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  • PM मोदी के जन्मदिन के बहाने देश को मथने की तैयारी… BJP शुरू करेगी जनसंपर्क अभियान

    PM मोदी के जन्मदिन के बहाने देश को मथने की तैयारी… BJP शुरू करेगी जनसंपर्क अभियान


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के जन्मदिन के बहाने भाजपा (BJP) ने जनसंपर्क यात्राओं और एक महीने के सेवा संकल्प अभियान (Service Pledge Campaign) के तहत पूरे देश को मथने, कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने और लोगों से सीधा संवाद करने की व्यापक तैयारी की है।

    योजना के तहत पीएम की जन्मभूमि वडनगर और कर्मभूमि वाराणसी से अलग-अलग यात्रा निकालने की है। इन यात्राओं से जुड़ी टीमें देश के अलग-अलग हिस्सों में बतौर लोकसेवक मोदी की उपलब्धियों की जानकारी देगी। इन यात्राओं से अछूते हिस्से में सेवा संकल्प अभियान के तहत रैलियां, रक्तदान, स्वास्थ्य जांच शिविर के जरिये लोगों से संपर्क साधा जाएगा। सेवा संकल्प अभियान का तानाबाना सोमवार देर रात तक पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन, गृह मंत्री अमित शाह, महासचिव स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े समेत कई वरिष्ठ नेताओं की बैठक में बुना गया।


    ये है यात्रा का खाका

    17 सितंबर से वडनगर और वाराणसी से शुरू हो रही यात्रा देश के विभिन्न हिस्से से गुजरते हुए 17 अक्तूबर को क्रमश: वाराणसी और वडनगर पहुंचेगी। दोनों यात्रा प्रतिदिन सौ किमी के सफर के साथ अलग-अलग तीन-तीन हजार किमी क्षेत्र को कवर करेगी। प्रतिदिन कम से कम चार कार्यक्रम करेगी।

  • BJP युवा चेहरों पर दांव खेलने की तैयारी में…. 60 साल से कम उम्र के होंगे भावी सरकारों के मुखिया… !

    BJP युवा चेहरों पर दांव खेलने की तैयारी में…. 60 साल से कम उम्र के होंगे भावी सरकारों के मुखिया… !


    नई दिल्ली।
    भाजपा (BJP) नेतृत्व देश की नई पीढ़ी (New Generation) खासकर युवाओं की आकांक्षाओं को प्राथमिकता पर रखते हुए अपनी आगे बनने वाली सरकारों (Governments) का नेतृत्व युवाओं (Youth) को सौंपे जाने की तैयारी में है। पार्टी ने संकेत दिए हैं कि उसकी भावी सरकारों के मुखिया साठ साल से कम उम्र के होंगे।

    हालांकि, सरकार में वरिष्ठ नेताओं को भी शामिल किया जाएगा। अगले साल भाजपा को सात राज्यों के चुनाव में जाना है, जिनमें पांच राज्यों में अभी उसके मुख्यमंत्री है। वहां पर यह बदलाव साफ दिखाई देगा। भाजपा के देशभर में अभी 17 मुख्यमंत्री हैं। इनमें पांच की ही उम्र साठ साल से अधिक है। सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू हैं, जिनकी उम्र 47 वर्ष है। सबसे ज्यादा उम्र के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा (73 वर्ष) हैं। छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णुदेव साय, गुजरात के भूपेंद्र पटेल, मणिपुर के वाय खेमचंद सिंह साठ साल के ज्यादा के हैं।

    भाजपा नेतृत्व ने संगठन में नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान सौंपकर साफ कर दिया था, कि अब वह नई पीढ़ी को आगे लाने जा रही है। जेन जी के आंदोलन के बने माहौल में भाजपा अब अपने इस फैसले को राज्यों में भी लागू करेगी। हालांकि, राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कुछ अपवाद रखे जा सकते हैं।


    गुजरात में हर्ष सांघवी नया चेहरा

    भाजपा की इस कवायद में आने वाले चुनाव वाले राज्यों में गुजरात में पार्टी के उप मुख्यमंत्री हर्ष सांघवी भावी नेता के रूप में उभर रहे हैं। मणिपुर की स्थिति अलग है। वहां पर अलग तरह से फैसला लिया जाएगा। हिमाचल प्रदेश और पंजाब जहां भाजपा की सरकारें नहीं हैं, वहां पार्टी अघोषित रूप से युवा चेहरे को सामने रखेगी।


    पीएमम मोदी के जन्मदिन पर सेवा संकल्प अभियान
    भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक “सेवा संकल्प अभियान” के तहत पूरे उत्तर प्रदेश में सेवा और जनकल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करेगी। प्रदेश भाजपा मुख्यालय से सोमवार को जारी बयान में यह जानकारी दी गई।

    मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन को समर्पित इस अभियान का उद्देश्य उनके सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण और विकसित भारत के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाना है।

    अभियान को लेकर प्रदेश स्तरीय कार्यशाला सोमवार को यहां इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित की गई। कार्यशाला में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी, उपमुख्यमंत्री द्वय केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक तथा प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह शामिल हुए।

  • कांग्रेस के गढ़ में BJP का बड़ा दांव, जयपुर निगम चुनाव में उतारे 8 मुस्लिम उम्मीदवार, 51 महिलाओं को टिकट

    कांग्रेस के गढ़ में BJP का बड़ा दांव, जयपुर निगम चुनाव में उतारे 8 मुस्लिम उम्मीदवार, 51 महिलाओं को टिकट


    जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सामाजिक और महिला समीकरण साधते हुए 8 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। पार्टी ने 150 वार्डों में 51 सीटों पर महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है। वहीं, कांग्रेस ने टिकट वितरण में संगठन से जुड़े नेताओं और मौजूदा पार्षदों पर भरोसा जताया है। ऐसे में दोनों दलों की रणनीति ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है।

    भाजपा ने 51 महिलाओं को दिया टिकट

    भाजपा की सूची में महिला और सामाजिक समीकरण पर खास फोकस दिखाई दे रहा है। पार्टी ने 33% महिला आरक्षण के सिद्धांत से आगे बढ़ते हुए करीब 35% टिकट महिलाओं को दिए हैं। इनमें महिला मोर्चा से जुड़ी कार्यकर्ताओं के साथ लंबे समय से संगठन में सक्रिय महिला चेहरों को भी मौका दिया गया है।

    वार्ड 47 से दीपा नाथावत, वार्ड 56 से रेखा सैनी, वार्ड 107 से अनुराधा माहेश्वरी और वार्ड 123 से पूनम मेहता को प्रत्याशी बनाया गया है।

    सबसे चर्चित नाम कांग्रेस की पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल का है। भाजपा ने उन्हें वार्ड 110 से मैदान में उतारा है। ज्योति खंडेलवाल जयपुर नगर निगम की महापौर रह चुकी हैं और लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रही हैं। अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने से वार्ड 110 का मुकाबला खास हो गया है।

    8 मुस्लिम चेहरों पर भाजपा का भरोसा

    भाजपा ने मुस्लिम बहुल और कांग्रेस के प्रभाव वाले इलाकों में भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। पार्टी ने कुल 8 मुस्लिम नेताओं को पार्षद का टिकट दिया है।

    वार्ड 19 से शहनवाज अंसारी, वार्ड 109 से जाकिर खान कायमखानी, वार्ड 113 से फरीदुद्दीन ‘जैकी’, वार्ड 117 से शब्बो जहां, वार्ड 128 से माजिद पठान, वार्ड 136 से मिजाना मिर्जा, वार्ड 137 से रहीस मंसूरी और वार्ड 146 से अफसाना को प्रत्याशी बनाया गया है।

    इनमें वार्ड 19 का टिकट सबसे ज्यादा चर्चा में है। सामान्य सीट होने के बावजूद भाजपा ने यहां मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। इसे पार्टी की वार्डवार सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    कांग्रेस ने संगठन के चेहरों पर जताया भरोसा

    कांग्रेस ने टिकट वितरण में अपने संगठन को प्राथमिकता दी है। पार्टी ने 4 ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्षों, 2 पीसीसी प्रकोष्ठ प्रमुखों और एक पीसीसी सचिव को चुनाव मैदान में उतारा है।

    इसके अलावा कई मौजूदा पार्षदों को भी दोबारा टिकट दिया गया है। पार्टी ने अपने मौजूदा जनप्रतिनिधियों के स्थानीय जनाधार और वार्ड में सक्रियता को टिकट का आधार बनाया है।

    कांग्रेस की रणनीति संगठन के पुराने नेटवर्क और मौजूदा पार्षदों के स्थानीय प्रभाव के सहारे भाजपा को चुनौती देने की है। हालांकि टिकट वितरण के बाद दोनों दलों के सामने बागियों को संभालने की चुनौती भी रहेगी।

    2500 से ज्यादा दावेदारों में से चुने 150 चेहरे

    जयपुर निगम चुनाव के लिए भाजपा में कई दिनों तक टिकट को लेकर मंथन चला। 150 वार्डों के लिए करीब 2500 से ज्यादा दावेदारों ने टिकट की दावेदारी की थी। पार्टी के सामने जिताऊ उम्मीदवार चुनने के साथ पुराने कार्यकर्ताओं, जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव के बीच संतुलन बनाने की चुनौती थी।

    भाजपा की सूची में महिला, युवा, सामाजिक और संगठन से जुड़े चेहरों का मिश्रण दिखाई दे रहा है। पार्टी ने वार्डवार समीकरण को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया है।

    बागियों पर रहेगी दोनों दलों की नजर

    टिकट वितरण के बाद अब भाजपा और कांग्रेस के सामने नाराज दावेदारों को मनाने की चुनौती है। टिकट नहीं मिलने पर कुछ दावेदार निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं या दूसरे दलों का रुख कर सकते हैं। ऐसे में कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय होने की संभावना है।

    भाजपा का 8 मुस्लिम उम्मीदवारों और 51 महिलाओं को टिकट देने का फैसला तथा कांग्रेस का संगठन के मजबूत चेहरों पर दांव अब चुनावी नतीजों पर कितना असर डालता है, यह चुनाव के दौरान देखने वाली बात होगी।

  • ‘दिमागी नक्सल’ पर BJP का सोशल मीडिया वार, राज्यों के हैंडल्स ने मिलकर शुरू किया मीम कैंपेन

    ‘दिमागी नक्सल’ पर BJP का सोशल मीडिया वार, राज्यों के हैंडल्स ने मिलकर शुरू किया मीम कैंपेन


    नई दिल्ली। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के सक्रिय होने के साथ पार्टी का सोशल मीडिया तंत्र भी नए अंदाज में काम करता नजर आ रहा है। भाजपा सोशल मीडिया कन्वीनर दीपक म्हस्के की टीम ने पिछले तीन दिनों में अलग-अलग राज्यों के पार्टी हैंडल्स को आपस में जोड़कर एक साथ राजनीतिक संदेश देने की रणनीति शुरू की है। इसके तहत मीम्स, बॉलीवुड-हॉलीवुड फिल्मों के चर्चित सीन और क्रिएटिव वीडियो का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    इस अभियान में राज्यों के भाजपा हैंडल्स एक-दूसरे की पोस्ट को कोट और रिट्वीट करने के साथ टैग और कोलैबोरेशन कर रहे हैं। इसका मकसद कंटेंट की पहुंच बढ़ाने के साथ राजनीतिक व्यंग्य के जरिए विपक्ष पर निशाना साधना भी है।

    जम्मू-कश्मीर BJP के पोस्ट से शुरू हुआ सिलसिला

    इस नए सोशल मीडिया प्रयोग की शुरुआत जम्मू-कश्मीर भाजपा के X हैंडल से हुई। हैंडल ने सलमान खान, संजय दत्त और जैकी श्रॉफ का एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें तीनों अभिनेता एक साथ रियलिटी शो के मंच पर दिखाई दे रहे हैं।

    भाजपा ने इस वीडियो को राजनीतिक रंग देते हुए संजय दत्त को कर्नाटक भाजपा, सलमान खान को जम्मू-कश्मीर भाजपा और जैकी श्रॉफ को गोवा भाजपा के रूप में पेश किया। पोस्ट में लिखा गया—“तीन भाई, तीनों तबाही ?? The worst nightmare for the Dimagi Naxal ecosystem!”

    पोस्ट के ट्रेंड करने के बाद भाजपा IT सेल और सोशल मीडिया टीम ने इसे आगे बढ़ाया। इसके बाद दूसरे राज्यों के भाजपा हैंडल्स भी इस अभियान से जुड़ते चले गए।

    MP BJP ने जोड़े ‘तीन’ में ‘चार भाई’

    जम्मू-कश्मीर भाजपा की पोस्ट को मध्य प्रदेश भाजपा ने कोट करते हुए लिखा—“Hold up… Madhya Pradesh is entering the chat?? तीन भाई? Make it चार, अब तबाही होगी आर-पार!”

    इसके बाद यह सिलसिला और आगे बढ़ा। दिल्ली भाजपा ने अभिनेता पंकज त्रिपाठी के एक वीडियो के साथ पोस्ट किया—“भूल तो नहीं गए हमें?” इसके बाद अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स ने इसी अंदाज में मीम्स और वीडियो पोस्ट करना शुरू कर दिया।

    दो-तीन राज्यों तक पहुंचाने की रणनीति

    भाजपा IT सेल के एक अधिकारी के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर भाजपा के वीडियो के बाद यह रणनीति बनाई गई कि देशभर के भाजपा राज्यों के सोशल मीडिया हैंडल्स को एक साथ जोड़ा जाए। इसके तहत हैंडल्स एक-दूसरे की पोस्ट को कोट, टैग और जरूरत के अनुसार कोलैबोरेट करेंगे।

    अधिकारी का कहना है कि अलग-अलग राज्यों के पार्टी हैंडल्स के फॉलोअर्स काफी ज्यादा हैं। ऐसे में एक राज्य का हैंडल जब दूसरे राज्य के हैंडल को कोट या टैग करता है तो पोस्ट की पहुंच कई गुना बढ़ जाती है।

    पार्टी के मुताबिक, दिल्ली भाजपा की एक पोस्ट के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि जिस तरह दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर किया, उसी तरह पंजाब में भी AAP को सबक मिल सकता है।

    भाजपा का दावा है कि इस रणनीति से राजनीतिक कंटेंट केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूसरे राज्यों में भी पहुंचता है। पार्टी अब ऐसे कंटेंट पर जोर दे रही है, जिसका असर एक साथ दो-तीन राज्यों की राजनीति पर पड़े।

    ‘दिमागी नक्सल’ के मुद्दे को बनाया सोशल मीडिया हथियार

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से “दिमागी नक्सल” शब्द इस्तेमाल किए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हुई है। अब भाजपा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसी कथित “दिमागी नक्सल” मानसिकता को निशाना बनाते हुए मीम्स और फनी वीडियो तैयार किए जा रहे हैं।

    इसके लिए बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों के लोकप्रिय दृश्यों को एडिट किया जा रहा है। इनके जरिए राजनीतिक संदेश के साथ विपक्ष पर व्यंग्य भी किया जा रहा है।

    भाजपा के एक नेता का कहना है कि अभी यह सिर्फ “करवट” है। उनके मुताबिक, तीन दिनों में सोशल मीडिया पर जिस तरह का नैरेटिव तैयार हुआ है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरी ताकत से अभियान चलने पर इसका असर कितना बड़ा हो सकता है।

    Twitter के बाद Instagram पर भी तैयारी

    भाजपा नेता का आरोप है कि कांग्रेस का नैरेटिव झूठ पर आधारित है और पार्टी को “झूठ की राजनीति” का जवाब देना जरूरी है। इसी रणनीति के तहत अब Twitter के बाद Instagram पर भी क्रिएटिव वीडियो और तस्वीरों के जरिए अभियान चलाने की तैयारी है।

    भाजपा सूत्रों के मुताबिक, Twitter पर राजनीतिक मुद्दों में रुचि रखने वाले लोगों की संख्या अधिक है, इसलिए वहां अभियान शुरू किया गया है। अब इसी रणनीति को Instagram पर भी लागू किया जाएगा।

    आने वाले दिनों में अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स से मीम्स, फनी वीडियो और क्रिएटिव पोस्ट लगातार सामने आने की संभावना है। पार्टी ने अपने Instagram और Twitter अकाउंट पर टीजर के तौर पर “Shall we begin” संदेश भी पोस्ट किया है और देशभर के अलग-अलग राज्यों के भाजपा हैंडल्स को टैग किया है।

    यानी भाजपा की नई सोशल मीडिया टीम ने साफ संकेत दे दिया है कि मौजूदा अभियान महज शुरुआत है। आने वाले दिनों में सोशल मीडिया पर पार्टी का राजनीतिक कैंपेन और ज्यादा आक्रामक और क्रिएटिव नजर आ सकता है।

  • BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस

    BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस


    नई दिल्ली। भाजपा ने अपनी नई संगठनात्मक टीम के जरिए बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के अनुरूप पार्टी को पुराने ढांचे से नए स्वरूप में ढालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सबसे अहम बदलाव यह है कि नए नेतृत्व को फैसले लेने में अधिक स्वतंत्रता दी गई है। वरिष्ठ नेता अब मुख्य रूप से मार्गदर्शक की भूमिका में रहेंगे और संगठन को जरूरत पड़ने पर उनकी सलाह और सहयोग लिया जाएगा। राजनीतिक दलों में समय-समय पर होने वाले पीढ़ीगत बदलाव की इसी कड़ी का असर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में भी दिखाई दे सकता है। हालांकि, संघ प्रमुख के पद में बदलाव को लेकर फिलहाल कोई चर्चा नहीं है।

    आमतौर पर किसी राजनीतिक दल के विपक्ष में रहने के दौरान संगठनात्मक प्रयोगों के लिए ज्यादा गुंजाइश होती है। सत्ता में रहते हुए बड़े बदलावों से बचने की प्रवृत्ति रहती है। इसके बावजूद भाजपा ने केंद्र में एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद भी अपने संगठन में बदलाव की शुरुआत की है। पार्टी के युवा अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई टीम में युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी है, लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता अपने स्तर पर बनाए रखी है।

    हर दशक में बदलता रहा भाजपा का संगठन

    भाजपा के 1980 में गठन के बाद करीब-करीब हर दशक में पार्टी के संगठन में बदलाव देखने को मिले हैं। पिछली सदी के अंतिम दशक में तत्कालीन संगठन प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी ने 1992 से 1995 के बीच बड़ी संख्या में युवाओं को पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं। उस दौर में नरेंद्र मोदी भी प्रमुख युवा चेहरों में शामिल थे। 21वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में भी संगठन में इसी तरह बदलाव हुए। हालांकि, उस समय वरिष्ठ नेताओं की भूमिका अधिक प्रभावी थी और वे नई टीमों को नेतृत्व देने के साथ उनका मार्गदर्शन भी करते थे।

    इस बार तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। पार्टी का नेतृत्व युवा है और निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी उसी के हाथों में रखी गई है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन को मजबूत करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी अहम बनी रहेगी। वरिष्ठ नेता नई टीम को मजबूती देने और जरूरत के मुताबिक सलाह देने की भूमिका में रहेंगे।

    अगले साल संघ में भी बड़े बदलाव की संभावना

    भाजपा के संगठनात्मक बदलाव के बाद अब उसकी वैचारिक और संगठनात्मक ताकत के प्रमुख केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी अगले साल महत्वपूर्ण परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है। ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद संघ का फोकस Gen-Z पर बढ़ने की बात कही जा रही है। संघ की ओर से अपने शताब्दी वर्ष के बाद नई पीढ़ी को लेकर संकेत भी दिए गए हैं।

    इसका व्यापक असर भाजपा के संगठन पर भी दिखाई दे सकता है। जेन-Z और जेन-अल्फा को लेकर बदलते सामाजिक माहौल के बीच भाजपा और संघ अपने नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं में नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे सकते हैं।

    हालांकि, संघ प्रमुख को बदलने की कोई चर्चा नहीं है। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत 2009 से इस पद पर हैं। संघ में सरसंघचालक के चुनाव की व्यवस्था नहीं है। इस पद पर नियुक्ति आम सहमति से होती है। मौजूदा संघ प्रमुख किसी नाम का सुझाव देते हैं तो संगठन के भीतर उस नाम पर सहमति बनाई जा सकती है।

  • मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर

    मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर


    नई दिल्ली।
    ‘डबल इंजन (‘Double Engine’)’ के जिस नारे को बीजेपी (BJP) अपनी सबसे बड़ी ढाल और जीत का पक्का फॉर्मूला मानती रही है, उसकी परतें अब उधड़ने लगी हैं. केंद्र की सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का चेहरा आज भी विरोधियों पर भारी पड़ता दिख रहा है, लेकिन राज्यों के धरातल पर पार्टी का दूसरा इंजन पूरी तरह हांफ रहा है. इंडिया टुडे और सी-वोटर का ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’ (MOTN) अगस्त 2026 सर्वे राजनीतिक विश्लेषकों की आंखें खोल देने वाले नतीजे लेकर आया है. आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि जिन राज्यों में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम फहराया था, वहां महज दो साल के भीतर पार्टी का जनाधार अप्रत्याशित रूप से खिसक चुका है।

    2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने वाली भाजपा ने अपने आपको संभाला और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जबर्दस्त जीत हांसिल की. विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का सहारा लेकर जिस ‘डबल इंजन’ को जनता ने समर्थन दिया, अब वही समर्थन कमजोर पड़ता दिख रहा है।

    आज देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो जाए, तो सर्वे के आंकड़े एनडीए को 326 सीटें और 45.1 प्रतिशत वोट शेयर देते हैं, जबकि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन को 185 सीटें और 39.1 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है. केवल बीजेपी के आंकड़े देखें तो पार्टी 261 सीटों और 39.0 प्रतिशत वोट शेयर के साथ संसद की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी और 2024 के 240 सीटों के मुकाबले 21 सीटें ज्यादा हासिल करेगी. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला और बीजेपी के सिपहसालारों की नींद उड़ाने वाला है. इसी साल जनवरी 2026 के सर्वे में बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त 2026 में घटकर 261 पर आ गई है. यानी बीते महज छह महीनों के भीतर बीजेपी की झोली से 26 सीटें खिसक चुकी हैं, जो यह साबित करता है कि राज्यों में जनता का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है और डबल इंजन का पहिया थमने लगा है।
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    सबसे ज्यादा आंखें खोल देने वाले आंकड़े उन राज्यों से आए हैं जिन्हें बीजेपी का अभेद्य गढ़ और जीत की गारंटी माना जाता था. मध्यप्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने 29 की 29 सीटें जीतकर इतिहास रचा था और विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया था. मगर अगस्त 2026 का सर्वे बताता है कि मध्यप्रदेश में बीजेपी की झोली से सीधे 8 सीटें गायब हो चुकी हैं और पार्टी महज 21 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है. जनवरी 2026 के सर्वे में भी जहां पार्टी 26 सीटों पर थी, वहां छह महीने में ही 5 सीटें और कम हो गईं. पार्टी का वोट शेयर 2024 के 59.27 प्रतिशत से सीधा गिरकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि बीते चुनाव में शून्य पर लटकी कांग्रेस अब 8 सीटें झटकती दिख रही है और उसका वोट शेयर 32.44 प्रतिशत से उछलकर 43.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा है.

    ओडिशा का सच तो और भी ज्यादा कड़वा है. जिस ओडिशा में 2024 के चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 20 सीटें जीतकर नवीन पटनायक के दशकों पुराने साम्राज्य को ढहा दिया था, वहीं अब बीजेपी की साख दांव पर लगी है. सर्वे के अनुसार ओडिशा में बीजेपी की सीटें घटकर सिर्फ 12 रह सकती हैं, यानी पार्टी को 8 सीटों का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है. जनवरी 2026 के 17 सीटों के अनुमान से तुलना करें तो भी छह महीने में पार्टी ने 5 सीटें गंवा दी हैं और उसका वोट शेयर 45.34 प्रतिशत से घटकर 43.0 प्रतिशत पर सिमट गया है.


    हिंदी पट्टी में सुलगता असंतोष और कमजोर पड़ते राज्य

    बीजेपी की राजनीति की रीढ़ मानी जाने वाली हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं. उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव में बीजेपी 33 सीटों पर अटक गई थी. अगस्त 2026 के सर्वे में पार्टी को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं, जो भले ही 2024 से 1 सीट ज्यादा हो, लेकिन छह महीने पहले की तस्वीर से तुलना करने पर पैरों तले जमीन खिसक जाती है. जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी 44 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त आते-आते सीधे 10 सीटें घटकर 34 पर आ चुकी हैं और एनडीए का वोट शेयर 43.69 प्रतिशत से गिरकर 41.7 प्रतिशत हो गया है.

    छत्तीसगढ़ की बात करें तो 2024 में 11 में से 10 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी अब सिर्फ 7 सीटों पर सिमटती दिख रही है, यानी 3 सीटों की सीधी चपत लग रही है, जबकि कांग्रेस 1 सीट से बढ़कर 4 सीटों पर कब्जा जमाती नजर आ रही है. उत्तराखंड में सभी 5 सीटों पर काबिज बीजेपी को 1 सीट का नुकसान होकर 4 सीटें मिलने का अनुमान है. वहीं राजस्थान में बीजेपी 16 सीटों पर दिखाई दे रही है, जो 2024 की 14 सीटों से 2 ज्यादा जरूर है, लेकिन जनवरी 2026 के 18 सीटों के आंकड़े से 2 सीटें कम हो चुकी है.


    पश्चिम बंगाल की लहर का छलावा

    देश भर में खिसकती जमीन के बीच पश्चिम बंगाल ही अकेला ऐसा राज्य बनकर उभरा है जहां बीजेपी के लिए चमत्कारिक आंकड़े सामने आए हैं. 2024 के चुनाव में जहां बीजेपी बंगाल की 42 सीटों में से सिर्फ 12 सीटें जीत पाई थी, वहीं अगस्त 2026 का सर्वे अनुमान लगा रहा है कि बीजेपी राज्य में 35 सीटें जीतकर तख्तापलट कर सकती है, यानी सीधे 23 सीटों का बंपर फायदा. बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर 38.73 प्रतिशत से बढ़कर 46.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन का आंकड़ा 30 सीटों से गिरकर महज 7 सीटों पर सिमट रहा है.

    लेकिन क्या बंगाल का यह उछाल बीजेपी को राहत दे सकता है? आंखें खोल देने वाली सचाई यह है कि केवल एक राज्य के दम पर पूरे देश की राजनीतिक गिरावट की भरपाई नहीं की जा सकती. अगर बंगाल में बीजेपी को 23 सीटों की बढ़त मिल भी जाता है, तो मध्यप्रदेश में 8 सीटें, ओडिशा में 8 सीटें, छत्तीसगढ़ में 3 सीटें और उत्तर प्रदेश में जनवरी के मुकाबले गंवाई गई 10 सीटें मिलकर उस पूरी बढ़त को डकार जाती हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक आधार हैं. बंगाल में स्थानीय विरोध या सत्ता-विरोधी लहर के कारण अस्थायी फायदा मिल सकता है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी के प्रति गहराता जनाक्रोश संगठन के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ा खतरा है।

    ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के ये आंकड़े साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि देश का मतदाता अब आंख मूंदकर ‘डबल इंजन’ के झांसे में आने को तैयार नहीं है. केंद्र में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत प्रभाव आज भी कायम है और लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर उन पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन राज्यों की बीजेपी सरकारों की नाकामी, स्थानीय बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक सुस्ती ने जनता का मोहभंग कर दिया है. एक ताकतवर इंजन पूरी ट्रेन को खींचने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन अगर राज्यों का दूसरा इंजन पूरी तरह खराब हो जाए, तो गाड़ी को पटरी से उतरने में वक्त नहीं लगता।

  • MP BJP का बड़ा संगठन महामंथन, ओरछा में 30-31 अगस्त को प्रदेश कार्यसमिति बैठक, 20 समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी

    MP BJP का बड़ा संगठन महामंथन, ओरछा में 30-31 अगस्त को प्रदेश कार्यसमिति बैठक, 20 समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी

    मध्य प्रदेश : भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक 30 और 31 अगस्त को धार्मिक नगरी ओरछा में आयोजित होने जा रही है। बैठक को लेकर पार्टी संगठन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। आयोजन को व्यवस्थित तरीके से पूरा कराने के लिए 20 विशेष समितियों का गठन किया गया है। इन समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। पार्टी का जोर बैठक के दौरान व्यवस्थाओं के साथ-साथ संगठनात्मक अनुशासन और आगामी रणनीति पर भी रहेगा।

    ओरछा में होने वाली इस बैठक को भाजपा के लिए संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के अनुसार, बैठक के माध्यम से बूथ स्तर से लेकर संगठन के विस्तार तक की आगामी रणनीति पर व्यापक मंथन किया जाएगा। इसके साथ ही पार्टी के संगठन को अधिक सक्रिय, मजबूत और प्रभावी बनाने से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी।

    बैठक में आने वाले वरिष्ठ नेताओं, प्रदेश पदाधिकारियों और अन्य प्रमुख अतिथियों की व्यवस्थाओं को लेकर अलग-अलग समितियों को जिम्मेदारी दी गई है। ओरछा की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को देखते हुए मंदिर दर्शन व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। इसके लिए मंदिर दर्शन व्यवस्था समिति का गठन किया गया है, जिसमें नौ प्रमुख कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह समिति वरिष्ठ अतिथियों को भगवान रामराजा के दर्शन कराने से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालेगी।

    पार्टी ने बैठक के दौरान चिकित्सा सुविधाओं को लेकर भी व्यवस्था सुनिश्चित की है। चिकित्सा समिति में डॉक्टरों की टीम को जिम्मेदारी दी गई है, ताकि किसी भी आकस्मिक स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जा सके। इसी तरह मीडिया और प्रचार-प्रसार से संबंधित जिम्मेदारियों के लिए अलग टीम बनाई गई है। आयोजन स्थल की साज-सज्जा, पार्किंग, कार्यकर्ता व्यवस्था और साउंड सिस्टम के लिए भी समितियां गठित की गई हैं।

    मंच और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी पार्टी ने अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की हैं। मंच व्यवस्था समिति बैठक स्थल पर कार्यक्रम से जुड़ी तैयारियों को संभालेगी, जबकि सुरक्षा समिति आयोजन के दौरान सुरक्षा संबंधी समन्वय पर नजर रखेगी। इसके अलावा परिवहन व्यवस्था के लिए भी कार्यकर्ताओं की टीम बनाई गई है, जो नेताओं और पदाधिकारियों के आवागमन से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालने का काम करेगी।

    प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में आगामी राजनीतिक अभियानों और महत्वपूर्ण संगठनात्मक प्रस्तावों को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। जिला स्तर पर पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा भी बैठक के एजेंडे का हिस्सा रहेगी। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच अनुशासन और मितव्ययिता को लेकर भी चर्चा हो सकती है।

    भाजपा संगठन का लक्ष्य बैठक के माध्यम से आगामी गतिविधियों के लिए स्पष्ट दिशा तय करना है। बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाने, कार्यकर्ताओं की भूमिका मजबूत करने और विभिन्न अभियानों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। ओरछा में होने वाली बैठक के लिए जिम्मेदारियां पहले से तय किए जाने से पार्टी संगठन व्यवस्थाओं को लेकर किसी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहता। बैठक के दौरान लिए जाने वाले फैसलों का असर आने वाले समय में प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों में दिखाई दे सकता है।

  • Gen Z के प्रदर्शन पर गजेंद्र पटेल का गंभीर आरोप: विदेशी ताकतें छात्रों को भड़का रहीं, बोले- मर्यादा में रखें अपनी मांगें

    Gen Z के प्रदर्शन पर गजेंद्र पटेल का गंभीर आरोप: विदेशी ताकतें छात्रों को भड़का रहीं, बोले- मर्यादा में रखें अपनी मांगें


    मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश में छात्रों के प्रदर्शन को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। बीजेपी के नवनियुक्त राष्ट्रीय महासचिव और खरगोन-बड़वानी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने छात्र आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप का दावा किया है। पटेल ने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए एक विचार तेजी से फैलाया जाता है और उसके बाद Gen Z के युवा उससे जुड़ जाते हैं। उनके मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम को देश के भीतर पर्दे के पीछे से कुछ बाहरी तत्वों का समर्थन मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी ताकतें देश को बांटने और युवाओं के बीच नफरत फैलाने की कोशिश कर रही हैं।

    इंदौर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान गजेंद्र सिंह पटेल से देश के अलग अलग हिस्सों में हो रहे छात्र प्रदर्शनों को लेकर सवाल पूछा गया था। इसी दौरान उन्होंने कहा कि पहले छात्र आंदोलन सकारात्मक सोच और रचनात्मक मुद्दों के साथ आगे बढ़ते थे। राजनीतिक नेताओं के प्रति भी भाषा और व्यवहार में एक तरह का सम्मान दिखाई देता था लेकिन अब छात्र आंदोलनों का स्वरूप और तरीका बदलता नजर आ रहा है। पटेल ने युवाओं से अपील की कि वे अपनी समस्याओं और मांगों को मर्यादा के दायरे में रखते हुए सरकार के सामने रखें।

    पटेल का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनके ही संसदीय क्षेत्र के बड़वानी जिले में एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय के करीब 200 छात्रों ने शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर लगभग 25 किलोमीटर तक मार्च किया। छात्रों की शिकायत थी कि शिक्षकों ने उनके साथ कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और अभद्र व्यवहार किया। छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन ने स्थानीय स्तर पर प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान खींचा है।

    इस प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए पटेल ने कहा कि स्कूल में किसी शिक्षक से छोटी मोटी गलती हो सकती है लेकिन बच्चों को इस तरह सड़कों पर नहीं उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार और संगठन बच्चों के साथ हैं और उनकी समस्याओं का समाधान निश्चित रूप से किया जाएगा। पटेल ने यह भी दावा किया कि पिछले एक साल से सक्रिय कुछ संगठनों ने सरकारी स्कूल के छात्रों को गुमराह किया और उन्हें प्रदर्शन के लिए उकसाने का काम किया है।

    बीजेपी नेता ने युवाओं को देश की ताकत बताते हुए कहा कि युवा समझदार हैं और उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके आंदोलन का इस्तेमाल कोई बाहरी ताकत अपने हित के लिए न करे। उन्होंने कहा कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं पर सरकार गंभीरता से काम कर रही है और शिकायतों के समाधान के लिए संवाद का रास्ता सबसे बेहतर है।

    बातचीत के दौरान पटेल ने इथेनॉल उत्पादन को लेकर भी सरकार की नीतियों का बचाव किया। उन्होंने दावा किया कि देश इथेनॉल उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ईंधन क्षेत्र को भी फायदा होगा। चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को उन्होंने कुछ समय की समस्या बताते हुए विपक्ष पर लोगों को गलत जानकारी के जरिए गुमराह करने का आरोप लगाया। छात्र आंदोलनों से लेकर आर्थिक मुद्दों तक पटेल के बयानों ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

  • संत रविदास के समानता और सामाजिक समरसता के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प, नितिन नवीन ने गिनाई प्राथमिकताएं

    संत रविदास के समानता और सामाजिक समरसता के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प, नितिन नवीन ने गिनाई प्राथमिकताएं

    नई दिल्ली । भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित समरसता संकल्प अभियान के पावन माटी कलश वंदन एवं वितरण कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य संत रविदास के सामाजिक समरसता, समानता और निष्काम कर्म के विचारों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि सभी वर्गों को साथ लेकर वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने का संकल्प लिया गया है।

    नितिन नवीन ने कहा कि संत शिरोमणि रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर पार्टी उनके विचारों और सामाजिक संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने का प्रयास कर रही है। उनके अनुसार, समाज में समानता और आपसी सद्भाव की भावना को मजबूत करना इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी का भी उन्होंने स्वागत किया।

    उन्होंने बताया कि समरसता संकल्प अभियान की शुरुआत 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर की गई थी। अभियान के आरंभ से ही देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों को इससे जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। नवीन ने कहा कि गुरु पूर्णिमा के दिन अभियान शुरू करने का उद्देश्य संत रविदास से जुड़े इस कार्यक्रम को गुरु परंपरा के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से आगे बढ़ाना था।

    भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि भारत की परंपरा संतों और महापुरुषों के विचारों से समृद्ध रही है। उनके मुताबिक, जब समाज के सामने असमानता या कठिन परिस्थितियां आईं, तब संतों और महापुरुषों ने लोगों को सामाजिक एकता और सुधार का रास्ता दिखाया। उन्होंने संत रविदास के विचारों को इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

    नितिन नवीन ने कहा कि संत रविदास ने ऐसे समय में सामाजिक समानता की बात की, जब समाज कई तरह की ऊंच-नीच और कुप्रथाओं से प्रभावित था। उनके विचारों ने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने और समाज में समरसता की भावना मजबूत करने का काम किया। भाजपा इसी संदेश को अभियान के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार की नीतियों का उद्देश्य गरीब और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना है। उन्होंने दावा किया कि करीब 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सरकार की योजनाओं की भूमिका रही है।

    कोरोना महामारी के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने का उल्लेख करते हुए नवीन ने कहा कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई व्यक्ति भूखा न सोए। उन्होंने इसे सामाजिक सरोकार और जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने की नीति से जोड़ा।

    नितिन नवीन ने कहा कि सामाजिक समरसता केवल किसी एक वर्ग का विषय नहीं है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि विकास का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाने और सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। उनके मुताबिक, यही भावना विकसित भारत के निर्माण की आधारशिला बनेगी।

    भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि पार्टी संत रविदास के आदर्शों और प्रधानमंत्री मोदी के विकास दृष्टिकोण को साथ लेकर सामाजिक एकता और देश के विकास की दिशा में काम करेगी। उन्होंने कहा कि समाज के हर वर्ग को जोड़कर 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।

  • मनुस्मृति और महिलाओं की स्वतंत्रता पर राहुल गांधी की टिप्पणी से सियासी घमासान, बीजेपी ने कांग्रेस पर हिंदू-विरोधी होने का आरोप लगाया

    मनुस्मृति और महिलाओं की स्वतंत्रता पर राहुल गांधी की टिप्पणी से सियासी घमासान, बीजेपी ने कांग्रेस पर हिंदू-विरोधी होने का आरोप लगाया

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मनुस्मृति और महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर पुणे में की गई टिप्पणी के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम के दौरान मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति से संबंधित विचारों का जिक्र करते हुए ऐसी व्यवस्था को गलत और शर्मनाक बताया, जिसमें महिलाओं को जीवन के अलग-अलग चरणों में पुरुष के अधीन रहने की बात कही गई है। उनके इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

    राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि मनुस्मृति में महिलाओं के जीवन को लेकर ऐसी बातें कही गई हैं, जिनके अनुसार बचपन में महिला पिता के अधीन, विवाह के बाद पति के अधीन और पति की मृत्यु के बाद बेटों के अधीन रहती है। उन्होंने इस तरह की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिलाओं को हमेशा किसी पुरुष के अधीन रखने की विचारधारा स्वीकार नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक महिलाओं को स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए।

    राहुल गांधी के इस बयान के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर हिंदू धर्म और उसके धार्मिक ग्रंथों को राजनीतिक नजरिये से पेश करने का आरोप लगाया। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस हिंदू धर्मग्रंथों को अपने राजनीतिक नैरेटिव के अनुसार प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने राहुल गांधी को मनुस्मृति पर टिप्पणी करने से पहले उसे पूरी तरह पढ़ने की सलाह भी दी।

    अमित मालवीय ने कहा कि धर्मग्रंथों को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी के बयान को हिंदू धर्म के बारे में गलत धारणा बनाने की कोशिश से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। बीजेपी नेता ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म को किसी राजनीतिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं है और धार्मिक विषयों पर टिप्पणी करते समय उनके व्यापक संदर्भ को समझना जरूरी है।

    बीजेपी के एक अन्य नेता निशिकांत दुबे ने भी राहुल गांधी और कांग्रेस पर हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस और गांधी परिवार के पुराने राजनीतिक फैसलों का उल्लेख करते हुए पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाए। निशिकांत दुबे ने प्रियंका गांधी का जिक्र करते हुए राहुल गांधी पर राजनीतिक टिप्पणी भी की और कहा कि वह अपने भाई से ज्यादा समझदार हैं।

    दुबे ने कांग्रेस के पुराने इतिहास से जुड़े कई राजनीतिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए पार्टी पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जिन सिद्धांतों और विचारों की बात दूसरों के संदर्भ में करती है, उन्हें अपने परिवार और संगठन के भीतर भी लागू करना चाहिए। इस बयान के जरिए उन्होंने राहुल गांधी की टिप्पणी को कांग्रेस की राजनीतिक विचारधारा से जोड़ने की कोशिश की।

    मनुस्मृति को लेकर भारतीय राजनीति में पहले भी अलग-अलग समय पर तीखी बहस होती रही है। सामाजिक समानता, जाति व्यवस्था और महिलाओं की स्थिति से जुड़े इसके संदर्भों पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के अलग-अलग विचार रहे हैं। इसी वजह से राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी ने राजनीतिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।

    कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी की टिप्पणी को महिलाओं की समानता और स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि बीजेपी ने इसे हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों के संदर्भ में राजनीतिक हमला बताया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के चलते यह मुद्दा आने वाले दिनों में भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है।