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  • भोपाल से शुरू Ayurozena Ayurveda, 12 साल के फार्मास्युटिकल अनुभव के साथ आयुर्वेदिक पर्सनल केयर में नई पहल

    भोपाल से शुरू Ayurozena Ayurveda, 12 साल के फार्मास्युटिकल अनुभव के साथ आयुर्वेदिक पर्सनल केयर में नई पहल

    भोपाल: से शुरू हुआ Ayurozena Ayurveda पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक फार्मास्युटिकल गुणवत्ता और पर्सनल केयर की जरूरतों के साथ जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है। ब्रांड की शुरुआत फार्मास्युटिकल क्षेत्र में करीब 12 वर्षों का अनुभव रखने वाले विजय मिश्रा ने की है। उनका उद्देश्य ऐसे आयुर्वेद आधारित उत्पाद विकसित करना है, जिनमें पारंपरिक सामग्री के साथ गुणवत्ता और निर्माण प्रक्रिया पर भी विशेष ध्यान दिया जाए।

    Ayurozena Ayurveda की शुरुआत के पीछे विजय मिश्रा की फार्मेसी शिक्षा और पेशेवर अनुभव महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। उन्होंने भोपाल के Technocrats Institute of Technology से B.Pharm तथा RKDF College of Pharmacy से M.Pharm की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने फार्मास्युटिकल और मेडिकल क्षेत्र में लगभग 12 वर्षों तक काम किया।

    अपने पेशेवर अनुभव के दौरान मिश्रा ने formulations, active ingredients और quality processes को नजदीक से समझा। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने पर्सनल केयर उत्पादों के निर्माण में केवल बाहरी प्रस्तुति के बजाय formulation और manufacturing process को महत्वपूर्ण मानते हुए ब्रांड की दिशा तय की।

    ब्रांड को बाजार में उतारने से पहले विभिन्न स्तरों पर उत्पादों और निर्माण प्रक्रियाओं को समझने की कोशिश की गई। इसके लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद कई manufacturing units का दौरा किया गया। उत्पादन प्रक्रियाओं को देखने के साथ विभिन्न formulations को source, test और compare किया गया।

    ब्रांड के अनुसार, कई formulations को ingredients की गुणवत्ता, consistency और भारतीय त्वचा तथा जलवायु के अनुरूप उपयोगिता जैसे मानकों के आधार पर परखा गया। इस प्रक्रिया के बाद शुरुआती उत्पाद श्रृंखला में Baby Care Soap, Royal Ubtan Bar और Charcoal Detox Bar को शामिल किया गया।

    Ayurozena Ayurveda की कार्यप्रणाली में आयुर्वेदिक ingredients और आधुनिक pharmaceutical approach को साथ लेकर चलने पर जोर दिया गया है। ब्रांड की सोच के अनुसार पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक गुणवत्ता प्रक्रियाएं एक-दूसरे के विकल्प के बजाय पूरक भूमिका निभा सकती हैं।

    उत्पादों के निर्माण के लिए third-party manufacturing partner की सेवाएं ली जाती हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार निर्माण प्रक्रिया में GMP-aligned practices का पालन किया जाता है। उत्पादन से पहले प्रत्येक formulation की Founder स्तर पर व्यक्तिगत approval प्रक्रिया भी रखी गई है।

    शुरुआती चरण में तीन उत्पादों के साथ बाजार में मौजूदगी बनाने के बाद ब्रांड का लक्ष्य अपनी Ayurvedic skincare और personal care range का विस्तार करना है। इस विस्तार में ऐसे उत्पादों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है, जिनमें पारंपरिक आयुर्वेदिक सोच के साथ आधुनिक manufacturing practices और गुणवत्ता पर ध्यान रखा जाए।

    भोपाल से शुरू हुई यह पहल मध्य प्रदेश में आयुर्वेद आधारित पर्सनल केयर क्षेत्र में स्थानीय उद्यमिता और फार्मास्युटिकल अनुभव के मेल का उदाहरण प्रस्तुत करती है। ब्रांड के आगे बढ़ने के साथ उत्पादों की संख्या, श्रेणी और बाजार पहुंच में विस्तार इसकी आगामी दिशा का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

  • महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने सख्त कार्रवाई की है। राज्यभर में लाइसेंस प्राप्त 434 आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली इकाइयों का निरीक्षण किया गया। जांच के दौरान अलग-अलग स्तर पर नियमों का उल्लंघन और निर्माण प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आने के बाद 135 निर्माताओं को शोकॉज नोटिस जारी किए गए हैं।

    FDA की इस कार्रवाई का उद्देश्य आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है। जिन कंपनियों को नोटिस जारी किए गए हैं, उन्हें निरीक्षण के दौरान सामने आई कमियों पर स्पष्टीकरण देने और निर्धारित नियमों के अनुपालन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।

    जांच अभियान के दौरान ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 और शेड्यूल टी के तहत निर्धारित प्रावधानों के पालन की जांच की गई। शेड्यूल टी में आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस यानी GMP से जुड़े मानक निर्धारित हैं।

    निरीक्षण में कुछ इकाइयों में योग्य या स्वीकृत तकनीकी कर्मचारियों की कमी सामने आई। ऐसी स्थिति भी पाई गई जहां आवश्यक तकनीकी स्टाफ की पर्याप्त मौजूदगी के बिना दवा निर्माण किया जा रहा था। कई कंपनियों में गुणवत्ता नियंत्रण विभाग अपेक्षित तरीके से काम नहीं कर रहे थे।

    कुछ निर्माण इकाइयों में दवाओं के उत्पादन और परीक्षण के लिए जरूरी मशीनरी तथा उपकरणों की भी कमी पाई गई। इसके अलावा साफ-सफाई से जुड़े मानकों में खामियां, बैच उत्पादन के रिकॉर्ड का अभाव और कच्चे माल से संबंधित दस्तावेजों में अनियमितताएं सामने आईं।

    जांच के दौरान कुछ उत्पादों के लेबल पर गलत निर्माण तिथियां दर्ज होने की बात भी सामने आई। कच्चे माल और तैयार उत्पादों की जांच से जुड़े रिकॉर्ड तथा परीक्षण व्यवस्था में भी कमियां पाई गईं। कुछ निर्माताओं के पास कच्चे माल का उचित रिकॉर्ड नहीं था और कुछ निर्माण इकाइयों का लेआउट स्वीकृत व्यवस्था के अनुरूप नहीं पाया गया।

    तकनीकी कर्मचारियों और श्रमिकों की मेडिकल जांच से जुड़े रिकॉर्ड का अभाव भी निरीक्षण में सामने आया। इसके अलावा कुछ कंपनियों में कर्मचारियों को दी गई ट्रेनिंग का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। कंट्रोल सैंपल और मास्टर फॉर्मूला रिकॉर्ड जैसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता नियंत्रण दस्तावेज भी कुछ इकाइयों में नहीं मिले।

    दवा निर्माण के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की कमियां भी सामने आईं। क्रॉस-कंटामिनेशन की स्थिति में एक उत्पाद या कच्चे पदार्थ का दूसरे उत्पाद में अनजाने में मिलना दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

    सबसे गंभीर मामलों में FDA ने 10 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिए। इन इकाइयों में ऐसी कमियां पाई गईं जिन्हें दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता के लिए गंभीर माना गया। कार्रवाई का उद्देश्य ऐसी निर्माण प्रक्रियाओं पर रोक लगाना है जिनसे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

    महाराष्ट्र FDA ने आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं को स्पष्ट किया है कि पारंपरिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण मान्यता प्राप्त संदर्भ ग्रंथों और निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। वहीं पेटेंट और प्रोप्राइटरी आयुर्वेदिक दवाओं के लिए निर्धारित गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यकताओं का पालन जरूरी है।

    राज्यभर में चलाया गया यह निरीक्षण अभियान आयुर्वेदिक दवा निर्माण क्षेत्र में नियामकीय अनुपालन मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। FDA ने संकेत दिया है कि शेड्यूल टी के GMP मानकों का पालन नहीं करने वाली इकाइयों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इससे निर्माताओं पर गुणवत्ता नियंत्रण, दस्तावेजीकरण, स्वच्छता और सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

  • बरसात में जामुन खाना क्यों है फायदेमंद? इम्यूनिटी बढ़ाने, वजन नियंत्रित रखने और हृदय को स्वस्थ रखने में मिल सकता है लाभ

    बरसात में जामुन खाना क्यों है फायदेमंद? इम्यूनिटी बढ़ाने, वजन नियंत्रित रखने और हृदय को स्वस्थ रखने में मिल सकता है लाभ

    नई दिल्ली । बरसात के मौसम में मिलने वाला जामुन केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि अपने पोषण गुणों के कारण भी विशेष महत्व रखता है। गहरे बैंगनी रंग का यह मौसमी फल विटामिन सी, फाइबर, आयरन, पोटैशियम और कई प्रकार के प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मौसमी फलों को संतुलित आहार में शामिल करने से शरीर को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। जामुन भी ऐसे ही फलों में शामिल है, जिसका सीमित और नियमित सेवन कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकता है।

    जामुन का उपयोग लंबे समय से पारंपरिक खानपान और आयुर्वेद में किया जाता रहा है। हालांकि इसे किसी बीमारी का उपचार नहीं माना जाता, लेकिन यह स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित भोजन का उपयोगी हिस्सा बन सकता है। विशेष रूप से ब्लड शुगर को संतुलित रखने में इसकी भूमिका को लेकर कई अध्ययन किए गए हैं। जामुन का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम माना जाता है और इसमें मौजूद फाइबर भोजन के बाद रक्त शर्करा के स्तर में अचानक वृद्धि को धीमा करने में मदद कर सकता है। फिर भी मधुमेह से पीड़ित लोगों को इसका सेवन डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए और इसे दवाओं का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

    पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में भी जामुन लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर आंतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने, कब्ज जैसी समस्याओं को कम करने और भोजन के पाचन में सहायता कर सकता है। नियमित रूप से उचित मात्रा में इसका सेवन पेट को हल्का रखने और पाचन तंत्र को सक्रिय बनाए रखने में मदद कर सकता है। स्वस्थ पाचन का सीधा संबंध शरीर के समग्र स्वास्थ्य से माना जाता है।

    जामुन में पाए जाने वाले विटामिन सी और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक हो सकते हैं। ये तत्व शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने, कोशिकाओं की सुरक्षा करने और संक्रमण से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता को बेहतर बनाने में भूमिका निभाते हैं। मौसम बदलने के दौरान संतुलित आहार के साथ जामुन का सेवन शरीर को अतिरिक्त पोषण प्रदान कर सकता है।

    हृदय स्वास्थ्य के लिए भी जामुन को लाभकारी फल माना जाता है। इसमें मौजूद पोटैशियम रक्तचाप को संतुलित रखने में मदद कर सकता है, जबकि एंटीऑक्सीडेंट्स रक्त वाहिकाओं की सुरक्षा और हृदय की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने में योगदान दे सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली के साथ ऐसे पौष्टिक फलों का सेवन हृदय संबंधी जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है।

    त्वचा की देखभाल और वजन नियंत्रण के लिहाज से भी जामुन उपयोगी माना जाता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को फ्री-रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकते हैं, जिससे त्वचा स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से दमकती हुई दिखाई दे सकती है। वहीं इसकी कम कैलोरी और अधिक फाइबर की मात्रा लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराती है, जिससे बार-बार भूख लगने की संभावना कम हो सकती है। यही कारण है कि संतुलित डाइट और सक्रिय जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के लिए जामुन एक पौष्टिक और उपयोगी मौसमी फल माना जाता है।

  • योग कार्यक्रम में चूक से विवाद , खजुराहो में VIP एंट्री पर NO ENTRY लिखने से मचा बवाल

    योग कार्यक्रम में चूक से विवाद , खजुराहो में VIP एंट्री पर NO ENTRY लिखने से मचा बवाल


    खजुराहो । खजुराहो में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के काउंटडाउन के तहत आयोजित योग महोत्सव के दौरान उस समय बड़ी लापरवाही सामने आ गई जब कार्यक्रम स्थल पर VIP एंट्री गेट पर ही नो एंट्री का बैनर लगा दिया गया। यह घटना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI विभाग की ओर से की गई व्यवस्था में गंभीर चूक मानी जा रही है, जिसे लेकर मौके पर मौजूद लोगों और प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई।

    यह पूरा मामला खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध पश्चिमी समूह मंदिर परिसर का है, जहां योग महोत्सव के लिए विशेष तैयारियां की गई थीं। इसी परिसर में VIP प्रवेश के लिए बनाए गए गेट पर अचानक NO ENTRY का बैनर नजर आया, जो कैमरों में कैद हो गया। जैसे ही यह वीडियो सामने आया, विभागीय अधिकारियों की नींद उड़ गई और तुरंत आनन फानन में बैनर को हटाने की कार्रवाई शुरू की गई। स्थिति को संभालने के लिए उस बैनर को लाल कपड़े से ढक दिया गया और उसे वहां से हटा दिया गया।

    दिलचस्प बात यह रही कि इसी VIP गेट से बाद में केंद्रीय आयुष मंत्री प्रताप जाधव योग महोत्सव में शामिल होने पहुंचे। कार्यक्रम Yoga for Healthy Aging थीम पर आधारित था और इसका उद्देश्य योग के माध्यम से स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना था। लेकिन आयोजन से पहले हुई इस गलती ने पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।

    कार्यक्रम में केंद्रीय आयुष मंत्री के अलावा प्रदेश के आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार, पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, सांसद वी.डी. शर्मा और राजनगर विधायक अरविंद पटेरिया भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव वर्चुअल माध्यम से इस आयोजन से जुड़े।

    इसी कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश सरकार ने आयुष क्षेत्र के विस्तार और विकास को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी साझा कीं। बताया गया कि राज्य में पिछले ढाई वर्षों में 9 नए आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी महाविद्यालय शुरू किए गए हैं, जो स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा कदम माना जा रहा है।

    इसके साथ ही खजुराहो में 15 करोड़ रुपये की लागत से 50 बेड का हाईटेक आयुष वेलनेस सेंटर स्थापित करने की योजना भी सामने आई है। यह सेंटर न केवल देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए उपयोगी होगा बल्कि स्थानीय लोगों को भी आधुनिक आयुष सुविधाएं प्रदान करेगा।

    पर्यटन मंत्री ने कहा कि धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर ऐसे वेलनेस सेंटर एमपीटी के सहयोग से विकसित किए जा रहे हैं। पूरे मामले में जहां एक ओर आयोजन की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे, वहीं दूसरी ओर आयुष और योग के विस्तार को लेकर सरकार ने अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।

  • दही के साथ ये चीजें खाना पड़ सकता है भारी, पेट की गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है

    दही के साथ ये चीजें खाना पड़ सकता है भारी, पेट की गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है


    नई दिल्ली। दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स पाचन तंत्र के लिए बेहद लाभकारी होते हैं। यह शरीर को ठंडक देने के साथ-साथ आंतों के स्वास्थ्य को भी सुधारता है। लेकिन इसका लाभ तभी मिलता है जब इसे सही तरीके से और सही खाद्य पदार्थों के साथ खाया जाए।

    दूध और दही साथ में खाने से बचें
    दूध और दही दोनों ही डेयरी उत्पाद हैं, लेकिन इन्हें एक साथ या एक ही समय पर खाने से पाचन पर असर पड़ सकता है। इससे गैस, एसिडिटी और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं क्योंकि दोनों अलग-अलग तरीके से पचते हैं।

    मछली और दही का कॉम्बिनेशन भी नुकसानदायक
    आयुर्वेद और एक्सपर्ट्स के अनुसार मछली और दही को साथ में नहीं खाना चाहिए। दोनों ही प्रोटीन से भरपूर होते हैं और इन्हें एक साथ लेने पर पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे अपच और त्वचा संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

    तला-भुना और ऑयली खाना बढ़ा सकता है परेशानी
    दही के साथ ज्यादा तला-भुना या ऑयली फूड लेने से पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इससे पेट में भारीपन, सुस्ती और अपच जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

    अचार और फर्मेंटेड फूड्स से दूरी रखें
    दही को अचार या अन्य फर्मेंटेड फूड्स के साथ खाना भी सही नहीं माना जाता। दोनों में बैक्टीरिया की मात्रा अधिक होती है, जिससे आंतों का संतुलन बिगड़ सकता है और पेट खराब हो सकता है।

    कुछ फलों के साथ भी न खाएं दही
    तरबूज, खरबूजा जैसे अधिक पानी वाले फलों के साथ दही का सेवन भी नुकसान पहुंचा सकता है। इससे डाइजेस्टिव सिस्टम प्रभावित होता है और गैस या फर्मेंटेशन की समस्या हो सकती है।

    एक्सपर्ट्स की सलाह
    विशेषज्ञों का कहना है कि दही को हमेशा हल्के और संतुलित भोजन जैसे रोटी, खिचड़ी या सब्जियों के साथ ही खाना चाहिए। सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाकर ही दही के पूरे स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं और पाचन संबंधी समस्याओं से बचा जा सकता है।

  • पाचन से लेकर इम्यूनिटी तक, पपीता है हर समस्या का प्राकृतिक समाधान

    पाचन से लेकर इम्यूनिटी तक, पपीता है हर समस्या का प्राकृतिक समाधान


    नई दिल्ली। पपीता एक ऐसा फल है जिसे सेहत के लिए प्राकृतिक औषधि माना जाता है। स्वाद में मीठा और रसीला यह फल न सिर्फ खाने में आसान है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक तत्व शरीर को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं। आयुष मंत्रालय के अनुसार पपीता विटामिन ए, सी, ई, फोलेट, पोटैशियम और फाइबर का बेहतरीन स्रोत है, जो शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करता है।
    पपीते में मौजूद पेपेन एंजाइम पाचन तंत्र के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। यह भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है और कब्ज, गैस व अपच जैसी समस्याओं को कम करता है। नियमित सेवन से पेट स्वस्थ रहता है और पाचन क्रिया मजबूत होती है।
    इसमें मौजूद विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इससे सर्दी-जुकाम, वायरल संक्रमण और अन्य मौसमी बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। यही कारण है कि बदलते मौसम में पपीता को बेहद फायदेमंद माना जाता है।
    पपीता त्वचा के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। इसके एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को चमकदार बनाने, दाग-धब्बों को कम करने और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करते हैं। नियमित सेवन से त्वचा स्वस्थ और साफ बनी रहती है।
    हड्डियों की मजबूती के लिए भी पपीता बहुत उपयोगी है। इसमें मौजूद विटामिन K और कैल्शियम हड्डियों की घनत्व (bone density) को बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे हड्डियां मजबूत बनती हैं और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है। विशेष रूप से बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यह फल बेहद लाभकारी माना जाता है।
    इसके अलावा पपीता बालों के लिए भी फायदेमंद है। इसमें मौजूद विटामिन A और E बालों की जड़ों को पोषण देते हैं, जिससे बाल मजबूत और चमकदार बनते हैं। यह बालों के झड़ने को कम करने और डैंड्रफ जैसी समस्याओं को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।
    विशेषज्ञों के अनुसार पपीता केवल पका हुआ ही नहीं, बल्कि कच्चा भी सब्जी के रूप में खाया जा सकता है। दोनों ही रूपों में यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। हालांकि किसी गंभीर बीमारी या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में इसके सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
  • गर्मियों में मेथी दाना खाना सही या गलत? जानें आयुर्वेद क्या कहता है

    गर्मियों में मेथी दाना खाना सही या गलत? जानें आयुर्वेद क्या कहता है

    नई दिल्ली। भारतीय रसोई में मौजूद मसाले सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। इन्हीं में से एक है मेथी दाना, जिसका इस्तेमाल सदियों से स्वास्थ्य लाभ के लिए किया जाता रहा है। हालांकि, गर्मियों के मौसम में इसके सेवन को लेकर लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं क्या इसकी तासीर शरीर पर नकारात्मक असर डाल सकती है?

    आयुर्वेद के अनुसार मेथी दाना की तासीर गर्म (उष्ण) होती है। यह शरीर में वात और कफ दोष को संतुलित करने में मदद करता है। लेकिन गर्मियों में जब शरीर में पित्त पहले से ही बढ़ा होता है, तब इसका अधिक सेवन कुछ लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मौसम में ज्यादा मात्रा में मेथी लेने से पेट में जलन, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

    इतना ही नहीं, जिन लोगों को मधुमेह (डायबिटीज) है, उनके लिए भी मेथी दाने का सेवन सोच-समझकर करना जरूरी है, क्योंकि यह ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए गर्मियों में इसका सेवन करने के तरीके और मात्रा दोनों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार, मेथी दाने को रातभर पानी में भिगोकर सुबह उस पानी को छानकर पीना ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद होता है। ध्यान रहे कि गर्मियों में इसे उबालकर या गर्म करके सेवन करने से बचें, क्योंकि इससे शरीर में अतिरिक्त गर्मी बढ़ सकती है।

    इसके अलावा, मेथी दाने की मात्रा सीमित रखना बेहद जरूरी है। गर्म मौसम में शरीर पहले से ही संवेदनशील होता है, इसलिए कम मात्रा में सेवन करने से ही लाभ मिलता है। आप चाहें तो मेथी दाने के पाउडर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे दही या छाछ में मिलाकर लेने से इसकी गर्म तासीर कम हो जाती है और पाचन तंत्र भी बेहतर रहता है।

    छाछ के साथ मेथी का सेवन करने से पेट की गर्मी कम होती है, साथ ही यह सूजन और जोड़ों के दर्द में भी राहत पहुंचाता है। इस तरह मेथी दाना एक प्राकृतिक जड़ी-बूटी की तरह काम करता है, लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि गर्मियों में मेथी दाना खाली पेट लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे गैस और असहजता हो सकती है। इसे भोजन के बाद लेना अधिक बेहतर माना जाता है।

    हालांकि, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, लो बीपी या मधुमेह के मरीजों को मेथी दाने का सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

    कुल मिलाकर, मेथी दाना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन गर्मियों में इसे सही मात्रा और सही तरीके से लेने पर ही इसका पूरा लाभ मिल सकता है।


  • कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका

    कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका


    नई दिल्ली । पपीता एक ऐसा फल है जिसे सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है लेकिन जहां पका हुआ पपीता आमतौर पर ज्यादा खाया जाता है वहीं कच्चा पपीता अपने गुणों के कारण उससे भी अधिक प्रभावी माना जाता है। पोषक तत्वों से भरपूर कच्चा पपीता शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है और आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इसके सेवन के दौरान कुछ जरूरी सावधानियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।

    कच्चे पपीते में फाइबर विटामिन सी और कैरोटीनॉयड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। इसमें मौजूद पापेन नामक एंजाइम खासतौर पर पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद होता है। यह एंजाइम खाने को खासकर प्रोटीन को तेजी से तोड़ने में मदद करता है जिससे भोजन आसानी से पच जाता है। यही कारण है कि जिन लोगों को गैस अपच या पेट भारी रहने की समस्या होती है उनके लिए कच्चा पपीता एक कारगर उपाय माना जाता है।

    अगर भोजन के बाद पेट में भारीपन महसूस होता है या भूख कम लगने लगी है तो कच्चे पपीते का सेवन लाभदायक हो सकता है। इसे सब्जी के रूप में खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती है और भूख भी बढ़ती है। यह कमजोर पाचन शक्ति को मजबूत बनाने में सहायक है जिससे शरीर को जरूरी पोषण सही तरीके से मिल पाता है।

    वजन नियंत्रित करने के लिए भी कच्चा पपीता एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसमें कैलोरी कम होती है और फाइबर की मात्रा अधिक होती है जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है। इससे ओवरइटिंग की आदत पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है और धीरे-धीरे वजन संतुलित होने लगता है।

    कच्चा पपीता शरीर की अंदरूनी सूजन को कम करने में भी प्रभावी है। यह शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में मदद करता है जिससे रक्त शुद्ध होता है और त्वचा पर भी सकारात्मक असर दिखाई देता है। नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से चेहरे पर निखार आता है और शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।

    महिलाओं के लिए भी कच्चा पपीता लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह हॉर्मोन संतुलन में मदद करता है लेकिन इसका सेवन सोच समझकर करना जरूरी है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं या जो महिलाएं गर्भधारण की योजना बना रही हैं उन्हें इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए क्योंकि गलत तरीके से सेवन करने पर यह नुकसान भी पहुंचा सकता है।

    कच्चे पपीते को सीधे खाने के बजाय उबालकर या पकाकर ही सेवन करना बेहतर माना जाता है। इसे सब्जी सूप सलाद या जूस के रूप में लिया जा सकता है लेकिन मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है। अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर पर विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है।

    इस तरह कच्चा पपीता एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है जो पाचन सुधारने से लेकर शरीर को अंदर से साफ करने तक कई फायदे देता है लेकिन इसके लाभ तभी मिलते हैं जब इसे सही तरीके और संतुलित मात्रा में सेवन किया जाए।

  • लिवर को रखना है मजबूत, तो डाइट में शामिल करें ये सुपरफूड फल और पत्ते

    लिवर को रखना है मजबूत, तो डाइट में शामिल करें ये सुपरफूड फल और पत्ते


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनियमित खानपान का सबसे ज्यादा असर हमारे लिवर पर पड़ रहा है, जो शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है। लिवर न केवल खून को साफ करता है बल्कि पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में इसकी देखभाल बेहद जरूरी हो जाती है।

    हर साल 19 अप्रैल को विश्व लिवर दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को लिवर की सेहत के प्रति जागरूक करना है। विशेषज्ञों और आयुष मंत्रालय के अनुसार, अगर सही खानपान और प्राकृतिक चीजों को डाइट में शामिल किया जाए तो लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ फल और पत्ते लिवर के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। इनमें सबसे पहले आता है आंवला, जिसे लिवर का सबसे बड़ा दोस्त माना जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो लिवर को डिटॉक्स करने में मदद करते हैं। रोजाना आंवला या इसका जूस पीना बेहद फायदेमंद होता है।

    पपीता भी लिवर के लिए काफी लाभकारी है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और लिवर में जमा विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। इसके अलावा अनार का सेवन लिवर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाता है और खून को शुद्ध रखने में सहायक होता है।

    अंगूर में पाए जाने वाले प्राकृतिक कंपाउंड लिवर की सूजन को कम करते हैं और उसे डिटॉक्स करने में मदद करते हैं। वहीं संतरा और नींबू विटामिन सी से भरपूर होते हैं। सुबह खाली पेट नींबू पानी पीने से लिवर को साफ रखने में मदद मिलती है।

    फलों के साथ-साथ कुछ पत्ते भी लिवर के लिए बेहद उपयोगी माने जाते हैं। माकोय के पत्ते आयुर्वेद में लिवर टॉनिक के रूप में जाने जाते हैं और लिवर की सूजन को कम करने में मदद करते हैं। वहीं मोरिंगा के पत्तों में पोषक तत्वों की भरमार होती है, जो लिवर को मजबूत बनाने और शरीर को डिटॉक्स करने में सहायक होते हैं।

    विशेषज्ञों की सलाह है कि इन प्राकृतिक चीजों को अपनी रोजाना की डाइट में शामिल करें। साथ ही तला-भुना और जंक फूड से दूरी बनाएं, शराब का सेवन सीमित करें, नियमित व्यायाम करें और पर्याप्त नींद लें। इन आसान आदतों को अपनाकर लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ और मजबूत रखा जा सकता है।

  • मानसिक शांति और शरीर की आंतरिक ठंडक बनाए रखने में चंदन सहायक माना जाता है

    मानसिक शांति और शरीर की आंतरिक ठंडक बनाए रखने में चंदन सहायक माना जाता है


    नई दिल्ली। भीषण गर्मी के मौसम में जब तापमान लगातार बढ़ रहा है, ऐसे समय में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में कई प्राकृतिक उपायों को शरीर के लिए बेहद लाभकारी माना गया है। इन्हीं में से एक प्रमुख और प्राचीन औषधि है चंदन, जिसे अपनी शीतल प्रकृति और औषधीय गुणों के कारण विशेष स्थान प्राप्त है।

    चंदन एक सुगंधित लकड़ी है, जिसका वानस्पतिक नाम सैंटलम एल्बम लिन बताया जाता है। इसका सबसे उपयोगी भाग इसका हार्टवुड होता है, जिसे औषधीय प्रयोगों में अधिक प्रभावी माना जाता है। पारंपरिक आयुर्वेद में चंदन को शरीर को ठंडक प्रदान करने, मानसिक शांति देने और कई शारीरिक विकारों को संतुलित करने वाली प्राकृतिक औषधि के रूप में जाना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार चंदन शरीर की आंतरिक गर्मी को कम करने में सहायक होता है, जिससे गर्मी के मौसम में होने वाली जलन, थकान और कमजोरी जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है। इसकी शीतल प्रकृति शरीर और मन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, जिससे व्यक्ति को ठंडक और सुकून का अनुभव होता है।

    आयुर्वेदिक दृष्टि से चंदन को रक्त से जुड़ी समस्याओं में भी उपयोगी माना गया है। माना जाता है कि यह शरीर में रक्त को शुद्ध करने और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा यह ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है, जिससे डायबिटीज से पीड़ित लोगों को राहत मिल सकती है।

    चंदन का उपयोग मूत्र संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी बताया गया है। विशेष रूप से पेशाब में जलन और बार-बार पेशाब आने जैसी स्थितियों में यह राहत प्रदान कर सकता है। इसकी शीतलता शरीर के अंदरूनी ताप को नियंत्रित करती है, जिससे मूत्र मार्ग से जुड़ी समस्याओं में सुधार देखने को मिलता है।

    त्वचा संबंधी परेशानियों में भी चंदन का प्रयोग पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। इसके लेप से त्वचा पर होने वाले मुंहासे, जलन और सूजन जैसी समस्याओं में आराम मिलने की बात कही जाती है। यह त्वचा को ठंडक प्रदान कर उसे शांत करने में सहायक होता है।

    इसके अतिरिक्त चंदन मानसिक तनाव को कम करने और हृदय को शांति प्रदान करने में भी उपयोगी माना जाता है। इसकी सुगंध और ठंडक देने वाले गुण शरीर को आंतरिक रूप से संतुलित रखते हैं, जिससे मानसिक स्थिरता बनी रहती है।