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  • होर्मुज पर अमेरिका का ‘टोटल कंट्रोल’! ट्रंप बोले- ईरान सिर्फ हार टाल रहा, बातचीत की जरूरत नहीं

    होर्मुज पर अमेरिका का ‘टोटल कंट्रोल’! ट्रंप बोले- ईरान सिर्फ हार टाल रहा, बातचीत की जरूरत नहीं


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने की शांति के बाद फिर सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का लगभग पूरा नियंत्रण है और ईरान की अर्थव्यवस्था बिखर रही है। उनका यह बयान अमेरिकी हवाई हमलों के कुछ घंटे बाद आया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच जवाबी हमले और तेज हो गए हैं।

    ट्रंप बोले- बातचीत के लिए मजबूर नहीं कर रहे

    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में एबीसी न्यूज की उस रिपोर्ट को खारिज किया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका ईरान को बातचीत के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईरान किसी समझौते पर हस्ताक्षर करता है या नहीं। उनके मुताबिक, मौजूदा स्थिति ही अमेरिका के लिए बेहतर है, क्योंकि होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण है और ईरान की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है।

    उन्होंने कहा कि घटनाक्रम एक तय नतीजे की ओर बढ़ रहा है। साथ ही ट्रंप ने ईरान की जनता से अपनी सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील भी की।

    ईरान हर बार खारिज करता रहा है दावा

    फरवरी में टकराव शुरू होने के बाद से ट्रंप कई बार होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण का दावा कर चुके हैं। हालांकि, ईरान लगातार इन दावों को खारिज करता रहा है। मंगलवार को अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर भारी हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन, बहरीन और इराक में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।

    इससे पहले सप्ताहांत में जुलाई के बाद पहली बार दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी हुई थी। सोमवार को होर्मुज से निकल रहे दो तेल टैंकरों पर हमले की खबर भी सामने आई। इसके बाद कच्चे तेल की कीमत करीब 4 डॉलर प्रति बैरल बढ़कर पांच सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

    होर्मुज पर ईरान की पकड़ का दावा

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। ईरान ने इसे जहाजों के लिए बंद कर रखा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कहना है कि अमेरिकी हमलों के बाद जलमार्ग पर उसकी पकड़ और मजबूत होगी।

    ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल निर्यात को रोकने की कोशिश की गई तो वह दूसरे देशों को भी ऐसा करने की अनुमति नहीं देगा।

    ट्रंप ने युद्धविराम की संभावना भी नकारी

    ट्रंप ने नए युद्धविराम की संभावना को भी खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि ईरान को समझौते के लिए पहले ही कई मौके दिए जा चुके हैं और अब किसी नए समझौते की जरूरत नहीं है।

    महीनों से जारी तनाव के बीच जून में हुआ समझौता भी ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को दोनों देशों के बीच टकराव का सबसे बड़ा मुद्दा माना जा रहा है। ऐसे में ट्रंप के ताजा बयान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव और बढ़ने की आशंका है।

  • होर्मुज में बारूद, जहाजों पर खतरा, अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर क्यों गिराए बम?

    होर्मुज में बारूद, जहाजों पर खतरा, अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर क्यों गिराए बम?


    नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर एयर स्ट्राइक की है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान ने भी जवाबी हमला किया और जॉर्डन व कतर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए मिसाइलें दागने का दावा किया। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया के तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

    अमेरिकी सेना ने बताया है कि लारक आईलैंड पर हमला किसी बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक संभावित तत्काल खतरे को खत्म करने के लिए सीमित और सटीक कार्रवाई की गई।

    अमेरिका के मुताबिक क्या था खतरा?

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की माइन बिछाने वाली यूनिट समुद्र में माइंस तैनात करने की तैयारी कर रही थी। इसके लिए दो रॉकेट लॉन्चरों का इस्तेमाल किए जाने की आशंका थी।

    अमेरिका का दावा है कि अगर ये समुद्री माइंस होर्मुज स्ट्रेट के शिपिंग रूट में बिछा दी जातीं तो तेल टैंकरों और दूसरे व्यावसायिक जहाजों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। इसी वजह से अमेरिकी सेना ने इसे ‘इमिनेंट थ्रेट’ यानी तत्काल खतरा माना और दोनों लॉन्चरों को निशाना बनाया।

    लारक आईलैंड ही क्यों बना निशाना?

    लारक आईलैंड ईरान के दक्षिणी तट के पास फारस की खाड़ी में स्थित है और होर्मुज स्ट्रेट के बेहद करीब है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग रूट्स में से एक है। यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या जहाजों की आवाजाही में रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    इसी रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका का दावा है कि लारक आईलैंड पर मौजूद सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना और किसी संभावित खतरे को रोकना जरूरी था।

    पहले माइंस हटाईं, फिर हमला क्यों किया?

    अमेरिकी सेना के मुताबिक, उसने हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट के अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट से पहले बिछाई गई समुद्री माइंस को हटाने का अभियान पूरा किया था।

    इसके बाद अमेरिकी निगरानी में IRGC की गतिविधियां सामने आईं। अमेरिका का दावा है कि ईरान दो लॉन्चरों के जरिए नई समुद्री माइंस तैनात करने की तैयारी कर रहा था।

    वॉशिंगटन के मुताबिक, माइंस शिपिंग लेन में पहुंच जातीं तो तेल टैंकरों और दूसरे कमर्शियल जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती थी। इसलिए अमेरिका ने संभावित खतरे के बढ़ने का इंतजार करने के बजाय लॉन्चरों को निशाना बनाया।

    ईरान ने कैसे दिया जवाब?

    ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को आक्रामक हमला बताया है। IRGC ने दावा किया कि लारक आईलैंड पर अमेरिकी हमले में उसके कई जवान और अन्य लोग मारे गए या घायल हुए।

    इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों की मेजबानी करने वाले दो ठिकानों की ओर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। जॉर्डन ने अपने एयरस्पेस में आठ मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने का दावा किया है।

    होर्मुज में अब क्या स्थिति?

    अमेरिकी हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने स्ट्रेट में एक शिप-टू-शिप ऑयल ट्रांसफर भी रुकवाया है। वहीं, अमेरिकी एयर स्ट्राइक की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखी गई।

    ईरान और ओमान के बीच होर्मुज को लेकर आपसी सहमति बनी हुई है, लेकिन इसके बावजूद स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पहले ही कम हुई है।

    क्या बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है?

    फिलहाल अमेरिका का कहना है कि लारक आईलैंड पर कार्रवाई का उद्देश्य ईरान के सैन्य ढांचे को बड़े पैमाने पर तबाह करना नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों के लिए पैदा हो रहे तत्काल खतरे को खत्म करना था।

    दूसरी ओर, ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है और जवाबी कार्रवाई भी कर चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लारक आईलैंड पर अमेरिकी हमला और ईरान का पलटवार दोनों देशों को एक बड़े सैन्य टकराव की ओर ले जाएगा?

  • लारक द्वीप पर अमेरिकी हमले के बाद ईरान का पलटवार, जॉर्डन में US सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी

    लारक द्वीप पर अमेरिकी हमले के बाद ईरान का पलटवार, जॉर्डन में US सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी


    नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिका ने ईरान के लारक द्वीप पर दो सैन्य लॉन्चरों को निशाना बनाया। इसके बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला करने का दावा किया है। ईरानी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी हमले में कई ईरानी सैन्यकर्मी और नागरिक मारे गए तथा घायल हुए हैं।

    अमेरिका ने लारक द्वीप पर दो लॉन्चरों को बनाया निशाना

    अमेरिकी सेना ने रविवार को लारक द्वीप पर दो ईरानी लॉन्चरों पर हमला किया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, IRGC के जवान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री खदानें बिछाने के लिए रॉकेट लॉन्च करने की तैयारी कर रहे थे।

    यह जुलाई के अंत के बाद ईरान के भीतर अमेरिका का पहला ज्ञात हमला बताया जा रहा है। उस समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े दो सप्ताह के अमेरिकी सैन्य अभियान को रोक दिया था।

    एक अमेरिकी अधिकारी ने एक्सियोस और बाद में रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी सेना ने दो ईरानी लॉन्चरों को निशाना बनाया। अधिकारी के मुताबिक, अमेरिकी सेना इलाके पर करीबी नजर रख रही है और जलडमरूमध्य से होकर व्यापार के मुक्त प्रवाह की सुरक्षा के लिए तैयार है।

    समुद्री खदानों को लेकर अमेरिका की जीरो टॉलरेंस नीति

    अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिकी सेना ने हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य के मुख्य शिपिंग रूट से समुद्री खदानें हटाने का अभियान पूरा किया था।

    इसके बाद ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी थी कि समुद्री खदानें बिछाने में शामिल किसी भी जहाज या नाव को तुरंत और व्यवस्थित तरीके से नष्ट कर दिया जाएगा। उन्होंने साफ कहा था कि समुद्री खदानें बिछाने को लेकर अमेरिका की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति है।

    ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हमले का दावा किया

    लारक द्वीप पर अमेरिकी हमले के जवाब में IRGC ने सोमवार को दावा किया कि उसने जॉर्डन में किंग हुसैन और अल-अज्रक स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है। ईरानी मीडिया ने इसकी जानकारी दी।

    इससे पहले IRGC ने कहा था कि अमेरिकी हमले का जवाब ईरान के लोग देंगे और हमलावर को इसकी कीमत चुकानी होगी। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी हमले में कई ईरानी सैन्यकर्मी और नागरिक मारे गए तथा घायल हुए हैं।

    IRGC के एक प्रवक्ता ने कहा कि लारक द्वीप पर हमले की कीमत अमेरिका को आर्थिक और सैन्य, दोनों मोर्चों पर चुकानी होगी।

    ड्रोन हमले में दो लोगों की मौत का भी दावा

    IRGC से जुड़े तस्नीम न्यूज एजेंसी ने अलग से दावा किया कि हमले में ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। एजेंसी के मुताबिक, इसमें दो लोगों की मौत हुई और दो अन्य घायल हुए हैं।

    ईरान की ताजा जवाबी कार्रवाई के बाद क्षेत्र में सैन्य टकराव और बढ़ने की आशंका है। अमेरिका अब सीधे बमबारी अभियान के साथ-साथ ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। यह संघर्ष अब सातवें महीने में प्रवेश कर चुका है।

  • अमेरिकी सेना की मदद करने वाले अफगान परिवार को भी नहीं बख्शा, ट्रंप प्रशासन ने दर्जनों प्रवासियों को अफ्रीका भेजा

    अमेरिकी सेना की मदद करने वाले अफगान परिवार को भी नहीं बख्शा, ट्रंप प्रशासन ने दर्जनों प्रवासियों को अफ्रीका भेजा


    नई दिल्ली। अमेरिकी सेना के साथ काम करने वाले परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक अफगान नागरिक समेत दर्जनों प्रवासियों को ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका से निकालकर अफ्रीकी देश सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य भेज दिया। शनिवार (29 अगस्त) को हुई इस निर्वासन उड़ान में 12 अफगान और 8 ईरानी नागरिकों के अलावा नेपाल और निकारागुआ के कई नागरिक भी शामिल थे। अफगान नागरिक के वकील और मानवाधिकार संगठनों ने इसकी जानकारी दी है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वासित किए गए अफगान नागरिक की उम्र करीब 20 साल है। उसके वकील अल्मा डेविड के अनुसार, अमेरिकी अदालत ने उसे अफगानिस्तान भेजे जाने से सुरक्षा दी थी, क्योंकि वहां उसे तालिबान से खतरा था। अदालत में पेश दस्तावेजों के मुताबिक, अमेरिकी सेना के समर्थन में उसके भाइयों द्वारा किए गए काम की वजह से अफगानिस्तान में उसके परिवार को तालिबान की धमकियां मिली थीं।

    एक भाई अमेरिकी सेना के साथ काम कर चुका, दूसरे की तालिबान ने की हत्या

    अल्मा डेविड के मुताबिक, अफगान नागरिक का एक भाई अमेरिका में रहता है और अफगान नेशनल आर्मी में काम कर चुका है। यह सेना 2021 में तालिबान के सत्ता में आने से पहले अमेरिकी सेना के साथ मिलकर काम करती थी। उसके एक अन्य भाई ने अमेरिकी प्रशिक्षण लेकर पायलट के तौर पर काम किया था, लेकिन तालिबान ने उसकी हत्या कर दी थी।

    इसके बावजूद अफगान नागरिक को अमेरिका में रहने की अनुमति नहीं मिली और उसे निर्वासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

    12 अफगान और 8 ईरानी नागरिकों को भेजा गया

    शनिवार को सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई पहुंची निर्वासन उड़ान में 12 अफगान और 8 ईरानी नागरिक शामिल थे। इसके अलावा नेपाल और निकारागुआ के कई नागरिकों को भी इसी उड़ान से भेजा गया। ह्यूमन राइट्स फर्स्ट की नीति, शरणार्थी और अप्रवासी अधिकार निदेशक सावी अरवे ने इसकी जानकारी दी।

    मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने कई गुप्त समझौतों के तहत हजारों प्रवासियों को करीब दो दर्जन ऐसे देशों में भेजा है, जो उनके अपने देश नहीं हैं। इसे प्रशासन की व्यापक इमिग्रेशन कार्रवाई का हिस्सा माना जा रहा है।

    जून के बाद सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य के लिए दूसरी उड़ान

    इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए कुछ शरण मांगने वालों को कानूनी रास्ते से अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों में वापस भेजा जा रहा है, जहां से वे भागे थे।

    शनिवार की उड़ान जून के बाद सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य के लिए ऐसी दूसरी निर्वासन उड़ान थी। जून में भेजी गई उड़ान में करीब दो दर्जन प्रवासी शामिल थे। इनमें एक ईरानी महिला भी थी, जिसने अपने देश में उत्पीड़न का सामना करने की बात कही थी।

    मानवाधिकार संगठनों ने ट्रंप प्रशासन की इस नीति को लेकर चिंता जताई है और सवाल उठाया है कि ऐसे लोगों को उन देशों में भेजना कितना सुरक्षित है, जहां उन्हें उत्पीड़न या खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

  • वेनेजुएला के 65 अरब बैरल तेल पर अमेरिका की नजर, ट्रंप बोले- यह दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल डील

    वेनेजुएला के 65 अरब बैरल तेल पर अमेरिका की नजर, ट्रंप बोले- यह दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल डील


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को बड़ा दावा करते हुए कहा कि अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ एक ऐसा समझौता किया है, जिसके तहत करीब 65 अरब बैरल तेल भंडार पर अमेरिका का नियंत्रण होगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस समझौते की जानकारी दी और इसे दुनिया की सबसे बड़ी तेल डील बताया।

    ट्रंप के अनुसार, यह समझौता अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री हेगसेथ और वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज के बीच हुई बातचीत के बाद हुआ। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने अभी-अभी वेनेजुएला देश के साथ एक समझौता किया है- जो दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी तेल डील है!”

    मादुरो की गिरफ्तारी के बीच हुआ ऐलान

    अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अमेरिका लाने का ऑपरेशन चलाया था। इसके बाद मादुरो पर नार्को-टेररिज्म और ड्रग तस्करी से जुड़े संघीय आरोप लगाए जाने की बात कही गई थी।

    इस बीच अमेरिका में गैस की बढ़ती कीमतों को लेकर ट्रंप प्रशासन पर दबाव भी बढ़ रहा है। ईरान में करीब छह महीने से युद्ध जारी है और फिलहाल इसके खत्म होने के संकेत नहीं हैं। ऐसे हालात में अमेरिका ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का इस्तेमाल किया है। अगस्त की शुरुआत तक इस भंडार में 30 करोड़ बैरल से भी कम तेल बचा था।

    मादुरो को हटाने के बाद वेनेजुएला पर बढ़ा फोकस

    जनवरी में निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाने के बाद ट्रंप ने अमेरिकी तेल कंपनियों को दोबारा वेनेजुएला भेजने और वहां मौजूद तेल भंडार का इस्तेमाल करने की बात कही थी।

    ट्रंप का आरोप रहा है कि वेनेजुएला ने अमेरिका का तेल चुराया था। उनका तर्क था कि वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने दशकों पहले सैकड़ों विदेशी संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया था, जिनमें अमेरिकी तेल कंपनियों की संपत्तियां भी शामिल थीं।

    303 अरब बैरल का भंडार, फिर भी उत्पादन सिर्फ 1%

    वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक है। अनुमान के मुताबिक देश की जमीन के नीचे करीब 303 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक यह दुनिया के कुल तेल भंडार का करीब 17% है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया के कई हिस्सों में बिना इस्तेमाल हुए तेल की खोज अभी भी जारी रहती है, जबकि वेनेजुएला के भूमिगत तेल भंडार का बड़ा हिस्सा पहले ही चिन्हित किया जा चुका है और उसके बारे में जानकारी उपलब्ध है।

    हालांकि, कमजोर बुनियादी ढांचे और अन्य समस्याओं के कारण इतना बड़ा भंडार होने के बावजूद वेनेजुएला दुनिया के कुल तेल उत्पादन का सिर्फ 1% ही उत्पादन कर पाता है।

  • ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर

    ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर


    नई दिल्ली। ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। अमेरिकी ट्रेजरी ने 4 इंडिया-बेस्ड कंपनियों और 3 भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन कंपनियों पर ईरानी पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के कारोबार में शामिल होने का आरोप है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित लेनदेन की कुल कीमत करीब 119 मिलियन डॉलर है।

    यह कार्रवाई ईरान के वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका की ओर से चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है। अमेरिकी ट्रेजरी का कहना है कि इसका उद्देश्य उन आर्थिक रास्तों को निशाना बनाना है, जिनका इस्तेमाल ईरान राजस्व जुटाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए करता है।

    सदाशिव ओवरसीज पर 69 मिलियन डॉलर के आयात का आरोप
    अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, इंडिया-बेस्ड सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड ने फरवरी 2024 से जून 2025 के बीच करीब 69 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। इनमें कुछ शिपमेंट ऐसी कंपनी से जुड़े बताए गए हैं, जिस पर अमेरिका पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है।

    इसके अलावा PP सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड और प्रकृतिस इंफ्रा इम्पेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पर करीब 25-25 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का आरोप लगाया गया है। इन तीनों कंपनियों के कारोबार को मिलाकर कुल रकम करीब 119 मिलियन डॉलर बताई गई है।

    चौथी कंपनी पर पेट्रोकेमिकल शिपमेंट में मदद का आरोप
    अमेरिका ने पोर्टईज पार्टनर्स LLP पर भी कार्रवाई की है। आरोप है कि कंपनी ने ईरान से पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कई खेप भारत लाने में मदद की। अमेरिका ने कंपनियों के अलावा तीन भारतीय नागरिकों को भी प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। इनमें PP सॉफ्टटेक के निदेशक प्रशांत गर्ग, पोर्टईज पार्टनर्स से जुड़े इदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी शामिल हैं।

    अमेरिका ने देशों को दी चेतावनी
    अमेरिका पहले ही विभिन्न देशों को चेतावनी दे चुका है कि वे ईरान को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए तय समयसीमा का पालन करें। ऐसा नहीं करने पर संबंधित कंपनियों और संस्थाओं को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, इस अभियान का मकसद ईरान के उन आर्थिक रास्तों को बंद करना है, जिनके जरिए वह राजस्व हासिल करता है और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करता है।

  • तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी का अमेरिकी दौरा रद्द, केंद्र से मंजूरी नहीं मिलने का आरोप लगाकर सरकार पर साधा निशाना

    तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी का अमेरिकी दौरा रद्द, केंद्र से मंजूरी नहीं मिलने का आरोप लगाकर सरकार पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का प्रस्तावित अमेरिका दौरा रद्द हो गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बताया गया है कि केंद्र सरकार से आवश्यक मंजूरी नहीं मिलने के कारण मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल की अमेरिका यात्रा आगे नहीं बढ़ सकी। रेवंत रेड्डी फिलहाल लंदन के दौरे पर हैं और अमेरिका की यात्रा के बजाय लंदन से सीधे हैदराबाद लौट सकते हैं।

    मुख्यमंत्री का विदेश दौरा राज्य में निवेश, शिक्षा और विभिन्न संस्थानों के साथ संभावित सहयोग को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा था। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लंदन के बाद रेवंत रेड्डी को 24 अगस्त को अमेरिका पहुंचना था। वहां कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों और अन्य प्रतिनिधियों के साथ बैठकें प्रस्तावित थीं। दौरे में तेलंगाना राइजिंग टीम के अधिकारी भी शामिल थे।

    जानकारी के मुताबिक, रेवंत रेड्डी 20 अगस्त को लंदन पहुंचे थे। लंदन प्रवास के दौरान उनके ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और लंदन बिजनेस स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जाने का कार्यक्रम था। इन मुलाकातों के जरिए शिक्षा, कौशल, निवेश और राज्य के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर बातचीत की योजना बनाई गई थी।

    लंदन के बाद अमेरिका में भी मुख्यमंत्री के कई कार्यक्रम निर्धारित थे। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी में जाने की योजना थी। इसके अलावा बोस्टन में 25 अगस्त को एक टीम के साथ बातचीत और 26 अगस्त को न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में शामिल होने का कार्यक्रम प्रस्तावित था।

    मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, विदेश मंत्रालय से आवश्यक अनुमति नहीं मिलने के कारण अमेरिका की यात्रा रद्द करनी पड़ी। कार्यालय ने कहा कि रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में तेलंगाना राइजिंग प्रतिनिधिमंडल को अमेरिका जाने की मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद यात्रा कार्यक्रम में बदलाव किया गया है।

    अमेरिका दौरे के दौरान जिन संस्थानों और प्रतिनिधियों के साथ बैठकें प्रस्तावित थीं, उनमें से कुछ कार्यक्रमों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय आगे की तारीखों के लिए निर्धारित करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य सरकार की ओर से संबंधित अधिकारियों को इस संबंध में कार्यक्रमों को पुनर्निर्धारित करने के लिए कहा गया है।

    मुख्यमंत्री के इस दौरे की पृष्ठभूमि में तेलंगाना में निवेश आकर्षित करने और राज्य के विकास से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को मजबूत करने की कोशिश भी देखी जा रही थी। प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा के दौरान उद्योग, शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ संवाद की संभावना थी।

    रेवंत रेड्डी 19 अगस्त को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली में थे। इसके बाद वह 20 अगस्त को लंदन के लिए रवाना हुए। पहले तय कार्यक्रम के अनुसार उनकी विदेश यात्रा के बाद 30 अगस्त को हैदराबाद लौटने की योजना थी। हालांकि अमेरिका दौरा रद्द होने के बाद अब उनकी वापसी की समय-सारणी में बदलाव हो सकता है।

    अमेरिकी यात्रा को लेकर अनुमति नहीं मिलने का मुद्दा केंद्र और तेलंगाना सरकार के बीच राजनीतिक मतभेदों को लेकर भी चर्चा में आ गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने अनुमति नहीं मिलने की बात कही है, जबकि इस घटनाक्रम के बाद राज्य सरकार के आगामी विदेश संपर्क कार्यक्रमों में भी बदलाव की संभावना बनी हुई है।

  • हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित हुई मोरारी बापू की ऐतिहासिक रामकथा, भारत से पहुंचे प्रमुख साधु-संतों ने भी लिया भाग

    हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित हुई मोरारी बापू की ऐतिहासिक रामकथा, भारत से पहुंचे प्रमुख साधु-संतों ने भी लिया भाग

    नई दिल्ली ।अमेरिका के कैम्ब्रिज स्थित प्रतिष्ठित हार्वर्ड विश्वविद्यालय के सैंडर्स थिएटर में आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला, जहां प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु मोरारी बापू द्वारा नौ दिवसीय रामकथा का आयोजन किया गया। इस विशेष कथा में भारत के विभिन्न प्रमुख तीर्थ स्थलों से आए बड़ी संख्या में साधु-संतों और विद्वानों ने सहभागिता की। कथा के दौरान विश्वविद्यालय प्रांगण में गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती भी पूरे श्रद्धाभाव के साथ मनाई गई।

    नौ दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत 15 अगस्त को हुई, जिसका समापन 23 अगस्त को होगा। इस आयोजन के दौरान शिक्षाविदों और आचार्यों के बीच तीन दिवसीय विशेष विद्वत चर्चा का भी आयोजन किया गया। मोरारी बापू ने कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सावन के पवित्र महीने में तुलसी जयंती के अवसर पर यह आयोजन ज्ञान, सत्य, प्रेम और करुणा के मूलभूत सिद्धांतों को उजागर करने के उद्देश्य से किया गया है।

    विश्वविद्यालय के लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टीट्यूट की फैकल्टी डायरेक्टर प्रोफेसर डायना ने इस अवसर पर कहा कि भगवान राम की अयोध्या से शुरू होकर रामेश्वरम तक की 14 वर्षों की यात्रा ने भारतीय उपमहाद्वीप में पवित्र सांस्कृतिक स्थलों का निर्माण किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि रामलीला और रामचरितमानस की परंपरा भारत की सीमाओं से निकलकर थाईलैंड, इंडोनेशिया और कंबोडिया जैसे देशों तक विस्तृत हुई है।

    समारोह में पहुंचे अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय के आदर्श वाक्य ‘वेरिटास’ यानी सत्य की तुलना भारतीय दर्शन के सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों से की। वक्ताओं ने कहा कि यह आयोजन दुनिया की सबसे प्राचीन पाठ और वाचन परंपराओं को दुनिया के शीर्ष शिक्षण संस्थानों के साथ जोड़ने का एक अनूठा प्रयास है।

    मोरारी बापू द्वारा वर्ष 2010 में तुलसी जयंती के अवसर पर शुरू की गई इस विशेष पहल का मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति, ज्ञान परंपरा और रामचरितमानस के संदेशों को वैश्विक पटल पर संरक्षित और प्रसारित करना है। इससे पूर्व भी वे कैलाश मानसरोवर, वेटिकन सिटी, संयुक्त राष्ट्र संघ और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जैसे ऐतिहासिक स्थानों पर रामकथा का आयोजन कर चुके हैं।

    हार्वर्ड में आयोजित इस कार्यक्रम में अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट जैसे आध्यात्मिक केंद्रों से पहुंचे साधु- संन्यासियों की उपस्थिति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। मध्य प्रदेश सहित भारत के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने भी इस वैश्विक आयोजन में अपनी सहभागिता दर्ज कराई। इस आयोजन को वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति और दर्शन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • ईरान ने अमेरिकी सैनिकों को पकड़ने या मारने पर 30 हजार डॉलर इनाम घोषित किया, महिला के लिए राशि दोगुनी होगी

    ईरान ने अमेरिकी सैनिकों को पकड़ने या मारने पर 30 हजार डॉलर इनाम घोषित किया, महिला के लिए राशि दोगुनी होगी

    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच ईरानी सेना की ओर से अमेरिकी सैनिकों को लेकर बड़ा ऐलान किया गया है। ईरान के सेना प्रमुख अमीर हातमी ने घोषणा की है कि किसी अमेरिकी सैनिक को मारने या पकड़ने वाले व्यक्ति को 30 हजार डॉलर का इनाम दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण स्थिति और गंभीर हो गई है।

    अमीर हातमी के मुताबिक, यदि किसी अमेरिकी सैनिक को पकड़ने या मारने की कार्रवाई किसी महिला द्वारा की जाती है तो इनाम की राशि दोगुनी होकर 60 हजार डॉलर हो जाएगी। हालांकि, इस घोषणा के तहत इनाम हासिल करने की प्रक्रिया, पात्रता और भुगतान से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    ईरानी सेना का यह ऐलान ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष समाप्त करने की दिशा में बातचीत को लेकर कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव और तीखी बयानबाजी का दौर जारी है। ऐसे माहौल में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने के लिए आर्थिक इनाम की घोषणा को ईरान के कड़े रुख के तौर पर देखा जा रहा है।

    इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है। लंबे समय तक समुद्री यातायात बाधित रहने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।

    ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लंबे समय से क्षेत्रीय तनाव का प्रमुख कारण बताया जाता रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका ईरान की सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय प्रभाव को सुरक्षा चुनौती के रूप में देखता है। दोनों देशों के बीच मतभेद केवल सैन्य मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रभाव से जुड़े व्यापक विवाद भी इसमें शामिल हैं।

    अमीर हातमी का बयान उस समय सामने आया है जब ईरान के भीतर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ समर्थन और प्रतिक्रिया का माहौल बना हुआ है। बताया गया है कि अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वित्तीय सहायता से संबंधित बड़ी संख्या में अनुरोध प्राप्त हुए थे। इसी पृष्ठभूमि में इनाम की घोषणा किए जाने की बात कही गई है।

    हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि घोषित इनाम के तहत किसी अमेरिकी सैनिक को पकड़ने या मारने की कोई कार्रवाई हुई है या नहीं। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि ऐसी किसी कार्रवाई के बाद संबंधित व्यक्ति तक इनाम की राशि किस प्रक्रिया के माध्यम से पहुंचाई जाएगी।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व में सैन्य गतिविधियों के बढ़ने से क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ी है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर दुनिया की नजर बनी हुई है।

    ईरानी सेना की इस घोषणा ने दोनों देशों के बीच संघर्ष को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। एक तरफ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे बयानों से सैन्य टकराव और तीखा होने की आशंका बढ़ती है। फिलहाल संघर्ष को समाप्त करने और समुद्री मार्गों पर सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में किसी ठोस समाधान का इंतजार बना हुआ है।

  • अमेरिका में नई कार की पूजा के दौरान पंडित ने स्वस्तिक बनाने से किया इनकार, सामने आई बड़ी वजह

    अमेरिका में नई कार की पूजा के दौरान पंडित ने स्वस्तिक बनाने से किया इनकार, सामने आई बड़ी वजह

    नई दिल्ली ।विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और धार्मिक परंपराओं को सहेजकर रखने के लिए जाने जाते हैं। चाहे कोई नया घर खरीदना हो या नई गाड़ी, पूजा-पाठ और अनुष्ठान की रस्में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं। हाल ही में अमेरिका से एक ऐसा ही दिलचस्प मामला सामने आया है, जहां एक भारतीय मूल की महिला ने अपनी नई कार की वैदिक रीति-रिवाज से पूजा कराई। हालांकि, इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान एक अनोखी स्थिति देखने को मिली, जब पंडित ने गाड़ी पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाने से मना कर दिया।

    सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो के अनुसार, अमेरिका में रह रही सारिका नाम की कंटेंट क्रिएटर ने अपनी नई कार की पूजा का आयोजन किया था। इस दौरान धोती-कुर्ता पहने पंडित ने भारतीय परंपरा के अनुसार पूरी विधि से पूजा संपन्न कराई। कार के बोनट पर सिंदूर से भगवान गणेश की आकृति बनाई गई, पुष्प अर्पित किए गए और सुरक्षा की कामना के साथ गंगाजल का छिड़काव किया गया। इसके अतिरिक्त, टायर के नीचे नींबू रखकर गाड़ी आगे बढ़ाने जैसी पारंपरिक रस्म भी पूरी की गई।

    पूजा के दौरान जब महिला ने कार पर ‘ओम’ और ‘स्वस्तिक’ बनाने का अनुरोध किया, तो पंडित ने ‘ओम’ का चिन्ह सहजता से अंकित कर दिया। हालांकि, जब स्वस्तिक बनाने की बात आई तो उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। पंडित का यह फैसला किसी धार्मिक मान्यता या मतभेद के कारण नहीं, बल्कि अमेरिका में स्वस्तिक को लेकर व्याप्त गलतफहमी और उससे उत्पन्न होने वाले संभावित विवादों से बचाव के लिए था।

    दरअसल, पश्चिमी देशों में कई लोग सनातन परंपरा के शुभ प्रतीक स्वस्तिक और नाजी जर्मनी के प्रतीक ‘हाकेनक्रूज’ के बीच अंतर नहीं समझ पाते हैं। अमेरिका में अनेक लोग स्वस्तिक को नाजी विचारधारा से जोड़कर देखने की भूल कर बैठते हैं। इसी भ्रम के कारण यह आशंका रहती है कि सार्वजनिक स्थान पर गाड़ी पर स्वस्तिक बना देखकर कोई स्थानीय निवासी विरोध दर्ज करा सकता है या फिर वाहन को क्षति पहुंचा सकता है।

    सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, हिंदू धर्म में स्वस्तिक को हजारों वर्षों से अत्यंत पवित्र, मंगलकारी और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। किसी भी शुभ कार्य, नए प्रतिष्ठान या वाहन क्रय पर स्वस्तिक का निर्माण अनिवार्य माना जाता है। इसके विपरीत, पश्चिमी समाज में ऐतिहासिक कारणों से इस चिन्ह को लेकर एक नकारात्मक धारणा बनी हुई है। इसी व्यावहारिक समस्या को देखते हुए अमेरिका में कई भारतीय परिवार कार के बाहरी हिस्से पर स्वस्तिक बनाने के बजाय उसे कागज पर बनवाकर गाड़ी के अंदर रख लेते हैं।

    विदेशों में रहने वाले भारतीयों को अक्सर अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करते समय स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों और संवेदनशीलता का ध्यान रखना पड़ता है। मध्य प्रदेश सहित भारत के विभिन्न राज्यों से विदेश गए लोग अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए समय-समय पर व्यावहारिक बदलाव भी अपनाते हैं।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रतीकों को लेकर जागरूकता और सही जानकारी के प्रसार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सोशल मीडिया पर भी इस निर्णय को पंडित जी की समझदारी और व्यावहारिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिसने एक धार्मिक रस्म को किसी भी संभावित विवाद से बचा लिया।