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  • बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'

    बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस TMC के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए उनकी पार्टी को कांग्रेस की जरूरत नहीं है। हालांकि अभिषेक ने यह भी साफ किया कि तृणमूल कांग्रेस अब भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।

    अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कहा कांग्रेस के पास बंगाल में ऐसा कुछ नहीं है जिसकी हमें जरूरत हो या जो वह हमें दे सके। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल की जबकि तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें गठबंधन का प्रस्ताव दिया था जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। अभिषेक ने कहा इसका परिणाम सबके सामने है उनकी सीट अब घटकर एक रह गई है।

    अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कोई भी निर्णय ममता बनर्जी ही लेंगी। उन्होंने कहा जब पार्टी कोई फैसला लेगी तो आपको पता चल जाएगा। फिलहाल कांग्रेस से कोई गठबंधन नहीं है।
    इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी ने केंद्र सरकार पर भी हमला किया और मनरेगा का नाम बदलने के मुद्दे पर कहा कि इसका नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने सरकार से पश्चिम बंगाल को बकाया राशि का भुगतान करने की मांग की। केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल का बकाया भुगतान करना चाहिए। मनरेगा का नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा उन्होंने कहा।

    अभिषेक ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह बंगाल के खिलाफ काम कर रही है और गांधीजी के नाम को हटाना बंगाल विरोधी कदम है। उन्होंने कहा गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दी थी इसलिए बंगाल से गांधीजी का नाम हटाना गलत है।इस बयान ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को निशाने पर लिया है और यह आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक रणनीतियों का इशारा है। अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस क्या कदम उठाती है और कांग्रेस के साथ गठबंधन का कोई नया मोड़ आता है या नहीं।

  • कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर विवादित बयान दिया कहा 'पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे'

    कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर विवादित बयान दिया कहा 'पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे'


    नई दिल्ली । कांग्रेसी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ऑपरेशन सिंदूर पर एक विवादित बयान दिया है जिसके बाद राजनीति में हलचल मच गई है। चव्हाण का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन भारतीय वायु सेना ने अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उस दिन भारतीय विमानों के पाकिस्तान द्वारा मार गिराए जाने की संभावना बहुत अधिक थी।

    पृथ्वीराज चव्हाण ने एक इंटरव्यू में कहा ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन अगर ग्वालियर बठिंडा या सिरसा से कोई विमान उड़ान भरता तो उसे पाकिस्तान द्वारा बहुत आसानी से मार गिराया जा सकता था। यही कारण था कि एयर फोर्स को पूरी तरह से ग्राउंडेड रखा गया था। चव्हाण ने आगे कहा कि पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे लेकिन ऑपरेशन के अगले चरणों में स्थिति में सुधार हुआ और भारतीय सेना ने अपनी ताकत दिखाई।

    यह बयान ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के एक्शन को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर जो कि 1999 में कारगिल युद्ध के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ किया गया था एक बड़ा सैन्य अभियान था जिसमें भारतीय वायु सेना और सेना ने एकजुट होकर पाकिस्तान की अग्रिम चौकियों को निशाना बनाया था। चव्हाण के बयान के बाद विपक्षी दलों और रक्षा विशेषज्ञों ने उनकी टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

    चव्हाण का यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब भारतीय वायु सेना और सेना के संचालन पर लगातार चर्चा हो रही है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान भारतीय सेना और वायु सेना की कार्यप्रणाली को गलत तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि चव्हाण ने अपनी बात तथ्यों पर आधारित रखते हुए रखी है और ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन भारतीय विमानों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त उपाय किए गए थे।

    इससे पहले भारतीय वायु सेना और सेना के कई अधिकारियों ने भी माना था कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन कुछ फैसले धीमे थे क्योंकि पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानों को निशाना बनाने का खतरा बहुत ज्यादा था। हालांकि बाद में स्थिति में सुधार हुआ और भारतीय सेना ने दुश्मन के ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया।

    चव्हाण के बयान ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या भारतीय वायु सेना के लिए ऐसे ऑपरेशनों में निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई कमजोरी रही थी। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बयानों से भारतीय सेना की रणनीतिक क्षमता पर सवाल उठते हैं जो एक संवेदनशील मामला हो सकता है।

    यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव हमेशा बना रहता है और ऐसे बयान से दोनों देशों के सैन्य इतिहास और रणनीति पर चर्चा और विवाद दोनों का सामना करना पड़ सकता है। चव्हाण के बयान को लेकर भारतीय रक्षा मंत्रालय और वायु सेना से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन इस बयान ने राजनीतिक और रक्षा हलकों में हंगामा मचा दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के बारे में चव्हाण का यह बयान भारतीय राजनीति में एक नई बहस का कारण बन सकता है और अब यह देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया देता है।

  • NDA में भी 'G Ram G' विधेयक पर विरोध TDP और कांग्रेस ने किया प्रदर्शन की तैयारी

    NDA में भी 'G Ram G' विधेयक पर विरोध TDP और कांग्रेस ने किया प्रदर्शन की तैयारी


    नई दिल्ली । केंद्र सरकार के ‘विकसित भारत-जी राम जी विधेयक 2025’ को लेकर अब एनडीए में भी विरोध की स्थिति बन गई है। जहां एक ओर विपक्ष ने इस विधेयक को महात्मा गांधी का अपमान मानते हुए उसका विरोध किया है वहीं एनडीए का एक प्रमुख सहयोगी दल तेलुगु देशम पार्टी  भी सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया है।

    यह विधेयक मनरेगा योजना के स्थान पर लाया गया है लेकिन विपक्ष और सरकार के सहयोगी दलों में इसके नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। तेलुगु देशम पार्टी के सांसद लवु श्री कृष्ण देवरयालु ने विधेयक के तहत राज्यों पर वित्तीय बोझ डालने का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य पहले से ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और इस नए बदलाव से उन्हें और ज्यादा बोझ पड़ेगा।

    देवरयालु ने आगे कहा “कुछ सालों से मनरेगा में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी और यह विचार संसद के बाहर और अंदर कई बार उठाए गए थे। हाल ही में काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किया गया जो एक सकारात्मक कदम है। लेकिन इस योजना का खर्च राज्यों पर डालने का प्रस्ताव खासकर आंध्र प्रदेश जैसे राज्य के लिए सही नहीं है।
    टीडीपी के प्रवक्ता एन विजय कुमार ने इस नए वर्जन का स्वागत तो किया लेकिन साथ ही उन्होंने सरकार से 40 फीसदी भुगतान के प्रावधान पर पुनः विचार करने की अपील की। उनका कहना था कि इस भुगतान व्यवस्था से राज्यों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।

    वहीं कांग्रेस ने भी इस विधेयक पर विरोध जताया है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि मनरेगा में महात्मा गांधी का नाम हटाना उनके अपमान के समान है। कांग्रेस ने इसे एक “राजनीतिक कदम बताया है और दावा किया कि मोदी सरकार गांधी के विचारों से मुंह मोड़ रही है। कांग्रेस ने इसके खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन करने की योजना बनाई है।

    ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस विधेयक को संसद में पेश करते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा महात्मा गांधी हमारे दिलों में बसते हैं और उनका नाम किसी योजना से हटाना उनका अपमान नहीं है। यह सरकार गांधीजी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर आधारित कई योजनाएं चला रही है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस सरकार के समय भी ‘जवाहर रोजगार योजना का नाम बदला गया था और तब क्या यह पंडित नेहरू का अपमान था?

    चौहान ने कहा कि सरकार ने मनरेगा पर 8.53 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं और अब इस नए विधेयक के तहत 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि इस योजना के लिए प्रावधानित की गई है जो गांवों के समग्र विकास के लिए उपयोग की जाएगी।

    यह विधेयक ध्वनिमत से पास हुआ है लेकिन इसके बावजूद विपक्ष और एनडीए के भीतर ही इसकी वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर उन राज्यों के लिए यह विधेयक एक चुनौती बन सकता है जो पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। सरकार की योजना है कि इस विधेयक से ग्रामीण भारत का समग्र विकास होगा और विकसित भारत की दिशा में एक ठोस कदम उठाया जाएगा। लेकिन इसके नाम उद्देश्य और वित्तीय बोझ को लेकर बढ़ते विवाद से यह साफ है कि आगामी दिनों में इस पर और भी राजनीतिक बहस होने की संभावना है।

  • कांग्रेस में अनबन की अटकलों पर शशि थरूर का विराम  बोले मेरी तरफ से सब कुछ बिल्कुल ठीक है

    कांग्रेस में अनबन की अटकलों पर शशि थरूर का विराम बोले मेरी तरफ से सब कुछ बिल्कुल ठीक है


    नई दिल्ली । कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद और आंतरिक खींचतान को लेकर चल रही अटकलों के बीच वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद शशि थरूर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि पार्टी के साथ उनके रिश्ते पूरी तरह सामान्य हैं। हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘वोट चोरी के मुद्दे पर कांग्रेस की रैली में उनकी गैरमौजूदगी और कुछ अहम बैठकों में शामिल न होने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

    इन अटकलों पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने चर्चित समाचार एजेंसी  से बातचीत में साफ कहा कि उनकी तरफ से किसी भी तरह की नाराजगी या असंतोष नहीं है। रैली में शामिल न हो पाने के सवाल पर उन्होंने कहा मैं जरूर अटेंड करता क्यों नहीं करता? लेकिन उस दिन मैं विदेश में था। यह कार्यक्रम मैंने करीब छह महीने पहले तय किया था। थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी गैरहाजिरी को पार्टी से दूरी या असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    जब उनसे सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या कांग्रेस में सब कुछ ठीक है तो थरूर ने दो टूक जवाब दिया बिल्कुल ठीक है। मुझे यह कहने की जरूरत क्यों पड़े? मेरी तरफ से सब कुछ ठीक है। उनके इस बयान को कांग्रेस नेतृत्व के प्रति भरोसे और प्रतिबद्धता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    इस बीच सोशल मीडिया मंच ‘एक्स पर एक यूजर द्वारा किए गए विश्लेषण ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बटोरी। यूजर ने अपने लंबे पोस्ट में शशि थरूर और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच कथित वैचारिक विरोधाभास की बात कही थी। पोस्ट में यह तर्क दिया गया था कि यह विरोधाभास दरअसल कांग्रेस पार्टी के भीतर मौजूद दो अलग-अलग वैचारिक प्रवृत्तियों को दर्शाता है।

    यूजर के अनुसार समस्या थरूर और राहुल गांधी के सह-अस्तित्व में नहीं है बल्कि कांग्रेस की उस अक्षमता में है जिसमें पार्टी अलग-अलग विचारधाराओं को चुनने एकजुट करने और उन्हें व्यवस्थित तरीके से लागू करने में सफल नहीं हो पा रही है। इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने इसे विचारशील विश्लेषण करार दिया।

    थरूर ने लिखा इस विचारशील विश्लेषण के लिए धन्यवाद। कांग्रेस पार्टी में हमेशा एक से अधिक प्रवृत्तियां रही हैं। आपका आकलन निष्पक्ष है और वर्तमान वास्तविकता की एक निश्चित धारणा को प्रतिबिंबित करता है। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि वे पार्टी के भीतर वैचारिक विविधता को एक स्वाभाविक और ऐतिहासिक प्रक्रिया मानते हैं न कि टकराव का कारण।

    गौरतलब है कि इससे पहले राहुल गांधी की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस सांसदों की एक अहम बैठक में भी शशि थरूर शामिल नहीं हुए थे। इस पर भी सवाल उठे थे। हालांकि चर्चित सूत्रों के हवाले से बताया कि थरूर ने बैठक में शामिल न हो पाने की जानकारी पहले ही पार्टी को दे दी थी। सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस समय वह कोलकाता में प्रभा खैतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मौजूद थे।

    कुल मिलाकर शशि थरूर के हालिया बयानों और स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस में उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी बड़े टकराव की बात फिलहाल केवल अटकलों तक सीमित है। थरूर ने न सिर्फ अपनी गैरहाजिरी के कारण गिनाए बल्कि यह भी जताया कि पार्टी के भीतर विभिन्न विचारधाराओं का होना कांग्रेस की परंपरा का हिस्सा रहा है। ऐसे में उनके बयान कांग्रेस के भीतर एकता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं।

  • कर्नाटक में CM पद की खींचतान जारी, सिद्धारमैया और शिवकुमार दिल्ली में हाई कमान से करेंगे मुलाकात

    कर्नाटक में CM पद की खींचतान जारी, सिद्धारमैया और शिवकुमार दिल्ली में हाई कमान से करेंगे मुलाकात


    नई दिल्‍ली । कर्नाटक(Karnataka) में मुख्यमंत्री पद को लेकर मची खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। हाई कमान के निर्देश पर मुख्यमंत्री के घर हुए दोनों नेताओं के नाश्ते के बाद ऐसा दावा किया जा रहा था कि अब सब ठीक है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से दोनों पक्षों की तरफ से की जा रही बयान बाजी के बाद यह साफ है कि कुछ ठीक नहीं है। हिन्दुस्तान (Hindustan)टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इसी खींचतान को लेकर अब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया(Siddaramaiah) और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार(DK Shivakumar) 14 दिसंबर को नई दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर सकते हैं।

    कांग्रेस के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों के मुताबिक दिल्ली में इन दोनों नेताओं की बैठक सोनिया गांधी, राहुल गांधी या फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी में से किसी एक से हो सकती है। पार्टी के करीबी सूत्र के मुताबिक इस बैठक के लिए समय बहुत कम है लेकिन अगर यह मुलाकात होती है, तो यह कर्नाटक के आगामी हालात के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी।

    कर्नाटक में कांग्रेस प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने एचटी से कहा, “सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। यदि वे हमारे किसी भी शीर्ष नेता से मिलना चाहते हैं, तो वह हमेशा ऐसा कर सकते हैं।” सूत्रों के मुताबिक कर्नाटक के नेताओं की कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से यह मुलाकात नई दिल्ली के ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ अभियान के तहत रामलीला मैदान में होने वाली रैली के बाद होगी।

    गौरतलब है कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से दोनों नेताओं की मुलाकात की खबर ऐसे समय में सामने आई है, जब दोनों खेमों के बीच में पिछले कई दिनों से खींचतान मची हुई है। 2023 से सत्ता में आने के बाद से दोनों पक्ष लगातार एक-दूसरे पर तंज कसते रहे हैं। लेकिन 20 नवंबर को सरकार के ढाई साल पूरे होने पर इन हमलों की तीव्रता बढ़ गई। शिवकुमार समर्थकों का कहना है कि जीत के बाद सरकार के आधे पड़ाव पर सत्ता हस्तांतरण की बात हुई थी। हालांकि ऐसा नहीं हो सका।

  • कैप्टन अमरिंदर सिंह का बीजेपी और कांग्रेस पर 'दमदार' हमला, सिद्धू को दी क्रिकेट कमेंट्री की सलाह

    कैप्टन अमरिंदर सिंह का बीजेपी और कांग्रेस पर 'दमदार' हमला, सिद्धू को दी क्रिकेट कमेंट्री की सलाह


    नई दिल्‍ली । पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने बयानों से राजनीतिक हलचल मचा दी है। उन्होंने बीजेपी के कार्यशैली पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी के फैसले दिल्ली से होते हैं और जमीनी नेताओं से कोई सलाह नहीं ली जाती। इसके साथ ही, उन्होंने कांग्रेस में वापसी की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने का दर्द अभी भी ताजा है, इसलिए कांग्रेस में लौटने का सवाल ही नहीं उठता।

    बीजेपी पर हमला:
    कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीजेपी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी में बड़े फैसले दिल्ली से होते हैं और जमीनी नेताओं की राय की कोई अहमियत नहीं है, हालांकि उनके पास 60 साल का राजनीतिक अनुभव है। इस बयान के साथ उन्होंने कांग्रेस में वापसी की संभावना को पूरी तरह से नकारा किया।

    प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ, सिद्धू पर प्रहार:
    हालांकि, अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की और कहा कि मोदी जी का पंजाब के प्रति विशेष स्नेह है। वहीं, नवजोत कौर सिद्धू पर तीखा हमला करते हुए उन्होंने कहा कि सिद्धू को राजनीति छोड़कर क्रिकेट कमेंट्री पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अमरिंदर ने सिद्धू और उनकी पत्नी को ‘अस्थिर’ करार दिया।

    अकाली दल से गठबंधन की जरूरत पर जोर:
    पंजाब की राजनीतिक स्थिति पर बोलते हुए, अमरिंदर सिंह ने बीजेपी को मजबूत बनाने के लिए शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन करने की सलाह दी। उनका मानना था कि बिना गठबंधन के पंजाब में सरकार बनाना मुश्किल है।

    ‘आप’ सरकार पर तीखा हमला:
    आम आदमी पार्टी (AAP) पर भी अमरिंदर सिंह ने करारा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पंजाब अब सबसे खराब दौर से गुजर रहा है और मुख्यमंत्री भगवंत मान केवल टीवी पर चुटकुले सुनाते हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब में असली फैसले दिल्ली से किए जा रहे हैं और मान केवल नाममात्र के मुख्यमंत्री हैं। इसके अलावा, अमरिंदर ने पंजाब को ‘भिखारी राज्य’ करार दिया, जो मुफ्त योजनाओं की वजह से बर्बाद हो गया है।

    बीजेपी-अकाली गठबंधन पर प्रतिक्रिया:
    अमरिंदर सिंह के बीजेपी और अकाली दल के गठबंधन के सुझाव पर बीजेपी नेताओं ने खारिज कर दिया और कहा कि पार्टी अकेले पंजाब में चुनाव लड़ेगी। हालांकि, अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने इस सुझाव का समर्थन किया और कहा कि बीजेपी पंजाब में अकेले सरकार नहीं बना सकती।

    AAP का पलटवार:
    आम आदमी पार्टी ने अमरिंदर सिंह के ‘भिखारी राज्य’ वाले आरोपों पर तीखा पलटवार किया। ‘आप’ के नेताओं ने अमरिंदर सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और कहा कि उनकी सरकार के दौरान खनन और केबल माफिया फल-फूल रहे थे। ‘आप’ ने यह भी कहा कि पंजाब की जनता ने पिछले भ्रष्ट शासन के खिलाफ खड़े होकर ‘आप’ को बहुमत दिया।

    कांग्रेस और ‘आप’ का तंज:
    कांग्रेस और ‘आप’ ने कैप्टन के बीजेपी और अकाली दल के गठबंधन सुझाव पर तंज कसते हुए कहा कि दोनों दल अकेले ही इतने कमजोर हैं कि उनका गठबंधन भी किसी असरदार बदलाव का कारण नहीं बनेगा।

    इस तरह, कैप्टन अमरिंदर सिंह के हमले और उनके सुझावों पर विभिन्न दलों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। पंजाब की राजनीतिक स्थिति में यह बयान एक नई बहस का आगाज कर सकते हैं।

  • अमरिंदर सिंह का बयान: कहा- भाजपा में मुझसे सलाह नहीं ली जाती, लेकिन कांग्रेस में लौटने का सवाल ही नहीं

    अमरिंदर सिंह का बयान: कहा- भाजपा में मुझसे सलाह नहीं ली जाती, लेकिन कांग्रेस में लौटने का सवाल ही नहीं


    नई दिल्‍ली । पंजाब(Punjab) के पूर्व मुख्यमंत्री (Chief Minister)और भारतीय जनता पार्टी(Bharatiya Janata Party) के नेता अमरिंदर सिंह(Amarinder Singh) ने शुक्रवार को बड़ा बयान दिया। भाजपा के कामकाज की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस के विपरीत, पार्टी उनसे परामर्श नहीं कर रही है। हालांकि, उन्होंने कांग्रेस में लौटने की संभावना को पूरी तरह खारिज किया।

    मीडिया को दिए इंटरव्यू में अमरिंदर सिंह ने कहा कि कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्हें जिस तरह से मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, उससे वह अब भी आहत हैं, इसलिए कांग्रेस में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि भाजपा में सभी निर्णय दिल्ली में लिए जाते हैं और जमीनी नेताओं से परामर्श नहीं किया जाता। उन्होंने कहा, ‘मेरे पास 60 साल का राजनीतिक अनुभव है, लेकिन मैं खुद को उन पर थोप नहीं सकता।’

    हालांकि, अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि मोदी का पंजाब के लिए विशेष स्नेह है और वह राज्य के लिए कुछ भी करेंगे। नवजोत कौर सिद्धू के इस बयान पर कि पंजाब में 500 करोड़ रुपये का सूटकेस देने वाला मुख्यमंत्री बनता है, सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू और उनकी पत्नी को अस्थिर बताया और सिद्धू को राजनीति छोड़कर क्रिकेट कमेंट्री पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। सिंह ने कहा कि भाजपा पंजाब में तभी मजबूत हो सकती है जब वह शिरोमणि अकाली दल के साथ हाथ मिलाए। उन्होंने दावा किया कि दोनों दल अंततः एक साथ आएंगे, क्योंकि पंजाब में गठबंधन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती।

    मुख्यमंत्री भगवंत मान पर तंज कसा
    वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार पर निशाना साधते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पंजाब आतंकवाद के वर्षों के बाद सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान पर तंज कसते हुए कहा कि वह केवल टीवी पर आते हैं और चुटकुले सुनाते हैं। सिंह ने आरोप लगाया कि मुफ्त की योजनाओं के कारण पंजाब भिखारी राज्य बन गया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि मान केवल नाममात्र के मुखिया हैं, जबकि पंजाब के असली फैसले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ले रहे हैं। सिंह ने लोगों से स्थिरता के लिए भाजपा पर विचार करने का आग्रह किया, क्योंकि भारत की सुरक्षा पंजाब के हितों से जुड़ी हुई है।

  • हिमंत बिस्वा सरमा का तंज, कहा- मैं भूल गया कांग्रेस से आया हूं, कट्टर भाजपाई बनने का रहता है प्रयास

    हिमंत बिस्वा सरमा का तंज, कहा- मैं भूल गया कांग्रेस से आया हूं, कट्टर भाजपाई बनने का रहता है प्रयास


    नई दिल्‍ली । असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma)ने कांग्रेस पर एकबार फिर तंज कसा है। उन्होंने कहा कि वह कट्टर भाजपाई (Hardcore BJP)बनने की कोशिश करते रहते हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि वह भूल गए हैं कि वह कांग्रेस से भाजपा (BJP)में आए थे। उन्होंने साल 2015 में कांग्रेस को अलविदा कह दिया था। इसके बाद वह भाजपा में शामिल हो गए थे।

    सरमा से जब पूछा गया कि सिर्फ असम नहीं, बल्कि भारत के कई राज्यों में आप भाजपा के गो टू मैन बन गए हैं, अब तो कोई यकीन भी नहीं करता कि आप कांग्रेस से आए हैं। आज तक के कार्यक्रम में पूछे गए इस सवाल का जवाब मजाकिया अंदाज में दिया।

    उन्होंने कहा, ‘मैं भी भूल गया हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘सबको भूल जाना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘बीजेपी से ज्यादा तो बीजेपी नहीं हो सकता पर अच्छा बीजेपी होने की कोशिश करता हूं। पूरा कट्टर बीजेपी बन जाऊं, उसका प्रयास तो होता रहता है।’

    क्यों छोड़ी कांग्रेस
    सरमा ने साल 2015 में कांग्रेस छोड़ दी थी। उन्होंने कांग्रेस पर परिवारवाद की राजनीति के आरोप लगाए थे। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था कि जब से उनके बेटे गौरव गोगोई राजनीति में आए हैं, तब से वह मतलबी हो गए है। खास बात है कि वह कांग्रेस में रहते हुए मंत्री बने थे। वहीं, भाजपा में आने के बाद वह मंत्री बने और बाद में असम के मुख्यमंत्री का पद भी संभाला।

    असम की सुरक्षा के लिए सामुदायिक रक्षा तंत्र तैयार करें: हिमंत
    गुरुवार को सरमा ने लोगों से अपील की कि वे राज्य की सुरक्षा के लिए सामुदायिक स्तर पर मिलकर रक्षा तंत्र तैयार करें। सरमा ने लोगों से आग्रह किया कि वे उन लोगों का सामाजिक और आर्थिक रूप से बहिष्कार करें जो कथित तौर पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करते हैं।

    मुख्यमंत्री ने संवाददाताओं से कहा, ‘हमें उन्हें (जो लोग अतिक्रमण करते हैं) आने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। लेकिन अगर वे ऊपरी असम के कुछ स्थानों पर पहले से ही मौजूद हैं, तो हम उन्हें वहां से हटा देंगे, जैसा हमने उरीयमघाट में किया था।’

    राज्य सरकार ने नगालैंड के साथ राज्य की सीमा पर उरीयमघाट में रेंगमा संरक्षित वन में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चलाया, जिसमें लगभग 11,000 बीघे (लगभग 1,500 हेक्टेयर) भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। इस अभियान में लगभग 1,800 परिवार प्रभावित हुए, जिनमें अधिकतर मुस्लिम समुदाय के थे। उन्होंने कहा कि सरकार अकेले असम को ‘सुरक्षित’ नहीं बना सकती है। सभी को उस प्रक्रिया में योगदान देना होगा।

  • शशि थरूर ने ठुकराया वीर सावरकर अवॉर्ड, आयोजकों का दावा: कांग्रेस के डर से पीछे हटे सांसद

    शशि थरूर ने ठुकराया वीर सावरकर अवॉर्ड, आयोजकों का दावा: कांग्रेस के डर से पीछे हटे सांसद


    नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। इस बार वजह है वीर सावरकर अवॉर्ड। हाल ही में पुरस्कार आयोजकों ने इस वर्ष के विजेताओं की सूची में थरूर का नाम शामिल किया, लेकिन सांसद ने यह अवॉर्ड स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

    थरूर का पक्ष

    शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से ही पता चला कि उन्हें अवॉर्ड के लिए चुना गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें इसके बारे में कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और न ही उन्होंने इसे स्वीकार किया था। थरूर ने इसे आयोजकों की गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई बताया।

    उन्होंने कहा, “पुरस्कार की प्रकृति, इसे देने वाले संगठन या अन्य विवरणों की जानकारी न होने के कारण, मेरे शामिल होने या पुरस्कार स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता।”

    आयोजकों का पलटवार

    वहीं, पुरस्कार आयोजक हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (HRDS) इंडिया ने थरूर के आरोपों को खारिज कर दिया। HRDS के सचिव अजी कृष्णन ने कहा कि थरूर को काफी पहले ही सूचित किया गया था। उन्होंने दावा किया कि संगठन और जूरी के चेयरमैन ने थरूर से उनके आवास पर मुलाकात कर उन्हें समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था।

    कृष्णन ने कहा कि थरूर ने उस समय अन्य अवॉर्ड विजेताओं की सूची भी मांगी और उन्हें वह सूची दे दी गई। उन्होंने सीधे आरोप लगाया कि शायद थरूर कांग्रेस की प्रतिक्रिया के डर से अवॉर्ड लेने से पीछे हटे।

    राजनीतिक बहस

    सावरकर पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाने वाले थरूर का यह कदम अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। कांग्रेस पार्टी, जो ऐतिहासिक रूप से सावरकर की विचारधारा की आलोचक रही है, के एक सांसद का पुरस्कार ठुकराना पार्टी लाइन के अनुरूप है।

    हालांकि आयोजकों के दावे ने विवाद को नया आयाम दिया है। अब यह मामला केवल पुरस्कार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस और मीडिया में बड़े पैमाने पर चर्चा का केंद्र बन गया है।

  • कोई राजनीतिक दल नहीं दे रहा हुमायूं कबीर का साथ, TMC ने विधानसभा में भी दूरी बनाने का फैसला लिया"

    कोई राजनीतिक दल नहीं दे रहा हुमायूं कबीर का साथ, TMC ने विधानसभा में भी दूरी बनाने का फैसला लिया"


    कोलकाता । पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले विधायक हुमायूं कबीर को खास राजनीतिक समर्थन नहीं मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें पहले ही निलंबित कर दिया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और लेफ्ट ने भी उनसे किनारा किया है। यहां तक कि सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी दूरी बनाने का फैसला किया है।

    विधायक बने रहने का फैसला करने के बावजूद, कबीर ने सोमवार को दोहराया कि वह इस महीने के अंत में एक नया राजनीतिक दल बनाने की योजना पर आगे बढ़ेंगे। उन्होंने दावा किया, ‘मैंने अभी तक कांग्रेस से बात नहीं की है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने उनके साथ बातचीत की जिम्मेदारी ली है। अगले विधानसभा चुनाव के लिए मुर्शिदाबाद में कांग्रेस और वाम दलों के साथ सीट के बंटवारे की प्रबल संभावना है।’

    भाजपा बोली- जिन्ना की भाषा बोल रहे
    भाजपा विधायक और बंगाल में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को कहा कि कबीर की बयानबाजी को ‘मुहम्मद अली जिन्ना की भाषा’ करार दिया। उन्होंने कहा कि यह ‘बंगाली हिंदुओं के लिए सीधी चुनौती’ है।

    उन्होंने आरोप लगाया, ‘हमने स्पष्ट रूप से कहा है कि आप अपनी जमीन पर, अपने समुदाय के धन से, कानूनी तौर पर मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे बनाएं। लेकिन रेजिनगर में जो हुआ वह धार्मिक आस्था नहीं थी। यह राज्य के संरक्षण में कट्टरपंथियों का शक्ति प्रदर्शन था।’

    शुभेंदु ने कबीर पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, ‘हुमायूं कबीर अब जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह हुसैन सुहरावर्दी और मुहम्मद अली जिन्ना की भाषा से अलग नहीं है। यह एक चुनौती है, एक युद्धघोष है, यह सह-अस्तित्व की भाषा नहीं है।’

    सीट बदलेगी TMC?
    टीएमसी ने विधानसभा के अंदर भी कबीर से दूरी बनाए रखने का फैसला किया है। टीएमसी नेताओं ने कहा कि सदन में उनके बैठने की व्यवस्था बदली जाएगी। सूत्रों के अनुसार, पार्टी सूत्रों ने बताया कि विधायक बने रहने के उनके फैसले के बाद, तृणमूल कांग्रेस विधायक दल ने सत्तारूढ़ दल के सदस्यों से दूर रखने के लिए कबीर की सीट भाजपा सदस्यों की सीट के पास करने की पहल की है। इससे पहले, कबीर को उनके पूर्व मंत्री पद के कारण सत्ता पक्ष की सीट के पास अगली पंक्ति में सीट दी गई थी।

    तृणमूल कांग्रेस के मुख्य सचेतक निर्मल घोष ने कहा कि पार्टी स्थिति पर कड़ी नजर रख रही है। उन्होंने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘निलंबित विधायकों को विधानसभा में बैठने की व्यवस्था पर फैसला अगले कुछ दिन में लिया जाएगा।’ पश्चिम बंगाल विधानसभा के कार्यकाल की समाप्ति से पहले सदन का शीतकालीन सत्र और अंतरिम बजट सत्र की बैठक होने की उम्मीद है।

    AIMIM ने क्या कहा
    हुमायूं कबीर ने खुद को पश्चिम बंगाल का ओवैसी बताया था। साथ ही खबरें थीं कि वह AIMIM के साथ गठबंधन भी करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया था कि इस संबंध में ओवैसी से बात हुई है। हालांकि, AIMIM ने विधायक कबीर के साथ चुनावी गठजोड़ से सोमवार को इनकार किया और उनके प्रस्तावों को ‘राजनीतिक रूप से संदिग्ध और वैचारिक रूप से असंगत’ बताया।

    पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद असीम वकार ने कहा, ‘सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कबीर को अधिकारी के राजनीतिक तंत्र का हिस्सा माना जाता है। और यह सर्वविदित है कि अधिकारी भाजपा के राष्ट्रीय स्तरीय नेतृत्व के मुख्य रणनीतिक ढांचे के भीतर काम करते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘मुस्लिम समुदाय राष्ट्र निर्माण में विश्वास रखता है, उसे तोड़ने में नहीं। वह देश को मजबूत करने वाली ताकतों के साथ खड़ा है और अशांति और विभाजन पैदा करने वालों को नकारता है।’

    कांग्रेस ने निकाली सद्भावना यात्रा
    शनिवार को कांग्रेस ने आरोप लगाया कि टीएमसी और भाजपा, दोनों ही, उस जिले में धार्मिक आशंकाओं का फायदा उठा रहे हैं जहां ऐतिहासिक रूप से साम्प्रदायिक तनाव देखा गया है। कोलकाता में कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने एक मस्जिद से मंदिर तक ‘सद्भावना रैली’ निकाली और लोगों से अपील की कि वे बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक भय के माहौल की वापसी को खारिज करें।

    प्रदेश कांग्रेस प्रमुख शुभंकर सरकार ने कहा, ‘मंदिर और मस्जिद लोगों को ना तो रोजगार देंगे और ना ही भोजन। विभाजन की राजनीति बंद होनी चाहिए।’ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीपीएम ने भी कबीर के फैसले से दूरी बनाई है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है।