Tag: America

  • अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 13.5% की बड़ी गिरावट, मास्टर्स प्रोग्राम से सबसे ज्यादा छात्र हुए कम

    अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 13.5% की बड़ी गिरावट, मास्टर्स प्रोग्राम से सबसे ज्यादा छात्र हुए कम

    नई दिल्ली । अमेरिका में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में एक साल के भीतर बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों की संख्या घटकर 3,16,893 रह गई। अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा 3,66,258 था। इस तरह एक साल के दौरान भारतीय छात्रों की संख्या में 49,365 की कमी आई है, जो लगभग 13.5 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। हालांकि, इस कमी के बावजूद अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सबसे बड़े समूह के रूप में भारत की स्थिति बरकरार है।

    स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विजिटर इंफॉर्मेशन सिस्टम (एसईवीआईएस) के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में सभी देशों के सक्रिय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या भी घटी है। अक्टूबर 2025 में यह संख्या 12,83,240 थी, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 11,92,572 रह गई। इस प्रकार कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में लगभग 7.1 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। भारतीय छात्रों की संख्या में आई गिरावट इस समग्र कमी से अधिक रही है।

    अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के दूसरे सबसे बड़े समूह चीन से आने वाले विद्यार्थियों का है। इस श्रेणी में भी एक साल के दौरान कमी दर्ज की गई। अक्टूबर 2025 में चीन के 2,45,038 सक्रिय छात्र अमेरिका में थे, जबकि अक्टूबर 2026 में यह संख्या घटकर 2,20,157 रह गई। इस तरह चीनी छात्रों की संख्या में लगभग 10.2 प्रतिशत की गिरावट आई है।

    अंतरराष्ट्रीय छात्रों के कुल आंकड़ों में भारत की हिस्सेदारी भी कम हुई है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका में सक्रिय विदेशी छात्रों में भारतीय विद्यार्थियों की हिस्सेदारी लगभग 28.5 प्रतिशत थी। अक्टूबर 2026 में यह घटकर करीब 26.6 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद भारत सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय छात्र भेजने वाला देश बना हुआ है।

    भारतीय छात्रों की संख्या में सबसे ज्यादा कमी मास्टर्स यानी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में सामने आई है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका के मास्टर्स प्रोग्राम में 2,92,929 भारतीय छात्र नामांकित थे। अक्टूबर 2026 में यह संख्या घटकर 2,34,034 रह गई। इस स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए मास्टर्स पाठ्यक्रमों को चुनता रहा है, इसलिए इस श्रेणी में आई कमी कुल आंकड़ों को भी प्रभावित कर रही है।

    हालांकि, डॉक्टोरल यानी पीएचडी स्तर पर इसके विपरीत रुझान देखने को मिला है। अक्टूबर 2025 में इस स्तर पर भारतीय छात्रों की संख्या 28,609 थी, जो अक्टूबर 2026 में बढ़कर 41,729 हो गई। यानी पीएचडी में भारतीय विद्यार्थियों का नामांकन बढ़ा है। वहीं, स्नातक यानी बैचलर स्तर पर छात्रों की संख्या 38,522 से घटकर 36,011 रह गई।

    आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों में 1,95,341 पुरुष और 1,21,552 महिला विद्यार्थी शामिल थे। एसईवीआईएस के आंकड़ों में उन विद्यार्थियों को शामिल किया जाता है जिनका रिकॉर्ड संबंधित सिस्टम में सक्रिय रहता है। इसमें ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) के तहत रहने वाले छात्र भी शामिल हैं। इसलिए ये आंकड़े किसी एक महीने की स्थिति बताते हैं, न कि पूरे वर्ष अमेरिका पहुंचे विद्यार्थियों की कुल संख्या।

    छात्रों की संख्या में गिरावट ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका में छात्र वीजा से जुड़ी जांच प्रक्रिया सख्त हुई है। ओपीटी और एसटीईएम एक्सटेंशन पर नई फीस लगाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इसके साथ ही कानूनी आव्रजन के विभिन्न रास्तों को लेकर नियमों और प्रक्रियाओं में सख्ती बढ़ाई जा रही है। इन परिस्थितियों के बीच भारतीय मूल के नेताओं के एक गैर-लाभकारी नेटवर्क ने 30 अक्टूबर को जारी बयान में अमेरिका में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या घटने की बात कही। संगठन ने इस रुझान को मौजूदा चुनावी माहौल में भारत-विरोधी बयानबाजी से भी जोड़ा है।

    दक्षिण एशिया के अन्य देशों से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। नेपाल के सक्रिय छात्रों की संख्या अक्टूबर 2025 में 35,273 थी, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 33,992 रह गई। इस तरह अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या घटने का रुझान कई देशों में दिखाई दे रहा है, जबकि भारतीय छात्रों के मामले में मास्टर्स स्तर की गिरावट सबसे प्रमुख बदलाव बनकर सामने आई है।

  • एलन मस्क के फॉलो किए ऋषभ यादव कौन हैं, अमेरिका में भारतीय इंजीनियर की कामयाबी से छिड़ी ब्रेन ड्रेन बहस

    एलन मस्क के फॉलो किए ऋषभ यादव कौन हैं, अमेरिका में भारतीय इंजीनियर की कामयाबी से छिड़ी ब्रेन ड्रेन बहस

    नई दिल्ली । दुनिया के प्रमुख उद्योगपतियों में शामिल एलन मस्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जिन लोगों को फॉलो करते हैं, उनमें भारतीय मूल के इंजीनियर ऋषभ यादव का नाम भी शामिल है। ऋषभ को लेकर एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उनकी पहचान, पेशेवर उपलब्धियों और अमेरिका में उनके काम को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। इसके साथ ही भारत से प्रतिभाशाली युवाओं के विदेश जाने यानी ब्रेन ड्रेन के मुद्दे पर भी बहस तेज हो गई है।

    यह चर्चा तब शुरू हुई, जब सोशल मीडिया यूजर माधव ने सवाल उठाया कि एलन मस्क द्वारा फॉलो किए जाने वाले ऋषभ यादव आखिर कौन हैं। उन्होंने बताया कि मस्क एक्स पर करीब 1,418 लोगों को फॉलो करते हैं और इनमें ऋषभ का नाम भी शामिल है। माधव ने यह भी कहा कि उन्हें पहले लगा था कि ऋषभ भारतीय होंगे, लेकिन उनका सोशल मीडिया अकाउंट अमेरिकी दिखाई देता है। इसके बाद उन्होंने इस इंजीनियर की पहचान जानने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चैटबॉट ग्रोक से सवाल किया।

    ग्रोक के जवाब के अनुसार, ऋषभ यादव कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कोडिंग टूल कर्सर के संस्थापक इंजीनियर हैं। यह टूल सॉफ्टवेयर डेवलपर्स को कोड लिखने और उससे जुड़े काम में सहायता देता है। ऋषभ भारतीय मूल के हैं और अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में रहते हैं। वह इससे पहले एप्पल और सिस्को जैसी बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों में काम कर चुके हैं। एप्पल में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने आईफोन के बैक टैप फीचर पर भी काम किया था।

    ऋषभ की पेशेवर पृष्ठभूमि और मस्क के साथ उनके जुड़ाव को लेकर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कर्सर और स्पेसएक्स के बीच हुए सौदे के बाद ऋषभ ने मस्क से जुड़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनी स्पेसएक्सएआई में काम शुरू किया। इसी पेशेवर संबंध को मस्क द्वारा उन्हें फॉलो किए जाने की चर्चा से जोड़ा जा रहा है। हालांकि, केवल सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को फॉलो करना अपने आप में किसी विशेष व्यक्तिगत संबंध का प्रमाण नहीं है।

    इस मामले ने भारतीय प्रतिभाओं के विदेश जाने के मुद्दे को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। माधव की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर ने कहा कि भारत की प्रतिभा हर साल अमेरिका चली जाती है। कुछ लोगों ने इसे देश के लिए प्रतिभा पलायन की चुनौती बताया, जबकि अन्य ने विदेशों में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों की उपलब्धियों को उनकी मेहनत और कौशल का परिणाम माना।

    बहस के दौरान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और भारतीय प्रबंधन संस्थानों से पढ़ाई करने वाले युवाओं का भी उल्लेख किया गया। कुछ यूजर्स का कहना था कि देश के प्रतिभाशाली विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदेशों में काम करते हैं और वहां नई तकनीकों तथा कारोबार के विकास में योगदान देते हैं। उनके मुताबिक, इससे भारत में उपलब्ध अवसरों और प्रतिभाओं को रोकने की क्षमता पर सवाल उठते हैं।

    दूसरी ओर, कुछ प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि केवल देशभक्ति की भावना के आधार पर प्रतिभा पलायन को नहीं रोका जा सकता। इसके लिए भारत में बेहतर रोजगार, अनुसंधान, तकनीकी विकास, प्रतिस्पर्धी वेतन और नवाचार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, यदि प्रतिभाशाली युवा देश में रहकर भारतीय कंपनियों और संस्थानों के साथ काम करें, तो उनकी विशेषज्ञता का लाभ घरेलू अर्थव्यवस्था को भी मिल सकता है।

    ऋषभ यादव की चर्चा इस तरह एक इंजीनियर की पेशेवर पहचान से आगे बढ़कर भारतीय प्रतिभाओं के वैश्विक योगदान और देश में उपलब्ध अवसरों के सवाल तक पहुंच गई है। विदेशों में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों की सफलता जहां उनकी क्षमता को दर्शाती है, वहीं यह बहस भी महत्वपूर्ण बनी हुई है कि भारत किस तरह अपने युवाओं को देश में ही बेहतर अवसर उपलब्ध करा सकता है।

  • F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपना अत्याधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता, बल्कि इसे केवल उन्हीं साझेदारों को उपलब्ध कराता है जिन पर उसे भरोसा होता है। गोर ने भारत को अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार बताते हुए क्वॉड समूह में उसकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों, सैन्य अभ्यासों और संभावित लड़ाकू विमान सौदों को लेकर चर्चा जारी है।

    सर्जियो गोर ने भारत में हाल के संयुक्त सैन्य अभ्यासों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले एक महीने के दौरान करीब 500 अमेरिकी सैनिक भारत में आयोजित युद्धाभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा, तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमान भी भारत पहुंचे और भारतीय वायुसेना के साथ अभ्यास किया। इन गतिविधियों को दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    एफ-35 अमेरिका के आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल है। इसमें स्टील्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य विमान को दुश्मन के रडार की पकड़ में आने से बचने में मदद करना है। इस तरह के विमान और उनसे जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल तथा हस्तांतरण संवेदनशील रक्षा मामलों में गिना जाता है। गोर के बयान के मुताबिक, अमेरिका ऐसे विमानों के मामले में भरोसेमंद साझेदारों को प्राथमिकता देता है। हालांकि, भारत के लिए एफ-35 की खरीद को लेकर किसी अंतिम समझौते की घोषणा इस बयान में नहीं की गई।

    गोर ने भारत को क्वॉड समूह का मूल्यवान साझेदार भी बताया। क्वॉड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। चारों देशों के बीच संवाद और गतिविधियों का उद्देश्य क्षेत्रीय चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाना है। ऐसे में भारत के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास और एफ-35 विमानों की भागीदारी दोनों देशों के रक्षा संबंधों की अहमियत को रेखांकित करती है।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है। दोनों देश सैन्य क्षमताओं के समन्वय, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी सहयोग करते हैं। संयुक्त अभ्यासों के दौरान सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, संचालन प्रक्रियाओं और क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में साथ काम करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी खास अभ्यास से तकनीक हस्तांतरण या विमान खरीद का समझौता अपने आप तय नहीं हो जाता।

    एफ-35 को लेकर गोर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत अपनी वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने और विभिन्न देशों के साथ रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़े फैसलों में लागत, तकनीकी जरूरतें, रखरखाव, परिचालन आवश्यकताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अमेरिकी राजदूत का बयान दोनों देशों के बीच भरोसे और सैन्य संपर्कों को तो दर्शाता है, लेकिन इसे किसी निश्चित विमान सौदे की पुष्टि नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, सर्जियो गोर ने अपने बयान में भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार बताया है। हाल के सैन्य अभ्यासों और तरंग शक्ति में एफ-35 की भागीदारी को उन्होंने दोनों देशों के मजबूत होते रक्षा संबंधों के संदर्भ में रखा। फिलहाल, भारत को एफ-35 की बिक्री को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में दोनों देशों के रक्षा सहयोग की दिशा और संभावित समझौतों पर होने वाली बातचीत महत्वपूर्ण रहेगी।

  • मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर

    मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का खतरा मंडराने लगा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ नई सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित हमलों के निशाने पर ईरान के परमाणु केंद्र, मिसाइल और ड्रोन भंडार के साथ ऊर्जा ढांचा भी हो सकता है। हालांकि, अब तक किसी भी हमले की योजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सैन्य अभियान छोटा, लेकिन बेहद तीव्र हो सकता है। अमेरिका और इजरायल की योजना कथित तौर पर तीन दिनों तक हमले कर ईरान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और उसे परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए मजबूर करने की है। संभावित लक्ष्यों में परमाणु ठिकानों के अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के कमांड सेंटर भी शामिल हैं।

    पिकैक्स माउंटेन पर हमले की भी चर्चा
    ईरान के पहाड़ों के नीचे स्थित परमाणु केंद्र ‘पिकैक्स माउंटेन’ भी संभावित निशाने पर हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह इस ठिकाने के खिलाफ 22,000 पाउंड वजनी GBU-43/B बम के इस्तेमाल पर विचार करने की बात कही थी। इसे MOAB यानी ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ भी कहा जाता है।

    हालांकि, ऊर्जा ढांचे पर हमले को लेकर अमेरिकी अधिकारियों के बीच मतभेद की स्थिति बताई जा रही है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार प्रभावित हो सकता है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसी वजह से ऊर्जा प्रतिष्ठानों को संभावित लक्ष्यों में शामिल करने को लेकर असमंजस बना हुआ है।

    ईरान की चेतावनी- जवाब सीमित नहीं रहेगा
    दूसरी ओर, ईरान ने चेतावनी दी है कि उस पर नया हमला हुआ तो उसकी जवाबी कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी। तेहरान ने संकेत दिया है कि संभावित जवाबी हमलों में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, डेटा सेंटरों और समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    ईरानी अधिकारियों के रुख से संकेत मिलता है कि किसी नए संघर्ष की स्थिति में युद्ध को सीमित रखना आसान नहीं होगा। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ने और संघर्ष के दूसरे देशों तक फैलने की आशंका भी गहरा सकती है।

    ईरान की सीमा के पास इजरायल का बड़ा हवाई अभ्यास
    इस बीच, इजरायल ने सोमवार को ईरान की सीमा के नजदीक एक बड़ा वायुसेना अभ्यास किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली वायुसेना के दर्जनों लड़ाकू और हवा में ईंधन भरने वाले विमान इजरायल से 800 मील से अधिक दूर तक गए। विमानों ने सीरिया और इराक के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए ईरान की सीमा के पास उड़ान भरी और फिर लौट आए।

    अधिकारियों के अनुसार, विमानों का यह मार्ग ईरान पर संभावित हमले के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले रास्ते जैसा था। हालांकि, इजरायल ने इसे प्रशिक्षण अभ्यास बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को कड़ा संदेश देना था। इजरायल ने इस अभियान की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरान ने अभ्यास में शामिल इजरायली विमानों पर हमला किया तो इजरायल को बड़े सैन्य अभियान का बहाना मिल सकता है। इससे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।

    ट्रंप के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
    पिछले अनुभवों को देखते हुए ट्रंप फिलहाल ईरान पर नए हमले का आदेश देने से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि, जब तक ईरान परमाणु वार्ता की मेज पर लौटकर समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तब तक सैन्य कार्रवाई की आशंका बनी रह सकती है।

    अमेरिका के सामने नई जंग शुरू करने के रास्ते में तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, हमले की स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा। दूसरी, संघर्ष का पूरे मिडिल ईस्ट में फैल जाना। तीसरी, अमेरिकी सेना के पास मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की संभावित कमी।

    ऐसे में सैन्य योजनाएं तैयार होने की खबरों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन हमले को मंजूरी देगा या कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देगा। फिलहाल, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच पूरे क्षेत्र की निगाहें वॉशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हैं।

  • ईरान की अमेरिका को दो टूक: 'यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजेंगे', आसिम मुनीर कर रहे मध्यस्थता

    ईरान की अमेरिका को दो टूक: 'यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजेंगे', आसिम मुनीर कर रहे मध्यस्थता


    नई दिल्ली। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर ईरान ने अपना रुख सख्त कर दिया है। तेहरान ने साफ कहा है कि वह अपने यूरेनियम का एक ग्राम भी देश से बाहर नहीं भेजेगा। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ बातचीत तभी आगे बढ़ेगी, जब वॉशिंगटन भरोसा बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाएगा और उसकी सभी शर्तें पूरी करने की दिशा में कार्रवाई करेगा। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ईरान यात्रा के बीच आया यह बयान दोनों देशों के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

    ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ईरान से यूरेनियम का एक ग्राम भी बाहर नहीं भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका को पहले विश्वास बहाली के लिए कदम उठाने होंगे। बातचीत की प्रक्रिया ईरान की सभी शर्तों को पूरी तरह पूरा करने से शुरू होनी चाहिए।

    रेजाई ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ बैठक में भी तेहरान का यही रुख दोहराया। मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने तथा बातचीत का रास्ता निकालने के प्रयासों के तहत ईरान पहुंचे हैं।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियन और संसद स्पीकर से मिले मुनीर
    ईरानी मीडिया के मुताबिक, मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने तेहरान में आसिम मुनीर के साथ बैठक की। इस दौरान क्षेत्रीय घटनाक्रम और अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों पर चर्चा हुई।

    नूरन्यूज के अनुसार, मुनीर ने ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर कलीबाफ से भी मुलाकात की। इन बैठकों में क्षेत्रीय तनाव कम करने और दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

    अमेरिका से बातचीत के लिए ईरान ने रखीं सात शर्तें
    ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर कलीबाफ ने कहा कि अमेरिका ईरान का भरोसा तब तक नहीं जीत सकता, जब तक वह पिछले महीने तेहरान की ओर से रखी गई सात शर्तों को पूरा नहीं करता।

    इन शर्तों का संबंध स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने से भी है। प्रमुख मांगों में ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी खत्म करना, ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना और क्षेत्र के सभी मोर्चों पर शत्रुता रोकना शामिल है।

    रेजाई ने यह भी कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के रुख के मुताबिक, हथियार बनाने के स्तर के करीब पहुंच चुके यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा।

    परमाणु कार्यक्रम पर अटका समझौता
    ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के साथ किसी संभावित समझौते की राह में प्रमुख बाधा बना हुआ है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि युद्ध समाप्त करने और समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए ईरान को अपनी यूरेनियम संवर्धन क्षमता में महत्वपूर्ण कमी करनी होगी।

    अमेरिका, इजरायल और कई अन्य पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह ईरान की ओर से यूरेनियम का 60 प्रतिशत तक संवर्धन करना है। यह स्तर आम नागरिक परमाणु उपयोग के लिए जरूरी संवर्धन स्तर से काफी अधिक है और लगभग 90 प्रतिशत संवर्धन वाले हथियार-ग्रेड यूरेनियम के स्तर के करीब है।

    हालांकि, ईरान लगातार परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने के आरोपों से इनकार करता रहा है। यूरेनियम संवर्धन की सीमा और संवर्धित यूरेनियम के भंडार का भविष्य दोनों देशों के बीच बातचीत के अहम मुद्दे बने हुए हैं।

    पाकिस्तान फिर करा रहा बातचीत की कोशिश
    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने के लिए पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले पाकिस्तान की मध्यस्थता के प्रयासों के बाद जून में अंतरिम शांति समझौता हुआ था। हालांकि, कुछ ही हफ्तों बाद दोनों देशों के बीच लड़ाई दोबारा शुरू होने से यह समझौता टूट गया।

    आसिम मुनीर की मौजूदा ईरान यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब दोनों देशों के बीच मतभेद दूर करने और बातचीत दोबारा शुरू कराने के प्रयास जारी हैं। ईरान ने यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजने और बातचीत से पहले अपनी शर्तें पूरी करने की मांग दोहराकर स्पष्ट कर दिया है कि परमाणु कार्यक्रम पर किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

  • ईरान पर परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं करेंगे ट्रंप, जमीनी सेना भेजने से भी किया इनकार, हमलों के लिए नए विकल्पों पर विचार

    ईरान पर परमाणु हथियार इस्तेमाल नहीं करेंगे ट्रंप, जमीनी सेना भेजने से भी किया इनकार, हमलों के लिए नए विकल्पों पर विचार


    नई दिल्ली ।अमेरिका और ईरान के बीच मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा। इसके साथ ही उन्होंने ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिकों को तैनात करने की संभावना से भी इनकार किया है। हालांकि, ईरान के ऊर्जा ढांचे और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए अमेरिकी सैन्य स्तर पर नए विकल्पों पर विचार किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    ट्रंप ने एक साक्षात्कार के दौरान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े सवाल पर कहा कि उन्हें इसकी जरूरत नहीं है और वह ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। उनसे यह भी पूछा गया कि क्या अमेरिका ईरान की जमीन पर अपने सैनिक भेजने पर विचार कर रहा है। इस पर उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा होता नहीं दिख रहा। उनके इस बयान से फिलहाल परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और जमीनी सैनिकों की तैनाती को लेकर अमेरिकी प्रशासन की घोषित स्थिति सामने आई है।

    ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर पारंपरिक हथियारों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हो रही है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य योजना से जुड़े अधिकारियों ने बताया है कि ट्रंप ने ईरान पर नए हमलों के विकल्प तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इन विकल्पों में ईरान के ऊर्जा ढांचे और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने की योजनाएं शामिल हैं। इनमें अमेरिका के शक्तिशाली गैर-परमाणु बम एमओएबी का इस्तेमाल भी एक संभावित विकल्प बताया गया है।

    एमओएबी को आम तौर पर ‘मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स’ कहा जाता है। यह एक शक्तिशाली पारंपरिक बम है, परमाणु हथियार नहीं। ट्रंप ने भी बातचीत के दौरान इसी अंतर को स्पष्ट किया। परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से इनकार करने के बावजूद, ईरान के खिलाफ पारंपरिक हथियारों से संभावित हमलों के विकल्पों पर विचार किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    ईरान के पिकैक्स माउंटेन क्षेत्र में स्थित ठिकाने को निशाना बनाने का विचार भी चर्चा में है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देना चाहता। उन्होंने दावा किया कि पहले किए गए अमेरिकी हमलों में ईरान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचा है। उनके अनुसार, ईरान की कुछ परमाणु सुविधाएं पहाड़ों के नीचे स्थित हैं। इसी संदर्भ में पिकैक्स माउंटेन पर हमले की संभावना पर विचार किए जाने की बात कही गई है।

    हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि इन संभावित सैन्य विकल्पों में से किसी को अंतिम मंजूरी दी गई है या नहीं। फिलहाल नए हमलों की योजनाएं तैयार करने और विभिन्न विकल्पों पर विचार किए जाने की बात सामने आई है। इसलिए संभावित कार्रवाई और वास्तविक रूप से किए गए हमलों के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है।

    ट्रंप ने बातचीत के दौरान अमेरिका, रूस और चीन के परमाणु हथियार भंडार का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार है, जबकि रूस दूसरे और चीन तीसरे स्थान पर है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन अगले पांच वर्षों में अमेरिका के करीब पहुंच सकता है। यह उनका आकलन है, न कि भविष्य की स्थिति का स्वतंत्र रूप से प्रमाणित निष्कर्ष।

    अमेरिकी राष्ट्रपति के मुताबिक, अमेरिका रूस और चीन के साथ परमाणु हथियारों में कमी लाने को लेकर बातचीत कर रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इन चर्चाओं के जरिए परमाणु हथियारों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इस तरह ट्रंप के बयान में एक ओर ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों और जमीनी सैनिकों के इस्तेमाल से इनकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर संभावित पारंपरिक सैन्य कार्रवाई और वैश्विक परमाणु हथियारों में कमी को लेकर बातचीत का उल्लेख भी किया गया है।

  • निर्मला सीतारमण ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप देने पर दिया जोर, बातचीत अंतिम चरण में पहुंची

    निर्मला सीतारमण ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप देने पर दिया जोर, बातचीत अंतिम चरण में पहुंची

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप देने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते का निष्पादन वैश्विक व्यापार और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के हित में होगा। उनके अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत अब अंतिम चरण के करीब पहुंचती दिखाई दे रही है। ऐसे में समझौते को जल्द पूरा करना दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
    सीतारमण ने यह बात बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों से इतर अटलांटिक काउंसिल के साथ बातचीत के दौरान कही। उन्होंने संकेत दिया कि व्यापार समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच लगातार चर्चा हो रही है और इसके जल्द हस्ताक्षर के लिए तैयार होने की उम्मीद है।
    वित्त मंत्री ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के हालिया बयान का भी उल्लेख किया। गोयल ने एक-दो दिन पहले उम्मीद जताई थी कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता जल्द हस्ताक्षर के लिए तैयार हो सकता है। इससे पहले उन्होंने बताया था कि समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप दिया जा चुका है और फिलहाल उसका कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है।
    गोयल के अनुसार, समझौते को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि भारत को समान प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में पर्याप्त प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिले। इस रुख से स्पष्ट है कि समझौते को आगे बढ़ाने के साथ भारत अपने आर्थिक और व्यापारिक हितों को भी ध्यान में रख रहा है।
    भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अमेरिकी पक्ष की ओर से भी सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने गुरुवार को कहा था कि प्रस्तावित समझौते का व्यापक ढांचा तैयार हो चुका है और दोनों देश इसे अंतिम रूप देने के काफी करीब हैं। उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकॉनमी फोरम में यह बात कही थी।
    व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था विभिन्न अनिश्चितताओं से गुजर रही है। ऐसे माहौल में दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, समझौते की अंतिम शर्तों और इसके लागू होने की तारीख को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
    बातचीत के दौरान सीतारमण ने भारत की आर्थिक वृद्धि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश अपनी विकास दर बनाए रखने में सफल रहा है। उनके अनुसार, कोविड महामारी के बाद पिछले चार से पांच वर्षों के दौरान भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है।
    वित्त मंत्री ने इस प्रदर्शन का श्रेय समावेशी विकास नीतियों, कौशल विकास में निवेश और वित्तीय अनुशासन को दिया। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर अपनी जिम्मेदारी समझती है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की सहायता करना जरूरी है, लेकिन इसके साथ सरकारी खर्च को अनुशासित बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
    सीतारमण ने बुनियादी ढांचे के विकास में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय की भूमिका पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक, इस खर्च से देश में आधारभूत सुविधाओं के निर्माण को गति मिली है और अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर इसका व्यापक गुणक प्रभाव पड़ा है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को जल्द पूरा करने की उनकी अपील के साथ आर्थिक विकास, वित्तीय अनुशासन और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा से जुड़े मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहे।
  • भारत में स्टारलिंक को लेकर विवाद, अमेरिका में 36.6 करोड़ डॉलर के चुनावी चंदे पर घिरे एलन मस्क

    भारत में स्टारलिंक को लेकर विवाद, अमेरिका में 36.6 करोड़ डॉलर के चुनावी चंदे पर घिरे एलन मस्क


    नई दिल्‍ली । दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल एलन मस्क भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में अपनी कंपनी स्टारलिंक की जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच अमेरिका में उनके भारी राजनीतिक चंदे को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने आरोप लगाया है कि मस्क रिपब्लिकन पार्टी को चुनावी बढ़त दिलाने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं, जिससे राजनीति में अरबपतियों के बढ़ते प्रभाव पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने 2026 के अमेरिकी चुनाव चक्र में करीब 36.6 करोड़ डॉलर का राजनीतिक चंदा दिया है। इसमें जुलाई के बाद से कम से कम 27.6 करोड़ डॉलर शामिल हैं। सैंडर्स का आरोप है कि इतनी बड़ी रकम खर्च करके मस्क रिपब्लिकन पार्टी को कांग्रेस में अपना नियंत्रण बनाए रखने में मदद करना चाहते हैं।

    ट्रंप की जीत के लिए 29 करोड़ डॉलर खर्च करने का दावा

    बर्नी सैंडर्स के मुताबिक, एलन मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के लिए करीब 29 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। सैंडर्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया कि ट्रंप की जीत के बाद मस्क की संपत्ति में 696 अरब डॉलर का इजाफा हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि मस्क अब दुनिया के पहले खरबपति बन गए हैं।

    हालांकि, ये आंकड़े और संपत्ति में बढ़ोतरी को लेकर सैंडर्स के दावे हैं। उनकी आलोचना का मुख्य आधार यह है कि बेहद अमीर कारोबारी चुनावी अभियानों में भारी रकम लगाकर राजनीतिक व्यवस्था पर असाधारण प्रभाव हासिल कर सकते हैं।

    सैंडर्स ने आरोप लगाया कि मस्क 3 नवंबर को होने वाले 2026 के मध्यावधि चुनाव में भी रिपब्लिकन उम्मीदवारों की मदद के लिए बड़ी रकम खर्च कर रहे हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में नारा दिया, ‘मस्क को रोको, कुलीनतंत्र को रोको।’ उनका कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक फैसलों पर कुछ अमीर लोगों का प्रभाव बढ़ना चिंता का विषय है।

    रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में कहां खर्च हुआ पैसा?

    मस्क के राजनीतिक चंदे का बड़ा हिस्सा उन संगठनों को मिला है, जो अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके योगदान का ब्योरा इस प्रकार है।

    सीनेट लीडरशिप फंड: रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवारों के समर्थन में काम करने वाले इस संगठन को करीब 15.8 करोड़ डॉलर दिए गए।
    अमेरिका पीएसी: मस्क के अपने राजनीतिक संगठन को लगभग 7.6 करोड़ डॉलर का योगदान मिला।
    कांग्रेसनल लीडरशिप फंड: प्रतिनिधि सभा के चुनावों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले इस संगठन को करीब 2 करोड़ डॉलर दिए गए।

    इन संगठनों के माध्यम से राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार, विज्ञापन तथा मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। बड़ी रकम के योगदान से चुनावी अभियानों को संसाधन मिलते हैं, हालांकि इससे किसी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित नहीं होती।

    मध्यावधि चुनाव में ट्रंप के प्रभाव की परीक्षा

    अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मुकाबला होगा। रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस में अपना बहुमत बनाए रखने की कोशिश करेगी, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में नियंत्रण हासिल करना चाहती है।

    ऐसे में मस्क की ओर से रिपब्लिकन समर्थक संगठनों को दिए गए बड़े चंदे पर बहस तेज हो गई है। आलोचकों का तर्क है कि चुनावी अभियानों में अरबपतियों की बड़ी वित्तीय हिस्सेदारी से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नीतिगत फैसलों पर उनके प्रभाव को लेकर असमानता बढ़ सकती है।

    क्या है कुलीनतंत्र, जिस पर सैंडर्स ने उठाए सवाल?

    कुलीनतंत्र यानी ओलिगार्की ऐसी व्यवस्था को कहा जाता है, जिसमें राजनीतिक शक्ति कुछ चुनिंदा अमीर या प्रभावशाली लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाती है। बर्नी सैंडर्स लंबे समय से इस विचार की आलोचना करते रहे हैं कि अरबपतियों की विशाल संपत्ति उन्हें चुनावों और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने की असाधारण क्षमता देती है।

    चुनावी अभियानों में बड़ी रकम खर्च करने वाले दानदाता विज्ञापन, प्रचार और मतदाताओं तक पहुंच बनाने के प्रयासों को वित्तीय मदद दे सकते हैं। इससे उनके समर्थन वाले उम्मीदवारों और मुद्दों को अधिक दृश्यता मिल सकती है। हालांकि, राजनीतिक चंदा देना अपने आप में किसी उम्मीदवार या दल पर नियंत्रण साबित नहीं करता।

    भारत में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर भी चर्चा

    अमेरिका में राजनीतिक चंदे पर उठे सवालों के बीच भारत में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की कारोबारी योजनाएं भी चर्चा में हैं। कंपनी भारतीय सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में सेवाएं शुरू करना चाहती है और इसके लिए जरूरी नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजर रही है।

    भारत में दूरसंचार और सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, नियमों और बाजार में कंपनियों की भूमिका को लेकर बहस होती रही है। वहीं, अमेरिका में मस्क के राजनीतिक योगदान को लेकर सैंडर्स की आलोचना ने अरबपतियों के चुनावी प्रभाव पर नई चर्चा छेड़ दी है।

    दोनों मामलों का संदर्भ अलग है, लेकिन इनके केंद्र में बड़ी कंपनियों और अत्यधिक संपत्ति वाले कारोबारियों की भूमिका है। जहां भारत में स्टारलिंक की कारोबारी योजनाओं के लिए नियामकीय मंजूरी अहम है, वहीं अमेरिका में मस्क के चुनावी चंदे ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बड़े दानदाताओं के प्रभाव को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

  • पीयूष गोयल की अमेरिकी कंपनियों से अहम मुलाकातें, भारत में निवेश बढ़ाने को लेकर इन क्षेत्रों पर हुई चर्चा

    पीयूष गोयल की अमेरिकी कंपनियों से अहम मुलाकातें, भारत में निवेश बढ़ाने को लेकर इन क्षेत्रों पर हुई चर्चा

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने न्यूयॉर्क में अमेरिका की कई प्रमुख कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों में भारत में निवेश बढ़ाने, कारोबार के विस्तार और दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंधों को मजबूत करने के अवसरों पर चर्चा हुई। बातचीत के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध संभावनाओं और भारत में कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया गया।

    पीयूष गोयल ने ब्लैकस्टोन के अध्यक्ष एवं मुख्य परिचालन अधिकारी जोनाथन ग्रे और अंतरराष्ट्रीय प्राइवेट इक्विटी कारोबार के चेयरमैन प्रकाश मेलवानी के साथ बैठक की। इसमें भारत में निवेश और साझेदारी को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में निवेश के विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा हुई। बैठक में भारत में कारोबार के लिए मौजूद अवसरों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

    उन्होंने न्यूबर्गर बरमन के चेयरमैन एवं सीईओ जॉर्ज वॉकर और उनकी नेतृत्व टीम से भी मुलाकात की। इस दौरान वित्तीय सेवाओं और वेल्थ मैनेजमेंट के क्षेत्र में निवेश सहयोग को और मजबूत करने के अवसरों पर बातचीत हुई। भारत में इन क्षेत्रों से जुड़े कारोबारी अवसरों और भविष्य की साझेदारी की संभावनाओं को चर्चा में शामिल किया गया।

    एस्टी लॉडर कंपनीज के अध्यक्ष एवं सीईओ स्टेफान डी फावेरी के साथ हुई बैठक में भारत के तेजी से बढ़ते ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार पर चर्चा की गई। इस दौरान भारत में विनिर्माण गतिविधियों और स्थानीय सोर्सिंग को बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार हुआ। बैठक में भारतीय बाजार की जरूरतों और कंपनी की संभावित भागीदारी से जुड़े विषयों पर बातचीत की गई।

    आईबीएम के चेयरमैन और सीईओ अरविंद कृष्णा के साथ बैठक में भारत में कंपनी की भागीदारी को और मजबूत करने पर चर्चा हुई। बातचीत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम कंप्यूटिंग और अन्य उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर विशेष रूप से विचार किया गया। तकनीकी क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर भी चर्चा का हिस्सा रहे।

    पीयूष गोयल ने मेटलाइफ के अध्यक्ष एवं सीईओ मिशेल ए. खलाफ से भी मुलाकात की। बैठक में भारत के बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों तथा कंपनी के संभावित विस्तार पर चर्चा हुई। इसके अलावा जनरल अटलांटिक के चेयरमैन एवं सीईओ विलियम ई. फोर्ड के साथ निवेश और व्यापारिक सहयोग को मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

    एआईए ग्रुप के गैर-कार्यकारी चेयरमैन मार्क टकर के साथ हुई बातचीत में भारत के बीमा और वित्तीय सेवाओं के अवसरों पर चर्चा की गई। इस दौरान वर्ष 2047 तक सभी के लिए बीमा के लक्ष्य को भी रेखांकित किया गया। बैठक में इस क्षेत्र में निवेश और कारोबारी भागीदारी बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार हुआ।

    इन बैठकों में वित्तीय सेवाओं, विनिर्माण, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और निवेश से जुड़े अवसरों पर व्यापक चर्चा हुई। भारत में अमेरिकी कंपनियों की कारोबारी भागीदारी बढ़ाने और दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

  • अमेरिका दौरे पर अनुपम खेर ने रॉबर्ट डी नीरो से की मुलाकात, बोले- हर बार उनसे मिलना मेरे लिए खुशी की बात

    अमेरिका दौरे पर अनुपम खेर ने रॉबर्ट डी नीरो से की मुलाकात, बोले- हर बार उनसे मिलना मेरे लिए खुशी की बात

    नई दिल्ली ।अभिनेता अनुपम खेर इन दिनों अपने नाटक ‘जाने पहचाने अनजाने’ के साथ अमेरिका और कनाडा के दौरे पर हैं। इसी दौरान उन्होंने हॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और अपने करीबी दोस्त रॉबर्ट डी नीरो से उनके घर पर मुलाकात की। अनुपम खेर ने इस मुलाकात की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए और इसे अपने मौजूदा दौरे की खास यादों में शामिल बताया।

    अनुपम खेर ने मुलाकात से जुड़ी कुछ तस्वीरें और वीडियो साझा किए, जिनमें वह रॉबर्ट डी नीरो के साथ नजर आ रहे हैं। पोस्ट के साथ उन्होंने कहा कि अमेरिका आने के बाद अपने सबसे प्यारे दोस्त डी नीरो से मिले बिना उनका दौरा पूरा नहीं हो सकता। उन्होंने रॉबर्ट डी नीरो को दुनिया के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक बताया और कहा कि उनसे मिलना हर बार उनके लिए खुशी की बात होती है।

    अनुपम खेर ने बताया कि अमेरिका और कनाडा में अपने म्यूजिकल प्ले ‘जाने पहचाने अनजाने’ के साथ चल रहे दौरे के बीच रॉबर्ट डी नीरो से हुई मुलाकात उनके लिए सबसे खास अनुभवों में से एक रही। उन्होंने अपने दोस्त के घर पहुंचने और उनके साथ समय बिताने को लेकर भी खुशी जाहिर की। दोनों की मुलाकात के दौरान उनके बीच दोस्ताना संबंध दिखाई दिए, जिसकी झलक अनुपम खेर की साझा की गई तस्वीरों और वीडियो में भी नजर आई।

    अनुपम खेर ने रॉबर्ट डी नीरो को अपने घर पर आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने उनके घर पर मिले स्वादिष्ट भोजन का भी जिक्र किया। अनुपम के मुताबिक, दोनों के बीच हुई बातचीत और डी नीरो की ओर से दिया गया समय उनके लिए काफी मायने रखता है। उन्होंने कहा कि जब भी वह डी नीरो से मिलते हैं, तो उनके भीतर का प्रशंसक भी उतना ही उत्साहित होता है, जितना एक दोस्त अपने दोस्त से मिलकर होता है।

    अनुपम खेर ने रॉबर्ट डी नीरो के प्रति एक अभिनेता और इंसान, दोनों रूपों में सम्मान व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि दुनिया के इस महान अभिनेता को अपना दोस्त कह सकते हैं। उन्होंने डी नीरो के परिवार का भी आभार जताया और कहा कि परिवार की मौजूदगी ने इस मुलाकात को उनके लिए और खूबसूरत याद बना दिया। अनुपम ने कहा कि वह इन पलों को अपने साथ लेकर जाएंगे और लंबे समय तक याद रखेंगे। उन्होंने डी नीरो की ओर से दिए गए कैप गिफ्ट के लिए भी धन्यवाद दिया और बताया कि यह उपहार उनके लिए बहुत मायने रखता है।