

अयोध्या में तेजी से बढ़ रहा निवेश
राम मंदिर अयोध्या के निर्माण और उद्घाटन के बाद से अयोध्या में पर्यटन, कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से विकसित हो रहा है। इसी वजह से बड़े उद्योगपति और फिल्मी हस्तियां भी यहां रियल एस्टेट में निवेश कर रही हैं।
पहले कहां-कहां खरीदी जमीन?
अमिताभ बच्चन इससे पहले भी अयोध्या में तीन प्लॉट खरीद चुके हैं।
2024: The Sarayu Project Ayodhya में लगभग 10,000 वर्ग फुट का प्लॉट करीब 14.5 करोड़ रुपये में खरीदा था।
2025: सरयू नदी के पास ही 25,000 वर्ग फुट का प्लॉट लगभग 40 करोड़ रुपये में लिया।
2025: उसी क्षेत्र के पास एक और जमीन में निवेश किया गया था, जो सरयू तट के आसपास विकसित हो रही परियोजनाओं से जुड़ी बताई जाती है।
2026 (नया सौदा): सरयू किनारे के पास लक्जरी प्रोजेक्ट के आसपास 10,617 वर्ग मीटर जमीन 25.20 करोड़ रुपये में खरीदी गई है।
यूपी से खास जुड़ाव
अमिताभ बच्चन का उत्तर प्रदेश से पुराना रिश्ता है। उनका पैतृक संबंध Prayagraj से रहा है। ऐसे में अयोध्या में लगातार निवेश को उनके यूपी से भावनात्मक जुड़ाव के तौर पर भी देखा जा रहा है।
बताया जा रहा है कि अयोध्या में तेजी से विकसित हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यटन के कारण यहां जमीन की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिससे बड़े निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है।

लिलिपुट जिनका असली नाम एमएम फारुकी है उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि उनकी और कमल हासन की दोस्ती फिल्म सागर की शूटिंग के दौरान शुरू हुई थी। उस समय फिल्म की कास्टिंग के दौरान कमल हासन उन्हें ढूंढ रहे थे। जब लिलिपुट पृथ्वी थिएटर पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि कमल हासन खुद उन्हें बुला रहे हैं। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ और उन्हें लगा कि कोई मजाक कर रहा है।
जब वे कमल हासन से मिलने उनके होटल पहुंचे तो अभिनेता ने बेहद गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। कमल हासन ने उनसे कहा कि वे फिल्म सागर बना रहे हैं और उसमें उनके किरदार के बराबर का एक खास रोल है जिसके लिए उन्हें कद में छोटा कलाकार चाहिए। इसके बाद उन्होंने लिलिपुट को निर्देशक रमेश सिप्पी से मिलने के लिए कहा।
फिल्म की शूटिंग के दौरान दोनों कलाकारों के बीच गहरी दोस्ती हो गई। लिलिपुट के अनुसार कमल हासन अक्सर उनके साथ घंटों बैठकर बातें करते थे। वह उनके जीवन के अनुभवों कॉमा सोच और मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते थे। इतना ही नहीं वे उनकी कई तस्वीरें भी लिया करते थे।
इसी दौरान लिलिपुट ने अपनी निजी जिंदगी के कई किस्से कमल हासन के साथ साझा किए थे जिनमें उनकी लव स्टोरी और दिल टूटने की कहानी भी शामिल थी। लिलिपुट का दावा है कि कमल हासन ने उन्हीं भावनात्मक अनुभवों को बाद में अपनी कल्ट फिल्म अप्पू राजा के इमोशनल हिस्से में शामिल कर लिया। उनके अनुसार फिल्म में दिखाया गया हार्टब्रेक वाला ट्रैक असल में उनकी ही जिंदगी की कहानी से प्रेरित था।
हालांकि जब उनसे पूछा गया कि क्या कमल हासन ने कभी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार किया या उन्हें इसका श्रेय दिया तो लिलिपुट ने साफ तौर पर कहा कि ऐसा कभी नहीं हुआ। फिर भी उन्होंने माना कि जिस खूबसूरती से उनकी भावनाओं को पर्दे पर उतारा गया वह काबिले तारीफ था।
इंटरव्यू में लिलिपुट ने अपने करियर से जुड़ा एक दिलचस्प और भावुक किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा था जब वह खुद को अमिताभ बच्चन के लिए अनलकी मानते थे। दरअसल कई बार ऐसा हुआ कि उनके साथ अमिताभ बच्चन की फिल्में शुरू होने से पहले ही बंद हो गईं। इसी वजह से उनके मन में यह अंधविश्वास बैठ गया था।
जब उन्हें साल 2005 में फिल्म बंटी और बबली में काम करने का मौका मिला तो उन्होंने मजाक में निर्देशक शाद अली से कहा था कि कहीं उनके कारण फिल्म को भी कोई परेशानी न हो जाए। लेकिन शाद अली ने उनकी बात को हंसी में उड़ा दिया और कहा कि वह ऐसी बातों पर विश्वास नहीं करते।
आखिरकार फिल्म रिलीज हुई और सुपरहिट साबित हुई। इसके साथ ही लिलिपुट का अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का सपना भी पूरा हो गया और उनका पुराना डर भी खत्म हो गया

अर्जुन तेंदुलकर और सानिया चंडोक के प्री-वेडिंग फंक्शन का आयोजन 27 फरवरी को गुजरात के जामनगर में अंबानी परिवार के घर हुआ था। अर्जुन और सानिया ने अगस्त 2025 में सगाई की थी। सानिया चंडोक ग्रैविस ग्रुप के चेयरमैन रवि घई की पोती हैं और मुंबई में मिस्टर पॉज पैट स्पा एंड स्टोर एलएलपी (Mr. Paws Pet Spa & Store LLP) की डायरेक्टर और पार्टनर हैं। यह संस्था 2022 में शुरू की गई थी और यह पालतू जानवरों की ग्रूमिंग, स्किनकेयर और उससे संबंधित सेवाएं प्रदान करती है।
शादी समारोह में शामिल हुए मेहमानों और क्रिकेट दिग्गजों ने अर्जुन और सानिया को बधाई दी। समारोह की भव्यता और फंक्शन के दौरान किए गए स्वागत और आयोजन ने इसे और भी यादगार बना दिया।
अर्जुन तेंदुलकर, जो अपने पिता सचिन तेंदुलकर की तरह ही क्रिकेट से जुड़े हैं, और सानिया चंडोक की शादी ने मुंबई में और देशभर में फैंस और मीडिया का ध्यान खींचा। इस शादी के आयोजन से दोनों परिवारों के बीच रिश्तों की मजबूती और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी पता चलता है।
इस भव्य शादी समारोह ने क्रिकेट और बॉलीवुड प्रेमियों में खुशी और उत्साह का माहौल पैदा कर दिया। अर्जुन और सानिया की जोड़ी को शुभकामनाएं देते हुए सभी मेहमान और परिवारजन समारोह के हर पल का आनंद लेते नजर आए।

त्रिलोक कपूर केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि वह अपने दौर के एक ऐसे ‘पावरहाउस’ थे, जिनका रिकॉर्ड आज तक अटूट है। दीवान बशेश्वरनाथ के बेटे त्रिलोक ने जब अभिनय की दुनिया में कदम रखा, तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि वह सफलता का एक ऐसा शिखर छुएंगे, जहाँ पहुँचने के लिए उनके भतीजे राज कपूर और पोते रणबीर कपूर को भी कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। त्रिलोक कपूर ने अपने करियर में 30 सुपरहिट फिल्में दीं। यह एक ऐसा आंकड़ा है, जिसे कपूर परिवार का कोई भी दूसरा सदस्य आज तक पार नहीं कर पाया है।
त्रिलोक कपूर का फिल्मी सफर 1928 में शुरू हुआ, जब वे पढ़ाई पूरी कर कोलकाता पहुंचे। वह दौर स्वतंत्रता आंदोलन का था और त्रिलोक भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने 1933 में फिल्म ‘चार दरवेश’ से डेब्यू किया। इसके बाद आई फिल्म ‘सीता’, जिसमें उनके बड़े भाई पृथ्वीराज कपूर ‘राम’ बने थे और त्रिलोक ने भी अहम भूमिका निभाई थी। 1930 और 1940 के दशक में उन्होंने इंडस्ट्री पर राज करना शुरू किया, लेकिन उनकी लोकप्रियता का असली सैलाब 1950 के दशक में आया।
उस दौर में त्रिलोक कपूर ‘पौराणिक फिल्मों’ Mythological Films के बेताज बादशाह बन गए थे। उन्होंने पर्दे पर भगवान के इतने जीवंत किरदार निभाए कि लोग उन्हें असलियत में पूजने लगे थे। खास तौर पर ‘शिव’ के रूप में उनकी छवि घर-घर में लोकप्रिय हो गई थी। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि अगर उस समय सोशल मीडिया होता, तो शायद उनके फॉलोअर्स की संख्या आज के दिग्गजों को मात दे देती।
जैसे-जैसे वक्त बदला, त्रिलोक कपूर ने खुद को बदला और करैक्टर आर्टिस्ट के रूप में अपनी दूसरी पारी शुरू की। 1970 और 80 के दशक में उन्होंने कई बड़ी फिल्मों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने फिल्म ‘गंगा जमुना सरस्वती’ में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पिता का किरदार निभाया था। इसके अलावा उन्होंने ‘दोस्ताना’, ‘राम तेरी गंगा मैली’ और ‘अल्लाह रखा’ जैसी फिल्मों में भी काम किया।
त्रिलोक कपूर भले ही आज की पीढ़ी के लिए एक अनसुना नाम हों, लेकिन भारतीय सिनेमा के पन्नों में उनकी कामयाबी स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। उनके बेटे विजय कपूर ने भी निर्देशन के क्षेत्र में हाथ आजमाया, लेकिन जो जादू त्रिलोक कपूर ने पर्दे पर पैदा किया, वह बेमिसाल था। 1988 में इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन अपनी 30 हिट फिल्मों की विरासत को वह पीछे छोड़ गए, जो आज भी कपूर खानदान के गौरवशाली इतिहास का सबसे मजबूत स्तंभ है।

वहीं फिल्म भाग मिल्खा भाग में सोनम कपूर ने अपनी परफॉर्मेंस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इंडस्ट्री की टैलेंटेड अभिनेत्रियों में शुमार सोनम ने इस फिल्म के लिए भी फीस नहीं ली सिर्फ नाम के लिए 11 रुपये स्वीकार किए। फिल्म में उनके काम को क्रिटिक्स और दर्शकों ने दोनों ने सराहा। इस फिल्म में फरहान अख्तर ने भी लीड रोल निभाया और उन्होंने भी बिना किसी फीस के काम किया। फरहान की मेहनत और फिल्म की तकनीकी दक्षता ने इसे बॉक्स ऑफिस पर हिट बनाना सुनिश्चित किया।
बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बात करें तो संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक में उनके अभिनय को हर किसी ने सराहा। यह फिल्म आज भी आइकॉनिक मानी जाती है और कम लोग जानते हैं कि अमिताभ ने इसके लिए एक भी रुपया फीस नहीं लिया था। उनके समर्पण और किरदार के प्रति ईमानदारी ने फिल्म की सफलता में अहम भूमिका निभाई। सुपरस्टार शाहरुख खान के साथ फिल्म ओम शांति ओम में दीपिका पादुकोण ने लीड रोल प्ले किया। उनकी परफॉर्मेंस को दर्शकों ने बहुत सराहा लेकिन दीपिका ने इस फिल्म के लिए कोई फीस नहीं ली। उनकी मेहनत और स्क्रीन पर दमदार उपस्थिति ने फिल्म को और भी यादगार बना दिया।
इसी तरह फिल्म ट्रैप्ड में राजकुमार राव ने एक लड़के का किरदार निभाया जो ऊंची और वीरान इमारत में फंस जाता है। राजकुमार ने इस चुनौतीपूर्ण रोल के लिए कोई भुगतान नहीं लिया। उनकी ईमानदार अदाकारी ने फिल्म के थ्रिल और सस्पेंस को और मजबूती दी। इन कहानियों से यह साबित होता है कि कभी-कभी सितारों का जुनून समर्पण और किरदार के प्रति ईमानदारी पैसे से भी बड़ी होती है। इन फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में अपने लिए खास जगह बनाई और यह साबित किया कि अच्छी कहानी बेहतरीन परफॉर्मेंस और एक्टर्स का समर्पण ही असली सफलता की कुंजी है।

फिल्म फरार’ के सेट का एक मजेदार किस्सा साझा करते हुए मास्टर राजू ने बताया कि अमिताभ बच्चन हमेशा से ही समय के बहुत पाबंद रहे हैं। वह सेट पर वक्त से पहले पहुँच जाते थे लेकिन चूंकि मास्टर राजू उस दौर में हर तीसरी फिल्म का हिस्सा होते थे इसलिए उनके पास समय की भारी कमी रहती थी। राजू ने बताया “मुझे यह कहते हुए हंसी आती है लेकिन उस वक्त अमित जी के पास मुझसे कम काम था। शूटिंग के दौरान मेकर्स मेरे शॉट्स को प्राथमिकता देते थे क्योंकि मुझे अगले शूट के लिए तीन घंटे में निकलना होता था। ऐसे में अमित जी के क्लोज-अप्स पहले ले लिए जाते थे और फिर उन्हें एक तरफ बैठकर तब तक इंतजार करना पड़ता था जब तक मेरे सीन्स पूरे न हो जाएं।”
इतना ही नहीं मास्टर राजू ने अपनी मां और बिग बी से जुड़ा एक और दिलचस्प वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि फरार’ के सेट पर लंच के दौरान उनकी मां ने अमिताभ बच्चन को डांट लगा दी थी। दरअसल एक सीन के लिए अमित जी के हाथ पर नकली घाव बनाया गया था जिस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। राजू की मां ने सफाई को लेकर सख्त होते हुए बिग बी से कह दिया था कि वह इसे कवर करें क्योंकि पास में ही सब खाना खा रहे थे।
मास्टर राजू ने उस दौर के अन्य सुपरस्टार्स पर भी चुटकी लेते हुए कहा कि उस समय सेट पर देरी से आना एक फैशन’ बन गया था। राजेश खन्ना विनोद खन्ना संजीव कुमार और धर्मेंद्र जैसे बड़े सितारे अक्सर देरी से पहुँचते थे लेकिन पूरी फिल्म इंडस्ट्री में केवल अमिताभ बच्चन ही इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो हमेशा अनुशासन में रहते थे। मास्टर राजू का यह बयान उस दौर की याद दिलाता है जब एक बाल कलाकार की व्यस्तता ने बॉलीवुड के सबसे बड़े सितारे को भी कतार में खड़ा कर दिया था।

साल 2013 के एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने अपनी उस पीड़ा को साझा करते हुए बताया था कि वह दौर उनके लिए बेहद अपमानजनक था। उनके दरवाजे पर हर दिन लेनदार पैसे मांगने आते थे। जो लोग कभी उनके साथ काम करने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते थे, मुसीबत के वक्त उन्होंने ही बिग बी के प्रति अनादर दिखाना शुरू कर दिया था। उस दौरान उन पर 55 लीगल केस दर्ज थे और उन्होंने स्वीकार किया कि कई लोगों ने उन्हें गुमराह करके गलत दस्तावेजों पर साइन भी करवा लिए थे, जिसका खामियाजा उन्हें अकेले भुगतना पड़ा।
इस टूटते हुए हौसले के बीच बिग बी को अपने पिता, महान कवि हरिवंश राय बच्चन की दो बातों ने संभाले रखा। पहली सीख थी मन का हो तो अच्छा, मन का न हो तो और भी अच्छा। इसका अर्थ था कि अगर चीजें आपकी योजना के अनुसार नहीं हो रही हैं, तो ईश्वर ने आपके लिए कुछ और भी बेहतर सोच रखा है। दूसरी अहम बात जो उनके पिता ने कही थी वह यह कि जब तक जीवन है, संघर्ष बना रहेगा। इन दो मंत्रों ने अमिताभ को हार मानने के बजाय लड़ने की शक्ति दी।
अमिताभ बच्चन की सेकेंड इनिंग की शुरुआत फिल्म मोहब्बतें और टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति से हुई, जिसने न केवल उनका कर्ज उतारा बल्कि उन्हें पहले से भी बड़ा स्टार बना दिया। आज उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि इंसान अपने पिता के आदर्शों और खुद के परिश्रम पर भरोसा रखे, तो वह राख से भी उठकर दोबारा अपना साम्राज्य खड़ा कर सकता है।

परवीन बाबी का जन्म 4 अप्रैल 1954 को गुजरात के जूनागढ़ में हुआ। एक नवाबी परिवार में जन्मी परवीन ने कम उम्र में ही पिता का साथ खो दिया लेकिन उनका पालन-पोषण अच्छे माहौल में हुआ। 18 साल की उम्र में उन्होंने मॉडलिंग शुरू की। अहमदाबाद में एक शूटिंग के दौरान फिल्ममेकर बी.आर. इशारा की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने परवीन को फिल्मों में कदम रखने का मौका दिया।
साल 1974 में परवीन नेमजबूर फिल्म से बॉलीवुड में कदम रखा और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी बेहद सफल रही। इसके बाद उन्होंनेदीवारअमर अकबर एंथनीनमक हलाल जैसी सुपरहिट और कल्ट फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई।परवीन की निजी जिंदगी भी हमेशा सुर्खियों में रही। उनका नाम अभिनेता डैनी डेन्जोंगपा कबीर बेदी और फिल्ममेकर महेश भट्ट से जुड़ा। महेश भट्ट के साथ उनका रिश्ता सबसे चर्चित रहा लेकिन समय के साथ यह रिश्ता टूट गया और परवीन की मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी।
परवीन पैरानॉइड सिज़ोफ्रेनिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रही थीं। इस बीमारी में व्यक्ति को भ्रम होने लगता है कि उसके आसपास के लोग उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। उन्होंने कई बार अपने करीबियों और फिल्मी हस्तियों पर गंभीर आरोप लगाए और धीरे-धीरे उन्होंने खुद को दुनिया से अलग कर लिया।22 जनवरी 2005 को परवीन बाबी की मौत हुई। उनके फ्लैट में 2-3 दिन तक दूध और अखबार पड़े रहने के कारण पड़ोसियों को शक हुआ। पुलिस ने जब दरवाजा खोला तो उनका शव बिस्तर पर पड़ा मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उनकी मौत मल्टीपल ऑर्गन फेलियर से हुई थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि उनके पेट में खाने का एक निवाला तक नहीं था यानी वह भूख से भी जूझ रही थीं।
उनका अंतिम संस्कार मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ क्योंकि उस समय उन्हें पहचानने वाला कोई नहीं था।परवीन बाबी की कहानी केवल एक अभिनेत्री की नहीं है बल्कि यह ग्लैमर और शोहरत के पीछे छिपे अकेलेपन और मानसिक संघर्ष की कड़वी सच्चाई की याद दिलाती है। चमकते सितारे की यह जिंदगी अंत में गुमनामी बीमारी और तन्हाई में समाप्त हुई।