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  • INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल

    INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल


    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में होगी। बैठक में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR, चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल संसद में प्रस्ताव लाने और इन मुद्दों पर संयुक्त रूप से आगे की रणनीति तैयार करने पर भी विचार कर सकते हैं। करीब साढ़े तीन महीने बाद होने वाली इस बैठक में चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच समन्वय को लेकर भी चर्चा हो सकती है।

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बैठक में शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह पार्टी का एक अन्य नेता प्रतिनिधित्व करेगा। वहीं, शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में जुड़ेंगे। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत के मुताबिक, पार्टी 2 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन की तैयारियों में व्यस्त है। पार्टी ने संबंधित प्रदर्शन को समर्थन देने की बात भी कही है। ऐसे में बैठक में उद्धव ठाकरे की भागीदारी ऑनलाइन होगी, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से अखिलेश यादव के स्थान पर दूसरा नेता मौजूद रहेगा।

    बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के शामिल होने की संभावना है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, सांसद अभिषेक बनर्जी, राजद नेता तेजस्वी यादव, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और CPI(M) महासचिव एमए बेबी के भी पहुंचने की उम्मीद है। एमए बेबी ने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात के बाद बताया था कि कांग्रेस बैठक के लिए विपक्षी दलों के बीच समन्वय कर रही है। उनके मुताबिक, केजरीवाल ने चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान की जरूरत पर जोर दिया और इस मुद्दे पर अपनी पार्टी में चर्चा करने की बात कही।

    I.N.D.I.A. ब्लॉक की पिछली बैठक 8 जून को हुई थी, जिसमें 23 विपक्षी दल शामिल हुए थे। उस बैठक में SIR और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी। हालांकि, आम आदमी पार्टी और DMK उस बैठक में शामिल नहीं हुई थीं। इसके बावजूद 28 जून को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भेजे गए विपक्षी दलों के संयुक्त पत्र पर AAP और DMK ने भी हस्ताक्षर किए थे। पत्र में चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे। पिछली बैठक के बाद अब विपक्षी दल एक बार फिर इन विषयों पर साथ बैठने जा रहे हैं।

    30 सितंबर की बैठक में विपक्षी दलों के बीच समन्वय, SIR के खिलाफ संभावित संयुक्त कार्रवाई और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर आगे की दिशा तय करने पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग और संसद में प्रस्ताव लाने से जुड़े विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। बैठक में अलग-अलग विपक्षी दलों के रुख और आगे की संयुक्त रणनीति को लेकर चर्चा होने की उम्मीद है।

  • मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मंगलवार को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। दिल्ली के इंदिरा भवन में हुई बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को लेकर चर्चा की गई। खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मोदी सरकार की कठपुतली बन गए हैं और मतदाता सूची से नाम हटाकर लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया।

    खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने देश के पूर्वजों द्वारा बनाई गई मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में उन्होंने कहा कि पूरा देश अब जानता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का उद्देश्य भाजपा को लाभ पहुंचाना है। खड़गे ने ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जिनके दबाव में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर ऐसा किया, प्रधानमंत्री मोदी को भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी की चिंताओं को बैठक में रखा।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर भी अपनी मांग सामने रखी। उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने और अपील करने का अवसर भी मिलना चाहिए। खड़गे ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा और फैसलों में पारदर्शिता की मांग की। उनका कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव से जुड़े निर्णयों के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता बनी रहे।

    खड़गे ने कहा कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी एक बार फिर कांग्रेस के कंधों पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों के दौरान देश की मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर चर्चा की गई।

    मंगलवार की बैठक में खड़गे के बयानों के केंद्र में चुनाव आयोग की भूमिका, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनावी फैसलों में पारदर्शिता के मुद्दे रहे। खड़गे ने अपने आरोपों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई और प्रधानमंत्री मोदी से भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करेगा। मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले में जल्द सुनवाई की मांग रखी, जिसके बाद अदालत ने याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्थान से जुड़े फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए जा सकते हैं।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ फैसले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना लिए गए। इसमें कहा गया है कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के तहत सामूहिक रूप से फैसले लेने की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। याचिका में चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने समेत कई मांगें भी की गई हैं।

    मामले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि SIR से जुड़े फैसले पूरे आयोग की सहमति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं। याचिका में दावा किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मामलों में आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है और इसी आधार पर याचिका में आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के अधिकार तथा प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।

    याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी मांगों के साथ यह भी कहा गया है कि आयोग में निहित सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों में सभी सदस्यों की भूमिका और सहमति किस तरह रही। इस मामले का एक प्रमुख हिस्सा SIR से जुड़े निर्णय हैं, जिनको लेकर याचिका में यह जानने की मांग की गई है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए गए थे या नहीं।

    वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रशासनिक मुद्दों से जुड़े थे और उनका SIR या आयोग के नीतिगत फैसलों से संबंध नहीं था। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर उठाए गए सवालों पर सुनवाई होगी। अदालत अगले सप्ताह इस मामले में याचिका में की गई मांगों और उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी।

  • SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला दिल्ली और महाराष्ट्र में बढ़ी डेडलाइन नोटिस वाले वोटरों को घर बैठे मिलेगी मदद

    SIR पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला दिल्ली और महाराष्ट्र में बढ़ी डेडलाइन नोटिस वाले वोटरों को घर बैठे मिलेगी मदद


    नई दिल्ली । चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर दिल्ली और महाराष्ट्र के मतदाताओं को राहत दी है। आयोग ने दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने के साथ नोटिस पाने वाले मतदाताओं के लिए प्रक्रिया को भी आसान बनाने का फैसला किया है। अब ऐसे कई मामलों में मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए चुनाव कार्यालय जाने की जरूरत नहीं होगी। बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO मतदाताओं के घर जाकर जरूरी दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ECINET सिस्टम पर अपलोड करने में मदद करेंगे। इसके बाद संबंधित निर्वाचन अधिकारी उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मामले पर फैसला करेगा।

    दिल्ली में SIR के तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख अब 30 अक्टूबर 2026 कर दी गई है। वहीं नोटिस दावे और आपत्तियों के निपटारे की समयसीमा 30 नवंबर 2026 तक बढ़ाई गई है। आयोग के इस फैसले से उन मतदाताओं को अतिरिक्त समय मिलेगा जिन्हें मतदाता सूची में किसी तरह की विसंगति को लेकर नोटिस मिला है या जो निर्धारित अवधि में अपनी आपत्ति दर्ज नहीं करा सके थे।

    महाराष्ट्र के मतदाताओं के लिए भी समयसीमा बढ़ाई गई है। यहां दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 12 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है। वहीं इन मामलों के निपटारे की प्रक्रिया 10 नवंबर 2026 तक चल सकती है। महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर 2026 को प्रकाशित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

    आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि नोटिस पाने वाले मतदाताओं को सामान्य मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी। केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ सकता है। इसका उद्देश्य SIR प्रक्रिया में दस्तावेज जमा करने और सुनवाई से जुड़ी परेशानी को कम करना है।

    BLO की भूमिका इस प्रक्रिया में अहम होगी। जिन मतदाताओं से दस्तावेज मांगे गए हैं उनके घर जाकर अधिकारी जरूरी कागजात प्राप्त करेंगे और उन्हें ECINET पर अपलोड करेंगे। इससे खास तौर पर बुजुर्गों दिव्यांगों मजदूरों और ऐसे लोगों को सुविधा मिल सकती है जिनके लिए चुनाव कार्यालय या निर्धारित केंद्र तक पहुंचना मुश्किल होता है। चुनाव आयोग ने बेघर लोगों मजदूरों और रैन बसेरों में रहने वाले लोगों के लिए विशेष हेल्प डेस्क और कैंप लगाने के निर्देश भी दिए हैं।

    SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम और विवरण की जांच करना महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग की वोटर सर्विसेज सुविधा के जरिए मतदाता अपनी जानकारी और संबंधित सेवाओं को ऑनलाइन देख सकते हैं।

    इस पूरे बदलाव का मकसद यह है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले और दस्तावेज जमा करने या सुनवाई के लिए अनावश्यक भागदौड़ न करनी पड़े। दिल्ली और महाराष्ट्र के मतदाताओं को अब अपनी संबंधित नई समयसीमा का ध्यान रखते हुए दावे या आपत्तियां दर्ज करनी होंगी।

  • SIR विवाद के बीच EC की तस्वीर ने खींचा सबका ध्यान बैठक से ज्यादा पानी की बोतल के दाम की चर्चा

    SIR विवाद के बीच EC की तस्वीर ने खींचा सबका ध्यान बैठक से ज्यादा पानी की बोतल के दाम की चर्चा


    नई दिल्ली । वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग लगातार चर्चा में है। इसी बीच तीनों चुनाव आयुक्तों की एक बैठक की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद चर्चा का एक अलग विषय सामने आ गया। तस्वीर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी नजर आ रहे हैं। बैठक की तस्वीर में टेबल पर रखी पानी की बोतलों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इन बोतलों को लेकर सोशल मीडिया पर कीमत की चर्चा शुरू हो गई।

    तस्वीर में दिखाई दे रही बोतलें सामान्य प्लास्टिक की बोतलों से अलग नजर आती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये 250 मिलीलीटर की कांच की बोतलें हैं और इन पर आवा ब्रांड का नाम दिखाई देता है। उपलब्ध ऑनलाइन कीमत के अनुसार 8 बोतलों के पैक की कीमत 999 रुपये बताई गई है। इस हिसाब से एक बोतल की कीमत करीब 125 रुपये बैठती है। 250 मिलीलीटर की एक बोतल के आधार पर गणना करें तो एक लीटर पानी की कीमत लगभग 500 रुपये निकलती है। इसी गणित को लेकर सोशल मीडिया पर तस्वीर की खूब चर्चा होने लगी।

    हालांकि केवल किसी बैठक की तस्वीर में कोई उत्पाद दिखाई देने से यह साबित नहीं होता कि चुनाव आयोग ने वह उत्पाद इसी कीमत पर खरीदा था। यह भी स्पष्ट नहीं है कि तस्वीर में नजर आ रही बोतलें किस माध्यम से बैठक में उपलब्ध कराई गई थीं। इसलिए सोशल मीडिया पर चल रही कीमत की चर्चा को उपलब्ध ऑनलाइन लिस्टिंग के आधार पर देखा जाना चाहिए न कि आयोग की वास्तविक खरीद कीमत के रूप में।

    इससे पहले भी चुनाव आयोग के कार्यालय से जुड़ी तस्वीरों में आवा ब्रांड की पानी की बोतलों को लेकर ऑनलाइन चर्चा सामने आ चुकी है। अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट में भी 250 मिलीलीटर की इन बोतलों और उनकी कीमत को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा का उल्लेख किया गया था। उस रिपोर्ट में कंपनी की वेबसाइट पर 8 बोतलों की नियमित कीमत 1600 रुपये और छूट के बाद 999 रुपये होने की जानकारी दी गई थी।

    आवा एक भारतीय मिनरल वॉटर ब्रांड है। कंपनी अपने पानी को प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त मिनरल वॉटर के रूप में पेश करती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ब्रांड का पानी अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक स्रोत से जुड़े होने का दावा किया जाता है। कंपनी अपने उत्पाद में कैल्शियम मैग्नीशियम सोडियम और पोटेशियम जैसे खनिजों की मौजूदगी का भी उल्लेख करती है।

    वायरल तस्वीर में पानी की बोतलों की चर्चा ऐसे समय हुई है जब SIR को लेकर चुनाव आयोग पहले से ही सार्वजनिक बहस के केंद्र में है। बैठक के बाद आयोग की ओर से आधिकारिक जानकारी भी साझा की गई थी। लेकिन सोशल मीडिया पर तस्वीर के सामने आने के बाद बैठक के फैसलों के साथ टेबल पर रखी बोतलों की कीमत भी चर्चा का विषय बन गई।

    इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 500 रुपये प्रति लीटर का आंकड़ा 250 मिलीलीटर की बोतल और 8 बोतलों के 999 रुपये वाले उपलब्ध पैक की गणना से निकलता है। इसे चुनाव आयोग द्वारा भुगतान की गई वास्तविक कीमत मानना उचित नहीं होगा। तस्वीर ने फिलहाल पानी की कीमत को लेकर सोशल मीडिया पर एक नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है।

  • ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ी कॉकरोच जनता पार्टी, शनिवार की डेडलाइन के बाद तय होगा आंदोलन का अगला कदम

    ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ी कॉकरोच जनता पार्टी, शनिवार की डेडलाइन के बाद तय होगा आंदोलन का अगला कदम


    नई दिल्ली। SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर उठ रहे सवालों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने एक बार फिर अपना अल्टिमेटम दोहरा दिया है। पार्टी ने कहा है कि अगर शनिवार तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं तो 2 अक्टूबर से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। पार्टी की ओर से यह चेतावनी ऐसे समय में दी गई है जब चुनाव आयोग के भीतर ही मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की खबर सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

    कॉकरोच जनता पार्टी लंबे समय से SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है। पार्टी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रारूप मतदाता सूचियों से बाहर किए गए हैं। संगठन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के तत्काल इस्तीफे की मांग के साथ SIR से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र जांच कराने की भी मांग रखी है। पार्टी के मुताबिक अगर शनिवार तक उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन से आंदोलन को देशव्यापी स्तर पर शुरू किया जाएगा।

    पार्टी ने सोशल मीडिया पर जंतर मंतर पर जुट रहे युवाओं का वीडियो साझा करते हुए अपने समर्थकों से आंदोलन की तैयारी करने को कहा है। इससे पहले संगठन ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टिमेटम दिया था लेकिन बाद में आंदोलन की तारीख बदलकर 2 अक्टूबर कर दी गई। पार्टी के संयोजक अभिजीत दीपके और सह संयोजक सौरव दास तथा आशुतोष रांका ने इलेक्शन कमीशन ठीक करो अभियान के तहत अपनी मांगें सामने रखी हैं।

    पार्टी का दावा है कि SIR प्रक्रिया के कारण 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक वैध नाम बाहर हो गए हैं। संगठन ने चुनाव आयोग से मांग की है कि वह यह स्पष्ट करे कि मतदाता सूची से हटाए गए प्रत्येक नाम के संबंध में कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किया गया है या नहीं। साथ ही पार्टी ने नाम हटाने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और सत्यापन पूरा होने तक जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने की मांग की है।

    कॉकरोच जनता पार्टी ने यह भी मांग रखी है कि SIR से संबंधित सभी रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट या किसी स्वतंत्र न्यायिक समिति को सौंपे जाएं ताकि पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा हो सके। इसके अलावा पार्टी मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को निरस्त कर अधिक पारदर्शी नियुक्ति व्यवस्था बनाने की मांग कर रही है।

    इसी बीच चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी कहा कि यदि चुनाव आयोग पर आरोप लगाए जा रहे हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त को सामने आकर अपना पक्ष रखना चाहिए। कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को लेकर कई शहरों में प्रदर्शन किया है। ऐसे में शनिवार की समयसीमा और 2 अक्टूबर को प्रस्तावित आंदोलन के कारण SIR विवाद आने वाले दिनों में और चर्चा में रह सकता है।

  • अखिलेश यादव का चुनाव आयोग पर हमला, बोले- यूपी चुनाव 2027 ज्ञानेश कुमार की देखरेख में न हों

    अखिलेश यादव का चुनाव आयोग पर हमला, बोले- यूपी चुनाव 2027 ज्ञानेश कुमार की देखरेख में न हों


    लखनऊ। चुनाव आयोग में कथित तौर पर सामने आई अंदरूनी असहमति की रिपोर्ट के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की देखरेख में नहीं कराए जाएं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग का मौजूदा रवैया लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    दरअसल, द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

    अखिलेश बोले- यूपी चुनाव की निगरानी पर उठ रहे सवाल
    अखिलेश यादव ने कहा कि जब आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं तो आगामी यूपी विधानसभा चुनाव की निगरानी को लेकर भी सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि 2027 का विधानसभा चुनाव ऐसे माहौल में नहीं होना चाहिए, जहां चुनाव आयोग की भूमिका पर ही राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हों।

    उन्होंने 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव का भी जिक्र किया। अखिलेश का आरोप है कि जिन इलाकों में समाजवादी पार्टी के समर्थक मतदाता थे, वहां वोटर लिस्ट से नाम हटाए गए। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस संबंध में एफिडेविट के साथ शिकायत भी की थी, लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

    उपचुनावों को लेकर भी लगाए आरोप
    सपा अध्यक्ष ने यूपी में हुए उपचुनावों का जिक्र करते हुए भी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि इन चुनावों के दौरान भी उनकी पार्टी ने अनियमितताओं की शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

    अखिलेश ने दावा किया कि कुछ लोगों के हस्ताक्षर तक बनाए गए और उनके आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे गए। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी गंभीर शिकायतों के बावजूद किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

    ‘सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहा आयोग’
    अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर सत्ता के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं, ताकि सत्ता में बैठे लोगों का प्रभाव बना रहे। उनके मुताबिक, यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है और आने वाले समय में जनता भी इसका जवाब देगी। अखिलेश ने कहा कि यूपी के चुनाव और उपचुनाव में पार्टी ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।

    आयोग ने रिपोर्ट पर दिया अलग पक्ष
    इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग के सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आए मतभेद के दावे को खारिज किया है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

    वहीं, रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

  • TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा

    TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है। इसी बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेजकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।

    दरअसल सोमवार को पार्टी के बागी नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर तृणमूल कांग्रेस की समानांतर वर्किंग कमेटी बनाने का दावा किया था। इस बैठक में ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा की गई और उनकी जगह अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इतना ही नहीं बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार का पद देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

    बागी नेताओं की इस कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत राजनीतिक जवाबी रणनीति अपनाई। उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्यों की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी। इस सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है जबकि अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव और सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष के रूप में दर्शाया गया है।

    नई सूची के चुनाव आयोग तक पहुंचने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध और प्रभावी बनाए रखने के लिए सक्रिय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बागी गुट को सीधा संदेश देने की रणनीति भी है।

    दूसरी ओर बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उनका दावा है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और नए संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए। इसी वजह से उन्होंने समानांतर कार्यसमिति के गठन को उचित ठहराया है।

    अब पार्टी पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुट आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला आधिकारिक संगठन है तो दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि विवाद और बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग के साथ-साथ अदालत तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी ने नई सूची भेजकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह पार्टी नेतृत्व को लेकर किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में नए समीकरण पैदा कर सकता है और TMC के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- निष्पक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन

    चुनाव आयोग की शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा- निष्पक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन

    नई दिल्ली । देश में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के लिए कराए जाने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी विशेष गहन संशोधन को पूरी तरह संवैधानिक और वैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची का समय-समय पर सुधार और शुद्धिकरण आवश्यक है तथा यह चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को कानून के तहत विशेष परिस्थितियों में मतदाता सूची का विशेष संशोधन कराने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता कि यह सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। यदि चुनाव आयोग को उचित कारण दिखाई देते हैं तो वह किसी भी समय मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का आदेश दे सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की व्यापक जिम्मेदारी देता है। इसी संवैधानिक दायित्व को प्रभावी बनाने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में आयोग को मतदाता सूची के संशोधन और शुद्धिकरण की शक्तियां दी गई हैं। अदालत ने माना कि विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया इन प्रावधानों के अनुरूप है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का कार्य करती है।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मतदाता के दस्तावेजों में गंभीर विसंगति दिखाई देती है या नागरिकता को लेकर संदेह उत्पन्न होता है तो चुनाव आयोग को संबंधित नामों की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि दस्तावेज मांगने या सत्यापन कराने का अर्थ यह नहीं माना जा सकता कि संबंधित व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम रूप से सवाल खड़ा किया जा रहा है। यह केवल मतदाता सूची को अधिक सटीक और त्रुटिरहित बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव आयोग ने मतदाताओं को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए थे। नाम जोड़ने, सुधार कराने, आपत्ति दर्ज करने और अपील करने जैसी व्यवस्थाएं प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाती हैं। नोटिस जारी करना, सार्वजनिक सूचना देना और कानूनी उपाय उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप माना गया।

    दरअसल, इस मामले में कई याचिकाएं दायर कर चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इतने बड़े स्तर पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराने का अधिकार चुनाव आयोग को प्राप्त नहीं है और यह प्रक्रिया नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। कुछ याचिकाओं में यह भी कहा गया था कि पूर्वजों से जुड़े दस्तावेज मांगना अत्यधिक कठोर शर्त है।

    अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन होना अनिवार्य है। यदि गलत या अपात्र नाम सूची में बने रहते हैं तो इससे लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों की बड़ी पुष्टि माना जा रहा है और आने वाले समय में यह निर्णय चुनावी सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

  • वोटर लिस्ट की नई जंग: SIR के तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश होंगे शामिल

    वोटर लिस्ट की नई जंग: SIR के तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश होंगे शामिल


    नई दिल्ली ।देश की चुनावी व्यवस्था में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के तीसरे चरण की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह प्रक्रिया केवल वोटर लिस्ट का सामान्य अपडेट नहीं बल्कि एक व्यापक सत्यापन अभियान है, जिसका उद्देश्य देश की मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है। तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश शामिल किए गए हैं, जहां कुल 36 करोड़ से अधिक मतदाताओं का विस्तृत वेरिफिकेशन किया जाएगा।

    SIR प्रक्रिया को चुनाव आयोग ने इसलिए लागू किया है ताकि मतदाता सूची में मौजूद उन नामों को हटाया जा सके जो अब वास्तविक रूप से पात्र नहीं हैं। इसमें मृत व्यक्तियों के नाम, स्थानांतरित हो चुके मतदाता, दोहराए गए रिकॉर्ड और गलत प्रविष्टियां शामिल हैं। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि जिन नागरिकों की उम्र 18 वर्ष हो चुकी है या जो पहले किसी कारणवश सूची में शामिल नहीं हो पाए थे, उन्हें भी मतदान का अवसर मिल सके। आयोग का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र की मजबूती उसकी मतदाता सूची की शुद्धता पर निर्भर करती है।

    अब तक के दो चरणों में इस अभियान का व्यापक असर देखा गया है। पहले चरण की शुरुआत बिहार से हुई थी, जिसे एक तरह का पायलट प्रोजेक्ट माना गया। इसके बाद दूसरे चरण में 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया गया, जहां करोड़ों नामों की समीक्षा की गई और बड़ी संख्या में नाम सूची से हटाए भी गए। इन प्रक्रियाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि SIR केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक गहन और सख्त सत्यापन अभियान है, जिसका प्रभाव सीधे तौर पर देश की चुनावी संरचना पर पड़ता है।

    तीसरे चरण को अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक चरण माना जा रहा है क्योंकि इसमें देश की बड़ी आबादी शामिल होगी। इस चरण में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, झारखंड, आंध्र प्रदेश, दिल्ली सहित कई महत्वपूर्ण राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं। इस चरण के दौरान लाखों बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी की जांच करेंगे और दस्तावेजों का मिलान करेंगे। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी इस प्रक्रिया में सहयोग करेंगे ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

    इस पूरे अभियान में तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ी तैयारी की गई है। लाखों की संख्या में बूथ लेवल अधिकारी और राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त एजेंट इस प्रक्रिया को सफल बनाने में जुटे रहेंगे। इसके तहत हर नागरिक की पहचान, निवास स्थान और पात्रता की जांच की जाएगी, जिससे किसी भी तरह की गड़बड़ी या दोहराव को रोका जा सके।

    SIR प्रक्रिया को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले ही कई तरह की राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं देखने को मिली हैं। कुछ जगहों पर इसे मतदाता सूची सुधार का जरूरी कदम बताया गया है, तो वहीं कुछ आलोचक इसे जटिल और विवादास्पद प्रक्रिया भी मानते हैं। खासकर उन क्षेत्रों में जहां बड़ी संख्या में नामों में बदलाव हुआ है, वहां इस प्रक्रिया पर लगातार निगरानी और बहस जारी है।

    तीसरे चरण के पूरा होने के बाद देश के लगभग पूरे चुनावी ढांचे की मतदाता सूची को नए सिरे से अपडेट कर दिया जाएगा। केवल कुछ ही क्षेत्र इस प्रक्रिया से बाहर रहेंगे, जहां प्रशासनिक या तकनीकी कारणों से बाद में इसे लागू किया जाएगा। इस बड़े अभियान के बाद भारत की चुनावी व्यवस्था को और अधिक सटीक और मजबूत बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।