Tag: government

  • बिहार सरकार ने वापस लिया सुरक्षा में कटौती का फैसला, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की 'Z' श्रेणी की सुरक्षा समेत बुलेटप्रूफ गाड़ियां दोबारा बहाल

    बिहार सरकार ने वापस लिया सुरक्षा में कटौती का फैसला, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की 'Z' श्रेणी की सुरक्षा समेत बुलेटप्रूफ गाड़ियां दोबारा बहाल

    नई दिल्ली । बिहार की सियासत में पिछले कुछ दिनों से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहा हाई-प्रोफाइल विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक निर्णय लेते हुए राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सुरक्षा व्यवस्था को दोबारा चाक-चौबंद करने का आदेश जारी किया है। सरकार के नए फैसले के मुताबिक, दोनों वरिष्ठ नेताओं की ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा को तत्काल प्रभाव से बहाल कर दिया गया है। इसके साथ ही दोनों नेताओं को राज्य सरकार की ओर से पुनः बुलेटप्रूफ गाड़ियां भी उपलब्ध करा दी गई हैं, जिससे इस मुद्दे पर जारी गतिरोध के फिलहाल थमने के आसार हैं।

    इस पूरे प्रशासनिक विवाद की शुरुआत कुछ समय पहले हुई थी, जब बिहार सरकार के गृह विभाग ने वीआईपी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की उच्च स्तरीय समीक्षा की थी। इस समीक्षा बैठक के बाद सरकार ने लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को मिली ‘Z+’ श्रेणी की सुरक्षा को हटाने का निर्णय लिया था। सरकार के इस कदम के बाद बिहार की राजनीति में अचानक उबाल आ गया था और विपक्षी खेमे ने इस फैसले को लेकर सत्तापक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। राष्ट्रीय जनता दल ने इस प्रशासनिक कटौती को पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित बताया था।

    सुरक्षा में की गई इस कटौती के विरोध में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने एक कड़ा और प्रतीकात्मक कदम उठाते हुए अपनी बची हुई शेष सरकारी सुरक्षा को भी प्रशासन को वापस लौटा दिया था। दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा सरकारी सुरक्षा सरेंडर किए जाने की घटना ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी थी। राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया था कि सत्तापक्ष जानबूझकर विपक्षी नेताओं को निशाना बना रहा है और उनके जीवन को खतरे में डालने का प्रयास किया जा रहा है।

    यह विवाद उस समय और अधिक गहरा गया जब बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए। तेजस्वी यादव ने सरकार के इस फैसले को विपक्ष के साथ किया जाने वाला खुला भेदभाव करार दिया था और एकजुटता दिखाते हुए अपनी स्वयं की सरकारी सुरक्षा भी प्रशासन को वापस सौंप दी थी। एक साथ तीन शीर्ष नेताओं द्वारा सुरक्षा लौटाए जाने के बाद सरकार चौतरफा दबाव में आ गई थी और इस मुद्दे पर प्रशासनिक स्तर पर नए सिरे से विचार करना अनिवार्य हो गया था।

    विपक्ष के इस कड़े और आक्रामक रुख को देखते हुए आखिरकार बिहार सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और अपने पुराने फैसले की समीक्षा करनी पड़ी। सरकार के नए आदेश के तहत अब लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को न सिर्फ ‘Z’ श्रेणी की कड़े घेरे वाली सुरक्षा वापस मिल गई है, बल्कि सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत आवश्यक बुलेटप्रूफ वाहन भी उनके काफिले में दोबारा शामिल कर दिए गए हैं। इस निर्णय के बाद राजद कैंप में इसे विपक्ष की नैतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में आगामी राजनीतिक समीकरणों और कानून व्यवस्था की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने इस विवाद को और अधिक लंबा न खींचना ही उचित समझा। हालांकि सुरक्षा बहाली के इस नए फैसले के बाद फिलहाल दोनों पक्षों के बीच जारी बयानबाजी और टकराव पर विराम लगने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन इस घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की कड़वाहट को एक बार फिर सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया है।

  • महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी

    महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी


    मुंबई।
    महाराष्ट्र (Maharashtra) में यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code- UCC) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार एक अहम कदम उठाने जा रही है. जानकारी के मुताबिक कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए जल्द ही एक कमेटी का गठन किया जाएगा.

    अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि महाराष्ट्र सरकार (Government of Maharashtra) यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने हेतु दो हफ्ते के भीतर एक कमेटी बना सकती है. उन्होंने जानकारी दी कि कमेटी के गठन और इसके काम करने के दायरे को अभी फाइनल किया जाना बाकी है।

    जानकारी के मुताबिक एक अधिकारी ने जानकारी दी कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने वाली कमेटी बनाने का प्रोसेस चल रहा है और अगले दो हफ्तों के भीतर इसका गठन कर दिया जाएगा।

    बता दें कि पिछले हफ्ते ही गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि महाराष्ट्र में यूसीसी लागू किया जाएगा और इस कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में कमेटी बनाई जाएगी.

    यूनिफॉर्म सिविल कोड एक संवैधानिक निर्देश है, जिसका मकसद सभी नागरिकों के लिए शादी, तलाक, विरासत और एडॉप्शन जैसे मामलों में एक समान कानून लागू करना है. कानून की नजर में सब एक समान होते हैं. शादी, तलाक, एडॉप्शन, उत्तराधिकार, विरासत लेकिन सबसे बढ़कर लैंगिक समानता वो कारण है, जिस वजह से यूनिफार्म सिविल कोड की जरूरत महसूस की जाती रही है।

    यूसीसी का मतलब है कि शादी, तलाक, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हो, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो. जिस राज्य में समान नागरिक संहिता लागू होगी, वहां इन मामलों में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ही कानूनी व्यवस्था लागू होगी।

  • पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर फैली अफवाहों को सरकार ने बताया गलत, 10 बिंदुओं में दी सफाई

    पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर फैली अफवाहों को सरकार ने बताया गलत, 10 बिंदुओं में दी सफाई


    नई दिल्ली। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) मिश्रण को लेकर सोशल मीडिया पर फैल रहे दावों पर सरकार ने विस्तृत सफाई दी है। कई पोस्टों में इंजन खराब होने, माइलेज घटने और बीमा रद्द होने जैसे दावे किए जा रहे थे, जिन्हें पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पूरी तरह भ्रामक बताया है।

    मंत्रालय के अनुसार, E20 कार्यक्रम वैज्ञानिक शोध और कई देशों के लंबे अनुभव पर आधारित है। सरकार ने कहा कि वाहन मालिकों को किसी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ईंधन मानकों के अनुरूप सुरक्षित है।

    सरकार ने 10 बिंदुओं में दी स्पष्ट जानकारी
    सरकार ने सोशल मीडिया पर फैल रही गलतफहमियों का जवाब देते हुए कई अहम तथ्य सामने रखे:-

    – एक लीटर एथेनॉल उत्पादन में 10,000 लीटर पानी लगने का दावा गलत है। सरकार के अनुसार, उत्पादन प्रक्रिया में केवल 3 से 5 लीटर प्रोसेस्ड पानी की आवश्यकता होती है और कई प्लांट जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक से काम करते हैं।

    – E20 कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि इसका उपयोग अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान, थाईलैंड और कई यूरोपीय देशों में लंबे समय से किया जा रहा है।
    – इंजन खराब होने का दावा गलत है। ARAI और अन्य संस्थाओं के अध्ययन में E20 से इंजन पर कोई बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया है, हालांकि पुराने वाहनों में कुछ रबर पार्ट्स बदलने की आवश्यकता हो सकती है।
    – परीक्षणों में केवल मामूली माइलेज बदलाव देखा गया है, जिससे वाहन की सामान्य कार्यक्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ता।
    – E20 के लिए डिजाइन या स्वीकृत वाहनों की वारंटी और बीमा पर कोई असर नहीं पड़ता।
    – फ्यूल ग्रेड एथेनॉल में चीनी नहीं होती और इसमें डिनैचुरेंट मिलाए जाते हैं, जिससे पेट्रोल की गंध हावी रहती है। इसलिए चींटियों या मधुमक्खियों के आकर्षित होने का दावा गलत है।
    – अदालत में E20 कार्यक्रम की वैधता पर नहीं, बल्कि एथेनॉल खरीद अनुबंधों से जुड़े मामलों पर सुनवाई हो रही थी।
    – आधुनिक वाहनों और पेट्रोल पंपों की संरचना ऐसी है कि फ्यूल टैंक में पानी जाने की संभावना न्यूनतम रहती है।
    – सोशल मीडिया पर वायरल ‘रस मिलाने’ वाला वीडियो फर्जी बताया गया है। मंत्रालय के अनुसार एथेनॉल औद्योगिक मानकों के तहत ही तैयार होता है।
    – सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण से अब तक 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची है, किसानों को 1.6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की आय मिली है, कच्चे तेल के आयात में 310 लाख मीट्रिक टन की कमी आई है और प्रदूषण में भी गिरावट दर्ज की गई है।
  • भीषण गर्मी के बीच ब्रिटेन में एसी पर सख्ती, नेट जीरो नीति के तहत घरों से हटाने के निर्देश

    भीषण गर्मी के बीच ब्रिटेन में एसी पर सख्ती, नेट जीरो नीति के तहत घरों से हटाने के निर्देश


    नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। ब्रिटेन में तापमान कई इलाकों में 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। हीटवेव के कारण जनजीवन प्रभावित है, लेकिन इसी बीच पर्यावरणीय नीतियों के तहत कुछ स्थानीय प्रशासनिक निकाय घरों में लगाए गए एयर कंडीशनर (एसी) को लेकर सख्ती बरत रहे हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार, लंदन के कुछ काउंसिल क्षेत्रों में निवासियों को एसी हटाने या उनके उपयोग को सीमित करने संबंधी नोटिस जारी किए गए हैं। अधिकारियों का तर्क है कि एयर कंडीशनर अधिक ऊर्जा की खपत करते हैं और कार्बन उत्सर्जन बढ़ाते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाना चाहिए।

    हीटवेव से जनजीवन प्रभावित

    ब्रिटेन में भीषण गर्मी के चलते कई क्षेत्रों में स्कूल बंद किए गए हैं और कुछ रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा है। मौसम विभाग ने अत्यधिक गर्मी को देखते हुए लोगों की सुरक्षा के लिए उच्च स्तर की चेतावनी जारी की है।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि कई अस्पतालों में तापमान अधिक होने और पर्याप्त शीतलन व्यवस्था नहीं होने के कारण हजारों गैर-आपातकालीन सर्जरी स्थगित करनी पड़ी हैं।

    क्या है नेट जीरो नीति?

    ब्रिटेन में लागू नेट जीरो नीति का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर तक लाना है। भवन निर्माण और ऊर्जा उपयोग से जुड़े दिशानिर्देशों के तहत पहले प्राकृतिक या पैसिव कूलिंग उपाय अपनाने पर जोर दिया जाता है।

    इन उपायों में भवनों का बेहतर वेंटिलेशन, खिड़कियां खोलकर रखना, छायादार व्यवस्था और सीलिंग फैन का उपयोग शामिल है। एसी के इस्तेमाल की अनुमति तभी दी जाती है, जब ये विकल्प पर्याप्त न हों।

    पर्यावरण संरक्षण पर जोर

    रिपोर्टों के मुताबिक, लंदन के कुछ स्थानीय निकायों ने नेट जीरो नीति के तहत भवनों में लगाए गए एसी हटाने या उनके उपयोग पर आपत्ति जताई है। प्रशासन लोगों को अधिक से अधिक प्राकृतिक वेंटिलेशन और सीलिंग फैन जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दे रहा है।

    हालांकि, भीषण गर्मी के बीच एसी के उपयोग को लेकर यह नीति बहस का विषय बनी हुई है। एक ओर सरकार और स्थानीय निकाय पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बढ़ते तापमान के बीच लोगों की सुविधा और स्वास्थ्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

  • सरकार गिरने के दावे पर छिड़ी सियासी जंग, बयान के बाद आमने-सामने आए सत्ता और विपक्ष के बड़े चेहरे

    सरकार गिरने के दावे पर छिड़ी सियासी जंग, बयान के बाद आमने-सामने आए सत्ता और विपक्ष के बड़े चेहरे


    नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। एक राजनीतिक टिप्पणी के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। हालिया बयान ने केवल राजनीतिक हलकों में चर्चा नहीं बढ़ाई, बल्कि इसे लेकर कई तरह की व्याख्याएं और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में इस बयान का असर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और बहस दोनों पर दिखाई दे सकता है।

    राजनीति में भविष्य को लेकर किए गए दावे और आकलन अक्सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं। लेकिन जब ऐसे बयान देश की सत्ता, राजनीतिक स्थिरता और सरकार के भविष्य से जुड़े हों, तो उनका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यही वजह है कि हालिया टिप्पणी के बाद राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की रणनीति से जोड़कर देख रहा है, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषक इसे आने वाले राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत मान रहे हैं।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की होती है। लेकिन जब राजनीतिक बयान सीधे सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं पर केंद्रित होने लगते हैं, तब उनकी राजनीतिक व्याख्या भी बदल जाती है। यही कारण है कि इस मुद्दे ने केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रहने के बजाय व्यापक चर्चा का रूप ले लिया है।

    सत्ता पक्ष की ओर से इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। कई नेताओं ने इसे राजनीतिक निराशा से जुड़ा बयान बताया है तो कुछ ने इसे देश के राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा है। राजनीतिक बयानबाजी के इस दौर में शब्दों की तीक्ष्णता भी पहले से अधिक दिखाई दे रही है। यही कारण है कि विभिन्न नेताओं के बयान लगातार चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय राजनीति में चुनावी रणनीति केवल चुनाव के समय ही सक्रिय नहीं होती, बल्कि चुनाव खत्म होने के बाद भी राजनीतिक गतिविधियां लगातार जारी रहती हैं। आने वाले समय के लिए माहौल तैयार करना, जनता के बीच मुद्दों को स्थापित करना और अपनी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखना हर दल की प्राथमिकता होती है। इसलिए इस प्रकार के बयान केवल तत्काल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहते बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक संकेत भी माने जाते हैं।

    देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में अधिक तीखी हुई है। राजनीतिक दल अब केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं हैं बल्कि विभिन्न मुद्दों पर लगातार अपनी स्थिति स्पष्ट करते रहते हैं। ऐसे माहौल में बयानों का प्रभाव भी तेजी से बढ़ता है और उनके राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगते हैं।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक सक्रिय हो गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। सत्ता और विपक्ष के बीच चल रही यह सियासी जंग फिलहाल थमती दिखाई नहीं दे रही और आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा में लगातार बना रह सकता है।

  • 30 साल का इंतजार, सत्ता से लेकर समाज तक असर… आखिर क्यों देश की सबसे खास पहचान बना दिल्ली जिमखाना क्लब?

    30 साल का इंतजार, सत्ता से लेकर समाज तक असर… आखिर क्यों देश की सबसे खास पहचान बना दिल्ली जिमखाना क्लब?

    नई दिल्ली। देश की राजधानी में स्थित दिल्ली जिमखाना क्लब एक बार फिर सुर्खियों में है। सरकार की ओर से क्लब परिसर खाली करने के निर्देश के बाद इस प्रतिष्ठित संस्था को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। दशकों से देश के सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित सामाजिक क्लबों में गिने जाने वाले इस संस्थान की पहचान केवल एक क्लब के रूप में नहीं रही, बल्कि यह देश के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का एक अहम केंद्र भी माना जाता रहा है। लंबे समय से यह जगह उन लोगों की पहचान बन चुकी थी, जिन्हें समाज के प्रभावशाली और चुनिंदा वर्ग का हिस्सा माना जाता था।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना वर्ष 1913 में हुई थी। शुरुआत में यह एक विशेष सामाजिक और खेल गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। समय के साथ इस क्लब ने केवल खेल और मनोरंजन की सीमाओं को पार किया और एक ऐसी जगह बन गया, जहां देश की कई बड़ी हस्तियों की मौजूदगी सामान्य बात मानी जाने लगी। आजादी से पहले और बाद के दौर में इस क्लब का नाम कई प्रभावशाली लोगों के साथ जुड़ता रहा। देश के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्यायों के दौरान यह स्थान चर्चाओं और मुलाकातों का केंद्र रहा।

    इस क्लब की एक सबसे बड़ी पहचान इसकी सदस्यता रही है। आम तौर पर किसी भी क्लब में सदस्य बनने की प्रक्रिया सीमित समय में पूरी हो जाती है, लेकिन दिल्ली जिमखाना क्लब का मामला बिल्कुल अलग रहा है। यहां सदस्यता के लिए लोगों को कई बार 20 से 30 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता रहा। इतनी लंबी प्रतीक्षा सूची अपने आप में इसकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को दर्शाती है। सदस्यता को सिर्फ सुविधा पाने का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और विशेष पहचान के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की इमारत और उसका परिसर भी अपनी अलग ऐतिहासिक पहचान रखते हैं। राजधानी के महत्वपूर्ण इलाके में फैला इसका विशाल परिसर वर्षों से विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसकी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व इसे सामान्य संस्थानों से अलग पहचान देते हैं। यही वजह रही कि यह स्थान केवल क्लब गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि देश की विरासत का भी हिस्सा माना जाता रहा है।

    अब सरकार के हालिया फैसले ने इस ऐतिहासिक संस्थान को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। क्लब परिसर को सार्वजनिक जरूरतों और प्रशासनिक कारणों से वापस लेने के फैसले के बाद कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक जरूरत मान रहे हैं तो कुछ इसे एक ऐतिहासिक अध्याय के बदलते दौर के रूप में देख रहे हैं। हालांकि इतना तय है कि दिल्ली जिमखाना क्लब केवल एक इमारत या क्लब नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी पहचान बन चुका है जिसने कई पीढ़ियों तक सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रभाव और विशिष्टता की अलग कहानी लिखी है। आज बदलते समय में यह फैसला केवल एक संस्थान से जुड़ा मुद्दा नहीं बल्कि देश की ऐतिहासिक और सामाजिक विरासत से जुड़ी एक बड़ी चर्चा बन चुका है।

  • NEET UG: री-एग्जाम से पहले अलर्ट मोड पर सरकार…. अफवाहों पर नकेल कसने की तैयारी

    NEET UG: री-एग्जाम से पहले अलर्ट मोड पर सरकार…. अफवाहों पर नकेल कसने की तैयारी


    नई दिल्ली।
    मेडिकल (Medical) की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) के री-एग्जाम से पहले केंद्र सरकार (Central government) पूरी तरह से अलर्ट मोड में आ गई है। 3 मई को हुई परीक्षा में पेपर लीक (Paper leak) और ग्रेस मार्क्स जैसे विवादों के बाद, अब सरकार सोशल मीडिया पर फैलने वाली झूठी अफवाहों और पैनिक फैलाने वाले पोस्ट्स पर सख्त नकेल कसने की तैयारी में है। छात्रों का भरोसा फिर से बहाल करने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने टेक जगत के दिग्गजों- गूगल (Google), मेटा (Meta) और टेलीग्राम (Telegram) को भी अपने साथ जोड़ लिया है, ताकि किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी को इंटरनेट पर फैलने से पहले ही रोका जा सके। बता दें कि आज 21 जून को NEET-UG का दोबारा एग्जाम हो रहा है।


    शिक्षा मंत्री ने लिया मोर्चा, दिए ‘फोकस्ड क्रैकडाउन’ के निर्देश

    केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को एक हाई-लेवल मीटिंग की अध्यक्षता की। इस महत्वपूर्ण बैठक में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों के अलावा केंद्रीय खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारी भी मौजूद रहे। शिक्षा मंत्री ने सख्त हिदायत दी है कि परीक्षा से पहले ऑनलाइन एक्टिव होने वाले उन नेटवर्क्स पर सीधा और ‘फोकस्ड क्रैकडाउन’ किया जाए, जो एक सोची-समझी साजिश के तहत गलत जानकारी फैलाते हैं।


    टेलीग्राम और सीक्रेट ग्रुप्स पर खुफिया एजेंसियों की पैनी नजर

    शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि सबसे बड़ी चिंता टेलीग्राम चैनल्स, अनजान ग्रुप्स और बॉट्स को लेकर है, जो बड़े एग्जाम्स से ठीक पहले अचानक बहुत एक्टिव हो जाते हैं। ये ग्रुप्स व्यूज और पैसों के लालच में ‘पेपर लीक’ के झूठे दावे, क्लिकबेट मैसेज और बिना सिर-पैर की जानकारी सर्कुलेट करते हैं। इससे छात्रों और उनके अभिभावकों के बीच दहशत का माहौल बन जाता है।

    खुफिया इनपुट्स से यह भी खुलासा हुआ है कि कुछ चुनिंदा फोन नंबर्स का इस्तेमाल करके दर्जनों संदिग्ध चैनल ऑपरेट किए जा रहे हैं, जो इनकी संगठित गतिविधि की ओर इशारा करता है। इसके बाद एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर डिजिटल सर्विलांस और कड़ी कर दी गई है। उन ग्रुप्स पर खास नजर है जो छात्रों को एग्जाम से पहले “अंदर की जानकारी” या एडवांस में पेपर देने का दावा करते हैं।


    टेक कंपनियों ने दिया पूरा सहयोग का भरोसा

    राहत की बात यह है कि सरकार की इस सख्ती पर मेटा, गूगल और टेलीग्राम जैसी कंपनियों ने सकारात्मक रुख दिखाया है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि परीक्षा से जुड़ी किसी भी भ्रामक या फेक जानकारी की पहचान करके उसे तेजी से ब्लॉक और रिमूव किया जाएगा। शिक्षा मंत्री ने कंपनियों से कहा है कि वे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और पुलिस एजेंसियों के साथ मिलकर काम करें, ताकि प्रोपेगेंडा और खौफ फैलाने वाले चैनल्स को तुरंत बंद किया जा सके।

    अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को भी परीक्षा से पहले डिजिटल सर्विलांस मजबूत करने को कहा गया है। उन एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स और तेजी से बढ़ रहे ग्रुप्स पर खास नजर रखी जा रही है, जो परीक्षार्थियों को परीक्षा से जुड़ी सामग्री एडवांस में देने या ‘इनसाइड इंफॉर्मेशन’ मुहैया कराने का दावा करते हैं।


    एग्जाम सेंटर पर कैसी होगी व्यवस्था?

    मंगलवार को री-एग्जाम की तैयारियों की समीक्षा करते हुए शिक्षा मंत्री ने साफ कर दिया था कि पिछली परीक्षा की सभी खामियों को पूरी तरह दूर किया जाना चाहिए। सभी राज्यों के जिलाधिकारियों (DM) और पुलिस अधीक्षकों (SP) के साथ को-ऑर्डिनेशन मीटिंग करने के निर्देश दिए गए हैं। इसका मकसद परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा और मॉनिटरिंग के प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करना है। इसके साथ ही, अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि री-एग्जाम के दिन छात्रों के लिए ट्रांसपोर्टेशन (आवाजाही), पीने के पानी और अन्य जरूरी सुविधाओं का खास ख्याल रखा जाए ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।


    क्यों हो रहा है नीट री-एग्जाम?

    आपको बता दें कि 3 मई को आयोजित की गई नीट-यूजी परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया था। इसके बाद ही री-एग्जाम की घोषणा की गई थी। इस पूरे विवाद (पेपर लीक के आरोप, ग्रेस मार्क्स विवाद और संगठित नकल) ने परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे, जिसके बाद सरकार अब हर स्तर पर सख्ती बरत रही है।

  • चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार का बड़ा ऐलान… निर्यात पर लगाया प्रतिबंध

    चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार का बड़ा ऐलान… निर्यात पर लगाया प्रतिबंध


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) ने बुधवार को बड़ा ऐलान किया. इसमें चीनी के निर्यात (Sugar Export) पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध (Ban Immediate Effect) लगाया गया है. कच्ची, सफेद और रिफाइंड चीनी के निर्यात (एक्सपोर्ट) पर सितंबर 2026 तक रोक रहेगी. इस रोक को आगे भी बढ़ाया जा सकता है. ये फैसला देश में चीनी की कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए किया गया है।

    बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है. केंद्र सरकार ने बुधवार को एक अधिसूचना में कहा कि उसने 30 सितंबर, 2026 तक या अगले आदेश तक तत्काल प्रभाव से चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. बताया गया कि ये स्थानीय कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश है।


    उत्पादन खपत से कम रहने की आशंका

    भारत, ब्राजील के बाद दुनिया का सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है. भारत ने घरेलू मांग से अधिक उत्पादन की उम्मीद में मिलों को 15 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात करने की अनुमति दी थी. लेकिन अब आशंका है कि प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में गन्ने की पैदावार कमजोर होने की वजह से उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष खपत से कम रहेगा।

    अल नीनो वेदर कंडीशन की वजह से मानसून में रुकावट होने की आशंका है. इसने पैदावार के प्रारंभिक अनुमानों से कम होने के जोखिम को भी बढ़ा दिया है। एक खबर के मुताबिक, डीलरों ने बताया कि निर्यात के लिए स्वीकृत 15 लाख मीट्रिक टन में से व्यापारियों ने लगभग 8 लाख टन के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जिसमें से 6 लाख टन से अधिक पहले ही भेजा जा चुका है।

    सरकार ने भी कहा है कि जो माल पहले से निर्यात प्रक्रिया में है उनको नहीं रोका जाएगा. अधिसूचना में कहा गया है कि पहले ही माल की लोडिंग शुरू हो चुकी हो तो माल की ढुलाई की अनुमति दी जाएगी. ये अनुमति उन मामलों में भी दी जाएगी जहां शिपिंग बिल दाखिल किया गया हो और जहाज पहले ही किसी भारतीय बंदरगाह पर लंगर डाल चुका हो। भारत द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध के ऐलान के बाद न्यूयॉर्क में कच्चे चीनी के वायदा भाव में 2% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि लंदन में सफेद चीनी के वायदा भाव में 3% की उछाल आया।

  • गुवाहाटी में शक्ति प्रदर्शन: हिमंता बिस्वा सरमा ने दूसरी बार ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, नई सरकार की शुरुआत

    गुवाहाटी में शक्ति प्रदर्शन: हिमंता बिस्वा सरमा ने दूसरी बार ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, नई सरकार की शुरुआत

    नई दिल्ली ।  असम की राजनीति में आज एक ऐसा क्षण देखने को मिला जिसने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। हिमंता बिस्वा सरमा ने लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सत्ता की कमान फिर से संभाल ली। गुवाहाटी में आयोजित इस भव्य और ऐतिहासिक समारोह में पूरे राज्य की नजरें टिकी रहीं, जहां राजनीतिक शक्ति और जनसमर्थन का बड़ा प्रदर्शन देखने को मिला।

    सुबह से ही राजधानी गुवाहाटी में उत्सव जैसा माहौल था। शहर को विशेष रूप से सजाया गया था और हर तरफ समर्थकों की भीड़ उमड़ रही थी। निर्धारित समय पर शपथ ग्रहण समारोह शुरू हुआ, जिसमें हिमंता बिस्वा सरमा ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। जैसे ही उन्होंने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, पूरे परिसर में उत्साह और जोश का माहौल बन गया।

    इस अवसर की सबसे बड़ी खासियत देश के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वरिष्ठ नेता इस कार्यक्रम में शामिल हुए, जिससे यह आयोजन केवल राज्य स्तर का नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्व का बन गया। कई राज्यों के प्रमुख नेता भी इस समारोह के साक्षी बने, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि असम की राजनीति अब राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान बना चुकी है।

    शपथ ग्रहण समारोह को बेहद भव्य तरीके से आयोजित किया गया था। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे और पूरे शहर में प्रशासन की सतर्कता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी और हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही थी। भारी संख्या में पहुंचे लोगों ने इस आयोजन को एक जन उत्सव का रूप दे दिया।

    मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी प्राथमिकताओं को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सरकार का पहला लक्ष्य जनता से किए गए वादों को तेजी से पूरा करना होगा। इसके लिए नई कैबिनेट की पहली बैठक में अगले 100 दिनों की कार्ययोजना तैयार की जाएगी। विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक सुधार को प्राथमिकता देने की बात सामने आई है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि नेतृत्व पर जनता के भरोसे की पुनः पुष्टि है। लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी यह संकेत देती है कि राज्य की जनता ने स्थिरता और विकास की नीति को स्वीकार किया है। हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व को मजबूत प्रशासनिक पकड़ और निर्णायक फैसलों के लिए जाना जाता है, जो इस वापसी का प्रमुख आधार माना जा रहा है।

    यह शपथ ग्रहण केवल सत्ता परिवर्तन का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह असम की राजनीति में एक नए आत्मविश्वास और नई दिशा की शुरुआत भी माना जा रहा है। आने वाले समय में सरकार की नीतियां और फैसले यह तय करेंगे कि यह दूसरा कार्यकाल राज्य के विकास में कितना प्रभावी साबित होता है।

  • सप्ताह में 4 दिन काम…. 3 दिन आराम का रास्ता साफ… सरकार ने नोटिफाई किया नया लेबर कोड

    सप्ताह में 4 दिन काम…. 3 दिन आराम का रास्ता साफ… सरकार ने नोटिफाई किया नया लेबर कोड


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने चारों लेबर कोड (All four Labor Codes) के तहत नियमों को नोटिफाई कर दिया है। इन नए नियमों से कुछ चुनिंदा सेक्टरों में सप्ताह में चार दिन काम और 3 दिन की छुट्टी लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। नए केंद्रीय कोड ऑन वेज के अनुसार, किसी भी कर्मचारी के लिए साप्ताहिक काम के घंटे 48 घंटे से अधिक नहीं होंगे। यानी अब कंपनी और कर्मचारी चाहें तो इन 48 घंटों को केवल 4 दिनों में बांट सकते हैं यानी प्रतिदिन 12 घंटे काम करके। बदले में उन्हें 3 दिन की छुट्टी यानी सप्ताह में तीन रेस्ट डे मिल सकती है।

    हालांकि, यह सुविधा सभी के लिए समान नहीं है। दिहाड़ी मजदूरों के लिए एक सामान्य कार्य दिवस 8 घंटे का ही रहेगा, इससे अधिक काम पर ओवरटाइम मिलेगा। साथ ही, ओवरटाइम की दर अब सामान्य दर की दोगुनी कर दी गई है।

    नए श्रम कानून कर्मचारियों को अधिक लचीलापन और बेहतर सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। हालांकि यह चार-दिवसीय कार्य सप्ताह अभी शुरुआती चरण में है और केवल चुनिंदा सेक्टरों में ही संभव है, फिर भी यह भारत में कामकाज के भविष्य का एक नया मॉडल पेश करता है।


    किन क्षेत्रों में 4 डे वर्क वीक की संभावना?

    बिजनेस स्टैंडर्ड की खबरे के अनुसार, जिन क्षेत्रों में शिफ्ट-बेस्ड या प्रोजेक्ट-ड्रिवन काम होता है, वहां इसे आसानी से लागू किया जा सकता है। जैसे, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, IT और शेयर्ड सर्विसेज।

    हालांकि, जिन सेक्टरों में ग्राहकों की तत्काल जरूरतें और रियल-टाइम डिलीवरी की उम्मीद होती है, जैसे कुछ बैंकिंग, रिटेल या कस्टमर सपोर्ट, उनके लिए यह व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।


    अंतिम नियमों में बड़े बदलाव

    गौरतलब है कि सरकार ने शुक्रवार (10 मई, 2026) को सभी चार लेबर कोड के अंतिम नियम जारी किए। इनमें शामिल हैं। इनमें इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, कोड ऑन वेज 2019, सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 और ऑक्यूपेशन सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड 2020 शामिल हैं।

    संसद द्वारा ये कानून पारित किए लगभग 6 साल बाद, 30 से अधिक गजेट नोटिफिकेशन के जरिए इन नियमों को अंतिम रूप दिया गया। दिसंबर 2025 में जो ड्राफ्ट जारी किया गया था, उसमें न्यूनतम वेतन तय करने के लिए कैलोरी इनटेक, कपड़े, किराया, ईंधन खर्च आदि के मानदंड थे। लेकिन अंतिम नियमों में इन्हें हटा दिया गया है। अब सरकार बाद में अलग से आदेश जारी करेगी।


    कर्मचारियों पर क्या क्या होगा असर?

    कंपनी या संस्थान को अनिवार्य नियुक्ति पत्र हर कर्मचारी को देना होगा। ओवरटाइम भुगतान के स्पष्ट प्रावधान होगा। वर्कर रिस्किलिंग फंड में योगदान करना होगा। एक साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी देनी होगी। इस नए कोड में आश्रित माता-पिता के लिए मासिक आय सीमा ₹9,000 से बढ़ाकर ₹14,000 कर दी गई है।


    कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां

    कंपनियों को अब ओवरटाइम भुगतान और रिस्किलिंग योगदान के कारण लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, उन्हें एचआर प्रथाओं को औपचारिक रूप देना होगा, काम के घंटे ट्रैक करने होंगे और अनिवार्य स्वास्थ्य लाभ देने होंगे।