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  • दिल्ली में धरना…. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द को बताया सीट चोरी.. EC से भिड़ गए रमेश

    दिल्ली में धरना…. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द को बताया सीट चोरी.. EC से भिड़ गए रमेश


    नई दिल्ली।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में होने वाले राज्य सभा चुनाव (Rajya Sabha Elections) में कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) का नामांकन खारिज कर दिया गया है। उन पर आपराधिक मामलों की जानकारी छुपाने के आरोप हैं। इस घटना से नाराज कांग्रेस नेताओं ने जहां इसे सीट चोरी बताया है, वहीं इसकी शिकायत करने सीधे चुनाव आयोग के दफ्तर जा पहुंचे। मामले में शिकायत दर्ज करवाने कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मंगलवार (9 जून) की शाम नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के मुख्यालय पहुंचे तो उन्हें अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। इस दौरान कांग्रेस महासिव जयराम रमेश को आयोग के सुरक्षा अधिकारियों से भिड़ते हुए देखा गया। रमेश ने धौंस दिखाते हुए सुरक्षा अधिकारियों से कहा कि कहानी मत बनाओ, 35 साल से सांसद हूं। अंदर आयोग के वेटिंग रूम में जाने दो, जब इसके बाद भी उन्हें इजाजत नहीं मिली तो कांग्रेस नेता मुख्य द्वार पर ही धरने पर बैठ गए।

    जयराम रमेश के साथ कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सचिन पायलट तथा कुछ अन्य नेता मंगलवार देर शाम आयोग के मुख्यालय पहुंचे थे। कांग्रेस का आरोप है कि उनके उम्मीदवार का नामांकन सिर्फ एक नोटिस का हवाला देकर खारिज कर दिया गया, जबकि उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है। वेणुगोपाल ने संवाददाताओं ने कहा कि जब तक कांग्रेस नेताओं को आयोग के भीतर जाने की इजाजत नहीं मिलती, तब तक धरना जारी रहेगा। हालांकि, कुछ देर बाद आयोग की ओर से पार्टी के दो नेताओं को ज्ञापन सौंपने की अनुमति मिली और फिर वेणुगोपाल एवं बघेल ने अंदर जाकर ज्ञापन सौंपा। इसके बाद घरना खत्म कर दिया गया।


    इंसाफ दीजिए, नहीं तो जाएंगे कोर्ट

    वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, ”शाम 7.25 बजे हमने निर्वाचन आयोग को शिकायत दर्ज कराने के मकसद से मुलाकात के वक्त के लिए पत्र दिया। अब निर्वाचन आयोग के अंदर हमें जाने नहीं दिया जा रहा है।” उन्होंने सवाल किया, ”इस देश में क्या हो रहा है? क्या यह ‘बनाना रिपब्लिक’ है?” वेणुगोपाल का कहना था, ”हमें इंसाफ चाहिए, (हम) कानूनी कदम उठाएंगे, हम अदालत भी जाएंगे।” उन्होंने दावा किया कि बिना किसी कारण के नटराजन का नामांकन रद्द कर दिया गया है।


    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ

    वहीं सचिन पायलट ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ न तो कोई मामला दर्ज है, न आरोप-पत्र दाखिल हुआ है और न ही किसी मामले में सजा हुई है, इसके बावजूद एक नोटिस मिलने का हवाला देकर नामांकन खारिज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इसके पीछे निश्चित तौर पर कोई षड्यंत्र है और इसपर निर्वाचन आयोग को ध्यान देना चाहिए। पायलट का कहना था कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि एक राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार का नामांकन बिना किसी कारण के खारिज कर दिया गया हो।


    नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करना भाजपा की साजिश

    इससे पहले, वेणुगोपाल ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करना भाजपा द्वारा गुप्त तरीके से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नष्ट करने का एक प्रयास है। उनके नामांकन में किसी भी त्रुटि या कोई जानकारी छिपाने का आरोप पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण है और कांग्रेस से एक सीट छीनने का यह हताशापूर्ण प्रयास है।” उनका कहना था, ”जब उन्हें (भाजपा को) एहसास हुआ कि हमारे कांग्रेस विधायकों से सौदा करने की उनकी गंदी चालें विफल होने वाली हैं, तो वे इतने नीचे गिर गए कि उनका (मीनाक्षी नटराजन का) नामांकन खारिज करवा दिया।”

    वेणुगोपाल ने दावा किया कि यह संविधान और लोकतंत्र के प्रति भाजपा की खोखली प्रतिबद्धता को दर्शाता है और वह हर कदम पर किसी न किसी तरह “वोट चोरी” पर आमादा है। कांग्रेस नेता ने कहा, ”हम लोकतंत्र की इस दिनदहाड़े लूट को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसके खिलाफ कानूनी तथा सड़क पर उतरकर लड़ाई लड़ेंगे।”

  • इंडिया गठबंधन में कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं…. इंडिया गठबंधन में सहयोगियों दलों ने खोला मोर्चा

    इंडिया गठबंधन में कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं…. इंडिया गठबंधन में सहयोगियों दलों ने खोला मोर्चा


    नई दिल्ली।
    हाल ही में तमिलनाडु (Tamil Nadu), केरल (Kerala) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) के विधानसभा चुनावों (Assembly Elections) के बाद ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन में दरारें गहरी होती जा रही हैं। सोमवार को नई दिल्ली में हुई विपक्षी दलों की अहम बैठक में वीसीके (VCK) और वामपंथी दलों ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर जोरदार हमला बोला है। तमिलनाडु की सत्ता से बाहर हुई डीएमके की नाराजगी इस कदर बढ़ गई है कि उसने गठबंधन में कांग्रेस के मौजूद रहने पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

    डीएमके की दो टूक- ‘कांग्रेस रहेगी तो हम नहीं’
    डीएमके के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा तभी बनेगी, जब कांग्रेस इस गुट का हिस्सा नहीं होगी। डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “हम चुनाव प्रणाली ‘SIR’ के मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजे जाने वाले पत्र पर भी हस्ताक्षर नहीं करेंगे।” नई दिल्ली में हुई इस बैठक में कांग्रेस द्वारा डीएमके से नाता तोड़ने का मुद्दा पूरी तरह छाया रहा और सहयोगियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी।


    राहुल गांधी पर वामदलों का सीधा हमला

    केरल में कांग्रेस और वामदलों के बीच की तल्खी बैठक के दौरान खुलकर सामने आ गई। सीपीएम नेता जॉन ब्रिटास, सीपीआई के संतोष कुमार और डी. राजा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने केरल चुनाव के दौरान लेफ्ट को ‘बीजेपी की बी-टीम’ बताया था।

    वामपंथी नेताओं ने डीएमके के गठबंधन से अलग होने के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराया और कई आरोप लगाए। जैसे- कांग्रेस ने तमिलनाडु चुनाव खत्म होने के ठीक बाद अचानक टीवीके (TVK) के पाले में जाकर द्रविड़ पार्टी (डीएमके) को उकसाने का काम किया है। कांग्रेस के इसी रवैये के कारण डीएमके ने गठबंधन छोड़ने जैसा बड़ा कदम उठाया।


    कांग्रेस की रणनीति से बिखर रहा है विपक्ष: वीसीके

    बैठक के दौरान वीसीके (VCK) के प्रमुख तोल थिरुमावलवन ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पार्टी के हालिया फैसलों ने कई सहयोगी दलों के भीतर गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। उन्होंने गठबंधन के भविष्य पर चिंता जताते हुए कुछ अहम बिंदु रखे: जैसे- केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस की जो रणनीति रही है, उसने गठबंधन के उन प्रमुख स्तंभों को कमजोर किया है जो अब तक मजबूती से खड़े थे। कांग्रेस के इस रवैये से मुख्य रूप से डीएमके, टीएमसी (TMC) और सीपीएम (CPM) जैसी अहम पार्टियों को नुकसान पहुंचा है। वीसीके प्रमुख ने स्पष्ट किया कि विपक्षी एकजुटता के बड़े लक्ष्य को देखते हुए कांग्रेस की यह रणनीति न तो वांछनीय है और न ही किसी भी तरह से फायदेमंद।

    सूत्रों ने बताया कि बैठक में शामिल माकपा के राज्यसभा सदस्य ने राहुल गांधी और कांग्रेस के आरोपों का विषय उठाया। भाकपा महासचिव डी राजा ने भी इसको लेकर नाराजगी जताई कि राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस द्वारा केरल में वाम नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए गए।

    सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की नीति के तहत पार्टी की ओर से चुनाव में एक विषय उठाया गया था। विपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने भी कहा कि अब इन बातों को भूलकर आगे बढ़ना है और मिलकर भाजपा का मुकाबला करना है। सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कहा कि गठबंधन के घटक दलों को एक दूसरे की आलोचना से बचना चाहिए।


    क्या रहा बैठक का नतीजा?

    विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक में शामिल कई नेताओं ने पुराने गिले-शिकवे भूलकर, बड़ा दिल दिखाते हुए और एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा मोदी सरकार को चुनौती देने का सुझाव दिया।

    सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इस बात की जोरदार पैरवी की कि गठबंधन में शामिल दलों को एक दूसरे की आलोचना करने से बचना चाहिए। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद इस गठबंधन को लेकर उनके रुख में बड़ा बदलाव आया है।

    बैठक में ममता और कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात भी हुई। सूत्रों ने बताया कि बैठक औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ममता ने सोनिया गांधी से करीब 10 मिनट लंबी बातचीत की। कांग्रेस ने दोनों नेताओं की एक-दूसरे को गले लगाते हुए तस्वीर भी अपने सोशल मीडिया मंच पर साझा की।

  • झारखंड राज्यसभा सीटों पर सियासी गतिरोध खत्म, JMM-कांग्रेस में 1-1 सीट पर बनी निर्णायक सहमति

    झारखंड राज्यसभा सीटों पर सियासी गतिरोध खत्म, JMM-कांग्रेस में 1-1 सीट पर बनी निर्णायक सहमति

    नई दिल्ली । झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों को लेकर महागठबंधन के दो प्रमुख घटक दल, झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के बीच जारी विवाद अब समाप्त हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बताया कि दोनों दलों के लिए एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने की सहमति हो गई है। इससे पहले झामुमो के विधायकों ने दोनों सीटों पर दावा ठोक दिया था, जिससे गठबंधन में तनातनी बढ़ गई थी।

    पूर्व विधायक बैद्यनाथ राम को झामुमो ने राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया है। बैद्यनाथ राम लातेहार से पूर्व विधायक रह चुके हैं और आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने में उनका योगदान सराहनीय माना जाता है। झामुमो के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि बैद्यनाथ राम पार्टी के मजबूत और समर्पित कार्यकर्ता हैं और उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

    जानकारी के अनुसार, इस विवाद को सुलझाने में पार्टी के वरिष्ठ पर्यवेक्षक, भूपेश बघेल और अजय शर्मा ने सीएम हेमंत सोरेन से लंबी चर्चा की। इसके बाद सीएम ने दोनों दलों के लिए एक-एक सीट पर उम्मीदवार तय करने पर सहमति दे दी। राज्यसभा की दो सीटों पर अब कांग्रेस और जेएमएम के एक-एक उम्मीदवार मैदान में होंगे।

    बताया जा रहा है कि झारखंड में पहले कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार प्रणव झा का नाम घोषित कर दिया था, जिससे जेएमएम नेतृत्व में नाराजगी उत्पन्न हो गई थी। पार्टी के नेताओं का आरोप था कि कांग्रेस ने जेएमएम को विश्वास में लिए बिना नाम की घोषणा की थी। हालांकि अब दोनों पार्टियों के बीच सभी मतभेद दूर होते दिख रहे हैं और सहमति से उम्मीदवार तय हो गए हैं।

    सीएम हेमंत सोरेन ने रविवार रात गठबंधन के सभी विधायकों को डिनर पर बुलाया। इस बैठक का मकसद गठबंधन के भीतर आपसी सामंजस्य बनाए रखना और भविष्य में सहयोग को मजबूत करना बताया गया है। इससे पहले JMM की ओर से दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने की संभावना जताई गई थी, लेकिन अब विवाद खत्म होकर गठबंधन में स्थिरता लौट आई है।

    राज्यसभा चुनाव से पहले इस तरह का समाधान महागठबंधन के लिए राहत भरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों दलों की आपसी सहमति से न केवल राज्यसभा में प्रतिनिधित्व तय होगा, बल्कि भविष्य में झारखंड में गठबंधन को भी मजबूती मिलेगी। बैद्यनाथ राम के नाम पर सहमति से आदिवासी और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखा गया है।

    हालांकि चुनाव की प्रक्रिया अभी जारी है, लेकिन JMM और कांग्रेस के बीच विवाद के शांत होने से महागठबंधन की छवि बेहतर बनी है। दोनों दलों के नेताओं ने आपसी सहयोग और संवाद को ही भविष्य में निर्णय लेने का आधार बनाने का संकल्प जताया है। इससे राज्यसभा चुनाव की तैयारी और रणनीति को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

  • NFHS डेटा पर बढ़ा सियासी घमासान, नड्डा बोले- अधूरी जानकारी से नहीं, तथ्यों से होता है देश का भला

    NFHS डेटा पर बढ़ा सियासी घमासान, नड्डा बोले- अधूरी जानकारी से नहीं, तथ्यों से होता है देश का भला

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। स्वास्थ्य क्षेत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों को लेकर दोनों दलों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए हैं। इस विवाद का केंद्र स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की व्याख्या और उनके सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण को लेकर उठे सवाल हैं।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से केंद्र सरकार पर महिलाओं और बच्चों से जुड़े स्वास्थ्य तथा पोषण संबंधी आंकड़ों को सार्वजनिक न करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि संबंधित आंकड़े सरकार की नीतिगत विफलताओं को उजागर करते हैं और इसी कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से सामने नहीं लाया जा रहा है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।

    खरगे के आरोपों के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कड़ा प्रतिवाद किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नड्डा ने कहा कि अधूरी जानकारी या चुनिंदा तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है और इससे वास्तविक स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आती।

    स्वास्थ्य मंत्री ने अपने जवाब में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के विभिन्न आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि पिछले वर्षों में देश के स्वास्थ्य ढांचे में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किए गए हैं। उनके अनुसार मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, संस्थागत प्रसव और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी में होने वाले प्रसव के मामलों में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। उन्होंने इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए व्यापक बदलावों और सरकारी प्रयासों का परिणाम बताया।

    नड्डा ने कहा कि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पंजीकरण कराने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है, जबकि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में होने वाले प्रसव का प्रतिशत भी काफी बढ़ा है। उनके अनुसार इन बदलावों ने मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में योगदान दिया है।

    केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए सुधारों का मूल्यांकन व्यापक आंकड़ों और दीर्घकालिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि देश की स्वास्थ्य यात्रा की वास्तविक कहानी प्रगति और सुधार की है, न कि केवल कमियों और चुनौतियों की। उन्होंने सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, टीकाकरण कार्यक्रमों और चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया।

    दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण संकेतकों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है और सरकार इन पहलुओं पर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरत रही है। पार्टी का कहना है कि जनता को स्वास्थ्य संबंधी सभी आंकड़ों तक पूरी पहुंच मिलनी चाहिए ताकि नीतियों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े किसी भी देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति को मापने का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। ऐसे में इन आंकड़ों की व्याख्या और प्रस्तुति को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक और संतुलित चर्चा को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

    फिलहाल एनएफएचएस के आंकड़ों को लेकर शुरू हुई यह बहस राजनीतिक स्तर पर जारी है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच और अधिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं, क्योंकि स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े विषय सीधे तौर पर करोड़ों नागरिकों के जीवन से जुड़े हुए हैं।

  • केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात, बिना औपचारिक अनुमति प्रदर्शन की तैयारी में जुटी कॉकरोच पार्टी

    केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात, बिना औपचारिक अनुमति प्रदर्शन की तैयारी में जुटी कॉकरोच पार्टी

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में हुई कथित धांधलियों और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले एक बड़े छात्र आंदोलन से पहले राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के बीच तेजी से पहचान बनाने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का समर्थन जुटाने के प्रयास में बड़ा झटका लगा है। देश के सबसे बड़े युवा संगठनों में से एक इंडियन यूथ कांग्रेस (आईवाईसी) ने इस नए गुट के साथ किसी भी प्रकार का राजनीतिक मंच साझा करने या उनके आंदोलन में सीधे तौर पर शामिल होने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।

    इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के पीछे दोनों संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच हुई एक बंद कमरे की बैठक को माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और रणनीतिकार हाल ही में यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब से मुलाकात करने पहुंचे थे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर बड़े आंदोलनों का अनुभव रखने वाले यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का संगठनात्मक सहयोग प्राप्त करना था। सीजेपी का मानना था कि ऑनलाइन लोकप्रियता को सड़क पर एक प्रभावी और अनुशासित भीड़ में बदलने के लिए उन्हें कांग्रेस के युवा मोर्चे के संगठनात्मक ढांचे और तजुर्बे की आवश्यकता होगी, जिससे उनकी स्वीकार्यता आम जनता के बीच और अधिक मजबूत हो सके।

    हालांकि, यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष उदय भानु चिब ने इस प्रकार के किसी भी गठबंधन की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के युवाओं और छात्रों से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे को उठाने वाले हर संगठन का वे व्यक्तिगत और नैतिक तौर पर स्वागत करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की नीति किसी अन्य नए या अपरिचित संगठन के मंच पर जाकर उनके नेतृत्व में आंदोलन करने की इजाजत नहीं देती। कांग्रेस के भीतर चल रही रणनीतिक चर्चाओं के अनुसार, पार्टी का थिंक-टैंक इस नए आंदोलन को लेकर बेहद सतर्क और आशंकित नजर आ रहा है।

    कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों को अंदेशा है कि सीजेपी का यह नया छात्र आंदोलन वर्ष 2011 में हुए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन की राह पर जा सकता है, जिसने तत्कालीन सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर अंततः एक नए राजनीतिक दल को जन्म दिया था। कांग्रेस को खुफिया इनपुट मिले हैं कि इस नए संगठन के तार उनके कुछ प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से परोक्ष रूप से जुड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने सभी सदस्यों और जमीनी कार्यकर्ताओं को निर्देश जारी किए हैं कि वे इस आंदोलन से एक निश्चित दूरी बनाकर रखें और युवाओं के इस मुद्दे को अपने स्वतंत्र मंचों से उठाएं।

    इस राजनीतिक खींचतान के बीच दिल्ली का सुरक्षा तंत्र और पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह से अलर्ट मोड पर आ गया है। आगामी छह जून को प्रस्तावित इस विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर नई दिल्ली और जंतर-मंतर के आसपास के संवेदनशील इलाकों में एक हजार से अधिक दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात कर दिया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अड़े इस संगठन के प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने पूरी सुरक्षा घेराबंदी कर दी है ताकि लुटियंस दिल्ली की कानून व्यवस्था में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो।

    एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, पुलिस प्रशासन को इस प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के बारे में अब तक केवल सोशल मीडिया पोस्ट और ऑनलाइन प्रसारित हो रहे संदेशों के माध्यम से ही सूचनाएं प्राप्त हुई हैं। अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाले इस संगठन की ओर से अब तक पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने या किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को प्रदर्शन की अनुमति के लिए कोई औपचारिक आवेदन या सूचना पत्र नहीं सौंपा गया है। पुलिस ने साफ किया है कि बिना पूर्व अनुमति के किसी भी प्रकार के जमावड़े की इजाजत नहीं दी जाएगी, हालांकि यदि संगठन की ओर से औपचारिक अनुरोध आता है, तो सुरक्षा और रूट नियमों के आधार पर उस पर विचार किया जा सकता है।

  • शपथ के दो दिन बाद ही कांग्रेस सरकार में खींचतान, विभाग आवंटन को लेकर वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी खुलकर सामने आई

    शपथ के दो दिन बाद ही कांग्रेस सरकार में खींचतान, विभाग आवंटन को लेकर वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी खुलकर सामने आई

    नई दिल्ली । कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व में गठित नई कांग्रेस सरकार को गठन के शुरुआती दिनों में ही आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। मंत्रिमंडल में विभागों के आवंटन को लेकर उठे विवाद अब और गहराते दिखाई दे रहे हैं। वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी की नाराजगी के बाद अब खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री केएच मुनियप्पा ने भी अपने विभाग में बदलाव की मांग उठाकर सरकार और पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।

    सरकार के गठन के बाद विभागों के वितरण को लेकर कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। केएच मुनियप्पा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने मौजूदा मंत्रालय को बदलने का अनुरोध पार्टी नेतृत्व के समक्ष रखा है। उनका कहना है कि उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए उन्हें ऐसे विभाग दिए जाने चाहिए जहां वे अधिक प्रभावी ढंग से जनसेवा कर सकें।

    मुनियप्पा ने संकेत दिया है कि वह इस विषय पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से भी चर्चा करेंगे। उनका मानना है कि वरिष्ठ नेताओं को उनकी अनुभव क्षमता और राजनीतिक योगदान के अनुरूप जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वह पिछले कई वर्षों से खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग से जुड़े रहे हैं और अब नई जिम्मेदारी संभालकर जनता के लिए अधिक व्यापक स्तर पर काम करना चाहते हैं।

    वरिष्ठ मंत्री ने समाज कल्याण, कृषि और सिंचाई जैसे विभागों में रुचि जताई है। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों में कार्य करने का उन्हें पर्याप्त अनुभव है और इन विभागों के माध्यम से वह ग्रामीण क्षेत्रों तथा सामाजिक विकास से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी योगदान दे सकते हैं। उनके इस बयान ने सरकार के भीतर विभागों के बंटवारे को लेकर चल रही चर्चाओं को और हवा दे दी है।

    इससे पहले रामलिंगा रेड्डी भी विभाग आवंटन को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें बेंगलुरु विकास विभाग दिए जाने का आश्वासन मिला था, लेकिन अंतिम समय में उन्हें बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस फैसले के बाद उन्होंने अपनी असहमति खुलकर व्यक्त की थी, जिससे सरकार के भीतर असंतोष पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आया।

    मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने हालांकि स्थिति को सामान्य बताते हुए कहा है कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत के माध्यम से निकाला जाएगा। उन्होंने रामलिंगा रेड्डी को अपना करीबी सहयोगी और सम्मानित वरिष्ठ नेता बताते हुए भरोसा जताया कि उनकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर संवाद जारी है और किसी भी प्रकार के मतभेद को सुलझाने की कोशिश की जाएगी।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई सरकार के शुरुआती चरण में इस तरह की नाराजगी प्रशासनिक स्थिरता और राजनीतिक संदेश दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह वरिष्ठ नेताओं की अपेक्षाओं और सरकार की कार्यक्षमता के बीच संतुलन बनाए रखे। यदि असंतोष को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो यह आगे चलकर संगठनात्मक एकता को प्रभावित कर सकता है।

    फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व स्थिति पर नजर बनाए हुए है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में नाराज नेताओं से बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। विभागों को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व और राजनीतिक प्रबंधन क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

  • राजधानी में सुरक्षा अलर्ट, धमकी भरे ईमेल के बाद मेयर दफ्तर, धार्मिक स्थलों और रेलवे नेटवर्क की निगरानी बढ़ी

    राजधानी में सुरक्षा अलर्ट, धमकी भरे ईमेल के बाद मेयर दफ्तर, धार्मिक स्थलों और रेलवे नेटवर्क की निगरानी बढ़ी

    नई दिल्ली । कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस सरकार के भीतर विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मंत्री केएच मुनियप्पा द्वारा खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग का कार्यभार संभालने से इनकार किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। इससे पहले वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी भी विभाग आवंटन को लेकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। लगातार दूसरे वरिष्ठ मंत्री के विरोध ने सरकार और कांग्रेस नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

    बेंगलुरु ग्रामीण जिले के देवनहल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान केएच मुनियप्पा ने स्पष्ट किया कि वह मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें सौंपे गए विभाग का प्रभार ग्रहण नहीं करेंगे। उनका कहना है कि विभागों का आवंटन करते समय वरिष्ठ नेताओं के अनुभव, राजनीतिक योगदान और संगठन में उनकी भूमिका का पर्याप्त सम्मान नहीं किया गया। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक पार्टी नेतृत्व इस मामले की समीक्षा कर कोई संतोषजनक निर्णय नहीं लेता, तब तक वह मंत्रालय का कार्यभार नहीं संभालेंगे।

    पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा ने कहा कि लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव वाले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपते समय वरिष्ठता को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर संतुलन और विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार ऐसे फैसले होने चाहिए जो संगठनात्मक एकता को मजबूत करें और कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश पहुंचाएं।

    मुनियप्पा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से सीधे हस्तक्षेप की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि पार्टी अध्यक्ष को एक अभिभावक की भूमिका निभाते हुए सभी वरिष्ठ नेताओं की भावनाओं को समझना चाहिए और ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे किसी भी स्तर पर असंतोष की स्थिति न बने। उन्होंने बताया कि अपनी नाराजगी से वह राहुल गांधी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, केसी वेणुगोपाल, सिद्धारमैया और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा चुके हैं।

    हालांकि मुनियप्पा ने किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन उनके बयान ने कांग्रेस सरकार के भीतर चल रही असहजता को उजागर कर दिया है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कुछ वरिष्ठ नेता इस बात से असंतुष्ट हैं कि कई प्रभावशाली विभाग अपेक्षाकृत युवा नेताओं या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों से जुड़े नेताओं को दिए गए हैं, जबकि लंबे समय से संगठन में योगदान देने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप जिम्मेदारियां नहीं मिलीं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल विभागों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार और संगठन के भीतर शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। नई सरकार के गठन के बाद यदि वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी लगातार बढ़ती है तो इसका असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक संदेश दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे समय में कांग्रेस नेतृत्व के लिए सभी पक्षों को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मुनियप्पा की नाराजगी को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि वह कर्नाटक कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। सात बार सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा का राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है। रामलिंगा रेड्डी के बाद उनका विरोध यह संकेत देता है कि विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष व्यापक रूप ले सकता है। अब कांग्रेस हाईकमान और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के भीतर एकजुटता बनाए रखने और नाराज नेताओं को संतुष्ट करने की होगी।

  • सोनिया गांधी की तबीयत को लेकर अपडेट, आंख की सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने दी छुट्टी

    सोनिया गांधी की तबीयत को लेकर अपडेट, आंख की सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने दी छुट्टी

    नई दिल्ली । कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद Sonia Gandhi की आंख की सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हो गई है, जिसके बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। डॉक्टरों की निगरानी में उपचार के बाद उनकी स्थिति स्थिर बताई जा रही है और वह अब नई दिल्ली स्थित अपने आवास 10 जनपथ पर लौट आई हैं। इस स्वास्थ्य संबंधी अपडेट के बाद पार्टी के भीतर और समर्थकों के बीच राहत का माहौल देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी को पिछले कुछ समय से आंखों से संबंधित परेशानी थी, जिसके चलते डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी थी। उपचार के दौरान उन्हें विशेष निगरानी में रखा गया था और उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार मेडिकल टीम नजर बनाए हुए थी। सर्जरी के बाद शुरुआती रिकवरी संतोषजनक रही, जिसके आधार पर डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय लिया।

    हालांकि सोनिया गांधी का स्वास्थ्य पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा में रहा है। उन्हें पेट, फेफड़ों और सांस से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता रहा है, जिसके चलते समय-समय पर उनका इलाज विभिन्न अस्पतालों में होता रहा है। नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल से लेकर गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल तक उनकी चिकित्सा प्रक्रिया जारी रही है, जिसमें विशेषज्ञ डॉक्टर उनकी सेहत की नियमित निगरानी करते रहे हैं।

    भारतीय राजनीति में Sonia Gandhi का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वह लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और पार्टी को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक चरणों से आगे ले जाने में उनकी भूमिका अहम रही है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी होने के साथ-साथ वे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की माता हैं, और कांग्रेस संगठन में उनका प्रभाव आज भी बना हुआ है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि उनके स्वास्थ्य में आई यह अस्थायी समस्या पार्टी की गतिविधियों पर कुछ हद तक प्रभाव डाल सकती है। विशेषकर उन परिस्थितियों में जब देश के विभिन्न राज्यों में संगठनात्मक और राजनीतिक निर्णयों की प्रक्रिया चल रही है, उनकी अनुपस्थिति से कुछ निर्णयों में देरी की संभावना जताई जा रही है।

    सोनिया गांधी ने 1997 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा था और 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने के बाद उन्होंने लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन संगठनात्मक मजबूती और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की उपस्थिति बनाए रखने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

    फिलहाल डॉक्टरों की सलाह के अनुसार उन्हें आराम करने और नियमित स्वास्थ्य निगरानी में रहने की सलाह दी गई है। पार्टी के नेताओं और समर्थकों ने उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। उनकी वर्तमान स्थिति स्थिर बताई जा रही है और चिकित्सकों की देखरेख में आगे की रिकवरी प्रक्रिया जारी रहेगी।

  • कर्नाटक की नई सरकार में किन चेहरों को मिलेगा मंत्री पद, डीके शिवकुमार कैबिनेट को लेकर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी

    कर्नाटक की नई सरकार में किन चेहरों को मिलेगा मंत्री पद, डीके शिवकुमार कैबिनेट को लेकर बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन के बाद नई सरकार के गठन को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री पद से Siddaramaiah के इस्तीफे के बाद अब राज्य में नई कैबिनेट को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सत्ता की बागडोर संभालने की प्रक्रिया के बीच आज शाम चार बजे कांग्रेस विधायक दल की अहम बैठक बुलाई गई है, जिसमें नए नेतृत्व और मंत्रिमंडल के गठन को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने की संभावना है।

    सूत्रों के अनुसार, इस नई सरकार का नेतृत्व DK Shivakumar के हाथों में होने की चर्चा तेज है। बताया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नई कैबिनेट का स्वरूप तय करने की तैयारी में है। संभावित मंत्रियों की सूची भी सामने आई है, जिसमें कई वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ कुछ नए चेहरों को भी जगह दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।

    नई कैबिनेट में जिन नामों की चर्चा सबसे अधिक है उनमें यतींद्र सिद्धारमैया, दिनेश गुंडू राव, लक्ष्मी हेब्बालकर, रामलिंगा रेड्डी, रिजवान अरशद और यू.टी. खादर जैसे अनुभवी नेताओं के नाम शामिल हैं। इसके अलावा प्रियंक खरगे जैसे युवा चेहरों को भी मंत्री पद की जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना है। पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले Priyank Kharge का नाम भी संभावित सूची में चर्चा में बना हुआ है।

    इसके साथ ही G. Parameshwara, एम.बी. पाटिल, कृष्णा बायरेगौड़ा, ईश्वर खंड्रे, के.जे. जॉर्ज, एच.सी. महादेवप्पा और संतोष लाड जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की संभावना है। पार्टी का उद्देश्य सभी क्षेत्रों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देते हुए एक संतुलित कैबिनेट तैयार करना बताया जा रहा है।

    इधर, कांग्रेस संगठन के शीर्ष नेतृत्व में भी लगातार बैठकों का दौर जारी है। एआईसीसी महासचिव और कर्नाटक प्रभारी Randeep Singh Surjewala की मौजूदगी में होने वाली आज की बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है। बैठक में सभी विधायक, एमएलसी और सांसदों को शामिल होने के निर्देश दिए गए हैं ताकि नए नेतृत्व के चयन और मंत्रिमंडल विस्तार पर अंतिम सहमति बनाई जा सके।

    सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व इस बात पर जोर दे रहा है कि नई कैबिनेट में अनुभव और युवा नेतृत्व का संतुलन बनाए रखा जाए। इसके साथ ही प्रशासनिक दक्षता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को भी प्राथमिकता दी जा रही है। माना जा रहा है कि बैठक के बाद ही नए मंत्रिमंडल की तस्वीर लगभग साफ हो जाएगी और अगले चरण में शपथ ग्रहण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

    राजनीतिक हलकों में इस बदलाव को कर्नाटक की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जहां सत्ता संतुलन और संगठनात्मक रणनीति दोनों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। अब सबकी नजर आज शाम होने वाली विधायक दल की बैठक पर टिकी हुई है, जो नई सरकार की दिशा तय कर सकती है।

  • दिग्विजय सिंह को फिर राज्यसभा भेजने की मांग तेज, दिल्ली में कांग्रेस करेगी मंथन

    दिग्विजय सिंह को फिर राज्यसभा भेजने की मांग तेज, दिल्ली में कांग्रेस करेगी मंथन


    भोपाल । मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस के भीतर एक बार फिर वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने की मांग जोर पकड़ने लगी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने खुलकर कहा है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजा जाना चाहिए।

    पीसी शर्मा ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार हाईकमान के साथ चर्चा कर अंतिम निर्णय लेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि जल्द ही कांग्रेस अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर सकती है। उनके अनुसार दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेता भी इस मामले में अपना निर्णय और राय देंगे।

    इधर राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस आलाकमान के स्तर पर दिल्ली में रणनीतिक बैठक होने जा रही है। बताया जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे। इस बैठक में मध्यप्रदेश की राज्यसभा सीटों को लेकर विस्तार से चर्चा होगी और संभावित नामों पर मंथन किया जाएगा।

    सूत्रों के मुताबिक तीन दिनों में दूसरी बार राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर चर्चा हो रही है। पार्टी के भीतर रायशुमारी कर एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस फिलहाल अपने एकमात्र संभावित सीट के लिए ऐसा चेहरा तलाश रही है जो संगठन और सियासी समीकरण दोनों के लिहाज से मजबूत माना जाए।

    वहीं कांग्रेस के इस मंथन पर बीजेपी ने भी तंज कसा है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि कांग्रेस में नेताओं के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की हालत ऐसी हो चुकी है कि उसकी हर बैठक विवाद और खींचतान का कारण बन रही है।

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 1 जून 2026 से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी। उम्मीदवार 8 जून तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच होगी जबकि 11 जून नाम वापसी की अंतिम तारीख तय की गई है। मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू की जाएगी।

    देश के 10 राज्यों की कुल 24 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है। मध्यप्रदेश में तीन सीटों पर मतदान होगा। इनमें दिग्विजय सिंह, जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
    मध्यप्रदेश विधानसभा में वर्तमान संख्या बल के हिसाब से भाजपा के 164 और कांग्रेस के 64 विधायक हैं। इसी गणित के अनुसार बीजेपी को दो सीटें और कांग्रेस को एक सीट मिलने की संभावना जताई जा रही है।