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  • BRICS सम्मेलन में भारत-चीन के बीच कारोबार पर अहम बातचीत, तकनीक और निवेश से जुड़ी अड़चनें उठाएगा भारत

    BRICS सम्मेलन में भारत-चीन के बीच कारोबार पर अहम बातचीत, तकनीक और निवेश से जुड़ी अड़चनें उठाएगा भारत

    नई दिल्ली । में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन से पहले भारत और चीन के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत अहम हो सकती है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है और उनके साथ बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। ऐसे में भारत चीन से आने वाली हाईटेक वस्तुओं के आयात में आ रही अड़चनों और चीन में भारतीय कंपनियों के निवेश से जुड़े प्रतिबंधों का मुद्दा उठा सकता है।

    भारत सरकार की ओर से चीनी तकनीक और महत्वपूर्ण सामान के आयात से जुड़ी परेशानियों पर उद्योग संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है। सरकार ने चीन की ओर से प्रमुख तकनीकी उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों का भी अध्ययन किया है। भारतीय उद्योग जगत का मानना है कि इन प्रतिबंधों का असर देश की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

    चीन की ओर से कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात संबंधी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें इंगट और वेफर तकनीक, बैटरी सेल और उससे जुड़ी तकनीक, हाई वोल्टेज डायरेक्ट करंट यानी HVDC उपकरण तथा कुछ विशेष ट्रांसमिशन कंपोनेंट्स शामिल हैं। HVDC तकनीक लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने में महत्वपूर्ण होती है और इससे ट्रांसमिशन के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है। यह रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से जोड़ने और बिजली व्यवस्था को स्थिर रखने में भी उपयोगी मानी जाती है।

    भारत की चिंता यह है कि महत्वपूर्ण तकनीक और कच्चे माल की आपूर्ति में लगातार अड़चनें आने से घरेलू विनिर्माण को नुकसान हो सकता है। इससे बैकवर्ड इंटीग्रेशन की प्रक्रिया भी प्रभावित होने की आशंका है। भारत बातचीत के दौरान प्रक्रियागत बाधाओं और सोर्सिंग से जुड़े नियमों में राहत के साथ पारस्परिकता का मुद्दा उठा सकता है, यानी दोनों देशों की कंपनियों को समान स्तर की सुविधा मिले।

    हालांकि भारत-चीन व्यापार की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि में चीन को भारत का निर्यात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 28 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 5.55 अरब डॉलर हो गया। अमेरिकी टैरिफ के कारण कुछ क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित होने के बीच चीन को बढ़े निर्यात ने भारत को कुछ राहत दी।

    भारत और चीन के संबंधों में हाल के महीनों में कुछ नरमी भी दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली, नाथू ला के रास्ते सीमा व्यापार फिर शुरू होना और लोगों के बीच संपर्क बढ़ना इसी बदलाव के संकेत हैं। इसके अलावा, लैंड बॉर्डर साझा करने वाले देशों से FDI से जुड़े नियमों में भी कुछ बदलाव किए गए हैं।

    बिजली क्षेत्र में भी भारत ने चीन के साथ कुछ मामलों में नियमों में ढील दी है। मार्च में सरकारी बिजली उपकरण कंपनी BHEL को चीन से 21 महत्वपूर्ण वस्तुओं की खरीद पांच साल तक करने की अनुमति दी गई। जून में भारत में कारखाने रखने वाली चार चीनी बिजली उपकरण कंपनियों को महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाओं से जुड़े सरकारी टेंडरों में भाग लेने की अनुमति मिली।

    2020 में LAC पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद चीनी कंपनियों के लिए सरकारी खरीद और निवेश से जुड़े नियम कड़े किए गए थे। अब कुछ क्षेत्रों में सीमित राहत से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में व्यावहारिक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।

    BRICS सम्मेलन भारत-चीन के बीच इन आर्थिक मुद्दों पर उच्चस्तरीय बातचीत का अवसर बन सकता है। भारत की प्राथमिकता हाईटेक सामान और जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति आसान कराने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए चीन में निवेश का माहौल बेहतर करना हो सकती है। ऐसे में शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर होने वाली बातचीत पर खास नजर रहेगी।

  • सीजेआई सूर्यकांत ने ब्रिक्स देशों में कारोबारी विवाद निपटाने के लिए मध्यस्थता और सुलह का साझा मंच बनाने का प्रस्ताव दिया

    सीजेआई सूर्यकांत ने ब्रिक्स देशों में कारोबारी विवाद निपटाने के लिए मध्यस्थता और सुलह का साझा मंच बनाने का प्रस्ताव दिया

    नई दिल्ली ।ब्रिक्स देशों के बीच न्यायिक सहयोग को मजबूत करने और व्यापार तथा निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार करने की दिशा में भारत ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने ब्रिक्स चीफ जस्टिस फोरम में वाणिज्यिक विवादों के समाधान के लिए मध्यस्थता और सुलह का साझा मंच बनाने की जरूरत बताई।

    शुक्रवार को आयोजित फोरम में ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ सहयोगी देशों के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान न्यायपालिका की भूमिका को केवल अदालती मामलों के निपटारे तक सीमित रखने के बजाय देशों के बीच सहयोग और आपसी संबंधों को मजबूत करने के व्यापक माध्यम के रूप में देखने पर जोर दिया गया।

    जस्टिस सूर्यकांत ने फोरम के दौरान विभिन्न देशों के न्यायिक प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। इन बैठकों में न्यायिक सहयोग से जुड़े समझौतों, व्यापारिक और कॉरपोरेट विवादों के समाधान तथा मध्यस्थता और सुलह-समझौते जैसे वैकल्पिक विवाद निपटारा तरीकों पर चर्चा हुई।

    वाणिज्यिक गतिविधियों के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को देखते हुए अलग-अलग देशों की न्यायिक व्यवस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीमा पार कारोबार में विवाद उत्पन्न होने पर उनके शीघ्र और प्रभावी समाधान से कंपनियों तथा निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। इसी संदर्भ में साझा मध्यस्थता और सुलह मंच का प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    फोरम में विदेशी निवेशकों के विश्वास को मजबूत करने के लिए कुशल वाणिज्यिक अदालतों की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। कारोबार से जुड़े विवादों का समयबद्ध निपटारा निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही विभिन्न देशों में दिए गए न्यायिक फैसलों और आदेशों को आपसी स्तर पर मान्यता देने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।

    बैठकों में न्यायिक सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए समझौता ज्ञापनों की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। इसका उद्देश्य न्यायिक संस्थानों के बीच संवाद और अनुभव साझा करने की प्रक्रिया को मजबूत करना है। न्यायिक अधिकारियों के बीच नियमित संपर्क से अलग-अलग देशों की कानूनी व्यवस्थाओं और विवाद समाधान प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिल सकती है।

    फोरम के दौरान प्रोफेशनल एक्सचेंज कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का मुद्दा भी सामने आया। इसके लिए भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी जैसे संस्थानों के इस्तेमाल की संभावनाओं पर चर्चा हुई। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए विभिन्न देशों के न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण, अनुभव और कार्यप्रणाली साझा करने का अवसर मिल सकता है।

    ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और निवेश लगातार सहयोग का प्रमुख क्षेत्र रहा है। ऐसे में कारोबारी विवादों के निपटारे के लिए प्रभावी न्यायिक तंत्र आर्थिक संबंधों को सुगम बनाने में मदद कर सकता है। मध्यस्थता और सुलह जैसे तरीकों से लंबे समय तक चलने वाली अदालती प्रक्रिया के विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।

    तीन दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन जस्टिस सूर्यकांत ने रूस, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, बेलारूस, कजाकिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान के न्यायिक अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों में न्यायिक सहयोग के साथ व्यापार, कॉरपोरेट विवाद और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण जैसे विषय प्रमुख रहे।

    फोरम के प्रस्तावों का व्यापक उद्देश्य ब्रिक्स देशों की न्यायिक व्यवस्थाओं के बीच सहयोग बढ़ाना और कारोबारी संबंधों को अधिक भरोसेमंद कानूनी आधार देना है। साझा विवाद समाधान व्यवस्था पर आगे की चर्चा से विभिन्न देशों के बीच व्यापारिक विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में रास्ता खुल सकता है।

  • भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    नई दिल्ली ।भारत सोमवार 17 अगस्त को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह यानी ईडब्ल्यूजी के वरिष्ठ अधिकारियों तथा जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की बैठक की मेजबानी करेगा। भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित इस बैठक में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच चर्चा होगी।

    बैठक की शुरुआत वरिष्ठ अधिकारियों के उद्घाटन सत्र से होगी। इसके बाद ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह और जलवायु परिवर्तन तथा सतत विकास पर संपर्क समूह की प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। चर्चा का प्रमुख उद्देश्य सदस्य देशों के बीच पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर साझा समझ विकसित करना और सहयोग को और मजबूत करना होगा।

    इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मंगलवार को ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की 12वीं बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें सदस्य देशों के पर्यावरण मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भाग लेंगे। दोनों बैठकों के माध्यम से पर्यावरणीय चुनौतियों पर सामूहिक दृष्टिकोण तैयार करने का प्रयास किया जाएगा।

    भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए इस बार की व्यापक थीम ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रखी गई है। पर्यावरण क्षेत्र में इस थीम के तहत सदस्य देशों के बीच ऐसे क्षेत्रों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा, जिनका संबंध जलवायु परिवर्तन से निपटने, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से है।

    बैठक में अंतिम दस्तावेज से जुड़े संभावित परिणामों पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा पर्यावरण से संबंधित अन्य प्राथमिक विषयों पर विचार किया जाएगा। इन चर्चाओं के जरिए ब्रिक्स देशों के बीच साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक कार्रवाई को मजबूत करने की दिशा में सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह की स्थापना वर्ष 2015 में मॉस्को में हुई पहली ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियमित रूप से सहयोग करने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था। इसके माध्यम से देश अपने अनुभव साझा करने, प्रभावी कार्यप्रणालियों को एक-दूसरे तक पहुंचाने और संयुक्त पर्यावरणीय कार्रवाई को मजबूत करने पर काम करते रहे हैं।

    वहीं जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की स्थापना वर्ष 2024 में की गई थी। इसका उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर सहयोग के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार करना है। यह समूह जलवायु संबंधी प्राथमिकताओं पर संवाद और समन्वय को बढ़ावा देने की दिशा में काम करता है।

    नई दिल्ली में होने वाली बैठक ऐसे समय आयोजित हो रही है जब जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास वैश्विक नीति विमर्श के प्रमुख विषय बने हुए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से साझा नीतिगत अनुभवों और व्यावहारिक उपायों के आदान-प्रदान को गति मिलने की उम्मीद है। बैठकों में होने वाली चर्चा आगे की सामूहिक प्राथमिकताओं और सहयोग के क्षेत्रों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान सितंबर में भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। वह नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। भारत वर्ष 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी के तहत राजधानी में इस महत्वपूर्ण बहुपक्षीय बैठक का आयोजन किया जा रहा है।

    पेजेशकियान की प्रस्तावित भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में ईरानी राष्ट्रपति का नई दिल्ली पहुंचना भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच पारंपरिक रूप से ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर संबंध रहे हैं।

    भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS सम्मेलन की थीम ‘बिल्डिंग फॉर रिजीलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनिबिलिटी’ रखी गई है। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग, वैश्विक शासन व्यवस्था, विकास, तकनीक और साझा चुनौतियों से जुड़े विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की भागीदारी से पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियां भी बैठक के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकती हैं।

    ईरान वर्ष 2024 में BRICS का पूर्ण सदस्य बना था। उसके साथ मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात भी संगठन के पूर्ण सदस्य बने थे। ईरान के शामिल होने के बाद BRICS का दायरा पश्चिम एशिया तक भी व्यापक हुआ है। भारत और ईरान दोनों के लिए संगठन के मंच पर आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर बढ़े हैं।

    मसूद पेजेशकियान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली महत्वपूर्ण मुलाकात अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस समय दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक भी हुई थी। बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों के साथ क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी।

    पेजेशकियान की आगामी भारत यात्रा के दौरान भी द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बातचीत की संभावना बनी हुई है। दोनों देशों के बीच व्यापार, चाबहार बंदरगाह, संपर्क परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत के लिए ईरान के साथ संपर्क बनाए रखना पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुंच के दृष्टिकोण से भी उपयोगी माना जाता है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की संभावित कूटनीतिक भूमिका भी चर्चा का विषय बन सकती है। जून में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के लिए भारत आए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा था कि नई दिल्ली क्षेत्रीय संकट को कम करने में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।

    ईरानी पक्ष का रुख रहा है कि संघर्ष का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से होना चाहिए। ऐसे में पेजेशकियान की नई दिल्ली यात्रा BRICS के बहुपक्षीय मंच के साथ-साथ भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संवाद का अवसर भी प्रदान कर सकती है।

    भारत की BRICS अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन ऐसे दौर में आयोजित हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति में पश्चिम एशिया का संकट, व्यापारिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। ईरानी राष्ट्रपति की भागीदारी से सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा को अतिरिक्त महत्व मिलने की संभावना है।

  • भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।

    भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।


    नई दिल्ली । 
    भारत की ओर से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को दिए गए दो अलग-अलग आधिकारिक निमंत्रणों पर पड़ोसी देश की ओर से अभी तक कोई अंतिम प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ढाका की ओर से संकेत दिए गए हैं कि प्रस्तावित भारत यात्रा का अंतिम ढांचा प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम और दोनों देशों के बीच जारी द्विपक्षीय बातचीत की प्रगति पर निर्भर करेगा।

    भारत ने सितंबर महीने में आयोजित होने जा रहे आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के विशेष सत्र के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया है। इसके अतिरिक्त एक पृथक द्विपक्षीय वार्ता के लिए भी नई दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा गया है। हालांकि, बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अभी पर्याप्त समय शेष है और सरकार इस दौरान कई महत्वपूर्ण घरेलू व संवैधानिक प्राथमिकताओं में व्यस्त है।

    विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, बिम्सटेक संगठन के वर्तमान अध्यक्ष के नाते भारत ने बांग्लादेश को ब्रिक्स सम्मेलन के संपर्क सत्र में शामिल होने का विशेष अवसर प्रदान किया है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से बने तनावपूर्ण माहौल को सामान्य बनाना और द्विपक्षीय वार्ता के जरिए आपसी संबंधों को नई दिशा देना है।

    ढाका में अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सरकार सभी देशों के साथ सकारात्मक संबंधों की पक्षधर है। यदि आगामी दिनों में स्थितियां अनुकूल रहती हैं और बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है, तो निश्चित रूप से भारत यात्रा को अंतिम रूप दिया जाएगा। दोनों पड़ोसी मुल्कों के शीर्ष नेतृत्व के बीच प्रत्यक्ष संवाद से कई लंबित क्षेत्रीय व व्यापारिक मुद्दों के हल होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बांग्लादेश में बीते समय में हुए राजनीतिक बदलावों के बाद से ही नई दिल्ली और ढाका के बीच रणनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे समय में शीर्ष स्तर की यह प्रस्तावित बैठक बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। द्विपक्षीय कूटनीति के जानकारों का मानना है कि व्यापार, सुरक्षा और ऊर्जा संकट जैसे संवेदनशील विषयों पर दोनों देशों का मिलकर काम करना बेहद आवश्यक है।

    अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की इस हलचल का सीधा असर भारत के विभिन्न राज्यों और व्यापारिक साझेदारियों पर भी देखा जा सकता है। मध्य प्रदेश जैसे औद्योगिक और कृषि प्रधान राज्य, जो वस्त्र और हस्तशिल्प निर्यात से जुड़े हैं, वे भी पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक स्थिरता की उम्मीद रखते हैं। मध्य प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक घरानों और नीति निर्माताओं की नजरें भी इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर बनी रहती हैं।

    दक्षिण एशियाई कूटनीति में बिम्सटेक और ब्रिक्स जैसे मंचों की भूमिका आने वाले समय में और अधिक निर्णायक होने की संभावना है। यदि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में भाग लेते हैं, तो यह क्षेत्र में आर्थिक सहयोग और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम सिद्ध हो सकता है।

    हाल के समय में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों देशों के राजनयिक लगातार संपर्क में हैं। अब सभी की नजरें ढाका के अंतिम आधिकारिक निर्णय पर टिकी हुई हैं कि क्या ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता संभव हो पाती है या नहीं।

  • ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी

    ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने के लिए फास्ट पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी को आपस में जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि इस दिशा में अभी कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सितंबर 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है।

    संजय मल्होत्रा ने कहा कि सीमा पार भुगतान ब्रिक्स देशों की साझा प्राथमिकताओं में शामिल है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में लागत, समय और तकनीकी प्रक्रियाओं को कम करने की पर्याप्त गुंजाइश है। इसी उद्देश्य से अलग-अलग देशों के तेज भुगतान नेटवर्क को जोड़ने और डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

    सीबीडीसी किसी देश के केंद्रीय बैंक की ओर से जारी डिजिटल मुद्रा होती है। भारत में डिजिटल रुपया इसी दिशा में विकसित की गई व्यवस्था है। यदि अलग-अलग देशों की ऐसी डिजिटल मुद्राओं और तेज भुगतान प्रणालियों के बीच तकनीकी कनेक्टिविटी विकसित होती है, तो भविष्य में सीमा पार लेनदेन को कम समय में पूरा करने की संभावना बढ़ सकती है।

    आरबीआई गवर्नर के अनुसार, अभी यह प्रक्रिया शुरुआती चर्चा के चरण में है और किसी अंतिम व्यवस्था या समयसीमा की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि, ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान ढांचे को बेहतर बनाने की कोशिश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान प्रणालियों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

    भारत इस पूरी रणनीति में रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रहा है। आरबीआई ने कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार व्यवस्था विकसित की है। इंडोनेशिया, मालदीव, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात के साथ द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए गवर्नर ने कहा कि ऐसे लेनदेन का दायरा बढ़ाने के लिए और प्रयास किए जाने चाहिए।

    स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कारोबार के लिए किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे कुछ मामलों में लेनदेन की लागत घटाने और भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए यह रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने और वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है।

    संजय मल्होत्रा ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल पर भी जोर दिया। उन्होंने बैंकों से एआई को केवल जोखिम के तौर पर देखने के बजाय तकनीकी अवसर के रूप में अपनाने की अपील की। बैंकों को अपने एआई मॉडल की सूची तैयार करने और बोर्ड स्तर पर एआई गवर्नेंस से जुड़ी नीतियां लागू करने की सलाह दी गई है।

    वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने पश्चिम एशिया के तनाव और अन्य भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को निकट अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संभावित जोखिम बताया। ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति के स्रोतों में विविधता, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और मुक्त व्यापार समझौतों जैसे कदमों को आर्थिक मजबूती के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

    आरबीआई गवर्नर ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली की स्थिति को भी मजबूत बताया। उनके मुताबिक बैंकों के पास बेहतर पूंजी आधार, कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां और स्वस्थ लाभप्रदता है। ऐसे में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बैंकिंग क्षेत्र अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

    ब्रिक्स के बीच भुगतान प्रणालियों और सीबीडीसी की संभावित कनेक्टिविटी आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को बदलने वाली पहल बन सकती है। हालांकि अभी यह चर्चा के स्तर पर है, लेकिन इसके आगे बढ़ने पर व्यापार, पर्यटन और अन्य सीमा पार लेनदेन में भुगतान की लागत और समय कम करने के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

  • निर्मला सीतारमण आज जयपुर में BRICS वित्त मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगी, वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर होगा मंथन

    निर्मला सीतारमण आज जयपुर में BRICS वित्त मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगी, वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर होगा मंथन

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बुधवार को जयपुर में आयोजित BRICS देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की दो दिवसीय बैठक में शामिल होंगी। भारत की BRICS अध्यक्षता के तहत हो रही यह बैठक वैश्विक आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक में समूह के सभी 11 सदस्य देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक के गवर्नर हिस्सा लेंगे।

    जयपुर के रामबाग पैलेस में आयोजित होने वाली बैठक का उद्घाटन सत्र बुधवार सुबह 11:15 बजे शुरू होगा। इसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। आर्थिक विकास, वित्तीय उदारीकरण, जोखिम प्रबंधन और वैश्विक वित्तीय स्थिरता जैसे मुद्दे चर्चा के प्रमुख केंद्र में रहेंगे।

    भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी बैठक में हिस्सा लेने के लिए जयपुर पहुंच चुके हैं। उद्घाटन सत्र के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आरबीआई गवर्नर सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं तथा केंद्रीय बैंकिंग से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार साझा करेंगे।

    बैठक में प्रतिनिधि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में सामने आ रही चुनौतियों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने मौजूद अवसरों पर भी चर्चा करेंगे। निवेश बढ़ाने, वित्तीय सहयोग मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को अधिक स्थिर बनाने से जुड़े विषयों पर सदस्य देशों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा।

    जयपुर पहुंचने पर वित्त मंत्री का स्वागत राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी, मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने किया। बैठक के आयोजन को देखते हुए जयपुर में विदेशी प्रतिनिधियों के लिए विशेष कार्यक्रम भी तैयार किए गए हैं।

    दो दिवसीय बैठक गुरुवार दोपहर 12:30 बजे तक चलेगी। इस दौरान BRICS सदस्य देशों के प्रतिनिधि आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र में आपसी सहयोग के संभावित रास्तों पर चर्चा करेंगे। बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल में निवेश, वित्तीय जोखिम और आर्थिक स्थिरता जैसे विषयों का महत्व लगातार बढ़ा है, ऐसे में बैठक को महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है।

    विदेशी प्रतिनिधियों को राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने के लिए भी विशेष कार्यक्रम रखा गया है। बुधवार शाम पांच बजे सभी प्रतिनिधि जयपुर सिटी पैलेस का दौरा करेंगे। इस दौरान राजस्थान की संस्कृति, परंपराओं और विरासत को प्रदर्शित करने वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

    BRICS वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की वार्षिक बैठक की शुरुआत करीब 18 वर्ष पहले वैश्विक वित्तीय संकट के दौर में हुई थी। समय के साथ यह बैठक वैश्विक आर्थिक और वित्तीय मामलों पर सदस्य देशों के बीच संवाद और सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बन गई है।

    जयपुर दूसरी बार इस बैठक की मेजबानी कर रहा है। इससे पहले वर्ष 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान भी जयपुर में इस बैठक का आयोजन हुआ था। उस समय आर्थिक पुनरुद्धार, टीकाकरण, डिजिटल स्वास्थ्य, सामाजिक अवसंरचना और वित्तीय समावेशन जैसे मुद्दे प्रमुख चर्चा में रहे थे।

    2021 की बैठक में यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म से जुड़े विषय पर भी विचार-विमर्श हुआ था। इस बार बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच वित्तीय स्थिरता, निवेश और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं चर्चा के केंद्र में रहने की उम्मीद है।

    भारत की अध्यक्षता में हो रही यह बैठक ऐसे समय आयोजित हो रही है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रही है। ऐसे में BRICS देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों के बीच समन्वय बढ़ाने की कोशिशों पर बैठक का विशेष ध्यान रहेगा।

  • ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन से पहले सजा भोपाल, विदेशी मेहमानों के स्वागत में VIP रोड और भोज सेतु संवारने की तैयारी

    ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन से पहले सजा भोपाल, विदेशी मेहमानों के स्वागत में VIP रोड और भोज सेतु संवारने की तैयारी

    मध्य प्रदेश । की राजधानी भोपाल 5 अगस्त से शुरू होने वाले ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन-2026 की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही है। चार दिनों तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के लिए शहर में व्यापक स्तर पर सौंदर्यीकरण और व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सम्मेलन 8 अगस्त तक चलेगा, जिसमें ब्रिक्स देशों के साथ कई अन्य मित्र देशों के संस्कृति मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, प्रतिनिधिमंडल और कलाकार भाग लेंगे। विदेशी मेहमानों के स्वागत के लिए शहर को विशेष रूप से सजाया जा रहा है, जिससे राजधानी का स्वरूप एक बार फिर बड़े वैश्विक आयोजन जैसा दिखाई दे रहा है।

    सम्मेलन के मद्देनजर एयरपोर्ट से लेकर आयोजन स्थल तक प्रमुख मार्गों को आकर्षक बनाया जा रहा है। एयरपोर्ट रोड, गांधी नगर, वीआईपी रोड, भोज सेतु, पॉलीटेक्निक चौराहा और पंडित कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर तक डिवाइडरों पर रंगरोगन किया जा रहा है। सड़क किनारे सफाई, पौधों की देखरेख और सौंदर्यीकरण के साथ शहर की समग्र छवि को बेहतर बनाने का कार्य तेजी से जारी है।

    भोज सेतु इस तैयारी का प्रमुख आकर्षण बना हुआ है। यहां दोनों ओर मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को दर्शाने वाली आकर्षक पेंटिंग बनाई जा रही हैं। इन कलाकृतियों के माध्यम से प्रदेश की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विविधता और पर्यटन स्थलों की झलक प्रस्तुत की जा रही है, ताकि विदेशी प्रतिनिधियों को मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान से परिचित कराया जा सके।

    इस सम्मेलन का मुख्य विषय भारतीय दर्शन की भावना ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित है, जिसमें वैश्विक समरसता, सांस्कृतिक संवाद और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर रहेगा। आयोजन में ब्राजील, इथियोपिया, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, क्यूबा, थाईलैंड, बेलारूस सहित कई देशों के संस्कृति मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधिमंडल भाग लेंगे। इनके अलावा विभिन्न देशों के दूतावासों से जुड़े अधिकारी और सांस्कृतिक विशेषज्ञ भी सम्मेलन में शामिल होंगे।

    सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के कलाकार अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी देंगे। मिस्र का राष्ट्रीय लोक नृत्य दल, इंडोनेशिया के गायन और नृत्य कलाकार, रूस के लोक वाद्ययंत्र ऑर्केस्ट्रा, दक्षिण अफ्रीका का संगीत समूह तथा ब्राजील के कलाकार संगीत, मार्शल आर्ट, एक्रोबेटिक्स और लोक संस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियां देंगे। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न देशों की सांस्कृतिक विरासत और कलात्मक परंपराओं का परिचय मिलेगा।

    प्रशासन ने सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सुरक्षा, यातायात, आतिथ्य और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को भी अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। आयोजन स्थल के आसपास विशेष निगरानी, साफ-सफाई और सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि विदेशी मेहमानों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। शहर के प्रमुख मार्गों और सार्वजनिक स्थलों पर भी आवश्यक सुधार कार्य तेज गति से पूरे किए जा रहे हैं।

    ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन-2026 केवल एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश और भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण अवसर भी माना जा रहा है। राजधानी भोपाल इस आयोजन के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, आतिथ्य परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं का परिचय दुनिया के सामने रखेगा। सम्मेलन से प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होने के साथ-साथ सांस्कृतिक सहयोग और पर्यटन को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

  • नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन पर दुनिया की नजर, शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से बढ़ सकती है कूटनीतिक सक्रियता

    नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन पर दुनिया की नजर, शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से बढ़ सकती है कूटनीतिक सक्रियता

    नई दिल्ली । सितंबर 2026 में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत करेगा और इस वैश्विक आयोजन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सम्मेलन से पहले सबसे अधिक चर्चा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को लेकर हो रही है। यदि उनका दौरा तय होता है, तो यह कोविड-19 महामारी और वर्ष 2020 के गलवान सीमा विवाद के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे में इस संभावित दौरे को भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होगा। सम्मेलन में सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की संभावना है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भी इसमें भाग लेने की उम्मीद जताई जा रही है। रूस की ओर से पहले ही उनकी भारत यात्रा के संकेत दिए जा चुके हैं। वहीं BRICS के नए सदस्य देशों में शामिल ईरान भी सम्मेलन में भाग लेगा, हालांकि उसकी ओर से किस स्तर का प्रतिनिधिमंडल आएगा, इस पर अंतिम निर्णय अभी शेष है।

    यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषय इस बैठक के प्रमुख एजेंडे में शामिल हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत बनाने के साथ-साथ वैश्विक चुनौतियों पर साझा रणनीति तैयार करने की दिशा में भी यह सम्मेलन अहम भूमिका निभा सकता है।

    BRICS सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले महीने किर्गिस्तान में आयोजित होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना भी जताई जा रही है। इस बैठक के दौरान रूस, चीन और ईरान सहित कई सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातें हो सकती हैं। माना जा रहा है कि इन बैठकों में क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, संपर्क परियोजनाओं और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों पर विस्तृत चर्चा होगी।

    यदि शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंचते हैं, तो इसे भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों देशों के संबंधों में तनाव देखने को मिला था। हालांकि हाल के समय में विभिन्न स्तरों पर संवाद जारी रहा है और संभावित शीर्षस्तरीय मुलाकात से द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है।

    इस बीच वर्ष 2027 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित SCO शिखर सम्मेलन को लेकर भी चर्चा तेज है। पाकिस्तान के अध्यक्षता संभालने के बाद सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को औपचारिक निमंत्रण भेजा जाएगा। ऐसे में भविष्य के क्षेत्रीय कूटनीतिक कार्यक्रमों को लेकर भी गतिविधियां बढ़ने की संभावना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंच वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रहेंगे। नई दिल्ली में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों, क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने का अवसर भी प्रदान कर सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें सदस्य देशों की आधिकारिक भागीदारी और संभावित द्विपक्षीय बैठकों पर टिकी हुई हैं।

  • भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत? सितंबर में BRICS समिट के लिए शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा पर टिकी दुनिया की नजर

    भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत? सितंबर में BRICS समिट के लिए शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा पर टिकी दुनिया की नजर

    नई दिल्ली । सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को लेकर भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह दौरा तय होता है तो वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। इस संभावित दौरे को दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शी जिनपिंग की मौजूदगी की संभावना है। उनकी यात्रा ऐसे समय में प्रस्तावित है जब भारत और चीन पिछले कुछ वर्षों से सीमा पर बने तनाव को कम करने और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई तल्खी के कारण कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएं हुईं, जिसके बाद अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशें जारी हैं।

    शी जिनपिंग की पिछली भारत यात्रा अक्टूबर 2019 में हुई थी, जब दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अनौपचारिक शिखर वार्ता आयोजित की गई थी। इसके कुछ महीनों बाद जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को दशकों के सबसे कठिन दौर में पहुंचा दिया। इसके बाद सीमा पर लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा और दोनों देशों ने कई स्तरों पर बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

    प्रस्तावित यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनयिक संपर्क बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के चीन दौरे की चर्चा है, जहां सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हो सकती है। हालांकि उनकी यात्रा की आधिकारिक तारीखों की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसके अलावा भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय के लिए गठित कार्य तंत्र (WMCC) की बैठक भी आने वाले समय में आयोजित होने की उम्मीद है। इसके बाद दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा विवाद पर आगे की वार्ता हो सकती है।

    यदि शी जिनपिंग भारत आते हैं तो ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बीच द्विपक्षीय बैठक होने की संभावना पर भी नजर रहेगी। ऐसी बैठक में सीमा प्रबंधन, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, निवेश, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास बहाली जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत बने हुए हैं, लेकिन सीमा विवाद के कारण राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।

    यह संभावित यात्रा ऐसे समय में सामने आ रही है जब वैश्विक स्तर पर कई भू-राजनीतिक चुनौतियां उभर रही हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, वैश्विक व्यापार पर दबाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच बदलते समीकरणों के बीच भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच संवाद को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नई दिल्ली में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं होगा, बल्कि यह वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच रणनीतिक समन्वय को भी नई दिशा देने का अवसर बन सकता है।