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  • मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने गहराई वैश्विक चिंता, विशेषज्ञ बोले- हालात एक और व्यापक युद्ध की ओर बढ़ने का दे रहे संकेत

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने गहराई वैश्विक चिंता, विशेषज्ञ बोले- हालात एक और व्यापक युद्ध की ओर बढ़ने का दे रहे संकेत

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालिया घटनाक्रम के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले महीनों में स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है। उनका कहना है कि मौजूदा घटनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने की आशंका बनी हुई है।

    विदेश मामलों के जानकार डॉ. वाएल अव्वाद ने कहा कि हाल के घटनाक्रम ने पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया है। उनके अनुसार, यदि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप जारी रखते हैं और सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं, तो इसका असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

    उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते में कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल बताए गए हैं, जिनका उद्देश्य क्षेत्र में तनाव कम करना और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखना था। उनका मानना है कि यदि समझौते के प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं होता, तो आपसी अविश्वास बढ़ सकता है और स्थिति अधिक संवेदनशील बन सकती है।

    विशेषज्ञ के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या नौवहन में बाधा अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है।

    डॉ. अव्वाद ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में कई देशों की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। उनका मानना है कि यदि तनाव लगातार बढ़ता है, तो विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गठबंधन और सहयोगी देश भी इस घटनाक्रम से प्रभावित हो सकते हैं। इससे कूटनीतिक प्रयासों के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी रणनीतियों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले दो से तीन महीने इस पूरे क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इस अवधि में यदि संवाद और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो तनाव और गहरा सकता है। उनका मानना है कि सभी पक्षों को संयम बरतते हुए बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशने का प्रयास करना चाहिए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, समुद्री व्यापार, निवेश, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देश इस घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और स्थिति के शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।

    हाल के घटनाक्रम के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और संघर्ष की संभावनाओं को कम करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक वार्ता, आपसी विश्वास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही ऐसे तनावपूर्ण माहौल में स्थायी समाधान का आधार बन सकते हैं। यदि संवाद की प्रक्रिया मजबूत होती है तो क्षेत्र में शांति बनाए रखने की संभावना बढ़ेगी, जबकि लगातार बढ़ता तनाव व्यापक क्षेत्रीय संकट का कारण बन सकता है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोना-चांदी पर दबाव, एमसीएक्स में दोनों कीमती धातुओं के दाम गिरे, कच्चा तेल हुआ महंगा

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोना-चांदी पर दबाव, एमसीएक्स में दोनों कीमती धातुओं के दाम गिरे, कच्चा तेल हुआ महंगा

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक कमोडिटी बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। बुधवार को घरेलू वायदा बाजार में सोना और चांदी दोनों गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। निवेशकों की ओर से मुनाफावसूली और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बदले निवेश रुझान के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया, जिससे वैश्विक आर्थिक चिंताएं और बढ़ गई हैं।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त डिलीवरी अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में गिरावट के साथ हुई। शुरुआती कारोबार में सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला और कारोबार के दौरान यह अपने शुरुआती स्तर से भी नीचे फिसल गया। इससे संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाते हुए बड़े निवेश से बच रहे हैं।

    चांदी के वायदा अनुबंध में भी कमजोरी का रुख देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ होने के बाद इसकी कीमत दो लाख तीस हजार रुपये प्रति किलोग्राम के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे पहुंच गई। कारोबार के दौरान चांदी में बिकवाली का दबाव बना रहा, जिससे इसकी कीमतों में और नरमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और निवेशकों की बदलती रणनीति का असर चांदी की कीमतों पर भी पड़ा है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोना और चांदी दोनों पर दबाव बना रहा। वैश्विक निवेशकों ने जोखिम से जुड़े परिसंपत्तियों के साथ-साथ कीमती धातुओं में भी सतर्क रुख अपनाया। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में निवेशकों की प्राथमिकता लगातार बदल रही है, जिससे कमोडिटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे समय में विभिन्न वैश्विक घटनाक्रम निवेश निर्णयों को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।

    बाजार पर सबसे बड़ा प्रभाव मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का माना जा रहा है। क्षेत्र में हालिया घटनाओं के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊर्जा कीमतों में यह तेजी वैश्विक महंगाई और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भू-राजनीतिक घटनाओं के दौरान कमोडिटी बाजार में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य माना जाता है। निवेशक लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी निवेश रणनीति में बदलाव करते हैं। यही कारण है कि एक ओर ऊर्जा बाजार में तेजी देखने को मिल रही है, जबकि दूसरी ओर कीमती धातुओं में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बना हुआ है।

    आने वाले दिनों में सोना, चांदी और कच्चे तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। वहीं स्थिति सामान्य होने पर कमोडिटी बाजार में भी स्थिरता लौटने की संभावना है। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतों, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं पर बनी हुई है, जो आने वाले कारोबारी सत्रों की दिशा तय करेंगे।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। बुधवार को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती सत्र में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स 78 हजार के स्तर से नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी में भी उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। वैश्विक अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूटकर 77 हजार के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 24,300 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार में बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने व्यापक स्तर पर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऑयल एवं गैस, ऑटो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, कमोडिटी और एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर फार्मा, हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में निवेशक ऐसे क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

    वैश्विक बाजारों में भी मिश्रित संकेत देखने को मिले। एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में दबाव के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाहें अब पश्चिम एशिया की स्थिति और उससे जुड़े अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का पड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल का प्रभाव शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया।

    निवेशक फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर यदि स्थिति सामान्य होती है तो निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर अल्पकालिक अस्थिरता पैदा करती हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • खामेनेई के जनाजे में हमास, हिज्बुल्लाह और हूती की मौजूदगी, ईरान ने दुनिया को दिया 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' की एकजुटता का संदेश

    खामेनेई के जनाजे में हमास, हिज्बुल्लाह और हूती की मौजूदगी, ईरान ने दुनिया को दिया 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' की एकजुटता का संदेश

    नई दिल्ली । ईरान में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के जनाजे के दौरान आयोजित अंतिम श्रद्धांजलि समारोह केवल एक धार्मिक और राष्ट्रीय आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पश्चिम एशिया की मौजूदा रणनीतिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण संदेश लेकर सामने आया। इस अवसर पर हमास, हिज्बुल्लाह और यमन के हूती आंदोलन सहित ईरान के कई क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से चर्चा में रहने वाला ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ अब भी सक्रिय और संगठित बना हुआ है।

    समारोह में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने ईरान के नेतृत्व के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ-साथ क्षेत्रीय सहयोग और साझा रणनीतिक संबंधों को भी दोहराया। इन संगठनों की उपस्थिति को केवल शोक प्रकट करने तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव और उसके सहयोगी नेटवर्क की मजबूती के प्रतीक के रूप में भी समझा जा रहा है।

    पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय संघर्ष, इजरायल के साथ बढ़ते तनाव और बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच ईरान और उसके सहयोगी संगठनों की भूमिका लगातार अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है। ऐसे समय में आयोजित यह अंतिम संस्कार समारोह कई देशों और विश्लेषकों की विशेष निगाहों में रहा, क्योंकि इसमें शामिल प्रतिनिधिमंडलों ने सामूहिक उपस्थिति के माध्यम से राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देने का प्रयास किया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ केवल एक राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि उन संगठनों का साझा मंच है जो क्षेत्रीय मुद्दों पर ईरान के साथ निकट सहयोग बनाए रखते हैं। इनमें लेबनान का हिज्बुल्लाह, फिलिस्तीनी संगठन हमास और यमन का हूती आंदोलन प्रमुख माने जाते हैं। इन संगठनों के बीच वर्षों से वैचारिक और रणनीतिक समन्वय देखने को मिलता रहा है।

    जनाजे के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रखी गई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए नागरिकों ने अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की, जबकि विदेशी प्रतिनिधिमंडलों ने भी समारोह में भाग लेकर ईरान के साथ अपने संबंधों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इस आयोजन ने घरेलू स्तर पर राष्ट्रीय एकजुटता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय साझेदारी दोनों को प्रमुखता से सामने रखा।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में लगातार बदलते हालात के बीच इस प्रकार के सार्वजनिक आयोजन केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से कूटनीतिक और रणनीतिक संकेत भी दिए जाते हैं। ऐसे आयोजनों में सहयोगी देशों और संगठनों की उपस्थिति भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    हाल के वर्षों में इजरायल, गाजा, लेबनान और लाल सागर क्षेत्र में बढ़े तनाव ने पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है। इसी पृष्ठभूमि में ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के बीच समन्वय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। खामेनेई के जनाजे में इन सभी प्रमुख सहयोगियों की एक साथ मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद यह क्षेत्रीय नेटवर्क सक्रिय बना हुआ है और साझा रणनीतिक उद्देश्यों पर आगे भी सहयोग जारी रखने की मंशा रखता है। समारोह से उभरी यह तस्वीर आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों पर होने वाली चर्चाओं में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखी जा रही है।

  • भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के हालिया भारत दौरे के बाद एशियाई कूटनीति में एक नया विवाद सामने आया है। चीन के सरकारी मीडिया ने इस यात्रा के दौरान जापानी प्रतिनिधिमंडल द्वारा कथित तौर पर केवल बोतलबंद पानी के इस्तेमाल के मुद्दे को प्रमुखता देते हुए भारत-जापान संबंधों पर सवाल खड़े करने का प्रयास किया है। हालांकि भारत और जापान की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन इसे दोनों देशों की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    चीनी सरकारी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में स्थानीय नल के पानी का उपयोग नहीं किया और पूरे दौरे के दौरान केवल पैक किए गए मिनरल वॉटर का ही इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रतिनिधिमंडल के लिए पहले से बड़ी मात्रा में बोतलबंद पानी की व्यवस्था की गई थी तथा साफ-सफाई और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए भी उसी का उपयोग किया गया। अखबार ने इस मामले को भारत के प्रति जापान के कथित दोहरे रवैये से जोड़ने की कोशिश की।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गर्मजोशीपूर्ण मुलाकात की और दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों पर जोर दिया। इसके बावजूद पानी के मुद्दे को उछालकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि व्यवहारिक स्तर पर जापान भारत को लेकर पूरी तरह सहज नहीं है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और न ही दोनों देशों ने इस विषय पर कोई आधिकारिक टिप्पणी की है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत और जापान के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। दोनों देशों ने हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित किया है। यही वजह है कि उनकी रणनीतिक साझेदारी को एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दोनों देशों के बीच नौसैनिक संचार प्रणाली, रक्षा तकनीक के संयुक्त विकास और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। इन क्षेत्रों में चीन का लंबे समय से प्रभाव माना जाता रहा है। ऐसे में भारत और जापान की बढ़ती भागीदारी को बीजिंग अपने रणनीतिक हितों के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

    हाल के संयुक्त बयानों में भारत और जापान ने दक्षिण चीन सागर तथा पूर्वी चीन सागर की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है। दोनों देशों ने किसी भी क्षेत्र में बल प्रयोग या एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने के प्रयासों का विरोध किया है। यद्यपि किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक संदेश के रूप में देखा गया। इसके बाद चीन ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी तीसरे देश को लक्ष्य बनाकर गठबंधन तैयार नहीं किए जाने चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि भारत की विनिर्माण क्षमता और जापान की उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता भविष्य में कई रणनीतिक क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर सकती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बढ़ते सहयोग पर चीन लगातार नजर बनाए हुए है। ऐसे माहौल में ‘टैप वॉटर’ जैसे मुद्दे को प्रमुखता देकर भारत-जापान संबंधों को लेकर संदेह पैदा करने की कोशिश को व्यापक कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है। फिलहाल दोनों देशों का ध्यान अपने दीर्घकालिक सहयोग को और मजबूत करने तथा क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

  • सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों के लिए मजबूत संकेत, दीर्घकाल में रिकॉर्ड स्तर पर बनी रह सकती है चमक

    सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों के लिए मजबूत संकेत, दीर्घकाल में रिकॉर्ड स्तर पर बनी रह सकती है चमक

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितताओं और बदलते निवेश माहौल के बीच सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। हालांकि अल्पकालिक अस्थिरता निवेशकों और उपभोक्ताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से सोने का भविष्य अब भी मजबूत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सोने की मांग उच्च स्तर पर बनी रह सकती है और इसकी कीमतों में मजबूती देखने को मिल सकती है।

    दुनियाभर में जारी युद्ध जैसे हालात, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता और विभिन्न देशों की आर्थिक नीतियों में बदलाव का सीधा असर सोने के बाजार पर पड़ रहा है। ऐसे समय में निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसके कारण सोना एक बार फिर भरोसेमंद निवेश साधन के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। यही वजह है कि कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद बाजार में इसकी अहमियत लगातार बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे देशों में सोने की मांग केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है। शादी-विवाह, त्योहारों और पारंपरिक अवसरों पर सोने की खरीदारी का चलन वर्षों से कायम है। इसके अलावा युवा आबादी में बढ़ती आय, संगठित ज्वैलरी बाजार का विस्तार और ब्रांडेड आभूषणों की बढ़ती स्वीकार्यता भी इस क्षेत्र की दीर्घकालिक संभावनाओं को मजबूत बना रही है।

    हालांकि बढ़ती कीमतों का असर उपभोक्ताओं की खरीदारी पर भी दिखाई दिया है। जब सोने के दाम तेजी से बढ़ते हैं तो कई ग्राहक खरीदारी को कुछ समय के लिए टाल देते हैं। वहीं कीमतों में स्थिरता आने या सीमित गिरावट होने पर बाजार में मांग फिर से बढ़ने लगती है। इससे स्पष्ट है कि उपभोक्ता पूरी तरह बाजार से दूर नहीं हो रहे हैं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार अपने खरीद निर्णय में बदलाव कर रहे हैं।

    बीते वित्तीय वर्ष के दौरान सोने की कीमतों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। इसका प्रभाव शुरुआती महीनों में मांग पर पड़ा और बाजार में खरीदारी अपेक्षाकृत धीमी रही। हालांकि वर्ष के दूसरे हिस्से में स्थिति में सुधार देखने को मिला और आभूषणों के साथ-साथ सोने के सिक्कों की मांग में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि ऊंची कीमतों के बावजूद सोने के प्रति उपभोक्ताओं का भरोसा बरकरार है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं। कई देशों द्वारा व्यापारिक नीतियों में बदलाव, आयात शुल्क में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चुनौतियों ने कारोबारी रणनीतियों को प्रभावित किया है। इसके बावजूद कंपनियां बदलते वैश्विक माहौल के अनुरूप अपनी योजनाओं में संशोधन कर अवसरों का लाभ उठाने की दिशा में काम कर रही हैं। मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कारोबारी सतर्कता भी बढ़ाई गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह अब भी एक महत्वपूर्ण परिसंपत्ति बना रहेगा। आर्थिक अस्थिरता, महंगाई और वैश्विक जोखिमों के दौर में सोना निवेश पोर्टफोलियो को संतुलित रखने का प्रभावी माध्यम माना जाता है। यही कारण है कि बाजार में अस्थायी उतार-चढ़ाव के बावजूद दीर्घकाल में सोने की चमक बरकरार रहने और इसकी मांग मजबूत बने रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

  • पश्चिम एशिया तनाव, महंगाई की आशंका और ब्याज दरों का दबाव, सोना-चांदी 1 प्रतिशत से ज्यादा फिसले, बाजार की नजर अब अमेरिकी आंकड़ों पर

    पश्चिम एशिया तनाव, महंगाई की आशंका और ब्याज दरों का दबाव, सोना-चांदी 1 प्रतिशत से ज्यादा फिसले, बाजार की नजर अब अमेरिकी आंकड़ों पर

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति की आशंकाओं और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच मंगलवार को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने और चांदी की कीमतों पर भारी दबाव देखने को मिला। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) से लेकर वैश्विक बुलियन बाजार तक दोनों कीमती धातुओं में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि कारोबारी सत्र के दौरान कुछ रिकवरी देखने को मिली, लेकिन बाजार का समग्र रुख कमजोर बना रहा।

    घरेलू वायदा बाजार में अगस्त डिलीवरी वाला सोना कारोबार की शुरुआत से ही दबाव में रहा। शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत पिछले बंद स्तर की तुलना में एक प्रतिशत से अधिक टूटकर खुली। दिन के दौरान बिकवाली और तेज हुई, जिससे सोना करीब 1.37 प्रतिशत तक फिसलकर दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया। बाद में सीमित खरीदारी लौटने से इसमें कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन बाजार की धारणा पूरी तरह सकारात्मक नहीं बन सकी।

    चांदी की कीमतों में भी इसी तरह कमजोरी देखने को मिली। सितंबर डिलीवरी वाला चांदी वायदा शुरुआती कारोबार में करीब एक प्रतिशत गिरावट के साथ खुला और दिन के शुरुआती सत्र में ही निचले स्तर तक पहुंच गया। बाद के कारोबार में मामूली सुधार हुआ, लेकिन कुल मिलाकर निवेशकों का रुझान सतर्क बना रहा और बड़े निवेशकों ने जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने और चांदी पर दबाव स्पष्ट दिखाई दिया। स्पॉट गोल्ड में लगभग डेढ़ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि स्पॉट सिल्वर दो प्रतिशत तक टूट गया। इसके अलावा प्लेटिनम और पैलेडियम जैसी अन्य कीमती धातुओं में भी कमजोरी देखने को मिली। विश्लेषकों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा तो सोना कई वर्षों की सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज कर सकता है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित सख्त मौद्रिक नीति है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई बढ़ने की आशंकाएं मजबूत हुई हैं। ऐसी स्थिति में निवेशकों को उम्मीद है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए आगे भी ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है या उनमें बढ़ोतरी कर सकता है।

    ऊंची ब्याज दरों की संभावना से अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिलती है, जिसका सीधा असर सोने और चांदी जैसी बिना ब्याज वाली परिसंपत्तियों की मांग पर पड़ता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपेक्षाकृत महंगा हो जाता है, जिससे निवेशकों का आकर्षण कम होता है और बिकवाली का दबाव बढ़ने लगता है। यही वजह रही कि सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली कीमती धातुओं में भी इस बार कमजोरी देखने को मिली।

    इस बीच कच्चे तेल के बाजार में भी उतार-चढ़ाव जारी रहा। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की उम्मीदों के बावजूद हालिया मिसाइल हमलों ने क्षेत्रीय तनाव को फिर बढ़ा दिया है। इसके चलते निवेशक फिलहाल किसी बड़े जोखिम वाले निवेश से बचते हुए आर्थिक संकेतकों का इंतजार कर रहे हैं। तेल बाजार में आई नरमी ने भी वैश्विक निवेश धारणा को प्रभावित किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने और चांदी की दिशा काफी हद तक अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगी। विशेष रूप से गैर-कृषि रोजगार, बेरोजगारी दर, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से जुड़े आंकड़े तथा यूरोजोन की मुद्रास्फीति रिपोर्ट निवेशकों की रणनीति तय करेंगे। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत संकेत देती है और फेड की सख्त नीति बरकरार रहती है तो कीमती धातुओं पर दबाव आगे भी जारी रह सकता है। वहीं किसी भी भू-राजनीतिक घटनाक्रम या आर्थिक संकेत में बदलाव से बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने की संभावना बनी रहेगी।

  • सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच सऊदी अरब और फ्रांस ने क्षेत्रीय शांति तथा सुरक्षा को लेकर अपने समन्वय को और मजबूत करने के संकेत दिए हैं। इसी क्रम में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच टेलीफोन पर महत्वपूर्ण बातचीत हुई, जिसमें क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ-साथ दोनों देशों के साझा हितों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

    सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार, बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया ज्ञापन समझौते से जुड़े ताजा घटनाक्रम की समीक्षा की। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी कूटनीतिक प्रयासों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि तनाव कम करने के लिए संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाना आवश्यक है।

    वार्ता में समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी प्रमुख विषय रही। दोनों पक्षों ने अंतरराष्ट्रीय नौवहन की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समुद्री व्यापार को किसी भी प्रकार के तनाव या टकराव से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने क्षेत्रीय विवादों के समाधान के लिए सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता दोहराई।

    बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने सऊदी अरब और फ्रांस के द्विपक्षीय संबंधों की भी समीक्षा की। आर्थिक, रणनीतिक और राजनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समन्वय बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की गई। इसके अलावा साझा वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करते हुए भविष्य में सहयोग को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हस्ताक्षरित ज्ञापन समझौते का उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और संवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था। हालांकि समझौते के बावजूद दोनों देशों के बीच समय-समय पर तनावपूर्ण घटनाएं सामने आती रही हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बनी हुई है।

    हालिया घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच आगे की बातचीत को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों ने फिलहाल आपसी हमलों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों के समाधान के लिए कतर की राजधानी दोहा में वार्ता करने पर सहमति जताई है। पहले यह बैठक स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित थी, लेकिन क्षेत्र में बढ़े तनाव को देखते हुए इसका स्थान बदल दिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्ष तकनीकी स्तर की वार्ताओं को जारी रखते हुए समुद्री मार्गों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और फ्रांस के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुआ यह संवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रमुख देशों के बीच निरंतर कूटनीतिक संपर्क और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। ऐसे प्रयास क्षेत्रीय तनाव कम करने और दीर्घकालिक शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • वैश्विक तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट, आपूर्ति सुधरने से बाजार को राहत, फिर भी पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है नजर

    वैश्विक तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट, आपूर्ति सुधरने से बाजार को राहत, फिर भी पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है नजर

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी का दौर जारी है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव में कमी और प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति सामान्य होने के कारण शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों के दाम दो प्रतिशत तक लुढ़क गए। ऊर्जा बाजार में यह गिरावट ऐसे समय दर्ज की गई है जब निवेशकों का भरोसा आपूर्ति व्यवस्था के स्थिर होने की ओर बढ़ा है। हालांकि पश्चिम एशिया में हाल ही में सामने आई कुछ घटनाओं ने यह संकेत भी दिया है कि बाजार पूरी तरह जोखिम से बाहर नहीं निकला है।

    अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ सप्ताह से उतार-चढ़ाव का मुख्य कारण पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियां रही हैं। पहले संघर्ष और आपूर्ति बाधित होने की आशंका के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था, लेकिन अब हालात अपेक्षाकृत सामान्य होने के बाद बाजार में राहत का माहौल बनता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति सुचारु बनी रहती है तो निकट भविष्य में कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है।

    हालांकि इस राहत के बीच ओमान के निकट एक मालवाहक जहाज पर हुए हमले ने ऊर्जा बाजार को फिर से सतर्क कर दिया। इस घटना के बाद कुछ समय के लिए तेल की कीमतों में तेजी आई, क्योंकि निवेशकों को आशंका थी कि यदि समुद्री सुरक्षा प्रभावित हुई तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है। बाद में बाजार ने स्थिति का आकलन किया और कीमतें दोबारा गिरावट की ओर लौट गईं। इससे स्पष्ट है कि निवेशक अभी भी पश्चिम एशिया की हर गतिविधि पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि, सुरक्षा चुनौती या राजनीतिक तनाव का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई देता है। हाल के दिनों में इस मार्ग से तेल टैंकरों की आवाजाही में सुधार होने से आपूर्ति बाधित होने की आशंका काफी कम हुई है, जिससे कीमतों पर दबाव बना है।

    सप्ताहभर के प्रदर्शन पर नजर डालें तो प्रमुख वैश्विक बेंचमार्क में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि बाजार फिलहाल आपूर्ति की स्थिति को लेकर पहले की तुलना में अधिक आश्वस्त है। फिर भी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि क्षेत्रीय तनाव दोबारा बढ़ता है या समुद्री मार्गों में किसी प्रकार की बाधा आती है तो कीमतों में फिर तेजी लौट सकती है।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट सकारात्मक मानी जाती है। इससे आयात लागत कम हो सकती है, जिसका असर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है। साथ ही परिवहन, विनिर्माण और ऊर्जा पर निर्भर उद्योगों को भी लागत में राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान लंबे समय तक बना रहता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव देश की आर्थिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है।

    भारतीय कच्चे तेल बास्केट की औसत कीमतों में भी हाल के समय में उल्लेखनीय कमी आई है। यह संकेत देता है कि वैश्विक बाजार में आई नरमी का असर भारत के आयात बिल पर भी पड़ रहा है। ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार आने वाले समय में यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें नियंत्रित रहती हैं तो इससे विदेशी मुद्रा व्यय में कमी और आर्थिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    फिलहाल वैश्विक तेल बाजार राहत और सतर्कता के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है। एक ओर आपूर्ति सामान्य होने से कीमतों में गिरावट का माहौल बना है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया की घटनाएं यह याद दिला रही हैं कि ऊर्जा बाजार अभी भी भू-राजनीतिक जोखिमों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय हालात, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक मांग की दिशा ही कच्चे तेल की कीमतों का अगला रुख तय करेगी।

  • चीन ने 10 अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर लगाया निर्यात प्रतिबंध, 46 फर्मों की खरीद पर भी रोक

    चीन ने 10 अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर लगाया निर्यात प्रतिबंध, 46 फर्मों की खरीद पर भी रोक

    बीजिंग। अमेरिका और चीन के बीच जारी कारोबारी एवं रणनीतिक टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। चीन ने अमेरिका की हालिया कार्रवाई के जवाब में 10 अमेरिकी सैन्य क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों पर निर्यात प्रतिबंध लगाने के साथ 46 रक्षा कंपनियों के उत्पादों की सरकारी खरीद पर भी रोक लगा दी है।

    चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने सोमवार को घोषणा करते हुए कहा कि देश की कंपनियां अब इन 10 अमेरिकी फर्मों को दोहरे उपयोग (डुअल-यूज) वाली वस्तुओं का निर्यात नहीं करेंगी। ऐसी वस्तुएं वे होती हैं जिनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

    राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उठाया कदम

    चीन का कहना है कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा और अमेरिकी सरकार द्वारा चीनी सैन्य कंपनियों की सूची का दायरा बढ़ाने के जवाब में लिया गया है। प्रतिबंधित अमेरिकी कंपनियों में सैन्य ड्रोन निर्माण और दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हैं।

    वहीं, चीन के वित्त मंत्रालय ने सरकारी विभागों और संस्थानों को 46 अमेरिकी रक्षा कंपनियों से उत्पाद खरीदने पर रोक लगाने का निर्देश दिया है। इनमें लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन मिसाइल्स एंड डिफेंस जैसी प्रमुख रक्षा कंपनियां भी शामिल हैं। हालांकि, चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि अत्यावश्यक वस्तुओं के लिए विशेष निर्यात अनुमति का आवेदन किया जा सकता है।

    अमेरिकी सूची में शामिल हुईं अलीबाबा और बायजू

    इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी रक्षा विभाग ने कई चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों को उन संस्थाओं की सूची में जोड़ा था, जिनके बारे में अमेरिका का दावा है कि उनके चीन की सेना से संबंध हैं। इस सूची में अलीबाबा और बायजू जैसी कंपनियों के नाम भी शामिल किए गए।

    बायजू ने अमेरिकी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। अमेरिकी सूची में शामिल होने के बाद इन कंपनियों के लिए अमेरिकी सेना से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करना संभव नहीं रहेगा। चीन ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा था कि यह कार्रवाई मई में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच बनी सहमति की भावना के विपरीत है।

    तकनीक और व्यापार को लेकर जारी है खींचतान

    दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव लंबे समय से जारी है। इसका केंद्र आयात शुल्क, उन्नत तकनीक और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर कई बार अतिरिक्त आयात शुल्क लगाए हैं, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी वस्तुओं और कृषि उत्पादों पर प्रतिशोधात्मक शुल्क लागू किए। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते दोनों देशों ने एक-दूसरे पर कई निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए हैं।