Tag: Geopolitics

  • तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी

    तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में तीस्ता नदी परियोजना को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। ढाका में विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद यह चर्चा और बढ़ गई है कि भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल-बंटवारा विवाद अब नए राजनीतिक हालात में आगे बढ़ सकता है।

    बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने उम्मीद जताई है कि भारत के साथ तीस्ता समझौते पर जल्द प्रगति हो सकती है। उन्होंने कहा कि पहले यह मुद्दा भारत के अंदर राज्यों की राजनीतिक स्थिति के कारण अटका हुआ था, लेकिन अब हालात बदलने से बातचीत आगे बढ़ने की संभावना है। उनके बयान के बाद इस मुद्दे ने एक बार फिर सुर्खियां पकड़ ली हैं।

    तीस्ता नदी, जो सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है, दोनों देशों के लिए कृषि और सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। वर्षों से इसके पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है, जिससे यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है।

    इसी बीच चीन की भूमिका भी लगातार चर्चा में है। बांग्लादेश ने तीस्ता नदी पर एक बड़े जलाशय और बांध परियोजना की योजना बनाई है, जिसके लिए चीन ने वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की पेशकश की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन की एक्सिम बैंक इस परियोजना को फंड कर सकती है। इससे इस परियोजना का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।

    भारत के लिए यह मामला सिर्फ जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी अहम है। जिस क्षेत्र में यह परियोजना प्रस्तावित है, वह भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, जिसे “चिकन नेक” कहा जाता है। यह संकरा गलियारा भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति, खासकर चीन की भागीदारी बढ़ती है, तो यह भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकता है। इसी वजह से भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि तीस्ता विवाद पर भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत की संभावना बनी हुई है, लेकिन चीन की बढ़ती रुचि ने इस मुद्दे को केवल जल बंटवारे से आगे बढ़ाकर एक बड़े भू-राजनीतिक सवाल में बदल दिया है।

  • वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, जहां कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता की बजाय उतार-चढ़ाव का दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही रणनीतिक समुद्री मार्गों में कुछ राहत मिले, लेकिन वैश्विक बाजार पर इसका तात्कालिक असर सीमित रहेगा।

    विश्लेषकों के अनुसार, शिपिंग व्यवस्था, रिफाइनरी संचालन और टैंकरों की उपलब्धता पर पड़ रहे दबाव के कारण तेल की सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पा रही है। इन बाधाओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बड़े सुधार की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।

    रिपोर्ट में यह भी अनुमान जताया गया है कि आने वाले समय में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकती है। इसका मतलब है कि ऊर्जा बाजार को मध्यम अवधि में सप्लाई की कमी और भू-राजनीतिक तनाव दोनों का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है, क्योंकि तेल की कीमतों का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और महंगाई पर पड़ता है।

    हाल के दिनों में तेल बाजार में तेजी भी देखी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रही है, जबकि अन्य बेंचमार्क भी इसी स्तर के आसपास मजबूती दिखा रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़त केवल मांग और आपूर्ति के असंतुलन का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता की भी अहम भूमिका है।

    इसके अलावा, उत्पादन में भी गिरावट देखने को मिली है। प्रमुख तेल उत्पादक समूह द्वारा हाल के महीनों में उत्पादन में कटौती के कारण वैश्विक आपूर्ति और सीमित हो गई है। उत्पादन में इस कमी ने कीमतों को और अधिक मजबूती दी है और बाजार में अस्थिरता को बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सिर्फ समुद्री मार्गों के सामान्य होने से बाजार तुरंत स्थिर नहीं होगा। लॉजिस्टिक चुनौतियां, सप्लाई चेन की बाधाएं और उत्पादन में असंतुलन आने वाले महीनों तक जारी रह सकते हैं। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर देखने को मिलेगा।

    कुल मिलाकर, कच्चे तेल का बाजार फिलहाल एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जहां हर भू-राजनीतिक घटना कीमतों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं पूरी तरह हल नहीं होतीं, तब तक तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद कम ही दिखाई देती है।

  • म्यांमार के खनिजों पर चीन की पकड़ से बढ़ी भारत की चिंता, गृहयुद्ध में बदला भू-राजनीतिक खेल

    म्यांमार के खनिजों पर चीन की पकड़ से बढ़ी भारत की चिंता, गृहयुद्ध में बदला भू-राजनीतिक खेल



    नई दिल्ली। म्यांमार 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से लगातार गृहयुद्ध जैसी स्थिति में फंसा हुआ है, जहां सेना और विभिन्न जातीय सशस्त्र समूहों के बीच संघर्ष जारी है। इस अस्थिर माहौल के बीच देश के रणनीतिक खनिज संसाधनों, खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर चीन की बढ़ती भूमिका ने क्षेत्रीय भू-राजनीति को और जटिल बना दिया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, म्यांमार के उत्तरी राज्यों जैसे कचीन और शान में स्थित खनिज क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में रेयर अर्थ तत्वों का उत्पादन होता है, जिनका वैश्विक सप्लाई चेन में अहम स्थान है। इन खनिजों का बड़ा हिस्सा चीन को निर्यात होता है, क्योंकि चीन दुनिया में रेयर अर्थ प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा केंद्र है।

    विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में सिर्फ आर्थिक निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि वह स्थानीय सशस्त्र समूहों और सीमावर्ती नेटवर्क के जरिए अपनी रणनीतिक पकड़ भी बनाए हुए है। इससे म्यांमार के भीतर संघर्ष और अधिक गहरा हुआ है और सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता बनी हुई है।

    भारत के लिए यह स्थिति इसलिए संवेदनशील है क्योंकि म्यांमार की करीब 1,600 किलोमीटर लंबी सीमा नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश से लगती है। इस क्षेत्र में पहले से ही उग्रवाद और तस्करी की चुनौतियां रही हैं, जो अब और जटिल हो गई हैं।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, म्यांमार की अस्थिरता और चीन की सक्रिय मौजूदगी भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं जैसे त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट पर भी असर डाल रही है।

    कुल मिलाकर, म्यांमार का संकट अब केवल आंतरिक गृहयुद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और संसाधन प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है, जिसमें भारत, चीन और स्थानीय समूहों के हित सीधे जुड़े हुए हैं।

  • वेस्ट एशिया में तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, बोले- ईरान विवाद जल्द होगा खत्म; परमाणु मुद्दे पर अमेरिका का सख्त रुख

    वेस्ट एशिया में तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, बोले- ईरान विवाद जल्द होगा खत्म; परमाणु मुद्दे पर अमेरिका का सख्त रुख



    नई दिल्ली। 28 फरवरी से जारी संघर्ष के बीच क्षेत्र में हालात अब भी बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं, हालांकि युद्धविराम के प्रयासों और अमेरिका-ईरान बातचीत की कोशिशों ने कूटनीतिक हलचल बढ़ा दी है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान विवाद जल्द सुलझ सकता है।

    ट्रंप का दावा: जल्द खत्म होगा विवाद
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने अपने समर्थकों से बातचीत में कहा कि ईरान के साथ युद्ध जैसी स्थिति जल्द खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है और इसी वजह से कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।

    ट्रंप ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि यह कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है और अधिकतर लोग इसे सही मानते हैं।

    क्षेत्र में लगातार हिंसा जारी
    हालात अब भी गंभीर बने हुए हैं

    दक्षिणी तेहरान में अमेरिकी-इस्राइली हमलों में 12 लोगों की मौत

    लेबनान में पिछले 24 घंटों में 33 लोगों की मौत, जिनमें एक किशोर भी शामिल

    लेबनान से उत्तरी इस्राइल पर रॉकेट हमले में 1 व्यक्ति की मौत और 2 घायल

    ईरानी हमले में बहरीन में मोरक्को के सैनिक की मौत और कई घायल

    ईरान का पलटवार और बयान
    ईरान की संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने ट्रंप के दावों को खारिज करते हुए उन्हें अफवाह बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान वैश्विक वित्तीय और तेल बाजार को प्रभावित करने के लिए दिए जा रहे हैं।उन्होंने अमेरिकी सैन्य अभियानों पर तंज कसते हुए इन्हें “ऑपरेशन ट्रस्ट मी ब्रो” और “ऑपरेशन फॉक्सियोस” कहा और कहा कि ये रणनीतियां विफल साबित हो रही हैं।


    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जर्मनी के राष्ट्रपति के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें अमेरिका-इस्राइल की कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया था।

    वेस्ट एशिया में हालात अभी भी विस्फोटक बने हुए हैं। एक तरफ सैन्य टकराव और जवाबी हमले जारी हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत की उम्मीदें भी जिंदा हैं, जिससे आने वाले दिनों में बड़ा बदलाव संभव माना जा रहा है।

  • वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जहां कई देशों में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है वहीं भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वृद्धि दर्ज की जा रही है इसके बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिलती नजर आ रही है

    दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाला है आंकड़ों के अनुसार यूएई में डीजल की कीमतों में लगभग 85 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी डीजल की कीमतें 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ी हैं वहीं कनाडा पाकिस्तान फ्रांस श्रीलंका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह वृद्धि 35 से 50 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से भू राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण मानी जा रही है

    पेट्रोल की कीमतों का रुझान भी इसी प्रकार का रहा है पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतों में सबसे अधिक लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है जबकि अमेरिका और यूएई में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है अन्य देशों जैसे कनाडा श्रीलंका और चीन में भी पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है हालांकि ब्राजील और रूस जैसे देशों में यह वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है

    इसके विपरीत भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्ष की शुरुआत के स्तर पर ही स्थिर बनी हुई हैं डीजल की कीमत लगभग 87 रुपए प्रति लीटर और पेट्रोल की कीमत करीब 94 रुपए प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है यह स्थिरता ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता अपने चरम पर है और कई देश महंगाई के दबाव से जूझ रहे हैं

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कीमतों को नियंत्रित रखने में सरकारी नीतियों और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान है तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से ईंधन की खरीद इस तरह कर रही हैं जिससे खुदरा कीमतों को स्थिर रखा जा सके हालांकि इसके चलते कंपनियों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है

    आर्थिक विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ती हैं तो भारतीय तेल कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है अनुमान के अनुसार यदि कीमतें 135 से 165 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती हैं तो पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 18 रुपए और डीजल पर लगभग 35 रुपए तक का नुकसान हो सकता है इसके अलावा कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से लागत में करीब 6 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हो सकती है

    कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि जहां वैश्विक बाजार में अस्थिरता और महंगाई का दबाव बढ़ रहा है वहीं भारत में संतुलित नीतियों और प्रबंधन के चलते ईंधन की कीमतों को स्थिर बनाए रखने में सफलता मिली है यह न केवल उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है बल्कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक साबित हो रही है

  • बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती

    बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती


    नई दिल्ली।  भारत की वैश्विक कूटनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। एस. जयशंकर दो दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हो रहे हैं, जहां वे जी-7 विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल भारत-फ्रांस संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी और प्रभावशाली बनाएगा।

    फ्रांस में होगी अहम कूटनीतिक बैठक

    विदेश मंत्री जयशंकर फ्रांस के अब्बे डेस वॉक्स-डी-सेर्ने में आयोजित बैठक में शामिल होंगे। उन्हें फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने आमंत्रित किया है। इस दौरान जयशंकर कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी कर सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    वैश्विक मुद्दों पर होगी गहन चर्चा

    इस जी-7 बैठक में दुनिया के कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसमें यूक्रेन में जारी युद्ध, पुनर्निर्माण की योजनाएं, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। साथ ही, सप्लाई चेन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखने पर भी विचार-विमर्श होगा।

    यूक्रेन संकट पर विशेष फोकस

    बैठक में यूक्रेन के पुनर्निर्माण को लेकर खास सत्र आयोजित होंगे। इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी, ह्यूमैनिटेरियन डीमाइनिंग और फंडिंग सिस्टम पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी जोर रहेगा, जो यूक्रेन की आर्थिक बहाली में मदद कर सकते हैं।

    समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर

    वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद अहम है। इस बैठक में मैरीटाइम रूट की सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाने के प्रयास किए जाएंगे।

    ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम में सुधार की पहल

    जी-7 देश वैश्विक शासन प्रणाली को और आधुनिक बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसमें ऐसे नए ढांचे तैयार करने पर जोर होगा, जो बदलती वैश्विक चुनौतियों जैसे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़े जोखिमो का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

    भारत समेत कई देशों की भागीदारी

    इस बैठक की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ जी-7 देश ही नहीं, बल्कि भारत, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ब्राजील और यूक्रेन जैसे कई साझेदार देश भी शामिल होंगे। यह जी-7 की बढ़ती आउटरीच और सहयोग की नीति को दर्शाता है।

    इवियन समिट की तैयारी का मंच

    यह बैठक जून में होने वाले जी-7 लीडर्स समिट (इवियन समिट) की तैयारी का अहम चरण मानी जा रही है। यहां होने वाली चर्चाएं भविष्य की वैश्विक रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़

    अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़


    नई दिल्ली:अमेरिका और इज़रायल का रिश्ता आज के समय में केवल दोस्ती नहीं बल्कि एक गहरा रणनीतिक गठबंधन बन चुका है, जिसे वैश्विक राजनीति का सबसे मजबूत समीकरण माना जाता है, यह रिश्ता केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि सुरक्षा, तकनीक, खुफिया जानकारी और आर्थिक हितों पर आधारित है, अमेरिका इज़रायल को मध्य पूर्व में अपना एक ऐसा मजबूत ठिकाना मानता है जो पूरे क्षेत्र में उसके हितों की रक्षा करता है, इज़रायल अमेरिका के लिए एक ऐसा सहयोगी है जो उसके रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

    मध्य पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां तेल और गैस के विशाल भंडार हैं, वहां इज़रायल अमेरिका के लिए एक सुरक्षा ढाल की तरह काम करता है, ईरान जैसे देशों के साथ तनाव के दौरान इज़रायल न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के हितों की भी सुरक्षा करता है, यही कारण है कि अमेरिका इज़रायल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है, हालांकि यह सहायता अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही वापस मिल जाती है क्योंकि इज़रायल इन पैसों से अमेरिकी हथियार खरीदता है

    युद्ध के मैदान में इन हथियारों के उपयोग से अमेरिका को वास्तविक समय का डेटा मिलता है जिससे वह अपने हथियारों को और उन्नत बना सकता है, मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम में भी अमेरिका की अहम भागीदारी है, यह सहयोग दोनों देशों को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाता है

    खुफिया जानकारी के क्षेत्र में भी इज़रायल अमेरिका का बेहद भरोसेमंद साझेदार है, इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का नेटवर्क दुनिया के कई हिस्सों में फैला हुआ है, खासकर इस्लामिक देशों और ईरान के अंदर इसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है, इस एजेंसी से मिलने वाली जानकारियां अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, जिससे वह अपने देश पर संभावित खतरों को समय रहते रोक पाता है

    तकनीकी और आर्थिक साझेदारी भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है, इज़रायल को स्टार्टअप नेशन कहा जाता है, जहां दुनिया की बड़ी कंपनियां जैसे इंटेल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट अपने रिसर्च सेंटर स्थापित कर चुकी हैं, इज़रायल और अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का गहरा संबंध है, जिसने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है

    अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी इज़रायल का प्रभाव साफ देखा जा सकता है, अमेरिकी इज़रायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी जैसी शक्तिशाली लॉबी वहां की विदेश नीति को प्रभावित करती है, कोई भी अमेरिकी नेता इज़रायल के खिलाफ खुलकर नहीं जा सकता क्योंकि इससे उसका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है

    इसके अलावा अमेरिका में एक बड़ा ईसाई वर्ग इज़रायल को धार्मिक दृष्टिकोण से समर्थन देता है, वे इसे अपनी आस्था का हिस्सा मानते हैं और इज़रायल की सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हैं, यह धार्मिक और सांस्कृतिक समर्थन भी इस रिश्ते को मजबूत बनाता है

    इतिहास की बात करें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप से आए कई यहूदी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को शरण दी, जिनमें अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्होंने परमाणु अनुसंधान और मैनहट्टन प्रोजेक्ट की नींव रखने में भूमिका निभाई, एडवर्ड टेलर और जॉन वॉन न्यूमैन जैसे वैज्ञानिकों ने अमेरिका को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने में योगदान दिया

    ऑपरेशन पेपरक्लिप के जरिए भी अमेरिका ने जर्मन वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़ा, जिससे अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक में बड़ी प्रगति हुई, इस तरह यह रिश्ता केवल आज का नहीं बल्कि दशकों पुरानी रणनीतिक सोच का परिणाम है

  • बांग्लादेश चुनाव पर भारत की नजर, BNP या जमात? नई दिल्ली के सामने भरोसे और ‘तिहरे संकट’ की चुनौती

    बांग्लादेश चुनाव पर भारत की नजर, BNP या जमात? नई दिल्ली के सामने भरोसे और ‘तिहरे संकट’ की चुनौती


    नई दिल्ली । बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाला आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का मामला नहीं है बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव भी है। इस बार चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है जिससे मतदाता दो वोट डालेंगे एक सरकार के लिए और दूसरा जनमत संग्रह के मुद्दे पर। संकेत मिल रहे हैं कि चुनावी परिणाम इस्लामवादी दलों की ओर झुक सकते हैं जो भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है।

    अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन हिंसा हड़तालें और प्रशासनिक फेरबदल ने माहौल को अनिश्चित बना दिया है। भारत के लिए यह स्थिति संवेदनशील है क्योंकि लंबी साझा सीमा पूर्वोत्तर की सुरक्षा व्यापार कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे तौर पर ढाका की राजनीति से जुड़ी हैं।

    अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मुख्य रूप से तीन संभावनाओं तक सिमट गया है बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार बीएनपी-जमात गठबंधन या जमात-ए-इस्लामी का प्रभुत्व। कुछ सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है। इनोविजन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार बीएनपी को 52.8% वोट शेयर मिल सकता है हालांकि अन्य सर्वे इसे कांटे की टक्कर बता रहे हैं। निर्णायक भूमिका अवामी लीग के पारंपरिक मतदाताओं की होगी।

    भारत के नीति-निर्माताओं का आकलन है कि बीएनपी नेता तारिक रहमान के साथ काम करना अपेक्षाकृत व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। हालांकि अतीत में बीएनपी सरकारों पर पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद को हवा देने के आरोप लगे थे फिर भी उसे एक मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी और व्यवहारिक दल माना जाता है। भारत की प्राथमिकता स्थिर और निर्वाचित सरकार है भले ही वह पूर्णतः अनुकूल न हो।

    दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी का उभार नई दिल्ली के लिए तिहरे संकट की आशंका पैदा करता है। पहला सीमापार उग्रवाद और कट्टरपंथ के फिर से सक्रिय होने का खतरा; दूसरा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से कथित समीकरण; और तीसरा चीन के साथ बढ़ती नजदीकी जिसमें रणनीतिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच की चर्चा शामिल है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया अस्थिरता के दौरान जमात ने प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत की है जो चुनावी लाभ में बदल सकती है।

    भारत की चिंता यह भी है कि 2024 की उथल-पुथल के बाद कुछ ऐसे तत्व रिहा हुए जिन पर पहले कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप थे। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि क्षेत्रीय अस्थिरता का असर सीमाओं के पार भी पड़ सकता है।

    फिर भी भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से व्यवहारिक रही है। नई दिल्ली ने ढाका में हर तरह की सरकार के साथ काम किया है और आगे भी ऐसा करने की संभावना है। लेकिन पिछले 18 महीनों में जिस धैर्य और संतुलन के साथ भारत ने स्थिति संभाली है उसकी परीक्षा इस चुनाव के नतीजों के बाद हो सकती है।

    अंततः बांग्लादेश का यह चुनाव केवल ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेगा बल्कि यह तय करेगा कि भारत-बांग्लादेश संबंध सहयोग स्थिरता और संतुलन की राह पर आगे बढ़ेंगे या नई रणनीतिक चुनौतियों का सामना करेंगे।

  • ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते

    ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते


    नई दिल्ली।ट्रम्प का बयान कनाडा अमेरिका की बजाय चीन की ओर झुक रहा है। ट्रम्प ने कहा कि यह उत्तर अमेरिका की सामूहिक सुरक्षा के लिए खतरा है।

    व्यापार विवाद

    कनाडा-चीन व्यापार समझौते में चीनी ईवी पर टैरिफ 100% से घटाकर 6.1% किया गया।

    चीन ने कनाडा के कृषि उत्पादों पर जवाबी शुल्क कम करने पर सहमति दी।

    अमेरिका इसे अपने हितों के खिलाफ मान रहा है।

    गोल्डन डोम प्रोजेक्ट पर मतभेद

    अमेरिका का मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट 175 अरब डॉलर इजराइल के आयरन डोम पर आधारित है।

    ट्रम्प इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए अहम मानते हैं, जबकि कार्नी इसे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ाने वाला कदम बताते हैं।

    दावोस फोरम में तल्खी

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कार्नी ने बड़ी शक्तियों के दबदबे की आलोचना की।

    ट्रम्प ने इसे अमेरिका के प्रति कृतज्ञता की कमी बताया।

    पूर्व विवाद और संभावित भविष्य

    ग्रीनलैंड और नाटो मुद्दों पर दोनों नेताओं के पहले भी मतभेद रहे।

    विशेषज्ञों के अनुसार, चीन, रक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन के मुद्दों से अमेरिका-कनाडा संबंध और जटिल हो सकते हैं।

  • जम्मू-कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन का बड़ा बयान, PoK समेत पूरा..भारत के साथ होना चाहिए

    जम्मू-कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन का बड़ा बयान, PoK समेत पूरा..भारत के साथ होना चाहिए


    नई दिल्ली। ब्रिटेन के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने जम्मू-कश्मीर को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला PoK भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। ब्लैकमैन ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने की उनकी मांग नई नहीं है, बल्कि यह तीन दशक से अधिक पुरानी है। उनका रुख 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के फैसले से प्रेरित नहीं है, बल्कि 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद से उन्होंने इसे अपनाया था।
    जयपुर के कॉन्स्टिट्यूशनल क्लब में आयोजित एक हाई-टी कार्यक्रम में बोलते हुए ब्लैकमैन ने कहा कि उनका यह दृष्टिकोण 1992 में बन गया था, जब कश्मीरी पंडितों को उनके पैतृक घरों से बाहर निकाल दिया गया था। उन्होंने बताया कि उस समय उन्होंने ब्रिटेन में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय पर ध्यान आकर्षित करने के लिए कई प्रयास किए थे। ब्लैकमैन ने कहा, “हमने उस समय एक बड़ी बैठक आयोजित की थी ताकि यह बताया जा सके कि धर्म के आधार पर लोगों को उनके घरों से निकालना एक गंभीर अन्याय है।
    मैं हमेशा से मानता आया हूं कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत के शासन के तहत ही सुरक्षित और स्थिर रहेगा।”

    बॉब ब्लैकमैन ने इस क्षेत्र में आतंकवाद की लगातार निंदा की है और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले हिस्सों की आलोचना की है। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा कहा है कि पूरे जम्मू और कश्मीर रियासत को भारत के शासन में शामिल किया जाना चाहिए। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान के प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को रोकना चाहिए।”

    उन्होंने पहलागाम में हुए आतंकी हमले की भी कड़ी निंदा की, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। ब्लैकमैन ने कहा कि ब्रिटेन की सरकार को आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

    उनका मानना है कि भारत और पश्चिमी देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना जरूरी है, ताकि क्षेत्र में स्थिरता और शांति कायम रह सके।

    इससे पहले, जून में ऑपरेशन सिंदूर ग्लोबल आउटरीच के दौरान ब्लैकमैन ने पाकिस्तान को “नाकाम देश” करार दिया और वहां के नागरिक-सैन्य संतुलन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संस्थान कार्यरत हैं या सेना के जनरल शासन कर रहे हैं।

    ब्लैकमैन ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान से भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भारत के साथ एकजुट होना अनिवार्य है।

    ब्लैकमैन का यह बयान दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का रुख जम्मू-कश्मीर और आतंकवाद के मुद्दों पर मजबूत समर्थन पा रहा है। उनका यह दृष्टिकोण केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि मानवाधिकार और शांति के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ जोड़ना न केवल न्यायसंगत है, बल्कि यह क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक जरूरी कदम भी है।