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  • ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते

    ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते


    नई दिल्ली।ट्रम्प का बयान कनाडा अमेरिका की बजाय चीन की ओर झुक रहा है। ट्रम्प ने कहा कि यह उत्तर अमेरिका की सामूहिक सुरक्षा के लिए खतरा है।

    व्यापार विवाद

    कनाडा-चीन व्यापार समझौते में चीनी ईवी पर टैरिफ 100% से घटाकर 6.1% किया गया।

    चीन ने कनाडा के कृषि उत्पादों पर जवाबी शुल्क कम करने पर सहमति दी।

    अमेरिका इसे अपने हितों के खिलाफ मान रहा है।

    गोल्डन डोम प्रोजेक्ट पर मतभेद

    अमेरिका का मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट 175 अरब डॉलर इजराइल के आयरन डोम पर आधारित है।

    ट्रम्प इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए अहम मानते हैं, जबकि कार्नी इसे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ाने वाला कदम बताते हैं।

    दावोस फोरम में तल्खी

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कार्नी ने बड़ी शक्तियों के दबदबे की आलोचना की।

    ट्रम्प ने इसे अमेरिका के प्रति कृतज्ञता की कमी बताया।

    पूर्व विवाद और संभावित भविष्य

    ग्रीनलैंड और नाटो मुद्दों पर दोनों नेताओं के पहले भी मतभेद रहे।

    विशेषज्ञों के अनुसार, चीन, रक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन के मुद्दों से अमेरिका-कनाडा संबंध और जटिल हो सकते हैं।

  • जम्मू-कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन का बड़ा बयान, PoK समेत पूरा..भारत के साथ होना चाहिए

    जम्मू-कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन का बड़ा बयान, PoK समेत पूरा..भारत के साथ होना चाहिए


    नई दिल्ली। ब्रिटेन के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने जम्मू-कश्मीर को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला PoK भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। ब्लैकमैन ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने की उनकी मांग नई नहीं है, बल्कि यह तीन दशक से अधिक पुरानी है। उनका रुख 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के फैसले से प्रेरित नहीं है, बल्कि 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद से उन्होंने इसे अपनाया था।
    जयपुर के कॉन्स्टिट्यूशनल क्लब में आयोजित एक हाई-टी कार्यक्रम में बोलते हुए ब्लैकमैन ने कहा कि उनका यह दृष्टिकोण 1992 में बन गया था, जब कश्मीरी पंडितों को उनके पैतृक घरों से बाहर निकाल दिया गया था। उन्होंने बताया कि उस समय उन्होंने ब्रिटेन में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय पर ध्यान आकर्षित करने के लिए कई प्रयास किए थे। ब्लैकमैन ने कहा, “हमने उस समय एक बड़ी बैठक आयोजित की थी ताकि यह बताया जा सके कि धर्म के आधार पर लोगों को उनके घरों से निकालना एक गंभीर अन्याय है।
    मैं हमेशा से मानता आया हूं कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत के शासन के तहत ही सुरक्षित और स्थिर रहेगा।”

    बॉब ब्लैकमैन ने इस क्षेत्र में आतंकवाद की लगातार निंदा की है और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले हिस्सों की आलोचना की है। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा कहा है कि पूरे जम्मू और कश्मीर रियासत को भारत के शासन में शामिल किया जाना चाहिए। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान के प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को रोकना चाहिए।”

    उन्होंने पहलागाम में हुए आतंकी हमले की भी कड़ी निंदा की, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। ब्लैकमैन ने कहा कि ब्रिटेन की सरकार को आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

    उनका मानना है कि भारत और पश्चिमी देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना जरूरी है, ताकि क्षेत्र में स्थिरता और शांति कायम रह सके।

    इससे पहले, जून में ऑपरेशन सिंदूर ग्लोबल आउटरीच के दौरान ब्लैकमैन ने पाकिस्तान को “नाकाम देश” करार दिया और वहां के नागरिक-सैन्य संतुलन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संस्थान कार्यरत हैं या सेना के जनरल शासन कर रहे हैं।

    ब्लैकमैन ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान से भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भारत के साथ एकजुट होना अनिवार्य है।

    ब्लैकमैन का यह बयान दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का रुख जम्मू-कश्मीर और आतंकवाद के मुद्दों पर मजबूत समर्थन पा रहा है। उनका यह दृष्टिकोण केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि मानवाधिकार और शांति के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ जोड़ना न केवल न्यायसंगत है, बल्कि यह क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक जरूरी कदम भी है।

  • ताइवान ने दिया जवाब, काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज लॉन्च; थल, जल और वायुसेना हाई अलर्ट पर

    ताइवान ने दिया जवाब, काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज लॉन्च; थल, जल और वायुसेना हाई अलर्ट पर


    नई दिल्ली।/बीजिंग।ताइवान जलडमरूमध्य में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। चीन ने ताइवान को पांच दिशाओं से घेरते हुए बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी PLA ने ताइवान के उत्तर, उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और पूर्वी तट के आसपास अलग-अलग सैन्य जोन बनाकर लाइव-फायर ड्रिल शुरू की है। इस कदम को हाल के वर्षों का सबसे आक्रामक सैन्य अभ्यास माना जा रहा है।चीन की इस कार्रवाई के जवाब में ताइवान ने भी तत्काल काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज शुरू कर दी है। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उसकी थलसेना, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह अलर्ट पर रखा गया है और चीनी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    पांच दिशाओं से सैन्य घेराबंदी

    चीनी सेना ने इस सैन्य अभियान को ‘जस्टिस मिशन 2025’ नाम दिया है। PLA के मुताबिक, इस अभ्यास में नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स को एक साथ तैनात किया गया है। युद्धाभ्यास में अत्याधुनिक युद्धपोत, फाइटर जेट, बॉम्बर विमान, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस ड्रिल का उद्देश्य समुद्री और हवाई लक्ष्यों पर हमला करने, बंदरगाहों की नाकाबंदी, रणनीतिक ठिकानों को निष्क्रिय करने और बाहरी हस्तक्षेप को रोकने की तैयारी बताया जा रहा है। इसके साथ ही चीनी कोस्ट गार्ड को भी ताइवान के आसपास के समुद्री क्षेत्र में सक्रिय कर दिया गया है।

    ताइवान की जवाबी तैयारी

    ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि वह किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। ताइवान की सेना ने कॉम्बैट-रेडीनेस ड्रिल शुरू की है, जिसमें वायु रक्षा प्रणाली, नौसैनिक गश्त और थलसेना की त्वरित तैनाती शामिल है।ताइवान कोस्ट गार्ड ने चीन पर आरोप लगाया है कि इस सैन्य अभ्यास से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है। कोस्ट गार्ड के अनुसार, चीनी गतिविधियों के कारण समुद्री जहाजों की आवाजाही और मछुआरों की सुरक्षा पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।

    पूर्वी तट बना सबसे अहम मोर्चा

    अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार चीन का सैन्य अभ्यास पहले की तुलना में अधिक व्यापक और ताइवान के बेहद करीब किया जा रहा है। खास तौर पर ताइवान के पूर्वी तट के पास बनाए गए सैन्य जोन को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि संकट की स्थिति में इसी दिशा से ताइवान को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से सैन्य या मानवीय मदद मिल सकती है। ऐसे में पूर्वी तट पर दबाव बनाना चीन की रणनीतिक प्राथमिकता माना जा रहा है।

    अमेरिका-ताइवान हथियार सौदे से बढ़ा तनाव

    चीन के इस सैन्य अभ्यास के पीछे अमेरिका और ताइवान के बीच हाल ही में हुई बड़ी हथियार डील को अहम कारण माना जा रहा है। अमेरिका ने ताइवान को करीब 11.1 अरब डॉलर के रक्षा उपकरण बेचने की घोषणा की है, जो अब तक का सबसे बड़ा रक्षा पैकेज बताया जा रहा है।इस पैकेज में उन्नत मिसाइल सिस्टम, रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सैन्य तकनीक शामिल है। चीन इसे अपनी संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप मानता है। इसी नाराजगी के चलते चीन ने 26 दिसंबर को अमेरिका की 20 डिफेंस कंपनियों और 10 वरिष्ठ अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था।

    ताइवान को लेकर चीन का रुख

    चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और किसी भी तरह के अलगाव या विदेशी समर्थन का कड़ा विरोध करता है। वहीं, ताइवान खुद को एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक इकाई मानता है।भौगोलिक रूप से ताइवान जापान से सिर्फ 110 किलोमीटर दूर है। यह क्षेत्र जापान के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से होकर उसका बड़ा समुद्री व्यापार मार्ग गुजरता है और जापान में अमेरिका का सबसे बड़ा विदेशी सैन्य अड्डा भी मौजूद है।मौजूदा हालात ने पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

  • जयशंकर ने PAK सेना पर साधा निशाना, मुनीर को लेकर कहा – कई समस्याओं की जड़ वहीं है, भड़का पाक

    जयशंकर ने PAK सेना पर साधा निशाना, मुनीर को लेकर कहा – कई समस्याओं की जड़ वहीं है, भड़का पाक


    नई दिल्‍ली । विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मीडिया समिट में एक बार फिर पाकिस्तान की पोल खोल दी। उन्होंने कहा कि भारत की अधिकांश समस्याओं की जड़ पाकिस्तान की सेना है और उसका आतंकी समूहों को समर्थन देना भी इसका हिस्सा है। पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए जयशंकर ने कहा, ‘जैसे अच्छे आतंकवादी और बुरे आतंकवादी होते हैं, वैसे ही कुछ अच्छे सैन्य नेता भी होते हैं और कुछ शायद उतने अच्छे नहीं।’ यह टिप्पणी पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की ओर इशारा मानी जा रही है।

    एस जयशंकर की ओर से सच्चाई उजागर करने पर पाकिस्तान को मिर्ची लगी है। पाकिस्तान ने कहा कि उसके सभी संस्थान राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत स्तंभ हैं। जयशंकर की टिप्पणियों पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, ‘पाकिस्तान भारतीय विदेश मंत्री की भड़काऊ, बेबुनियाद और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज और निंदा करता है।’ अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तान एक जिम्मेदार देश है और उसके सभी संस्थान, जिनमें सशस्त्र बल भी शामिल हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत आधार हैं। प्रवक्ता ने कहा कि मई महीने में हुई झड़पों ने पाकिस्तानी सेना के उस संकल्प को दिखाया कि वह किसी भी आक्रमण का जवाब दे सकती है।

    पाकिस्तान को जान-माल का भारी नुकसान
    गौरतलब है कि 7 मई को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिक मारे गए थे, जिसके जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इसके जरिए पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर हमले किए गए थे। इन हमलों के बाद चार दिन तक तीव्र सैन्य टकराव चला, जो 10 मई को मिलिट्री ऐक्शन रोकने की समझौते के साथ खत्म हुआ। भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के अनुसार, भारतीय हमलों में पाकिस्तान के 12 से अधिक लड़ाकू विमान नष्ट या क्षतिग्रस्त हो गए थे। इनमें अमेरिकी मूल के एफ-16 जेट भी शामिल थे। इस तरह पाकिस्तान को जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।

  • आलोचना के बीच प्रशंसा: “ट्रंप नोबेल पुरस्कार के हकदार” – पूर्व अधिकारी का बयान

    आलोचना के बीच प्रशंसा: “ट्रंप नोबेल पुरस्कार के हकदार” – पूर्व अधिकारी का बयान


    नई दिल्‍ली । भारत-रूस कूटनीति को लेकर अमेरिका के पूर्व पेंटागन अधिकारी(Pentagon officials) ने अपने ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप(Donald Trump) पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन(Vladimir Putin) को नई दिल्ली में जो गर्मजोशी और सम्मान मिला, उसका श्रेय रूस नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जाता है। माइकल रुबिन (Michael Rubin)के अनुसार ट्रंप ने ही भारत और रूस को एक-दूसरे के और करीब धकेला, और इसके लिए वे नोबेल पुरस्कार के हकदार हैं।

    ट्रंप को दिया ‘नोबेल’ का सुझाव
    मीडिया से बातचीत में रुबिन ने कहा कि पुतिन की भारत यात्रा मॉस्को के नजरिए से बेहद सकारात्मक रही और भारत द्वारा दिया गया सम्मान दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिला। उन्होंने कहा- मैं यह तर्क दूंगा कि भारत और रूस को जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने एक-दूसरे के करीब लाया है, उसके लिए वे नोबेल पुरस्कार के हकदार हैं।

    रुबिन ने यह भी सवाल उठाया कि पुतिन की यात्रा के दौरान हुए समझौतों में से कितने वास्तविक सहयोग में तब्दील होंगे और कितने ऐसे हैं जो भारत की उस नाराजगी से उपजे हैं जो हाल के समय में ट्रंप के रवैये के कारण बनी है- चाहे वह पीएम मोदी के प्रति उनका व्यवहार हो या भारत के व्यापक हितों के प्रति उदासीनता।

    अमेरिका में दो धाराएं- ट्रंप का दावा’ बनाम ‘ट्रंप की अक्षमता
    रुबिन ने बताया कि अमेरिका में इस घटनाक्रम को लेकर दो बिल्कुल अलग नजरिए हैं। उन्होंने कहा, यदि आप डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक हैं, तो आप इसे ‘मैंने कहा था न’ वाले चश्मे से देखते हैं। लेकिन यदि आप उन 65 प्रतिशत अमेरिकियों में से हैं जो ट्रंप को पसंद नहीं करते, तो यह सब डोनाल्ड ट्रंप की भारी कूटनीतिक अक्षमता का नतीजा दिखता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने भारत-अमेरिका संबंधों को पीछे धकेल दिया और कई फैसले ऐसे लिए जिन पर पाकिस्तान, तुर्किये और कतर जैसी देशों की चापलूसी या कथित प्रलोभनों का असर दिखा।

    ट्रंप के दौर की तीखी आलोचना: ‘रणनीतिक नुकसान’
    रुबिन के अनुसार वॉशिंगटन के कई विशेषज्ञ इस बात से हैरान हैं कि ट्रंप ने कैसे अमेरिका–भारत की बढ़ती रणनीतिक एकजुटता को कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि ट्रंप इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि भारत–रूस निकटता को अपनी विदेश नीति की दूरदर्शिता साबित करने में इस्तेमाल करेंगे।

    ‘भारत को नसीहत देना बंद करे अमेरिका’
    पुतिन द्वारा भारत को निरंतर ऊर्जा आपूर्ति देने के वादे पर टिप्पणी करते हुए रुबिन ने कहा कि अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक अनिवार्यताओं को समझने में लगातार विफल रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को इसलिए चुना है कि वे भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व करें। भारत दुनिया की सबसे आबादी वाला देश है, जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा, और उसे ऊर्जा चाहिए। अमेरिका को भारत को लेक्चर देना बंद कर देना चाहिए।

    उन्होंने अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि स्वयं अमेरिका भी तब रूस से ऊर्जा खरीदता है जब विकल्प सीमित हों। रुबिन ने सवाल उठाया कि यदि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत रूसी ईंधन खरीदे, तो वह भारत को सस्ते दाम पर और पर्याप्त मात्रा में ईंधन उपलब्ध कराने के लिए क्या कर रहा है? उन्होंने तीखे अंदाज में कहा- यदि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, तो सबसे अच्छा यह होगा कि हम चुप रहें, क्योंकि भारत को अपनी सुरक्षा और जरूरतों को पहले रखना ही पड़ेगा।