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  • केन्द्र सरकार इन साल इन बड़ी योजनाओं में 40% बजट ही कर पाई खर्च… सबसे पीछे किसानों से जुड़ी ये स्कीम

    केन्द्र सरकार इन साल इन बड़ी योजनाओं में 40% बजट ही कर पाई खर्च… सबसे पीछे किसानों से जुड़ी ये स्कीम


    नई दिल्ली।
    केन्द्र सरकार (Central Government) ने इस वित्त वर्ष में अपनी सबसे बड़ी योजनाओं (Biggest Plans) पर 40 फीसदी बजट ही खर्च किया है। ये वे योजनाएं हैं जिनके लिए लगभग 500 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था। इन योजनाओं में केंद्र और राज्यों को मिलकर खर्च करना है। इन योजनाओं में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के तहत इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेशन योजना (Widow Pension Scheme.) और अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए प्री मैट्रिक वजीफा योजना (Pre Matric Scholarship Scheme) शामिल है। इसके अलावा मनरेगा, अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना पर भी 40 फीसदी ही खर्च हो पाया है।

    कुल 53 योजनाओं में से 6 योजनाओं पर 40 फीसदी से कम खर्च किया गया है। चार पर 40 से 50 फीसदी, 15 योनजाओं पर 51 से 75 फीसदी, 10 पर 90 से 100 पर्सेंट और 6 योजनाों पर 100 प्रतिशत खर्च हुआ है। बाकी 47 योजनाओं पर रिवाइज्ड एस्टिमेट बजट एस्टिमेट से कम है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में 850 करोड़ के बजट काआवंटन किया गया था जिसमें से केवल 150 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

    अगर कुल 53 योजनाओं पर कुल खर्च की बात करें तो यह 3.8 करोड़ रुपये है। इन योजनाओं पर 5 लाख करोड़ के बजट का ऐलान हुआ था। 31 दिसंबर तक दो लाख करोड़ का बजट रिलीज किया गया था। यह कुल बजट का 41.2 फीसदी था। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना, वॉटर मैनेजमेंट, पीएम ईबस सेवा, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान, जल जीवन मिशन, कंप्यूटराइजेशन ऑफ प्राइमरी ऐग्रीकस्च्र क्रेडिट सोसाइटी और अन्य कई योजाओं पर बजट का 40 फीसदी ही खर्च हुआ है। इनमें से 6 योजनाएं ऐसी भी हैं जिनके लिए केवल 10 फीसदी ही बजट रिलीज हुआ है।

    इस बजट सत्र के दौरान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी आर पाटील ने शनिवार को यहां बताया कि देश में जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत अब तक 16 करोड़ घरों में नल से जल पहुंचाया जा चुका है।पाटिल ने यहां केन्द्रीय बजट को लेकर प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमृत सरोवर योजना और जेजेएम ऐतिहासिक साबित हो रहे हैं और अमृत सरोवर योजना के तहहत देशभर में 69 हजार से अधिक सरोवरों का निर्माण किया गया है, जिससे भूजल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

    उन्होंने बताया कि जेजेएम के लिए 67 हजार 300 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं और अब तक 16 करोड़ घरों में नल से जल पहुंचाया जा चुका है और चार-पांच करोड़ घरों को और पानी देना है तथा इस योजना को वर्ष 2028 तक विस्तारित किया गया है। इससे देश की लगभग नौ करोड़ माताओं-बहनों का करीब 4.5 करोड़ घंटे का समय बचा है। साथ ही जल गुणवत्ता जांच के लिए 24 लाख 80 हजार महिलाओं को प्रशिक्षित भी किया गया है और आठ लाख महिलाओं ने परीक्षण पोर्टल पर अपनी रिपोर्ट को रखा है।

  • राइडर्स की सुरक्षा पर केंद्र सरकार सख्त, ‘10 मिनट डिलीवरी’ के दावों से पीछे हटीं क्विक कॉमर्स कंपनियां

    राइडर्स की सुरक्षा पर केंद्र सरकार सख्त, ‘10 मिनट डिलीवरी’ के दावों से पीछे हटीं क्विक कॉमर्स कंपनियां


    नई दिल्ली।क्विक कॉमर्स सेक्टर में तेज डिलीवरी को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के बीच अब केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। राइडर्स की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सरकार की आपत्ति के बाद स्विगी और जेप्टो जैसी प्रमुख कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म से 10 मिनट में डिलीवरी जैसे दावों को हटा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब डिलीवरी की होड़ में सड़क सुरक्षा और गिग वर्कर्स पर बढ़ते दबाव को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे।

    सरकारी स्तर पर यह मुद्दा तब गंभीर रूप से सामने आया जब क्विक कॉमर्स कंपनियों के विज्ञापनों और प्रचार अभियानों में बेहद कम समय में सामान पहुंचाने को प्रमुखता दी जाने लगी। मंत्रालय का मानना है कि इस तरह के वादे डिलीवरी पार्टनर्स पर अप्रत्यक्ष लेकिन गहरा दबाव बनाते हैं। नतीजतन कई बार राइडर्स को समय पर डिलीवरी पूरी करने के लिए तेज ड्राइविंग करनी पड़ती है जिससे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन और सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है।मंगलवार को केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में क्विक कॉमर्स कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में गिग वर्कर्स की सुरक्षा काम के घंटे भुगतान प्रणाली और डिलीवरी के दौरान पड़ने वाले दबाव जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक के बाद कंपनियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे अपनी ब्रांडिंग और मार्केटिंग से ऐसी समय-सीमाएं हटाएं जो राइडर्स को जोखिम लेने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

    इससे पहले क्विक कॉमर्स सेक्टर की बड़ी कंपनी ब्लिंकिट ने अपने ऐप और प्रचार सामग्री से 10 मिनट में डिलीवरी का दावा हटा लिया था। अब स्विगी और जेप्टो ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए अपनी टैगलाइन और विज्ञापन रणनीति में बदलाव किया है। कंपनियां अब डिलीवरी की गति के बजाय उत्पादों की उपलब्धता सेवा की सुविधा और ग्राहकों को मिलने वाले विकल्पों पर जोर दे रही हैं।क्विक कॉमर्स मॉडल को लेकर यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है कि क्या बेहद कम समय में डिलीवरी वास्तव में सुरक्षित और टिकाऊ है। सोशल मीडिया श्रमिक संगठनों और गिग वर्कर्स की ओर से बार-बार यह चिंता जताई गई कि कम समय की प्रतिस्पर्धा में राइडर्स को अपनी और दूसरों की सुरक्षा से समझौता करना पड़ता है। हाल के महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों में गिग वर्कर्स की हड़तालों ने भी इस मुद्दे को और मुखर बना दिया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि विज्ञापनों से समय-सीमा हटाने का मतलब यह नहीं है कि कंपनियां अपनी तेज डिलीवरी क्षमता खो देंगी। डार्क स्टोर्स माइक्रो-वेयरहाउस और स्थानीय आपूर्ति नेटवर्क के चलते क्विक कॉमर्स कंपनियां पहले की तरह तेजी से ऑर्डर पूरा करती रहेंगी। फर्क बस इतना होगा कि अब मार्केटिंग में सबसे तेज होने के बजाय सबसे भरोसेमंद सुरक्षित और सुविधाजनक सेवा को प्राथमिकता दी जाएगी।यह कदम भारत की गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों डिलीवरी पार्टनर्स के लिए अहम माना जा रहा है। बड़ी संख्या में युवा इन प्लेटफॉर्म्स से जुड़े हैं और उनकी सुरक्षा काम की शर्तों और अधिकारों को लेकर लंबे समय से स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग हो रही थी। केंद्र सरकार का यह हस्तक्षेप उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

  • उज्जैन सिंहस्थ 2028: मध्यप्रदेश सरकार ने केंद्र से 20 हजार करोड़ का विशेष पैकेज मांगा, श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए अधोसंरचना का विकास होगा

    उज्जैन सिंहस्थ 2028: मध्यप्रदेश सरकार ने केंद्र से 20 हजार करोड़ का विशेष पैकेज मांगा, श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए अधोसंरचना का विकास होगा


    भोपाल । मध्य प्रदेश सरकार ने आगामी 2028 के सिंहस्थ महाकुंभ के लिए केंद्र सरकार से 20 हजार करोड़ रुपये का विशेष पैकेज मांगा है। इस मांग को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ शनिवार को नई दिल्ली में हुई एक बैठक में उठाया गया। बैठक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों की प्री-बजट मीटिंग का हिस्सा थी, जिसमें मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने इस मुद्दे को केंद्र के सामने रखा।सिंहस्थ महाकुंभ, जो हर 12 साल में उज्जैन में आयोजित होता है, में लगभग 50 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है।
    ऐसे में श्रद्धालुओं के सुचारु दर्शन और अन्य सुविधाओं के लिए राज्य सरकार ने कई अहम योजनाओं पर काम करना शुरू कर दिया है। इसमें प्रमुख रूप से सड़कें, पुल-पुलिया, क्षिप्रा नदी पर पक्के घाट, ठहरने के स्थल, अस्पताल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास किया जाएगा।मध्य प्रदेश सरकार ने कहा है कि केंद्र से 20 हजार करोड़ रुपये का विशेष पैकेज मिलने से इन कार्यों को तेज़ी से और बेहतर तरीके से पूरा किया जा सकेगा। राज्य सरकार का उद्देश्य है कि सिंहस्थ महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

    4500 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लेने की संभावना

    मध्यप्रदेश सरकार ने यह भी जानकारी दी कि 15वें वित्त आयोग द्वारा राज्य का जीएसडीपी 16.94 लाख करोड़ रुपये के रूप में आंका गया है, जबकि केंद्र सरकार इसे 15.44 लाख करोड़ रुपये मानती है। यदि राज्य सरकार के आंकड़ों को माना जाता है, तो मध्य प्रदेश को अतिरिक्त 4500 करोड़ रुपये तक कर्ज लेने का अवसर मिल सकता है, जिसका उपयोग राज्य के विकास कार्यों में किया जाएगा।

    अधोसंरचना के विकास के लिए केंद्र से मिलने वाली सहायता से न केवल सिंहस्थ महाकुंभ के आयोजन में मदद मिलेगी, बल्कि प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी बुनियादी ढांचे का विकास संभव होगा। उज्जैन सिंहस्थ 2028 को लेकर सरकार की योजना काफी विस्तृत है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि इस ऐतिहासिक आयोजन के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं मिलें।

  • केन्द्र ने अरावली पहाड़ियों में नए खनन पट्टे देने पर लगाई रोक, राज्यों को दिया निर्देश

    केन्द्र ने अरावली पहाड़ियों में नए खनन पट्टे देने पर लगाई रोक, राज्यों को दिया निर्देश


    नई दिल्ली।
    अरावली पहाड़ियों (Aravalli Hills) को लेकर केंद्र सरकार (Central government) ने बुधवार को बड़ा फैसला (Big Decision) लिया। केंद्र ने राज्यों को अरावली में नए खनन पट्टे (New Mining Leases) देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। सरकार का कहना है कि वह अरावली की पहाड़ियों के संरक्षण के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। जैव विविधता के संरक्षण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देती है। अरावली रेंज दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है, जिसको लेकर पिछले कुछ दिनों से विवाद चल रहा था। सोशल मीडिया पर भी लोग अरावली को लेकर सरकार का विरोध कर रहे थे। अब अवैध खनन से बचाने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को अरावली में किसी भी तरह की नई माइनिंग पर पूरी तरह से रोक लगाने के आदेश दिए।

    पर्यावरण मंत्रालय ने कहा, ”यह रोक पूरी अरावली रेंज पर समान रूप से लागू होगी और इसका मकसद इस रेंज की अखंडता को बनाए रखना है। इन निर्देशों का मकसद अरावली को गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली एक लगातार भूवैज्ञानिक पहाड़ी के रूप में सुरक्षित रखना और सभी अनियमित माइनिंग गतिविधियों को रोकना है।” इसके अलावा, मंत्रालय ने इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) को पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे और इलाकों/जोन की पहचान करने का निर्देश दिया है, जहां खनन पर रोक लगाई जानी चाहिए। ये इलाके केंद्र द्वारा पहले से प्रतिबंधित खनन क्षेत्रों के अलावा होंगे, और इनकी पहचान पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और लैंडस्केप-स्तर के विचारों के आधार पर की जाएगी।

    सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि जो खदानें पहले से चल रही हैं, उनके लिए संबंधित राज्य सरकारें सभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार काम करें। पर्यावरण की सुरक्षा और टिकाऊ खनन तरीकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए, चल रही खनन गतिविधियों को अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ सख्ती से रेगुलेट किया जाएगा।

    नवंबर 2025 में, शीर्ष अदालत ने पर्यावरण मंत्रालय के नेतृत्व वाली एक समिति की सिफारिश पर अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज की एक समान कानूनी परिभाषा को स्वीकार कर लिया। इस परिभाषा के तहत, ‘अरावली पहाड़ी’ अपने आसपास के इलाके से कम से कम 100 मीटर की ऊंचाई वाली एक भू-आकृति है और ‘अरावली रेंज’ एक दूसरे के 500 मीटर के भीतर दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना शुरू हो गई थी।

    वहीं, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव (Bhupendra Yadav) ने कांग्रेस पर अरावली की नई परिभाषा के मुद्दे पर ‘गलत सूचना’ और ‘झूठ’ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि पर्वत श्रृंखला के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही कानूनी रूप से खनन किया जा सकता है। यादव ने प्रेसवार्ता में कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार अरावली की सुरक्षा और पुनर्स्थापन के लिए ‘पूरी तरह से प्रतिबद्ध’ है। उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘कांग्रेस ने अपने शासनकाल में राजस्थान में बड़े पैमाने पर अवैध खनन की अनुमति दी, लेकिन वह अब इस मुद्दे पर भ्रम, गलत सूचना और झूठ फैला रही है।’’ उन्होंने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुमोदित नई परिभाषा का उद्देश्य ‘अवैध खनन पर अंकुश लगाना’ और ‘कानूनी रूप से टिकाऊ खनन’ की अनुमति देना है तथा वह भी तब होगा जब भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) संपोषणीय खनन के लिए प्रबंधन योजना (एमपीएसएम) तैयार कर लेती है।

  • IFFK विवाद पर शशि थरूर का तीखा हमला: फिल्मों पर रोक से भारत की वैश्विक छवि को खतरा

    IFFK विवाद पर शशि थरूर का तीखा हमला: फिल्मों पर रोक से भारत की वैश्विक छवि को खतरा

    तिरुवनंतपुरम।केरल में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरल IFFK से जुड़ा विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा कई फिल्मों को स्क्रीनिंग की अनुमति न देने के फैसले पर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बताया बल्कि यह भी कहा कि ऐसे कदम भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    मीडिया से बातचीत के दौरान शशि थरूर ने कहा कि भारत में सिनेमा और रचनात्मक स्वतंत्रता की एक समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने याद दिलाया कि देश में गोवा और केरल जैसे राज्यों में वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिल्म फेस्टिवल आयोजित होते रहे हैं जिन्हें दुनियाभर में सम्मान की नजर से देखा जाता है। ऐसे में फिल्मों की स्क्रीनिंग पर रोक लगाना न केवल कलाकारों के साथ अन्याय है बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान पर भी सवाल खड़े करता है।थरूर ने कहा यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। हमारे देश में सिनेमाई संस्कृति का हमेशा सम्मान किया गया है। लेकिन आज स्थिति यह है कि फिल्मों की एक सूची को सीमित कर दिया गया है और कुछ फिल्मों को बिना ठोस वजह के रोका जा रहा है। किसी भी फिल्म को इस तरह से नहीं रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पहले जिन फिल्मों को बैन किया गया या जिन्हें मंजूरी नहीं दी गई उनके पीछे दिए गए कारण अक्सर हास्यास्पद रहे हैं।

    कांग्रेस सांसद ने नौकरशाही की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को ज्यादा समझदारी और संवेदनशीलता दिखानी चाहिए क्योंकि ऐसे फैसलों का असर केवल एक फेस्टिवल तक सीमित नहीं रहता। थरूर के मुताबिक जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की रचनात्मक स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं तो इससे देश की छवि को गंभीर नुकसान होता है।इससे पहले सोशल मीडिया पर भी शशि थरूर ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि तिरुवनंतपुरम में आयोजित केरल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली 19 फिल्मों को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न दिए जाने से एक अजीब और अनावश्यक विवाद खड़ा हो गया है। उनका कहना था कि यह फैसला कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना के खिलाफ है।

    केवल कांग्रेस ही नहीं बल्कि केरल सरकार ने भी केंद्र सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने साफ शब्दों में कहा कि IFFK में तय फिल्मों की स्क्रीनिंग की अनुमति न देना अस्वीकार्य है। उन्होंने इसे रचनात्मक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया और कहा कि इस तरह के कदम लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि फिल्म फेस्टिवल में लगाई गई सेंसरशिप मौजूदा केंद्र सरकार के तानाशाही रवैये को दर्शाती है। उनके मुताबिक यह सरकार देश में विरोध की आवाजों और अलग-अलग रचनात्मक अभिव्यक्तियों को दबाने की कोशिश कर रही है। पिनाराई विजयन ने यह भी स्पष्ट किया कि जागरूक केरल ऐसे किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।

    राज्य सरकार ने यह ऐलान किया है कि जिन फिल्मों को केंद्र सरकार ने अनुमति नहीं दी थी उन्हें फिर भी फेस्टिवल में दिखाया जाएगा। केरल सरकार का मानना है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि यह समाज के सवालों विचारों और सच्चाइयों को सामने लाने का एक सशक्त जरिया है। IFFK से जुड़ा यह विवाद अब केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केंद्र और राज्य के रिश्तों और भारत की सांस्कृतिक पहचान जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ गया है। शशि थरूर और केरल सरकार के बयानों के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में यह मामला और गहराने वाला है।