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  • NTA की व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी….. पूरी प्रक्रिया की समीक्षा में जुटी सरकार

    NTA की व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी….. पूरी प्रक्रिया की समीक्षा में जुटी सरकार


    नई दिल्ली।
    राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) (National Testing Agency -NTA) की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की कवायद तेज हो गई है। इसके लिए परीक्षाओं के आयोजन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, अभ्यर्थियों की पहचान, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, परिणाम तैयार करने और शिकायतों के निस्तारण तक पूरी प्रक्रिया की समीक्षा (Review) की जा रही है।

    केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी (Pralhad Joshi) लगातार विशेषज्ञों के साथ बैठकें कर रहे हैं। मंत्रालय का जोर एनटीए के पूरे परीक्षा तंत्र को अधिक मजबूत, विश्वसनीय, तकनीक-सक्षम और पारदर्शी बनाने पर है। इसके लिए देश और दुनिया में अपनाई जा रही सफल व्यवस्थाओं यानी ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’ का अध्ययन किया जा रहा है। कई महत्वपूर्ण बदलावों की तैयारी है। इनमें परीक्षा प्रक्रिया की निगरानी, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और सुरक्षित संचालन, परीक्षा केंद्रों की जवाबदेही, तकनीकी सुरक्षा, मूल्यांकन और परिणाम प्रक्रिया को और मजबूत करना शामिल है।


    बेस्ट प्रैक्टिसेज होंगी साझा

    एनटीए में सुधार के लिए विभिन्न संस्थानों, परीक्षा विशेषज्ञों और तकनीकी विशेषज्ञों से बेस्ट प्रैक्टिसेज साझा करने को कहा जा रहा है। उद्देश्य विश्वसनीयता कायम रखना है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) में एक संयुक्त सचिव, तीन निदेशक और एक संयुक्त निदेशक की नियुक्ति की है।

    कार्मिक मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को जारी आदेश के मुताबिक, 2005 बैच के भारतीय राजस्व सेवा (आयकर) अधिकारी अंशुमान शर्मा को पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए एनटीए में संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया है। मंत्रालय की ओर से 27 अगस्त को जारी अलग-अलग आदेशों के अनुसार, भारतीय राजस्व सेवा (आयकर) के अधिकारी सत्या एस., भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी रवि कुमार सिंह और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी प्रसन्ना वेंकटेश वी. को निदेशक नियुक्त किया गया है। वहीं, 2016 बैच के भारतीय राजस्व सेवा (सीमा शुल्क एवं अप्रत्यक्ष कर) के अधिकारी अमित समदरिया को संयुक्त निदेशक नियुक्त किया गया है।

    मंत्रालय के सर्कुलर के अनुसार, नियुक्त अधिकारियों को आदेश जारी होने के तीन सप्ताह के भीतर अपना नया पद संभालना होगा। हाल ही में सरकार ने एनटीए की परीक्षा प्रणाली में व्यापक बदलावों की घोषणा की थी।


    कौन से बदलाव संभावित

    – प्रश्नपत्र सुरक्षा : प्रश्नपत्रों की डिजिटल एन्क्रिप्शन, सुरक्षित भंडारण और परीक्षा शुरू होने तक बहु-स्तरीय एक्सेस कंट्रोल।
    – अभ्यर्थी की पहचान : आधार/डिजिटल आईडी के साथ बायोमेट्रिक या फेस ऑथेंटिकेशन जैसी बहु-स्तरीय पहचान व्यवस्था।
    – परीक्षा केंद्रों की निगरानी : सीसीटीवी की लाइव मॉनिटरिंग, एआई आधारित संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और केंद्रों की रियल टाइम निगरानी।
    – परीक्षा केंद्रों का चयन : केंद्रों की रैंकिंग और जोखिम के आधार पर उनकी नियमित ऑडिटिंग, ताकि संदिग्ध या कमजोर केंद्रों को हटाया जा सके।
    – चार-स्तरीय जांच : प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर प्रिंटिंग, वितरण और परीक्षा संचालन तक अलग-अलग स्तरों पर स्वतंत्र सत्यापन।
    – तकनीकी सुरक्षा : सर्वर, परीक्षा सॉफ्टवेयर और डेटा के लिए साइबर सिक्योरिटी ऑडिट, लॉग मॉनिटरिंग और बैकअप व्यवस्था।

  • सरकार की सख्ती का असर…..4 दिन में 8 रुपये सस्ती हुई शक्कर, ₹51 प्रति किलो पर आए दाम

    सरकार की सख्ती का असर…..4 दिन में 8 रुपये सस्ती हुई शक्कर, ₹51 प्रति किलो पर आए दाम


    नई दिल्ली।
    चीनी (Sugar) की बढ़ती कीमतों (Rising Prices) को काबू में करने के लिए सरकार (Government) की ओर से उठाए गए कई कदमों का असर अब बाजार में दिखाई देने लगा है। देश के कई हिस्सों में चीनी के भाव नरम हुए हैं। दक्षिण महाराष्ट्र (Southern Maharashtra) में जहां चीनी का भाव करीब 62 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था, वहीं अब महाराष्ट्र में मिल स्तर पर यह करीब 51-52 रुपये प्रति किलो में कारोबार कर रही है। कोलकाता में थोक भाव करीब 53 रुपये प्रति किलो बताया जा रहा है। कोलकाता पूर्वोत्तर राज्यों के लिए चीनी का प्रमुख आपूर्ति केंद्र है।

    ChiniMandi के सूत्रों के मुताबिक, थोक और मिल स्तर पर आई इस नरमी का असर अगले 3-5 दिनों में खुदरा बाजार में भी दिखाई दे सकता है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है।


    रिटेल मार्केट में 8 रुपये तक सस्ती हुई चीनी

    ChiniMandi के ताजा रेट्स के मुताबिक दिल्ली में बुधवार को चीनी 62 रुपये किलो बिकी। इसका हाई 68 रुपये था। वहीं, कानपुर में चीनी की कीमत अब 69 की जगह 62 रुपये पर आ गई है। मुंबई में चीनी का भाव अब 68 रुपये से घटकर 61 रुपये, गुवाहटी में 71 से घटकर 63, हैदराबाद में 70 से घटकर 62 और चेन्नई में 70 रुपये से घटकर 65 रुपये किलो रह गई।


    चीनी के थोक भाव में बड़ी गिरावट

    अगर होलसेल प्राइस की बात करें तो मुंबई में चीनी अपने हाई से 950 रुपये प्रति क्विंटल सस्ती हो चुकी है। मुंबई में चीनी 5800 रुपये पर आ गई है जबकि, 22 अगस्त को 6750 रुपये के ऑल टाइम हाई पर थी। दिल्ली में चीनी 6000 रुपये प्रति क्विंटल पर ही टिकी है। यह 6600 रुपये पर पहुंच गई थी। चार दिन में कानपुर में भी चीनी के दाम में भी 600 रुपये की बड़ी गिरावट है। यहां एक क्विंटल चीनी 6050 रुपये पर आ गई है।


    सरकार ने क्या-क्या उठाए हैं कदम

    स्टॉक लिमिट: कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने बड़े उपभोक्ताओं और डीलरों के लिए स्टॉक रखने की सीमा तय की। इससे इनके पास जमा अतिरिक्त चीनी बाजार में आने लगी और उपलब्धता बढ़ी। सप्लाई सुधरने के साथ ही कीमतों पर दबाव कम हुआ है।

    जमाखोरी पर छापेमारी: सरकार ने चीनी की जमाखोरी और स्टॉक छिपाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी तेज कर दी है। देशभर में अब तक 1,000 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी या निरीक्षण किए जाने की बात सामने आई है। इसके साथ ही चीनी मिलों को निर्देश दिया गया है कि अगस्त का निर्धारित कोटा जिन मिलों ने अभी तक बाजार में नहीं उतारा है, उसे जल्द से जल्द बेचें। इससे आने वाले दिनों में बाजार में चीनी की उपलब्धता और बढ़ सकती है।

    ड्यूटी-फ्री आयात: सरकार ने 21 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी थी। सूत्रों के मुताबिक, निर्यातक देशों से करीब 70-80 हजार टन चीनी वाली 3-4 खेपें पहले ही रवाना हो चुकी हैं। इनके सितंबर के मध्य से अंत तक भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने की उम्मीद है।

    त्योहारों से पहले सरकार की नजर कीमतों पर
    अगस्त के बचे हुए कोटे की चीनी बाजार में आने, आयातित चीनी की खेपों के पहुंचने और बंदरगाहों पर रिफाइन होने वाली चीनी की उपलब्धता बढ़ने से प्रमुख खपत वाले इलाकों में सप्लाई बेहतर होने की उम्मीद है।

    खासकर त्योहारी सीजन को देखते हुए सरकार की कोशिश बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रण में रखने की है। अगर ये सभी कदम उम्मीद के मुताबिक काम करते हैं, तो आने वाले हफ्तों में चीनी के भाव में और नरमी देखने को मिल सकती है।

  • प्याज महंगा हुआ तो सरकार ने बढ़ाई सप्लाई, बफर स्टॉक खोला, ‘कांदा एक्सप्रेस’ से ढुलाई शुरू

    प्याज महंगा हुआ तो सरकार ने बढ़ाई सप्लाई, बफर स्टॉक खोला, ‘कांदा एक्सप्रेस’ से ढुलाई शुरू


    नई दिल्ली। प्याज की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने बाजार में सप्लाई बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी है। नासिक से देश के प्रमुख खपत केंद्रों तक प्याज की ढुलाई शुरू कर दी गई है। इसके साथ ही बफर स्टॉक से भी नियंत्रित मात्रा में प्याज बाजार में उतारा जा रहा है। सरकार का मकसद पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों में अचानक होने वाली तेजी को रोकना है।

    अगस्त-सितंबर में बढ़ती है प्याज की मांग

    सरकार के मुताबिक, अगस्त और सितंबर में प्याज की कीमतों में मौसमी तेजी आमतौर पर देखी जाती है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने के अलावा मौसम और सप्लाई-चेन से जुड़ी दिक्कतों का भी कीमतों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में बाजार में प्याज की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए पहले से कदम उठाए जा रहे हैं।

    पहले चरण में 5 बड़े शहरों पर फोकस

    शुरुआती चरण में सरकार ने पांच बड़े खपत केंद्रों को चुना है। इनमें चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, कोच्चि और गुवाहाटी शामिल हैं। नासिक से इन शहरों तक प्याज पहुंचाया जाएगा और मांग के अनुसार बाजार में इसकी आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

    सरकार के अनुसार, यदि किसी अन्य शहर में भी कीमत या सप्लाई पर दबाव बढ़ता है तो उसे भी इस कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।

    देश में प्याज की कमी नहीं

    सरकार का कहना है कि आने वाले महीनों की घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए देश में पर्याप्त प्याज उपलब्ध है। वर्ष 2025-26 में प्याज का उत्पादन करीब 307.37 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के 307.67 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के लगभग बराबर है।

    ऐसे में मौजूदा स्थिति को बड़े सप्लाई संकट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। सरकार का फोकस बाजार में उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने पर है।

    बफर स्टॉक से भी प्याज बाजार में उतारा

    बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए बफर स्टॉक से प्याज की नियंत्रित मात्रा में रिलीज शुरू कर दी गई है। जरूरत के हिसाब से आगे भी इसकी मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

    प्याज की ढुलाई में रेलवे की ‘कांदा एक्सप्रेस’ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकार के मुताबिक, 2025-26 में इसके जरिए करीब 88 हजार मीट्रिक टन प्याज देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया गया।

    86 रेलवे रैक से 16 शहरों तक पहुंचा प्याज

    रेलवे के 86 रैक के जरिए प्याज को देश के 16 बड़े शहरों तक पहुंचाया गया है। सरकार का कहना है कि बाजार की स्थिति और मांग के अनुसार आगे भी प्याज की ढुलाई और बफर स्टॉक से रिलीज का दायरा बढ़ाया जाएगा।

    नासिक से बड़े खपत केंद्रों तक सप्लाई बढ़ाने और बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारने से आने वाले दिनों में उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है। अब इसका असर अलग-अलग शहरों की खुदरा कीमतों पर कितना पड़ता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

  • चीनी की किल्लत के बीच सरकार बोली- हमारे पास 20-25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक… आयात की भी तैयारी

    चीनी की किल्लत के बीच सरकार बोली- हमारे पास 20-25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक… आयात की भी तैयारी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में चीनी की किल्लत (Sugar Crisis) की खबरों के बीच अब सरकार (Government) एक्शन मोड में आ गई है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी (Pralhad Joshi) ने रविवार को कहा है कि त्योहारों के मौसम से पहले चीनी की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को लेकर चिंताओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार कई कदम उठा रही है। जोशी ने कहा कि रेड रॉट (गन्ने की फसल में होने वाली बीमारी) और अल नीनो की स्थितियों के कारण चीनी के उत्पादन में कमी आई है। इससे न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में चीनी सहित कुल कृषि उत्पादन में कमी आई है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि सरकार इसे लेकर चिंतित है और इसीलिए सरकार ने तुरंत कई कदम उठाए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया है कि भारत की जरूरत लगभग 280 लाख टन है और आज की स्थिति में हमारे पास 20 से 25 लाख टन से ज्यादा का अतिरिक्त स्टॉक है।


    ब्राजील से आएगी चीनी

    वहीं सहकारी चीनी मिलों की संस्था एनएफसीएसएफ के प्रमुख ने कहा कि भारत आने वाली चीनी की कुछ खेप 15 अक्तूबर से पहले देश में पहुंच सकती है। हालांकि अभी इसकी सही मात्रा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। वहीं, जमाखोरी के खिलाफ सरकार की सख्ती से कीमतों में कुछ कमी आने लगी है।

    एनएफसीएसएफ के अध्यक्ष प्रकाश नाइकनवारे ने रविवार को बताया कि फिलहाल आयात के लिए ब्राजील ही एकमात्र व्यावहारिक स्रोत है, क्योंकि पारंपरिक आपूर्तिकर्ता थाईलैंड खुद चीनी की कमी से जूझ रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सप्लाई सबसे पहले पहुंचेगी। ब्राजील से भारत तक सामान आने में 40-45 दिन लगते हैं।


    कीमतों में आ रही गिरावट

    नायकनवरे ने कहा कि केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने फेडरेशन और इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। उन्होंने बाजार में पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करने और कीमतों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। इससे पहले चीनी की कीमत 65-67 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई थी, हालांकि शनिवार को खुले टेंडरों में 5 रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर गई।

  • MP: छिंदवाड़ा NICU अग्निकांड में 1 बच्ची की मौत, 2 झुलसे बच्चों के इलाज का पूरा खर्च उठाएगी सरकार

    MP: छिंदवाड़ा NICU अग्निकांड में 1 बच्ची की मौत, 2 झुलसे बच्चों के इलाज का पूरा खर्च उठाएगी सरकार


    छिंदवाड़ा।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के छिंदवाड़ा जिला अस्पताल (Chhindwara District Hospital) के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (Special Newborn Care Unit) में शनिवार तड़के वार्मर मशीन में अचानक आग लगने से बड़ा हादसा हो गया. इस दुखद घटना में झुलसे तीन नवजात शिशुओं में से एक बच्ची ने जबलपुर में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. मुख्यमंत्री मोहन यादव (Chief Minister Mohan Yadav) ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है और शोकाकुल परिवार के प्रति संवेदना जताई है।

    मुख्यमंत्री ने मृतक बच्ची के परिजनों को 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है. इसके साथ ही उन्होंने साफ किया कि जबलपुर मेडिकल कॉलेज में उपचाराधीन अन्य दो नवजात बच्चों के इलाज का पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी.

    आग लगने के तुरंत बाद ऑन-ड्यूटी स्टाफ ने मुस्तैदी दिखाते हुए अग्निशामक यंत्रों का उपयोग किया और ऑक्सीजन सप्लाई लाइन बंद कर बड़े हादसे को टाल दिया. यूनिट में मौजूद 33 नवजातों में से 30 को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

    वार्मर में रखे 3 बच्चे झुलस गए, जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत एंबुलेंस और डॉक्टरों की निगरानी में जबलपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया. इनमें से एक नवजात की हालत अत्यंत गंभीर थी, जिसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया.

    इस घटना को लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट करते हुए सिंघार ने आरोप लगाया कि सरकारी अस्पताल मरीजों की जान के लिए खतरा बनते जा रहे हैं. उन्होंने प्रदेश के सभी सरकारी व निजी अस्पतालों का तुरंत फायर सेफ्टी ऑडिट कराने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

    फिलहाल, छिंदवाड़ा जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन ने हादसे के तकनीकी कारणों की जांच शुरू कर दी है और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित कर लिए गए हैं।

  • उत्तराखंड सरकार का बड़ा फैसला, सरकारी डॉक्टर शाम को अस्पतालों में कर सकेंगे निजी प्रैक्टिस, माननी होंगी तीन शर्तें..

    उत्तराखंड सरकार का बड़ा फैसला, सरकारी डॉक्टर शाम को अस्पतालों में कर सकेंगे निजी प्रैक्टिस, माननी होंगी तीन शर्तें..

    नई दिल्ली । उत्तराखंड सरकार राज्य की स्वास्थ सेवाओं को अधिक सुदृढ़ और आम नागरिकों के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेने जा रही है। नई व्यवस्था के तहत सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को शाम के समय अस्पताल परिसर के भीतर ही निजी प्रैक्टिस करने की सशर्त छूट प्रदान की जाएगी। सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य मरीजों को किफायती दर पर शाम के वक्त भी विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    वर्तमान में राज्य के सरकारी डॉक्टरों के लिए निजी प्रैक्टिस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लागू है, जिसके एवज में सरकार उन्हें नियमित वेतन के साथ नॉन प्रैक्टिस अलाउंस का भुगतान करती है। हालांकि, कतिपय व्यावहारिक समस्याओं और मरीजों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने शाम के समय अस्पतालों के बुनियादी ढांचे का उपयोग करते हुए यह सुविधा देने का मॉडल तैयार किया है।

    इस नई व्यवस्था को पूरी तरह से ऐच्छिक रखा जाएगा और इसके संचालन के लिए तीन प्रमुख शर्तें अनिवार्य की गई हैं। पहली शर्त के अनुसार डॉक्टरों को मरीजों से बेहद न्यूनतम परामर्श शुल्क लेने की अनुमति होगी। दूसरी शर्त यह है कि परामर्श के दौरान डॉक्टर बाहर की दवाइयां नहीं लिख सकेंगे, बल्कि अस्पताल में उपलब्ध या जेनेरिक दवाएं ही सुझानी होंगी। तीसरी शर्त के तहत यदि मरीज को किसी प्रकार के ऑपरेशन या गंभीर इलाज की आवश्यकता होती है, तो वह प्रक्रिया केवल सरकारी अस्पताल में ही पूरी की जाएगी।

    स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गई है और जल्द ही इसे औपचारिक स्वीकृति के लिए राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से डॉक्टरों को अस्पताल परिसर के बाहर अनधिकृत क्लिनिक चलाने की आवश्यकता नहीं होगी और अस्पताल के संसाधनों का भी अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    विशेष रूप से पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में दोपहर दो बजे के बाद सरकारी अस्पतालों में सेवाएं सीमित हो जाती थीं। नई नीति लागू होने से पर्वतीय जिलों के निवासियों को शाम के समय भी विशेषज्ञ डॉक्टरों का परामर्श अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल में ही प्राप्त हो सकेगा। इससे निजी अस्पतालों और महंगे क्लीनिकों पर मरीजों की निर्भरता काफी हद तक कम होगी।

    मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों के स्वास्थ्य विभागों द्वारा भी इस प्रकार के हाइब्रिड हेल्थकेयर मॉडल का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की दक्षता को बढ़ाया जा सके। उत्तराखंड में इस निर्णय के लागू होने से न केवल आम मरीजों को कम खर्च में बेहतर इलाज मिलेगा, बल्कि सरकारी डॉक्टरों की कार्यक्षमता का भी राज्य के स्वास्थ्य ढांचे के हित में सही उपयोग हो सकेगा।

  • US: सरकारी मदद पाने वाले प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन हो सकते हैं रद्द…. 18 सितंबर को लागू होंगे नए नियम

    US: सरकारी मदद पाने वाले प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन हो सकते हैं रद्द…. 18 सितंबर को लागू होंगे नए नियम


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में स्थायी नागरिकता यानी ग्रीन कार्ड (Green Card Applications) पाने की कोशिश कर रहे प्रवासियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक बोझ से जुड़े नियमों का दायरा बढ़ा दिया है। नए नियम के तहत सरकारी आर्थिक मदद लेने वाले कुछ प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन (Green Card Applications) पर सवाल उठ सकते हैं और आवेदन खारिज भी किया जा सकता है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (U.S. Citizenship and Immigration Services) का यह नियम 18 सितंबर से लागू होगा। इसका असर अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों और उनके परिवारों पर भी पड़ सकता है।


    क्या सरकारी मदद लेने से ग्रीन कार्ड पर असर पड़ेगा?

    पहले सार्वजनिक बोझ का आकलन मुख्य रूप से दो तरह की सरकारी मदद के आधार पर किया जाता था। नए नियम में अधिकारियों को ज्यादा पहलुओं को देखने का अधिकार दिया गया है। अब आवेदक की उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिति, आर्थिक हालत और शिक्षा को भी देखा जा सकेगा। इसके अलावा आवेदक पर निर्भर लोगों की ओर से ली गई कुछ सरकारी मदद को भी आवेदन पर फैसला करते समय ध्यान में रखा जा सकता है।


    भारतीयों पर कितना पड़ सकता है असर?
    वर्ष 2023 में 78,100 भारतीयों को अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिला था। इनमें करीब 60 प्रतिशत भारतीयों ने परिवार के किसी सदस्य या अमेरिकी नागरिक रिश्तेदार के आधार पर ग्रीन कार्ड हासिल किया था। नए नियम के कारण ऐसे परिवारों में सरकारी सहायता लेने की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर परिवार का कोई सदस्य सरकारी सब्सिडी का इस्तेमाल करता है तो अधिकारी आवेदक की आयु, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए आवेदन पर फैसला कर सकते हैं।


    क्या अधिकारियों को आवेदन खारिज करने की ज्यादा ताकत मिलेगी?

    आव्रजन मामलों के जानकारों के अनुसार नए नियम से अधिकारियों के पास आवेदन को लेकर फैसला करने की गुंजाइश बढ़ जाएगी। यानी केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि आवेदक ने सरकारी मदद ली है या नहीं। अधिकारी उसकी पूरी परिस्थिति को देखकर यह आकलन कर सकते हैं कि वह भविष्य में सरकार पर आर्थिक रूप से निर्भर हो सकता है या नहीं। इससे ग्रीन कार्ड आवेदन की जांच पहले के मुकाबले ज्यादा सख्त हो सकती है।


    किन लोगों को नियम से छूट मिलेगी?

    नए नियम का असर सभी प्रवासियों पर एक जैसा नहीं होगा। शरणार्थियों, उत्पीड़न के पीड़ितों और कुछ विशेष श्रेणियों के आवेदकों को इससे छूट दी गई है। यानी इन लोगों के आवेदन पर सार्वजनिक बोझ से जुड़े नए नियम उसी तरह लागू नहीं होंगे। हालांकि सामान्य ग्रीन कार्ड आवेदकों के लिए उम्र, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और परिवार की परिस्थितियां अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं।


    18 सितंबर के बाद क्या बदलेगा?
    यह नया नियम 2022 में बाइडन प्रशासन के दौरान लागू किए गए नियम को रद्द करने के बाद आया है। 18 सितंबर से इसके लागू होने के बाद ग्रीन कार्ड आवेदन की जांच में सरकारी सहायता के साथ आवेदक की व्यक्तिगत और पारिवारिक स्थिति को भी ज्यादा महत्व दिया जाएगा। भारतीयों की बड़ी संख्या परिवार आधारित ग्रीन कार्ड के जरिए स्थायी नागरिकता हासिल करती है। ऐसे में नए नियम के बाद भारतीय आवेदकों को अपनी आर्थिक और पारिवारिक स्थिति को लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ सकती है।

  • चीनी के दाम आसमान पर… सरकार ने तय की लिमिट, 15 दिन का स्टॉक नहीं रख सकेंगे कारोबारी

    चीनी के दाम आसमान पर… सरकार ने तय की लिमिट, 15 दिन का स्टॉक नहीं रख सकेंगे कारोबारी


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (Government of India) ने 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक चीनी (Sugar Stock Limit) इस्तेमाल करने वाले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा तय की है। सरकारी अधिसूचना के अनुसार ऐसे डीलर 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर तक लागू रहेगा। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती (Rising Sugar Demand) है। इस दौरान बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियां पहले से स्टॉक बढ़ाती हैं।


    चीनी स्टॉक पर किस कारण लिया गया फैसला?

    सरकार के मुताबिक रिकॉर्ड चीनी कीमतों पर लगाम लगाने के लिए नया आदेश जारी किया गयाहै। इस आदेश के तहत, 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का उपयोग करने वाले डीलर 15 दिन से ज्यादा स्टॉक नहीं रख पाएंगे। यह सरकारी आदेश बुधवार को सामने आया। नियम 1 सितंबर से लागू होगा और 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगा।


    कीमतों में उछाल से चिंता, जुलाई में चीनी को लेकर क्या फैसला हुआ?

    दरअसल, पिछले महीने, भारत ने डीलरों को 30 दिन से अधिक स्टॉक न रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद, भारतीय चीनी की कीमतें पिछले महीने 10 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। अगले तीन महीनों तक कीमतें ऊंची रहने की उम्मीद है। इससे पहले मंगलवार को आई रॉयटर्स की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत चीनी आपूर्ति बढ़ाने के उपायों पर विचार कर रहा है। खबर के मुताबिक सरकार सीमित शुल्क-मुक्त आयात और थोक व्यापारियों के लिए सख्त स्टॉक सीमा जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है।


    चीनी की मांग और आपूर्ति की स्थिति कैसी?

    गौरतलब है कि भारत में अगस्त से नवंबर तक चीनी की मांग बढ़ जाती है। इस दौरान गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं। बिस्किट और कन्फेक्शनरी निर्माता जैसे थोक उपभोक्ता त्योहारों से पहले स्टॉक बनाते हैं। अनियमित बारिश और शुष्क मौसम ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया है। चीनी भारत में राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यह कई गरीब परिवारों के लिए कैलोरी का एक सस्ता स्रोत है।


    भारत से चीनी निर्यात पर प्रतिबंध क्यों?

    इससे पहले मई में चीनी निर्यात पर रोक लगाई गई थी। सरकार ने कहा था कि निर्यात पर यह रोक 30 सितंबर या अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी। सरकार ने यह कदम देश में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और इसकी कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी की गई है। इसके अनुसार, यह प्रतिबंध कच्ची, सफेद और परिष्कृत चीनी पर लागू होता है। सरकार ने नीति में बदलाव करते हुए चीनी को निषिद्ध श्रेणी में रख दिया है।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!

    FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) के मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। चर्चा इस बात को लेकर तेज है कि क्या भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में संशोधन से जुड़े विधेयक को इसी सप्ताह सदन में पेश करेगी या फिर इसे आगे के लिए टाल दिया जाएगा। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक समीकरण बताया जा रहा है, जिसका सीधा संबंध प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (Proposed Delimitation Bill) से जुड़ा हुआ है।

    FCRA संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को संसद में साधारण बहुमत की जरूरत होगी, लेकिन परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए व्यापक समर्थन जुटाना आवश्यक होगा। यही वजह है कि दोनों विधेयकों को लेकर सरकार की रणनीति को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं बढ़ गई हैं।

    सूत्रों के अनुसार, भाजपा अपने महत्वाकांक्षी परिसीमन विधेयक, जिसे 131वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किए जाने की संभावना है, को पारित कराने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से बाहर मौजूद दलों से भी संपर्क साध रही है। हालांकि दूसरी ओर विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई विपक्षी और क्षेत्रीय दलों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। तमिलनाडु की डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे दल इसका विरोध करने के संकेत दे चुके हैं, जबकि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे दल अभी अपने रुख को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं।

    एक समाचार चैनल द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं और सूत्रों से बातचीत में यह सामने आया कि FCRA विधेयक को लेकर दलों के बीच मतभेद गहरे हैं। इसमें भाजपा के सहयोगी दलों की राय भी शामिल है। दक्षिण भारत की एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी ने मौजूदा स्वरूप में FCRA विधेयक को लेकर चिंता जताई है। पार्टी को आशंका है कि प्रस्तावित बदलावों का असर उन संस्थानों पर पड़ सकता है, जो उसके परंपरागत मतदाता वर्ग से जुड़े हुए हैं।

    पार्टी के एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा, “सरकार के साथ बातचीत अभी जारी है। यदि हमारे सुझावों को स्वीकार किया जाता है तो हम सहयोग करने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो हमें विरोध करना पड़ेगा।” मतदान से दूरी बनाने के विकल्प पर उन्होंने कहा कि यह उनके लिए संभव नहीं है। पार्टी या तो विधेयक के समर्थन में मतदान करेगी या फिर विरोध में। उनका कहना था कि यह विषय उनके मुख्य मतदाता वर्ग से सीधे जुड़ा हुआ है और इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    सूत्रों के अनुसार, इस क्षेत्रीय दल का बड़ा समर्थन आधार ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में है। पार्टी को डर है कि FCRA विधेयक का वर्तमान स्वरूप इन समुदायों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है। राजनीतिक स्थिति यह है कि परिसीमन विधेयक पर यह दल सरकार के साथ खड़ा हो सकता है, लेकिन इसके लिए उसकी अपनी शर्तें हैं। वहीं FCRA संशोधन विधेयक पर समर्थन मिलने की संभावना काफी कम नजर आ रही है।

    इधर, एनसीपी (शरद पवार गुट) और डीएमके ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप के पक्ष में नहीं हैं। दोनों दल चाहते हैं कि इस विधेयक को आगे विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए। एनसीपी (शरद पवार गुट) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि हर दानदाता और हर संस्था को संदेह की नजर से क्यों देखा जाए।

    एनसीपी सांसद ने कहा कि सामाजिक संस्थाओं और धर्मार्थ संगठनों के माध्यम से मिलने वाली सहायता का उपयोग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याण के कार्यों में होता है। उनका कहना था कि कुछ संस्थाओं की गलतियों के आधार पर सभी संस्थानों और दानदाताओं पर संदेह करना उचित नहीं है।

    उन्होंने कहा कि मौजूदा स्वरूप में उनकी पार्टी इस विधेयक का समर्थन नहीं कर सकती और इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग करेगी। वहीं परिसीमन विधेयक पर समर्थन के सवाल पर उन्होंने कहा कि जब तक राजनीतिक दलों को विधेयक का प्रारूप उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक कोई अंतिम निर्णय लेना संभव नहीं है।

    डीएमके भी FCRA विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने की मांग कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु में कांग्रेस से दूरी बढ़ने के बाद डीएमके इस मुद्दे पर अपनी अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर रही है। डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया कि मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक अल्पसंख्यक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों पर दबाव बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। उनका कहना था कि विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे सरकार को FCRA के तहत धन प्राप्त करने वाले संस्थानों की संपत्तियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है, जिसमें पहले से खरीदी गई संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं।

    डीएमके नेता ने सवाल उठाया कि वर्षों पहले खरीदी गई संपत्तियों पर बाद में कार्रवाई करने का अधिकार देना कितना उचित होगा। उन्होंने कहा कि गैर सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यदि सुधार की जरूरत है तो नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसा प्रावधान नहीं होना चाहिए जिससे सभी संस्थानों को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाए।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियां FCRA विधेयक का विरोध करती हैं और दूसरी ओर परिसीमन विधेयक पर भाजपा का समर्थन करती हैं तो उनके सामने राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। सूत्रों के अनुसार, इन दलों में इस मुद्दे पर गंभीर मंथन चल रहा है। वहीं विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने संसद में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा कि कांग्रेस कई कारणों से इस विधेयक का विरोध करेगी।

    केरल से जुड़े कांग्रेस नेताओं ने भी आशंका जताई है कि प्रस्तावित संशोधनों का असर राज्य के गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है। विपक्ष का कहना है कि पिछली तारीख से संपत्तियों पर कार्रवाई करने की संभावित शक्ति और अधिकारियों को व्यापक अधिकार देना चिंता का विषय है। एक वरिष्ठ सीपीएम नेता ने दावा किया कि प्रस्तावित FCRA संशोधन के तहत अधिकारियों को मिलने वाली शक्तियां वक्फ संशोधन कानून में दिए गए अधिकारों से भी अधिक व्यापक हो सकती हैं।

    गौरतलब है कि इससे पहले महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को विपक्षी एकजुटता के कारण संसद में चुनौती का सामना करना पड़ा था। हालांकि पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद सामने आए हैं। वहीं एनसीपी के नए राजनीतिक समीकरण और ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता के बाद NDA का संख्या बल मजबूत हुआ है।

    ऐसे में भाजपा आने वाले छह महीने से कम समय में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अब इस विधेयक के पारित होने की संभावना पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है, लेकिन FCRA संशोधन विधेयक पर सहयोगी दलों और विपक्ष की नाराजगी सरकार के लिए नई चुनौती बन सकती है।