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  • अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    नई दिल्ली। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भूचाल ला दिया है। सोमवार को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में ही कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। इस उछाल ने ग्लोबल इकोनॉमी में चिंता बढ़ा दी है और आने वाले दिनों में आम आदमी की रसोई और ईंधन पर असर होने की संभावना जताई जा रही है।

    एक दिन में 17% की भारी तेजी

    सोमवार को अमेरिकी बेंचमार्क (WTI) क्रूड की कीमत $15.66 की वृद्धि के साथ $106.56 प्रति बैरल पर पहुंच गई। यानी एक ही दिन में लगभग 17.23% का उछाल देखा गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड की कीमत $14.23 बढ़कर $106.92 प्रति बैरल हो गई। शुक्रवार तक तेल बाजार $90 के आसपास स्थिर था, लेकिन वीकेंड में बिगड़े हालात ने बाजार का समीकरण बदल दिया।

    10 दिन से जारी है अमेरिका-ईरान संघर्ष

    कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल पिछले 10 दिनों से अमेरिका और ईरान-इजरायल के बीच जारी संघर्ष की वजह से आया है। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सैन्य और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें प्रमुख ईंधन डिपो भी शामिल थे। इसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक हमले किए। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर ईरान की कार्रवाई ने सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया।

    ईरान की चेतावनी

    ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने चेतावनी दी है कि संघर्ष जारी रहा तो देश के तेल क्षेत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि इस स्थिति में ईरान न तो तेल उत्पादन कर पाएगा और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना संभव होगा। इस बयान से वैश्विक सप्लाई चेन में जोखिम बढ़ गया है।

    कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका

    विशेषज्ञों की चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह वह संकरा समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के कुल कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान ने फिलहाल इसे बंद नहीं किया है, लेकिन चेतावनी दी है कि संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका और इजरायल से जुड़े व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। यदि मार्ग अवरुद्ध होता है, तो तेल की कीमतों में और उछाल संभव है।

    अमेरिका की प्रतिक्रिया

    अमेरिका ने कहा है कि यह संकट लंबे समय तक नहीं रहेगा। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, मौजूदा उछाल केवल मार्केट का डर है और कुछ हफ्तों तक ही बने रहने की संभावना है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने भी कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई भविष्य में तेल उद्योग के लिए फायदेमंद होगी।

    ट्रंप का बयान

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन इसे सुरक्षा की कीमत मानना चाहिए। उनका मानना है कि जैसे ही ईरान का परमाणु खतरा समाप्त होगा, तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। इस उछाल के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की अस्थिरता बनी हुई है, और आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है।

  • 10 नए बैटलशिप बना रहा अमेरिका, पुराने युद्धपोतों से 100 गुना ज्यादा ताकतवर होंगे: ट्रंप

    10 नए बैटलशिप बना रहा अमेरिका, पुराने युद्धपोतों से 100 गुना ज्यादा ताकतवर होंगे: ट्रंप

     वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने हाल ही में अमेरिकी सैन्य रणनीति और विदेश नीति को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका ऐसे 10 अत्याधुनिक बैटलशिप तैयार कर रहा है, जो पुराने युद्धपोतों की तुलना में करीब 100 गुना ज्यादा शक्तिशाली होंगे। ट्रंप के मुताबिक इन युद्धपोतों का मकसद दुश्मनों को सीधे टक्कर देने से पहले ही डर पैदा करना है, ताकि वे किसी तरह का जोखिम उठाने से बचें।

    ट्रंप ने बताया कि उन्होंने महंगे रॉकेट सिस्टम की जगह बड़े बैटलशिप्स के इस्तेमाल का सुझाव दिया था। उनके अनुसार 30 लाख डॉलर तक के महंगे रॉकेट दागने के बजाय बड़े गोले दागने वाले युद्धपोत अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन नए बैटलशिप्स की मौजूदगी ही दुश्मनों को चुनौती देने से रोकने के लिए काफी होगी।

    ‘शक्ति से शांति’ की नीति पर जोर
    डोनाल्‍ड ट्रंप ने खुद को शांतिवादी बताते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में कई बड़े संघर्षों को खत्म किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने आठ युद्ध समाप्त करवाए और यूरोप की सुरक्षा के लिए भी लगातार प्रयास किए। ट्रंप का कहना था कि महासागरों से घिरे होने के कारण अमेरिका पर सीधे खतरे अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन फिर भी वैश्विक शांति बनाए रखने के लिए मजबूत सैन्य शक्ति जरूरी है।

    उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का भी जिक्र किया और कहा कि व्यापार और टैरिफ जैसे आर्थिक उपायों के जरिए संकट को कम करने में मदद मिली, जिससे संभावित बड़ा युद्ध टल गया।

    वेनेजुएला में ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’
    ट्रंप ने लैटिन अमेरिका की स्थिति पर बोलते हुए बताया कि जनवरी 2026 में अमेरिकी सेना ने ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत वेनेजुएला में एक विशेष कार्रवाई की। उनके मुताबिक इस ऑपरेशन में देश के तत्कालीन नेता Nicolás Maduro को पकड़ लिया गया।
    ट्रंप ने इस अभियान को “18 मिनट की शुद्ध सैन्य कार्रवाई” बताते हुए कहा कि इसके बाद वेनेजुएला में नई सरकार बनी है, जिसके साथ अमेरिका सहयोग कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बदलाव के बाद देश में तेल उत्पादन बढ़ा है और अमेरिका के साथ सोने तथा अन्य खनिजों को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता भी हुआ है।

    ईरान पर कार्रवाई का दावा
    राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को भी बड़ी सफलता बताया। उन्होंने दावा किया कि तीन दिनों के भीतर अमेरिकी सेना ने ईरान के 42 नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया। ट्रंप के अनुसार इस कार्रवाई में कुछ बड़े युद्धपोत भी शामिल थे, जिससे ईरान की नौसैनिक क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा।

    उन्होंने ‘मिडनाइट हैमर’ नामक बी-2 बमवर्षक हमले का भी जिक्र किया और कहा कि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा। ट्रंप के मुताबिक उस समय ईरान परमाणु हथियार बनाने से कुछ ही महीनों दूर था, लेकिन अमेरिकी कार्रवाई से इस खतरे को टाल दिया गया।

    आक्रामक लेकिन निर्णायक विदेश नीति

    ट्रंप ने अपने बयानों में बार-बार कहा कि उनकी नीति “शक्ति के जरिए शांति” बनाए रखने की है। उनके अनुसार मजबूत सैन्य तैयारी, आर्थिक दबाव और रणनीतिक कार्रवाई के जरिए दुनिया में स्थिरता कायम की जा सकती है।

    उन्होंने नए बैटलशिप्स के निर्माण, वेनेजुएला में कार्रवाई और ईरान के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन को अपनी विदेश नीति की प्रमुख उपलब्धियों के तौर पर पेश किया। ट्रंप का कहना है कि उनकी रणनीति का उद्देश्य युद्ध शुरू करना नहीं, बल्कि संभावित संघर्षों को रोकना है।

  • टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज

    टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज


    नई दिल्ली। अमेरिका के टेक्सास राज्य के शुगर लैंड शहर में स्थापित 90 फीट ऊंची अभय हनुमान प्रतिमा को लेकर विवाद गहरा गया है। पंचलोहा से निर्मित यह भव्य प्रतिमा उत्तर अमेरिका की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमाओं में से एक मानी जा रही है। अगस्त 2024 में विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इसका लोकार्पण किया गया था। निजी भूमि पर स्थापित यह प्रतिमा स्थानीय हिंदू समुदाय के लिए आस्था शक्ति और शांति का प्रतीक बन चुकी है लेकिन हाल के दिनों में इसे लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब टेक्सास स्थित एक रिपब्लिकन कार्यकर्ता कार्लोस टुर्सियोस ने सोशल मीडिया पर प्रतिमा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी साझा की। पोस्ट में नस्लीय और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और यह आरोप लगाया गया कि प्रवासी समुदाय अमेरिका में “धीरे-धीरे कब्जा” कर रहा है। उनके कुछ समर्थकों ने भी आपत्तिजनक और आप्रवासी-विरोधी नारे लगाए जिससे मामला और तूल पकड़ गया।

    इस बयान के बाद भारतीय-अमेरिकी समुदाय और कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि प्रतिमा निजी संपत्ति पर स्थापित है और अमेरिकी संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आती है। समुदाय के प्रतिनिधियों का तर्क है कि किसी भी धार्मिक प्रतीक को नस्लीय या सांस्कृतिक आधार पर निशाना बनाना न केवल असंवेदनशील है बल्कि असंवैधानिक भावना को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की बहुसांस्कृतिक पहचान में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान मूलभूत सिद्धांत है।

    यह पहली बार नहीं है जब इस मंदिर परिसर की प्रतिमा विवाद में आई हो। इससे पहले भी कुछ समूहों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। उस समय भी स्थानीय प्रशासन और सामुदायिक नेताओं ने संयम और संवाद की अपील की थी। हालांकि इस बार सोशल मीडिया की तीव्रता ने विवाद को राष्ट्रीय बहस का रूप दे दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है बल्कि अमेरिका में धार्मिक विविधता आप्रवासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे व्यापक विषयों से जुड़ा हुआ है। एक पक्ष इसे धार्मिक और नस्लीय असहिष्णुता का उदाहरण मान रहा है तो दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देख रहा है। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है लेकिन यह अधिकार घृणा या हिंसा को बढ़ावा देने का औचित्य नहीं बन सकता।

    फिलहाल शुगर लैंड की अभय हनुमान प्रतिमा आस्था के साथ-साथ सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। यह विवाद इस बात की याद दिलाता है कि बहुसांस्कृतिक समाजों में संवाद संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान कितने आवश्यक हैं। अमेरिका जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक प्रतीकों को लेकर उठने वाले प्रश्न केवल स्थानीय नहीं रहते बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अधिकार और सहअस्तित्व की बहस को जन्म देते हैं।

  • ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना

    ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना


    वाशिंगटन । इस समय पूरी दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई हैं। ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों और तेहरान पर संभावित हमले की अटकलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना फोकस बदल दिया है। अब उनकी नजरें सात समंदर पार नहीं, बल्कि पड़ोसी देश मैक्सिको पर हैं, जहां ड्रग कार्टेलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मैक्सिको पर दबाव डाल रहा है कि वह अमेरिकी सेना को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति दे।

    दरअसल, अमेरिका मैक्सिको में मादक पदार्थों (खासकर फेंटानिल) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में अपनी सेना को शामिल करने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ मैक्सिको की सरकार विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को सिरे से नकार रही है। अमेरिकी अधिकारी विशेष अभियान दलों के सैनिकों या सीआईए अधिकारियों को मैक्सिकन सैनिकों के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाने की मंजूरी मांग रहे हैं।

    न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको की धरती पर फेंटानिल की प्रयोगशालाओं को नष्ट करने के मकसद से चलाए जा रहे अभियानों में अमेरिकी सैन्य बलों की भागीदारी के लिए मैक्सिको से मंजूरी हासिल करने के प्रयास तेज कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी चाहते हैं कि संदिग्ध फेंटानिल उत्पादन स्थलों पर छापेमारी के दौरान मैक्सिकन सैनिकों के साथ विशेष अभियान दल के सैनिक या सीआईए अधिकारी शामिल हों। यह अनुरोध दोनों देशों के बीच फेंटानिल संकट को लेकर हुई उच्च-स्तरीय सुरक्षा वार्ताओं के बाद आया है।

    बता दें कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्रंप ने मैक्सिको को चेतावनी दी थी कि वह अगला निशाना बन सकता है। उन्होंने कहा था कि अब हम ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने जा रहे हैं। मैक्सिको पर ड्रग तस्करों का कब्जा है। उस देश की हालत देखना बेहद दुखद है, लेकिन ड्रग तस्करों का ही राज है और वे हर साल हमारे देश में 2.5 लाख से 3 लाख लोगों की जान ले रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि अमेरिका इन ड्रग कार्टेलों से निपटने के लिए मैक्सिको में जमीनी ठिकानों पर हमला कर सकता है।

    इन धमकियों के बावजूद मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने ट्रंप के साथ सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर हुई ‘अच्छी बातचीत’ के बाद अपना विरोध दोहराया है। शीनबाम ने पहले भी ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और मैक्सिकन ड्रग कार्टेलों के खिलाफ प्रयासों में विदेशी सैन्य भागीदारी से लगातार इनकार किया है।

  • पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध

    पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध


    वाशिंगटन।
    भारत (India) और अमेरिका (America) के रिश्ते पिछले 6 महीनों से लगातार खराब स्थिति में हैं। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत ने खुले तौर पर अमेरिकी बयानों का विरोध किया, जिसके परिणाम स्वरूप ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने पाकिस्तान (Pakistan) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाते हुए भारत पर आर्थिक हमला करने की कोशिश की। राष्ट्रपति ट्रंप की इस नीति का अमेरिका में ही कई लोगों ने विरोध किया, यहां तक कि उनके सहयोगियों ने भी भारत को लेकर अपनाई जा रही इस नीति का विरोध ही किया। अब अमेरिकी वैश्विक मामलों के जानकार, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा ने ट्रंप की इस नीति को लेकर उन पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने अपने निजी व्यवहार के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर दिया।

    एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”

    प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”

    आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।

    दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।

    दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।

  • अफगानिस्तान मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर गुस्‍साए डोनाल्‍ड ट्रंप, पत्रकार से कहा- ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’

    अफगानिस्तान मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर गुस्‍साए डोनाल्‍ड ट्रंप, पत्रकार से कहा- ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’


    नई दिल्‍ली । वाइट हाउस के सामने हुई गोलीबारी को लेकर मीडिया से बात कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप एक सवाल पर अपना आपा खो बैठे। एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस घटना के लिए अपने पूर्ववर्ती जो बाइडन प्रशासन को दोष क्यों दिया? इस सवाल को सुनते ही ट्रंप भड़क गए और गुस्से में पत्रकार की तरफ देखते हुए बोले, ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’

    गौरतलब है कि कल हुई इस घटना के बाद से ही ट्रंप लगातार बाइडन प्रशासन पर इसका दोष दे रहे हैं। क्योंकि आरोपी रहमानुल्लाह बाइडन प्रशासन के दौरान ही अफगानिस्तान से अमेरिका आया था। आरोपी रहमानुल्लाह बाइडन के ऑपरेशन अलाइज वेलकम अभियान के दौरान अमेरिका आया था।

    ट्रंप ने रिपोर्टर पर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, “दोष दे रहा हूं क्योंकि वे (बाइडन) हजारों ऐसे लोगों को अमेरिका लेकर आए थे, जिन्हें यहां होना ही नहीं चाहिए था। तुम ऐसे सवाल पूछ रहे हो क्योंकि तुम बेवकूफ इंसान हो।” राष्ट्रपति ने कहा कि बाइडन प्रशासन ने एक कानून पारित किया है, जिसकी वजह से हम इन लोगों को वापस नहीं भेज सकते। उन्होंने पूरे हालात को गड़बड़ करार देते हुए कहा कि अफगानिस्तान का मामला एक गंदगी था। इन (प्रवासियों को) शुरू से ही यहां नहीं होना चाहिए था।

    इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने दोनों नेशनल गार्ड्स की सेहत का अपडेट देते हुए बताया कि इसमें घायल एक जवान सैनिक सारा बेकस्ट्राम की मौत हो चुकी है।

    ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार लगाए जा रहे आरोपों के बीच बाइडन समर्थकों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है। बाइडन प्रशासन के समर्थकों का कहना है कि इस कार्यक्रम के तहत जिन लोगों को लाया गया था, उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मदद की थी। इस कार्यक्रम को व्यापक सुरक्षा जांच के बाद ही पूरा किया गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के वापस आने के बाद इन लोगों के जीवन के लिए यह कार्यक्रम जरूरी था।

    गौरतलब है कि बाइडन प्रशासन की इस पहल के तहत करीब 76 हजार अफगान नागरिकों को अमेरिका लाया गया था। इनमें से कई अमेरिकी सैनिक और राजनयिकों के साथ दुभाषिए और अनुवादक के रूप में काम करते थे।