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  • मौन व्रत: मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए वरदान..

    मौन व्रत: मानसिक शांति और स्वास्थ्य के लिए वरदान..


    नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और शोर-शराबे से भरी दुनिया में शांति एक दुर्लभ लेकिन बेहद जरूरी चीज बन गई है। लगातार अशांति और शोर-शराबा न केवल शरीर को बीमारियों की ओर ले जाता हैबल्कि तनावचिड़चिड़ापन और मानसिक थकान भी बढ़ाता है। ऐसे में मौन का अभ्यास सेल्फ-अवेयरनेसमानसिक स्पष्टता और आंतरिक शांति का बेहतरीन साधन बन जाता है।

    सनातन धर्म में मौन व्रत को सर्वोत्तम तप माना गया है। हर साल मौनी अमावस्या को यह व्रत रखा जाता है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता हैबल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। मौन का अभ्यास केवल बाहर की शांति नहीं हैबल्कि यह एक सक्रिय प्रक्रिया हैजो हमें आंतरिक दुनिया की ओर ले जाती है और मन को शांत करती है।

    आयुर्वेद के अनुसारअधिक बोलना वात दोष को बढ़ाता हैजिससे मन अशांत होता हैनींद प्रभावित होती है और ऊर्जा का क्षय होता है। मौन रहने से मन शांत रहता हैसत्व गुण बढ़ते हैंऊर्जा बचती है और एकाग्रताध्यान और मानसिक क्षमता मजबूत होती है। यह तनावक्रोध और हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।भगवद्गीता में मौन को गुह्य ज्ञान कहा गया है। इसमें मौन व्रत को मानसिक तप का रूप माना गया हैजो शरीर और मन के संतुलन के लिए फायदेमंद है। मौन व्रत से वाणी और संयम के जरिए ओजस की रक्षा होती है और सेहत मजबूत बनती है।

    कई रिसर्च में यह सिद्ध हुआ है कि शोर प्रदूषण मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता हैजबकि मौन का दिमाग पर हीलिंग प्रभाव पड़ता है। अध्ययन बताते हैं कि रोजाना दो घंटे का मौन ब्रेन सेल्स के विकास को बढ़ाता हैजिससे याददाश्तभावनाएं और सीखने की क्षमता सुधरती है। मौन तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को कम करता हैब्लड प्रेशर और हृदय गति को नियंत्रित करता हैनींद सुधारता है और एकाग्रताक्रिएटिविटी और भावनात्मक संतुलन बढ़ाता है।संक्षेप मेंमौन व्रत केवल आध्यात्मिक साधना नहीं हैबल्कि यह शारीरिकमानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का वरदान भी है। जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए मौन व्रत को अपनी दिनचर्या में अपनाना एक अत्यंत उपयोगी साधन हो सकता है।

  • सेब पर छिड़क लें बस एक चुटकी सेंधा नमक, स्वाद के साथ सेहत के फायदे हो जाएंगे दोगुने, जानिए दादी-नानी का आजमाया नुस्खा

    सेब पर छिड़क लें बस एक चुटकी सेंधा नमक, स्वाद के साथ सेहत के फायदे हो जाएंगे दोगुने, जानिए दादी-नानी का आजमाया नुस्खा


    नई दिल्ली । एक सेब रोज खाओ और डॉक्टर को दूर भगाओ यह कहावत लगभग हर किसी ने सुनी है। सेब को सेहत का खजाना माना जाता है, लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर सेब को सही तरीके से खाया जाए, तो इसके फायदे और भी बढ़ सकते हैं। दादी-नानी के जमाने से चला आ रहा एक सरल घरेलू नुस्खा आज फिर चर्चा में है सेब के स्लाइस पर एक चुटकी सेंधा नमक छिड़क कर खाना। यह न केवल स्वाद को बढ़ाता है, बल्कि शरीर पर इसके पोषक तत्वों का असर भी दोगुना कर देता है। न्यूट्रिशन विशेषज्ञों के अनुसार, सेब और सेंधा नमक का संयोजन शरीर के लिए पावरहाउस से कम नहीं है। सेब में मौजूद प्राकृतिक शुगर शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करती है। जब इसे नमक के साथ खाया जाता है, तो शरीर इसे तेजी से अवशोषित करता है। यही वजह है कि यह नुस्खा दोपहर की थकान, कमजोरी या वर्कआउट से पहले इंस्टेंट एनर्जी देने में बेहद कारगर माना जाता है।

    सेंधा नमक या हिमालयन पिंक सॉल्ट में सोडियम के साथ-साथ पोटैशियम, मैग्नीशियम और अन्य ट्रेस मिनरल्स भी होते हैं। ये तत्व शरीर में इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखने में मदद करते हैं। खासकर गर्मी के मौसम में, अधिक पसीना आने या भारी शारीरिक मेहनत के दौरान यह मिश्रण मांसपेशियों में ऐंठन और डिहाइड्रेशन से बचाव करता है पाचन से जुड़ी समस्याओं में भी यह नुस्खा बेहद लाभकारी है। सेब फाइबर से भरपूर होता है, जो पाचन तंत्र को मजबूत करता है। वहीं सेंधा नमक पाचन एंजाइम्स को सक्रिय करता है। दोनों मिलकर पेट फूलने, गैस और अपच जैसी समस्याओं से राहत दिलाते हैं और गट हेल्थ को बेहतर बनाते हैं।

    एसिडिटी से परेशान लोगों के लिए भी सेब और सेंधा नमक का यह संयोजन फायदेमंद माना जाता है। सेंधा नमक की क्षारीय प्रकृति सेब के कुछ एसिडिक तत्वों को संतुलित कर देती है, जिससे पेट में जलन और खट्टी डकार जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं। अक्सर लोगों को यह महसूस होता है कि नमक लगाने से सेब और भी मीठा लगने लगता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। नमक जीभ पर मौजूद कड़वाहट महसूस करने वाले रिसेप्टर्स को दबा देता है, जिससे सेब की प्राकृतिक मिठास और अधिक उभर कर सामने आती है।

    सेवन के सही तरीके की बात करें, तो हमेशा साधारण रिफाइंड नमक की जगह सेंधा नमक या गुलाबी नमक का ही उपयोग करें। नमक की मात्रा सिर्फ एक चुटकी तक सीमित रखें, क्योंकि अधिक नमक से ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सेब को अच्छी तरह धोकर ताजे स्लाइस में काटें और तुरंत सेवन करें। यह आसान घरेलू नुस्खा बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए फायदेमंद है। खासतौर पर जिम जाने वालों और खिलाड़ियों के लिए यह एक बेहतरीन प्री-वर्कआउट स्नैक साबित हो सकता है। हालांकि, किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या में इसे अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

  • उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला, 12 से 16 फरवरी तक दशहरा मैदान में आयोजित

    उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला, 12 से 16 फरवरी तक दशहरा मैदान में आयोजित


    उज्जैन । महाकाल की नगरी उज्जैन में पहली बार विंध्य हर्बल वन मेला आयोजित किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशानुसार यह पांच दिवसीय मेला 12 से 16 फरवरी 2026 तक दशहरा मैदान में चलेगा। मेले का शुभारंभ 12 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कर कमलों द्वारा होने की संभावना है। वन विभाग के तत्वावधान में आयोजित इस मेले का उद्देश्य आमजन को वन, पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण, आयुर्वेद एवं पारंपरिक ज्ञान, वनोपज आधारित हर्बल उत्पादों, आयुष, स्वास्थ्य, जैव विविधता और जनजातीय संस्कृति से जोड़ना है। मेले में प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से हर्बल उत्पाद, आयुर्वेदिक औषधियां, वनोपज आधारित हस्तशिल्प कृतियां और आंचलिक व्यंजन प्रदर्शित किए जाएंगे।

    मेला केवल उत्पादों की प्रदर्शनी तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य जागरूकता को भी बढ़ावा मिलेगा। इस दौरान आमजन को विभिन्न जड़ी-बूटियों और वनोपज के बारे में जानकारी दी जाएगी और उन्हें खरीदने का अवसर भी मिलेगा। मेले में आने वाले पर्यटक और नागरिक वन और पर्यावरण से जुड़े कार्यशालाओं और लाइव डेमोंस्ट्रेशन में भाग लेकर नई जानकारियां हासिल कर सकेंगे। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मेले में देशभर से हर्बल उत्पाद और पारंपरिक ज्ञान की विविधता पेश की जाएगी। यह मेला न केवल व्यापारियों और कारीगरों के लिए अवसर प्रदान करेगा, बल्कि आमजन के लिए भी वन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ने का एक अनूठा मंच बनेगा। साथ ही, इस मेले में युवा और छात्र पर्यावरणीय शिक्षा और आयुर्वेदिक ज्ञान के महत्व को समझने का अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।

    उज्जैन की यह पहल महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर आयोजित की जा रही है, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर केंद्रित गतिविधियों का भी संयोजन होगा। अधिकारियों का कहना है कि इस मेला से जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। पांच दिवसीय मेले में आने वाले नागरिक हर्बल उत्पादों की खरीदारी के साथ-साथ आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित कार्यशालाओं में भाग लेकर अपनी स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ा सकेंगे। वन और पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह मेला एक विशेष अनुभव प्रदान करेगा, जो वन्य जीवन और जैव विविधता के महत्व को सीधे तौर पर समझने का अवसर देगा।

  • करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण

    करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण


    नई दिल्ली: करेला का नाम सुनते ही अधिकतर लोग मुंह बना लेते हैं, लेकिन यही कड़वा करेला सेहत के लिहाज से किसी वरदान से कम नहीं है। आयुर्वेद में करेला को औषधि के रूप में माना गया है और इसे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी बताया गया है। सिर्फ खाने से ही नहीं, बल्कि बाहरी रूप से लगाने पर भी करेला शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है।

    आयुर्वेद में करेले को करवेल्लक कहा जाता है। इसे ऐसा पौधा माना गया है जो दूषित रक्त को शुद्ध करने, बढ़ी हुई शर्करा को नियंत्रित करने और शरीर में मौजूद कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। करेला विटामिन A, B और C का अच्छा स्रोत है, जो इम्युनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा और आंखों की सेहत के लिए भी जरूरी माने जाते हैं।करेला अग्नि और अग्न्याशय तक प्रभाव डालता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। यह आंतों की गहराई से सफाई कर वहां मौजूद कीड़े, हानिकारक बैक्टीरिया और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। जिन लोगों को बार-बार पेट साफ न होने, गैस, अपच या भूख न लगने की समस्या रहती है उनके लिए करेले का जूस या सलाद बेहद फायदेमंद हो सकता है।

    अगर शरीर में लंबे समय से कब्ज की समस्या बनी रहे, तो इससे आंतों में कीड़े पनप सकते हैं और पोषक तत्व शरीर में ठीक से अवशोषित नहीं हो पाते। ऐसे में करेला शरीर का प्राकृतिक डिटॉक्स करता है और पाचन तंत्र को फिर से सक्रिय बनाता है। इसके कड़वे स्वाद को कम करने के लिए इसे काटकर नमक लगाकर कुछ घंटों के लिए छोड़ दिया जाए, तो इसका कड़वापन काफी हद तक कम हो जाता है।त्वचा संबंधी समस्याओं में भी करेला बेहद उपयोगी माना जाता है। चेहरे पर मुंहासे, एक्ने, खुजली या रूखापन अक्सर रक्त की अशुद्धि का संकेत होते हैं। रोजाना सीमित मात्रा में करेले के जूस का सेवन रक्त को शुद्ध करता है, जिससे त्वचा में निखार आता है और एक्ने की समस्या कम होती है। साथ ही यह शरीर की खुद को ठीक करने की क्षमता को भी बढ़ाता है।

    करेला स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी लाभकारी बताया गया है, क्योंकि यह दूध बनाने वाले हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, इस दौरान इसका सेवन डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। वहीं, अगर शरीर पर कोई घाव, फोड़ा या सूजन हो जाए, तो करेले का लेप लगाने से घाव जल्दी भरता है और संक्रमण का खतरा कम होता है।कुल मिलाकर करेला भले ही स्वाद में कड़वा हो, लेकिन इसके फायदे इतने ज्यादा हैं कि इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।

  • मकर संक्रांति पर देसी खिचड़ी बनाम मॉडर्न डिटॉक्स: सेहत के लिए क्यों बेहतर है पारंपरिक स्वाद, जानें डॉक्टर की राय

    मकर संक्रांति पर देसी खिचड़ी बनाम मॉडर्न डिटॉक्स: सेहत के लिए क्यों बेहतर है पारंपरिक स्वाद, जानें डॉक्टर की राय


    नई दिल्ली।उत्तर भारत के घरों में मकर संक्रांति आते ही रसोई की खुशबू कुछ खास हो जाती है। सर्दियों की ठंड में गाजर मटर गोभी और अलग-अलग दालों के मेल से बनी गरमागरम खिचड़ी न सिर्फ स्वाद देती है बल्कि शरीर और मन को भी सुकून पहुंचाती है। यह व्यंजन केवल परंपरा या पर्व से जुड़ा नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरी स्वास्थ्य समझ भी छिपी हुई है जिसे आज आधुनिक चिकित्सा भी स्वीकार करती है।जनवरी का महीना आमतौर पर ऐसा समय होता है जब लोग शादी-पार्टियों त्योहारों और भारी भोजन के बाद अपने शरीर को दोबारा संतुलन में लाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में शरीर अपने-आप हल्के सादे और आसानी से पचने वाले भोजन की मांग करता है। शायद यही कारण है कि इस मौसम में खिचड़ी सबसे ज्यादा पसंद की जाती है और यह हमें अंदर से ग्राउंडेड महसूस कराती है।

    इस विषय पर भंगेल सीएचसी की सीनियर मेडिकल ऑफिसर और गायनेकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मीरा पाठक ने आईएएनएस से बातचीत में खिचड़ी के स्वास्थ्य लाभों को सरल शब्दों में समझाया। उनका कहना है कि आजकल यह गलत धारणा बन गई है कि खिचड़ी सिर्फ बीमार लोगों या कमजोरी के समय खाई जाती है जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है।डॉ. मीरा पाठक के अनुसार खिचड़ी एक टाइम-टेस्टेड आयुर्वेदिक डाइट है और इसे संपूर्ण आहार माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन और जरूरी अमीनो एसिड्स का संतुलन होता है। दाल में मौजूद लाइसीन और चावल में पाए जाने वाले मिथिओनीन अमीनो एसिड मिलकर एक कंप्लीट प्रोटीन बनाते हैं जो शरीर की मरम्मत और ऊर्जा के लिए बेहद जरूरी है।

    डिटॉक्स डाइट की बात करें तो खिचड़ी सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्पों में से एक है। डॉ. मीरा बताती हैं कि खिचड़ी पचाने में बेहद हल्की होती है और शरीर व दिमाग को एक तरह का सॉफ्ट रीसेट देती है। कुछ दिनों तक सिंपल और हल्का भोजन करने से आंतों लिवर और नर्वस सिस्टम को आराम मिलता है जिससे शरीर खुद को रिपेयर कर पाता है।खिचड़ी की एक और खासियत यह है कि यह धीरे-धीरे ऊर्जा रिलीज करती है। इससे ब्लड शुगर लेवल में अचानक उछाल नहीं आता जो आजकल की जूस डाइट या ट्रेंडी डिटॉक्स ड्रिंक्स में आम समस्या है। डॉ. मीरा के मुताबिक जूस कोम्बुचा या प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स की तुलना में खिचड़ी कहीं ज्यादा संतुलित और पोषण से भरपूर विकल्प है।

    इसके अलावा खिचड़ी में हाइड्रेटिंग और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं जो शरीर की सूजन थकान और अंदरूनी टूट-फूट को ठीक करने में मदद करते हैं। यही कारण है कि इसे रिकवरी और बीमारी के समय दिया जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि यह सिर्फ बीमारों का खाना है।खिचड़ी की सबसे बड़ी खूबी इसकी वर्सटाइल प्रकृति है। इसमें चावल की जगह मिलेट्स अलग-अलग दालें मौसमी सब्जियां पनीर या शुद्ध घी मिलाकर इसे और भी पौष्टिक बनाया जा सकता है। यह हमारी पारंपरिक भारतीय समझ का प्रतीक है जिसे आज मॉडर्न साइंस भी पूरी तरह समर्थन देता है।

  • सर्दियों में लेमन ग्रास टी इम्यूनिटी बूस्ट और एनर्जी का प्राकृतिक स्रोत

    सर्दियों में लेमन ग्रास टी इम्यूनिटी बूस्ट और एनर्जी का प्राकृतिक स्रोत


    नई दिल्ली । सर्दियों के मौसम में ठंड से बचाव और सेहत बनाए रखने के लिए लेमन ग्रास टी एक प्राकृतिक वरदान है। सर्दियों में लेमन ग्रास टी की चुस्की खासतौर पर फायदेमंद है। यह ताजगी भरी हर्बल ड्रिंक एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती है जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाती है।लेमन ग्रास टी न केवल पाचन सुधारती है बल्कि प्राकृतिक रूप से तनाव से राहत देती है और इम्यूनिटी बढ़ाती है। आयुर्वेद में लंबे समय से इस्तेमाल हो रही यह चाय सर्दी-जुकाम से बचाव के लिए भी बेहतरीन है।
    भारत सरकार का आयुष मंत्रालय लेमन ग्रास टी के फायदों से अवगत कराता है। इसका सेवन पाचन तंत्र के लिए बहुत फायदेमंद है। यह पेट फूलना गैस और अपच जैसी समस्याओं को दूर करती है। लेमन ग्रास टी में मौजूद सिट्रल कंपाउंड पाचन एंजाइम्स को एक्टिव करता है जिससे भोजन आसानी से पचता है। सर्दियों में भारी खाने से होने वाली तकलीफों में यह राहत देती है।

    प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में भी लेमन ग्रास टी का बड़ा योगदान है। इसमें विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर होते हैं जो संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। सर्दियों में वायरल इंफेक्शन और फ्लू से बचाव के लिए रोजाना एक कप पीना लाभकारी है। यह टी सूजन कम करने में भी प्रभावी है। एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण जोड़ों के दर्द मांसपेशियों की अकड़न और सर्दी से होने वाली सूजन में आराम मिलता है। साथ ही यह शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालती है और डिटॉक्स का काम करती है।

    लेमन ग्रास टी थकान को उतारने में भी प्रभावी है। रिलैक्सेशन को बढ़ावा देने वाली यह टी तनाव और चिंता कम करती है। इसकी सुगंध मूड को बेहतर बनाती है और नींद अच्छी आती है। सर्दियों की लंबी रातों में एक कप गर्म लेमन ग्रास टी पीना शांति का एहसास देता है। लेमन ग्रास टी बनाने के लिए ताजा या सूखे लेमन ग्रास के डंठल लें काटकर पानी में उबाल लें। इसे 5 से 10 मिनट तक उबालने के बाद छान लें। स्वाद के लिए इसमें शहद या नींबू भी मिला सकते हैं।लेमन ग्रास टी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है। हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इसे रोजाना 1 या 2 कप से ज्यादा न पीएं। गर्भवती महिलाएं या कोई दवा ले रहे हों तो डॉक्टर से सलाह के बाद ही सेवन करें।

  • आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी को मिलेगा वैश्विक मानक दर्जा WHO और आयुष मंत्रालय की बड़ी पहल

    आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी को मिलेगा वैश्विक मानक दर्जा WHO और आयुष मंत्रालय की बड़ी पहल


    नई दिल्ली । भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से जोड़ने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य संगठन और आयुष मंत्रालय ने एक बड़ी पहल की है। इस पहल के तहत आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को अब अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के तहत एक समर्पित मॉड्यूल के रूप में विकसित किया जाएगा। इस कदम से इन प्रणालियों को वैश्विक पहचान और वैज्ञानिक आधार मिलेगा।

    इस संदर्भ में 20-21 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक अहम तकनीकी बैठक का आयोजन किया गया। यह बैठक WHO और आयुष मंत्रालय के बीच 24 मई 2025 को हुए ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन एमओयू के अंतर्गत आयोजित की गई थी। बैठक का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से जोड़ने के लिए एक समान कोडिंग प्रणाली का विकास करना था जिससे उपचार की प्रभावशीलता को समझने शोध और नीति निर्माण में मदद मिल सके।

    प्रधानमंत्री मोदी का विजन और वैश्विक पहचान

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि आयुष प्रणालियों को वैज्ञानिक और मानकीकृत तरीके से अपनाने से ये चिकित्सा पद्धतियां दुनिया भर में प्रभावी रूप से फैल सकती हैं। यह कदम भारतीय पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में अहम साबित होगा।

    बैठक में वैश्विक प्रतिनिधित्व
    बैठक की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय की संयुक्त सचिव कविता गर्ग ने की। इस बैठक में WHO के छह क्षेत्रों अफ्रीका अमेरिका पूर्वी भूमध्यसागर यूरोप दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत से प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके अलावा भारत भूटान ब्राजील ईरान मलेशिया नेपाल मॉरीशस दक्षिण अफ्रीका श्रीलंका फिलीपींस यूके और अमेरिका जैसे देशों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। इस बैठक में भारतीय आयुष प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए प्रमुख स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के कोड पर चर्चा की गई। साथ ही आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी चिकित्सा से जुड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड को भी विस्तृत रूप से परखा गया।

    वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा को एकीकृत करना

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ जोड़ने में आसानी होगी। यह कदम सुरक्षित साक्ष्य आधारित और समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देगा। विशेष रूप से आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का यह अवसर है।

    भारत की प्रमुख भूमिका

    भारत जो पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों का एक अहम केंद्र है इस पहल में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इस बैठक में भारतीय टीम ने महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसमें प्रो. रबिनारायण आचार्य महानिदेशक सीसीआरएएस प्रो. एनजे मुथुकुमार महानिदेशक सीसीआरएस और डॉ. जहीर अहमद महानिदेशक सीसीआरयूएम जैसे प्रमुख विशेषज्ञ शामिल थे।

    WHO के वैश्विक प्रयास

    इस पहल में डब्ल्यूएचओ के जानी-मानी शख्सियतों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। जिनेवा में डब्ल्यूएचओ मुख्यालय के प्रमुख प्रतिनिधि रॉबर्ट जैकब नेनाद कोस्टांजेक स्टीफन एस्पिनोसा और डॉ. प्रदीप दुआ ने वर्गीकरण चर्चाओं का नेतृत्व किया। साथ ही डब्ल्यूएचओ ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर जीटीएमसी और डब्ल्यूएचओ एसईएआरओ कार्यालय से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस पहल को प्रभावी बनाने में मदद की।

    पारंपरिक चिकित्सा के लिए समर्पित मॉड्यूल

    यह पहल पारंपरिक चिकित्सा उपचारों के लिए एक समर्पित वर्गीकरण प्रणाली को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे दुनिया भर में पारंपरिक इलाज की जानकारी को सही तरीके से दर्ज किया जा सकेगा जिससे उपचार के परिणामों की बेहतर समझ हो सकेगी और स्वास्थ्य नीति बनाने में मदद मिलेगी। WHO और आयुष मंत्रालय की यह पहल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के लिए वैश्विक पहचान प्राप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह कदम न केवल भारतीय आयुष प्रणालियों को विज्ञान आधारित बना सकेगा बल्कि यह अन्य देशों में भी इन पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
    भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से जोड़ने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य संगठन और आयुष मंत्रालय ने एक बड़ी पहल की है। इस पहल के तहत आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को अब अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के तहत एक समर्पित मॉड्यूल के रूप में विकसित किया जाएगा। इस कदम से इन प्रणालियों को वैश्विक पहचान और वैज्ञानिक आधार मिलेगा। इस संदर्भ में 20-21 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक अहम तकनीकी बैठक का आयोजन किया गया। यह बैठक WHO और आयुष मंत्रालय के बीच 24 मई 2025 को हुए ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन एमओयू के अंतर्गत आयोजित की गई थी। बैठक का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से जोड़ने के लिए एक समान कोडिंग प्रणाली का विकास करना था जिससे उपचार की प्रभावशीलता को समझने शोध और नीति निर्माण में मदद मिल सके।

    प्रधानमंत्री मोदी का विजन और वैश्विक पहचान

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि आयुष प्रणालियों को वैज्ञानिक और मानकीकृत तरीके से अपनाने से ये चिकित्सा पद्धतियां दुनिया भर में प्रभावी रूप से फैल सकती हैं। यह कदम भारतीय पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में अहम साबित होगा।

    बैठक में वैश्विक प्रतिनिधित्व

    बैठक की अध्यक्षता आयुष मंत्रालय की संयुक्त सचिव कविता गर्ग ने की। इस बैठक में WHO के छह क्षेत्रों अफ्रीका अमेरिका पूर्वी भूमध्यसागर यूरोप दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत से प्रतिनिधियों ने भाग लिया।इसके अलावा भारत भूटान ब्राजील ईरान मलेशिया नेपाल मॉरीशस दक्षिण अफ्रीका श्रीलंका फिलीपींस यूके और अमेरिका जैसे देशों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। इस बैठक में भारतीय आयुष प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए प्रमुख स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के कोड पर चर्चा की गई। साथ ही आयुर्वेद सिद्ध और यूनानी चिकित्सा से जुड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य हस्तक्षेप कोड को भी विस्तृत रूप से परखा गया।

    वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा को एकीकृत करना

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ जोड़ने में आसानी होगी। यह कदम सुरक्षित साक्ष्य-आधारित और समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देगा। विशेष रूप से आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का यह अवसर है।

    भारत की प्रमुख भूमिका
    भारत जो पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों का एक अहम केंद्र है इस पहल में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इस बैठक में भारतीय टीम ने महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसमें प्रो. रबिनारायण आचार्य महानिदेश सीसीआरएएस प्रो. एनजे मुथुकुमार सीसीआरएसऔर डॉ. जहीर अहमद महानिदेशक सीसीआरयूएम जैसे प्रमुख विशेषज्ञ शामिल थे।

    WHO के वैश्विक प्रयास
    इस पहल में डब्ल्यूएचओ के जानी-मानी शख्सियतों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। जिनेवा में डब्ल्यूएचओ मुख्यालय के प्रमुख प्रतिनिधि रॉबर्ट जैकब नेनाद कोस्टांजेक स्टीफन एस्पिनोसा और डॉ. प्रदीप दुआ ने वर्गीकरण चर्चाओं का नेतृत्व किया। साथ ही डब्ल्यूएचओ ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर जीटीएमसी और डब्ल्यूएचओ एसईएआरओ कार्यालय से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस पहल को प्रभावी बनाने में मदद की।

    पारंपरिक चिकित्सा के लिए समर्पित मॉड्यूल

    यह पहल पारंपरिक चिकित्सा उपचारों के लिए एक समर्पित वर्गीकरण प्रणाली को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे दुनिया भर में पारंपरिक इलाज की जानकारी को सही तरीके से दर्ज किया जा सकेगा जिससे उपचार के परिणामों की बेहतर समझ हो सकेगी और स्वास्थ्य नीति बनाने में मदद मिलेगी। WHO और आयुष मंत्रालय की यह पहल भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के लिए वैश्विक पहचान प्राप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह कदम न केवल भारतीय आयुष प्रणालियों को विज्ञान आधारित बना सकेगा बल्कि यह अन्य देशों में भी इन पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।

  • ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच

    ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली  /प्रदेश में जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है, वैसे-वैसे वायु प्रदूषण का स्तर भी चिंताजनक होता जा रहा है। राजधानी समेत कई जिलों में हवा की गुणवत्ता खराब हो चुकी है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है। अस्पतालों में छींक, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत, कब्ज और एलर्जी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह मौसम खासतौर पर उन लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या जो पहले से ही अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक उपाय ठंड और प्रदूषण दोनों से बचाव का प्रभावी, सुरक्षित और किफायती विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं।

    सही दिनचर्या से मिलेगा दोहरी सुरक्षा
    राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के रोग एवं विकृति विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि सर्दियों में यदि ऋतु के अनुसार दिनचर्या और भोजन अपनाया जाए, तो ठंड और प्रदूषण से होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। उनके अनुसार, रोजाना सरसों के तेल से हल्की मालिश सिर से पांव तक करने से शरीर में गर्माहट बनी रहती है और त्वचा भी सुरक्षित रहती है। इसके साथ ही सुबह नाक में अणु तेल या सरसों तेल की 1–2 बूंद डालने से नाक और फेफड़ों को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

    सूर्यस्नान, योग और भाप के लाभ

    सर्दियों में रोजाना कम से कम 30 मिनट धूप में बैठना शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों की सलाह से अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी प्राणायाम करने से श्वसन तंत्र सशक्त होता है और फेफड़े बेहतर तरीके से काम करते हैं। रात में भाप लेना भी बेहद फायदेमंद माना गया है। इससे नाक और सांस की नलियां साफ होती हैं, बलगम निकलता है और सर्दी-जुकाम में राहत मिलती है।

    सर्दियों में सही भोजन बनेगा सेहत की ढाल
    आयुर्वेद में हेमंत और शिशिर ऋतु में उष्ण, तरल और स्नेही आहार को लाभकारी बताया गया है। बाल रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया के अनुसार बच्चों को रोज हल्दी वाला दूध देना चाहिए, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस मौसम में आसानी से मिलने वाला आंवला विटामिन-सी और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। इसके अलावा गुड़, अदरक, कच्ची हल्दी, तिल और सोंठ से बने व्यंजन शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं और ठंड के असर को कम करते हैं।

    पाचन ठीक रहेगा तो बीमारियां रहेंगी दूर
    प्रभारी अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ठंड के मौसम में पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है, जिससे कब्ज, गैस और अपच की समस्या बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए दिनभर गुनगुना पानी पीना, रात को दूध में एक चम्मच घी लेना और सुबह भिगोया हुआ मेथी दाना खाना फायदेमंद होता है।

    आयुर्वेदिक जीवनशैली है सबसे आसान समाधान
    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग नियमित योग, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, तो ठंड और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। यह न केवल बीमारी से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है।