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  • डिजिटल व्यवस्था की राह में साइबर ठगी बनी बाधा… 72% भारतीयों ने बनाई ऑनलाइन दुनिया से दूरी

    डिजिटल व्यवस्था की राह में साइबर ठगी बनी बाधा… 72% भारतीयों ने बनाई ऑनलाइन दुनिया से दूरी


    नई दिल्ली।
    देश जब एआई (AI) और भविष्य के 6जी नेटवर्क में दुनिया का नेतृत्व करने का महत्वाकांक्षी विजन लेकर आगे बढ़ रहा है, तब साइबर धोखाधड़ी (Cyber Fraud) और ऑनलाइन स्कैम्स (Online Scams) की बाढ़ भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था (Digital Economy) की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर उभर रही है। वैश्विक दूरसंचार संस्था जीएसएमए के एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, साइबर ठगी के डर से देश के लगभग तीन-चौथाई (70 से 72 फीसदी) नागरिक ऑनलाइन गतिविधियों से कतरा रहे हैं और अपने डिजिटल व्यवहार को सीमित कर रहे हैं।

    नई दिल्ली में आयोजित इंडिया मोबाइल कांग्रेस (आईएमसी) के इतर जीएसएमए के एशिया-पैसिफिक प्रमुख जूलियन गोरमैन ने आगाह किया कि यह भरोसे का संकट देश के डिजिटल विकास की गति को कुंद कर सकता है। जीएसएमए के सर्वे के मुताबिक, पिछले 12 महीनों में भारत में लगभग हर आठ में से एक नागरिक किसी न किसी ऑनलाइन स्कैम का शिकार बना। शिकायत दर्ज कराने के बावजूद अधिकांश पीड़ितों को कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिला। गौरमैन ने कहा, सबसे चिंताजनक है कि 70-72% आबादी घबराई हुई है और ऑनलाइन व्यवहार को सीमित कर रही है।


    1-2% के अंतर को पाटेगा सैटेलाइट

    सैटेलाइट संचार पर छिड़ी बहस पर गोरमैन ने कहा, भारत का जमीनी मोबाइल ब्रॉडबैंड पहले ही 98% से अधिक आबादी तक पहुंच चुका है। सैटेलाइट केवल दूरदराज के क्षेत्रों, जहाजों या जंगलों में बचे 1-2% कनेक्टिविटी गैप को भरने का काम करेगा ना कि मोबाइल नेटवर्क की जगह ले सकता है। भारत सबसे सस्ते मोबाइल टैरिफ वाले देशों में से एक है, यहां सैटेलाइट ब्रॉडबैंड की भारी लागत इसके कार्यान्वयन में बाधा होगी।


    डिजिटल ट्रस्ट बड़ी चुनौती

    गोरमैन ने कहा कि दूरसंचार और डिजिटल सेक्टर के एजेंडे में सबसे ऊपर डिजिटल ट्रस्ट (डिजिटल भरोसा) कायम करना होना चाहिए, क्योंकि धोखाधड़ी ग्राहकों के साथ-साथ व्यवसायों और सरकारी पहलों को भी प्रभावित करती है। विदेशी सैटेलाइट कंपनियां घरेलू ऑपरेटरों पर हावी होनेे के सवाल पर गोरमैन ने कहा, भारत 5जी लॉन्च करने वाला पहला देश नहीं था, लेकिन आज वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 5जी बाजार बन चुका है। पहले आना ही सब कुछ तय नहीं करता। उन्होंने सलाह दी कि सभी को सैटेलाइट से जोड़ने की कोशिश के बजाय उन करोड़ों लोगों को मौजूदा मोबाइल ब्रॉडबैंड से जोड़ने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो अब तक इंटरनेट की पहुंच से बाहर हैं।

  • दूसरे के दस्तावेज पर सिम एक्टिवेट कर थमा दी किसी और को: शिवपुरी में ऑपरेशन FAST 2.0 के तहत पुलिस की बड़ी कार्रवाई

    दूसरे के दस्तावेज पर सिम एक्टिवेट कर थमा दी किसी और को: शिवपुरी में ऑपरेशन FAST 2.0 के तहत पुलिस की बड़ी कार्रवाई


    शिवपुरी । मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में साइबर फ्रॉड के लिए इस्तेमाल हो रही फर्जी सिम कार्ड के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। ऑपरेशन FAST 2.0 के तहत भौंती और मायापुर थाना पुलिस ने जांच के बाद तीन लोगों के खिलाफ अलग अलग मामले दर्ज किए हैं। यह कार्रवाई राज्य साइबर पुलिस मुख्यालय भोपाल के निर्देश पर संदिग्ध मोबाइल नंबरों और सिम कार्ड की जांच के दौरान की गई। जांच में कुछ ऐसे मोबाइल नंबर सामने आए जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधों में किया गया था। पुलिस ने सिम धारकों के साथ सिम जारी करने की प्रक्रिया में लापरवाही या गड़बड़ी करने वालों को भी जांच के दायरे में लिया है।

    भौंती थाना पुलिस के सामने साइबर पोर्टल के जरिए ऑनलाइन ठगी की शिकायत पहुंची थी। राजस्थान के डीडवाना कुचामन सिटी निवासी किशनलाल ने शिकायत में बताया कि उन्हें दो मोबाइल नंबरों से फोन आया था। कॉल करने वाले लोगों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और एफआईआर दर्ज होने का डर दिखाकर उन्हें अपने जाल में फंसा लिया। आरोपियों ने कार्रवाई का डर दिखाते हुए किशनलाल से 12520 रुपए फीनो पेमेंट्स बैंक के खाते में ट्रांसफर करा लिए। ठगी का अहसास होने के बाद पीड़ित ने साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई।

    शिकायत के आधार पर पुलिस ने ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों की जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि 7067915249 और 6267266154 नंबर ग्राम महोबा डामरौन निवासी राहुल जाटव और भानुप्रताप जाटव के नाम पर दर्ज थे। इसके बाद भौंती पुलिस ने दोनों के खिलाफ धारा 318(4) और 319(2) बीएनएस के साथ 66(D) आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन नंबरों का इस्तेमाल किस तरह किया गया और इनके जरिए साइबर ठगी के नेटवर्क से कौन कौन लोग जुड़े हुए हैं।

    इसी अभियान के तहत मायापुर पुलिस ने सिम जारी करने वाले एजेंट के खिलाफ भी कार्रवाई की है। पुलिस को मिली एक एक्सेल शीट की जांच के दौरान POS कोड 8085309715 से जारी एक सिम साइबर फ्रॉड से जुड़ी मिली। जांच में सिम नंबर 7898219481 रेखा पत्नी हल्के आदिवासी निवासी ग्राम पड़ोरा के नाम पर दर्ज पाया गया। पुलिस ने जब रेखा से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने यह सिम कभी खरीदी ही नहीं थी। परिवार के किसी सदस्य द्वारा भी इस सिम का इस्तेमाल किए जाने से उन्होंने इनकार किया।

    इसके बाद पुलिस ने सिम जारी करने की प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की जांच की। जांच में प्रथम दृष्टया सामने आया कि मायापुर स्थित एयरटेल स्टोर के एजेंट पवन कुमार लोधी ने ग्राहक के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर उसके नाम से सिम एक्टिवेट की और उसे किसी दूसरे व्यक्ति को दे दिया। बाद में इसी सिम का इस्तेमाल साइबर अपराध में किया गया। पुलिस की जांच में इस नंबर से कुल 13040 रुपए की धोखाधड़ी सामने आई है।

    मायापुर पुलिस ने पवन कुमार लोधी के खिलाफ धारा 318(4) बीएनएस के साथ 66(C) आईटी एक्ट और दूरसंचार अधिनियम 2023 की धारा 42(3)(E) और 42(6) के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस अब पूरे मामले की विवेचना कर रही है। इस कार्रवाई से साफ है कि साइबर अपराधियों तक पहुंचने के लिए पुलिस केवल ठगी करने वालों पर ही नहीं बल्कि संदिग्ध सिम उपलब्ध कराने वाले लोगों पर भी नजर रख रही है। ऑपरेशन FAST 2.0 के तहत फर्जी सिम के नेटवर्क पर की जा रही यह कार्रवाई साइबर ठगी पर लगाम लगाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

  • अरेस्ट वारंट का डर दिखाया, फर्जी जज ने सुनाया संपत्ति जब्ती का फरमान; 96 दिन में बुजुर्ग दंपती से ठगे 22 लाख

    अरेस्ट वारंट का डर दिखाया, फर्जी जज ने सुनाया संपत्ति जब्ती का फरमान; 96 दिन में बुजुर्ग दंपती से ठगे 22 लाख


    भोपाल । भोपाल के कोलार इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपती के साथ डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। ठगों ने करीब 96 दिनों तक दंपती को वीडियो कॉल के जरिए अपने नियंत्रण में रखा और उन्हें करोड़ों रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने की धमकी दी। कभी खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया गया तो कभी चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर दंपती को डराया गया। आरोपियों ने गिरफ्तारी वारंट और संपत्ति सीज होने का भय दिखाकर उनसे 22 लाख रुपए ऐंठ लिए। रकम देने के बाद भी जब ठगों ने उन्हें डिजिटल निगरानी से मुक्त नहीं किया तो दंपती को शक हुआ और उन्होंने साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई।

    पुलिस के अनुसार कृष्णा कॉम्प्लेक्स गणपति एन्क्लेव निवासी सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडू जिले के रहने वाले हैं। परिवार के साथ फरवरी में शिवरात्रि मनाने के लिए वे आंध्र प्रदेश गए थे। इसी दौरान 19 मई को सुवर्णा के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अधिकारी खन्ना बताया और दावा किया कि उनके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी है। उन्हें बताया गया कि दिल्ली केनरा बैंक से जुड़े एक खाते के जरिए नरेश गोयल के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करोड़ों रुपए का लेनदेन हुआ है और उसमें उनका नाम सामने आया है।

    इसके बाद ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ शुरू कर दी। दंपती को निर्देश दिया गया कि वे किसी दूसरे व्यक्ति से संपर्क नहीं करेंगे और घर से बाहर भी नहीं निकलेंगे। 21 मई को एक महिला ने खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताते हुए बैंक खातों और दूसरी वित्तीय जानकारी मांगी। अगले दिन दंपती की वीडियो कॉल पर एक कथित जज से बात कराई गई। इस फर्जी जज ने उनके आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी दिखाकर कार्रवाई का डर पैदा किया और उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वे गंभीर कानूनी मामले में फंस चुके हैं।

    9 जून को कथित जज ने वीडियो कॉल पर दंपती को संपत्ति सीज करने की धमकी दी। इसके बाद निशा पटेल नाम की महिला ने उन्हें भोपाल लौटने के लिए कहा। ठगों ने मामले को खत्म करने के नाम पर एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने का दबाव बनाया। डर के कारण दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से भोपाल के लिए रवाना हुए और 11 जून को यहां पहुंचे। अगले ही दिन उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपए जुटाए।

    आरोपियों के निर्देश पर दंपती ने पांच अलग-अलग बार रकम विभिन्न बैंक खातों में जमा की। ठगों ने संपर्क बनाए रखने के लिए सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया। इतनी बड़ी रकम देने के बाद भी दंपती को राहत नहीं मिली। उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया और किसी से बात नहीं करने का दबाव बनाया जाता रहा। यह सिलसिला 23 अगस्त तक चलता रहा। यानी 19 मई से 23 अगस्त तक करीब 96 दिनों तक बुजुर्ग दंपती साइबर ठगों के डर और दबाव में रहे।

    बाद में दंपती को पूरे मामले पर संदेह हुआ और उन्होंने जब संबंधित जानकारी की जांच कराई तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर दिखाया गया आदेश भी फर्जी था। इसके बाद उन्होंने साइबर सेल से संपर्क किया। 27 अगस्त को मामले में एफआईआर दर्ज की गई और केस डायरी कोलार थाने भेजी गई। पुलिस अब सातों WhatsApp नंबरों पांच बैंक खातों में हुए ट्रांजैक्शन वीडियो कॉल और आरोपियों की पहचान से जुड़े डिजिटल सुरागों की जांच कर रही है। यह मामला एक बार फिर बताता है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम पर डर पैदा कर पैसे मांगना साइबर ठगी का बड़ा तरीका बन चुका है। किसी भी जांच या गिरफ्तारी के नाम पर वीडियो कॉल के जरिए पैसे मांगने वालों पर भरोसा करने के बजाय तत्काल संबंधित पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना जरूरी है।

  • MP: भाजपा विधायक संजय पाठक की कंपनी के साथ डेढ़ करोड़ रपये की साइबर ठगी

    MP: भाजपा विधायक संजय पाठक की कंपनी के साथ डेढ़ करोड़ रपये की साइबर ठगी


    कटनी।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई है. राज्य के सबसे अमीर विधायकों में गिने जाने वाले और कटनी जिले (Katni district) के विजयराघवगढ़ (Vijayraghavgarh) से विधायक संजय पाठक (MLA Sanjay Pathak) की कंपनी के साथ डेढ़ करोड़ रुपये की भारी-भरकम साइबर ठगी का मामला सामने आया है. शातिर साइबर ठगों ने कंपनी के सीनियर डायरेक्टर के नाम और फोटो का इस्तेमाल कर अकाउंटेंट को चकमा दिया और बड़ी आसानी से पैसे ट्रांसफर करवा लिया।

    पूरी घटना बुधवार 12 अगस्त दोपहर करीब 2 बजे की है. विधायक संजय पाठक की कंपनी के सीनियर अकाउंटेंट शैलेश तिवारी के पास एक मैसेज आया. यह मैसेज कंपनी के ही एक सीनियर डायरेक्टर के मोबाइल नंबर से आया था, जिस पर उनकी फोटो भी लगी हुई थी. मैसेज में अकाउंटेंट को तुरंत किसी दूसरे बैंक खाते में डेढ़ करोड़ रुपये ट्रांसफर करने को कहा गया।

    चूंकि मैसेज सीधे सीनियर डायरेक्टर के नंबर और उनकी प्रोफाइल फोटो के साथ आया था, इसलिए अकाउंटेंट को किसी भी तरह का कोई शक नहीं हुआ. बिना देर किए अकाउंटेंट ने कंपनी के खाते से पैसे ट्रांसफर कर दिए. दो बार में ट्रांजेक्शन किए गए, जिसमें एक बार 1 करोड़ 16 लाख और दूसरी बार करीब 33 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए. इस तरह कुल मिलाकर लगभग डेढ़ करोड़ रुपये ठगों के खाते में चले गए।


    फ्लाइट से उतरते ही विधायक को मिली जानकारी

    दिलचस्प बात यह है कि जिस समय यह फ्रॉड हो रहा था, विधायक संजय पाठक फ्लाइट से यात्रा कर रहे थे. जैसे ही वह प्लेन से उतरे, उन्हें इस फर्जीवाड़े की जानकारी मिली। मामले की गंभीरता को देखते हुए विधायक संजय पाठक ने तुरंत कटनी के पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा को पूरी घटना की जानकारी दी. पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए तत्काल कार्रवाई शुरू की. पुलिस ने कुछ राशि को होल्ड कराने के निर्देश दिए. कंपनी के अकाउंटेंट की शिकायत पर रंगनाथ नगर थाने में साइबर ठगी का मामला दर्ज कर लिया गया है।


    ‘बॉस स्कैम’ का शिकार हुई कंपनी

    कटनी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) कमल मौर्य ने इस पूरे मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि यह एक टिपिकल साइबर फ्रॉड है, जिसे ‘बॉस स्कैम’ कहा जाता है. इसमें ठग बड़े अधिकारियों की नकली प्रोफाइल बनाकर कर्मचारियों को झांसे में लेते हैं।

    एएसपी ने बताया कि साइबर ठगों ने मात्र दो-तीन घंटे के अंदर ही पूरी रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर साफ कर दिया. ठगी गई रकम को करीब 200 अलग-अलग जगहों पर डिस्ट्रीब्यूट किया गया, जिसे एटीएम और चेक के माध्यम से निकाला जा रहा है।

    पुलिस और साइबर सेल की टीम ने तुरंत ऐक्शन लेते हुए ठगों के खातों से अब तक करीब 23 लाख रुपये की राशि को होल्ड (फ्रीज) करवा लिया है. फिलहाल, साइबर सेल की टीम तकनीकी जांच में जुटी हुई है और ठगों के पूरे नेटवर्क का पता लगाने की कोशिश कर रही है।

  • 10वीं-12वीं पास युवक रात में बन जाते थे 'फ्रैंक' और 'ब्रूस', अमेरिकन एक्सेंट में करते थे करोड़ों की ठगी

    10वीं-12वीं पास युवक रात में बन जाते थे 'फ्रैंक' और 'ब्रूस', अमेरिकन एक्सेंट में करते थे करोड़ों की ठगी


    ग्वालियर । ग्वालियर के मोहना स्थित होटल जैनपथ में संचालित एक फर्जी इंटरनेशनल कॉल सेंटर का पुलिस ने पर्दाफाश किया है। जांच में सामने आया कि महज 10वीं और 12वीं तक पढ़े चार युवक रात होते ही अपनी पहचान बदल लेते थे। वे खुद को फ्रैंक, लुईस, ब्रूस और माइकल जैसे विदेशी नामों से परिचित कराते और अमेरिकन एक्सेंट में धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर अमेरिकी नागरिकों को अपने जाल में फंसाते थे। शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि गिरोह ने महज पांच महीने में एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी को अंजाम दिया।

    पुलिस के अनुसार, आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे स्थित होटल जैनपथ के एक कमरे से यह फर्जी कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था। यहां से चारों आरोपी अमेरिकी समय के अनुसार रात करीब 9 बजे काम शुरू करते थे और सुबह तक विदेशी नागरिकों को कॉल करते थे। दिन में वे आराम करते थे, जबकि रातभर ठगी का नेटवर्क सक्रिय रहता था।

    जांच में पता चला कि आरोपियों को कॉल करने के लिए पहले से तैयार स्क्रिप्ट दी जाती थी। लैपटॉप स्क्रीन पर मौजूद उसी स्क्रिप्ट को पढ़कर वे खुद को विदेशी कंपनी का प्रतिनिधि बताते और लोगों का भरोसा जीतते थे। कॉलिंग के लिए आवश्यक डेटा और स्क्रिप्ट कथित मास्टरमाइंड प्रबल प्रताप सिंह परिहार उपलब्ध कराता था। आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि विदेशी नागरिकों का डेटा कथित तौर पर डार्क वेब से हासिल किया जाता था।

    पुलिस के मुताबिक, प्रत्येक कॉलर को 10 घंटे की शिफ्ट में करीब 150 कॉल करना अनिवार्य था। चारों आरोपी मिलकर प्रतिदिन 400 से 500 अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करते थे। इनमें से औसतन 12 से 15 लोग उनके झांसे में आ जाते थे। इसके बाद उनसे गिफ्ट कार्ड, प्रोसेसिंग फीस और अन्य बहानों से पैसे वसूले जाते थे।

    प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह रोजाना लगभग 50 से 70 हजार रुपये की ठगी करता था। इस हिसाब से हर महीने करीब 20 लाख रुपये की अवैध कमाई हो रही थी। पुलिस का अनुमान है कि पिछले पांच महीनों में गिरोह ने एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की है। हालांकि जांच अभी जारी है और यह रकम आगे बढ़ सकती है।

    पूछताछ में आरोपियों ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए अमेरिकन एक्सेंट बोलना सीखा था। इसके बाद वे दी गई स्क्रिप्ट का अभ्यास करते थे और उसी के आधार पर विदेशी नागरिकों से बातचीत कर उन्हें ठगी का शिकार बनाते थे। पुलिस अब गिरोह के मास्टरमाइंड, डिजिटल नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और इस साइबर ठगी से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।

  • इंदौर में साइबर ठगों का डबल अटैक, इंजीनियर से ₹1.12 लाख और छात्रा से ₹40 हजार की ऑनलाइन ठगी

    इंदौर में साइबर ठगों का डबल अटैक, इंजीनियर से ₹1.12 लाख और छात्रा से ₹40 हजार की ऑनलाइन ठगी


    इंदौर । इंदौर में साइबर अपराधियों का जाल लगातार फैलता जा रहा है। शहर में ऑनलाइन ठगी के दो अलग-अलग मामलों में बदमाशों ने एक सिविल इंजीनियर और एक छात्रा को अपना शिकार बनाकर कुल 1.52 लाख रुपए से अधिक की धोखाधड़ी कर ली। दोनों मामलों में पीड़ितों की शिकायत पर पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    पहला मामला राजेंद्र नगर थाना क्षेत्र का है, जहां धनवंतरी नगर स्थित साईं विला अपार्टमेंट निवासी सिविल इंजीनियर आनंद बनवडीकर के क्रेडिट कार्ड से बिना उनकी अनुमति के ऑनलाइन ट्रांजेक्शन कर दिए गए। आनंद के मुताबिक 8 जुलाई को दोपहर उनके मोबाइल पर लगातार ट्रांजेक्शन के मैसेज आए। जांच करने पर पता चला कि उनके आईसीआईसीआई बैंक के क्रेडिट कार्ड से दो बार 51-51 हजार रुपए और दूसरे क्रेडिट कार्ड से 10 हजार रुपए का भुगतान किया गया। इस तरह कुल 1 लाख 12 हजार रुपए उनके खाते से निकल गए।

    घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने बैंक से संपर्क कर दोनों क्रेडिट कार्ड तत्काल ब्लॉक करवा दिए। शिकायत में बताया गया है कि ट्रांजेक्शन अमेजन सेलर सर्विस और कैशफ्री इनोवेटिव रिटेल आईडी के माध्यम से किए गए। पुलिस अब संबंधित बैंक खातों और ऑनलाइन भुगतान के स्रोत की जांच कर रही है।

    दूसरा मामला भंवरकुआ थाना क्षेत्र का है, जहां एक छात्रा इंस्टाग्राम पर ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान साइबर ठगी का शिकार हो गई। छात्रा मोना नागर ने पुलिस को बताया कि उसने इंस्टाग्राम पर ‘सुमन वूमन’ नाम के अकाउंट से 999 रुपए की ड्रेस ऑर्डर की थी। ऑर्डर के बाद एक युवक ने फोन कर वेरिफिकेशन के नाम पर पहले 500 रुपए जमा कराने को कहा।

    युवक ने बातचीत के दौरान अलग-अलग प्रक्रिया बताकर कई बार ऑनलाइन भुगतान कराया। छात्रा उसकी बातों में आ गई और कुछ ही देर में उसके बैंक खाते से करीब 40 हजार रुपए निकल गए। ठगी का एहसास होने पर उसने तत्काल साइबर फ्रॉड की शिकायत दर्ज कराई।

    दोनों मामलों में पुलिस डिजिटल ट्रांजेक्शन, बैंक रिकॉर्ड और संबंधित ऑनलाइन अकाउंट की जांच कर रही है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, वेरिफिकेशन लिंक या सोशल मीडिया शॉपिंग ऑफर पर बिना पुष्टि किए भुगतान न करें और संदिग्ध ट्रांजेक्शन होने पर तुरंत बैंक तथा साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं।

  • सिर्फ 5 रुपए भेजे और गंवा दिए ₹1.08 लाख, ओटीटी सब्सक्रिप्शन बंद कराने के बहाने साइबर ठगों का नया खेल

    सिर्फ 5 रुपए भेजे और गंवा दिए ₹1.08 लाख, ओटीटी सब्सक्रिप्शन बंद कराने के बहाने साइबर ठगों का नया खेल


    नई दिल्ली । इंदौर में साइबर अपराधियों ने ऑनलाइन ठगी का नया तरीका अपनाते हुए एक दवा व्यापारी और उनकी पत्नी को एक लाख आठ हजार रुपए का चूना लगा दिया। ठगों ने ओटीटी सब्सक्रिप्शन बंद कराने के बहाने पहले महज 5 रुपए ट्रांसफर करवाए और इसके कुछ ही मिनटों बाद दोनों के बैंक खातों से अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए पूरी रकम निकाल ली। मामले की शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    पीड़ित निर्मल नवलानी गोपाल कॉलोनी के निवासी हैं और दवा व्यवसाय से जुड़े हैं। उन्होंने विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले रखी थी। चार जून को उन्होंने जियो हॉटस्टार का सब्सक्रिप्शन बंद कराने के लिए गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजा। सर्च में मिले नंबर पर कॉल करने पर सामने वाले व्यक्ति ने खुद को कंपनी का कस्टमर सपोर्ट अधिकारी बताया और सदस्यता बंद कराने की प्रक्रिया शुरू करने का दावा किया।

    बातचीत के दौरान आरोपी ने प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर 5 रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर करने को कहा। व्यापारी ने अपने गूगल पे के माध्यम से यह राशि भेज दी। इसके कुछ ही समय बाद उनका मोबाइल असामान्य तरीके से काम करने लगा और स्क्रीन बंद हो गई। जब मोबाइल दोबारा चालू किया तो बैंक खाते से लगातार रकम निकलने के संदेश आने लगे।

    सबसे पहले उनके बैंक ऑफ बड़ौदा खाते से 8 हजार और फिर 50 हजार रुपए निकाल लिए गए। इसके बाद उनकी पत्नी शारदा के खाते से भी 20 हजार और 30 हजार रुपए के दो अलग-अलग ट्रांजेक्शन कर दिए गए। इस तरह कुल 1 लाख 8 हजार रुपए साइबर ठगों के खाते में पहुंच गए।

    ठगी का अहसास होते ही व्यापारी ने तुरंत बैंक से संपर्क कर दोनों खातों को फ्रीज कराया और साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई। बाद में मामले को जूनी इंदौर थाने भेजा गया जहां पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। जांच एजेंसियां बैंक खातों ट्रांजेक्शन और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।

    यह मामला एक बार फिर बताता है कि गूगल पर दिखाई देने वाला हर कस्टमर केयर नंबर असली नहीं होता। साइबर अपराधी फर्जी नंबर और नकली वेबसाइट बनाकर लोगों को जाल में फंसा रहे हैं। किसी भी सेवा से जुड़ी सहायता लेने से पहले संबंधित कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या मोबाइल ऐप से ही कस्टमर सपोर्ट नंबर की पुष्टि करनी चाहिए। साथ ही किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर कोई ऐप डाउनलोड करने बैंक विवरण साझा करने या छोटी से छोटी राशि ट्रांसफर करने से भी बचना चाहिए क्योंकि यही साइबर ठगी की शुरुआत बन सकती है।

  • नौकरी दिलाने के नाम पर युवक से 44 हजार ऐंठे, इंटरव्यू और GST के बहाने करते रहे वसूली

    नौकरी दिलाने के नाम पर युवक से 44 हजार ऐंठे, इंटरव्यू और GST के बहाने करते रहे वसूली


    इंदौर । इंदौर में ऑनलाइन नौकरी दिलाने के नाम पर साइबर ठगी का मामला सामने आया है। डेटा एंट्री जॉब का झांसा देकर ठगों ने एक छात्र से अलग-अलग बहानों से करीब 44 हजार रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर करा लिए। नौकरी और रिफंड का भरोसा देते हुए आरोपियों ने कई किस्तों में रकम वसूली, लेकिन न तो नौकरी दी और न ही पैसा लौटाया। शिकायत के बाद एमआईजी थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी हैइंदौर ।

    पुलिस के अनुसार नेहरू नगर निवासी छात्र राजेश पाटीदार ने शिकायत में बताया कि 17 जून को उसके मोबाइल पर एक युवती का फोन आया। उसने अपना नाम अनुष्का बताया और कहा कि नौकरी के लिए किया गया उसका आवेदन चयनित हो गया है। बातचीत के दौरान उसने व्यक्तिगत जानकारी और कार्य से जुड़ी कुछ जानकारियां लीं तथा बताया कि डेटा एंट्री की नौकरी के लिए उसका चयन किया गया है। साथ ही जल्द ही टेलीफोनिक इंटरव्यू कराने की बात कही गई।

    कुछ देर बाद युवती ने चयन प्रक्रिया पूरी करने के लिए 1800 रुपए जमा करने को कहा। उसने भरोसा दिलाया कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद 50 रुपए काटकर बाकी रकम वापस कर दी जाएगी। इसके बाद एक अन्य व्यक्ति ने फोन कर इंटरव्यू की जानकारी दी और मोबाइल पर ही इंटरव्यू लेने की बात कही।

    शिकायत के मुताबिक इंटरव्यू के बाद आरोपियों ने चयन होने का दावा करते हुए फिर 1800 रुपए जमा कराए। इसके बाद सुरक्षा राशि, सर्विस चार्ज और जीएसटी समेत अलग-अलग मदों के नाम पर लगातार पैसे मांगे जाते रहे। हर बार यह आश्वासन दिया गया कि पूरी प्रक्रिया समाप्त होने पर जमा की गई पूरी राशि वापस कर दी जाएगी।

    आरोपियों ने राजेश से कुल आठ ऑनलाइन ट्रांजेक्शन कराए और करीब 44 हजार रुपए अपने खातों में ट्रांसफर करा लिए। रकम जमा कराने के बाद भी न तो नियुक्ति पत्र भेजा गया और न ही किसी प्रकार की नौकरी उपलब्ध कराई गई। जब लगातार संपर्क करने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला, तब छात्र को ठगी का एहसास हुआ।

    इसके बाद पीड़ित ने साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर एमआईजी थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस मोबाइल नंबर, बैंक खातों और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन की जानकारी के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

    पुलिस ने युवाओं से अपील की है कि नौकरी दिलाने के नाम पर रजिस्ट्रेशन फीस, प्रोसेसिंग फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट या जीएसटी जैसी कोई भी रकम मांगने वाले कॉल और मैसेज से सतर्क रहें। किसी भी कंपनी या भर्ती एजेंसी की सत्यता की पुष्टि किए बिना ऑनलाइन भुगतान न करें और संदिग्ध मामलों की तुरंत साइबर हेल्पलाइन या पुलिस को सूचना दें।

  • म्यूल हंट 1.0 बना साइबर ठगों का काल, गुजरात पुलिस ने करोड़ों की ठगी का नेटवर्क तोड़ा

    म्यूल हंट 1.0 बना साइबर ठगों का काल, गुजरात पुलिस ने करोड़ों की ठगी का नेटवर्क तोड़ा


    नई दिल्ली । साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के बीच गुजरात पुलिस ने एक ऐसा अभियान चलाया है जिसने ऑनलाइन ठगी के बड़े नेटवर्क की जड़ें हिला दी हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में संचालित ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 ने साइबर अपराधियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया है। इस अभियान को राज्य में साइबर अपराध के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी और प्रभावी कार्रवाई माना जा रहा है।

    डिजिटल युग में साइबर ठग नए-नए तरीकों से लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। फर्जी कॉल्स, ऑनलाइन निवेश के झांसे, बैंकिंग फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट जैसे हथकंडों के जरिए अपराधी लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में गुजरात पुलिस ने तकनीक और डेटा इंटेलिजेंस का सहारा लेते हुए साइबर अपराधियों के पूरे नेटवर्क को निशाने पर लिया।

    ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 के तहत गुजरात पुलिस ने इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर, नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल, समन्वय पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन से प्राप्त आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया। इस डेटा के आधार पर ऐसे म्यूल अकाउंट्स और उनसे जुड़े लोगों की पहचान की गई जो साइबर अपराध से अर्जित धन को निकालने और आगे पहुंचाने का काम कर रहे थे।

    अभियान के दौरान राज्यभर में 565 एफआईआर दर्ज की गईं और 638 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा 913 म्यूल अकाउंट्स पर कार्रवाई की गई तथा कुल 4,052 साइबर अपराधों की पहचान की गई जिनमें 491 मामले गुजरात से जुड़े पाए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस अभियान में 2,289 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड का खुलासा हुआ।

    गुजरात पुलिस ने इस अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और इंडियन डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रिस्क स्कोरिंग सिस्टम का भी उपयोग किया। इस तकनीक की मदद से संदिग्ध खातों की पहचान पहले से अधिक सटीक तरीके से की जा रही है ताकि साइबर अपराधियों तक तेजी से पहुंचा जा सके।

    साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस गांधीनगर के एसपी राजदीप सिंह झाला ने बताया कि पुलिस ने ऐसे खातों को चिह्नित किया जो सीधे साइबर ठगी की रकम प्राप्त करते थे और बाद में एटीएम या चेक के माध्यम से पैसे निकालते थे। विस्तृत डेटाबेस तैयार कर इन खातों और उनसे जुड़े नेटवर्क पर एक साथ कार्रवाई की गई जिससे साइबर अपराध के बड़े गिरोहों का खुलासा हुआ।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आम लोगों की सतर्कता भी इस लड़ाई में बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी संदिग्ध कॉल, मैसेज या ऑनलाइन ऑफर पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। यदि कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई दे तो तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती और ऐसे नाम पर आने वाले कॉल पूरी तरह फर्जी होते हैं।

    ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 की सफलता के बाद गुजरात सरकार ने साइबर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को और तेज करते हुए 2 जून 2026 से ऑपरेशन म्यूल हंट 2.0 भी शुरू कर दिया है। इसका उद्देश्य साइबर ठगी के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना और डिजिटल दुनिया को आम नागरिकों के लिए अधिक सुरक्षित बनाना है।

  • साइबर ठगी के पैसों से खरीदा सोना, उज्जैन में पकड़ा गया गिरोह: MBA पास युवकों का नेटवर्क बेनकाब, BJP नेता का बेटा निकला मास्टरमाइंड

    साइबर ठगी के पैसों से खरीदा सोना, उज्जैन में पकड़ा गया गिरोह: MBA पास युवकों का नेटवर्क बेनकाब, BJP नेता का बेटा निकला मास्टरमाइंड


    मध्यप्रदेश । साइबर अपराधियों द्वारा ठगी के पैसों को वैध बनाने के लिए अपनाए जा रहे नए तरीकों का एक चौंकाने वाला मामला उज्जैन में सामने आया है। उज्जैन पुलिस ने ऐसे गिरोह का खुलासा किया है, जो साइबर ठगी से हासिल रकम को सोने में निवेश कर उसे नकदी में बदलने की साजिश रच रहा था। मामले में नर्मदापुरम के तीन युवकों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें मुख्य आरोपी एक स्थानीय भाजपा नेता का बेटा बताया जा रहा है।

    पुलिस जांच के अनुसार, गिरफ्तार आरोपी अनिमेष वर्मा, कशिश बढ़ानी और राहुल गुप्ता आपस में मित्र हैं और तीनों उच्च शिक्षित हैं। आरोपियों ने फर्जी आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्रों का इस्तेमाल कर उज्जैन के विभिन्न ज्वेलरी शोरूम से करीब 4.65 लाख रुपए का सोना खरीदा। इन खरीदारी का भुगतान साइबर ठगी से प्राप्त रकम के जरिए क्यूआर कोड स्कैन कर किया गया था।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब फ्रीगंज स्थित एक ज्वेलर्स के बैंक खाते को संदिग्ध ट्रांजेक्शन के चलते होल्ड कर दिया गया। शोरूम संचालक ने इसकी सूचना माधवनगर थाने में दी। पुलिस ने तत्काल जांच शुरू की और सीसीटीवी फुटेज खंगाले। फुटेज में खरीदारी करने आए युवक के मोबाइल पर आए एक कॉल का नंबर स्क्रीन पर दिखाई दे गया। यही नंबर जांच का सबसे अहम सुराग साबित हुआ।

    माधवनगर थाना पुलिस ने तकनीकी विश्लेषण और लोकेशन ट्रैकिंग की मदद से महाकाल क्षेत्र के एक होटल में दबिश देकर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में सामने आया कि मुख्य आरोपी अनिमेष वर्मा कुछ महीने पहले क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज प्लेटफॉर्म के माध्यम से टेलीग्राम पर सक्रिय साइबर ठगों के संपर्क में आया था। ठगों ने उसे मोटे कमीशन और त्वरित मुनाफे का लालच दिया था।

    आरोपियों ने पिछले दस दिनों में उज्जैन के कई ज्वेलरी शोरूम से सोना खरीदा। दुकानदारों के क्यूआर कोड दिल्ली में बैठे साइबर ठगों को भेजे जाते थे। इसके बाद राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश में साइबर ठगी के शिकार लोगों के बैंक खातों से सीधे भुगतान किया जाता था। सोना खरीदने के बाद उसे बेचकर रकम को नकदी में बदलने की योजना थी।

    उज्जैन एसपी प्रदीप शर्मा के अनुसार, प्रारंभिक जांच में राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश के पीड़ितों के खातों से लाखों रुपए के भुगतान की पुष्टि हुई है। पुलिस का मानना है कि यह एक बड़े अंतरराज्यीय और संभवतः अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का हिस्सा है, जो ठगी के पैसों को पेट्रोल पंपों और सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों में निवेश कर वैध बनाने का प्रयास करता है।

    फिलहाल पुलिस ने आरोपियों को न्यायालय में पेश कर 21 जून तक रिमांड पर लिया है। मामले की गहराई से जांच की जा रही है और नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक पहुंचने के लिए एक विशेष टीम दिल्ली भेजी जा रही है। पुलिस को उम्मीद है कि पूछताछ में साइबर अपराध के इस संगठित नेटवर्क से जुड़े कई और अहम खुलासे हो सकते हैं।