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  • दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं

    दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं


    तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच कतर की राजधानी दोहा में प्रस्तावित बातचीत को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मंगलवार को दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक का दावा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की वार्ता निर्धारित नहीं है।

    ईरान के इस बयान से दोनों देशों के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों पर सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद भी एक बार फिर सामने आ गए हैं।

    ईरान बोला- अमेरिका से कोई बातचीत तय नहीं
    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि इस सप्ताह ईरान का एक प्रतिनिधिमंडल कतर जाएगा, लेकिन इस यात्रा का अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी बैठक या वार्ता से कोई संबंध नहीं है।

    उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी स्तर की बातचीत तय नहीं है। बघाई के मुताबिक, तेहरान की प्राथमिकता फिलहाल दोनों देशों के बीच हुए समझौते से जुड़े प्रावधानों को लागू करना है और अंतिम समझौते पर चर्चा अभी शुरू नहीं हुई है।

    ट्रंप ने किया था बैठक का दावा
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया था कि दोहा में अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठक होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि बातचीत की पहल ईरान की ओर से की गई है। बाद में व्हाइट हाउस ने पुष्टि करते हुए बताया कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर उच्चस्तरीय वार्ता के लिए दोहा जाने वाले हैं।

    हालिया समझौते पर भी मंडराने लगे सवाल
    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने को लेकर एक बहु-बिंदु समझौते पर सहमति बनने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि अब दोनों पक्षों के विरोधाभासी बयानों से यह संकेत मिल रहा है कि कूटनीतिक प्रक्रिया अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिशों को नया झटका लग सकता है।

  • 24 घंटे में दूसरी बार अमेरिका की ईरान पर एयर स्ट्राइक, सैन्य ठिकानों और ड्रोन केंद्रों को बनाया निशाना

    24 घंटे में दूसरी बार अमेरिका की ईरान पर एयर स्ट्राइक, सैन्य ठिकानों और ड्रोन केंद्रों को बनाया निशाना


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने 24 घंटे के भीतर दूसरी बार ईरान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित कई अहम ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर की गई इस कार्रवाई में ईरान के सैन्य निगरानी तंत्र, संचार प्रणाली, एयर डिफेंस साइट्स, ड्रोन भंडारण केंद्रों और समुद्री बारूदी सुरंग (माइन) बिछाने की क्षमताओं को निशाना बनाया गया।

    सिरिक के पास सुने गए धमाके

    ईरान के सरकारी मीडिया IRIB ने सैन्य सूत्रों के हवाले से बताया कि दक्षिणी शहर सिरिक के नजदीक विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। रिपोर्ट के मुताबिक कई प्रोजेक्टाइल एक दूरसंचार टावर से टकराए, हालांकि घटना से जुड़ी विस्तृत जानकारी तत्काल साझा नहीं की गई।

    युद्धविराम के बाद फिर बढ़ा तनाव

    अमेरिका ने शुक्रवार को भी ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब हाल ही में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच युद्धविराम पर सहमति बनी थी। लगातार दूसरे दिन हुई अमेरिकी एयर स्ट्राइक के बाद दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

    तेल टैंकर पर ड्रोन हमले का दिया जवाब

    अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने शनिवार तड़के वन-वे अटैक ड्रोन से पनामा के झंडे वाले तेल टैंकर M/T Kiku को निशाना बनाया, जिससे युद्धविराम का उल्लंघन हुआ। CENTCOM के मुताबिक, यह टैंकर 20 लाख से अधिक बैरल कच्चा तेल लेकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहा था, तभी उस पर हमला किया गया।

    अमेरिकी सेना का कहना है कि शुक्रवार की कार्रवाई के बाद ईरान को युद्धविराम का पालन करने और तनाव कम करने का अवसर दिया गया था, लेकिन ताजा ड्रोन हमले के बाद जवाबी कार्रवाई करना आवश्यक हो गया।

    अमेरिका ने दी सतर्क रहने की चेतावनी

    CENTCOM ने अपने बयान में कहा कि होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से जारी है और अमेरिकी सेना क्षेत्र में पूरी तरह सतर्क तथा किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

    इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी सेना ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन भंडारण केंद्रों के साथ रडार ठिकानों को भी निशाना बनाया था। वॉशिंगटन का कहना है कि वह कार्रवाई 25 जून को सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज M/V Ever Lovely पर हुए कथित ईरानी ड्रोन हमले के जवाब में की गई थी।

    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की चेतावनी

    बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को आगे किसी भी सैन्य कार्रवाई से बचने की चेतावनी दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान ने युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और अमेरिका ने उसका पालन किया। यदि समझौते को लेकर कोई मतभेद है तो उसे बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है, लेकिन हिंसा का जवाब हिंसा से दिया जाएगा।

  • पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बिगड़ते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा तनाव और बढ़ता है तथा स्थिति व्यापक संघर्ष में बदलती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों, ऊर्जा कंपनियों और आयातक देशों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। तेल की कीमतों में हालिया तेजी इस बात का संकेत है कि बाजार संभावित आपूर्ति बाधाओं को लेकर सतर्क हो चुका है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो ऊर्जा लागत में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र विश्व तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या परिवहन व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है। तेल उत्पादन और निर्यात में बाधा आने की आशंका के कारण बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। यही वजह है कि निवेशक लगातार घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    माना जा रहा है कि क्षेत्र में तेल उत्पादन और परिवहन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मार्ग दबाव में हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि गंभीर संकट की स्थिति में कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है।

    हालांकि फिलहाल कुछ ऐसे कारक भी हैं जो बाजार को पूरी तरह अस्थिर होने से बचा रहे हैं। प्रमुख देशों के रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग और कुछ बड़े उपभोक्ता देशों द्वारा आयात में संतुलन बनाए रखने के प्रयासों से बाजार को अस्थायी राहत मिली हुई है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं तो ये उपाय लंबे समय तक पर्याप्त साबित नहीं होंगे।

    ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता। तेल की कीमतों में तेजी का सीधा प्रभाव परिवहन, विनिर्माण, विमानन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ता है। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

    पिछले कुछ महीनों में वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़े प्रभाव ने बाजार को पहले ही संवेदनशील बना दिया है। आपूर्ति में कमी और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ तो बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल रहते हैं और तनाव कम होता है तो बाजार को राहत मिल सकती है। वहीं दूसरी ओर यदि टकराव बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों और उनके आर्थिक प्रभावों पर टिकी हुई हैं।

  • ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका

    ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) के साथ जारी शांति वार्ता (Peace talks) के बीच डील को लेकर बड़ी धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि ईरान (Iran) के साथ या तो बड़ी और बेहतर परिणामों वाली डील होगी या फिर कोई भी डील नहीं होगी। इतना ही नहीं ट्रंप ने डील न होने की स्थिति में फिर से युद्ध शुरू करने की भी धमकी दी।

    उन्होंने कहा कि अब अगर डील नहीं होती है, तो अमेरिका पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा। इसके साथ ही ट्रंप ने अरब देशों से अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने की अपील की, जिसमें कुछ देश पहले से शामिल हैं। बता दें, ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में सामने आई है, जब ईरान और अमेरिका के बीच हो रही शांति वार्ता लगातार लंबी खिंचती जा रही है। ईरान और अमेरिका दोनों ही तरफ से अच्छे संकेत दिए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।

    ईरान के साथ लंबी खिंचती बातचीत के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया का युद्ध फिर से शुरू हो। इसलिए बेहतर है कि डील हो जाए। सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने शनिवार को मध्य-पूर्व के राष्ट्राध्यक्षों के साथ हुई अपनी बातचीतों का ब्यौरा भी साझा किया। उन्होंने बताया खाड़ी देशों के नेताओं, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान के साथ मिलकर इस संकट को सुलझाने के लिए बातचीत की है। उम्मीद है कि यह जल्दी ही सुलझ जाएगा, लेकिन इसके साथ ही ट्रंप ने अपील की यह सभी देश अब्राहम अकॉर्ड पर भी हस्ताक्षर करें। इतना ही नहीं ट्रंप ने कहा कि अगर ऐसा होता है, तो ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर कर सकता है।


    एक-दो देशों को छोड़कर बाकी देशों को समस्या नहीं होनी चाहिए: ट्रंप

    सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने इस्लामिक देशों के अब्राहम अकॉर्ड को स्वीकार न करने के डर को भी महत्व दिया। उन्होंने कहा, “संभव है कि एक या दो देशों के बाद ऐसा न करने का कारण हो, हम उसे स्वीकार भी करेंगे। लेकिन अधिकांश देशों को इसके लिए तैयार होना होगा। इससे ईरान के साथ होने वाला समझौता और भी ज्यादा ऐतिहासिक हो जाएगा। यह समझौता संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकस्तान के लिए वित्तीय, आर्थिक और सामाजिक बूम साबित हुआ है। इस संघर्ष के दौर में भी इन देशों को इसका फायदा मिला है।”


    क्या हैं अब्राहम अकॉर्ड्स?

    अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका द्वारा बनाए गए समझौतों की एक लिस्ट है। इसका प्रमुख उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान शुरू हुए इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को ने हस्ताक्षर किए थे। सूडान ने भी इसको सहमति दी है, लेकिन अभी तक उसकी संसद ने इस पर हामी नहीं भरी है। वहीं, अमेरिका का करीबी माने जाने वाला सऊदी अरब भी अभी तक इस समझौते से दूरी बनाए हुए है। हालांकि, सऊदी क्राउन प्रिंस ने इस समझौते में शामिल होने के लिए एक शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि वह इसमें शामिल होने के लिए तैयार हैं, बशर्ते इसमें दो-राष्ट्र समाधान को लेकर स्पष्टता हो।

    दरअसल, अरब देशों और इस्लामिक देशों की दुनिया में अब्राहम अकॉर्ड्स को फिलिस्तीन के साथ धोखे के तौर पर देखा जाता है। इसलिए ज्यादातर देश इससे कन्नी काटते हुए नजर आते हैं। इस समझौते के बाद देशों को इजरायल के साथ सामान्य संबंधों पर राजी होना पड़ता है, जिससे उनकी जनता इस पर नाराज हो सकती है। पाकिस्तान जैसे देश के लिए तो यह समझौता और भी ज्यादा परेशानी पैदा करने वाला है, क्योंकि वह तो इजरायल को देश के रूप में मान्यता ही नहीं देते हैं।

  • रक्षा, ऊर्जा और सुरक्षा पर बड़ा मंथन, भारत-अमेरिका बैठक से वैश्विक समीकरणों में बढ़ी हलचल

    रक्षा, ऊर्जा और सुरक्षा पर बड़ा मंथन, भारत-अमेरिका बैठक से वैश्विक समीकरणों में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों ने कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इस उच्चस्तरीय बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे विषय केंद्र में रहे। बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच यह संवाद केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है और दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण समझौतों के जरिए रणनीतिक तालमेल को मजबूत किया है। इस बातचीत में भविष्य की सुरक्षा जरूरतों, तकनीकी सहयोग और साझा रणनीतिक हितों को लेकर सकारात्मक विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में नई दिशा तय कर सकती है।

    ऊर्जा क्षेत्र भी इस बैठक का एक अहम केंद्र रहा। तेजी से बदलती वैश्विक ऊर्जा जरूरतों और वैकल्पिक संसाधनों की बढ़ती मांग को देखते हुए दोनों देशों ने सहयोग के नए अवसरों पर विचार किया। ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और भविष्य की साझेदारी को लेकर साझा सोच विकसित करने पर जोर दिया गया। यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। दोनों देशों ने आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने तथा नए निवेश अवसरों को मजबूत करने की दिशा में विचार साझा किए। बदलते वैश्विक आर्थिक हालात के बीच व्यापारिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाना दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल दिखाई दिया। आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में कई नए कदम उठाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

    बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। दोनों देशों ने क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर सहमति जताई। वैश्विक चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। इस महत्वपूर्ण संवाद से स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत और अमेरिका अपने संबंधों को केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और व्यापक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

  • भारत-अमेरिका रिश्तों को मिली नई रफ्तार, नई दिल्ली बैठक में रक्षा से व्यापार तक कई बड़े मुद्दों पर बनी सहमति

    भारत-अमेरिका रिश्तों को मिली नई रफ्तार, नई दिल्ली बैठक में रक्षा से व्यापार तक कई बड़े मुद्दों पर बनी सहमति

    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों ने कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इस उच्चस्तरीय बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे विषय केंद्र में रहे। बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच यह संवाद केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है और दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण समझौतों के जरिए रणनीतिक तालमेल को मजबूत किया है। इस बातचीत में भविष्य की सुरक्षा जरूरतों, तकनीकी सहयोग और साझा रणनीतिक हितों को लेकर सकारात्मक विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में नई दिशा तय कर सकती है।

    ऊर्जा क्षेत्र भी इस बैठक का एक अहम केंद्र रहा। तेजी से बदलती वैश्विक ऊर्जा जरूरतों और वैकल्पिक संसाधनों की बढ़ती मांग को देखते हुए दोनों देशों ने सहयोग के नए अवसरों पर विचार किया। ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और भविष्य की साझेदारी को लेकर साझा सोच विकसित करने पर जोर दिया गया। यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। दोनों देशों ने आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने तथा नए निवेश अवसरों को मजबूत करने की दिशा में विचार साझा किए। बदलते वैश्विक आर्थिक हालात के बीच व्यापारिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाना दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल दिखाई दिया। आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में कई नए कदम उठाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

    बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। दोनों देशों ने क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर सहमति जताई। वैश्विक चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। इस महत्वपूर्ण संवाद से स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत और अमेरिका अपने संबंधों को केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और व्यापक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

  • ट्रंप, ईरान और चीन को लेकर ब्रह्मा चेलानी का बड़ा दावा: क्या बदल रही है वैश्विक राजनीति?

    ट्रंप, ईरान और चीन को लेकर ब्रह्मा चेलानी का बड़ा दावा: क्या बदल रही है वैश्विक राजनीति?




    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ Brahma Chellaney ने हाल में एक श्रृंखला में ऐसे दावे किए हैं, जिनमें अमेरिका, ईरान, चीन और कैरेबियन क्षेत्र की भू-राजनीति को लेकर गंभीर टिप्पणियां शामिल हैं।इन दावों के अनुसार वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और अमेरिका की विदेश नीति नई दिशा में जा रही है।

    ट्रंप और वैश्विक रणनीति पर दावा
    दावों में कहा गया है कि Donald Trump कथित तौर पर ईरान संकट के बीच नई रणनीतिक दिशा अपना रहे हैं। इसमें:

    मध्य पूर्व और कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिका की सक्रियता बढ़ना

    क्यूबा और वेनेजुएला जैसी सरकारों पर दबाव की नीति

    सत्ता परिवर्तन (regime change) जैसी पुरानी रणनीतियों की वापसी का संकेत

    हालांकि ये सभी दावे विश्लेषण और टिप्पणी पर आधारित हैं, किसी आधिकारिक अमेरिकी नीति दस्तावेज से इनकी पुष्टि नहीं हुई है।

    क्यूबा और कैरेबियन तनाव का संदर्भ
    चेलानी के अनुसार कैरेबियन क्षेत्र में तनाव के पीछे ये कारक बताए गए हैं:

    क्यूबा के खिलाफ आर्थिक और ऊर्जा प्रतिबंधों का विस्तार

    समुद्री नाकेबंदी और तेल आपूर्ति पर रोक के आरोप

    सैन्य गतिविधियों और निगरानी में वृद्धि

    इन घटनाओं को क्षेत्रीय संकट और मानवीय दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन इन दावों पर अलग-अलग पक्षों की राय भिन्न है।

    चीन पर रणनीतिक टिप्पणी
    अपने एक अन्य विश्लेषण में चेलानी ने कहा कि:

    अमेरिका अब चीन को केवल प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि “समकक्ष महाशक्ति” के रूप में देख रहा है

    वैश्विक शक्ति संतुलन बहुध्रुवीय (multipolar) बनता जा रहा है

    एशिया में खासकर जापान और अन्य देशों के लिए चीन-अमेरिका संबंध महत्वपूर्ण तनाव कारक बन रहे हैं

    इस संदर्भ में China को लेकर वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की चर्चा और तेज हो गई है।

    कितना तथ्य, कितना विश्लेषण?
    यह समझना जरूरी है कि:

    ये दावे मुख्यतः विश्लेषणात्मक टिप्पणियों और भू-राजनीतिक व्याख्या पर आधारित हैं

    इनमें कई बातें “प्रोजेक्शन” या “जियोपॉलिटिकल थ्योरी” के रूप में प्रस्तुत की गई हैं

    आधिकारिक अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन सभी बिंदुओं की पुष्टि नहीं की है

  • ईरान युद्ध सवाल पर ट्रम्प पत्रकार पर भड़के, रिपोर्टिंग को बताया ‘देशद्रोह’, कहा- सच नहीं लिखते

    ईरान युद्ध सवाल पर ट्रम्प पत्रकार पर भड़के, रिपोर्टिंग को बताया ‘देशद्रोह’, कहा- सच नहीं लिखते


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान युद्ध से जुड़े एक सवाल पर उस समय भड़क उठे जब एक पत्रकार ने सैन्य अभियान और राजनीतिक लक्ष्यों को लेकर सवाल पूछा। ट्रम्प ने पत्रकार को झूठा बताते हुए उसकी रिपोर्टिंग को देशद्रोह जैसा करार दिया और कहा कि वह सच नहीं लिखते तथा उनके एडिटर जो कहते हैं, वही वह लिखते हैं।

    ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान में पूरी तरह सैन्य जीत हासिल कर ली है और यह बात सभी मानते हैं। उन्होंने पत्रकार से नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसे लोग देश के खिलाफ काम कर रहे हैं और उन्हें अपनी रिपोर्टिंग पर शर्म आनी चाहिए।

    दरअसल यह सवाल एक पत्रकार डेविड सेंगर ने पूछा था, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने सैन्य जीत हासिल कर ली है तो फिर राजनीतिक लक्ष्य पूरे क्यों नहीं हुए और संघर्ष अभी भी क्यों जारी है। इसी सवाल के बाद ट्रम्प ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

    इस बीच ईरान संघर्ष को लेकर वैश्विक स्तर पर भी कई बड़े अपडेट सामने आए हैं। ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में माना गया कि युद्ध को खत्म करने की जरूरत है और होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखा जाना चाहिए। हालांकि चीन की भूमिका को लेकर कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं।

    वहीं ब्रिक्स देशों की बैठक में भी ईरान मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी और सदस्य देशों के अलग-अलग रुख सामने आए। भारत में हुई बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि इस मुद्दे पर देशों की सोच अलग-अलग है।

    अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने दावा किया है कि चीन अमेरिका से तेल खरीद बढ़ा सकता है, जबकि चीन ने कहा है कि समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। जर्मनी ने भी ईरान से तुरंत बातचीत शुरू करने और परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की है।

  • अडानी का US के साथ सेटलमेंट…. दो केस खत्म करने के बदले 10 अरब डॉलर निवेश और 15 हजार नौकरियां

    अडानी का US के साथ सेटलमेंट…. दो केस खत्म करने के बदले 10 अरब डॉलर निवेश और 15 हजार नौकरियां


    वाशिंगटन।
    अडानी ग्रुप (Adani Group) के चेयरमैन और एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति गौतम अडानी (Gautam Adani) पर अमेरिका (America) में दो तरह के कानूनी मामले चल रहे हैं। अब अमेरिकी अधिकारी इन मामलों को खत्म करने की तैयारी में हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका का न्याय विभाग भारतीय अरबपति गौतम अडानी पर लगे रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के सभी आपराधिक मामलों को वापस ले रहा है।


    क्या है पूरा मामला?

    साल 2024 के अंत में, अमेरिका के शेयर बाजार नियामक ‘सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन’ (SEC) ने भारत के दिग्गज कारोबारी गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी पर एक गंभीर आरोप लगाया था। ये दोनों अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के शीर्ष पदों पर हैं।


    रिश्वत का आरोप:

    SEC का आरोप था कि अडानी ग्रुप ने भारत में एक बहुत बड़े सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट का सरकारी ठेका ऊंचे दामों पर हासिल करने के लिए भारतीय अधिकारियों को करोड़ों डॉलर (सैकड़ों मिलियन डॉलर) की रिश्वत देने का वादा किया था।


    निवेशकों से धोखाधड़ी:

    इसी दौरान, कंपनी ने वॉल स्ट्रीट (अमेरिकी शेयर बाजार) के निवेशकों से अरबों डॉलर का फंड भी जुटाया। निवेशकों को यह भरोसा दिलाया गया था कि कंपनी में रिश्वतखोरी को रोकने के लिए सख्त नियम हैं और टॉप मैनेजमेंट ने वादा किया था कि कोई भी गलत काम नहीं होगा। SEC के मुताबिक, निवेशकों से यह बात छिपाना अमेरिकी कानूनों के तहत धोखाधड़ी है।


    सेटलमेंट और जुर्माना

    अब अमेरिकी सरकार इस मामले को सुलझाने यानी सेटलमेंट के लिए राजी हो गई है। कोर्ट में जमा किए गए दस्तावेजों के अनुसार: गौतम अडानी 60 लाख डॉलर का जुर्माना भरेंगे। उनके भतीजे सागर अडानी 1 करोड़ 20 लाख डॉलर (लगभग $12 मिलियन) का जुर्माना भरेंगे।

    अहम बात:
    इस समझौते में यह शामिल है कि अडानी अपनी गलती या अपराध स्वीकार नहीं कर रहे हैं। अडानी ग्रुप ने शुरुआत में भी इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें बेबुनियाद बताया था।


    आपराधिक मामले (क्रिमिनल केस) रद्द होने की संभावना

    न्यूयॉर्क में दोनों पर धोखाधड़ी और साजिश रचने के क्रिमिनल चार्ज भी लगे थे। द न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, अब इन आपराधिक मामलों को भी रद्द किया जा सकता है।


    ऐसा क्यों हो रहा है?:

    इसके पीछे एक बड़ा कारण अमेरिका में हुए राजनीतिक बदलाव को माना जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद गौतम अडानी ने उनकी खूब तारीफ की थी।

    मार्च 2025 में, ट्रंप सरकार ने ‘फॉरेन करप्ट प्रैक्टिसेस एक्ट’ (FCPA) पर रोक लगा दी थी। यह वह कानून है जो अमेरिकी कंपनियों या निवेशकों से जुड़े विदेशी व्यापार में रिश्वतखोरी को रोकता है। इस कानून पर रोक लगने से ही यह तय माना जा रहा था कि अडानी के खिलाफ चल रहा केस कमजोर पड़ जाएगा।


    क्या है 10 अरब डॉलर और 15 हजार नौकरियों का ऑफर?

    न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 में अडानी की लीगल टीम ने वाशिंगटन में अमेरिकी न्याय विभाग के अधिकारियों के साथ एक अहम बैठक की। इस दौरान वकीलों ने सरकार के सामने एक बड़ा प्रस्ताव रखा- उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे केस को खत्म कर देता है, तो अडानी समूह अमेरिका की अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर (लगभग 90 हजार करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश करेगा। इसके अलावा, इस निवेश के जरिए अमेरिका में 15,000 नई नौकरियां पैदा की जाएंगी।


    डोनाल्ड ट्रंप के वकील की एंट्री

    इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब गौतम अडानी ने अपना केस लड़ने के लिए एक नई लीगल टीम उतारी। इस टीम का नेतृत्व ‘रॉबर्ट जे. गिफ्रा जूनियर’ कर रहे हैं। रॉबर्ट जे. गिफ्रा कोई आम वकील नहीं हैं, बल्कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निजी (पर्सनल) वकीलों में से एक हैं।


    मीटिंग में 100 स्लाइड का प्रेजेंटेशन

    न्याय विभाग के मुख्यालय में हुई उस बैठक में वकील रॉबर्ट ने अधिकारियों को करीब 100 स्लाइड का एक पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन दिखाया। शुरुआती स्लाइड्स में उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि अमेरिकी जांच एजेंसियों के पास अडानी के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं और न ही अमेरिका के पास इस मामले में केस चलाने का अधिकार क्षेत्र बनता है। इसी प्रेजेंटेशन की आखिरी कुछ स्लाइड्स में सरकार को खुश करने के लिए 10 अरब डॉलर के निवेश और नौकरियों का यह आकर्षक ऑफर पेश किया गया।


    अमेरिकी अधिकारियों का क्या रुख रहा?

    हालांकि अमेरिकी वकीलों और न्याय विभाग ने आधिकारिक तौर पर यह कहा कि इस 10 अरब डॉलर के ऑफर का इस कानूनी मामले के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि मीटिंग में मौजूद कम से कम एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इस निवेश के ऑफर पर बेहद ‘सकारात्मक प्रतिक्रिया’ दी थी। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही हफ्तों के भीतर अमेरिका ने अडानी पर लगे क्रिमिनल चार्ज हटाने की योजना बना ली।


    अडानी का कारोबार और पिछला विवाद

    गौतम अडानी ने 1990 के दशक में कोयले के व्यापार से अपनी किस्मत बनाई थी। धीरे-धीरे उन्होंने ग्रीन एनर्जी, रक्षा (डिफेंस) और कृषि जैसे कई बड़े सेक्टर्स में अपना बिजनेस फैला लिया। “ग्रोथ विद गुडनेस” के नारे के साथ, कंपनी ने 20 गीगावाट से ज्यादा का क्लीन एनर्जी पोर्टफोलियो बना लिया है, जिसमें तमिलनाडु का दुनिया के सबसे बड़े सोलर पावर प्लांट में से एक भी शामिल है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक इस सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी बनना है।

  • ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा

    ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा



    नई दिल्ली। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर रणनीतिक बातचीत एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका यहां तीन नए सैन्य अड्डे बनाने की योजना पर काम कर रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह प्रक्रिया अभी केवल कूटनीतिक चर्चा के स्तर पर है और किसी भी तरह का अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

    ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण इसका आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होना है, जहां से उत्तरी अटलांटिक महासागर और यूरोप-उत्तर अमेरिका के बीच के समुद्री मार्गों पर नजर रखी जा सकती है। अमेरिका पहले से ही यहां थुले एयर बेस के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है, जो शीत युद्ध के समय से सक्रिय है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और डेनमार्क के बीच हाल के महीनों में उच्च स्तरीय बातचीत हुई है, जिसमें ग्रीनलैंड के दक्षिणी हिस्से में अतिरिक्त सैन्य ढांचे विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। माना जा रहा है कि इन प्रस्तावित अड्डों का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, खासकर रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखना है।

    अमेरिका की रणनीति आर्कटिक क्षेत्र में अपनी निगरानी और सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की है। इस क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों की रुचि बढ़ गई है। इसी वजह से अमेरिका इस इलाके को अपने रक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा मानता है।

    हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि डेनमार्क एक संप्रभु राष्ट्र है और ग्रीनलैंड उसकी स्वायत्त इकाई है, इसलिए किसी भी प्रकार के सैन्य विस्तार या नई तैनाती के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी होती है। डेनमार्क की सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने किसी भी “सीक्रेट डील” या कब्जे जैसे दावों को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा मामला भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है, न कि किसी तत्काल सैन्य कब्जे की योजना। अमेरिका का लक्ष्य नाटो सहयोगियों के साथ मिलकर आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है, ताकि भविष्य की किसी भी सुरक्षा चुनौती का सामना किया जा सके।

    फिलहाल स्थिति यह है कि बातचीत जारी है और किसी भी अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में “बिना गोली चले कब्जा” जैसी बातें अधिकतर राजनीतिक और मीडिया व्याख्याओं का हिस्सा मानी जा रही हैं, जबकि वास्तविकता अभी कूटनीतिक स्तर पर ही सीमित है।