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  • ब्रिक्स बिजनेस फोरम में भारत का ट्रेड प्लान, जयशंकर बोले- कारोबार के लिए स्थिर, पारदर्शी और भरोसेमंद माहौल जरूरी

    ब्रिक्स बिजनेस फोरम में भारत का ट्रेड प्लान, जयशंकर बोले- कारोबार के लिए स्थिर, पारदर्शी और भरोसेमंद माहौल जरूरी


    नई दिल्ली ।
    ब्रिक्स बिजनेस फोरम में भारत ने सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए स्थिर, पारदर्शी और भरोसेमंद कारोबारी माहौल बनाने पर जोर दिया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए देशों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने ब्रिक्स देशों के बीच मजबूत सप्लाई चेन तैयार करने और अलग-अलग भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की दिशा में काम करने की बात कही।

    एस जयशंकर ने कहा कि ब्रिक्स अपनी सदस्यता, एजेंडे और सहयोग के तरीकों के लिहाज से लगातार विकसित हो रहा है। ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में अस्थिरता और अनिश्चितता बनी हुई है, सदस्य देशों के लिए आर्थिक सहयोग को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि दुनिया बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के दौर से गुजर रही है और जटिल परिस्थितियां वैश्विक व्यवस्था की पहचान बन गई हैं।

    विदेश मंत्री के अनुसार, ब्रिक्स देशों के लिए आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने का अर्थ अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े और प्रतिस्पर्धी बने रहते हुए आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता को मजबूत करना है। इसके लिए कारोबारी व्यवहार को बाजार के वास्तविक सिद्धांतों के अनुरूप बनाए रखना और व्यापारिक साझेदारियों में भरोसे को बढ़ाना जरूरी है।

    उन्होंने विविध व्यापारिक संबंधों, पारदर्शी व्यापार और निवेश व्यवस्था तथा ऐसे कारोबारी वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसका अनुमान लगाया जा सके। उनके मुताबिक, कारोबारियों के लिए स्पष्ट और भरोसेमंद परिस्थितियां तैयार होने से उन्हें नए साझेदार तलाशने, नए बाजारों तक पहुंच बनाने और अलग-अलग देशों की क्षमताओं को व्यावहारिक कारोबारी साझेदारी में बदलने में मदद मिलेगी।

    जयशंकर ने ब्रिक्स देशों के बीच आपूर्ति नेटवर्क को जोड़ने की जरूरत भी बताई। मजबूत सप्लाई चेन तैयार होने से सदस्य देशों के कारोबारियों के लिए आपसी व्यापार और सहयोग के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि देशों को अपनी क्षमताओं को व्यावहारिक कारोबारी साझेदारी में बदलने के लिए समन्वित प्रयास करने चाहिए।

    व्यापार और निवेश में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ निष्पक्ष बाजार व्यवस्था सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया। भारत की ओर से ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में विविधता लाने और आर्थिक सहयोग को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई। इसके साथ ही सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ने का सुझाव भी दिया गया।

    भारत नई दिल्ली में शनिवार और रविवार को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। ब्रिक्स में शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। वर्ष 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को इसमें शामिल किया गया। इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया भी संगठन का सदस्य बना।

    ब्रिक्स के विस्तार के साथ संगठन के भीतर व्यापार और निवेश सहयोग का दायरा भी बढ़ा है। ऐसे में भारत ने सदस्य देशों के कारोबारियों के लिए अधिक बाजारों तक पहुंच, बेहतर सप्लाई नेटवर्क, पारदर्शी व्यापार व्यवस्था और भरोसेमंद कारोबारी माहौल को महत्वपूर्ण आधार के रूप में सामने रखा है। आर्थिक अनिश्चितता के दौर में इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को सदस्य देशों की आर्थिक क्षमता मजबूत करने से जोड़ा गया है।

  • ब्रिक्स में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ी मांग, यूएई और चीन की हिस्सेदारी 88.50 प्रतिशत, नए व्यापार अवसरों पर नजर

    ब्रिक्स में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ी मांग, यूएई और चीन की हिस्सेदारी 88.50 प्रतिशत, नए व्यापार अवसरों पर नजर

    नई दिल्ली ।भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात क्षेत्र ने ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार में मजबूत वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स सदस्य देशों को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 49.27 प्रतिशत बढ़ा। यह वृद्धि देश के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में दर्ज 26.53 प्रतिशत की बढ़ोतरी से काफी अधिक रही। उद्योग जगत को उम्मीद है कि 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद डिजिटल सहयोग और व्यापार सुगमता से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने से निर्यात की रफ्तार और तेज हो सकती है।

    इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कंप्यूटर सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के अनुसार, ब्रिक्स देशों के साथ बढ़ता व्यापार यह संकेत देता है कि डिजिटल और तकनीकी सहयोग को कारोबारी अवसरों में बदलने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। यदि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापार सुगमता से जुड़े प्रस्ताव प्रभावी तरीके से लागू किए जाते हैं, तो भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातकों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है।

    ब्रिक्स देशों में संयुक्त अरब अमीरात और चीन भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के सबसे बड़े आयातक बने हुए हैं। दोनों देशों की संयुक्त हिस्सेदारी ब्रिक्स देशों को भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 88.50 प्रतिशत रही। इससे इन दोनों बाजारों की भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है।

    उत्पादों की श्रेणी में दूरसंचार उपकरण भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का सबसे बड़ा सेगमेंट रहा। ब्रिक्स देशों को होने वाले कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में दूरसंचार उपकरणों की हिस्सेदारी 74.60 प्रतिशत रही। इससे इस क्षेत्र में भारत और ब्रिक्स बाजारों के बीच व्यापार की प्रमुख दिशा भी सामने आती है।

    ब्रिक्स देशों का भारत के कुल वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में लगभग 19.61 प्रतिशत योगदान है। उद्योग के अनुसार, सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग नेटवर्क उपकरणों, डिवाइस सर्टिफिकेशन और साझा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को संचालित करने वाले सॉफ्टवेयर की मांग बढ़ा सकता है।

    भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान डिजिटल सहयोग और व्यापार से जुड़े कई प्रस्तावों को एजेंडे में शामिल किया गया है। उद्योग का मानना है कि इन प्रस्तावों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सदस्य देश उन्हें कितनी तेजी और गंभीरता से लागू करते हैं।

    ब्रिक्स डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर रिपॉजिटरी पर चर्चा और पिछले महीने पुणे में भारत तथा ब्राजील के बीच हुआ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी समझौता इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताए गए हैं। इस समझौते में 5जी, 6जी, ओपन रैन और उपग्रह कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर जोर दिया गया है। ये क्षेत्र भविष्य में ब्रिक्स के डिजिटल सहयोग का आधार बन सकते हैं।

    प्रस्तावित ब्रिक्स ग्लोबल वैल्यू चेन एक्शन प्लान 2026-2030 और एमएसएमई सहयोग पोर्टल को भी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन पहलों से खासतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

    इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए प्रस्तावित ब्रिक्स इनवॉइस डिस्काउंटिंग तंत्र भी महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य एमएसएमई के सामने आने वाली व्यापार वित्तपोषण संबंधी चुनौतियों को कम करना है। उद्योग जगत के मुताबिक, सऊदी अरब, रूस, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे बाजारों में विस्तार की योजना बना रहे भारतीय निर्यातकों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

  • पुतिन की भारत यात्रा में सुरक्षा का कड़ा इंतजाम, बख्तरबंद ऑरस सीनेट कार और विशेष सुरक्षा व्यवस्था चर्चा में

    पुतिन की भारत यात्रा में सुरक्षा का कड़ा इंतजाम, बख्तरबंद ऑरस सीनेट कार और विशेष सुरक्षा व्यवस्था चर्चा में

    नई दिल्ली ।रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में हिस्सा लेने भारत पहुंचे हैं। उनके भारत दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई विशेष इंतजाम किए गए हैं। पुतिन के जमीनी सफर के लिए रूस की खास बख्तरबंद ऑरस सीनेट लिमोजीन का इस्तेमाल किया जाता है। इसे बेहद सुरक्षित वाहन के तौर पर तैयार किया गया है और इसे अक्सर चलते-फिरते बंकर के रूप में बताया जाता है।

    पुतिन की यह खास कार सीधे मॉस्को से लाई जाती है। इसकी सुरक्षा विशेषताओं में रन-फ्लैट टायर और आपात स्थिति के लिए अलग ऑक्सीजन सप्लाई जैसी सुविधाएं शामिल हैं। दी गई जानकारी के अनुसार, यह वाहन स्नाइपर की गोलीबारी, बारूदी सुरंगों और रासायनिक हमलों जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार किया गया है।

    पुतिन की हवाई यात्रा के लिए खास तौर पर संशोधित इल्यूशिन आईएल-96-300पीयू विमान का इस्तेमाल किया जाता है। इसे फ्लाइंग क्रेमलिन के नाम से जाना जाता है। सुरक्षा व्यवस्था में उनके साथ डिकॉय जेट, सुरक्षित कमांड सिस्टम और उन्नत मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी शामिल बताए गए हैं।

    भारत में पुतिन की सुरक्षा की जिम्मेदारी रूस की फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस यानी एफएसओ और भारत के आतंकवाद-रोधी बलों के बीच समन्वय से संभाली जा रही है। जमीन पर राष्ट्रपति की सुरक्षा के सबसे अंदरूनी घेरे में रूसी प्रेसिडेंशियल सिक्योरिटी सर्विस के विशेष अधिकारी तैनात रहते हैं। इन अधिकारियों को एफएसओ की एडवांस्ड टीमें सहयोग देती हैं।

    रूसी सुरक्षा दल उन सभी स्थानों की जांच करता है, जहां पुतिन के जाने का कार्यक्रम होता है। इसके साथ ही रूसी प्रतिनिधिमंडल अपने लॉजिस्टिक्स पर भी नियंत्रण बनाए रखता है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत पुतिन के साथ निजी शेफ और खाने-पीने की चीजों की जांच के लिए पोर्टेबल लैब जैसी सुविधाएं भी रखी जाती हैं।

    ऑपरेशनल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए चुनिंदा होटलों में डमी वीआईपी यानी नकली वीआईपी की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। इसके अलावा जैविक कचरे के निपटारे से जुड़े प्रोटोकॉल भी सुरक्षा इंतजाम का हिस्सा बताए गए हैं।

    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मद्देनजर दिल्ली, एयरोसिटी और गुरुग्राम के चुने गए होटलों में भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है। प्रत्येक होटल को अलग सुरक्षित क्षेत्र के रूप में व्यवस्थित किया गया है। इन स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था में कानून लागू करने वाली एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की भूमिका है।

    हर होटल में डीसीपी रैंक के अधिकारी को वेन्यू कमांडर बनाया गया है, जबकि बड़े क्षेत्रों की निगरानी स्पेशल कमिश्नर रैंक के अधिकारी कर रहे हैं। होटल के भीतर दो कमरों को ऑपरेशनल कमांड हब में बदला गया है। ये दिल्ली पुलिस के सेंट्रल सी4आई कमांड नोड से जुड़े हैं और आपात स्थिति के प्रबंधन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

    होटलों की बाहरी दीवारों और हॉलवे पर एडवांस्ड एआई कैमरे लगाए गए हैं। इनमें घुसपैठ का पता लगाने और लोगों की गतिविधियों को पहचानने वाला सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया जाता है। दीवार फांदने या रेंगने जैसी असामान्य गतिविधियों की पहचान भी इन कैमरों के जरिए की जा सकती है।

    होटल कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांच भी की गई है। उन्हें डिजिटल की-कार्ड के जरिए केवल निर्धारित मंजिलों तक पहुंच की अनुमति दी गई है। इस तरह पुतिन की भारत यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था विमान, वाहन, होटल और उनके निर्धारित कार्यक्रम वाले स्थानों तक कई स्तरों में व्यवस्थित की गई है।

  • ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पीयूष गोयल और एस. जयशंकर ने व्यापार नियम सरल करने, बाजार खोलने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की बात कही

    ब्रिक्स बिजनेस फोरम में पीयूष गोयल और एस. जयशंकर ने व्यापार नियम सरल करने, बाजार खोलने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की बात कही

    नई दिल्ली । दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम की बैठक में भारत ने ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलते वैश्विक व्यापारिक और राजनीतिक माहौल के बीच सदस्य देशों के लिए आपसी सहयोग बढ़ाने को महत्वपूर्ण बताया।

    बैठक के दौरान पीयूष गोयल ने कहा कि ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था में व्यापार की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स देशों में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है और ये देश वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। दुनिया के कुल व्यापार में भी ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत बताई गई।

    गोयल ने भारत की व्यापारिक क्षमताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत बड़ी मात्रा में इंजीनियरिंग सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स दूसरे देशों को भेजता है। दवाओं के क्षेत्र में भी भारत की मजबूत स्थिति है और वह ब्रिक्स देशों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने वाला भरोसेमंद देश बन सकता है।

    केंद्रीय मंत्री ने ब्रिक्स के सदस्य और साझेदार देशों से अपने बाजारों तक पहुंच आसान बनाने की अपील की। उनका कहना था कि केवल टैक्स कम करने से व्यापार में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होगी। इसके साथ ही सामान के आयात-निर्यात से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं को भी सरल बनाने की आवश्यकता है।

    गोयल ने कहा कि कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए सामान की मंजूरी की प्रक्रिया में कम समय लगना चाहिए। उनका मानना है कि यदि व्यापार से जुड़ी प्रक्रियाएं आसान होंगी और मंजूरी में तेजी आएगी तो कंपनियों के लिए अलग-अलग ब्रिक्स देशों के बाजारों में कारोबार करना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

    बैठक में सप्लाई चेन को मजबूत बनाने का मुद्दा भी प्रमुख रहा। गोयल ने कच्चे माल और जरूरी खनिजों के लिए अलग-अलग देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की जरूरत बताई। बदलते वैश्विक हालात के बीच आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत और अधिक भरोसेमंद बनाने को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी ब्रिक्स देशों के बीच मिलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के संस्थागत सहयोग के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं और यह संगठन के लिए महत्वपूर्ण समय है। उनके अनुसार, इन वर्षों में ब्रिक्स के सदस्य, इसके काम और चर्चा के मुद्दों में बदलाव आया है।

    जयशंकर ने कहा कि दुनिया इस समय राजनीतिक तनाव, महामारी और मौसम में बदलाव जैसी कई बड़ी चुनौतियों से गुजर रही है। इन परिस्थितियों का असर कारोबार पर भी पड़ रहा है। ऐसे समय में देशों को तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को तैयार करना होगा।

    विदेश मंत्री ने डिजिटल तकनीक के बढ़ते महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई तकनीक कारोबार करने के तरीकों को बदल रही है। डिजिटल सुविधाओं के विस्तार से कंपनियों का काम तेजी से हो सकता है और उत्पादन बढ़ाने के साथ आर्थिक विकास के नए अवसर भी सामने आ सकते हैं।

    बैठक में भारत का मुख्य संदेश ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को आसान बनाने पर केंद्रित रहा। बाजारों तक पहुंच सरल करने, व्यापार नियमों को सुगम बनाने, सामान की मंजूरी में तेजी लाने और सप्लाई चेन मजबूत करने को आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

  • पीयूष गोयल ने ब्रिक्स देशों से बाजार खोलने, नियामकीय प्रक्रियाएं सरल करने और निर्बाध व्यापार को बढ़ावा देने की अपील की

    पीयूष गोयल ने ब्रिक्स देशों से बाजार खोलने, नियामकीय प्रक्रियाएं सरल करने और निर्बाध व्यापार को बढ़ावा देने की अपील की

    नई दिल्ली ।वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक एकीकरण को और मजबूत करने के लिए सदस्य देशों से अपने बाजार अधिक खोलने की अपील की है। उन्होंने नियामकीय प्रक्रियाओं को आसान बनाने और व्यापारिक खेपों की तेज मंजूरी की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया। गोयल ने यह बात शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कही।

    केंद्रीय मंत्री ने खास तौर पर सेवा क्षेत्र के बाजारों को अधिक खोलने की जरूरत बताई। उन्होंने ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधियों से एक-दूसरे के लिए सेवा बाजार खोलने का आह्वान किया। उनके अनुसार, सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को केवल मौजूदा स्तर तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापार और नवाचार के क्षेत्र में और आगे बढ़ाने की जरूरत है।

    गोयल ने संयुक्त नवाचार को नया मानदंड बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने ब्रिक्स देशों से एक-दूसरे के उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने की अपील की। उनका जोर ऐसे आर्थिक सहयोग पर रहा, जिससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक अवसर बढ़ सकें और आपसी आर्थिक एकीकरण को मजबूती मिल सके।

    केंद्रीय मंत्री ने ब्रिक्स देशों के कृषि-तकनीक यानी एग्री-टेक स्टार्टअप्स के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में मिलकर काम करने से किसानों के लिए समाधान विकसित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, इससे लोगों की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयासों को भी समर्थन मिल सकता है।

    वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने भी ब्रिक्स देशों की आर्थिक ताकत को ठोस कारोबारी परिणामों में बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को व्यावहारिक कारोबारी उपलब्धियों में बदलना महत्वपूर्ण है।

    जितिन प्रसाद के अनुसार, प्राथमिकताओं में बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी और नवाचार को बढ़ावा देना, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना, सदस्य देशों के बीच संतुलित व्यापार सुनिश्चित करना और सेवा क्षेत्र में साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना शामिल है।

    भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जा रही है। भारत की 2026 की अध्यक्षता का मार्गदर्शन “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” थीम से हो रहा है। इस थीम के तहत मौजूदा उपलब्धियों और संस्थागत प्रभावशीलता को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।

    भारत की अध्यक्षता में विकास, स्थिरता और नवाचार को एजेंडे के केंद्र में रखा गया है। साथ ही, ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को भी प्रमुखता दी जा रही है। भारत ब्रिक्स को एक रचनात्मक और समाधान-केंद्रित मंच के रूप में और मजबूत करने पर जोर दे रहा है।

    वर्तमान में ब्रिक्स में 11 देश शामिल हैं। इनमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। ये देश सामूहिक रूप से दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • BRICS Summit 2026 में शामिल होने भारत आएंगे शी जिनपिंग, पीएम मोदी के निमंत्रण पर 12-13 सितंबर को होगा दौरा

    BRICS Summit 2026 में शामिल होने भारत आएंगे शी जिनपिंग, पीएम मोदी के निमंत्रण पर 12-13 सितंबर को होगा दौरा

    नई दिल्ली ।चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत दौरे पर आएंगे। चीन के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को उनके दौरे की जानकारी दी। शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को भारत में आयोजित होने वाले BRICS सम्मेलन में शामिल होंगे। करीब सात साल बाद उनका भारत दौरा होने जा रहा है।

    शी जिनपिंग का यह दौरा भारत और चीन के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2020 में गलवान की घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की यह पहली आमने-सामने की द्विपक्षीय मुलाकात होगी। इससे पहले दोनों नेता किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान एक ही मंच पर नजर आए थे। उस दौरान दोनों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया था, लेकिन उनके बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक नहीं हुई थी।

    शी जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में भारत आए थे। तब उन्होंने तमिलनाडु के मामल्लपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई थी। इससे पहले वर्ष 2016 में शी जिनपिंग गोवा में आयोजित BRICS सम्मेलन में शामिल होने भारत पहुंचे थे। सितंबर 2014 में उन्होंने पहली बार भारत का दौरा किया था। उस समय भी प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच कई अहम विषयों पर चर्चा हुई थी।

    शी जिनपिंग का आगामी दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और चीन अपने संबंधों में आई दूरी को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव की स्थिति रही है। अब दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की प्रस्तावित मुलाकात से भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    नई दिल्ली में 11 से 13 सितंबर तक BRICS सम्मेलन आयोजित होगा। इस बैठक में कई देशों के प्रमुख नेता शामिल होंगे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के सम्मेलन में पहुंचने की पुष्टि हो चुकी है।

    BRICS बैठक में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की स्थिति भी बैठक में चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल हो सकती है।

    सम्मेलन में विकासशील देशों की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव जैसे मुद्दों पर भी विचार-विमर्श होने की उम्मीद है। ऐसे में शी जिनपिंग की भारत यात्रा और BRICS बैठक में उनकी भागीदारी दोनों देशों के बीच संबंधों से जुड़े घटनाक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी।

  • भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 में नई दिल्ली का फोकस, समावेशी वैश्विक व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की आवाज पर जोर

    भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 में नई दिल्ली का फोकस, समावेशी वैश्विक व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की आवाज पर जोर

    नई दिल्ली ।कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले आर्थिक शब्द के रूप में सामने आया ब्रिक्स अब चार महाद्वीपों तक फैले प्रभावशाली भू-राजनीतिक समूह का रूप ले चुका है। नए सदस्य देशों के जुड़ने के साथ इसकी आर्थिक और रणनीतिक ताकत में लगातार विस्तार हुआ है। वर्ष 2026 में संगठन की अध्यक्षता भारत के पास है और नई दिल्ली इसे अधिक समावेशी, प्रभावी तथा समाधान-केंद्रित मंच बनाने की दिशा में काम कर रही है।

    ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक नीतियों के समन्वय का महत्वपूर्ण मंच बन गया है। सदस्य देश यहां वैश्विक शासन, विकास, व्यापार और आर्थिक सुधारों से जुड़े मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करते हैं। लगातार संवाद और सहयोग के जरिए संगठन ने वैश्विक दक्षिण की आवाज को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाई है।

    भारत की 2026 की अध्यक्षता “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी” विषय पर केंद्रित है। इसी थीम के तहत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जाएगी। भारत का लक्ष्य संगठन की संस्थागत क्षमता को मजबूत करना, विकास और नवाचार को प्राथमिकता देना तथा वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में प्रमुख स्थान दिलाना है।

    वर्तमान में ब्रिक्स में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात सहित 11 सदस्य देश हैं। ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे संगठन की आर्थिक और जनसांख्यिकीय पहुंच का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    ब्रिक्स के विस्तार का बड़ा चरण जनवरी 2024 में आया, जब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया 11वां पूर्ण सदस्य बना। इन देशों के शामिल होने से संगठन का प्रभाव एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक और व्यापक हुआ।

    विस्तार के साथ ब्रिक्स में पार्टनर कंट्री श्रेणी भी बनाई गई। वर्ष 2025 के दौरान बेलारूस, बोलिविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम इस ढांचे से जुड़े। इससे संगठन की पहुंच और प्रभाव क्षेत्र में और विस्तार हुआ।

    समय के साथ ब्रिक्स का एजेंडा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, कृषि, श्रम एवं रोजगार, दूरसंचार, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियां भी इसके प्रमुख विषयों में शामिल हैं।

    ब्रिक्स विश्व व्यापार संगठन और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व तथा संतुलित भागीदारी की वकालत करता है। इसके प्रयासों का उद्देश्य वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाना तथा बदलती वैश्विक चुनौतियों के प्रति उसे अधिक उत्तरदायी बनाना है।

  • अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    नई दिल्ली । इंडिया टुडे के BRICS Roundtable में नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, क्लीन टेक्नोलॉजी और भारत की औद्योगिक क्षमता पर विस्तार से विचार रखे. उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अमेरिका और चीन दोनों पक्षों के साथ संतुलित रणनीति बनाकर काम करना अनिवार्य है.

    अमिताभ कांत के अनुसार, क्लीन टेक्नोलॉजी के लगभग सभी प्रमुख वर्टिकल्स में चीन का दबदबा है. दुनिया की करीब 95% क्लीन बैटरियां और 85% इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) चीन में बनते हैं. इसके अलावा, क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग तकनीक के साथ-साथ सोलर सेक्टर पर करीब 80% और विंड एनर्जी में 77% नियंत्रण चीन का ही है.

    दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के बाजार में अमेरिका का बड़ा प्रभाव है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का आयात करता है, जिस पर सालाना लगभग 180 अरब डॉलर का खर्च आता है. पश्चिम एशिया में तनाव या युद्ध की स्थिति बनते ही कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, जिससे भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिरता और पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है.

    देश हित में चीन के साथ काम करना क्यों है जरूरी?

    ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को भविष्य में तेजी से क्लीन टेक्नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ना होगा. ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित में चीन के साथ तकनीकी स्तर पर सहभागिता बनाना जरूरी है, लेकिन चीन को इस तकनीक को ‘वेपनाइज’ बनाने से रोकना होगा. चीन को यह तकनीक BRICS देशों और ग्लोबल साउथ के साथ साझा करनी चाहिए.

    चीन के नॉन-टैरिफ बैरियर्स और बाजार की असमानता

    चीन की नीति मुख्य रूप से निर्यात पर केंद्रित है, जबकि वह दूसरे देशों के आयात के लिए अपना बाजार आसानी से नहीं खोलता. चीन में मौजूद नॉन-टैरिफ बैरियर्स के कारण भारत के फार्मास्यूटिकल और ड्रग मैन्युफैक्चरर्स वहां आसानी से प्रवेश नहीं कर पाते. आगामी BRICS शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत को चीन के सामने अपने बाजारों को खोलने और क्लीन टेक साझा करने का मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए.

    अमिताभ कांत ने कहा कि क्लीन टेक्नोलॉजी में किसी एक देश का अत्यधिक नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ग्लोबल साउथ के देशों के सतत विकास के लिए तकनीक, निवेश और बाजारों का आपस में साझा होना जरूरी है, ताकि एकाधिकार की स्थिति से बचा जा सके.

    भारत की आर्थिक वृद्धि पर बात करते हुए उन्होंने एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत में नई औद्योगिक क्रांति की बात कही गई है. इसके पीछे स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और एयरोस्पेस जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स की मुख्य भूमिका है.

    भारत में औद्योगिक वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सरकार ने उन क्षेत्रों को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खोल दिया है, जिन पर पहले सरकारी नियंत्रण था. जियो-स्पेशियल, ड्रोन, स्पेस और डिफेंस सेक्टर्स में निजी भागीदारी और स्टार्टअप्स के आने से नई तकनीक, निवेश और प्रतिस्पर्धा को बड़ा प्रोत्साहन मिला है.

    डिजाइनिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर भारत का फोकस

    भारत अब केवल तकनीक और चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी बढ़ा रहा है. सेमीकंडक्टर PLI योजना की सफलता और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में आई तेजी इसका प्रमाण हैं. भारत का लक्ष्य घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ ग्लोबल सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनना है.

    BRICS देश दुनिया की कुल GDP का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं. अमिताभ कांत ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी अध्यक्षता के दौरान संगठन का ध्यान राजनीतिक ध्रुवीकरण या ‘पश्चिम-विरोधी’ रुख पर ले जाने के बजाय व्यापार, निवेश, जलवायु और विकास जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए.

    पश्चिम एशिया के तनाव और विभिन्न सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच भारत को ‘कंसेंसस बिल्डिंग’ की भूमिका निभानी होगी. जैसा कि भारत ने G20 सम्मेलन में संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाकर दिखाया था, वैसा ही नेतृत्व BRICS में भी दिखाकर सभी देशों को एक न्यूनतम साझा एजेंडे पर साथ लाना होगा.

  • भारत के न्योते पर बांग्लादेश की चुप्पी से बढ़ी हलचल, शेख हसीना प्रत्यर्पण और चीन से बढ़ती नजदीकी पर नजर

    भारत के न्योते पर बांग्लादेश की चुप्पी से बढ़ी हलचल, शेख हसीना प्रत्यर्पण और चीन से बढ़ती नजदीकी पर नजर


    नई दिल्ली ।
    बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आएंगे या नहीं, इसे लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है। भारत में 12-13 सितंबर के बीच ब्रिक्स बैठक होनी है। लगभग सभी देश इसमें शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश के शिखर सम्मेलन से दूरी बनाने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब शेख हसीना के प्रत्यर्पण और तीस्ता नदी के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। साथ ही बांग्लादेश में चीन के बढ़ते दखल के भी संकेत मिल रहे हैं। भारत अब तक बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली आने का दो बार न्योता दे चुका है।

    बुधवार को बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलील-उर-रहमान पत्रकारों से बात कर रहे थे। इस दौरान उनसे पीएम रहमान के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने को लेकर सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही उन्होंने चुप्पी साध ली और विषय बदलने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वह वहां अपने देश के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं हैं और उनसे महासभा के अध्यक्ष के रूप में ही सवाल किए जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई द्विपक्षीय मुद्दा है तो वह विदेश मंत्री के तौर पर उस पर अलग से बात कर सकते हैं।

    भारत का न्योता

    भारत ने रहमान को BIMSTEC शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भी बुलाया है। इसमें भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, बांग्लादेश, म्यांमा, नेपाल और भूटान शामिल हैं। हालांकि, भारत की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि रहमान के आने की अभी कोई पुष्टि नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसकी जानकारी दी थी।

    इससे पहले जब रहमान प्रधानमंत्री बने, तब भारत ने उन्हें नई दिल्ली आने का न्योता दिया था। हालांकि, उस समय भी उनकी यात्रा की पुष्टि नहीं हुई थी और ऐसी खबरें सामने आई थीं कि रहमान चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं। वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने यात्रा उस समय के लिए टाल दी थी। बाद में वह म्यांमार और बीजिंग पहुंचे थे।

    एक ओर बांग्लादेश भारत के सामने अपनी शर्तें रख रहा है, वहीं बैठकों में डीजल सप्लाई बढ़ाने समेत कई तरह की मदद भी मांग रहा है।

    किस मूड में है बांग्लादेश

    अगस्त में बांग्लादेश ने कहा था कि प्रधानमंत्री को भारत यात्रा की कोई जल्दी नहीं है। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा था कि अगर राष्ट्रीय हितों के आधार पर किसी समझौते पर पहुंचा जाता है तो अगले सप्ताह या उसके अगले सप्ताह यात्रा हो सकती है। उन्होंने कहा था कि इसे लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। इससे पहले भी बांग्लादेश ने कहा था कि रहमान की यात्रा के लिए भारत को अनुकूल माहौल बनाना होगा।

    क्या शेख हसीना हैं वजह

    साल 2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई थीं। बाद में जब 2026 में रहमान सरकार ढाका में आई, तो उनके प्रत्यर्पण की मांग तेज हो गई। हाल ही में एक और मंत्री जाहिद उर रहमान ने कहा है कि हसीना को भारत से लेकर आएंगे और उन्हें फांसी दे दी जाएगी। हालांकि, इससे पहले बांग्लादेश सरकार ने कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री को सभी कानूनी सहायता और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    प्रत्यर्पण के मुद्दे पर पहले से तनावपूर्ण रिश्ते तब और खराब हुए, जब हसीना ने भारत में रहते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बांग्लादेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले ही इस पर आपत्ति जताई थी और बाद में अपना रुख और सख्त कर लिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

    क्या चीन है कारण

    जून में तारिक रहमान चीन की यात्रा पर पहुंचे थे और इस दौरान बांग्लादेश की ओर से बीजिंग से निवेश मांगने की खबरें सामने आई थीं। यात्रा के दौरान कई द्विपक्षीय समझौते भी हुए थे। बांग्लादेश ने बीजिंग से तीस्ता नदी के मुद्दे पर मदद मांगी थी। इसके अलावा मोंगला पोर्ट पर SEZ यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाए जाने से जुड़ी डील भी चर्चा में रही थी। ढाका के इन कदमों को भारत बारीकी से देख रहा था।

  • नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन, पुतिन-मोदी मुलाकात में भारत-रूस सहयोग और वैश्विक हालात पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन, पुतिन-मोदी मुलाकात में भारत-रूस सहयोग और वैश्विक हालात पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के दौरान भारत और रूस के बीच उच्चस्तरीय संपर्क भी देखने को मिलेगा। पुतिन 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। इस मुलाकात में दोनों देशों के आपसी संबंधों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

    रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा की पुष्टि क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मंगलवार को की। उन्होंने कहा कि पुतिन कुछ ही दिनों में भारत की यात्रा शुरू करेंगे। पेसकोव के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच लंबे समय से करीबी और व्यावहारिक संबंध रहे हैं। दोनों नेता द्विपक्षीय एजेंडे से जुड़े संवेदनशील विषयों पर भी खुले और रचनात्मक तरीके से बातचीत करने में सक्षम हैं।

    रूस की ओर से पुतिन की इस यात्रा को भारत के साथ सहयोग को आगे बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, तकनीक और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की बैठक में द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने के उपायों पर विचार किया जा सकता है।

    18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होगा। भारत इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसने समूह के लिए लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर आधारित व्यापक प्राथमिकताएं तय की हैं। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा।

    ब्रिक्स सहयोग को रूस मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित मानता है। इनमें राजनीति और सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वित्त तथा सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग शामिल हैं। रूस समूह के विस्तार और अलग-अलग प्रारूपों में नए देशों की भागीदारी को भी समर्थन देता रहा है। ऐसे में सम्मेलन में ब्रिक्स के भविष्य और वैश्विक स्तर पर इसकी भूमिका से जुड़े मुद्दे भी अहम रह सकते हैं।

    पुतिन और मोदी की इससे पहले 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में मुलाकात हुई थी। दोनों नेता शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन से इतर मिले थे। उस बातचीत के दौरान रूस और भारत के संबंधों को लगातार मजबूत बताते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई थी।

    बिश्केक बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का रुख भी स्पष्ट किया था। उन्होंने शत्रुता समाप्त करने और शांति की दिशा में प्रयासों को समर्थन देने की बात कही थी। भारत लगातार यह रुख दोहराता रहा है कि संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए।

    इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि 2026 में संगठन की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारत की अध्यक्षता के दौरान व्यापार, कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, शहरी विकास, स्टार्टअप और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पुतिन की मौजूदगी से सम्मेलन में भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ ब्रिक्स के व्यापक एजेंडे को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।