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  • दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    मध्य प्रदेश। की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी विवाद के कारण चर्चा में है। कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जुलाई 2026 में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामे में उन्होंने वर्ष 1991 के एक पुराने आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। इस मामले के सामने आने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने दायर की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि घनश्याम सिंह ने उपचुनाव के दौरान अपने शपथ पत्र में कुछ आपराधिक मामलों की जानकारी दी, लेकिन 1991 में दर्ज एक अन्य मामले का उल्लेख नहीं किया। याचिका में इस कथित चूक को उनके निर्वाचन को चुनौती देने का आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से उनके चुनाव को निरस्त करने की मांग की है।

    याचिका में वर्ष 1991 की एक घटना का उल्लेख किया गया है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ था। आरोप के मुताबिक, इस घटना के दौरान पुलिस ने 22 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी, जिनमें घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मामले की जानकारी जुलाई 2026 के उपचुनाव के दौरान दाखिल किए गए हलफनामे में नहीं दी गई।

    मामले में वर्ष 2020 के एक अन्य आपराधिक प्रकरण का भी जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि घनश्याम सिंह ने 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल अपने शपथ पत्र में भी इस मामले से संबंधित जानकारी का उल्लेख नहीं किया था। इस तरह याचिका में अलग-अलग चुनावों के दौरान दिए गए हलफनामों में कथित रूप से जानकारी छिपाने का मुद्दा उठाया गया है।

    शुक्रवार को सुनवाई के दौरान ग्वालियर खंडपीठ ने विधायक को नोटिस जारी कर उनका पक्ष जानना चाहा। अदालत की इस कार्रवाई के बाद अब मामले में उनके जवाब और आगे होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। हालांकि, केवल नोटिस जारी होने से यह साबित नहीं होता कि विधायक ने जानबूझकर जानकारी छिपाई है या उनका निर्वाचन अवैध है। इन सवालों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होगा।

    दतिया विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वर्ष पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद यहां उपचुनाव कराया गया था। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में दोषसिद्धि और सजा के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हुई थी। इसके बाद खाली हुई सीट पर जुलाई 2026 में मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की।

    उपचुनाव में घनश्याम सिंह का मुकाबला भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी से हुआ था। अब उनके निर्वाचन को अदालत में चुनौती दिए जाने से दतिया की राजनीति में एक नया कानूनी मुद्दा सामने आया है। हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में उनकी सदस्यता समाप्त होगी या सीट पर दोबारा उपचुनाव कराना पड़ेगा।

    आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों और चुनावी हलफनामे से जुड़े तथ्यों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है। यदि आरोप न्यायिक प्रक्रिया में साबित होते हैं और अदालत निर्वाचन को प्रभावित करने वाली कानूनी अनियमितता पाती है, तो उसके अनुसार फैसला लिया जा सकता है। फिलहाल हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर विधायक से जवाब मांगा है और मामले का अंतिम परिणाम आना बाकी है।

  • एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा

    एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा


    मध्य प्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया रुख के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार से आरक्षण के समर्थन में ठोस आंकड़े जुटाकर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की मांग की है। वहीं, प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह ने इस विवाद के लिए कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

    जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया, लेकिन कानून का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनी रही। तन्खा के मुताबिक, वर्तमान सरकार को अदालत में इस व्यवस्था के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करने चाहिए थे।

    तन्खा ने हाईकोर्ट की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त और ठोस आंकड़े पेश नहीं किए जाने के कारण आरक्षण के पक्ष को मजबूती से रखने में कठिनाई हुई। उनका मानना है कि यदि अदालत के सामने समय रहते जरूरी आंकड़े रखे जाते, तो मामले की स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, यह उनका आकलन है और अदालत के निर्णय का अंतिम आधार संबंधित कानूनी तथ्यों तथा न्यायिक निष्कर्षों पर निर्भर करता है।

    आरक्षण की सीमा को लेकर विवेक तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक है। इसके लिए राज्य सरकार को पिछड़ेपन और संबंधित परिस्थितियों के समर्थन में प्रामाणिक मात्रात्मक आंकड़े अदालत के सामने रखने होते हैं।

    तन्खा ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत अभी भी राज्य सरकार के पास अपना पक्ष रखने का रास्ता है। यदि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, तो उसे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण से जुड़े मामले में आंकड़ों और कानूनी आधार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सरकार को उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी और संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी अध्यादेश या कानून का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप या सहयोग कर सकते हैं, लेकिन सरकार के पास उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और प्रशासनिक रिकॉर्ड को अदालत में पेश करने का दायित्व सरकार का ही है।

    दूसरी ओर, मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्याप्त तैयारी के बिना ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का कदम उठाया था। उनके अनुसार, संबंधित विधेयक में तकनीकी और कानूनी कमियां थीं, जिनके कारण मामला विवादों में उलझा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ओबीसी वर्ग के हितों के नाम पर ऐसा निर्णय लिया, जिसका कानूनी आधार पर्याप्त मजबूत नहीं था।

    राकेश सिंह ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार ओबीसी सहित सभी वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा जताया कि सरकार कानूनी मंचों पर अपना पक्ष रखेगी और ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास करेगी, जिससे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।इस पूरे विवाद में अब राज्य सरकार की कानूनी रणनीति और सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। एक ओर विवेक तन्खा ने आंकड़ों के आधार पर मजबूत पैरवी की जरूरत बताई है, वहीं भाजपा ने आरक्षण से जुड़ी मौजूदा कानूनी स्थिति के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

  • महुआ मोइत्रा ने उठाई सत्ता परिवर्तन की मांग, कपिल सिब्बल के बयान पर भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव

    महुआ मोइत्रा ने उठाई सत्ता परिवर्तन की मांग, कपिल सिब्बल के बयान पर भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव

    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार पर निशाना साधते हुए सत्ता परिवर्तन की मांग की है। इससे पहले राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल भी इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार की आलोचना कर चुके हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करने के आरोप लगाए हैं।

    महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने बयान में कहा कि विपक्ष सत्ता परिवर्तन चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो सरकार अपने ही निहत्थे नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए कथित रूप से अवैध तरीके से हिरासत में लेती है और उन्हें जेल भेजने के लिए पुलिस तंत्र का इस्तेमाल करती है, उसे सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है। उन्होंने हिरासत की कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उनका यह बयान चुनावी अनियमितताओं के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच आया है।

    इससे पहले कपिल सिब्बल ने भी सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा था। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया था कि वे बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि विपक्षी दल अराजकता फैलाने के लिए युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    राजनाथ सिंह ने लखनऊ में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि लोकतंत्र किसी को भी अराजकता फैलाने या संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर करने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में कथित चुनावी अनियमितताओं के विरोध में हुए प्रदर्शनों को लेकर विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

    रक्षा मंत्री के आरोपों का जवाब देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि सत्ता परिवर्तन की मांग कांग्रेस या विपक्षी दलों की ओर से नहीं, बल्कि देश की जनता की ओर से उठ रही है। उन्होंने अपने बयान में मौजूदा सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नारों के साथ सत्ता में आई सरकार ने बाद में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित किया और मतदाता सूची में हेरफेर किया। उन्होंने कहा कि अब सरकार के जाने का समय आ गया है। ये आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए हैं।

    इस राजनीतिक विवाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्ष की टिप्पणियां देश को अस्थिर करने के कथित एजेंडे की ओर संकेत करती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष चुनाव सुधारों, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर या युवाओं के भविष्य के लिए नहीं, बल्कि किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने के लिए प्रयास कर रहा है।

    नितिन नवीन ने सोशल मीडिया पर अपने बयान में सत्ता परिवर्तन जैसे शब्दों के इस्तेमाल को विपक्ष की मंशा से जोड़ते हुए विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया। उन्होंने विपक्ष की राजनीति को कथित तौर पर अर्बन नक्सल एजेंडे से भी जोड़ा। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने का रास्ता जनता के जनादेश से होकर गुजरता है, न कि अराजकता के माध्यम से। उन्होंने दावा किया कि भाजपा और देश की जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देंगी।

    सत्ता परिवर्तन को लेकर यह बयानबाजी ऐसे समय में हो रही है, जब चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और कथित अनियमितताओं को लेकर राजनीतिक दलों के बीच विवाद जारी है। विपक्ष सरकार की कार्यशैली और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश बता रही है। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का मुद्दा और प्रमुख हो गया है।

  • दतिया विधायक घनश्याम सिंह को हाईकोर्ट का नोटिस, 1991 के आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप से बढ़ी हलचल

    दतिया विधायक घनश्याम सिंह को हाईकोर्ट का नोटिस, 1991 के आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप से बढ़ी हलचल

    मध्य प्रदेश: की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक चर्चाओं में आ गई है। कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह को नामांकन पत्र में आपराधिक मामले की जानकारी नहीं देने के आरोप से जुड़े प्रकरण में ग्वालियर हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह कदम इस मामले में दायर याचिका पर उठाया है। नोटिस सामने आने के बाद दतिया में संभावित उपचुनाव को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं, हालांकि फिलहाल उपचुनाव की स्थिति बनने की कोई पुष्टि नहीं हुई है।

    यह मामला वर्ष 1991 में कांग्रेस के एक प्रदर्शन के दौरान दर्ज एफआईआर से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस प्रदर्शन के दौरान घनश्याम सिंह सहित कुछ अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। आरोप है कि दतिया विधानसभा उपचुनाव के दौरान नामांकन पत्र दाखिल करते समय घनश्याम सिंह ने इस आपराधिक मामले का उल्लेख नहीं किया था।

    इसी आरोप को आधार बनाकर दीपक बेलपत्री सहित कुछ लोगों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में नामांकन पत्र में आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दिए जाने का मुद्दा उठाया गया है। अब अदालत ने विधायक को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब मांगा है। फिलहाल नोटिस जारी होने का अर्थ आरोपों का साबित होना नहीं है। मामले में आगे की स्थिति संबंधित पक्षों के जवाब और अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगी।

    इस घटनाक्रम के बीच कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अवधेश नायक ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट से नोटिस मिलना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे जरूरत से ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। नायक ने इस मामले को लेकर राजेंद्र भारती की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटनाक्रम के पीछे भारती की भूमिका हो सकती है।

    अवधेश नायक ने राजेंद्र भारती पर कानूनी प्रक्रियाओं और दस्तावेजों के माध्यम से राजनीतिक नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2023 में उनका टिकट कटने के पीछे भी भारती की भूमिका थी। ये आरोप नायक की ओर से लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी में इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि या राजेंद्र भारती की इस मामले पर प्रतिक्रिया का विवरण नहीं है।

    दतिया विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भी यह मामला चर्चा में है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था, जबकि कांग्रेस ने दोनों चुनावों में जीत दर्ज की थी। ऐसे में विधायक को जारी हुए नोटिस के बाद स्थानीय राजनीति में इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    अब सबसे अहम सवाल यह है कि पुराने आपराधिक मामले और नामांकन पत्र में जानकारी नहीं देने के आरोप पर अदालत आगे क्या रुख अपनाती है। यदि कानूनी कार्यवाही में कोई ऐसा आदेश आता है जिसका विधानसभा सदस्यता पर प्रभाव पड़ता हो, तो उसके राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं। हालांकि, केवल नोटिस जारी होने से विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होती और न ही अपने आप उपचुनाव की स्थिति बनती है।

    फिलहाल ग्वालियर हाईकोर्ट के नोटिस के बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने का इंतजार है। विधायक का जवाब, याचिका में उठाए गए सवालों पर अदालत का विचार और आगे आने वाले आदेश ही तय करेंगे कि इस प्रकरण का दतिया की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

  • रिजीम चेंज के बयान पर सियासी घमासान, राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर लगाए सत्ता परिवर्तन की साजिश के आरोप

    रिजीम चेंज के बयान पर सियासी घमासान, राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर लगाए सत्ता परिवर्तन की साजिश के आरोप

    नई दिल्ली ।देश में एसआईआर और चुनाव सुधारों को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन के बयान पर नया विवाद खड़ा हो गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के नेताओं के बयानों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार बदलने के लिए अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष का उद्देश्य चुनाव के जरिए सरकार बदलना है।

    लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा कि विपक्ष की लड़ाई चुनाव सुधार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल विपक्ष की मंशा को स्पष्ट करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में अराजकता पैदा करके सत्ता हासिल करने की कोशिश की जा रही है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि देश के युवाओं को अराजकता की राजनीति का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग उसी तरह भारत में भी सत्ता बदलने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर सरकार बदलने और दूसरे देशों से प्रेरणा लेने संबंधी बयान दिए जा रहे हैं।

    भाजपा सांसद संबित पात्रा ने भी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के बयान पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सत्ता परिवर्तन को मौजूदा संघर्ष का उद्देश्य बताने से विपक्ष की मंशा सामने आती है। एसआईआर के मुद्दे पर दिए गए बयानों को लेकर भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या यह आंदोलन केवल चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए है या इसके पीछे सरकार बदलने का व्यापक राजनीतिक उद्देश्य भी है।

    विवाद की शुरुआत 15 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए बयानों के बाद हुई। इसमें प्रशांत भूषण के साथ सीजेपी नेता अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा भी शामिल हुई थीं। प्रशांत भूषण ने कहा था कि यदि सरकार की कथित बर्बरता जारी रहती है, तो सरकार बदलनी होगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई नागरिक समाज और युवाओं के नेतृत्व में लड़ी जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि वे ‘रिजीम चेंज’ चाहते हैं।

    इससे पहले 14 अक्टूबर को नेहा बोरा ने बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर एक संदेश दिया था। इसमें उन्होंने बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि वहां धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ चल रही लड़ाई और भारत में युवाओं की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ किए जा रहे संघर्ष के बीच समानता है। उनके इस बयान को भी मौजूदा राजनीतिक विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।

    राजनाथ सिंह के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि विपक्ष चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने की बात करता है। उन्होंने 1977 में हुए सत्ता परिवर्तन का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि उस समय भी सरकार नहीं बदली थी क्या। खेड़ा के अनुसार, विपक्ष का उद्देश्य आंदोलन और चुनावों के जरिए सत्ता परिवर्तन करना होता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना विपक्ष की राजनीतिक भूमिका का हिस्सा है। उन्होंने भाजपा नेताओं के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष को सरकार बदलने के लिए चुनावी प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है।

    केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक संघर्ष को ‘दिमागी नक्सलियों’ और देशभक्त भारतीयों के बीच की लड़ाई बताया। साथ ही उन्होंने इसे संविधान में विश्वास रखने वालों और अराजकतावादियों के बीच का संघर्ष करार दिया।

    ‘रिजीम चेंज’ शब्द के इस्तेमाल, बांग्लादेश के आंदोलन के संदर्भ और सरकार बदलने की मांग को लेकर भाजपा तथा विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर भाजपा नेता इन बयानों को अराजकता और सत्ता परिवर्तन की साजिश से जोड़ रहे हैं, वहीं कांग्रेस का कहना है कि चुनाव के जरिए सरकार बदलना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।

  • MP: OBC आरक्षण को लेकर HC के फैसले पर CM बोले- कांग्रेस सरकार का अध्यादेश त्रुटिपूर्ण था, खामियों की करेंगे समीक्षा

    MP: OBC आरक्षण को लेकर HC के फैसले पर CM बोले- कांग्रेस सरकार का अध्यादेश त्रुटिपूर्ण था, खामियों की करेंगे समीक्षा


    भोपाल।
    मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण (27 Percent OBC reservation ) से जुड़े मामले में हाईकोर्ट (High Court) के फैसले पर मुख्यमंत्री मोहन यादव (Chief Minister Mohan Yadav) ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में जल्दबाजी की थी और इसके प्रावधानों में गंभीर कानूनी खामियां थीं। राज्य सरकार हाईकोर्ट के निर्णय का विधिक परीक्षण कर आगे की कार्रवाई करेगी। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 से 2022 के बीच की गई नियुक्तियों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। उनके मुताबिक, न्यायालय ने 13 प्रतिशत अतिरिक्त नियुक्तियों को संरक्षण देते हुए आगामी भर्ती में समायोजित करने का निर्देश दिया है। वहीं, वर्ष 2022 के बाद से फैसले की तारीख तक की गई भर्तियों में 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए हैं।


    कांग्रेस सरकार की प्रक्रिया पर उठाए सवाल

    सीएम मोहन यादव ने कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के जरिए 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने में जल्दबाजी की थी। उनके अनुसार, इस संबंध में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से भी परामर्श नहीं लिया गया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से तत्कालीन सरकार की प्रक्रिया और आरक्षण लागू करने के तरीके पर सवाल उठे हैं।


    विधिक परीक्षण के बाद आगे की कार्रवाई

    मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार हाईकोर्ट के फैसले का विधिक परीक्षण करेगी और इसके बाद आगे की कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। ओबीसी आरक्षण के मामले में फैसले के प्रभाव और राज्य सरकार के अगले कदम को लेकर अब कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

  • राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    नई दिल्ली । INDIA गठबंधन के नेताओं ने भारत के राष्ट्रपति से मुलाकात करने का अनुरोध किया है। कांग्रेस के मुताबिक, इस संबंध में पहला अनुरोध पत्र 2 अक्टूबर को भेजा गया था। इसके बाद राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं के नाम मांगे गए थे। कांग्रेस का कहना है कि उसने 5 अक्टूबर को नेताओं के नाम के साथ दोबारा अनुरोध भेजा और 7, 8 या 9 अक्टूबर को मुलाकात के लिए समय मांगा, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि विपक्षी नेता राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं और इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। पार्टी के अनुसार, पहले पत्र के बाद राष्ट्रपति कार्यालय ने मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं की जानकारी मांगी थी। इसके बाद कांग्रेस ने 5 अक्टूबर को दोबारा पत्र भेजकर संबंधित नेताओं के नाम दिए और मुलाकात के लिए तीन तारीखों का विकल्प भी रखा।

    कांग्रेस का कहना है कि 7, 8 या 9 अक्टूबर में से किसी दिन मुलाकात का समय देने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, 8 अक्टूबर तक राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने की बात कांग्रेस ने कही है। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि वह अगले दिन तक जवाब का इंतजार करेगी। ऐसे में INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

    इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक बुलाई। यह बैठक कनॉट प्लेस में दोपहर करीब पौने दो बजे आयोजित हुई। बैठक में विपक्षी सांसदों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद सभी नेताओं के बस से राजघाट पहुंचने की संभावना भी जताई गई।

    बैठक के दौरान कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने केंद्र की बीजेपी सरकार, केंद्रीय मंत्री और चुनाव आयोग पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अराजकता कौन फैला रहा है, यह सवाल है। वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा, अमित शाह, नरेंद्र मोदी और ज्ञानेश कुमार लोकतंत्र में अराजकता फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष यहां लोकतंत्र की रक्षा के लिए है और वही काम कर रहा है।

    केसी वेणुगोपाल ने इस लड़ाई को विपक्ष के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि उनका सीधा मकसद देश के आम लोगों और मतदाताओं की रक्षा करना है। उनके मुताबिक, विपक्ष इसी उद्देश्य के साथ काम कर रहा है और उसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी कोशिश जारी रखनी है।

    इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम के बीच नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता जनपथ पर जमा हुए। वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक आयोजित की। विपक्षी नेताओं की गतिविधियों के बीच राष्ट्रपति से मुलाकात का मुद्दा भी सामने है। INDIA गठबंधन के नेताओं ने मुलाकात के लिए दो बार अनुरोध भेजा है, लेकिन कांग्रेस के मुताबिक अभी तक जवाब नहीं आया है।

    कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए 7, 8 और 9 अक्टूबर की तारीखों में समय मांगा गया था। 8 अक्टूबर को भी जवाब नहीं मिलने के बाद अब विपक्षी नेता अगले दिन तक इंतजार करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात के लिए कब समय दिया जाता है और INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होती है, इस पर अब नजर बनी हुई है।

  • कांग्रेस और हरीश रावत के बीच बढ़ा टकराव, खरगे-राहुल भी अलर्ट; हाईकमान के आदेश के बावजूद जारी रही यात्रा

    कांग्रेस और हरीश रावत के बीच बढ़ा टकराव, खरगे-राहुल भी अलर्ट; हाईकमान के आदेश के बावजूद जारी रही यात्रा


    नई दिल्ली:
    उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर टकराव बढ़ता नजर आ रहा है। उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा के आग्रह पत्र के बावजूद हरीश रावत ने सोमवार को भी अपनी यात्रा जारी रखी। इस बीच उन्होंने पार्टी हाईकमान से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा है। रावत ने कहा कि उनकी यात्रा को गलत समझा जा रहा है और उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल को पहले ही पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। यात्रा पहले से तय होने के कारण उन्होंने उनसे माफी भी मांगी थी। कुमारी सैलजा ने कहा है कि रावत अपनी बात रखना चाहते हैं और वह 7 या 8 अक्टूबर को उनसे बात करेंगी।

    हरीश रावत की यात्रा को लेकर कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने स्पष्ट कहा था कि राज्य में कोई भी व्यक्तिगत कार्यक्रम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद सोमवार को रावत ने जसपुर से हल्द्वानी तक धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा निकाली। यात्रा के दौरान कई कांग्रेस नेता और जनप्रतिनिधि उनके साथ दिखाई दिए। कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और चकराता विधायक प्रीतम सिंह के रावत की यात्रा के समर्थन में आने से पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। नैनीताल और ऊधमसिंह नगर में यात्रा के दौरान जसपुर विधायक आदेश सिंह चौहान, अल्मोड़ा विधायक मनोज तिवारी, धारचूला विधायक हरीश धामी और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल भी शामिल हुए।

    हालांकि काशीपुर में महानगर अध्यक्ष अलका पाल, प्रदेश उपाध्यक्ष अनुपम शर्मा समेत कुछ नेताओं ने यात्रा से दूरी बनाए रखी। इससे पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़ों के सक्रिय होने की चर्चा तेज हुई है। रावत ने सोशल मीडिया पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि दिल्ली में उनकी धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को गलत समझा जा रहा है। उन्होंने कहा कि संभव है कि वह अपनी बात सही तरीके से नहीं समझा पाए हों। प्रदेश प्रभारी ने उन्हें मिलने का समय दिया है और वह वहां अपना स्पष्टीकरण देंगे।

    हरीश रावत के मुद्दे को कांग्रेस हाईकमान भी गंभीरता से ले रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार यह मामला राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संज्ञान में भी लाया गया है। उत्तराखंड चुनाव को गंभीरता से ले रही कांग्रेस इस बार किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी के भीतर यह भी आशंका है कि रावत के समर्थन में और नेता सामने आ सकते हैं, जिससे चुनाव से पहले गुटबाजी बढ़ सकती है। इसी वजह से हाईकमान उनके पक्ष को सुनकर ही आगे कोई फैसला लेने के संकेत दे रहा है।

    कुमारी सैलजा ने कहा कि हरीश रावत अपनी बात रखना चाहते हैं और पार्टी पहले उनका पक्ष सुनना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाएगा। यह पूछे जाने पर कि यदि रावत यात्रा जारी रखते हैं और पार्टी उनकी दलीलों से सहमत नहीं होती तो क्या उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है, सैलजा ने कहा कि इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। वहीं, सोमवार रात करीब आठ बजे यात्रा के हल्द्वानी पहुंचने पर हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखंड की धरती पर उन्हें बदलाव की आवाज सुनाई दे रही है। उन्होंने कहा कि 2027 में उत्तराखंड और 2029 में केंद्र में बदलाव होगा और यह बदलाव कांग्रेस लाएगी। स्वराज आश्रम में विधायक सुमित हृदयेश, द्वाराहाट विधायक मदन बिष्ट समेत कई पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया।

  • स्मित मछार की बहादुरी पर कांग्रेस की चुप्पी को लेकर BJP ने राहुल-प्रियंका और गांधी परिवार से जवाब मांगा

    स्मित मछार की बहादुरी पर कांग्रेस की चुप्पी को लेकर BJP ने राहुल-प्रियंका और गांधी परिवार से जवाब मांगा

    नई दिल्ली ।भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और उसके नेतृत्व पर स्मित मछार की बहादुरी के मुद्दे पर चुप्पी साधने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कैप्टन स्मित मछार की बहादुरी की चारों ओर प्रशंसा हो रही है, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं। उन्होंने गांधी परिवार और कांग्रेस पर आतंकवादी हमलावर के धर्म के आधार पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।

    सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि स्मित मछार की बहादुरी को लेकर गांधी परिवार की कथित खामोशी कांग्रेस के रुख पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने जाकिर नाइक और अफजल गुरु का जिक्र करते हुए कांग्रेस नेतृत्व से सवाल किया कि ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने वाले नेता स्मित मछार के मामले में चुप क्यों हैं। उन्होंने दावा किया कि जाकिर नाइक को शांति का मसीहा बताने और अफजल गुरु को परिस्थितियों का मारा बताने वाले लोगों ने स्मित मछार के मामले में कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी।

    भाजपा प्रवक्ता ने स्मित मछार की बहादुरी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना कई लोगों की जान बचाने का काम किया। उन्होंने सवाल उठाया कि इसके बावजूद उनके बारे में कोई कुछ क्यों नहीं बोल रहा है। त्रिवेदी ने अपने आरोपों के समर्थन में बुरहान वानी और याकूब मेमन से जुड़े पुराने राजनीतिक बयानों तथा बाटला हाउस एनकाउंटर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर मुखर रहने वाले लोगों की ओर से स्मित मछार के मामले में अब तक चुप्पी क्यों है।

    इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रूप ले लिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राजनेताओं से लेकर फिल्मी जगत से जुड़े लोगों तक कई लोग भारतीय पायलट स्मित मछार की बहादुरी की प्रशंसा कर रहे हैं। इसी को आधार बनाकर सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाया और कहा कि कांग्रेस को स्मित मछार की बहादुरी को लेकर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस पर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप भी लगाया।

    सुधांशु त्रिवेदी ने आगे सवाल किया कि बुरहान वानी और याकूब मेमन जैसे मामलों में तुरंत अपनी बात रखने वाले गांधी परिवार की ओर से स्मित मछार पर एक शब्द भी क्यों नहीं कहा गया। उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से इस मामले में सीधा जवाब चाहती है। त्रिवेदी के मुताबिक, स्मित मछार की बहादुरी पर कांग्रेस की कथित चुप्पी को लेकर पार्टी के रुख को स्पष्ट किया जाना चाहिए।

    भाजपा ने इस पूरे मामले को कांग्रेस और गांधी परिवार के कथित दोहरे मापदंड से जोड़ते हुए सवाल खड़े किए हैं। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि स्मित मछार की बहादुरी के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आना सवाल पैदा करता है। उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप दोहराते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से इस मुद्दे पर जवाब मांगा। खबर में कांग्रेस या उसके संबंधित नेताओं की ओर से इस आरोप पर कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं कराई गई है।

  • थलपति विजय की TVK ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से बनाई दूरी, SIR के विरोध पर कायम पार्टी

    थलपति विजय की TVK ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से बनाई दूरी, SIR के विरोध पर कायम पार्टी

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की सत्ताधारी तमिळगा वेत्री कड़गम यानी TVK ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से खुद को अलग कर लिया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं। हालांकि थलपति विजय की पार्टी ने इस मांग का समर्थन नहीं किया है।

    TVK की ओर से कहा गया है कि किसी एक व्यक्ति को पद से हटाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। पार्टी ने इसे मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली रणनीति बताया है। हालांकि इसके साथ ही TVK ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का विरोध जारी रखने की बात भी स्पष्ट की है।

    यह विवाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR प्रक्रिया को लेकर सामने आई आपत्तियों के बाद तेज हुआ। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने पिछले 10 महीनों में SIR की प्रक्रिया को लेकर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए और उनके खिलाफ इस्तीफे के साथ कानूनी कार्रवाई की मांग भी सामने आई।

    TVK के वरिष्ठ नेता और तमिलनाडु के स्कूली शिक्षा मंत्री ए राजमोहन ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि CEC को पद से हटाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक, किसी एक व्यक्ति को हटाने से व्यवस्था में बदलाव नहीं आएगा और पार्टी किसी भटकाने वाली रणनीति का हिस्सा नहीं बनेगी।

    हालांकि राजमोहन ने यह भी कहा कि TVK SIR का विरोध करती रहेगी। उन्होंने बताया कि पार्टी अध्यक्ष विजय ने सत्ता में आने से पहले ही SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की थी। राजमोहन के मुताबिक, SIR के दौरान चुनिंदा मतदाताओं के नाम हटाए गए और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत और बड़ी होती।

    विजय और कांग्रेस के बीच पहले भी मतभेद सामने आ चुके हैं। इससे पहले TVK के नेताओं और मंत्रियों की ओर से वर्ष 2029 के लिए विजय को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताए जाने के बाद विवाद पैदा हुआ था। उस समय कांग्रेस के मंत्रियों की ओर से कैबिनेट से इस्तीफा देने की धमकी तक सामने आई थी।

    फिलहाल तमिलनाडु में कांग्रेस के पांच विधायक हैं, जिनके समर्थन से TVK ने सरकार बनाई थी। इनमें से दो विधायकों को विजय ने मंत्री भी बनाया है। ऐसे में CEC के इस्तीफे के मुद्दे पर TVK का कांग्रेस से अलग रुख गठबंधन के भीतर मतभेदों को सामने लाता है।

    दूसरी ओर, डीएमके प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया है। डीएमके ने कहा है कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन संसद में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव आता है तो पार्टी उसका समर्थन करेगी।

    डीएमके प्रवक्ता टी के एस एलंगोवन ने कहा कि जब भी विपक्षी दल किसी मुद्दे पर बीजेपी का विरोध करेंगे, उनकी पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि डीएमके इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है तो पार्टी उसका समर्थन करेगी।

    इससे पहले 23 सितंबर को स्टालिन ने बयान जारी कर कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर कांग्रेस और डीएमके की मांग के बीच TVK ने अलग रुख अपनाया है। पार्टी ने SIR के विरोध को बरकरार रखते हुए CEC को हटाने की मांग को व्यवस्था में बदलाव का समाधान मानने से इनकार किया है।