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  • नवरात्र विशेष: यह वन तुलसी चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं मां दुर्गा, औषधीय गुणों का खजाना

    नवरात्र विशेष: यह वन तुलसी चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं मां दुर्गा, औषधीय गुणों का खजाना


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर मां भगवती की आराधना में जहां विभिन्न फूल और पत्तियां अर्पित की जाती हैं वहीं एक खास पौधा ऐसा भी है जो देवी को अत्यंत प्रिय माना जाता है। आमतौर पर पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित माना जाता है लेकिन एक विशेष प्रकार की तुलसी जिसे दौना दवना मरुआ या वन तुलसी कहा जाता है मां दुर्गा को बेहद प्रिय है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान इस वन तुलसी की पत्तियां और फूल अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं और घर में सुख समृद्धि व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह पौधा आकार में छोटा लगभग 1 से 2 फुट ऊंचा होता है लेकिन इसकी सुगंध अत्यंत तेज और मनमोहक होती है। इसके पत्ते गुलदाउदी की तरह कटावदार होते हैं और इसकी खुशबू इतनी प्रभावशाली मानी जाती है कि महंगे परफ्यूम भी इसके सामने फीके पड़ जाते हैं।

    धार्मिक परंपराओं में दौना को भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का भी प्रिय माना गया है लेकिन विशेष रूप से नवरात्रि में मां दुर्गा को इसे अर्पित करने की परंपरा है। वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में इस पौधे को लगाने से वातावरण शुद्ध रहता है और लक्ष्मी कृपा बनी रहती है। यह न केवल पूजा को पूर्णता प्रदान करता है बल्कि घर को सुगंधित और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।

    अगर आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो वन तुलसी औषधीय गुणों से भरपूर है। आयुर्वेद में इसे कफ वात और कृमि रोगों के उपचार में लाभकारी बताया गया है। यह सर्दी खांसी जुकाम बुखार जोड़ों के दर्द सूजन और पेट की समस्याओं में भी कारगर है। इसके पत्ते बीज जड़ और डंठल सभी औषधीय रूप से उपयोगी होते हैं।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तुलसी के गुणों को स्वीकार किया गया है। अमेरिका की राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय में प्रकाशित शोधों के अनुसार तुलसी का सेवन डायबिटीज हृदय रोग तनाव और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है। खास बात यह है कि इसके सेवन से गंभीर दुष्प्रभाव नहीं पाए गए हैं।

    वन तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं और संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। यह श्वसन तंत्र को मजबूत बनाती है और अस्थमा ब्रोंकाइटिस व खांसी जैसी समस्याओं में राहत देती है। साथ ही इसकी सुगंध प्राकृतिक रूप से मच्छरों को दूर रखने और हवा को शुद्ध करने में भी सहायक होती है।

    इस तरह वन तुलसी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी एक अमूल्य औषधि है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर इसे अर्पित करना जहां मां भगवती को प्रसन्न करता है वहीं इसका उपयोग शरीर और मन दोनों को स्वस्थ और संतुलित रखने में मदद करता है

  • नवरात्र विशेष: मां भगवती को प्रिय अनार, आस्था के साथ सेहत का भी खजाना

    नवरात्र विशेष: मां भगवती को प्रिय अनार, आस्था के साथ सेहत का भी खजाना


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर जहां भक्त मां दुर्गा की आराधना में लीन हैं वहीं पूजा में चढ़ाए जाने वाले फलों का भी विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनार जिसे संस्कृत में दादिमा कहा जाता है माता भगवती को अत्यंत प्रिय फल माना गया है। लाल-लाल दानों से भरा यह फल न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है।

    धर्म शास्त्रों में अनार को विशेष स्थान दिया गया है। मान्यता है कि सभी फलों में यह देवी को सबसे अधिक प्रिय है और इसे अर्पित करने से सुख-समृद्धि संतान सुख आरोग्य और कर्ज मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्रि में अनार चढ़ाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है जिसे अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    अनार की गहरी लाल रंगत शक्ति ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती है। यह रंग मां दुर्गा के शक्तिशाली और रौद्र स्वरूप से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि भक्त नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से अनार अर्पित करते हैं ताकि उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे। धार्मिक मान्यता यह भी है कि इसे चढ़ाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

    अनार को अखंड फल भी माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे नारियल या श्रीफल का धार्मिक महत्व है। कई भक्त इसे विशेष रूप से कर्ज से मुक्ति और परिवार की खुशहाली के लिए माता को अर्पित करते हैं। पूजा-पाठ के साथ-साथ यह फल परिवार के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

    अगर आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो अनार औषधीय गुणों से भरपूर होता है। प्राचीन ग्रंथों विशेषकर 12वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ मानसोल्लास में इसे पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है। यह फल रक्त शुद्ध करने एनीमिया यानी खून की कमी दूर करने पाचन तंत्र को मजबूत बनाने और हृदय रोगों से बचाव में सहायक माना जाता है।

    अनार में भरपूर मात्रा में विटामिन C एंटीऑक्सीडेंट फाइबर और पोटैशियम पाए जाते हैं जो इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं। गर्मी के मौसम में यह शरीर को ठंडक प्रदान करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। अनार का जूस पीने से शरीर में नई ऊर्जा आती है और थकान दूर होती है।

    इस तरह अनार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। नवरात्रि के इस पावन पर्व पर इसे अर्पित करना जहां आध्यात्मिक लाभ देता है वहीं इसका सेवन शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में भी मदद करता है।

  • हिंदू नववर्ष पर नीम-मिश्री खाने की परंपरा क्यों? जानिए वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व

    हिंदू नववर्ष पर नीम-मिश्री खाने की परंपरा क्यों? जानिए वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व


    नई दिल्ली। भारतीय परंपरा में गुड़ी पड़वा और उगादी के साथ हिंदू नववर्ष की शुरुआत बेहद खास मानी जाती है। इस बार 19 मार्च से नवसंवत्सर की शुरुआत हो रही है। इस दिन सुबह पूजा के बाद नीम की पत्तियां और मिश्री या गुड़ खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है जिसका गहरा धार्मिक दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व है।

    नीम और मिश्री जीवन का संतुलन

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नववर्ष के पहले दिन नीम और मिश्री का सेवन जीवन के कड़वे और मीठे अनुभवों का प्रतीक है। नीम का कड़वा स्वाद जीवन की चुनौतियों संघर्ष और कठिनाइयों को दर्शाता है वहीं मिश्री की मिठास सुख सफलता और खुशियों का संकेत देती है। यह परंपरा सिखाती है कि जीवन में सुख दुख दोनों का संतुलन जरूरी है और हर परिस्थिति को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

    पौराणिक महत्व

    शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सृष्टि की रचना की थी। इसी कारण इस दिन को नववर्ष और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान की पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि की कामना की जाती है।

    आयुर्वेदिक दृष्टि से भी लाभकारी

    आयुर्वेद के अनुसार मौसम बदलने के समय यानी बसंत से गर्मी में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में नीम की पत्तियों में मौजूद एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। वहीं मिश्री शरीर को ऊर्जा देती है और नीम की कड़वाहट को संतुलित करती है।

    कैसे किया जाता है सेवन

    कई जगहों पर नीम की कोमल पत्तियों को मिश्री गुड़ इमली या कच्चे आम के साथ मिलाकर खाया जाता है। इसे नववर्ष की शुभ शुरुआत और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

    इस वर्ष कौन होगा राजा और मंत्री?

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिस दिन नववर्ष शुरू होता है उसी दिन का ग्रह उस वर्ष का राजा माना जाता है। इस बार नववर्ष गुरुवार को पड़ रहा है इसलिए गुरु ग्रह वर्ष के राजा होंगे जबकि मंगल ग्रह को मंत्री माना गया है।इसके अलावा इस वर्ष चंद्र देव सेनापति मेघाधिपति और फलधिपति रहेंगे। गुरु ग्रह नीरसाधिपति धनाधिपति और सस्याधिपति भी होंगे जबकि बुध धान्याधिपति और शनि रसाधिपति माने गए हैं। कुल मिलाकर हिंदू नववर्ष पर नीम मिश्री खाने की परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि जीवन दर्शन और स्वास्थ्य से जुड़ा एक गहरा संदेश भी देती है।

  • रोज सुबह पीएं मेथी का पानी: कोलेस्ट्रॉल घटाए, वजन नियंत्रित करे और मेटाबॉलिज्म बढ़ाए

    रोज सुबह पीएं मेथी का पानी: कोलेस्ट्रॉल घटाए, वजन नियंत्रित करे और मेटाबॉलिज्म बढ़ाए


    नई दिल्ली । आयुर्वेद में मेथी को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और गलत खान-पान के कारण कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है। जब खून में कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल से ज्यादा हो जाता है तो यह नसों में जमा होकर ब्लॉकेज और दिल पर अतिरिक्त दबाव का कारण बनता है।

    यूपी के अलीगढ़ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पीयूष माहेश्वरी के अनुसार मेथी के दानों में फाइबर और स्टेरोइडल सैपोनिन्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। सुबह खाली पेट मेथी का पानी पीने से खून में मौजूद बैड कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे कम होता है। यह नसों की दीवारों पर जमा फैट को पिघलाकर शरीर से बाहर निकालता है जिससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है और दिल पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।

    इसका सेवन आसान है। रात को एक गिलास पानी में एक चम्मच मेथी दाना भिगो दें। सुबह दाने चबाकर खाएं और पानी पी लें। इस सरल उपाय से नसों में जमा कोलेस्ट्रॉल कम होने लगता है और दिल की सेहत बेहतर रहती है।

    डॉ. माहेश्वरी बताते हैं कि डायबिटीज के मरीजों के लिए मेथी का पानी वरदान है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर ब्लड में शुगर के अवशोषण की गति धीमी करता है और इंसुलिन के उत्पादन में मदद करता है। नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल नियंत्रित रहता है और मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है।

    पाचन के लिए भी मेथी का पानी लाभकारी है। यह गैस एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देता है आंतों को साफ़ करता है और शरीर से टॉक्सिन्स निकालता है। मेटाबॉलिज्म को तेज करके यह अतिरिक्त चर्बी को बर्न करने में मदद करता है। पेट लंबे समय तक भरा महसूस होने से ओवरईटिंग और अनावश्यक कैलोरी का सेवन भी कम होता है।

    मेथी की तासीर गर्म होती है जो वात दोष को संतुलित करती है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो जोड़ों और हड्डियों की सूजन कम करने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में इसे हार्ट डायबिटीज पाचन और वजन कंट्रोल के लिए शक्तिशाली औषधि माना गया है।

    रोज सुबह खाली पेट मेथी का पानी पीने से नसों में जमा गंदे कोलेस्ट्रॉल कम होता है ब्लड फ्लो बेहतर होता है मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है वजन नियंत्रित रहता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह दिल पाचन और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए एक सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक उपाय है।

  • पालक खाने से पथरी और जोड़ों में दर्द? इन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी..

    पालक खाने से पथरी और जोड़ों में दर्द? इन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी..


    नई दिल्ली ।पालक को अक्सर सुपरफूड कहा जाता है क्योंकि यह रक्त बढ़ाने, हड्डियों को मजबूत करने और पेट की सेहत सुधारने में मदद करता है। लेकिन हर किसी के लिए यह सुरक्षित नहीं है। कुछ लोगों के लिए पालक का सेवन परेशानी का कारण बन सकता है।

    आयुर्वेद में पालक के गुण और शरीर के दोषों वात, पित्त, कफ पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखा जाता है। जहां यह रक्तवर्धक और पोषण से भरपूर है, वहीं इसके अत्यधिक सेवन से पथरी का खतरा बढ़ सकता है। खासकर उन लोगों को, जिन्हें पहले से यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन UTI या किडनी की समस्याएं हैं, पालक से बचना चाहिए। यह मूत्र मार्ग में रुकावट पैदा कर सकता है और आगे जाकर पथरी का कारण बन सकता है।

    यदि आपकी पाचन शक्ति कमजोर है, तो पालक से परहेज करना बेहतर है। पाचन अग्नि मंद होने पर पालक पेट में सही तरीके से पचता नहीं और टॉक्सिन पैदा कर सकता है। इससे पेट भारी, गैस या खराब बैक्टीरिया का विकास हो सकता है।

    इसके अलावा, शरीर में वात और कफ की अधिकता वाले लोग भी पालक का सेवन सीमित करें। पालक की भारी प्रकृति कफ को बढ़ाकर श्वसन समस्याएं और वात को बढ़ाकर जोड़ों में जकड़न या गैस की समस्या पैदा कर सकती है।

    पालक फायदेमंद होने के बावजूद कुछ परिस्थितियों में नुकसानदेह भी हो सकता है। खासकर यूटीआई, पथरी, कमजोर पाचन शक्ति और वात-कफ अधिक होने वाले लोगों को पालक का सेवन सीमित करना चाहिए। संतुलित मात्रा और सही तैयारी के साथ पालक का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, लेकिन साव

  • आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम

    आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम


    नई दिल्ली।सर्दियों में ठंड और आलस के कारण लोग अक्सर लंबे समय तक बिस्तर या कुर्सी पर रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज की जीवनशैली में मस्तिष्क का इस्तेमाल तो बढ़ गया है लेकिन शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं। यह असंतुलन धीरे-धीरे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।आयुर्वेद में भी कम शारीरिक गतिविधि को स्वास्थ्य के लिए चेतावनी माना गया है। चरक संहिता में कहा गया है व्यायामात लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखम्। यानी व्यायाम से लंबी उम्र ताकत और खुशहाली मिलती है।

    कम गतिविधि से होने वाले प्रमुख स्वास्थ्य खतरे
    मोटापा और मधुमेहलंबे समय तक बैठे रहने से वसा का जमाव बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म कमजोर होता है जिससे मोटापा और डायबिटीज़ की संभावना बढ़ जाती है।

    गठिया और जोड़ों में दर्द
    लगातार एक ही पोज़चर में रहने से हड्डियों और मांसपेशियों में जकड़न होती है जो जोड़ों के दर्द का कारण बनती है।

    हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग
    चलने और व्यायाम से रक्त संचार और ऑक्सीजन वितरण बेहतर होता है। कम गतिविधि से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है जिससे दिल से जुड़े रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।

    मानसिक स्वास्थ्य पर असर
    डिप्रेशन चिंता और पाचन विकार की समस्या बढ़ सकती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो जाती है।विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोज़ाना थोड़ी शारीरिक गतिविधि जैसे सुबह की वॉक हल्का व्यायाम या स्ट्रेचिंग को जीवनशैली में शामिल किया जाए। इससे न केवल बीमारियों का जोखिम कम होता है बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन भी बना रहता है।

  • शंख भस्म: हड्डियों और पेट की सेहत के लिए आयुर्वेद का चमत्कारी खजाना

    शंख भस्म: हड्डियों और पेट की सेहत के लिए आयुर्वेद का चमत्कारी खजाना


    नई दिल्ली। आयुर्वेद सदियों से जड़ी-बूटियों और भस्मों के माध्यम से स्वास्थ्य को सुधारने का अनमोल ज्ञान देता आया है। इस कड़ी में शंख भस्म एक ऐसा खजाना है जिसे आयुर्वेद में चमत्कारी भस्म के रूप में जाना जाता है। इसे मुख्यतः पेट और हड्डियों की बीमारियों में लाभकारी माना गया है।शंख भस्म मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट से बनती है। इसका उपयोग एसिड रिफ्लक्स, पेट की जलन और पाचन से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञ बताते हैं कि शंख भस्म पेट की पाचन अग्नि को रीसेट करती है, जिससे भोजन बेहतर ढंग से पचता है और गैस, पेट दर्द, उल्टी जैसी परेशानियों में राहत मिलती है।

    हड्डियों और जोड़ों के लिए वरदान:
    शंख भस्म कैल्शियम से भरपूर होने के कारण हड्डियों को मजबूत बनाने ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने और दांतों की मजबूती बनाए रखने में सहायक होती है। शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर भी शंख भस्म लाभकारी है। खास बात यह है कि यह वात और कफ दोषों को संतुलित करने में भी मदद करती है, जिससे शरीर में असंतुलन की वजह से होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है।

    त्वचा और सौंदर्य में भी उपयोगी:
    शंख भस्म का लेपन या सेवन चेहरे पर मुहांसों, दाग-धब्बों और त्वचा की समस्याओं में भी लाभकारी माना गया है। आयुर्वेद में इसे न केवल आंतरिक स्वास्थ्य बल्कि बाहरी सुंदरता और त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

    सुरक्षित उपयोग:
    ध्यान रखें कि शंख भस्म को सीधा नहीं खाना चाहिए। इसे किसी आयुर्वेदिक मिश्रण या चिकित्सा के अनुसार लिया जाता है। सेवन की मात्रा और तरीका रोग और शरीर की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। गर्भवती महिलाएं और बच्चों के लिए चिकित्सक की सलाह आवश्यक है। संक्षेप में शंख भस्म आयुर्वेद का एक ऐसा खनिज है, जो पाचन, हड्डियों, जोड़ों और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है। इसके नियमित और सही उपयोग से शरीर में ऊर्जा, संतुलन और मजबूती आती है।

  • मौन व्रत: मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए वरदान..

    मौन व्रत: मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए वरदान..


    नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और शोर-शराबे से भरी दुनिया में शांति एक दुर्लभ लेकिन बेहद जरूरी चीज बन गई है। लगातार अशांति और शोर-शराबा न केवल शरीर को बीमारियों की ओर ले जाता हैबल्कि तनावचिड़चिड़ापन और मानसिक थकान भी बढ़ाता है। ऐसे में मौन का अभ्यास सेल्फ-अवेयरनेसमानसिक स्पष्टता और आंतरिक शांति का बेहतरीन साधन बन जाता है।

    सनातन धर्म में मौन व्रत को सर्वोत्तम तप माना गया है। हर साल मौनी अमावस्या को यह व्रत रखा जाता है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता हैबल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। मौन का अभ्यास केवल बाहर की शांति नहीं हैबल्कि यह एक सक्रिय प्रक्रिया हैजो हमें आंतरिक दुनिया की ओर ले जाती है और मन को शांत करती है।

    आयुर्वेद के अनुसारअधिक बोलना वात दोष को बढ़ाता हैजिससे मन अशांत होता हैनींद प्रभावित होती है और ऊर्जा का क्षय होता है। मौन रहने से मन शांत रहता हैसत्व गुण बढ़ते हैंऊर्जा बचती है और एकाग्रताध्यान और मानसिक क्षमता मजबूत होती है। यह तनावक्रोध और हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।भगवद्गीता में मौन को गुह्य ज्ञान कहा गया है। इसमें मौन व्रत को मानसिक तप का रूप माना गया हैजो शरीर और मन के संतुलन के लिए फायदेमंद है। मौन व्रत से वाणी और संयम के जरिए ओजस की रक्षा होती है और सेहत मजबूत बनती है।

    कई रिसर्च में यह सिद्ध हुआ है कि शोर प्रदूषण मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता हैजबकि मौन का दिमाग पर हीलिंग प्रभाव पड़ता है। अध्ययन बताते हैं कि रोजाना दो घंटे का मौन ब्रेन सेल्स के विकास को बढ़ाता हैजिससे याददाश्तभावनाएं और सीखने की क्षमता सुधरती है। मौन तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को कम करता हैब्लड प्रेशर और हृदय गति को नियंत्रित करता हैनींद सुधारता है और एकाग्रताक्रिएटिविटी और भावनात्मक संतुलन बढ़ाता है।संक्षेप मेंमौन व्रत केवल आध्यात्मिक साधना नहीं हैबल्कि यह शारीरिकमानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का वरदान भी है। जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए मौन व्रत को अपनी दिनचर्या में अपनाना एक अत्यंत उपयोगी साधन हो सकता है।

  • सेब पर छिड़क लें बस एक चुटकी सेंधा नमक, स्वाद के साथ सेहत के फायदे हो जाएंगे दोगुने, जानिए दादी-नानी का आजमाया नुस्खा

    सेब पर छिड़क लें बस एक चुटकी सेंधा नमक, स्वाद के साथ सेहत के फायदे हो जाएंगे दोगुने, जानिए दादी-नानी का आजमाया नुस्खा


    नई दिल्ली । एक सेब रोज खाओ और डॉक्टर को दूर भगाओ यह कहावत लगभग हर किसी ने सुनी है। सेब को सेहत का खजाना माना जाता है, लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर सेब को सही तरीके से खाया जाए, तो इसके फायदे और भी बढ़ सकते हैं। दादी-नानी के जमाने से चला आ रहा एक सरल घरेलू नुस्खा आज फिर चर्चा में है सेब के स्लाइस पर एक चुटकी सेंधा नमक छिड़क कर खाना। यह न केवल स्वाद को बढ़ाता है, बल्कि शरीर पर इसके पोषक तत्वों का असर भी दोगुना कर देता है। न्यूट्रिशन विशेषज्ञों के अनुसार, सेब और सेंधा नमक का संयोजन शरीर के लिए पावरहाउस से कम नहीं है। सेब में मौजूद प्राकृतिक शुगर शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करती है। जब इसे नमक के साथ खाया जाता है, तो शरीर इसे तेजी से अवशोषित करता है। यही वजह है कि यह नुस्खा दोपहर की थकान, कमजोरी या वर्कआउट से पहले इंस्टेंट एनर्जी देने में बेहद कारगर माना जाता है।

    सेंधा नमक या हिमालयन पिंक सॉल्ट में सोडियम के साथ-साथ पोटैशियम, मैग्नीशियम और अन्य ट्रेस मिनरल्स भी होते हैं। ये तत्व शरीर में इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखने में मदद करते हैं। खासकर गर्मी के मौसम में, अधिक पसीना आने या भारी शारीरिक मेहनत के दौरान यह मिश्रण मांसपेशियों में ऐंठन और डिहाइड्रेशन से बचाव करता है पाचन से जुड़ी समस्याओं में भी यह नुस्खा बेहद लाभकारी है। सेब फाइबर से भरपूर होता है, जो पाचन तंत्र को मजबूत करता है। वहीं सेंधा नमक पाचन एंजाइम्स को सक्रिय करता है। दोनों मिलकर पेट फूलने, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत दिलाते हैं और गट हेल्थ को बेहतर बनाते हैं।

    एसिडिटी से परेशान लोगों के लिए भी सेब और सेंधा नमक का यह संयोजन फायदेमंद माना जाता है। सेंधा नमक की क्षारीय प्रकृति सेब के कुछ एसिडिक तत्वों को संतुलित कर देती है, जिससे पेट में जलन और खट्टी डकार जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं। अक्सर लोगों को यह महसूस होता है कि नमक लगाने से सेब और भी मीठा लगने लगता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। नमक जीभ पर मौजूद कड़वाहट महसूस करने वाले रिसेप्टर्स को दबा देता है, जिससे सेब की प्राकृतिक मिठास और अधिक उभर कर सामने आती है।

    सेवन के सही तरीके की बात करें, तो हमेशा साधारण रिफाइंड नमक की जगह सेंधा नमक या गुलाबी नमक का ही उपयोग करें। नमक की मात्रा सिर्फ एक चुटकी तक सीमित रखें, क्योंकि अधिक नमक से ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सेब को अच्छी तरह धोकर ताजे स्लाइस में काटें और तुरंत सेवन करें। यह आसान घरेलू नुस्खा बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए फायदेमंद है। खासतौर पर जिम जाने वालों और खिलाड़ियों के लिए यह एक बेहतरीन प्री-वर्कआउट स्नैक साबित हो सकता है। हालांकि, किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या में इसे अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

  • उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला, 12 से 16 फरवरी तक दशहरा मैदान में आयोजित

    उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला, 12 से 16 फरवरी तक दशहरा मैदान में आयोजित


    उज्जैन । महाकाल की नगरी उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला आयोजित किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशानुसार यह पांच दिवसीय मेला 12 से 16 फरवरी 2026 तक दशहरा मैदान में चलेगा। मेले का शुभारंभ 12 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कर कमलों द्वारा होने की संभावना है। वन विभाग के तत्वावधान में आयोजित इस मेले का उद्देश्य आमजन को वन, पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण, आयुर्वेद एवं पारंपरिक ज्ञान, वनोपज आधारित हर्बल उत्पादों, आयुष, स्वास्थ्य, जैव विविधता और जनजातीय संस्कृति से जोड़ना है। मेले में प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से हर्बल उत्पाद, आयुर्वेदिक औषधियां, वनोपज आधारित हस्तशिल्प कृतियां और आंचलिक व्यंजन प्रदर्शित किए जाएंगे।

    मेला केवल उत्पादों की प्रदर्शनी तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य जागरूकता को भी बढ़ावा मिलेगा। इस दौरान आमजन को विभिन्न जड़ी-बूटियों और वनोपज के बारे में जानकारी दी जाएगी और उन्हें खरीदने का अवसर भी मिलेगा। मेले में आने वाले पर्यटक और नागरिक वन और पर्यावरण से जुड़े कार्यशालाओं और लाइव डेमोंस्ट्रेशन में भाग लेकर नई जानकारियां हासिल कर सकेंगे। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मेले में देशभर से हर्बल उत्पाद और पारंपरिक ज्ञान की विविधता पेश की जाएगी। यह मेला न केवल व्यापारियों और कारीगरों के लिए अवसर प्रदान करेगा, बल्कि आमजन के लिए भी वन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ने का एक अनूठा मंच बनेगा। साथ ही, इस मेले में युवा और छात्र पर्यावरणीय शिक्षा और आयुर्वेदिक ज्ञान के महत्व को समझने का अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।

    उज्जैन की यह पहल महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर आयोजित की जा रही है, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर केंद्रित गतिविधियों का भी संयोजन होगा। अधिकारियों का कहना है कि इस मेला से जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। पांच दिवसीय मेले में आने वाले नागरिक हर्बल उत्पादों की खरीदारी के साथ-साथ आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित कार्यशालाओं में भाग लेकर अपनी स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ा सकेंगे। वन और पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह मेला एक विशेष अनुभव प्रदान करेगा, जो वन्य जीवन और जैव विविधता के महत्व को सीधे तौर पर समझने का अवसर देगा।