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  • अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?

    अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के एक महत्वपूर्ण सर्विलांस टावर को नष्ट कर दिया है। अमेरिकी सेना ने इस कार्रवाई का वीडियो फुटेज भी जारी किया है।

    अमेरिका के अनुसार, यह हमला होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की निगरानी और सैन्य क्षमता को कमजोर करने के अभियान का हिस्सा था। अमेरिकी सेंट्रल कमान (CENTCOM) ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि अमेरिकी सेना ने चाबहार बंदरगाह शहर में स्थित ‘चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट’ सर्विलांस टावर को निशाना बनाया।

    खास बात यह है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत भी कभी ईरान का सहयोगी रह चुका है। भारत ने इस रणनीतिक बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    16 जुलाई को किया गया हमला
    CENTCOM के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने 16 जुलाई को इस ऑपरेशन को अंजाम दिया और चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट के सर्विलांस टावर को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह टावर ईरान के ओमान की खाड़ी तट पर मौजूद समुद्री निगरानी नेटवर्क का हिस्सा था। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की निगरानी और कार्रवाई के लिए किया जाता था।

    अमेरिका के अनुसार, टावर के नष्ट होने से IRGC की उस क्षमता को नुकसान पहुंचा है, जिसके जरिए वह रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखने और हमलों के समन्वय का काम करता था।

    अमेरिका ने बताई कार्रवाई की वजह
    CENTCOM ने कहा कि इस हमले से नागरिक जहाजों के क्रू सदस्यों को निशाना बनाने की IRGC की क्षमता कम होगी। अमेरिकी कमान ने यह भी दावा किया कि इस कार्रवाई से क्षेत्रीय जल क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा कि यह सुविधा उन जहाजों के लिए लागू नहीं होगी, जो ईरान के खिलाफ चल रही अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे हैं।

    होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव
    अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान लंबे समय से इस इलाके में अपनी सैन्य और निगरानी क्षमता बनाए हुए है।

    चाबहार और भारत का संबंध
    चाबहार बंदरगाह भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व रखता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इस बंदरगाह के विकास में सहयोग किया था। इसका उद्देश्य भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराना था। यही वजह है कि चाबहार का नाम किसी भी सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में आने पर भारत के लिए भी यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है।

  • अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी

    अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी


    नई दिल्ली। अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देख रहे लाखों विदेशी छात्रों, खासकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए नई चुनौती सामने आ सकती है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने F-1 छात्र वीजा नियमों में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत अमेरिका में विदेशी छात्रों के रहने की अवधि अधिकतम चार साल तक सीमित की जा सकती है।

    यदि यह नियम लागू होता है, तो दशकों से चली आ रही ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ (Duration of Status) व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। वर्तमान व्यवस्था के तहत F-1 वीजा वाले छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम में सक्रिय हैं और वीजा की सभी शर्तों का पालन कर रहे हैं।

    चार साल से ज्यादा पढ़ाई के लिए लेनी होगी मंजूरी
    रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियम के तहत F-1 वीजा पर अमेरिका जाने वाले छात्रों को सामान्य तौर पर अधिकतम चार साल तक रहने की अनुमति मिलेगी। अगर किसी छात्र का कोर्स, रिसर्च या प्रशिक्षण चार साल से अधिक समय तक चलता है, तो उसे अपनी वैध अवधि समाप्त होने से पहले DHS से एक्सटेंशन की मंजूरी लेनी होगी। समय पर अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में छात्र की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है।

    यह बदलाव सिर्फ F-1 वीजा तक सीमित नहीं रहेगा। प्रस्तावित नियम J-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी मीडिया प्रतिनिधियों को दिए जाने वाले I वीजा पर भी निश्चित अवधि लागू कर सकता है। हालांकि, लागू होने से पहले इस नियम को अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा।

    सरकार ने बताई राष्ट्रीय सुरक्षा वजह
    ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य छात्र वीजा प्रणाली की निगरानी को मजबूत करना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को प्रभावी बनाना है। वहीं, अमेरिकी विश्वविद्यालयों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है कि नए नियमों से चार साल से अधिक अवधि वाले शैक्षणिक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    भारतीय छात्रों पर सबसे ज्यादा असर की आशंका
    इस बदलाव का प्रभाव भारतीय छात्रों पर खास तौर पर पड़ सकता है। ‘ओपन डोर्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में अमेरिका के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 3.31 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन कर रहे थे। यह संख्या अमेरिका में पढ़ने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का करीब 30 प्रतिशत है।

    भारतीय छात्रों का एक बड़ा हिस्सा पीएचडी, रिसर्च आधारित मास्टर्स, मेडिकल ट्रेनिंग, इंजीनियरिंग रिसर्च और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में दाखिला लेता है, जिनकी अवधि कई बार चार साल से ज्यादा हो जाती है। ऐसे छात्रों को अब पढ़ाई जारी रखने के लिए समय रहते DHS से अतिरिक्त समय की अनुमति लेनी पड़ सकती है।

    एक्सटेंशन में देरी से बढ़ सकती हैं कानूनी मुश्किलें
    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी छात्र का एक्सटेंशन आवेदन समय पर मंजूर नहीं होता या दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक देरी अथवा अन्य कारणों से उसकी वैध अवधि खत्म हो जाती है, तो वह अमेरिका में ‘अनलॉफुल प्रेजेंस’ (अवैध रूप से रहने) की स्थिति में आ सकता है।

    इसका असर भविष्य में वीजा आवेदन, रोजगार के अवसर और अमेरिका में दोबारा प्रवेश पर पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल यह नियम तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा पूरी होने और अंतिम प्रभावी तारीख घोषित होने तक F-1 छात्रों के लिए मौजूदा ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ व्यवस्था ही जारी रहेगी।

  • अमेरिकी नाकाबंदी को मात देने की तैयारी में ईरान, ‘शैडो फ्लीट’ से तेल टैंकर निकालने की रणनीति

    अमेरिकी नाकाबंदी को मात देने की तैयारी में ईरान, ‘शैडो फ्लीट’ से तेल टैंकर निकालने की रणनीति


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। सीजफायर समझौते के खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच टकराव तेज हो गया है। ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी है, वहीं ईरान इस नाकाबंदी को चकमा देने के लिए अपने गुप्त जहाजी बेड़े यानी ‘शैडो फ्लीट’ का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य पर निगरानी और दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने उत्तरी अरब सागर में दो एयरक्राफ्ट कैरियर, 1,000 से ज्यादा नौसैनिकों और कम से कम 19 युद्धपोतों को तैनात किया है। इसके जवाब में ईरान से जुड़े कई तेल टैंकर अपनी पहचान छिपाकर समुद्री रास्तों से निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

    23 जहाजों का गुप्त नेटवर्क सक्रिय
    समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान से जुड़े कम से कम 23 जहाज सक्रिय हैं। ये जहाज अपने ट्रैकिंग सिस्टम को बंद या उसमें बदलाव कर ‘डार्क फ्लीट’ या ‘शैडो फ्लीट’ की तरह काम कर रहे हैं। इन जहाजों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचते हुए तेल और अन्य सामान की आवाजाही के लिए किया जा रहा है।

    दूसरे देशों के झंडे और पहचान छिपाने की रणनीति
    समुद्री खुफिया कंपनी विंडवर्ड के मुताबिक, ईरान से जुड़े जहाज अमेरिकी नौसेना की निगरानी से बचने के लिए कई तरह के तरीके अपना रहे हैं। इनमें दूसरे देशों के झंडों का इस्तेमाल, ट्रांसपोंडर बंद करना और जहाज की वास्तविक पहचान छिपाने जैसी तकनीकें शामिल हैं। इस तरह ये जहाज अपनी गतिविधियों को छिपाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

    ईरान पहले भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए ऐसे गुप्त जहाजी नेटवर्क का इस्तेमाल करता रहा है। प्रतिबंधों के बावजूद वह एक जटिल शिपिंग नेटवर्क के जरिए कच्चे तेल का निर्यात करता रहा है, जिसमें चीन उसका प्रमुख खरीदार रहा है।

    जून में 5 करोड़ बैरल तेल निर्यात का दावा
    ‘टैंकरट्रैकर्स’ के आंकड़ों के मुताबिक, तमाम प्रतिबंधों और निगरानी के बावजूद ईरान ने जून महीने में करीब 5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया।

    रिपोर्ट के अनुसार, 23 जहाजों में से 10 टैंकर इस समय कच्चे तेल या अन्य सामान से लदे हुए हैं, जबकि 13 जहाज नए माल की लोडिंग का इंतजार कर रहे हैं। इसके अलावा सात प्रतिबंधित VLCC (बहुत बड़े कच्चे तेल के टैंकर) हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद हैं। ये टैंकर ईरानी तेल से भरे हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की तलाश में हैं।

    पहले भी नाकाबंदी के बावजूद जारी रहा तेल निर्यात
    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका पहले भी ईरान के तेल निर्यात को रोकने के लिए कई कदम उठा चुका है। इन प्रयासों से ईरानी तेल निर्यात में गिरावट जरूर आई, लेकिन इसे पूरी तरह बंद नहीं किया जा सका। हालांकि, पिछली पाबंदियों का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। देश में महंगाई बढ़ी और आर्थिक दबाव भी काफी बढ़ गया था। अब नजर इस बात पर है कि अमेरिका की कड़ी निगरानी के बीच ईरान का शैडो फ्लीट अपनी रणनीति में कितना सफल हो पाता है।

    ईरान का दावा- तेल निर्यात सामान्य
    इस बीच ईरान के तेल मंत्री मोहसिन पाकनेजाद ने दावा किया है कि अमेरिका की ओर से 60 दिनों की प्रतिबंध छूट खत्म किए जाने के बाद भी देश का कच्चे तेल का निर्यात सामान्य रूप से जारी है। उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने अमेरिकी प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने के लिए पहले से ही मजबूत व्यवस्था तैयार कर रखी है।

    पाकनेजाद ने अमेरिकी फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि वॉशिंगटन ने अपने वादों का उल्लंघन किया है। उन्होंने इसे इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (MoU) की धारा 10 के खिलाफ बताया, जिसमें 60 दिनों की छूट का प्रावधान शामिल था।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विवाद की खबरों को सर्जियो गोर ने बताया गलत, बोले- बातचीत सकारात्मक दिशा में जारी

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विवाद की खबरों को सर्जियो गोर ने बताया गलत, बोले- बातचीत सकारात्मक दिशा में जारी


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर चल रही अटकलों पर अब अमेरिकी पक्ष की ओर से सफाई सामने आई है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने उन खबरों को खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता अटक गया है या किसी पक्ष ने इसे अस्वीकार कर दिया है।

    सर्जियो गोर ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि ऐसी खबरें गलत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका दोनों ही व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और हाल की बातचीत सकारात्मक रही है।

    सर्जियो गोर ने कहा- किसी पक्ष ने डील रिजेक्ट नहीं की
    अमेरिकी राजदूत ने एक्स पर लिखा, “फेक न्यूज अलर्ट! किसी ने कुछ भी रिजेक्ट नहीं किया है।” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत सकारात्मक माहौल में आगे बढ़ रही है और ट्रेड डील को पूरा करने के लिए दोनों पक्ष सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। उन्होंने एक मीडिया रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि संबंधित पक्षों को इससे बेहतर काम करना चाहिए।

    भारत सरकार ने भी रिपोर्टों को बताया भ्रामक
    भारत सरकार ने भी उन दावों को खारिज किया है, जिनमें कहा गया था कि नई दिल्ली व्यापार समझौते में देरी कर रही है या पीछे हट गई है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इन दावों को झूठा, आधारहीन और भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता लगातार जारी है और समझौते की दिशा में काफी प्रगति हुई है।

    गोयल ने यह भी कहा कि भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील से दूरी नहीं बनाई है और न ही जानबूझकर इसमें देरी की जा रही है। उन्होंने रॉयटर्स की रिपोर्ट में किए गए दावों को पूरी तरह गलत बताया।

    क्या थी रिपोर्ट में कही गई बात?
    इससे पहले समाचार एजेंसी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत और अमेरिका बेहतर शर्तों की तलाश में व्यापार समझौते को लेकर सहमति तक नहीं पहुंच सके हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए किसी ऐसे समझौते में जल्दबाजी नहीं करना चाहता, जिससे घरेलू स्तर पर नुकसान हो। इसमें यह भी दावा किया गया था कि दोनों देश अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेसन ग्रीयर की भारत यात्रा के दौरान अंतरिम समझौते की शर्तों को अंतिम रूप देने में सफल नहीं हो पाए।

    रिपोर्ट के अनुसार, एक भारतीय अधिकारी ने दावा किया था कि अमेरिका की ओर से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है। इनमें चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को लेकर टैरिफ लाभ और समझौते के बाद नए अमेरिकी शुल्कों से सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल बताए गए थे।

    संवेदनशील क्षेत्रों पर भारत का रुख
    रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भारत कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जल्दबाजी में कोई समझौता नहीं करना चाहता। भारत का जोर ऐसे व्यापार समझौते पर है, जो दोनों देशों के हितों के अनुरूप हो। फिलहाल भारत और अमेरिका दोनों की ओर से यही संकेत दिए गए हैं कि बातचीत जारी है और ट्रेड डील को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

  • दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं

    दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं


    तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच कतर की राजधानी दोहा में प्रस्तावित बातचीत को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मंगलवार को दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक का दावा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की वार्ता निर्धारित नहीं है।

    ईरान के इस बयान से दोनों देशों के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों पर सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद भी एक बार फिर सामने आ गए हैं।

    ईरान बोला- अमेरिका से कोई बातचीत तय नहीं
    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि इस सप्ताह ईरान का एक प्रतिनिधिमंडल कतर जाएगा, लेकिन इस यात्रा का अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी बैठक या वार्ता से कोई संबंध नहीं है।

    उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी स्तर की बातचीत तय नहीं है। बघाई के मुताबिक, तेहरान की प्राथमिकता फिलहाल दोनों देशों के बीच हुए समझौते से जुड़े प्रावधानों को लागू करना है और अंतिम समझौते पर चर्चा अभी शुरू नहीं हुई है।

    ट्रंप ने किया था बैठक का दावा
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया था कि दोहा में अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठक होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि बातचीत की पहल ईरान की ओर से की गई है। बाद में व्हाइट हाउस ने पुष्टि करते हुए बताया कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर उच्चस्तरीय वार्ता के लिए दोहा जाने वाले हैं।

    हालिया समझौते पर भी मंडराने लगे सवाल
    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने को लेकर एक बहु-बिंदु समझौते पर सहमति बनने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि अब दोनों पक्षों के विरोधाभासी बयानों से यह संकेत मिल रहा है कि कूटनीतिक प्रक्रिया अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिशों को नया झटका लग सकता है।

  • 24 घंटे में दूसरी बार अमेरिका की ईरान पर एयर स्ट्राइक, सैन्य ठिकानों और ड्रोन केंद्रों को बनाया निशाना

    24 घंटे में दूसरी बार अमेरिका की ईरान पर एयर स्ट्राइक, सैन्य ठिकानों और ड्रोन केंद्रों को बनाया निशाना


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने 24 घंटे के भीतर दूसरी बार ईरान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित कई अहम ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर की गई इस कार्रवाई में ईरान के सैन्य निगरानी तंत्र, संचार प्रणाली, एयर डिफेंस साइट्स, ड्रोन भंडारण केंद्रों और समुद्री बारूदी सुरंग (माइन) बिछाने की क्षमताओं को निशाना बनाया गया।

    सिरिक के पास सुने गए धमाके

    ईरान के सरकारी मीडिया IRIB ने सैन्य सूत्रों के हवाले से बताया कि दक्षिणी शहर सिरिक के नजदीक विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। रिपोर्ट के मुताबिक कई प्रोजेक्टाइल एक दूरसंचार टावर से टकराए, हालांकि घटना से जुड़ी विस्तृत जानकारी तत्काल साझा नहीं की गई।

    युद्धविराम के बाद फिर बढ़ा तनाव

    अमेरिका ने शुक्रवार को भी ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब हाल ही में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच युद्धविराम पर सहमति बनी थी। लगातार दूसरे दिन हुई अमेरिकी एयर स्ट्राइक के बाद दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

    तेल टैंकर पर ड्रोन हमले का दिया जवाब

    अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने शनिवार तड़के वन-वे अटैक ड्रोन से पनामा के झंडे वाले तेल टैंकर M/T Kiku को निशाना बनाया, जिससे युद्धविराम का उल्लंघन हुआ। CENTCOM के मुताबिक, यह टैंकर 20 लाख से अधिक बैरल कच्चा तेल लेकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहा था, तभी उस पर हमला किया गया।

    अमेरिकी सेना का कहना है कि शुक्रवार की कार्रवाई के बाद ईरान को युद्धविराम का पालन करने और तनाव कम करने का अवसर दिया गया था, लेकिन ताजा ड्रोन हमले के बाद जवाबी कार्रवाई करना आवश्यक हो गया।

    अमेरिका ने दी सतर्क रहने की चेतावनी

    CENTCOM ने अपने बयान में कहा कि होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से जारी है और अमेरिकी सेना क्षेत्र में पूरी तरह सतर्क तथा किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

    इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी सेना ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन भंडारण केंद्रों के साथ रडार ठिकानों को भी निशाना बनाया था। वॉशिंगटन का कहना है कि वह कार्रवाई 25 जून को सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज M/V Ever Lovely पर हुए कथित ईरानी ड्रोन हमले के जवाब में की गई थी।

    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की चेतावनी

    बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को आगे किसी भी सैन्य कार्रवाई से बचने की चेतावनी दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान ने युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और अमेरिका ने उसका पालन किया। यदि समझौते को लेकर कोई मतभेद है तो उसे बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है, लेकिन हिंसा का जवाब हिंसा से दिया जाएगा।

  • पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बिगड़ते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा तनाव और बढ़ता है तथा स्थिति व्यापक संघर्ष में बदलती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों, ऊर्जा कंपनियों और आयातक देशों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। तेल की कीमतों में हालिया तेजी इस बात का संकेत है कि बाजार संभावित आपूर्ति बाधाओं को लेकर सतर्क हो चुका है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो ऊर्जा लागत में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र विश्व तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या परिवहन व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है। तेल उत्पादन और निर्यात में बाधा आने की आशंका के कारण बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। यही वजह है कि निवेशक लगातार घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    माना जा रहा है कि क्षेत्र में तेल उत्पादन और परिवहन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मार्ग दबाव में हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि गंभीर संकट की स्थिति में कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है।

    हालांकि फिलहाल कुछ ऐसे कारक भी हैं जो बाजार को पूरी तरह अस्थिर होने से बचा रहे हैं। प्रमुख देशों के रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग और कुछ बड़े उपभोक्ता देशों द्वारा आयात में संतुलन बनाए रखने के प्रयासों से बाजार को अस्थायी राहत मिली हुई है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं तो ये उपाय लंबे समय तक पर्याप्त साबित नहीं होंगे।

    ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता। तेल की कीमतों में तेजी का सीधा प्रभाव परिवहन, विनिर्माण, विमानन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ता है। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

    पिछले कुछ महीनों में वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़े प्रभाव ने बाजार को पहले ही संवेदनशील बना दिया है। आपूर्ति में कमी और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ तो बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल रहते हैं और तनाव कम होता है तो बाजार को राहत मिल सकती है। वहीं दूसरी ओर यदि टकराव बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों और उनके आर्थिक प्रभावों पर टिकी हुई हैं।

  • ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका

    ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) के साथ जारी शांति वार्ता (Peace talks) के बीच डील को लेकर बड़ी धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि ईरान (Iran) के साथ या तो बड़ी और बेहतर परिणामों वाली डील होगी या फिर कोई भी डील नहीं होगी। इतना ही नहीं ट्रंप ने डील न होने की स्थिति में फिर से युद्ध शुरू करने की भी धमकी दी।

    उन्होंने कहा कि अब अगर डील नहीं होती है, तो अमेरिका पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा। इसके साथ ही ट्रंप ने अरब देशों से अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने की अपील की, जिसमें कुछ देश पहले से शामिल हैं। बता दें, ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में सामने आई है, जब ईरान और अमेरिका के बीच हो रही शांति वार्ता लगातार लंबी खिंचती जा रही है। ईरान और अमेरिका दोनों ही तरफ से अच्छे संकेत दिए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।

    ईरान के साथ लंबी खिंचती बातचीत के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया का युद्ध फिर से शुरू हो। इसलिए बेहतर है कि डील हो जाए। सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने शनिवार को मध्य-पूर्व के राष्ट्राध्यक्षों के साथ हुई अपनी बातचीतों का ब्यौरा भी साझा किया। उन्होंने बताया खाड़ी देशों के नेताओं, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान के साथ मिलकर इस संकट को सुलझाने के लिए बातचीत की है। उम्मीद है कि यह जल्दी ही सुलझ जाएगा, लेकिन इसके साथ ही ट्रंप ने अपील की यह सभी देश अब्राहम अकॉर्ड पर भी हस्ताक्षर करें। इतना ही नहीं ट्रंप ने कहा कि अगर ऐसा होता है, तो ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर कर सकता है।


    एक-दो देशों को छोड़कर बाकी देशों को समस्या नहीं होनी चाहिए: ट्रंप

    सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने इस्लामिक देशों के अब्राहम अकॉर्ड को स्वीकार न करने के डर को भी महत्व दिया। उन्होंने कहा, “संभव है कि एक या दो देशों के बाद ऐसा न करने का कारण हो, हम उसे स्वीकार भी करेंगे। लेकिन अधिकांश देशों को इसके लिए तैयार होना होगा। इससे ईरान के साथ होने वाला समझौता और भी ज्यादा ऐतिहासिक हो जाएगा। यह समझौता संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकस्तान के लिए वित्तीय, आर्थिक और सामाजिक बूम साबित हुआ है। इस संघर्ष के दौर में भी इन देशों को इसका फायदा मिला है।”


    क्या हैं अब्राहम अकॉर्ड्स?

    अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका द्वारा बनाए गए समझौतों की एक लिस्ट है। इसका प्रमुख उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान शुरू हुए इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को ने हस्ताक्षर किए थे। सूडान ने भी इसको सहमति दी है, लेकिन अभी तक उसकी संसद ने इस पर हामी नहीं भरी है। वहीं, अमेरिका का करीबी माने जाने वाला सऊदी अरब भी अभी तक इस समझौते से दूरी बनाए हुए है। हालांकि, सऊदी क्राउन प्रिंस ने इस समझौते में शामिल होने के लिए एक शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि वह इसमें शामिल होने के लिए तैयार हैं, बशर्ते इसमें दो-राष्ट्र समाधान को लेकर स्पष्टता हो।

    दरअसल, अरब देशों और इस्लामिक देशों की दुनिया में अब्राहम अकॉर्ड्स को फिलिस्तीन के साथ धोखे के तौर पर देखा जाता है। इसलिए ज्यादातर देश इससे कन्नी काटते हुए नजर आते हैं। इस समझौते के बाद देशों को इजरायल के साथ सामान्य संबंधों पर राजी होना पड़ता है, जिससे उनकी जनता इस पर नाराज हो सकती है। पाकिस्तान जैसे देश के लिए तो यह समझौता और भी ज्यादा परेशानी पैदा करने वाला है, क्योंकि वह तो इजरायल को देश के रूप में मान्यता ही नहीं देते हैं।

  • रक्षा, ऊर्जा और सुरक्षा पर बड़ा मंथन, भारत-अमेरिका बैठक से वैश्विक समीकरणों में बढ़ी हलचल

    रक्षा, ऊर्जा और सुरक्षा पर बड़ा मंथन, भारत-अमेरिका बैठक से वैश्विक समीकरणों में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों ने कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इस उच्चस्तरीय बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे विषय केंद्र में रहे। बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच यह संवाद केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है और दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण समझौतों के जरिए रणनीतिक तालमेल को मजबूत किया है। इस बातचीत में भविष्य की सुरक्षा जरूरतों, तकनीकी सहयोग और साझा रणनीतिक हितों को लेकर सकारात्मक विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में नई दिशा तय कर सकती है।

    ऊर्जा क्षेत्र भी इस बैठक का एक अहम केंद्र रहा। तेजी से बदलती वैश्विक ऊर्जा जरूरतों और वैकल्पिक संसाधनों की बढ़ती मांग को देखते हुए दोनों देशों ने सहयोग के नए अवसरों पर विचार किया। ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और भविष्य की साझेदारी को लेकर साझा सोच विकसित करने पर जोर दिया गया। यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। दोनों देशों ने आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने तथा नए निवेश अवसरों को मजबूत करने की दिशा में विचार साझा किए। बदलते वैश्विक आर्थिक हालात के बीच व्यापारिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाना दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल दिखाई दिया। आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में कई नए कदम उठाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

    बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। दोनों देशों ने क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर सहमति जताई। वैश्विक चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। इस महत्वपूर्ण संवाद से स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत और अमेरिका अपने संबंधों को केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और व्यापक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

  • भारत-अमेरिका रिश्तों को मिली नई रफ्तार, नई दिल्ली बैठक में रक्षा से व्यापार तक कई बड़े मुद्दों पर बनी सहमति

    भारत-अमेरिका रिश्तों को मिली नई रफ्तार, नई दिल्ली बैठक में रक्षा से व्यापार तक कई बड़े मुद्दों पर बनी सहमति

    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों ने कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। इस उच्चस्तरीय बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे विषय केंद्र में रहे। बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक साझेदारी के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच यह संवाद केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है और दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण समझौतों के जरिए रणनीतिक तालमेल को मजबूत किया है। इस बातचीत में भविष्य की सुरक्षा जरूरतों, तकनीकी सहयोग और साझा रणनीतिक हितों को लेकर सकारात्मक विचार-विमर्श किया गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में नई दिशा तय कर सकती है।

    ऊर्जा क्षेत्र भी इस बैठक का एक अहम केंद्र रहा। तेजी से बदलती वैश्विक ऊर्जा जरूरतों और वैकल्पिक संसाधनों की बढ़ती मांग को देखते हुए दोनों देशों ने सहयोग के नए अवसरों पर विचार किया। ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और भविष्य की साझेदारी को लेकर साझा सोच विकसित करने पर जोर दिया गया। यह माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। दोनों देशों ने आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने तथा नए निवेश अवसरों को मजबूत करने की दिशा में विचार साझा किए। बदलते वैश्विक आर्थिक हालात के बीच व्यापारिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाना दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल दिखाई दिया। आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में कई नए कदम उठाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

    बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। दोनों देशों ने क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर सहमति जताई। वैश्विक चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। इस महत्वपूर्ण संवाद से स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत और अमेरिका अपने संबंधों को केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और व्यापक रूप देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।