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  • इस दिन रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे सूर्य देव…. नौतपा में पड़ेगी प्रचंड गर्मी

    इस दिन रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे सूर्य देव…. नौतपा में पड़ेगी प्रचंड गर्मी


    नई दिल्ली।
    ज्येष्ठ महीने (Jyeshtha month) के शुरू होते ही गर्मी अपना प्रचंड (Extreme Heat) रूप दिखाने लगी है. लेकिन अब नौतपा (Nautapa) के चलते सूरज आग के गोले की तरह तपने वाला है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 25 मई 2026 को दोपहर 03:37 बजे ग्रहों के राजा सूर्य देव अपने मित्र चंद्रमा के नक्षत्र ‘रोहिणी’ (Nakshatra ‘Rohini’) में प्रवेश कर रहे हैं. सूर्य का यह नक्षत्र परिवर्तन (Surya Nakshatra Parivartan 2026) प्रकृति और मानव जीवन पर बड़ा असर डालेगा. सूर्य के रोहिणी में आते ही 25 मई से 2 जून 2026 तक ‘नौतपा’ रहेगा, जिसके कारण उत्तर और मध्य भारत में भीषण हीटवेव (लू) की स्थिति बनेगी।

    वैदिक ज्योतिष के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा हैं, जो शीतलता के प्रतीक हैं. जब अग्नि तत्व सूर्य देव इस नक्षत्र में आते हैं, तो वे इसकी शीतलता को सोख लेते हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है. सूर्य का यह उग्र रूप 8 जून 2026 तक रहेगा, लेकिन शुरुआती 9 दिन यानी नौतपा का समय सबसे ज्यादा कष्टप्रद होगा. सूर्य के इस गोचर से जहां कुछ राशियों को लाभ होगा, वहीं 4 विशेष राशियां ऐसी हैं जिन्हें इस दौरान आर्थिक, मानसिक और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारी नुकसान और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


    1. वृषभ राशि (Taurus)

    चूंकि सूर्य देव आपकी ही राशि में रहते हुए रोहिणी नक्षत्र में गोचर कर रहे हैं, इसलिए इसका सबसे सीधा और गहरा प्रभाव आप पर पड़ेगा. इस अवधि में आपके स्वभाव में बेवजह का गुस्सा, अहंकार और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है. कार्यस्थल पर सहकर्मियों या बिजनेस में पार्टनर के साथ गंभीर विवाद हो सकते हैं. 25 मई से 8 जून के बीच पार्टनरशिप के कामों में कोई भी बड़ा फैसला जल्दबाजी में न लें. अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें, अन्यथा बनते काम बिगड़ सकते हैं.


    2. मिथुन राशि (Gemini)

    मिथुन राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर आपकी राशि से बारहवें भाव यानी व्यय और हानि के भाव में होने जा रहा है. इस दौरान आपके खर्चों में अप्रत्याशित रूप से भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे बजट पूरी तरह बिगड़ जाएगा. धन हानि के प्रबल योग बन रहे हैं. किसी कानूनी मामले या कोर्ट-कचहरी के चक्कर में दौड़भाग और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. इस समय अवधि में किसी को भी बड़ा कर्ज या उधार देने से बचें. पैसों के लेनदेन में पूरी सतर्कता बरतें.


    3. वृश्चिक राशि (Scorpio)

    सूर्य देव आपकी राशि से सातवें भाव (साझेदारी और वैवाहिक जीवन) में गोचर करेंगे, जो सीधे आपके रिश्तों को प्रभावित करेगा. दांपत्य जीवन में जीवनसाथी के साथ गलतफहमियां और तनाव बढ़ सकता है. व्यापार में यदि पार्टनरशिप है, तो वहां भी मतभेद उभर सकते हैं. कार्यक्षेत्र में आपकी प्रतिष्ठा को थोड़ी ठेस पहुंचने की आशंका है. जीवनसाथी के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें. किसी भी व्यावसायिक दस्तावेज पर बिना अच्छी तरह पढ़े हस्ताक्षर न करें.


    4. कुंभ राशि (Aquarius)

    कुंभ राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर चौथे भाव में होने जा रहा है, जिसे सुख, संपत्ति और माता का भाव माना जाता है. पारिवारिक सुख-शांति में कमी आ सकती है और घरेलू मोर्चे पर वाद-विवाद की स्थिति बन सकती है. भूमि, मकान या वाहन से जुड़े मामलों में अचानक रुकावटें आ सकती हैं. इसके अलावा, सेहत में गिरावट आ सकती है. अपनी माता के स्वास्थ्य को लेकर बिल्कुल भी लापरवाही न बरतें. सीने में तकलीफ या हाई ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) के मरीज इस दौरान अपनी दवाइयां समय पर लें और धूप में निकलने से बचें.

  • चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास

    चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास


    नई दिल्ली ।भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना एक बड़ी जरूरत बन जाता है। ऐसे समय में लोग आमतौर पर छाछ, लस्सी और नींबू पानी का सहारा लेते हैं, लेकिन रोज एक ही स्वाद से मन ऊब जाता है। इसी वजह से फालसा छाछ एक बेहतरीन और पारंपरिक विकल्प के रूप में सामने आती है, जो न केवल शरीर को ठंडक देती है बल्कि अपने खट्टे-मीठे स्वाद से ताजगी का नया अनुभव भी कराती है। यह पेय गर्मियों में शरीर को अंदर से ठंडा रखने और लू के असर को कम करने में मददगार माना जाता है।

    फालसा एक मौसमी फल है जिसमें प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण पाए जाते हैं। जब इसे दही और मसालों के साथ मिलाकर छाछ के रूप में तैयार किया जाता है तो यह एक सुपर समर ड्रिंक बन जाता है। यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ ऊर्जा भी प्रदान करता है और पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।

    फालसा छाछ बनाने के लिए सबसे पहले ताजे फालसा को अच्छी तरह धोकर एक बर्तन में लिया जाता है। इसमें हल्की मात्रा में चीनी या मिश्री और थोड़ा पानी मिलाकर इसे हाथों से अच्छे से मसल लिया जाता है ताकि इसका गूदा अलग हो जाए और स्वाद पूरी तरह निकल आए। इसके बाद इस मिश्रण को छानकर बीज अलग कर दिए जाते हैं और एक गाढ़ा खट्टा-मीठा जूस तैयार किया जाता है।

    इसके बाद एक बड़े बर्तन में ताजा दही लिया जाता है और उसमें ठंडा पानी मिलाया जाता है। इसी में तैयार फालसा जूस डाला जाता है। स्वाद को संतुलित बनाने के लिए काला नमक और भुना जीरा पाउडर मिलाया जाता है। इन सभी चीजों को अच्छे से मथकर तब तक फेंटा जाता है जब तक मिश्रण हल्का झागदार और स्मूद न हो जाए। यह प्रक्रिया छाछ को और अधिक स्वादिष्ट और पाचक बना देती है।

    तैयार छाछ को सर्व करने के लिए गिलास में बर्फ के टुकड़े डाले जाते हैं और ऊपर से यह ठंडी फालसा छाछ डाली जाती है। इसे पुदीने की पत्तियों और भुने जीरे से सजाकर परोसा जाता है। इसका स्वाद न केवल शरीर को ठंडक देता है बल्कि मानसिक रूप से भी ताजगी का अहसास कराता है।

    गर्मी के मौसम में यह पेय शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद दही के प्रोबायोटिक्स पाचन को सुधारते हैं और पेट की जलन को कम करते हैं। वहीं फालसा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन C शरीर को लू और तेज धूप के असर से बचाने में मदद करते हैं। यह ड्रिंक शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखकर डिहाइड्रेशन से भी राहत दिलाती है।

    इस तरह फालसा छाछ सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि गर्मियों में शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का एक आसान और स्वादिष्ट उपाय है, जिसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और रोजाना सेवन किया जा सकता है।

  • ग्रामीण और शहरी भारत के लिए बड़ा बदलाव, डाक विभाग की नई सर्विस से घर बैठे लोन और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध

    ग्रामीण और शहरी भारत के लिए बड़ा बदलाव, डाक विभाग की नई सर्विस से घर बैठे लोन और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध

    नई दिल्ली ।भारतीय वित्तीय सेवाओं के डिजिटल विस्तार में एक नया अध्याय जुड़ गया है, जहां अब बैंकिंग सुविधाएं सिर्फ शाखाओं तक सीमित नहीं रहेंगी बल्कि सीधे आम नागरिकों के घर तक पहुंचेंगी। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक द्वारा शुरू की गई नई स्मार्ट पोस्टमैन सेवा के तहत अब डाकिया केवल पत्र या पार्सल ही नहीं, बल्कि वित्तीय सेवाओं का पूरा पैकेज लेकर लोगों के दरवाजे तक पहुंचेगा। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं को और अधिक सरल, तेज और सुलभ बनाना बताया जा रहा है।

    नई व्यवस्था के तहत डाकिया अब बायोमेट्रिक डिवाइस और डिजिटल टैबलेट के माध्यम से लोगों को पर्सनल लोन, माइक्रो इंश्योरेंस और डिजिटल लॉकर जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम होगा। इसका सीधा लाभ उन लोगों को मिलेगा जो बैंक शाखाओं तक पहुंचने में असमर्थ हैं या जिनके लिए बैंकिंग प्रक्रियाएं जटिल और समय लेने वाली साबित होती हैं। इस पहल से वित्तीय समावेशन को भी नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सेवा के तहत ग्राहक घर बैठे ही लोन के लिए आवेदन कर सकेंगे और डाकिया उनके घर पहुंचकर आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन करेगा। सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद पात्रता के आधार पर लोन की राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर की जा सकेगी। इसी तरह माइक्रो इंश्योरेंस की सुविधा भी सरल प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे छोटे प्रीमियम पर बीमा कवरेज हासिल किया जा सकेगा।

    डिजिटल लॉकर सेवा के माध्यम से नागरिक अपने महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संरक्षित कर सकेंगे। डाकिया इस प्रक्रिया में दस्तावेजों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित करने में सहायता करेगा, जिससे कागजी दस्तावेजों के खोने या खराब होने की समस्या से राहत मिलने की संभावना है। यह कदम विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जो अपने दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।

    इस पूरी व्यवस्था को सरकार के वित्तीय समावेशन अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य देश के अंतिम व्यक्ति तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाना है। विशेषज्ञों के अनुसार इस पहल से छोटे व्यवसायियों, किसानों और निम्न आय वर्ग के परिवारों को काफी राहत मिल सकती है, क्योंकि उन्हें छोटे-छोटे वित्तीय कार्यों के लिए अब बैंक शाखाओं के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

    हालांकि, इस नई व्यवस्था के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और डिजिटल साक्षरता की कमी इस सेवा के प्रभावी संचालन में बाधा बन सकती है। इसके अलावा डाक कर्मचारियों पर बढ़ती जिम्मेदारियों के चलते उन्हें विशेष प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी ताकि सेवा की गुणवत्ता प्रभावित न हो।

    इसके बावजूद यह पहल भारतीय डाक प्रणाली को एक नए डिजिटल वित्तीय ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल बैंकिंग व्यवस्था को सरल बनाएगा बल्कि देश के आर्थिक ढांचे में भी व्यापक बदलाव ला सकता है।

  • चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी

    चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी


    नई दिल्ली। चंदन यानी सैंडलवुड आयुर्वेद में सदियों से त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता रहा है। इसे फेस पैक या लेप के रूप में लगाने से त्वचा को ठंडक, निखार और कई प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। खासकर गर्मी के मौसम में चंदन फेस केयर लेप को बेहद फायदेमंद माना जाता है।

    चंदन फेस पैक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह त्वचा की जलन और सनबर्न को शांत करता है। गर्मी या धूप के कारण होने वाली त्वचा की लालिमा को यह कम करने में मदद करता है। इसके नियमित उपयोग से त्वचा का रंग साफ और चमकदार दिखाई देने लगता है। साथ ही यह मुंहासों (acne) और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक माना जाता है।

    चंदन में मौजूद प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह अतिरिक्त तेल (excess oil) को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जिससे ऑयली स्किन वालों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। कई लोग इसे बेसन, हल्दी या गुलाब जल के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में उपयोग करते हैं।

    हालांकि, चंदन फेस पैक के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। संवेदनशील त्वचा (sensitive skin) वाले लोगों को इससे एलर्जी, खुजली या रैशेज की समस्या हो सकती है। यदि चंदन की गुणवत्ता शुद्ध न हो या उसमें केमिकल मिले हों, तो यह त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है।

    कुछ लोगों में इसका अधिक उपयोग त्वचा को अत्यधिक सूखा (dry) बना सकता है। इसलिए इसे हफ्ते में 2–3 बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उपयोग से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी माना जाता है ताकि किसी भी तरह की एलर्जी से बचा जा सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सैंडलवुड का सही और सीमित उपयोग त्वचा के लिए लाभकारी है, लेकिन गलत तरीके से या अधिक मात्रा में उपयोग नुकसानदेह भी हो सकता है। इसलिए हमेशा प्राकृतिक और शुद्ध चंदन पाउडर का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो चंदन फेस केयर लेप एक पारंपरिक और प्रभावी स्किन केयर उपाय है, जो सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा को प्राकृतिक निखार और ठंडक प्रदान करता है। लेकिन सावधानी और संतुलन इसके उपयोग की सबसे बड़ी जरूरत है।

  • बाजार में क्या रहेगा ट्रेंड? जानें 22 मई का शेयर मार्केट और गोल्ड आउटलुक

    बाजार में क्या रहेगा ट्रेंड? जानें 22 मई का शेयर मार्केट और गोल्ड आउटलुक


    नई दिल्ली। 22 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजार और सर्राफा बाजार दोनों में हलचल देखने को मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों के संकेत, डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां शुक्रवार के कारोबार की दिशा तय करेंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, शेयर बाजार में जहां उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, वहीं सोने की कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिल सकती है।

    भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक BSE Sensex और NIFTY 50 में शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में दबाव और खरीदारी दोनों का मिश्रित असर देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक बाजारों का रुख निवेशकों की धारणा को प्रभावित करेगा।

    आईटी, बैंकिंग और ऑटो सेक्टर के शेयरों में हल्की मजबूती देखने को मिल सकती है, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में मुनाफावसूली का दबाव रह सकता है। पिछले कुछ दिनों से बाजार में जारी तेजी के बाद निवेशक अब सतर्क नजर आ रहे हैं। ऐसे में ट्रेडिंग के दौरान उतार-चढ़ाव अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी जारी रहती है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। वहीं अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक आर्थिक संकेतकों का असर भी भारतीय बाजार पर दिखाई देगा। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे बिना रणनीति के बड़े निवेश से बचें और स्टॉप लॉस के साथ ट्रेडिंग करें।

    दूसरी ओर, सर्राफा बाजार में सोना की कीमतों में तेजी के संकेत मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की कमजोरी और सुरक्षित निवेश के बढ़ते रुझान के कारण सोने की मांग बढ़ सकती है। अनुमान है कि 24 कैरेट सोना 98 हजार से 99 हजार 500 रुपए प्रति 10 ग्राम के बीच कारोबार कर सकता है, जबकि 22 कैरेट सोने का भाव 89 हजार 500 से 91 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम तक रह सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं। यही वजह है कि गोल्ड में लगातार निवेश बढ़ रहा है। हालांकि शहरों और राज्यों के हिसाब से टैक्स और मेकिंग चार्ज के कारण कीमतों में थोड़ा अंतर हो सकता है।

    आर्थिक जानकारों के अनुसार, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार में गिरावट के दौरान अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदना फायदेमंद हो सकता है। वहीं सोने में निवेश करने वालों के लिए डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF भी अच्छे विकल्प बनकर उभर रहे हैं।

    कुल मिलाकर 22 मई का दिन निवेशकों के लिए काफी अहम रहने वाला है। शेयर बाजार में जहां सावधानी के साथ निवेश की जरूरत होगी, वहीं सोने की चमक निवेशकों को आकर्षित कर सकती है।

  • गोवा की बेकरी परंपरा को नई उड़ान, GI टैग से बढ़ेगा पारंपरिक ब्रेड्स का अंतरराष्ट्रीय बाजार

    गोवा की बेकरी परंपरा को नई उड़ान, GI टैग से बढ़ेगा पारंपरिक ब्रेड्स का अंतरराष्ट्रीय बाजार

    नई दिल्ली । गोवा की समृद्ध पाक परंपरा में शामिल पारंपरिक ब्रेड्स पोई, पाओ और उंडो को जल्द ही भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिलने की संभावना है। यह कदम न केवल इन पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इससे स्थानीय बेकरी उद्योग को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने इन ब्रेड्स के लिए संयुक्त रूप से GI टैग के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है, जिससे गोवा की सदियों पुरानी बेकरी परंपरा को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

    गोवा की इन पारंपरिक ब्रेड्स की जड़ें पुर्तगाली शासनकाल से जुड़ी हुई मानी जाती हैं, जब पाओ बनाने की तकनीक राज्य में आई थी। समय के साथ यह परंपरा गोवा की स्थानीय संस्कृति में इस तरह रच-बस गई कि आज यह वहां के दैनिक भोजन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। पोई, पाओ और उंडो न केवल स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि इनकी खास सुगंध और बनावट इन्हें अन्य ब्रेड्स से अलग पहचान देती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पारंपरिक विधियों को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इनके असली स्वरूप को बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे मार्केटिंग और ब्रांडिंग को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे इन ब्रेड्स की मांग राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ सकती है।

    स्थानीय बेकरी उद्योग लंबे समय से कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें पारंपरिक सामग्री की कमी और बदलती उत्पादन प्रक्रियाएं प्रमुख हैं। पहले जहां इन ब्रेड्स को पारंपरिक तरीकों और प्राकृतिक खमीर जैसी विधियों से तैयार किया जाता था, वहीं अब कई जगहों पर व्यावसायिक खमीर का उपयोग बढ़ गया है, जिससे इनके मूल स्वाद और गुणवत्ता में बदलाव देखा जा रहा है।

    इसके बावजूद गोवा में आज भी सैकड़ों बेकरी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं और पीढ़ियों से चली आ रही विधियों का पालन कर रही हैं। अनुमान है कि राज्य की अधिकांश बेकरी अभी भी इन पारंपरिक ब्रेड्स का उत्पादन करती हैं, जो स्थानीय लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा हैं।

    GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ने की उम्मीद है, खासकर उन देशों में जहां गोवा के प्रवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं। इससे न केवल स्थानीय उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलेगा बल्कि गोवा की सांस्कृतिक पहचान भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर और मजबूत होगी।

    राज्य पहले से ही कई कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए GI टैग प्राप्त कर चुका है और अब पारंपरिक ब्रेड्स का यह कदम इस सूची को और समृद्ध कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल गोवा की खाद्य विरासत को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाएगी।

  • यूपी पंचायतों में बड़ा बदलाव या राजनीतिक रणनीति? कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाने की तैयारी से सियासी हलचल तेज

    यूपी पंचायतों में बड़ा बदलाव या राजनीतिक रणनीति? कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाने की तैयारी से सियासी हलचल तेज

    नई दिल्ली  /उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासनिक ढांचे को लेकर एक नए संभावित प्रयोग ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में गहरी बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार इस विकल्प पर विचार कर रही है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी दी जा सकती है। अगर यह फैसला लागू होता है तो यह प्रदेश के पंचायत इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम माना जाएगा, क्योंकि अब तक इस तरह की व्यवस्था कभी नहीं अपनाई गई है।

    परंपरागत रूप से पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने और नए चुनाव होने तक की अवधि में प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों के पास रहती रही है, लेकिन इस बार तस्वीर बदलती नजर आ रही है। प्रस्ताव के तहत पंचायतों का कामकाज उन्हीं चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में रहने की संभावना है, जिनका कार्यकाल पूरा हो चुका होगा। इस संभावित बदलाव को लेकर जहां एक ओर इसे प्रशासनिक निरंतरता का कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे ग्रामीण राजनीति में सत्ता संतुलन से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्रामीण स्तर पर संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने की रणनीति भी हो सकती है। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में ग्राम प्रधान होते हैं, जो स्थानीय स्तर पर जनता और शासन के बीच सबसे अहम कड़ी माने जाते हैं। गांवों में विकास कार्यों से लेकर जनकल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन तक में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में इनका प्रशासनिक रूप से सक्रिय रहना ग्रामीण राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

    इस पूरे मुद्दे के केंद्र में पंचायत चुनावों की संभावित देरी भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाओं और आयोग की रिपोर्ट के चलते पंचायत चुनावों के समय पर होने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसी वजह से यह संभावना जताई जा रही है कि मौजूदा व्यवस्था को कुछ समय तक जारी रखने के लिए प्रशासनिक विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

    वहीं विपक्ष इस संभावित फैसले पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव टालकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है और इससे ग्रामीण स्तर पर सत्ता का संतुलन प्रभावित हो सकता है। उनका तर्क है कि अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को ही प्रशासक बना दिया गया तो निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर असर पड़ सकता है और यह राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा कानून में सरकार को असाधारण परिस्थितियों में प्रशासक नियुक्त करने का अधिकार जरूर दिया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों को दी जा सकती है या नहीं। इसी कारण इस प्रस्ताव को लेकर भविष्य में कानूनी चुनौती की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।

    प्रशासनिक स्तर पर यह भी चर्चा है कि अगर ग्राम पंचायतों में यह मॉडल लागू होता है तो इसका असर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर तक भी जा सकता है, जहां पहले से ही सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता रहा है। ऐसे में पूरे पंचायत ढांचे में एक नया प्रशासनिक और राजनीतिक मॉडल आकार ले सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण राजनीति की दिशा तय करने वाले संभावित कदम के रूप में भी समझा जा रहा है। गांवों में राजनीतिक पकड़ और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक चर्चा में रहने की संभावना है।

  • वैभव लक्ष्मी व्रत कथा: जानें शुक्रवार के दिन क्यों माना जाता है खास

    वैभव लक्ष्मी व्रत कथा: जानें शुक्रवार के दिन क्यों माना जाता है खास


    नई दिल्ली। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी दिन विशेष रूप से मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करने का भी विधान है, जिसे करने से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि, वैभव और शांति का संचार होता है। मान्यता है कि यह व्रत न केवल आर्थिक समस्याओं को दूर करता है, बल्कि दांपत्य जीवन में भी खुशहाली लाता है।

    इस व्रत की शुरुआत संकल्प लेकर की जाती है, जिसमें श्रद्धालु 11, 21 या अपनी इच्छा अनुसार जितने शुक्रवार तक व्रत रखने का निर्णय लेते हैं। हर शुक्रवार को पूरे नियम और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है और वैभव लक्ष्मी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। व्रत के दौरान भक्त मां लक्ष्मी को लाल फूल, मिठाई और विशेष रूप से खीर का भोग अर्पित करते हैं।

    व्रत कथा के अनुसार, एक समय एक शहर में लोग भक्ति और धर्म से दूर होकर भोग-विलास में डूब गए थे। उसी शहर में शीला नाम की एक धार्मिक और संतोषी स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। समय के साथ उसका पति बुरी संगत में पड़कर अपना सारा धन गंवा बैठा और जीवन संघर्षों से भर गया।

    शीला ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद भगवान पर आस्था बनाए रखी। एक दिन उसके घर एक दिव्य तेज से युक्त वृद्ध महिला आई, जिन्होंने शीला को मां लक्ष्मी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत सरल है और श्रद्धा से करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    उनके मार्गदर्शन पर शीला ने पूरे विश्वास के साथ यह व्रत प्रारंभ किया। हर शुक्रवार वह पूरी विधि से पूजा करती और कथा सुनती। धीरे-धीरे उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा। उसके पति का स्वभाव सुधरने लगा और वह मेहनत करके व्यापार करने लगा। कुछ समय बाद घर में फिर से धन-समृद्धि लौट आई और सुख-शांति स्थापित हो गई।

    कथा के अनुसार, व्रत के अंतिम चरण में उद्यापन किया जाता है, जिसमें सात सुहागिन महिलाओं को पूजा सामग्री या व्रत कथा की पुस्तक भेंट की जाती है। यह प्रक्रिया व्रत को पूर्ण करने के लिए आवश्यक मानी जाती है।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार, मां लक्ष्मी की आराधना से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सकारात्मकता का संचार होता है। विशेष रूप से मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करने से आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है।

    आज के समय में भी हजारों श्रद्धालु इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा के साथ करते हैं और इसे अपने जीवन में सुख-समृद्धि का माध्यम मानते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा कभी निष्फल नहीं जाती और मां लक्ष्मी अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखती हैं।

  • बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन

    बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन


    नई दिल्ली। त्वचा की देखभाल में नेचुरल उपाय हमेशा से प्रभावी माने गए हैं। खासकर फल (fruits) से बने स्क्रब स्किन को बिना नुकसान पहुंचाए साफ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। बाजार के केमिकल स्क्रब की तुलना में प्राकृतिक फलों से बने स्क्रब ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी माने जाते हैं।

    त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार पपीता एक बेहतरीन प्राकृतिक स्क्रब माना जाता है। इसमें मौजूद एंजाइम (papain) त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead skin cells) को हटाने में मदद करता है और स्किन को मुलायम बनाता है। यह मुंहासों और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक होता है।

    स्ट्रॉबेरी भी स्क्रब के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसमें प्राकृतिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो त्वचा को साफ करने के साथ-साथ पोर्स को टाइट करते हैं। यह स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बनाती है।

    केला भी एक अच्छा विकल्प है, खासकर ड्राय स्किन वालों के लिए। इसमें मौजूद विटामिन और मिनरल्स त्वचा को नमी प्रदान करते हैं और स्किन को सॉफ्ट बनाते हैं। इसे शहद के साथ मिलाकर स्क्रब की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

    संतरे का छिलका या उसका पाउडर भी एक प्राकृतिक स्क्रब की तरह काम करता है। यह त्वचा से अतिरिक्त तेल हटाने और टैनिंग कम करने में मदद करता है। इसमें विटामिन C होता है जो स्किन को ब्राइट बनाने में सहायक होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फलों से बने स्क्रब का नियमित लेकिन सीमित उपयोग ही करना चाहिए। हफ्ते में 2 बार स्क्रब करना पर्याप्त होता है। अधिक स्क्रबिंग से त्वचा में जलन या सूखापन हो सकता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी नए फल से बने स्क्रब को इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। अगर त्वचा संवेदनशील है तो हल्के और सौम्य फलों का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो पपीता, स्ट्रॉबेरी, केला और संतरा जैसे फल त्वचा के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित स्क्रब के रूप में बेहतरीन विकल्प हैं। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ये स्किन को साफ, स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से चमकदार बना सकते हैं।

  • मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय

    मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच ठंडा पानी हर किसी की जरूरत बन चुका है। कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचने के कारण घरों में रखा पानी भी जल्दी गर्म हो जाता है। ऐसे में फ्रिज का पानी भले ही तुरंत राहत देता है, लेकिन सेहत की दृष्टि से लोग अब फिर से मटके के पानी की ओर लौटने लगे हैं। मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा और ताजगी देने वाला माना जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी में यह भी जल्दी सामान्य तापमान पकड़ लेता है। इसी समस्या के समाधान के लिए पुराने समय से अपनाए जा रहे देसी तरीके एक बार फिर चर्चा में हैं।

    जानकारों के अनुसार, मटके के पानी को लंबे समय तक ठंडा रखने का सबसे सरल तरीका उसे सूती कपड़े से ढंकना है। कपड़े को गीला करके मटके के चारों ओर लपेटने से उसमें मौजूद नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती रहती है, जिससे मटके की सतह ठंडी बनी रहती है और अंदर का पानी भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। कई जगहों पर लोग सूती कपड़े की जगह टाट या जूट के बोरे का उपयोग भी करते हैं, जो गर्मी में बेहतर कूलिंग प्रभाव देते हैं।

    इसके अलावा मटके को रखने का स्थान भी पानी की ठंडक पर बड़ा असर डालता है। यदि मटका सीधे धूप या गर्म सतह पर रखा जाए तो पानी तेजी से गर्म हो जाता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में एक पुराना तरीका अपनाया जाता है, जिसमें मटके को गीली रेत या मिट्टी के बीच रखा जाता है। रेत में मौजूद नमी और ठंडक मटके को बाहर से ठंडा रखती है, जिससे पानी लंबे समय तक ताजा और ठंडा बना रहता है।

    कुछ घरेलू उपायों में नया मटका इस्तेमाल करने से पहले उसमें सेंधा नमक डालकर कुछ समय तक पानी भरकर रखने की परंपरा भी शामिल है। माना जाता है कि इससे मटके की प्राकृतिक ठंडक बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है। बाद में उस पानी को निकालकर ताजा पानी भरने पर मटका अधिक प्रभावी ढंग से पानी को ठंडा रखता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मटके का पानी न केवल प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर विकल्प है। अत्यधिक ठंडा फ्रिज का पानी कई बार गले और पाचन पर असर डाल सकता है, जबकि मटके का पानी शरीर को संतुलित तरीके से ठंडक प्रदान करता है। इसी कारण अब शहरों में भी लोग पारंपरिक तरीकों की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं और इन देसी जुगाड़ों को फिर से अपनाया जा रहा है, ताकि गर्मी के मौसम में बिना बिजली के भी ठंडे पानी का आनंद लिया जा सके।