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  • निजी कॉलेजों की फीस निर्धारण पर घिरी सरकार चार साल में 5062 संस्थानों का शुल्क तय करने की प्रक्रिया पर सवाल

    निजी कॉलेजों की फीस निर्धारण पर घिरी सरकार चार साल में 5062 संस्थानों का शुल्क तय करने की प्रक्रिया पर सवाल


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में निजी शिक्षण संस्थानों की फीस निर्धारण प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने विधानसभा में सरकार द्वारा दिए गए लिखित जवाब का हवाला देते हुए फीस निर्धारण में पारदर्शिता और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति ने वर्ष 2022 से 2025-26 के बीच 5062 निजी शिक्षण संस्थानों की फीस तय की, जबकि वर्ष 2025-26 में एक ही बैठक के दौरान 355 निजी संस्थानों की फीस निर्धारित कर दी गई। उन्होंने इसे नियमों और व्यावहारिक प्रक्रिया के विपरीत बताते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

    विधानसभा में पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में तकनीकी शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने बताया कि प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति निर्धारित प्रक्रिया के तहत निजी शिक्षण संस्थानों की फीस तय करती है। उन्होंने जानकारी दी कि चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिकतम 15 दिनों के भीतर संस्थानों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का परीक्षण कर अपनी रिपोर्ट समिति को सौंपता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर शुल्क निर्धारण किया जाता है।

    सरकार के जवाब के बाद कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने दावा किया कि उनके मूल प्रश्न का महत्वपूर्ण हिस्सा अनुत्तरित छोड़ दिया गया। उनका कहना है कि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि चार्टर्ड अकाउंटेंट ने कितने दिनों में कितने संस्थानों के आवेदन और वित्तीय दस्तावेजों का परीक्षण किया। उनके अनुसार वर्ष 2008 के राजपत्र में स्पष्ट प्रावधान हैं कि किसी भी शिक्षण संस्थान की फीस तय करने से पहले उसके आय-व्यय, बैलेंस शीट, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया जाना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर संस्थान से अतिरिक्त जानकारी और स्पष्टीकरण भी लिया जाता है। ऐसे में एक ही दिन में बड़ी संख्या में संस्थानों की फीस तय होना कई सवाल खड़े करता है।

    उपाध्याय ने विशेष रूप से वर्ष 2025-26 का उल्लेख करते हुए कहा कि एक ही बैठक में 355 निजी शिक्षण संस्थानों की फीस निर्धारित कर दी गई। उनका कहना है कि प्रत्येक संस्थान के दस्तावेजों, निरीक्षण दल की रिपोर्ट और चार्टर्ड अकाउंटेंट की रिपोर्ट का अलग-अलग परीक्षण किए बिना इतनी बड़ी संख्या में शुल्क निर्धारण करना संभव नहीं लगता। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई।

    विधायक ने नर्सिंग कॉलेजों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि हर वर्ष 60 से 100 नर्सिंग संस्थानों की फीस तय की जाती है, जबकि कई संस्थानों पर पहले से नियमों के उल्लंघन और अनियमित संचालन के आरोप लगते रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि ऐसे संस्थानों के मामलों में निरीक्षण दल और चार्टर्ड अकाउंटेंट ने किन मानकों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की और शुल्क निर्धारण की अनुमति कैसे दी गई।

    कांग्रेस विधायक ने मांग की कि निजी शिक्षण संस्थानों की फीस निर्धारण प्रक्रिया की सीबीआई अथवा किसी स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच समिति से जांच कराई जाए। उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफाखोरी पर रोक लगाने और छात्रों के हितों की रक्षा के लिए पूरे प्रदेश में समान पाठ्यक्रमों के लिए पारदर्शी और एक समान शुल्क व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

    यह मुद्दा विधानसभा में सामने आने के बाद निजी शिक्षण संस्थानों की फीस निर्धारण प्रक्रिया, नियामक समिति की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार इन आरोपों पर क्या आगे की कार्रवाई करती है।

  • सांदीपनि विद्यालयों पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बड़ा दावा, बोले- निजी स्कूल छोड़कर सरकारी विद्यालयों में बढ़ रहा विद्यार्थियों का भरोसा

    सांदीपनि विद्यालयों पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बड़ा दावा, बोले- निजी स्कूल छोड़कर सरकारी विद्यालयों में बढ़ रहा विद्यार्थियों का भरोसा

    मध्य प्रदेश: के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कटनी जिले के स्लीमनाबाद क्षेत्र में दो नए सांदीपनि विद्यालयों के लोकार्पण अवसर पर कहा कि प्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित सांदीपनि विद्यालयों के कारण अब विद्यार्थी निजी विद्यालयों से निकलकर शासकीय संस्थानों में प्रवेश ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर संसाधनों के माध्यम से राज्य सरकार बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मैत्री भारतीय संस्कृति में समानता, आत्मीयता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने उज्जैन स्थित सांदीपनि आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर ज्ञान और संस्कार का महत्व स्थापित किया था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रदेश में आधुनिक सुविधाओं से युक्त सांदीपनि विद्यालय विकसित किए जा रहे हैं, जहां पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक शिक्षा का संतुलित समावेश किया गया है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने झिंझरी और बहोरीबंद में निर्मित दो नए सांदीपनि विद्यालयों का लोकार्पण किया। इन विद्यालयों में आधुनिक शैक्षणिक सुविधाओं के साथ डिजिटल शिक्षा, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय और अन्य आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, साइकिलें और विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं का लाभ उपलब्ध करा रही है। बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को लैपटॉप तथा विद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को स्कूटी प्रदान की जा रही है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा के साथ-साथ किसानों के कल्याण और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर भी सरकार समान रूप से कार्य कर रही है। उन्होंने स्लीमनाबाद टनल परियोजना को बघेलखंड और बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि इससे रीवा, सतना, मैहर, पन्ना और कटनी सहित कई जिलों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के लिए लगभग 1400 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं और इसका लाभ बड़ी संख्या में किसानों को मिलेगा।

    उन्होंने आगे कहा कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना तथा पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना भी प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ाने और कृषि उत्पादन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि इन परियोजनाओं के पूरा होने से प्रदेश के कई जिलों में खेती की स्थिति बेहतर होगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने आगामी विधानसभा सत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार समान नागरिक संहिता के प्रारूप को मंत्रिपरिषद के समक्ष प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। उन्होंने बताया कि विधानसभा के वर्षाकालीन सत्र से पहले जगदीशपुर में मंत्रिपरिषद की बैठक आयोजित कर इस संबंध में आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार सभी नागरिकों के लिए समान व्यवस्था लागू करने की दिशा में कार्य कर रही है।

    अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना के तहत पात्र हितग्राहियों के बैंक खातों में 1500 रुपये की राशि हस्तांतरित की जाएगी। उन्होंने दोहराया कि शिक्षा, सिंचाई, सामाजिक सुरक्षा और आधारभूत विकास से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के सर्वांगीण विकास को गति देना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

  • NEET और भर्ती घोटालों के खिलाफ छात्रों का अनोखा आंदोलन, डिलीवरी बॉय से ड्राइवर तक कर रहे सहयोग

    NEET और भर्ती घोटालों के खिलाफ छात्रों का अनोखा आंदोलन, डिलीवरी बॉय से ड्राइवर तक कर रहे सहयोग


    इंदौर । इंदौर के टंट्याभील चौराहे पर 23 सूत्रीय मांगों को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार आठवें दिन भी जारी रहा। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे किसी राजनीतिक दल या बड़े संगठन के बजाय आम लोगों का सहयोग मिल रहा है। धरना स्थल पर टेंट, गद्दे, भोजन, पेयजल और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं समाज के लोगों और छात्रों के सहयोग से संचालित की जा रही हैं। कई युवा अपनी रोज की कमाई का हिस्सा भी आंदोलन के लिए दे रहे हैं ताकि प्रदर्शन बिना किसी बाधा के जारी रह सके।

    प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि जब उन्होंने आंदोलन शुरू किया था तब उनके पास बैठने और बारिश से बचने तक की व्यवस्था नहीं थी। शुरुआती दिनों में बारिश से बचने के लिए उन्हें अपने बैठने वाले गद्दों को ही ओढ़ना पड़ा। इस दौरान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो कई सामाजिक संगठन और स्थानीय नागरिक उनकी मदद के लिए आगे आए। इसके बाद धरना स्थल पर टेंट, गद्दे और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की गई।

    छात्रों की मांग है कि नीट पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, रिक्त और बैकलॉग पदों पर जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू हो तथा शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि जब तक उनकी 23 सूत्रीय मांगों पर सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

    धरना स्थल पर मौजूद पवन अहिरवार और अरुण बड़ोले ने बताया कि रोजाना टेंट और अन्य व्यवस्थाओं पर करीब 1500 रुपये खर्च होते हैं। यह राशि आम नागरिकों के स्वैच्छिक सहयोग से जुटाई जा रही है। इसके लिए धरना स्थल पर सहयोग पेटी भी रखी गई है, जिसमें लोग अपनी इच्छा से आर्थिक सहायता दे रहे हैं। कई छात्र स्वयं लोगों से संपर्क कर आंदोलन के लिए सहयोग की अपील भी कर रहे हैं।

    इस आंदोलन में आम लोगों की भागीदारी भी देखने को मिल रही है। पेशे से ड्राइवर दिनेश वास्कले ने बताया कि उनके छोटे बच्चे हैं और वे नहीं चाहते कि भविष्य में उन्हें भी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं का सामना करना पड़े। उन्होंने अपना जन्मदिन भी धरना स्थल पर मनाया और उस दिन सभी छात्रों के भोजन की व्यवस्था की। वहीं डिलीवरी बॉय चंदन मोवेल ने कहा कि वह अपनी कमाई का एक हिस्सा आंदोलन के लिए नियमित रूप से दे रहे हैं। इसी तरह कई अन्य युवाओं ने भी छात्रों के समर्थन में आर्थिक सहयोग दिया है।

    धरने में शामिल छात्रों के अनुसार रात के समय भी 15 से 20 छात्र लगातार धरना स्थल पर मौजूद रहते हैं, जबकि सुबह और शाम करीब 100 छात्र आंदोलन में शामिल होते हैं। उनका आरोप है कि अब तक प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी मांगों पर चर्चा करने नहीं पहुंचा है।

    एलएलएम के छात्र अनिल विद्याराणा ने बताया कि विभिन्न छात्र संगठनों का भी आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। कई संगठन धरना स्थल पर पहुंचकर छात्रों का मनोबल बढ़ा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को प्रदेश स्तर तक विस्तारित किया जाएगा।

  • मार्क्स नहीं हुनर बनाएगा सफल पेरेंट्स को डॉ संजीव अग्रवाल की सीख बच्चों को दें सीखने की आजादी

    मार्क्स नहीं हुनर बनाएगा सफल पेरेंट्स को डॉ संजीव अग्रवाल की सीख बच्चों को दें सीखने की आजादी


    मध्‍य प्रदेश आज के समय में शिक्षा केवल परीक्षा में अधिक अंक लाने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि बदलते दौर में सफलता का असली आधार ज्ञान के साथ कौशल और व्यक्तित्व विकास बन चुका है। ऐसे समय में सेज यूनिवर्सिटी के चांसलर और सेज ग्रुप के सीएमडी डॉ संजीव अग्रवाल ने अभिभावकों को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा है कि बच्चों को केवल नंबरों की दौड़ में उलझाने के बजाय उनकी प्रतिभा और स्किल्स को विकसित करने पर जोर देना चाहिए। उनका मानना है कि भविष्य में वही युवा सबसे आगे होंगे जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान नई सोच और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता होगी।

    डॉ संजीव अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री दिलाना नहीं बल्कि ऐसे युवाओं का निर्माण करना होना चाहिए जो आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार करें। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जहां छात्र सिर्फ नौकरी पाने की तैयारी न करें बल्कि नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से जॉब क्रिएटर बनकर समाज और देश के विकास में योगदान दें।

    उन्होंने बताया कि सेज यूनिवर्सिटी में विद्यार्थियों के समग्र विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि कोई छात्र नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित नहीं होता तो केवल सूचना देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं की जाती बल्कि शिक्षक स्वयं उसके घर तक पहुंचते हैं और उसकी पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं। संस्थान का उद्देश्य हर छात्र को शिक्षा से जोड़कर रखना और उसकी क्षमता को सही दिशा देना है।

    डॉ अग्रवाल के अनुसार आज की शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती। इसलिए विश्वविद्यालय में स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों के साथ उद्योग जगत के विशेषज्ञों को भी छात्रों से संवाद के लिए बुलाया जाता है। कैंपस में स्टार्टअप कॉन्क्लेव करियर डे और विभिन्न व्यावसायिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ताकि विद्यार्थी वास्तविक दुनिया की चुनौतियों को समझ सकें और अपने करियर की बेहतर तैयारी कर सकें। उनका कहना है कि विद्यार्थियों को प्रकृति के करीब रहने व्यावहारिक सोच विकसित करने और नई परिस्थितियों में स्वयं निर्णय लेने का अवसर भी मिलना चाहिए।

    अपने छात्र जीवन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पहले शिक्षा का स्वरूप काफी अलग था। उस समय शिक्षक केवल किताबों तक सीमित ज्ञान देते थे लेकिन अब समय बदल चुका है। आज सफल होने के लिए कम्युनिकेशन स्किल्स लीडरशिप टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसी क्षमताएं भी उतनी ही जरूरी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके समय में भी कम अंक आने का डर रहता था लेकिन आज कई अभिभावक बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल देते हैं जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और वे अपनी वास्तविक प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं कर पाते।

    युवाओं के लिए उनका संदेश भी स्पष्ट है कि सफलता मेहनत धैर्य और निरंतर सीखने की प्रक्रिया से मिलती है। यदि किसी प्रयास में तुरंत सफलता न मिले तो निराश होने की जरूरत नहीं बल्कि उसे अनुभव मानकर आगे बढ़ना चाहिए। उनका विश्वास है कि लगातार मेहनत करने वाले लोगों के लिए अवसर जरूर बनते हैं और ईमानदारी के साथ किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

    डॉ संजीव अग्रवाल का मानना है कि भारत का भविष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था में छिपा है जो बच्चों को केवल अच्छे अंक नहीं बल्कि बेहतर इंसान जिम्मेदार नागरिक और सफल पेशेवर बनने की प्रेरणा दे। जब शिक्षा में स्किल्स नवाचार और नैतिक मूल्यों को बराबर महत्व मिलेगा तभी देश की युवा शक्ति वास्तव में राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत बन सकेगी।

  • स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने कहा है कि स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन को गति देने वाला ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म अब देश में ‘वन नेशन, वन डिजिटल प्लेटफॉर्म’ के रूप में एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। यह प्लेटफॉर्म शिक्षा को अधिक सुलभ, समावेशी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में लगातार विस्तार कर रहा है।

    दीक्षा की शुरुआत वर्ष 2017 में की गई थी और इसे नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) के तहत सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल टेक्नोलॉजी (CIET) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य देशभर के छात्रों और शिक्षकों को एकीकृत डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम उपलब्ध कराना है।

    सरकारी जानकारी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म कक्षा 1 से 12 तक के लिए व्यापक डिजिटल लर्निंग सपोर्ट प्रदान करता है। इसमें प्रारंभिक साक्षरता और अंक ज्ञान से लेकर वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक की पढ़ाई शामिल है, जिससे विद्यार्थियों को एक समान और संरचित शैक्षिक अनुभव मिल सके।

    दीक्षा को लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों ने अपनाया है। यह प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं, पाठ्यक्रम और शिक्षण आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर शिक्षा की पहुंच और प्रभावशीलता बढ़ती है।

    इस डिजिटल प्लेटफॉर्म में 2D और 3D एनिमेशन, ऑगमेंटेड रियलिटी अनुभव, सिमुलेशन, वर्चुअल लैब और साइन लैंग्वेज वीडियो जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य छात्रों के लिए सीखने की प्रक्रिया को अधिक रोचक और समझने योग्य बनाना है।

    सरकार ने बताया कि QR-कोड आधारित पाठ्यपुस्तकें NCERT की किताबों को वीडियो, इंटरैक्टिव सामग्री और शिक्षक गाइड से जोड़ती हैं। इससे कक्षा शिक्षण में डिजिटल सामग्री का सहज उपयोग संभव होता है और विषयों की बेहतर समझ विकसित होती है।

    दिव्यांग शिक्षार्थियों के लिए भी इस प्लेटफॉर्म पर विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसमें DAISY प्रारूप, टेक्स्ट-टू-स्पीच फीचर और भारतीय सांकेतिक भाषा वीडियो शामिल हैं, जिससे समावेशी शिक्षा को बढ़ावा मिलता है और हर वर्ग के विद्यार्थियों तक समान अवसर पहुंचते हैं।

    दीक्षा प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत शिक्षण को भी समर्थन देता है। अभ्यास प्रश्नों, अनुकूली मूल्यांकन और योग्यता आधारित प्रश्न बैंक के माध्यम से विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता का आकलन किया जाता है और कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर समय पर सुधार किया जाता है।

    इसके साथ ही यह प्लेटफॉर्म शिक्षक प्रशिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एनआईएसएचटीएचए जैसे कार्यक्रमों के जरिए शिक्षकों को स्व-गति आधारित प्रमाणित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे उनकी व्यावसायिक क्षमता में निरंतर सुधार हो सके।

    सरकार के अनुसार, दीक्षा एक संघबद्ध और विकेंद्रीकृत मॉडल पर काम करता है, जिसमें राज्यों और संस्थानों को स्थानीय भाषाओं में सामग्री अपलोड करने की स्वतंत्रता मिलती है। हालांकि गुणवत्ता नियंत्रण सीआईईटी-एनसीईआरटी द्वारा समय-समय पर किया जाता है।

    यह प्लेटफॉर्म ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध है, जिससे इंटरनेट की सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में भी शिक्षा बाधित नहीं होती। स्मार्ट क्लासरूम और डाउनलोड सुविधा के माध्यम से छात्रों को निरंतर अध्ययन का अवसर मिलता है, जिससे डिजिटल शिक्षा का दायरा और अधिक व्यापक हो रहा है।

  • मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की नई पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की ऐतिहासिक कलाकृति ‘डांसिंग गर्ल’ (नृत्य करती युवती) के चित्रण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, परिषद द्वारा कला शिक्षा की नई पुस्तक ‘मधुरिमा’ के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में मोहनजोदड़ो से प्राप्त इस सुप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा के वास्तविक रूप में बदलाव करते हुए उसके बिना कपड़ों वाले धड़ को छायांकन (शेडिंग) के जरिए ढका हुआ दिखाया गया था। ऐतिहासिक धरोहर के इस बदले हुए रूप की शिक्षाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने तीखी आलोचना की थी। चौतरफा दबाव और विरोध के बीच अब एनसीईआरटी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पाठ्यपुस्तक में इस मूर्ति की मूल और वास्तविक तस्वीर को ही प्रकाशित करने का अंतिम फैसला लिया है।

    इस पूरे मामले पर एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी ने एक साक्षात्कार के दौरान आधिकारिक पुष्टि की है। जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या परिषद कक्षा नौ की कला विषय की पुस्तक में संशोधित और विवादित तस्वीर को हटाकर मूल कांस्य प्रतिमा का चित्र शामिल करेगी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘हां’ में जवाब दिया। उल्लेखनीय है कि इस नई पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से के मूल स्वरूप को इस तरह बदला गया था कि शरीर के वे हिस्से साफ दिखाई नहीं दे रहे थे जो वास्तविक पुरातात्विक खोज में नजर आते हैं। इसके विपरीत, परिषद द्वारा ही तैयार की गई कक्षा छठी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में इसी ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को उसके मूल और वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप के बेहद करीब दिखाया गया है, जिसने इस विसंगति को और उजागर कर दिया।

    कक्षा छठी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक समिति के पूर्व प्रमुख रहे माइकल डैनिनो ने इस बदलाव पर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने खुलासा किया कि इससे पहले उन्हें यह तर्क दिया गया था कि इस प्राचीन प्रतिमा का नग्न स्वरूप छोटे बच्चों की ‘उम्र के अनुसार उपयुक्त नहीं’ है। डैनिनो के अनुसार, उनकी पूरी टीम इस तर्क से असहमत थी और जब उन्होंने कक्षा छठी के शिक्षकों से इस संबंध में बात की, तो उन सभी का कहना था कि क्लासरूम में इस ऐतिहासिक कलाकृति को लेकर कभी कोई समस्या या असहजता नहीं रही। डैनिनो ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि कलाकृति की नग्नता को अनुपयुक्त मानना वास्तव में विक्टोरियन युग की पुरानी और संकीर्ण औपनिवेशिक सोच का हिस्सा है, जबकि वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को इन्हीं औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं।

    जानकारों का मानना है कि यदि भारतीय कला पर आधारित किसी गंभीर अध्याय में भी किसी ऐतिहासिक कलाकृति को उसके वास्तविक रूप और सही शारीरिक अनुपात में नहीं दिखाया जा सकता, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या है। इतिहासकारों ने इस बदलाव की तुलना मध्य युग की उस घटना से की है जब चर्च ने अपनी संकीर्ण सोच के कारण ‘डेविड’ की विश्वप्रसिद्ध सुंदर प्रतिमा पर अंजीर का पत्ता जोड़कर उसे गलत रूप में प्रस्तुत किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक साक्ष्य या कलाकृति की तस्वीरों में इस तरह का मनमाना बदलाव करना एक तरह से ‘नकली कलाकृति’ बनाने जैसा है, जो यह साबित करता है कि जिम्मेदार संस्थाओं में इतिहास और पुरातत्व को प्रस्तुत करने की समझ बेहद कम है।

    ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, यह ‘डांसिंग गर्ल’ मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग २६०० ईसा पूर्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कांस्य प्रतिमा है। सिंधु घाटी सभ्यता की इस अद्भुत कलाकृति को ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ (मोम पिघलाकर धातु ढालने की विधि) से बनाया गया था, जो तकनीक आज भी भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से प्रचलित है। पुरातत्वविदों के अनुसार, कमर पर हाथ रखकर खड़े होने की यह विशिष्ट मुद्रा राजस्थान के हड़प्पा कालीन स्थल ‘भिरड़ाना’ से मिले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों पर भी अंकित मिली है, जो यह दर्शाती है कि इस मुद्रा का प्राचीन काल में कोई गहरा सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व था।

  • NEET-UG पेपर लीक मामला गरमाया: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर राहुल के बयान से सियासी घमासान, BJP ने साधा निशाना

    NEET-UG पेपर लीक मामला गरमाया: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर राहुल के बयान से सियासी घमासान, BJP ने साधा निशाना

    नई दिल्ली । NEET-UG पेपर लीक मामले को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है और इस बार विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक बयान के बाद सामने आया है, जिसके बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। राहुल गांधी के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे गैर-जिम्मेदाराना और तथ्यहीन बताते हुए विपक्ष पर गंभीर मुद्दों को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को लेकर चल रही बहस को केंद्र में ला दिया है।

    दरअसल मामला उस समय चर्चा में आया जब NEET-UG पेपर लीक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने यह टिप्पणी की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे मामले की प्रगति पर व्यक्तिगत रूप से नजर रख रहे हैं। इसी बयान को आधार बनाते हुए राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसा और कहा कि अगर प्रधानमंत्री जांच की निगरानी कर रहे हैं, तो क्या उन्होंने पेपर लीक की भी व्यक्तिगत निगरानी की थी। राहुल गांधी का यह बयान तेजी से राजनीतिक बहस का विषय बन गया और कुछ ही समय में विभिन्न दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

    भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के इस बयान को गंभीरता से लेते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष के नेता को जिम्मेदारी के साथ बयान देना चाहिए, खासकर तब जब मामला लाखों छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा हो। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं और संवेदनशील मुद्दों पर अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी का यह भी कहना है कि इस तरह की टिप्पणी न केवल राजनीतिक स्तर पर अनावश्यक तनाव पैदा करती है, बल्कि छात्रों और उनके अभिभावकों की चिंताओं को भी कमजोर करती है।

    केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार नेता से अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों के आधार पर बात करे और समाधान की दिशा में सुझाव दे, न कि केवल सुर्खियां बटोरने के लिए बयानबाजी करे। वहीं बीजेपी प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी राहुल गांधी के बयान को तर्क से परे बताते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां उनकी गंभीर मुद्दों को समझने की क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं।

    दूसरी ओर, बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता मुद्दों की गंभीरता को समझे बिना प्रतिक्रिया देते हैं, जिससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है।

    गौरतलब है कि NEET-UG परीक्षा, जो मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाती है, इस वर्ष पेपर लीक के आरोपों के बाद विवादों में आ गई थी। इसके बाद परीक्षा प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे और मामला न्यायालय तक पहुंच गया, जहां फिलहाल इसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

    इस पूरे विवाद ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। फिलहाल मामला अदालत की निगरानी में है और जांच प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी ने इसे और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    नई दिल्ली।देश में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से युवाओं के भविष्य के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। हर बार किसी बड़े परीक्षा विवाद के बाद सख्त कानून और कठोर कार्रवाई की बातें सामने आती हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। युवाओं की मेहनत, वर्षों की तैयारी और उम्मीदें बार-बार ऐसे मामलों की भेंट चढ़ती रही हैं। इसी समस्या पर रोक लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम लागू किया था। उस समय यह दावा किया गया था कि इस कानून के बाद पेपर लीक माफियाओं के लिए बच निकलना लगभग असंभव हो जाएगा और दोषियों को किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाएगा। लेकिन समय बीतने के साथ तस्वीर कुछ अलग दिखाई देने लगी है।

    कानून में बेहद सख्त प्रावधान किए गए थे। इसमें दोषियों के लिए 10 साल तक की जेल, एक करोड़ रुपये तक जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे कदम शामिल किए गए थे। परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले संगठित गिरोहों, सॉल्वर गैंग और एजेंसियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था। उम्मीद थी कि इतने कड़े नियमों के बाद पेपर लीक जैसी घटनाओं में भारी कमी आएगी। लेकिन हाल ही में सामने आए नए विवादों ने इस उम्मीद पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। अब तक सामने आए कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई निचले स्तर के लोगों तक ही सीमित दिखाई दी है। छोटे कर्मचारी, परीक्षा केंद्र से जुड़े लोग या डमी उम्मीदवार गिरफ्त में आते हैं, लेकिन असली मास्टरमाइंड और बड़े नेटवर्क कानून की पकड़ से दूर नजर आते हैं। इससे अपराधियों में डर की बजाय व्यवस्था की कमजोरियों का भरोसा बढ़ता दिखाई देता है।

    एक और बड़ी चिंता जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार को लेकर सामने आ रही है। कई मामलों में अदालतों तक मामला पहुंचने और अंतिम फैसला आने में लंबा समय लग जाता है। जब सजा में देरी होती है तो कानून का प्रभाव भी कमजोर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के मन में डर पैदा करने के लिए त्वरित कार्रवाई और समयबद्ध फैसले बेहद जरूरी हैं।

    इसके अलावा कुछ कानूनी प्रावधानों पर भी सवाल उठ रहे हैं। व्यवस्था में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके जरिए कई बार तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक त्रुटियों को आधार बनाकर बड़ी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है और जांच लंबी खिंचती चली जाती है।

    लगातार सामने आ रही पेपर लीक घटनाओं ने युवाओं का भरोसा भी प्रभावित किया है। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षाओं में बैठते हैं और जब ऐसे विवाद सामने आते हैं तो केवल परीक्षा नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी टूटता है। अब छात्र केवल सख्त कानून की घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उसके असर को देखना चाहते हैं। क्योंकि जब तक बड़े नेटवर्क और असली दोषियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पेपर लीक की यह समस्या खत्म होने की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।

  • स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल

    स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा और संवेदनशील नीतिगत फैसला सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में नई बहस को जन्म दे दिया है। राज्य सरकार ने आदेश जारी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य रूप से किया जाएगा। इस निर्णय को शिक्षा और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा एक अहम कदम बताया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर इसे लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा और प्रतिक्रिया भी देखने को मिल रही है।

    सरकारी आदेश के अनुसार यह नियम केवल सामान्य सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मदरसा शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों पर लागू होगा। इसमें सरकारी मॉडल मदरसे, सहायता प्राप्त संस्थान, स्वीकृत मदरसा शिक्षा केंद्र, शिशु शिक्षा केंद्र और मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त मदरसे सभी शामिल किए गए हैं। इस आदेश के बाद पुराने सभी संबंधित नियम और पूर्व प्रथाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त मानी जाएंगी। प्रशासन का मानना है कि शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अभ्यास को लागू करने से एकरूपता और राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलेगी।

    इस फैसले के पीछे सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि जब राज्य के अन्य सभी सरकारी स्कूलों और विशेष भाषा आधारित विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन पहले से ही लागू है, तो फिर मदरसों को इससे अलग रखना उचित नहीं है। सरकार के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान देना नहीं है, बल्कि छात्रों में राष्ट्र के प्रतीकों के प्रति सम्मान और एकता की भावना विकसित करना भी है। इसी सोच के तहत इस निर्णय को लागू किया गया है।

    शिक्षा विभाग की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि यह निर्णय किसी एक वर्ग या संस्था को लक्षित नहीं करता, बल्कि इसका उद्देश्य राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में समान नियम लागू करना है। प्रशासन का मानना है कि इससे छात्रों के बीच सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को और अधिक मजबूती मिलेगी। वहीं इस फैसले के बाद शिक्षा जगत में इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इस तरह के निर्देश विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की विविध परंपराओं और व्यवस्थाओं के साथ संतुलन बना पाएंगे या नहीं।

    इससे पहले राज्य सरकार ने कुछ दिन पूर्व ही सामान्य सरकारी स्कूलों में भी यही नियम लागू किया था, जिसके बाद अब इसे मदरसों तक विस्तारित कर दिया गया है। इस विस्तार को सरकार की एक व्यापक नीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य सभी शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक अभ्यास सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

    राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस निर्णय को लेकर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और शिक्षा में समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता और परंपराओं से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। हालांकि सरकार अपने रुख पर कायम है और इस नीति को राज्य के सभी संबंधित संस्थानों में लागू करने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है। कुल मिलाकर यह निर्णय पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले समय में राज्य के शैक्षणिक और सामाजिक ढांचे पर भी पड़ सकता है।

  • तेलंगाना ने केंद्र से मांगी 5,000 करोड़ की विशेष वित्तीय सहायता, यंग इंडिया स्कूल परियोजना के लिए दी मांग

    तेलंगाना ने केंद्र से मांगी 5,000 करोड़ की विशेष वित्तीय सहायता, यंग इंडिया स्कूल परियोजना के लिए दी मांग


    नई दिल्ली।
    तेलंगाना सरकार ने केंद्र से विशेष सहायता योजना (एसएएससीआई) के तहत अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए की मांग की है, ताकि राज्य में पूंजीगत निवेश और विकास परियोजनाओं को गति दी जा सके। उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने इस संबंध में केंद्रीय वित्त मंत्री से नई दिल्ली में मुलाकात की और राज्य की आर्थिक, शैक्षणिक और मानव संसाधन विकास संबंधी जरूरतों पर विस्तार से चर्चा की। इस बैठक में वित्तीय सहायता की आवश्यकता, विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में किए जा रहे बड़े निवेशों की व्याख्या की गई।

    उपमुख्यमंत्री ने केंद्रीय वित्त मंत्री को बताया कि तेलंगाना में शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे निवेश, विशेषकर यंग इंडिया इंटीग्रेटेड रेजिडेंशियल स्कूल्स (वाईआईआईआरएस) परियोजना, राज्य की सामाजिक और शैक्षणिक संरचना में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे। इस परियोजना का कुल बजट 30,000 करोड़ रुपए है और यह लाखों बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पोषण संबंधी सुविधाएं सुनिश्चित करेगी। उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग से इस परियोजना को एफआरबीएम सीमा से छूट देने की अपील भी की, ताकि दीर्घकालिक मानव पूंजी निवेश पर वित्तीय प्रतिबंध न आए।

    विक्रमार्क ने कहा कि इस पहल से राज्य के वंचित और पिछड़े वर्गों के बच्चों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा और पौष्टिक भोजन मिलेगा, जो उन्हें सशक्त बनाएगा और राज्य की जनसांख्यिकीय क्षमता को मजबूत करेगा। प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय वित्त मंत्री को ज्ञापन सौंपकर एसएएससीआई योजना के तहत अतिरिक्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता और इसके महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। उन्होंने यह भी बताया कि तेलंगाना की आबादी में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग बहुसंख्यक हैं, और उनके सशक्तिकरण के लिए यह योजना निर्णायक साबित होगी।

    केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ हुई इस बैठक में राज्य के कृषि और मानव संसाधन विकास से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। कृषि मंत्री तुम्माला नागेश्वर राव और अन्य प्रतिनिधियों ने राज्य में कृषि, ग्रामीण विकास और शिक्षा से जुड़े बड़े निवेशों के महत्व को रेखांकित करते हुए वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन अधिनियम के तहत छूट की मांग की। उन्होंने कहा कि इस अतिरिक्त वित्तीय सहायता के बिना राज्य की दीर्घकालिक विकास योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं और मानव पूंजी में निवेश की गति धीमी पड़ सकती है।

    पिछले वर्ष भी इसी प्रकार की बैठक में मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने यंग इंडिया प्रोजेक्ट के लिए विशेष वित्तीय सहायता और एफआरबीएम छूट की मांग की थी, और अब इस मांग को दोबारा केंद्र के समक्ष रखा गया है। अधिकारियों का मानना है कि इस योजना के कार्यान्वयन से तेलंगाना के पिछड़े और वंचित वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में स्थायी लाभ मिलेगा। इसके साथ ही राज्य की आर्थिक क्षमता बढ़ेगी और दीर्घकालिक मानव संसाधन विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

    इस बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्री को यह स्पष्ट किया गया कि तेलंगाना की अधिकांश आबादी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से आती है। इस आंकड़े के अनुसार, राज्य की आबादी का 56.33 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग, 17.43 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 10.45 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। इस सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार ने एसएएससीआई योजना के तहत अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए की मांग की है, ताकि शैक्षणिक और सामाजिक सुधारों को समय पर लागू किया जा सके और राज्य में समग्र विकास को बढ़ावा दिया जा सके।