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  • इंदौर में छात्राओं की समस्याओं पर राहुल गांधी ने सरकार से मांगा जवाब, बोले- रहने की जगह नहीं मिलने से पढ़ाई छूटती है

    इंदौर में छात्राओं की समस्याओं पर राहुल गांधी ने सरकार से मांगा जवाब, बोले- रहने की जगह नहीं मिलने से पढ़ाई छूटती है

    इंदौर : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं और छात्रावासों की कमी का मुद्दा उठाते हुए सरकार से सवाल किया है। उन्होंने इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान एक छात्रा की ओर से पूछे गए सवाल का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार के पास दीये जलाने के लिए पैसा है, लेकिन छात्रों के लिए हॉस्टल बनाने के लिए क्यों नहीं है।

    राहुल गांधी ने कहा कि यह सवाल उनसे इंदौर में एक छात्रा ने पूछा था। उनके मुताबिक छात्रा गांव से उच्च शिक्षा के लिए शहर आई है, लेकिन उसे रहने के लिए हॉस्टल नहीं मिला। ऐसे में उसे पीजी में रहना पड़ रहा है। छात्रा ने रहने और सुरक्षित रहने की लागत को लेकर अपनी परेशानी सामने रखी।

    राहुल गांधी ने इसी सवाल के आधार पर छात्राओं के सामने आने वाली आवास संबंधी समस्याओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गांवों से शहरों में पढ़ाई के लिए आने वाली कई छात्राओं के सामने रहने की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बन जाती है। हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें निजी आवास या पीजी पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

    उन्होंने कहा कि युवा देश का भविष्य हैं और किसी भी देश की मजबूती में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राहुल गांधी ने छात्रों की जिज्ञासा और सवाल पूछने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक छात्रों में सबसे बड़ा गुण सवाल पूछने का होना चाहिए, क्योंकि सवालों के जरिए व्यवस्था से जवाब मांगा जा सकता है।

    राहुल गांधी ने छात्राओं की शिक्षा से जुड़े आवास और सुरक्षा के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई लड़कियां केवल इसलिए पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि उनके लिए रहने की उचित जगह उपलब्ध नहीं होती। उनके अनुसार उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर जाने वाली छात्राओं के सामने पढ़ाई के साथ सुरक्षित आवास की चिंता भी बनी रहती है।

    उन्होंने सरकार से छात्रावासों और छात्रों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को लेकर जवाब मांगा। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए छात्रा के सवाल का जवाब देने की मांग की और कहा कि सरकार को युवाओं की शिक्षा तथा उनके रहने की जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए।

    राहुल गांधी ने आवास सहायता से जुड़े मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि छात्रों के लिए मिलने वाली आवास संबंधी सहायता बढ़ती महंगाई के अनुरूप पर्याप्त नहीं है और इसके साथ अनियमितताओं की समस्या भी जुड़ी हुई है। उन्होंने इस विषय पर भी सरकार से जवाब मांगा।

    इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शिक्षा, रोजगार और छात्रों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। इसी दौरान छात्रावासों की कमी और छात्राओं की सुरक्षा का विषय भी सामने आया। राहुल गांधी ने कहा कि विद्यार्थियों की समस्याओं को सुनना और उनके सवालों पर जवाब मांगना जरूरी है।

    उन्होंने छात्राओं के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा हासिल करने के लिए शहरों में आने वाले विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिनाइयों का सामना नहीं करना चाहिए। उनके बयान में छात्रावासों की उपलब्धता को उच्च शिक्षा और छात्र सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषय के रूप में सामने रखा गया।

  • जीतू पटवारी का मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तंज, बोले- 800 दिन बचे हैं, अब सस्ती शिक्षा और छात्रों के मुद्दों पर काम करें

    जीतू पटवारी का मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तंज, बोले- 800 दिन बचे हैं, अब सस्ती शिक्षा और छात्रों के मुद्दों पर काम करें

    मध्य प्रदेश: कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर निशाना साधा। पटवारी ने मुख्यमंत्री से सस्ती और सुलभ शिक्षा सुनिश्चित करने की अपील करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल के अब करीब 800 दिन बचे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय का इस्तेमाल जनता और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए किया जाना चाहिए।

    पटवारी ने मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश के विद्यार्थियों के लिए सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को बिना समय गंवाए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में काम करना चाहिए। उनके मुताबिक सत्ता और पद पर रहने का समय तेजी से गुजरता है, इसलिए सरकार को शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए।

    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने अपने बयान में मुख्यमंत्री के राजनीतिक हालात का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के पास अब सीमित समय बचा है और उन्हें इस अवधि में जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। पटवारी ने शिक्षा को छात्रों के भविष्य से सीधे जुड़ा विषय बताते हुए सरकार से इस दिशा में ठोस काम करने की अपील की।

    इसी दौरान जीतू पटवारी ने प्रदेशभर में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान चलाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में मध्य प्रदेश के हर जिले में इस नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अभियान के जरिए छात्रों और उनके अभिभावकों को सीधे तौर पर जोड़े जाने की बात कही गई है।

    पटवारी ने कार्यक्रम की रूपरेखा बताते हुए कहा कि ‘छात्रों की गूंज’ किसी राजनीतिक दल या कांग्रेस के बैनर तले आयोजित नहीं किया जाएगा। इसमें छात्रों और उनके अभिभावकों की भागीदारी होगी। अभियान का उद्देश्य शिक्षा और छात्रों से जुड़े मुद्दों को सामने लाना तथा उनके भविष्य से संबंधित विषयों पर चर्चा करना बताया गया है।

    उन्होंने सरकार से अपील करते हुए कहा कि छात्रों से जुड़े गंभीर मुद्दों पर अब काम शुरू किया जाना चाहिए। पटवारी ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि विद्यार्थियों के हित और उनके भविष्य से जुड़े विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

    ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को प्रदेश के सभी जिलों तक ले जाने की घोषणा के साथ पटवारी ने छात्रों और अभिभावकों की सीधी भागीदारी पर जोर दिया। उनके अनुसार यह कार्यक्रम शिक्षा से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का माध्यम बनेगा और विद्यार्थियों की समस्याओं पर चर्चा की जाएगी।

    इंदौर में हुई पत्रकार वार्ता के दौरान पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने सस्ती शिक्षा का मुद्दा प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि सरकार को अपने बचे हुए कार्यकाल में शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए और छात्रों के भविष्य से जुड़े विषयों पर प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

    इस पूरे अभियान के जरिए छात्रों और अभिभावकों को शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर जोड़ने की योजना बताई गई है। पटवारी ने कहा कि सरकार को जनहित के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए और छात्रों के भविष्य से संबंधित समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।

  • महाराष्ट्र के आदिवासी स्कूलों को लेकर सीजेपी का नया अभियान, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़ने की अपील

    महाराष्ट्र के आदिवासी स्कूलों को लेकर सीजेपी का नया अभियान, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़ने की अपील

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में आदिवासी बच्चों की शिक्षा और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सीजेपी ने नया अभियान शुरू करने की घोषणा की है। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों और आदिवासी स्कूलों की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू करने की बात कही है। उन्होंने इस अभियान से स्वयंसेवकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के जुड़ने की अपील की है।

    अभिजीत दीपके ने सरकारी आदिवासी स्कूलों की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन स्कूलों में आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं, वहां पढ़ाई के लिए जरूरी व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आदिवासी बच्चों को अच्छी और सम्मानजनक शिक्षा मिल सके।

    दीपके ने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों यानी EMRS की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए बनाए गए इन स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और व्यवस्थाओं की स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

    उन्होंने स्वयंसेवकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान से जुड़ें। उनके अनुसार अभियान के जरिए यह सुनिश्चित करने में मदद की जानी चाहिए कि आदिवासी बच्चों को उनके अधिकार के अनुरूप अच्छी शिक्षा और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण मिल सके।

    दीपके ने महाराष्ट्र के आश्रम स्कूलों में बच्चों की मौत का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो वर्षों में इन स्कूलों में 590 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। उन्होंने इन घटनाओं के पीछे स्कूलों में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता, सांप के काटने की घटनाओं और बच्चों के लिए पर्याप्त बिस्तरों की उपलब्धता नहीं होने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया।

    उन्होंने कहा कि बिस्तरों की कमी के कारण बच्चों को जमीन पर सोना पड़ता है और ऐसी परिस्थितियों में सांप के काटने की घटनाएं सामने आती हैं। उन्होंने इसे सरकार की ओर से मेडिकल लापरवाही का मामला बताया।

    सीजेपी का कहना है कि आदिवासी समुदाय का संसाधनों पर पहला हक है और शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। संगठन के अनुसार आदिवासी बच्चों को बेहतर से बेहतर शिक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि उन्हें अपने अधिकार के अनुरूप शैक्षणिक अवसर मिल सकें।

    दीपके ने आदिवासी स्कूलों से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुल 720 स्कूलों को मंजूरी मिली है, लेकिन इनमें से केवल 477 स्कूल ही संचालित हो रहे हैं। उनके अनुसार सिर्फ 341 स्कूलों के पास अपनी पक्की इमारतें हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि इन स्कूलों में 28 हजार से अधिक पद खाली पड़े हैं।

    उन्होंने सवाल उठाया कि जब इन स्कूलों का उद्देश्य आदिवासी बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराना था, तो बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी स्कूलों, शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं का इंतजार क्यों कर रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर सीजेपी ने अभियान के माध्यम से संबंधित व्यवस्थाओं पर ध्यान देने और लोगों की भागीदारी बढ़ाने की अपील की है।

    अभियान के तहत संगठन ने आदिवासी बच्चों की शिक्षा से जुड़े मुद्दों को उठाने और स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए स्वयंसेवकों, शिक्षाविदों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को साथ आने का आह्वान किया है। संगठन ने कहा है कि आदिवासी बच्चों को अच्छी और सम्मानजनक शिक्षा मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

  • शिक्षक दिवस पर सीएम मोहन यादव की बड़ी घोषणा, मध्यप्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा अब ऑफलाइन मोड में आयोजित होगी

    शिक्षक दिवस पर सीएम मोहन यादव की बड़ी घोषणा, मध्यप्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा अब ऑफलाइन मोड में आयोजित होगी

    मध्यप्रदेश: शिक्षक दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश के शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी को ऑफलाइन मोड में आयोजित करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षकों के हित में जरूरी निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध है और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर लगातार काम किया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने यह घोषणा भोपाल स्थित आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी में आयोजित राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह में की। समारोह का शुभारंभ राज्यपाल मंगुभाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कार्यक्रम से पहले एनसीसी कैडेट्स ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया।

    समारोह में प्रदेश के 33 उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षक केवल कक्षाओं में विद्यार्थियों को पढ़ाने का काम नहीं करते, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को आकार देते हैं। उनके अनुसार देश का नक्शा कागज पर तैयार होता है, लेकिन देश की किस्मत कक्षाओं में बनती है।

    डॉ. यादव ने कहा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन और गौरवशाली रही है। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे शिक्षा केंद्रों ने दुनिया के विद्यार्थियों को ज्ञान दिया। उन्होंने मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक और शैक्षणिक परंपरा का उल्लेख करते हुए उज्जैन के सांदीपनि आश्रम का भी जिक्र किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार शिक्षकों की मेहनत और योगदान का सम्मान करती है। उन्होंने दावा किया कि बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में मेरिट सूची में बड़ी संख्या सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की होती है। इसके पीछे शिक्षकों का मार्गदर्शन, परिश्रम और विद्यार्थियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि मध्यप्रदेश के शासकीय स्कूल गुणवत्ता के मामले में निजी स्कूलों से बेहतर बनें। शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक सुधारों पर काम किया जा रहा है। इसी क्रम में शिक्षक पात्रता परीक्षा को ऑफलाइन कराने का निर्णय शिक्षकों और अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने शिक्षक सम्मान समारोह में प्रदेश के सभी शिक्षकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि शिक्षक ज्ञान के साथ संस्कार देकर बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षा को बदलती वैश्विक जरूरतों और रोजगार के अवसरों के अनुरूप लगातार विकसित करने की आवश्यकता है।

    राज्यपाल ने शिक्षकों से विद्यार्थियों की प्रतिभा पहचानने और उनकी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने में सहयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने बच्चों में सहनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करने पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

    स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि प्रदेश का प्रत्येक शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की अहम कड़ी है। उन्होंने शिक्षकों के समर्पण और ग्रामीण तथा चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में उनके योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षकों से जुड़ी कानूनी और प्रशासनिक बाधाओं को दूर करने के लिए प्रयास कर रही है।

    समारोह में सम्मानित शिक्षकों में शिवलाल दांगी, धन्नालाल बिसेन, रितेश कुमार पथाड़े, सुखनंदन साहू, नरेंद्र कुमार भारद्वाज, शिखा शर्मा, ज्योति पाठक, सीमा परमार, पूनम मिश्रा, मनीष तिवारी, अजय कुमार मिश्रा, पूजा पांडे और अन्य चयनित शिक्षक शामिल रहे। शिक्षक दिवस पर टीईटी को ऑफलाइन कराने की घोषणा और उत्कृष्ट शिक्षकों का सम्मान प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार के रुख को सामने लाता है।

  • अखिलेश यादव की पार्टी 5 से 11 सितंबर तक चलाएगी पीडीए जागरुकता अभियान, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे होंगे केंद्र में

    अखिलेश यादव की पार्टी 5 से 11 सितंबर तक चलाएगी पीडीए जागरुकता अभियान, शिक्षा और रोजगार के मुद्दे होंगे केंद्र में


    नई दिल्ली । 
    उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी ने छात्र और युवा वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने की दिशा में अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। शिक्षक दिवस के मौके पर पार्टी की छात्र सभा की ओर से 5 से 11 सितंबर तक छात्र, नौजवान एवं पीडीए जागरुकता अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान का नाम पाठशाला पुकारे रखा गया है।

    समाजवादी पार्टी के अनुसार, अभियान के दौरान प्रदेश में बंद किए गए प्राथमिक, जूनियर और हाईस्कूलों के बाहर शिक्षक सम्मान कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी का कहना है कि इन कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाया जाएगा और स्थानीय लोगों को भी संवाद का हिस्सा बनाया जाएगा।

    अभियान के तहत विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र सम्मेलन तथा शिक्षक सम्मान समारोह भी आयोजित किए जाने हैं। बंद स्कूलों के परिसर के बाहर उपलब्ध स्थानों पर शिक्षक दिवस से जुड़े कार्यक्रम किए जाएंगे। इनमें स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ ग्रामीणों की भागीदारी भी प्रस्तावित है।

    सपा छात्र सभा के कार्यक्रम को अलग अलग चरणों में आयोजित करने की योजना बनाई गई है। 7 सितंबर को पीडीए वृक्षारोपण और पर्चा वितरण का कार्यक्रम होगा। इसके बाद 8 सितंबर को विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिविर लगाकर छात्रों से संपर्क किया जाएगा।

    9 सितंबर को छात्रों से सुझाव लिए जाएंगे और उनकी समस्याओं को सुना जाएगा। इस दौरान उनसे संकल्प पत्र भी भरवाए जाने की योजना है। पार्टी का उद्देश्य छात्रों से सीधे संवाद स्थापित करके शिक्षा, रोजगार और अन्य संबंधित विषयों पर उनकी प्राथमिकताओं को समझना बताया गया है।

    10 सितंबर को छात्र छात्राओं और युवाओं की राजनीति में भूमिका को लेकर चर्चा की जाएगी। इसके बाद 11 सितंबर को मेधावी छात्रों और टॉपर्स के सम्मान के साथ अभियान का समापन किया जाएगा। पार्टी ने इस कार्यक्रम को छात्र और युवा वर्ग से जुड़ने के अपने प्रयास के तौर पर सामने रखा है।

    अभियान में शिक्षा और युवाओं से जुड़े कई मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। इनमें पेपर लीक, समान पाठ्यक्रम, बढ़ती फीस, रोजगार, आरक्षण और उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियों में कथित भ्रष्टाचार जैसे विषय शामिल हैं। पार्टी आरक्षण व्यवस्था में पारदर्शिता और रोस्टर प्रणाली को लेकर भी सवाल उठाने की तैयारी में है।

    इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, छात्रों को डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराने, पुस्तकालयों की व्यवस्था मजबूत करने तथा नए विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के निर्माण जैसे मुद्दों को भी अभियान में शामिल किया गया है। सपा का कहना है कि इन विषयों के माध्यम से छात्रों और युवाओं की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता दी जाएगी।

    यह अभियान ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी गतिविधियां तेज कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के लिए छात्र और युवा वर्ग महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार माना जाता है। ऐसे में शिक्षा, रोजगार और आरक्षण जैसे मुद्दों के जरिए पार्टी इस वर्ग के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

    पाठशाला पुकारे अभियान के माध्यम से बंद सरकारी स्कूलों और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा भी राजनीतिक बहस में लाने की तैयारी है। अभियान के दौरान सामने आने वाली छात्र समस्याओं और सुझावों को पार्टी किस तरह अपने आगामी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल करती है, इस पर भी नजर रहेगी।

  • टाटा संस के पूर्व चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को मोदी कैबिनेट में जगह मिलने की अटकलों से दिल्ली में सियासी चर्चा तेज हुई

    टाटा संस के पूर्व चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को मोदी कैबिनेट में जगह मिलने की अटकलों से दिल्ली में सियासी चर्चा तेज हुई

    नई दिल्ली । टाटा संस के चेयरमैन पद से हाल ही में इस्तीफा देने वाले एन चंद्रशेखरन का नाम अब केंद्र सरकार में संभावित मंत्री पद को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में सामने आ रहा है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह अटकल तेज है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में संभावित फेरबदल के दौरान चंद्रशेखरन को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं हुई है।

    राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार चंद्रशेखरन को कॉर्पोरेट मामलों या शिक्षा जैसे किसी मंत्रालय की जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना पर बात हो रही है। कुछ नेताओं का कहना है कि उन्होंने इस तरह की चर्चा सुनी है। ऐसे में फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक नियुक्ति से जुड़ी अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    चंद्रशेखरन ने हाल में टाटा संस के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं लेने की इच्छा जताई थी। बताया गया कि उन्होंने 12 अगस्त को इस्तीफा दिया था और उनका वर्तमान कार्यकाल 20 फरवरी को समाप्त होना था। उनके इस्तीफे के पीछे टाटा ट्रस्ट बोर्ड के सदस्यों के साथ मतभेदों की चर्चा भी सामने आई है।

    चंद्रशेखरन की उम्र 63 वर्ष है। राजनीतिक नियुक्तियों के संदर्भ में यह उम्र अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी में वरिष्ठ पदों के लिए 75 वर्ष की आयु सीमा का नियम चर्चा में रहा है, हालांकि अलग-अलग परिस्थितियों में इसके अपवाद भी देखे गए हैं। इसी वजह से उनकी उम्र को संभावित जिम्मेदारी के रास्ते में बड़ी बाधा के रूप में नहीं देखा जा रहा है।

    शिक्षा मंत्रालय को लेकर चंद्रशेखरन का नाम सामने आने की चर्चा ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी कई नेताओं के पास रही है। स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल और धर्मेंद्र प्रधान इस पद पर रह चुके हैं। अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों में इन सभी को बाद में पद से हटना पड़ा।

    शिक्षा क्षेत्र में हालिया घटनाक्रमों ने भी संभावित बदलाव को लेकर चर्चाओं को बढ़ाया है। परीक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। परीक्षा सुधारों के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति की जिम्मेदारी इंफोसिस के पूर्व सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि को दिए जाने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकार शिक्षा व्यवस्था में विशेषज्ञता रखने वाले गैर-राजनीतिक व्यक्तियों को अधिक भूमिका देने पर विचार कर रही है।

    इसी संदर्भ में चंद्रशेखरन की संभावित नियुक्ति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उद्योग और प्रबंधन क्षेत्र में लंबे अनुभव के कारण उन्हें प्रशासनिक और आर्थिक मामलों की समझ रखने वाला व्यक्ति माना जाता है। यदि सरकार उन्हें कोई जिम्मेदारी देती है तो यह पारंपरिक राजनीतिक नियुक्तियों से अलग एक महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकता है।

    फिलहाल शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी अंतरिम रूप से प्रह्लाद जोशी के पास है। यह व्यवस्था उस समय बनी थी जब NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले के बाद शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सवाल उठे और धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। ऐसे में अब निगाहें संभावित कैबिनेट फेरबदल और शिक्षा मंत्रालय के लिए सरकार के अगले फैसले पर टिकी हैं। चंद्रशेखरन के नाम पर चल रही चर्चाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि उनकी नियुक्ति को लेकर अभी कोई आधिकारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।

  • राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के लिए एनसीईआरटी समिति का पुनर्गठन, नवंबर तक आएगी 11वीं कक्षा की नई किताब

    राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के लिए एनसीईआरटी समिति का पुनर्गठन, नवंबर तक आएगी 11वीं कक्षा की नई किताब

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने स्कूली शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और प्रासंगिक बनाने के उद्देश्य से बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने कक्षा 11वीं और 12वीं की राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने के लिए 20 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम का पुनर्गठन किया है। इस नई समिति में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, स्कूल शिक्षकों और विषय विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

    पुनर्गठित समिति में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, इग्नू, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल, पांडिचेरी यूनिवर्सिटी और उत्कल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शिक्षाविद शामिल हैं। इस 20 सदस्यीय टीम की संरचना में विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले विशेषज्ञों का समावेश किया गया है, ताकि अध्ययन सामग्री को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप संतुलित और समृद्ध बनाया जा सके।

    पाठ्यपुस्तक विकास दल की कमान प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद संदीप शास्त्री को सौंपी गई है। समिति को दोनों कक्षाओं की पुस्तकों के निर्माण के लिए स्पष्ट समयसीमा प्रदान की गई है। इसके तहत कक्षा 11वीं की राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को 30 नवंबर 2026 तक अंतिम रूप दिए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि कक्षा 12वीं की नई पुस्तक 30 जुलाई 2027 तक तैयार की जाएगी।

    एनसीईआरटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 के तहत संचालित की जाएगी। समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह सामाजिक विज्ञान, भारतीय ज्ञान प्रणाली, पर्यावरण शिक्षा और आधुनिक शिक्षाशास्त्र से जुड़े विभिन्न समूहों के मार्गदर्शन में कार्य करे। तैयार की जाने वाली सामग्री को अंतिम स्वीकृति देने, प्रकाशित करने और वितरित करने का दायित्व परिषद के पास ही रहेगा।

    शैक्षणिक सुधारों की इस श्रृंखला के तहत मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्कूलों में नए सत्र के अनुसार पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। नई पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा के दौरान समावेशन, सांस्कृतिक जुड़ाव, आधुनिक मूल्यांकन पद्धतियों और भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है।

    अकादमिक जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि विषय विशेषज्ञों के व्यापक अनुभव से तैयार होने वाली ये नई किताबें विद्यार्थियों को राजनीतिक सिद्धांतों और भारतीय शासन व्यवस्था की गहरी समझ प्रदान करेंगी। एनसीईआरटी का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थियों को अद्यतन जानकारी के साथ गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना है।

  • सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    नई दिल्ली । देश में सरकारी शिक्षा प्रणाली की स्थिति और उसमें आवश्यक सुधारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक बयान जारी कर मांग की है कि शिक्षा विभाग से जुड़े सभी मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्राचार्यों और शिक्षकों को अपने बच्चों का दाखिला अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही कराना चाहिए। उनका मानना है कि यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने बच्चों को इन संस्थानों में भेजेंगे, तो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में बहुत जल्द सकारात्मक और व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा।

    अभिजीत दीपके ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक सरकारी नीतियों को लागू करने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वयं इन सेवाओं का उपयोग नहीं करेंगे, तब तक वास्तविक सुधार संभव नहीं है। उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों अधिकारी और मंत्री अपने बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाना पसंद करते हैं। क्या उन्हें अपने ही विभाग और सरकारी नीतियों की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं है। उनका यह बयान देश भर में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों के संदर्भ में आया है।

    इस विचार को धरातल पर उतारने और व्यवस्था की कमियों को उजागर करने के उद्देश्य से उन्होंने महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित अपने पैतृक गांव संतुक पिंपरी का दौरा किया था। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला परिषद द्वारा संचालित स्थानीय स्कूल में पहुंचे दीपके ने वहां की बुनियादी सुविधाओं का जायजा लिया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि कक्षाओं में खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे, सीसीटीवी कैमरे निष्क्रिय थे और स्वच्छता से जुड़ी कई मूलभूत सुविधाएं बदहाल स्थिति में थीं।

    उनके द्वारा उजागर की गई कमियों के बाद स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत तुरंत हरकत में आई। संतुक पिंपरी के स्थानीय सरपंच विजय पुरी ने जानकारी दी है कि अभिजीत दीपके द्वारा चिन्हित की गई सभी समस्याओं को दूर करने का कार्य प्राथमिकता के आधार पर शुरू कर दिया गया है। स्कूल में क्षतिग्रस्त खिड़कियों और उनके फ्रेम को बदला जा रहा है, नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, तथा शौचालयों में पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।

    शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए स्कूल प्रबंधन को मरम्मत कार्य जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश जारी किए हैं। इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय स्तर पर स्कूल की ढांचागत स्थिति में तेजी से सुधार देखने को मिल रहा है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं को लेकर समय-समय पर इस तरह की मांगें उठती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग को अनिवार्य या प्रोत्साहित किया जाए, तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ती है। अभिजीत दीपके की इस पहल और उनके सुझाव ने एक बार फिर शिक्षा के अधिकार और सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के स्तर को ऊंचा उठाने की दिशा में गंभीर मंथन शुरू कर दिया है।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल, छात्रों के आंदोलन का समर्थन कर सरकारों से सुधार की मांग की

    राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल, छात्रों के आंदोलन का समर्थन कर सरकारों से सुधार की मांग की

    नई दिल्ली । कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत का शिक्षा तंत्र पूरी तरह से कमजोर हो चुका है और छात्रों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि देशभर में छात्रों के बीच उठ रही आवाज मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ है और सरकारों को उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना चाहिए।

    राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से Gen-Z और छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि शिक्षा अब काफी महंगी हो गई है, जिसके कारण बड़ी संख्या में छात्रों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। उनके अनुसार, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और प्रभावी कदमों की जरूरत है।

    उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों की समस्याओं को समझे और उनकी मांगों पर ध्यान दे। राहुल गांधी ने कहा कि चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, छात्रों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया।

    राहुल गांधी ने यह भी कहा कि उन्होंने पहले देहरादून और कोटा जैसे स्थानों पर छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाए हैं और अब प्रयागराज में भी इसी विषय को लेकर बात करेंगे। उनके मुताबिक, देश के युवा भविष्य की दिशा तय करते हैं, इसलिए उनकी समस्याओं को समझना और समाधान निकालना जरूरी है।

    राहुल गांधी के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उन पर निशाना साधा है। भाजपा ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी युवाओं और छात्रों के मुद्दों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष के नेता युवाओं के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं और एक अलग राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना चाहते हैं।

    भाजपा की ओर से कहा गया कि छात्रों से जुड़े मामलों पर सरकार लगातार काम कर रही है और शिक्षा क्षेत्र में कई सुधार किए जा रहे हैं। पार्टी ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि युवाओं के मुद्दों को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।

    यह विवाद उस समय सामने आया है जब देश के कई हिस्सों में छात्र परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं। छात्रों की ओर से परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, रोजगार के अवसर और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है।

    राहुल गांधी ने इससे पहले भी छात्र आंदोलनों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामलों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने छात्रों के साथ संवाद को जरूरी बताते हुए कहा है कि युवाओं की समस्याओं को समझे बिना शिक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता।

    वहीं, भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां कांग्रेस शिक्षा व्यवस्था की कमियों और छात्रों की परेशानियों को प्रमुख मुद्दा बता रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। आने वाले दिनों में शिक्षा और छात्र मुद्दे उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं।