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  • वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत ट्रंप की नीति पर उठे सवाल

    वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत ट्रंप की नीति पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी बार वापसी के बाद में वैश्विक भू-राजनीति का परिदृश्य तेजी से बदलता नजर आ रहा है, जहां अमेरिका की विदेश नीति एक नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में शुरुआत से ही दुनिया भर में टैरिफ और व्यापारिक दबाव की राजनीति तेज थी, जिससे कई देशों के साथ अमेरिका के संबंधों में तनाव की स्थिति बन गई थी। लेकिन ईरान संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता के बीच अमेरिकी प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसका सीधा असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ा है।

    ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका का ध्यान व्यापारिक विवादों से हटकर सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक गठबंधनों की ओर केंद्रित हो गया। इस बदलाव ने भारत जैसे देशों के महत्व को और बढ़ा दिया, जो लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। भारत ने इस दौरान अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई, चाहे वह रूस से तेल खरीदने का मामला हो या वैश्विक व्यापारिक दबाव।

    इस पूरी स्थिति में भारत को अमेरिका का एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार माना जाने लगा है। वाशिंगटन के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए नई दिल्ली की भूमिका बेहद अहम है। यही कारण है कि हाल के समय में अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भारत के प्रधानमंत्री की सराहना भी देखने को मिली है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक भरोसे का संकेत माना जा रहा है।

    हालांकि, अमेरिकी नीति में यह नरमी स्थायी है या केवल परिस्थितिजन्य, इस पर अभी सवाल बने हुए हैं। ट्रंप के पिछले रुख को देखते हुए यह संभावना भी जताई जा रही है कि जैसे-जैसे वैश्विक हालात स्थिर होंगे, व्यापारिक दबाव और टैरिफ की राजनीति फिर से लौट सकती है। चीन को लेकर भी अमेरिका का रुख कुछ हद तक नरम दिखाई दे रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच पूरी तरह से विश्वास की स्थिति अभी नहीं बनी है।

    भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट किया है कि वह किसी दबाव में आकर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगा। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिका अपनी पुरानी नीतियों की ओर लौटता है या फिर भारत के साथ साझेदारी को एक स्थायी रणनीतिक दिशा देता है।

  • अमेरिका-ईरान समझौते की उम्मीद से शेयर बाजार में लौटी मजबूती, लगातार दूसरे सप्ताह निफ्टी और सेंसेक्स ने दिखाई दमदार बढ़त

    अमेरिका-ईरान समझौते की उम्मीद से शेयर बाजार में लौटी मजबूती, लगातार दूसरे सप्ताह निफ्टी और सेंसेक्स ने दिखाई दमदार बढ़त

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव में कमी की उम्मीद और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी ने भारतीय शेयर बाजार को सप्ताहभर सकारात्मक दिशा प्रदान की। निवेशकों के बीच बढ़े भरोसे का असर यह रहा कि प्रमुख सूचकांक निफ्टी और सेंसेक्स लगातार दूसरे सप्ताह बढ़त दर्ज करने में सफल रहे। हालांकि सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली, लेकिन पूरे सप्ताह का प्रदर्शन निवेशकों के लिए उत्साहजनक रहा।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों ने वैश्विक निवेशकों की चिंताओं को कुछ हद तक कम किया। इससे ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता में राहत मिली और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सकारात्मक माहौल बना। इसी का लाभ भारतीय बाजार को भी मिला, जहां निवेशकों ने चुनिंदा क्षेत्रों में जमकर खरीदारी की।

    सप्ताह के दौरान निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ने मजबूत प्रदर्शन किया। हालांकि अंतिम कारोबारी सत्र में आईटी शेयरों में बिकवाली और निवेशकों द्वारा मुनाफा वसूली के कारण बाजार पर दबाव देखने को मिला। इसके बावजूद पूरे सप्ताह का रुख सकारात्मक बना रहा और प्रमुख सूचकांक उल्लेखनीय बढ़त के साथ बंद हुए। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों का भरोसा अभी भी बाजार में कायम है।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी ने भी बाजार को महत्वपूर्ण समर्थन दिया। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में गिरावट का सीधा असर उन अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है जो बड़े पैमाने पर तेल आयात करती हैं। भारत के लिए यह स्थिति महंगाई नियंत्रण, व्यापार संतुलन और आर्थिक स्थिरता के लिहाज से सकारात्मक मानी जाती है। इसी कारण निवेशकों ने कई क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई।

    सप्ताह के दौरान भारतीय मुद्रा में भी मजबूती दर्ज की गई। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति बेहतर होने से विदेशी निवेशकों के दृष्टिकोण में सुधार देखा गया। वित्तीय बाजारों में मुद्रा की स्थिरता को निवेश के लिए अनुकूल संकेत माना जाता है और इसका असर शेयर बाजार की धारणा पर भी दिखाई दिया।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन की बात करें तो उपभोक्ता टिकाऊ वस्तु, रियल एस्टेट, फार्मा और रक्षा क्षेत्र के शेयरों ने अच्छा प्रदर्शन किया। विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही और इस क्षेत्र ने सप्ताह के दौरान उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की। मजबूत ऑर्डर बुक, दीर्घकालिक विकास संभावनाएं और सरकारी नीतिगत समर्थन इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

    इसके विपरीत सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र दबाव में रहा। वैश्विक स्तर पर तकनीकी सेवाओं की मांग को लेकर जारी चिंताओं और कमजोर कारोबारी अनुमानों के कारण आईटी कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखने को मिली। इससे संबंधित सूचकांक सप्ताह के सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों में शामिल रहा।

    मौद्रिक नीति के मोर्चे पर भी निवेशकों की नजरें बनी हुई हैं। प्रमुख वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनाए जा रहे सतर्क रुख के कारण ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। वहीं भारत में भी नीति निर्माताओं का दृष्टिकोण फिलहाल संतुलित और सावधानीपूर्ण माना जा रहा है।

    आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मानसून की प्रगति, कृषि क्षेत्र की गतिविधियों, महंगाई के आंकड़ों और वैश्विक आर्थिक संकेतकों पर रहेगी। विशेष रूप से खरीफ फसलों की बुआई और ग्रामीण मांग से जुड़े संकेत बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव में और कमी आती है तथा कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित बनी रहती हैं, तो भारतीय शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल आगे भी जारी रह सकता है। हालांकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों पर निवेशकों की सतर्क निगाह बनी रहेगी।

  • वैश्विक अनिश्चितता और आईटी सेक्टर पर दबाव का असर, सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन शेयर बाजार में बड़ी गिरावट

    वैश्विक अनिश्चितता और आईटी सेक्टर पर दबाव का असर, सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन शेयर बाजार में बड़ी गिरावट

    नई दिल्ली । सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार दबाव में नजर आया और प्रमुख सूचकांकों ने उल्लेखनीय गिरावट के साथ कारोबार समाप्त किया। वैश्विक आर्थिक संकेतों, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता के रद्द होने तथा आईटी सेक्टर में बढ़ी बिकवाली ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहा, लेकिन अंतिम घंटों में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया, जिसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में बंद हुए।

    कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 600 अंकों से अधिक टूटकर 76 हजार के स्तर के आसपास बंद हुआ, जबकि निफ्टी भी 24 हजार के महत्वपूर्ण स्तर के करीब फिसल गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार हाल के सप्ताहों में आई तेजी के बाद निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी, जिससे कई बड़े शेयरों में दबाव देखने को मिला। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं ने भी निवेशकों को सतर्क रुख अपनाने के लिए मजबूर किया।

    बाजार की गिरावट में सबसे बड़ा योगदान आईटी सेक्टर का रहा। वैश्विक टेक्नोलॉजी कंपनियों की ओर से मिले कमजोर संकेतों और भविष्य के कारोबार को लेकर सतर्क अनुमान ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। इसके परिणामस्वरूप भारतीय आईटी कंपनियों के शेयरों में व्यापक बिकवाली दर्ज की गई। सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में तेज गिरावट देखने को मिली, जिससे आईटी सूचकांक दिन के सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों में शामिल रहा।

    जानकारों का मानना है कि डिजिटल सेवाओं और तकनीकी निवेश से जुड़ी वैश्विक मांग को लेकर अनिश्चितता बढ़ने से निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बच रहे हैं। यही कारण है कि बड़े संस्थागत निवेशकों ने तकनीकी शेयरों में अपनी हिस्सेदारी घटाने का फैसला किया। इसका सीधा असर बाजार के समग्र प्रदर्शन पर पड़ा।

    हालांकि, बाजार में हर तरफ निराशा का माहौल नहीं था। हेल्थकेयर, फार्मा, रक्षा, ऊर्जा और धातु क्षेत्रों से जुड़े कुछ शेयरों में मजबूती देखने को मिली। इन सेक्टरों ने निवेशकों को सीमित राहत प्रदान की और बाजार में गिरावट को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद की। सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश में कई निवेशकों ने इन क्षेत्रों की ओर रुख किया।

    दिलचस्प बात यह रही कि बड़े शेयरों की तुलना में मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। दोनों श्रेणियों के सूचकांक बढ़त के साथ बंद हुए, जिससे यह संकेत मिला कि घरेलू निवेशकों का भरोसा अभी भी चुनिंदा कंपनियों और विकास आधारित क्षेत्रों में बना हुआ है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत घरेलू आर्थिक संकेतक और निवेश गतिविधियां इन वर्गों को समर्थन प्रदान कर रही हैं।

    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता रद्द होने की खबर ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी सतर्कता बढ़ा दी। निवेशकों को आशंका है कि भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का प्रभाव भारतीय बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम, मानसून की प्रगति, कॉर्पोरेट नतीजों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर बनी रहेगी। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव और सतर्क कारोबार का माहौल जारी रह सकता है।

  • भू-राजनीतिक तनाव घटते ही सोना-चांदी में भारी गिरावट, लगातार तीसरे सत्र की बिकवाली ने निवेशकों की बढ़ाई चिंता

    भू-राजनीतिक तनाव घटते ही सोना-चांदी में भारी गिरावट, लगातार तीसरे सत्र की बिकवाली ने निवेशकों की बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव में कमी आने और निवेशकों का जोखिम वाले निवेश विकल्पों की ओर झुकाव बढ़ने के कारण शुक्रवार को कीमती धातुओं के बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली। लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में सोना और चांदी दोनों दबाव में रहे, जिससे बाजार में निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हुई तेज बिकवाली ने सोना-चांदी की कीमतों को महत्वपूर्ण स्तरों से नीचे पहुंचा दिया है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में सोने की कीमतों में कारोबार की शुरुआत से ही कमजोरी का रुख दिखाई दिया। शुरुआती घंटों में सोना दो प्रतिशत से अधिक टूट गया और दिन के दौरान इसमें और गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के दिनों में मध्य पूर्व समेत कई क्षेत्रों में तनाव कम होने से निवेशकों ने सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने से दूरी बनानी शुरू कर दी है। इसका सीधा असर कीमतों पर देखने को मिला है।

    चांदी के बाजार में भी भारी दबाव बना रहा। कारोबार के दौरान चांदी में तीन प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई और यह दिन के निचले स्तरों तक पहुंच गई। विश्लेषकों का मानना है कि चांदी पर दोहरी मार पड़ी है। एक ओर सुरक्षित निवेश की मांग कमजोर हुई है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजारों में बिकवाली का असर भी इसकी कीमतों पर पड़ा है।

    अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। अमेरिकी बाजार में सोना और चांदी दोनों कमजोर कारोबार करते नजर आए। निवेशकों का ध्यान अब वैश्विक आर्थिक संकेतकों, केंद्रीय बैंकों की नीतियों और महंगाई से जुड़े जोखिमों पर अधिक केंद्रित हो गया है। इससे कीमती धातुओं में निवेश का आकर्षण फिलहाल कुछ कम हुआ है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में सोना और चांदी दोनों में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली थी। ऐसे में मौजूदा गिरावट को काफी हद तक मुनाफावसूली का परिणाम भी माना जा रहा है। उनका कहना है कि ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव, महंगाई को लेकर आशंकाएं, ब्याज दरों से जुड़े संकेत और डॉलर की मजबूती जैसे कारकों ने निवेशकों की रणनीतियों को प्रभावित किया है। इसके अलावा, लीवरेज्ड ट्रेडिंग पोजीशन के कम होने से भी बाजार में बिकवाली बढ़ी है।

    हालांकि विशेषज्ञ इस गिरावट को दीर्घकालिक दृष्टि से पूरी तरह नकारात्मक नहीं मानते। उनका कहना है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ता सरकारी कर्ज, केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को लेकर बनी अनिश्चितताएं अभी भी सोने के पक्ष में मजबूत आधार प्रदान करती हैं। यही कारण है कि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कीमती धातुएं अब भी आकर्षक निवेश विकल्प बनी हुई हैं।

    बाजार जानकारों का मानना है कि फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि कीमतें अपने निचले स्तर पर पहुंच चुकी हैं या गिरावट का दौर कुछ और समय तक जारी रहेगा। अल्पकालिक निवेशकों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है, जबकि लंबी अवधि का नजरिया रखने वाले निवेशकों के लिए यह अपने पोर्टफोलियो में कीमती धातुओं की हिस्सेदारी पर विचार करने का उपयुक्त समय हो सकता है।

    सोना और चांदी की कीमतों में आई इस तेज गिरावट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम का इन धातुओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, केंद्रीय बैंकों के फैसलों और आर्थिक संकेतकों के आधार पर बाजार की दिशा तय होगी, जिस पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।

  • अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका चर्चा में, शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर के साथ कूटनीतिक सफलता का किया दावा

    अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका चर्चा में, शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर के साथ कूटनीतिक सफलता का किया दावा


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। इस समझौते को लेकर पाकिस्तान भी वैश्विक चर्चा का हिस्सा बन गया है, क्योंकि उसने इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया है। समझौते पर अमेरिका और ईरान के शीर्ष नेतृत्व द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी मध्यस्थ के रूप में दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

    समझौते के बाद पाकिस्तान सरकार की ओर से जारी संदेशों में इसे ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि यह समझौता कई महीनों से जारी तनाव और टकराव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। उनके अनुसार, दोनों देशों द्वारा संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाना इस बात का संकेत है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान बातचीत के माध्यम से भी संभव है।

    समझौते के प्रमुख बिंदुओं में क्षेत्रीय समुद्री मार्गों की सामान्य स्थिति बहाल करने और तनाव कम करने से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और पिछले कुछ समय से इसके संचालन को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बनी हुई थी। समझौते के बाद ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार गतिविधियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस अवसर पर अमेरिका और ईरान दोनों देशों के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि समझौते तक पहुंचना आसान प्रक्रिया नहीं थी। उन्होंने इसे धैर्य, संवाद और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि निरंतर कूटनीतिक प्रयासों और आपसी विश्वास निर्माण से सुनिश्चित की जा सकती है।

    हालांकि इस समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता तत्काल तनाव कम करने में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित पक्ष इसके प्रावधानों का किस प्रकार पालन करते हैं। पिछले वर्षों में अमेरिका और ईरान के संबंधों में उतार-चढ़ाव और अविश्वास का लंबा इतिहास रहा है, जिसके कारण समझौते की स्थिरता को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल हैं, जहां कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी भी समझौते की सफलता केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय संतुलन पर भी पड़ता है। इसी कारण आने वाले दिनों में विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाओं और आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाएगी।

    फिलहाल इस समझौते ने संघर्ष और टकराव के माहौल में संवाद की संभावना को मजबूत किया है। पाकिस्तान इसे अपनी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात पर ध्यान केंद्रित किए हुए है कि समझौते के बाद क्षेत्र में वास्तविक स्थिरता और शांति स्थापित होती है या नहीं। आने वाले सप्ताह इस समझौते की प्रभावशीलता और इसके व्यापक परिणामों को समझने के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे।

  • ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल

    ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल


    नई दिल्ली ।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक नई शांति संधि की कोशिशों के बीच मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा वैचारिक टकराव उभरकर सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत की सुगबुगाहटों के बीच इजरायल ने अपने रुख को बेहद आक्रामक बनाए रखा है। वाशिंगटन के लिए जहां यह युद्ध वैश्विक कूटनीति और हितों का एक हिस्सा मात्र हो सकता है, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वहां की एक बड़ी आबादी के लिए यह देश के वजूद और अस्तित्व को बचाए रखने की एक अनिवार्य लड़ाई बन चुकी है।

    यरुशलम की रणनीतिक सोच और वाशिंगटन के नजरिए में बुनियादी फर्क यह है कि अमेरिका इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत को हालिया तारीखों से जोड़कर देखता है, जबकि इजराइली अवाम के लिए यह लड़ाई अक्टूबर दो हजार तेईस के उस काले दिन से शुरू हो चुकी है जब उनकी सीमाओं के भीतर घुसकर बर्बरता को अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन जब भी शांति और समझौते की बात आगे बढ़ाता है, इजरायली रक्षा बल अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी मुल्कों में बने आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और तेज कर देते हैं।

    बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक जीवन और उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी है कि दुश्मनों के सामने रियायतें देना आत्मघाती साबित होता है। संयुक्त राष्ट्र में देश के सबसे युवा राजदूत के रूप में काम कर चुके नेतन्याहू के पास सुरक्षा मामलों का लंबा व्यावहारिक अनुभव है, जिसके दम पर वे कई बार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दबाव को भी खारिज कर चुके हैं। इजरायल में यह माना जाता है कि जब भी किसी कमजोर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कदम पीछे खींचे हैं, देश को और बड़े संकटों का सामना करना पड़ा है।

    इजरायल की अंदरूनी राजनीति भले ही बेहद जटिल और मिली-जुली सरकारों के दौर से गुजरती रही हो, लेकिन बाहरी खतरों के समय वहां का समाज पूरी तरह एकजुट हो जाता है। वर्तमान में देश की साठ फीसदी से अधिक जनता राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर सरकार की इस सैन्य नीति के साथ मजबूती से खड़ी है कि ईरान समर्थित उग्रवादी संगठनों का पूरी तरह सफाया किया जाए। गाजा पट्टी से वर्ष दो हजार पांच में सेना हटाने के बाद जिस तरह वहां हमास का गढ़ तैयार हुआ, उसने इजरायली सुरक्षा तंत्र को यह सबक सिखाया है कि जमीन के बदले शांति की नीति हमेशा बेअसर रहती है।

    सैन्य मोर्चे पर इजरायल इस समय चारों तरफ से खतरनाक हथियारों से लैस गैर-राज्य अभिकर्ताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ गाजा में सक्रिय नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ लेबनान की सीमा पर आधुनिक मिसाइलों से लैस हिजबुल्लाह मौजूद है, जिसने उत्तरी इजरायल के नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर रखा है। इजरायली सेना की रणनीति अब बिल्कुल साफ है कि वे किसी भी मोर्चे पर कमजोरी नहीं दिखाएंगे और उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए लितानी नदी तक के पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए पूरी तरह खामोश कर देंगे ताकि भविष्य में रॉकेट हमलों का खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो सके।

    कूटनीतिक स्तर पर यरुशलम इस बात को भली-भांति समझता है कि महाशक्तियों की नीतियां उनके तात्कालिक राजनीतिक फायदों के हिसाब से बदलती रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए युद्ध को बीच में रोकना एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इजरायल के लिए युद्ध को अधूरा छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। यदि यह जंग बिना किसी ठोस नतीजे के रुकती है, तो तेहरान से हथियारों की आपूर्ति दोबारा शुरू हो जाएगी और सीमावर्ती इलाकों से विस्थापित हुए लाखों इजरायली नागरिक कभी भी अपने घरों को सुरक्षित वापस नहीं लौट पाएंगे।

  • ईरान-अमेरिका समझौते के बहाने कांग्रेस का मोदी सरकार पर प्रहार, जयराम रमेश ने विदेश नीति और पाकिस्तान पर उठाए सवाल

    ईरान-अमेरिका समझौते के बहाने कांग्रेस का मोदी सरकार पर प्रहार, जयराम रमेश ने विदेश नीति और पाकिस्तान पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबरों के बीच देश में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। इस घटनाक्रम का स्वागत करते हुए कांग्रेस ने एक ओर जहां क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यापार के लिए इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार की विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठाए हैं।

    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के सामान्य रूप से खुलने की संभावना भारत के लिए राहत भरी खबर हो सकती है। उनका मानना है कि इस समुद्री मार्ग के सुचारु संचालन से ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ने वाले दबाव में कमी आ सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे देश की अर्थव्यवस्था के सामने पहले से मौजूद संरचनात्मक चुनौतियां स्वतः समाप्त नहीं हो जाएंगी।

    उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था कई ऐसे मुद्दों का सामना कर रही है जो पश्चिम एशिया में हालिया तनाव शुरू होने से पहले से मौजूद थे। उनके अनुसार रुपये पर लंबे समय से दबाव बना हुआ है और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग तथा उपलब्धता के बीच अंतर लगातार बढ़ता गया है। ऐसे हालात में केवल वैश्विक परिस्थितियों में सुधार से घरेलू आर्थिक चुनौतियों का समाधान संभव नहीं माना जा सकता।

    कांग्रेस नेता ने निवेश के मोर्चे पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में निवेश की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। उनके अनुसार वास्तविक मजदूरी वृद्धि में ठहराव, विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन से होने वाले आयात पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने के कारण व्यापार घाटा बढ़ा है, जिसका असर घरेलू उद्योगों पर भी पड़ा है।

    जयराम रमेश ने कारोबारी माहौल को लेकर भी सरकार की आलोचना की। उनका कहना था कि नियामकीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी चुनौतियों ने निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया है। उन्होंने दावा किया कि उद्योग जगत को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद वातावरण की आवश्यकता है ताकि दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहन मिल सके।

    विदेश नीति के मुद्दे पर कांग्रेस ने पाकिस्तान और चीन के बढ़ते सामरिक संबंधों का उल्लेख किया। जयराम रमेश ने कहा कि पाकिस्तान, जिसे वर्षों पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की दिशा में भारत को सफलता मिली थी, अब क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की रणनीतिक संरचना में चीन की गहरी भागीदारी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है।

    कांग्रेस नेता ने पश्चिम एशिया के संदर्भ में भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित संतुलित और बहुआयामी विदेश नीति की मांग करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार इस दिशा में अपेक्षित संतुलन प्रदर्शित नहीं कर सकी है। साथ ही उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति, मानवीय सरोकारों और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी बड़ी शक्ति के लिए आवश्यक होता है।

    ईरान-अमेरिका समझौते की संभावनाओं के बीच कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों पर दुनिया की नजर बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में इस समझौते के वास्तविक प्रभाव और क्षेत्रीय राजनीति पर इसके परिणामों को लेकर देश के भीतर भी बहस जारी रह सकती है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को घरेलू बाजारों ने मजबूत शुरुआत की और प्रमुख सूचकांकों सेंसेक्स तथा निफ्टी में डेढ़ प्रतिशत के आसपास की तेजी दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना ने निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल तैयार किया, जिसका लाभ भारतीय बाजार को भी मिला।

    कारोबार की शुरुआत से ही निवेशकों में खरीदारी का उत्साह देखने को मिला। बीएसई सेंसेक्स ने करीब 1,200 अंकों की मजबूती के साथ कारोबार शुरू किया, जबकि एनएसई निफ्टी भी लगभग 24 हजार अंकों के स्तर के करीब पहुंच गया। शुरुआती घंटों में दोनों प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ हरे निशान में कारोबार करते रहे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम कम होने की धारणा ने निवेशकों को इक्विटी बाजारों की ओर आकर्षित किया है।

    विशेष रूप से व्यापक बाजार में भी मजबूती देखने को मिली। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में अच्छी खरीदारी दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि तेजी केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। निवेशकों ने विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई और बाजार का समग्र रुझान सकारात्मक बना रहा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो धातु, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं से जुड़े शेयरों में उल्लेखनीय तेजी रही। वित्तीय सेवाओं, तेल एवं गैस तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर, फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र में सीमित दबाव दर्ज किया गया, हालांकि इससे बाजार की कुल सकारात्मक धारणा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की खबर रही। दोनों देशों के बीच शांति समझौते की दिशा में हुई प्रगति को वैश्विक निवेशकों ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर बनी अनिश्चितता दूर होने से ऊर्जा आपूर्ति संबंधी चिंताएं भी कम हुई हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके सुचारु संचालन से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ी है।

    इस सकारात्मक घटनाक्रम का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई। तेल की कीमतों में कमी को भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। इससे आयात बिल पर दबाव घट सकता है और महंगाई नियंत्रण में रखने के प्रयासों को भी समर्थन मिल सकता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिस्थितियां और अधिक अनुकूल हो सकती हैं। कम तेल कीमतों का लाभ उद्योगों, परिवहन क्षेत्र और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। साथ ही आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति से जुड़े अनुमानों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    फिलहाल बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर बनी हुई है, लेकिन सप्ताह की शुरुआत जिस मजबूती के साथ हुई है, उसने निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है। आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान समझौते से जुड़े आगे के घटनाक्रम और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति निवेशकों की नजर में प्रमुख कारक बने रहेंगे।

  • वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने के संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार ने सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में शानदार प्रदर्शन किया। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया, जिसके चलते घरेलू बाजार में चौतरफा खरीदारी देखने को मिली। इस तेजी के परिणामस्वरूप निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में करीब 10 लाख करोड़ रुपये का इजाफा दर्ज किया गया।

    कारोबार समाप्त होने पर प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ बंद हुए। निवेशकों की सकारात्मक धारणा और वैश्विक संकेतों के समर्थन से बाजार ने पूरे सत्र के दौरान मजबूती बनाए रखी। बड़ी कंपनियों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी उल्लेखनीय खरीदारी देखने को मिली, जिससे बाजार की व्यापक भागीदारी स्पष्ट हुई।

    बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर लगभग 462 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि निवेशकों ने वैश्विक परिस्थितियों में सुधार की उम्मीदों को सकारात्मक रूप से लिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को सबसे अधिक राहत इस बात से मिली कि पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना दिखाई दी।

    कारोबारी सत्र के दौरान बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के शेयरों में मजबूत खरीदारी दर्ज की गई। निजी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के शेयरों ने बाजार को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों में दो से तीन प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई, जिससे प्रमुख सूचकांकों को मजबूती मिली।

    मिडकैप और स्मॉलकैप वर्ग के शेयरों में भी निवेशकों का उत्साह देखने को मिला। आमतौर पर जोखिम वाले माने जाने वाले इन शेयरों में खरीदारी यह संकेत देती है कि बाजार सहभागियों का भरोसा केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक स्तर पर सकारात्मक धारणा बनी रही। इससे बाजार की मजबूती और अधिक व्यापक दिखाई दी।

    विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की खबरें रहीं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था। यदि किसी समझौते की दिशा में ठोस प्रगति होती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और निवेश माहौल पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    इसी उम्मीद का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जिसे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए सकारात्मक माना जाता है। कम तेल कीमतें महंगाई के दबाव को घटाने, चालू खाते के संतुलन को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने में सहायक हो सकती हैं। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में नरमी को शेयर बाजार ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया।

    हालांकि बाजार विशेषज्ञ निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि वैश्विक घटनाक्रमों में किसी भी प्रकार का बदलाव बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकता है। फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों का भरोसा मजबूत दिखाई दे रहा है और घरेलू आर्थिक संकेतक भी बाजार को समर्थन प्रदान कर रहे हैं।

    दिनभर की तेज बढ़त ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होने की संभावना भारतीय बाजार के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं, तो आने वाले कारोबारी सत्रों में भी सकारात्मक रुख देखने को मिल सकता है।

  • मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच शांति समझौते की संभावनाओं ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में नई ऊर्जा का संचार किया है। इसी सकारात्मक माहौल का असर भारतीय कमोडिटी बाजार में भी दिखाई दिया, जहां सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई। निवेशकों के बीच बढ़े विश्वास और वैश्विक जोखिम धारणा में सुधार के कारण दोनों कीमती धातुओं में खरीदारी का रुझान मजबूत रहा।

    शुक्रवार सुबह मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर अगस्त डिलीवरी वाले सोने के वायदा भाव में तेजी देखने को मिली। कारोबार की शुरुआत से ही सोना मजबूत स्तर पर खुला और दिन के शुरुआती सत्र में 1.50 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर निवेशकों की मनोवैज्ञानिक धारणा के लिहाज से काफी अहम माना जाता है और इसके ऊपर टिके रहना बाजार की मजबूती का संकेत देता है।

    चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। जुलाई डिलीवरी वाली चांदी ने मजबूत शुरुआत की और कारोबार के दौरान 2.40 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर से ऊपर पहुंच गई। औद्योगिक मांग, निवेशकों की दिलचस्पी और वैश्विक बाजारों में सुधरते संकेतों ने चांदी को भी मजबूती प्रदान की। बाजार विश्लेषकों के अनुसार चांदी में फिलहाल रिकवरी का क्रम जारी है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

    कीमती धातुओं में यह तेजी उस समय सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। हालिया बयानों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है। इससे वैश्विक निवेशकों के बीच जोखिम लेने की क्षमता में सुधार हुआ है, जिसका प्रभाव शेयर बाजारों के साथ-साथ कमोडिटी बाजारों पर भी दिखाई दिया।

    बुलियन बाजार के आंकड़ों के अनुसार शुद्धता के आधार पर सोने और चांदी की कीमतों में भी मजबूती बनी हुई है। घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की मांग और अंतरराष्ट्रीय संकेतों के संयुक्त प्रभाव से निवेशकों की रुचि लगातार बनी हुई है। बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं तो आने वाले समय में कीमतों को और समर्थन मिल सकता है।

    तकनीकी विश्लेषण के अनुसार सोने के लिए 1.52 लाख रुपये का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि कीमतें इस स्तर के ऊपर स्थिर रहने में सफल होती हैं तो आगे और तेजी देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, 1.50 लाख रुपये से नीचे फिसलने की स्थिति में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह चांदी के लिए 2.48 लाख से 2.51 लाख रुपये का दायरा प्रमुख प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इस स्तर को पार करने पर तेजी और मजबूत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम, निवेशकों की जोखिम धारणा, मुद्रा बाजार की चाल और सुरक्षित निवेश की मांग सोने तथा चांदी की कीमतों को प्रभावित करती रहेगी। फिलहाल दोनों धातुओं का निकट अवधि का रुख सकारात्मक दिखाई दे रहा है, हालांकि निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर लगातार नजर बनाए रखने की आवश्यकता होगी।