Tag: Congress

  • आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली ।आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर देश के कई हिस्सों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार जिस तरीके से जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, उससे सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करना मुश्किल होगा। उन्होंने मौजूदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जातियों की गणना कराने की मांग की है।

    जयराम रमेश ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव करना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि जनगणना में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज करने से देश की अन्य जातियों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन नहीं हो पाएगा।

    कांग्रेस ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया है कि जनगणना के फॉर्म में एससी और एसटी के लिए अलग व्यवस्था है, जबकि अन्य जातियों के लिए उसी तरह का स्पष्ट कॉलम उपलब्ध नहीं कराया गया है। पार्टी का कहना है कि जातिगत जनगणना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके जरिए देश के विभिन्न सामाजिक समूहों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने आनी चाहिए।

    जयराम रमेश ने कहा कि जातिगत आंकड़ों का सही संग्रह सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों की जनसंख्या, सामाजिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियों का विश्वसनीय आकलन होने पर ही नीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकती हैं। कांग्रेस इसी आधार पर जातियों की गिनती के लिए अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दे रही है।

    कांग्रेस महासचिव ने बिहार और तेलंगाना में अपनाई गई व्यवस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करने की मांग भी रखी है। उन्होंने सरकार से विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने और सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की अपील की है, ताकि जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को लेकर व्यापक सहमति बनाई जा सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जातिगत जनगणना को लेकर कई बार पत्र लिखे जा चुके हैं। कांग्रेस के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का पत्र भेजा था। इससे पहले खरगे ने अप्रैल 2023 और मई 2025 में भी इस मुद्दे पर पत्र लिखे थे। कांग्रेस का दावा है कि इन पत्रों का अब तक जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस ने जनगणना में जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने के लिए अपनाए जा रहे खुले प्रश्न वाले तरीके पर भी सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि यदि प्रक्रिया स्पष्ट और मानकीकृत नहीं होगी तो आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस के अनुसार, सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए सटीक आंकड़े बेहद आवश्यक हैं।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली, जयपुर, लखनऊ और पटना समेत कई शहरों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। आरक्षण के पक्ष और विरोध में सामने आ रहे अलग-अलग राजनीतिक तथा सामाजिक रुख के बीच जातिगत जनगणना का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आ गया है।

    कांग्रेस का कहना है कि जातिगत जनगणना को व्यापक, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। पार्टी के मुताबिक, इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने और भविष्य की नीतियों को बेहतर आधार देने में मदद मिल सकती है। वहीं, इस मुद्दे पर सरकार की प्रक्रिया और कांग्रेस की आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने के आसार हैं।

  • सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले ही साथ चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दे चुके हैं, लेकिन अब आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री ने विपक्षी गठबंधन की रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि अगर सपा और आप के बीच सीटों को लेकर सहमति बनती है तो कांग्रेस के सामने गठबंधन के भीतर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।

    सियासी हलकों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव के लिए करीब 15 से 20 सीटें देने पर विचार कर सकती है। इस संभावना को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आप नेता संजय सिंह के बीच हुई मुलाकातों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद यूपी की चुनावी रणनीति को लेकर अटकलें तेज हुई हैं।

    संजय सिंह और अखिलेश यादव की इसी साल अप्रैल में मुलाकात हुई थी। इसके बाद 23 अगस्त को भी दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हुई। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 15 से 20 सीटों की मांग कर सकती है। हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर अभी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

    सपा और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन के बीच आप को साथ लाने की कोशिश कांग्रेस के लिए आसान नहीं मानी जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि 2027 में उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब और गोवा में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से मौजूद है। ऐसे में दोनों दलों को एक ही गठबंधन में लाने का फैसला कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है।

    इसके अलावा आम आदमी पार्टी के INDIA गठबंधन से दूरी बनाने वाले बयानों ने भी स्थिति को जटिल बनाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आप की उत्तर प्रदेश में प्रत्यक्ष चुनावी भूमिका नहीं रही थी। पार्टी ने यूपी में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे और समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया था।

    2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 349 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को कुल 3 लाख 47 हजार 187 वोट मिले थे। हालांकि उसका प्रदर्शन व्यापक रूप से प्रभावी नहीं रहा, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में उसे अपेक्षाकृत अधिक मत मिले थे। रुधौली में आप उम्मीदवार को 24,367 और खलीलाबाद में 25,123 वोट मिले थे।

    इसके अलावा लोनी, साहिबाबाद, नोएडा और मोहनलालगंज जैसे क्षेत्रों में भी पार्टी के उम्मीदवारों को पांच हजार से अधिक वोट मिले थे। यही कारण है कि आगामी चुनाव में आप इन क्षेत्रों को संभावित सीट दावेदारी के आधार के रूप में देख सकती है। यदि सपा इन क्षेत्रों में आप को जगह देती है तो सीट बंटवारे की प्रक्रिया में कांग्रेस की भूमिका और रणनीति महत्वपूर्ण हो जाएगी।

    2024 के लोकसभा चुनाव में आप ने उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार नहीं उतारे थे और सपा को समर्थन दिया था। चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ प्रेस वार्ता भी की थी। वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सपा ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन किया था।

    ऐसे में उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और आप के संभावित समीकरण को लेकर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। यदि आप की गठबंधन में औपचारिक एंट्री होती है तो सीटों के बंटवारे के साथ-साथ तीनों दलों के बीच क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी रणनीति को लेकर भी बातचीत करनी होगी। फिलहाल सपा और आप के बीच संभावित तालमेल की चर्चा ने यूपी की विपक्षी राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।

  • सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण

    सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चवन्नी को रुपया बनाने वाले बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर तंज कसते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कई ऐसे गठबंधन किए जिनमें छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें राजनीतिक ताकत दी लेकिन बाद में वही सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थकों और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनावी आंकड़े भी अखिलेश के दावे को मजबूती देते हैं और सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों को वास्तव में राजनीतिक फायदा मिला।

    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव से शुरुआत करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। यह उसके लिए बड़ी वापसी थी क्योंकि इससे पहले लगातार दो लोकसभा चुनाव में पार्टी महज पांच पांच सीटों पर सिमट गई थी। इसी चुनाव में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर मैदान में उतरी और छह सीटें जीतने में सफल रही। 2019 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली थी। इस लिहाज से सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके प्रदर्शन में बड़ा सुधार हुआ।

    2024 में जन अधिकार पार्टी को भी सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला। पार्टी के प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर सीट से सपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार लोकसभा का रास्ता तय किया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही से चुनाव हार गए और पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

    अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा और बसपा ने लंबे अंतराल के बाद साथ चुनाव लड़ा था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं जबकि सपा के खाते में सिर्फ पांच सीटें आईं। खास बात यह थी कि 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से 2019 में उसका प्रदर्शन बड़ी वापसी माना गया। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बसपा ने सपा से दूरी बना ली।

    2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने कई छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं। 2017 में रालोद के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। इसी तरह ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। हालांकि अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल को सिराथू से बड़ी जीत मिली लेकिन पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। दूसरी ओर महान दल और जनवादी पार्टी समाजवादी गठबंधन के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सके।

    2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन दोनों दलों को बड़ा फायदा नहीं मिला। सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर सात सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 2012 की तुलना में 21 सीटों का नुकसान हुआ था।

    इन आंकड़ों को देखें तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई बड़े दलों के प्रदर्शन में सुधार जरूर दिखाई देता है। हालांकि हर सहयोगी को समान सफलता नहीं मिली। कुछ दलों को सीटें मिलीं तो कुछ गठबंधन के बावजूद चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर सके। यही वजह है कि अखिलेश के बयान को लेकर राजनीतिक बहस आंकड़ों के साथ साथ गठबंधन की रणनीति और सीट बंटवारे तक पहुंच गई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा और उसके संभावित सहयोगियों के बीच यह सियासी रिश्ता किस दिशा में जाता है।

  • युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:

    युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:


    नई दिल्ली । 
    राष्ट्रगीत, झंडा फहराने और राष्ट्रगान को लेकर राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं ने देशभक्ति से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ युवाओं की बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, टैक्स का बोझ और महंगी होती ईएमआई जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार से इन पर चर्चा करने की मांग की है।

    कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने राष्ट्रगीत को लेकर बीजेपी पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को राष्ट्रगीत के मुद्दे पर अचानक इतना जोर देने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। मसूद ने कहा कि देश में जब राष्ट्रगीत गाने को लेकर विरोध और कार्रवाई की स्थिति बनी थी, तब बीजेपी के लोग इस तरह सामने नहीं आए थे।

    उन्होंने आजादी के बाद के राजनीतिक इतिहास का उल्लेख करते हुए बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसके लोगों ने लंबे समय तक राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और झंडा फहराने जैसे विषयों को लेकर वह भूमिका नहीं निभाई, जिसका दावा अब किया जा रहा है। मसूद ने कहा कि देश की जनता शिक्षित है और राजनीतिक दलों के पुराने रुख तथा उनके वर्तमान बयानों के बीच अंतर को समझती है।

    मसूद ने यह भी कहा कि आज सूचना तकनीक के दौर में लोगों के पास पुराने घटनाक्रमों और बयानों को जानने के कई साधन मौजूद हैं। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी पुराने तथ्य की जानकारी हासिल की जा सकती है। उनके अनुसार देशभक्ति से जुड़े इतिहास को किसी एक संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

    कांग्रेस नेता ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास व्यापक रहा है और इसमें अलग-अलग विचारधाराओं तथा समुदायों से जुड़े लोगों ने योगदान दिया था। इसलिए देशभक्ति पर किसी एक संगठन या राजनीतिक विचारधारा का अधिकार नहीं माना जा सकता। उनके इस बयान के जरिए कांग्रेस ने राष्ट्रवाद की मौजूदा राजनीतिक बहस को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक इतिहास से जोड़ने की कोशिश की।

    वहीं कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने सरकार और बीजेपी नेताओं से जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने की अपील की। उन्होंने रोजगार की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के युवाओं के सामने नौकरियों की चुनौती बनी हुई है। चौधरी ने कहा कि राजनीतिक बहस को उन मुद्दों पर भी केंद्रित किया जाना चाहिए जिनका सीधा असर आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।

    रेणुका चौधरी ने बढ़ती महंगाई, टैक्स के बोझ और ईएमआई महंगी होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और ऐसे समय में सरकार को इन समस्याओं पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रुपये की स्थिति में गिरावट का असर लोगों की आर्थिक परिस्थितियों पर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेताओं के इन बयानों से स्पष्ट है कि पार्टी राष्ट्रगीत और देशभक्ति से जुड़ी बहस के समानांतर आर्थिक और रोजगार संबंधी मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना चाहती है। पार्टी का कहना है कि युवाओं के लिए रोजगार, महंगाई से राहत और आम परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ जैसे विषयों पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

    दूसरी ओर, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह बहस केवल राष्ट्रगीत की स्वीकार्यता तक सीमित रहने के बजाय देशभक्ति की राजनीतिक व्याख्या और जनता से जुड़े आर्थिक मुद्दों तक भी फैल सकती है।

  • E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल

    E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि गन्ने और अनाज के एक हिस्से का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होने से खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि लोगों को एक तरफ सड़क पर वाहन चलाने के दौरान और दूसरी तरफ रसोई में खाद्य सामग्री खरीदते समय कीमत चुकानी पड़ रही है। उन्होंने E20 नीति की दोबारा समीक्षा करने और उपभोक्ताओं को बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने का विकल्प देने की मांग की है।

    कांग्रेस की ओर से चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर गन्ने के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। पार्टी का दावा है कि लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने में इस्तेमाल होने वाला गन्ना इथेनॉल उत्पादन की ओर गया। जयराम रमेश ने इसी संदर्भ में चीनी और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया।

    उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन महीनों में चीनी की कीमत 48 रुपये से बढ़कर 67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने गुड़, चावल और मक्के के आटे जैसी कुछ अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का उल्लेख किया है। हालांकि, अलग-अलग बाजारों और क्षेत्रों में इन वस्तुओं की कीमतों में अंतर हो सकता है।

    E20 पेट्रोल को लेकर कांग्रेस ने वाहनों के माइलेज का मुद्दा भी उठाया है। पार्टी का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ने से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता प्रभावित हो सकती है। खासकर पुराने वाहनों को लेकर भी कांग्रेस ने संभावित तकनीकी समस्याओं की चिंता जताई है।

    कांग्रेस की मांग है कि उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत और वाहन की तकनीकी क्षमता के अनुसार बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल खरीदने का विकल्प मिलना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि ईंधन संबंधी नीतियों में उपभोक्ता हितों और वाहन मालिकों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    दूसरी ओर, चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाया है। सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के देश में लाने की मंजूरी दी। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर दबाव कम करना है।

    दिल्ली में 21 अगस्त को चीनी की कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। कीमतों में बढ़ोतरी और सरकार के आयात फैसले के बाद E20 नीति को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। कांग्रेस इसे खाद्य महंगाई और वाहन माइलेज से जोड़ रही है, जबकि सरकार का चीनी आयात का कदम बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में है।

    इथेनॉल मिश्रण नीति का उद्देश्य पेट्रोल में वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाना, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फीडस्टॉक से अतिरिक्त बाजार तैयार करना रहा है। हालांकि, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और वाहन ईंधन दक्षता पर इसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।

    आने वाले समय में चीनी की कीमतों, घरेलू आपूर्ति और E20 ईंधन के वास्तविक प्रभाव के आंकड़े इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने नीति की समीक्षा और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प देने की मांग को केंद्र में रखा है, जबकि सरकार का ताजा कदम चीनी की उपलब्धता बढ़ाकर बाजार कीमतों को नियंत्रित करने पर केंद्रित है।

  • राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि पहुंचे सोनिया, राहुल और प्रियंका, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

    राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि पहुंचे सोनिया, राहुल और प्रियंका, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

    नई दिल्ली ।भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती पर गुरुवार को देशभर में उन्हें याद किया गया। 20 अगस्त को मनाए जाने वाले इस अवसर को सद्भावना दिवस के रूप में भी जाना जाता है। दिल्ली स्थित वीर भूमि पर राजीव गांधी की समाधि पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

    कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने वीर भूमि पहुंचकर राजीव गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित किए। इस दौरान कांग्रेस नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री के राजनीतिक जीवन, विचारों और देश के विकास में उनके योगदान को याद किया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री को याद करते हुए उनके योगदान को नमन किया। इसके अलावा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित अन्य नेताओं ने भी राजीव गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

    राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ था। वह देश के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने अपेक्षाकृत कम उम्र में यह जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभाली और 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। वह 1984 से 1989 तक इस पद पर रहे।

    राजीव गांधी के कार्यकाल को भारत में तकनीक, संचार, शिक्षा और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए भी याद किया जाता है। उनके समर्थक उन्हें युवा भारत की बदलती जरूरतों और तकनीकी विकास के साथ देश को आगे बढ़ाने वाले नेताओं में शामिल करते हैं। उनके राजनीतिक विचारों में युवाओं की भागीदारी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष जोर रहा।

    कांग्रेस नेताओं ने जयंती के अवसर पर राजीव गांधी की उस विरासत को भी रेखांकित किया, जिसमें युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने और देश में आधुनिक तकनीकी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया था। मतदान की न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करने का संवैधानिक बदलाव भी उनके प्रधानमंत्रित्व काल की महत्वपूर्ण पहलों में गिना जाता है। इससे बड़ी संख्या में युवाओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिला।

    राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन हालांकि उपलब्धियों के साथ-साथ कई विवादों और चुनौतियों से भी जुड़ा रहा। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी वह राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा के दौरान आत्मघाती हमले में उनकी हत्या कर दी गई थी।

    राजीव गांधी की जयंती पर होने वाले कार्यक्रम हर वर्ष उनकी सार्वजनिक और राजनीतिक विरासत को याद करने का अवसर बनते हैं। वीर भूमि पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे नेताओं ने उनके योगदान को स्मरण करते हुए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, तकनीकी प्रगति और युवाओं की भूमिका से जुड़े उनके विचारों को रेखांकित किया। इस अवसर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का एक साथ पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देना उनके राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन की व्यापक पहचान को भी दर्शाता है।

  • भारतीय मूल की पिया डांडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेस क्षेत्र में डेमोक्रेटिक प्राथमिक चुनाव जीतकर नवंबर मुकाबले का रास्ता साफ किया

    भारतीय मूल की पिया डांडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेस क्षेत्र में डेमोक्रेटिक प्राथमिक चुनाव जीतकर नवंबर मुकाबले का रास्ता साफ किया


    नई दिल्ली ।
    भारतीय मूल की पिया डांडिया ने अमेरिकी राजनीति में महत्वपूर्ण सफलता हासिल करते हुए फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेस क्षेत्र के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी का प्राथमिक चुनाव जीत लिया है। पूर्व स्कूल प्रिंसिपल डांडिया ने वकील कायसिया अर्ली को हराकर नवंबर में होने वाले आम चुनाव के लिए पार्टी का उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ कर लिया है। प्राथमिक चुनाव में डांडिया को 68.6 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी अर्ली को 31.4 प्रतिशत मत प्राप्त हुए।

    डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने प्राथमिक चुनाव में जीत के बाद पिया डांडिया को बधाई दी। पार्टी ने उनके लंबे समय से शिक्षा और समुदाय से जुड़े नेतृत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वह लोगों के लिए नए अवसर बढ़ाने और कामकाजी परिवारों के हितों के लिए काम करने के उद्देश्य से चुनाव मैदान में उतरी हैं।

    अब पिया डांडिया का मुकाबला नवंबर में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार पूर्व नौसैनिक कैसी असकर से होगा। यह चुनाव फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेस क्षेत्र में दोनों दलों के बीच सीधा मुकाबला होगा। इस सीट को चुनावी क्षेत्र के नए परिसीमन के बाद बनाया गया है और प्राथमिक चुनाव के समय यहां कोई मौजूदा सांसद चुनाव मैदान में नहीं था।

    पिया डांडिया इससे पहले फ्लोरिडा के 21वें जिले से रिपब्लिकन पार्टी के सांसद ब्रायन मास्ट को चुनौती देने की कोशिश कर चुकी हैं। ब्रायन मास्ट विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष हैं। बाद में डांडिया दक्षिण फ्लोरिडा के 22वें जिले में चली गईं और उन्होंने इसी क्षेत्र से डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की तैयारी की।

    डांडिया की राजनीतिक पृष्ठभूमि से पहले उनका पेशेवर जीवन शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। वह अमेरिका में हाई स्कूल की प्रिंसिपल रह चुकी हैं। शिक्षा क्षेत्र में काम करने के दौरान छात्रों और समुदाय से जुड़े मुद्दों पर उनका अनुभव रहा है। इसी पृष्ठभूमि को वह अपने राजनीतिक अभियान में भी प्रमुखता से सामने रख रही हैं।

    पिया डांडिया के माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। भारतीय मूल की पृष्ठभूमि के कारण उनकी राजनीतिक यात्रा अमेरिकी समुदाय के साथ-साथ भारतीय मूल के लोगों के बीच भी रुचि का विषय बनी हुई है। प्राथमिक चुनाव में मिली स्पष्ट जीत ने नवंबर के आम चुनाव के लिए उनकी स्थिति मजबूत की है।

    जीत के बाद डांडिया ने अपने संदेश में अभियान पर भरोसा जताने वाले लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वह अपने छात्रों, अपने बेटे और जिले में बड़े हो रहे उन बच्चों के लिए चुनाव में उतरी हैं, जो बेहतर भविष्य के हकदार हैं। उन्होंने अपने अभियान को आम परिवारों की आर्थिक चुनौतियों से जोड़ते हुए खर्च कम करने और भ्रष्टाचार खत्म करने की बात कही।

    डांडिया ने कहा कि उनका उद्देश्य वॉशिंगटन को फिर से आम लोगों के लिए काम करने वाला बनाना है। उनके अभियान में परिवारों के लिए रोजमर्रा के खर्च, स्वास्थ्य सेवाओं और आवास की लागत जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने भी इन्हीं मुद्दों को दक्षिण फ्लोरिडा के परिवारों से जोड़ते हुए डांडिया के समर्थन को आगे बढ़ाने की बात कही है।

    नवंबर में होने वाला चुनाव पिया डांडिया के राजनीतिक करियर के लिए अगली बड़ी परीक्षा होगा। प्राथमिक चुनाव में मजबूत प्रदर्शन के बाद अब उन्हें रिपब्लिकन उम्मीदवार कैसी असकर का सामना करना है। चुनाव परिणाम यह तय करेगा कि फ्लोरिडा का 22वां कांग्रेस क्षेत्र अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में किस दल का प्रतिनिधित्व करेगा। डांडिया की जीत के साथ भारतीय मूल के उम्मीदवार के रूप में उनकी राजनीतिक यात्रा ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है।

  • वंदे मातरम् विवाद पर कंगना रनौत का कांग्रेस पर हमला, कहा बीजेपी विरोध करते करते देश विरोधी सोच तक पहुंची पार्टी

    वंदे मातरम् विवाद पर कंगना रनौत का कांग्रेस पर हमला, कहा बीजेपी विरोध करते करते देश विरोधी सोच तक पहुंची पार्टी

    नई दिल्ली । स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बयानबाजी के बीच और तेज हो गया है। हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व को निशाने पर लेते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने वंदे मातरम् को भारत की चेतना से जुड़ा बताया और कांग्रेस नेताओं के रुख पर सवाल खड़े किए।

    कंगना रनौत ने कहा कि वंदे मातरम् देश की भावनाओं और चेतना को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि एक कलाकार होने के नाते वह इस बात को समझती हैं कि किसी कविता या रचना का समाज और देश पर कितना गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि वंदे मातरम् को लेकर इतनी नाराजगी या विरोध की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।

    बीजेपी सांसद ने कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया पर भी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि विवाद के दौरान कैमरे के सामने असहजता दिखाई गई और कैमरा बंद कराने की कोशिश की गई। इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस नेताओं की तुलना पाकिस्तान से करते हुए कहा कि उनके अनुसार पड़ोसी देश के लोग भी वंदे मातरम् को लेकर उतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं देते, जितनी कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से देखने को मिल रही है।

    कंगना ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि पार्टी के नेता इस पूरे विवाद के कारण देशभर में चर्चा का विषय बन गए हैं। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस पहले बीजेपी का विरोध करती थी, लेकिन अब उसकी राजनीति ऐसी दिशा में पहुंच गई है जिसे वह देश विरोधी मानती हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस बयान पर प्रतिक्रिया सामने आने पर ही राजनीतिक विवाद का अगला पक्ष स्पष्ट होगा।

    कंगना रनौत ने यह बयान मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर में दर्शन करने के बाद दिया। 18 अगस्त की सुबह मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने मंदिर में पूजा की और कहा कि सिद्धिविनायक पूरे मुंबई के रक्षक माने जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वह मंदिर में दर्शन करने आती हैं।

    इसी दौरान कंगना ने बीजेपी के सामने सोशल मीडिया से जुड़ी एक नई चुनौती का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे दिमागी नक्सलवाद की चुनौती बताया और कहा कि गलत सूचनाओं के प्रसार से निपटना जरूरी है। उनके मुताबिक सोशल मीडिया और रील कल्चर के कारण युवाओं और महिलाओं तक कई बार ऐसी जानकारियां पहुंच रही हैं जो उन्हें भ्रमित कर सकती हैं।

    कंगना ने कहा कि पहले लोगों के विचारों और जानकारी के निर्माण में समाचार पत्रों, किताबों और माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी, लेकिन अब सोशल मीडिया लोगों के लिए जानकारी का बड़ा माध्यम बन गया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाओं को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि इससे निपटने के लिए जागरूकता और तैयारी जरूरी है।

    वंदे मातरम् को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय प्रतीकों, देशभक्ति और राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कंगना के बयान के बाद यह विवाद राजनीतिक स्तर पर और तीखा होने की संभावना है। बीजेपी और कांग्रेस के बीच पहले से जारी वैचारिक टकराव के बीच वंदे मातरम् का मुद्दा भी अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।

  • वंदे मातरम विवाद पर मल्लिकार्जुन खरगे का पलटवार, बोले गांधी नेहरू और पटेल की परंपरा के अनुसार ही गीत गाया

    वंदे मातरम विवाद पर मल्लिकार्जुन खरगे का पलटवार, बोले गांधी नेहरू और पटेल की परंपरा के अनुसार ही गीत गाया

    नई दिल्ली । वंदे मातरम को लेकर देश में जारी राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भारतीय जनता पार्टी के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। खरगे ने कहा कि उन्होंने वही वंदे मातरम गाया है, जिसे महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेता भी गाते रहे हैं। उनके बयान के बाद इस मुद्दे पर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी और तेज हो गई है।

    खरगे ने कहा कि कांग्रेस ने वंदे मातरम को लेकर किसी नई परंपरा की शुरुआत नहीं की है। उनके मुताबिक पार्टी लंबे समय से चली आ रही परंपरा का ही पालन कर रही है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या किसी विशेष तरीके से राष्ट्रगीत गाने को अपराध माना जा सकता है।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर वंदे मातरम गाना अपराध है तो फिर उन ऐतिहासिक नेताओं के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने इसी रूप में इसे गाया था। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल का उल्लेख करते हुए अपने तर्क को सामने रखा।

    खरगे ने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी को यह समझना चाहिए कि राष्ट्रीय गीतों और उनसे जुड़ी परंपराएं उसके राजनीतिक अस्तित्व से काफी पहले की हैं। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस ने करीब नौ दशक से चली आ रही परंपरा को ही आगे बढ़ाया है। उनके बयान में यह संदेश देने की कोशिश दिखाई दी कि वंदे मातरम को लेकर वर्तमान विवाद को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

    उन्होंने सरकार और राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। खरगे ने कहा कि यदि किसी एक सरकार के निर्णय को ही राष्ट्रीय नियम मान लिया जाए तो भविष्य में सत्ता बदलने पर अलग नियम बनाए जा सकते हैं। उनके अनुसार राष्ट्रीय प्रतीकों और उनसे जुड़ी परंपराओं को राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर बदलने के बजाय व्यापक सहमति के साथ देखा जाना चाहिए।

    वंदे मातरम को लेकर मौजूदा विवाद स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया है कि दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वंदे मातरम का गायन बीच में रोक दिया गया था। आरोप के अनुसार सोनिया गांधी ने इशारे के माध्यम से गीत को रोकने के लिए कहा था। इसके बाद इस घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

    कांग्रेस की ओर से इस विवाद के बीच अपने रुख को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। खरगे का बयान इसी राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने वंदे मातरम के गायन को ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि पार्टी ने किसी नई व्यवस्था का पालन नहीं किया।

    वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा महत्वपूर्ण गीत रहा है और इसे देश के राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। राष्ट्रगान जन गण मन से अलग इसकी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमिका है। इसी वजह से इससे जुड़ी किसी भी राजनीतिक टिप्पणी पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

    मौजूदा विवाद में एक तरफ बीजेपी कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस इसे पुरानी परंपरा और राजनीतिक विवाद का विषय बता रही है। खरगे के बयान के बाद यह बहस और व्यापक हो गई है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।

  • वंदे मातरम पर कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद का बयान, बोले दो छंद ही गाऊंगा जेल या फांसी मंजूर

    वंदे मातरम पर कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद का बयान, बोले दो छंद ही गाऊंगा जेल या फांसी मंजूर

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह वंदे मातरम के केवल दो छंद ही गाएंगे। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उन्हें जेल भेज दिया जाए या फांसी दे दी जाए, लेकिन वह पूरा वंदे मातरम नहीं गाएंगे। उनके इस बयान के बाद राष्ट्रगीत को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

    हरिप्रसाद का बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के गायन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण के दौरान राष्ट्रगीत के गायन को लेकर भी विवाद सामने आया था। इस दौरान गीत के पूरे गायन और कार्यक्रम में उसके प्रस्तुतीकरण को लेकर अलग अलग दावे किए गए।

    इसके बाद गोवा में आयोजित कांग्रेस की बैठक में भी वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद गाए जाने का मामला सामने आया। इस कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद थे। दो छंदों तक सीमित गायन को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठे और पार्टी के रुख को लेकर राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई।

    इसी बीच बीके हरिप्रसाद के बयान ने इस विवाद को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपने रुख को दोहराते हुए कहा कि वह वंदे मातरम के दो छंद ही गाएंगे। उनके बयान में जेल और फांसी का उल्लेख किए जाने से राजनीतिक प्रतिक्रिया और तीखी होने की संभावना बढ़ गई है।

    वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके सम्मान और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके गायन को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा होती रही है। राष्ट्रगीत के कुछ हिस्सों को लेकर ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों पर भी अलग अलग राजनीतिक विचार सामने आते रहे हैं।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने वही वंदे मातरम गाया है जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं से भी जोड़ा जाता है। खरगे ने यह सवाल भी उठाया कि यदि वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस के नेताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो ऐतिहासिक रूप से इससे जुड़े अन्य नेताओं के रुख पर भी चर्चा होनी चाहिए।

    खरगे ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने देश के राष्ट्रीय गीतों से संबंधित विषयों पर अपने ऐतिहासिक निर्णय पहले ही लिए थे। उनका तर्क है कि किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के कहने मात्र से राष्ट्रीय मानक निर्धारित नहीं किए जा सकते।

    वहीं केंद्र सरकार की ओर से वंदे मातरम के सम्मान को लेकर हाल में कड़े प्रावधान किए जाने की चर्चा है। जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान करने या उसके गायन में बाधा डालने से जुड़े मामलों में कार्रवाई की व्यवस्था को लेकर भी राजनीतिक बहस चल रही है।

    स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले के कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम के गायन को भी इस विवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में बीके हरिप्रसाद का बयान केवल व्यक्तिगत रुख तक सीमित नहीं रहने वाला है और इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

    अब इस मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर आगे क्या रुख अपनाया जाता है और अन्य राजनीतिक दल किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, इस पर नजर रहेगी। वंदे मातरम को लेकर सामने आया ताजा विवाद राष्ट्रगीत, ऐतिहासिक परंपरा और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच चल रही बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।