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  • कपड़ा उद्योग को दिवाली का बड़ा तोहफा, सरकार ने 31 दिसंबर तक बढ़ाई कपास आयात शुल्क छूट की अवधि

    कपड़ा उद्योग को दिवाली का बड़ा तोहफा, सरकार ने 31 दिसंबर तक बढ़ाई कपास आयात शुल्क छूट की अवधि

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने दिवाली से पहले देश के कपड़ा और परिधान उद्योग को बड़ी राहत दी है। वित्त मंत्रालय ने कच्चे कपास के आयात पर सीमा शुल्क से मिलने वाली छूट की अवधि दो महीने बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 तक कर दी है। इससे पहले यह छूट 31 अक्टूबर 2026 तक लागू थी। सरकार के इस फैसले से कपड़ा मिलों, धागा निर्माताओं और रेडीमेड गारमेंट बनाने वाली इकाइयों को सस्ती दरों पर कच्चा माल उपलब्ध हो सकेगा। इसके साथ ही घरेलू कपड़ा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

    कपास आयात पर सामान्य रूप से 11 प्रतिशत की दर से कस्टम ड्यूटी लगती है। सरकार ने पहले इस शुल्क को 31 अक्टूबर तक हटाने का फैसला किया था। अब समय-सीमा समाप्त होने से पहले वित्त मंत्रालय ने 30 अक्टूबर को अधिसूचना जारी कर छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया। इस निर्णय का प्रमुख उद्देश्य कपड़ा उद्योग को कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है, ताकि उत्पादन गतिविधियों पर असर न पड़े।

    कपास कपड़ा उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इसके दाम बढ़ने पर धागे, कपड़े और तैयार परिधानों की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। ऐसे में आयात शुल्क से छूट मिलने पर विदेशी बाजारों से कपास मंगाना अपेक्षाकृत सस्ता होगा। इससे कताई मिलों और गारमेंट निर्माताओं को अपनी लागत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। खासतौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को इस फैसले से राहत मिलने की उम्मीद है। ये इकाइयां कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण वित्तीय दबाव का सामना कर रही थीं।

    आयात शुल्क में छूट बढ़ाने के पीछे घरेलू बाजार में कपास की सीमित उपलब्धता भी एक प्रमुख वजह मानी जा रही है। सामान्य तौर पर अक्टूबर से कृषि मंडियों में नई कपास की आवक बढ़ने लगती है, लेकिन इस साल आवक उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। पैदावार में संभावित कमी और बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद में किसानों द्वारा फसल रोककर रखने के कारण मंडियों में कपास की दैनिक आवक करीब 70 हजार से 80 हजार गांठों तक सीमित रही। एक गांठ का वजन 170 किलोग्राम बताया गया है।

    उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक, कपास की घरेलू आपूर्ति और खपत के बीच अंतर बना हुआ था। ऐसे में उत्पादन इकाइयों की जरूरत पूरी करने के लिए आयातित कपास पर निर्भरता बढ़ाना जरूरी हो गया था। सरकार के इस फैसले से मिलों को कच्चे माल की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही उत्पादन प्रक्रिया में रुकावट आने की आशंका भी कम होगी।

    भारतीय कपड़ा उद्योग को वैश्विक बाजार में बांग्लादेश, वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इन देशों में कच्चे माल की लागत और शुल्क व्यवस्था अपेक्षाकृत अनुकूल होने के कारण उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध हो पाते हैं। भारत में कपास के शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा जारी रहने से घरेलू निर्माताओं को उत्पादन लागत पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी। इससे भारतीय निर्यातक समय पर विदेशी ऑर्डर पूरे कर सकेंगे और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर परिधान उपलब्ध करा सकेंगे।

    हालांकि, सरकार ने उद्योग को राहत देने के साथ घरेलू कपास किसानों के हितों का संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया है। उम्मीद है कि दिवाली के बाद कृषि मंडियों में नई फसल की आवक बढ़ेगी और कपड़ा मिलों की घरेलू खरीद भी जारी रहेगी। सरकार आयातित और घरेलू कपास की कीमतों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बाजार की स्थिति पर नजर रखेगी।

    कुल मिलाकर, कपास आयात शुल्क में छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने का फैसला कपड़ा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादन लागत और निर्यात प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • एमपी के रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर, 6 महीने में ट्रांसफर भत्ते और HRA की नीति बनाएगी सरकार

    एमपी के रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर, 6 महीने में ट्रांसफर भत्ते और HRA की नीति बनाएगी सरकार


    जबलपुर । मध्य प्रदेश की ग्राम पंचायतों में काम करने वाले करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जबलपुर हाईकोर्ट ने उनके तबादले से जुड़े आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार यदि किसी ग्राम रोजगार सहायक का तबादला करती है तो उसे नियमानुसार अनिवार्य यात्रा भत्ता सहित यात्रा भत्ता और घरेलू भत्ता देना होगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को रोजगार सहायकों के लिए छह महीने के भीतर भत्तों से संबंधित नीति तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से प्रदेशभर के रोजगार सहायकों को भविष्य में आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

    पांच रोजगार सहायकों ने दायर की थी याचिका

    इस मामले में सिंगरौली के अमित कुमार मिश्रा और शहडोल के शिवाकांत मिश्रा व राजेश कुमार सहित सागर के रानू राजपूत तथा टीकमगढ़ के अभिषेक पटेरिया ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पांचों याचिकाकर्ताओं ने 18 जुलाई 2025 को याचिका दायर कर तबादले से जुड़ी समस्याओं और आर्थिक नुकसान का मुद्दा उठाया था। मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ में हुई। अदालत ने 14 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब इस पर आदेश जारी कर दिया गया है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गोपेश यश तिवारी ने पक्ष रखा। मामले में रोजगार सहायकों के वेतन और तबादले के बाद होने वाले अतिरिक्त खर्च का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले रोजगार सहायकों को सीमित वेतन में अपने परिवार और दूसरी जरूरतों का खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी कर्मचारी को मौजूदा कार्यस्थल से काफी दूर भेज दिया जाता है तो उसके सामने आवागमन और रहने की व्यवस्था से जुड़ी आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

    18 हजार रुपये वेतन में दूर तबादला बन सकता है परेशानी

    याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता के अनुसार ग्राम रोजगार सहायकों को लगभग 18 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है। ऐसी स्थिति में यदि किसी कर्मचारी का तबादला 100 किलोमीटर दूर कर दिया जाता है तो उसे आने जाने और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। सीमित आय के कारण यह खर्च कर्मचारी के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

    इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को यात्रा भत्ते और हाउस रेंट अलाउंस यानी एचआरए से संबंधित नीति बनाने के निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुसार राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को छह महीने के भीतर इस संबंध में नीति तैयार करनी होगी। नीति तैयार होने से यह तय करने में मदद मिलेगी कि तबादले की स्थिति में रोजगार सहायकों को किस प्रकार के भत्ते और आर्थिक सुविधाएं दी जाएंगी।

    तबादले पर रोक नहीं लेकिन भत्तों पर बनानी होगी नीति

    हाईकोर्ट के आदेश में यह भी महत्वपूर्ण है कि रोजगार सहायकों की तबादले नहीं किए जाने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि राज्य सरकार प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार रोजगार सहायकों का तबादला कर सकेगी। हालांकि तबादले के कारण कर्मचारियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को देखते हुए भत्तों के संबंध में नीति तैयार करनी होगी।

    प्रदेश में करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायक ग्राम पंचायतों में विभिन्न कार्यों से जुड़े हैं। ऐसे में इस फैसले का असर बड़ी संख्या में कर्मचारियों पर पड़ सकता है। अब सभी की नजर राज्य सरकार और राज्य रोजगार गारंटी परिषद की ओर से तैयार की जाने वाली नीति पर रहेगी। छह महीने की समयसीमा में बनने वाली यह नीति तय करेगी कि तबादले की स्थिति में कर्मचारियों को किन शर्तों पर आर्थिक लाभ मिलेगा।

  • 100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?

    100 फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी देने पर SC ने सरकार से पूछा-कैसे करेंगे सप्लाई?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को सरकार (Government) से पूछा कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों (ई-100) को अनुमति दी गई है, तो ईधन (100% Ethanol Fuel) की सप्लाई कैसे की जाएगी। ‘एथनॉल सप्लाई ईयर’ (ईएसवाई) 2025-26 (‘Ethanol Supply Year’ (ESY) 2025-26) के लिए एथेनॉल आवंटन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मुद्दे पर हाल ही में आई मीडिया रिपोर्टों का जिक्र किया।

    इस दौरान जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा कि हाल ही में हमने कुछ अखबारों की रिपोर्ट देखीं, जिनमें कहा गया है कि 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है। पीठ ने पूछा कि हम बस यह जानना चाहते हैं कि अगर 100 प्रतिशत एथनॉल से चलने वाले वाहनों को अनुमति दी गई है, तो आप इनकी सप्लाई कैसे करेंगे?


    ई-100 को मिली है मंजूरी

    इस पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर विनिर्माण व्यवस्था में बदलाव करने होंगे। गौरतलब है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 26 अक्टूबर को केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन अधिसूचित किया था। इसके तहत ई100 यानी लगभग शुद्ध एथनॉल से चलने वाले वाहनों को भी नियमों में शामिल किया गया है। इससे पहले ई-85 जैसे अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन से चलने वाले वाहनों का प्रावधान था।


    क्या कह रही सरकार?

    हालांकि, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 27 अक्टूबर को कहा था कि सरकार की पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण मौजूदा 20 प्रतिशत से तत्काल आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने किसानों को सशक्त बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि इस मुद्दे को व्यापक जनहित और पर्यावरण के नजरिये से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी, खासकर गांवों में रहने वाले किसानों के हितों पर भी ध्यान देना होगा।


    किसानों से की जाएगी बात

    जस्टिस सुंदरेश ने कहा, ”देश की बड़ी आबादी के नजरिये से तीसरा पहलू, जो मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है, वह किसान हैं। हमें इस पहलू पर ध्यान देना होगा कि किसानों को किस तरह सशक्त बनाया जाए। इस पर कोई भी बात नहीं कर रहा है।” इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वह मामले में अपनी दलीलों के दौरान किसानों से जुड़े मुद्दे पर भी बात करेंगे। शीर्ष अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई अगले महीने के लिए टाल दी गई। बता दें कि उच्चतम न्यायालय 2025-26 के एथनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए आवंटन बढ़ाने से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहा है।

  • हसीना के सत्ता से हटने से पहले ही यूनुस को कमान सौंपने की हो गई थी तैयारी! इस दावे से बांग्लादेश में नई बहस शुरू

    हसीना के सत्ता से हटने से पहले ही यूनुस को कमान सौंपने की हो गई थी तैयारी! इस दावे से बांग्लादेश में नई बहस शुरू


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने और मोहम्मद यूनुस के अंतरिम सरकार का नेतृत्व संभालने से जुड़े घटनाक्रम पर नया विवाद खड़ा हो गया है। यूनुस के पूर्व प्रेस सचिव और समाचार एजेंसी AFP के पूर्व पत्रकार शफीकुल आलम ने दावा किया है कि हसीना के प्रधानमंत्री पद छोड़ने से पहले ही छात्र नेताओं ने यूनुस को अंतरिम सरकार की कमान सौंपने के लिए उनसे संपर्क की कोशिश शुरू कर दी थी। इस पूरी प्रक्रिया में AFP की फैक्ट-चेक टीम के तत्कालीन संपादक कदरुद्दीन शिशिर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। हालांकि, इस दावे से यह साबित नहीं होता कि सरकार गिराने की पूरी योजना पहले से तैयार थी।

    शफीकुल आलम के इस बयान के बाद बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के पीछे की रणनीति और अंतरिम सरकार के नेतृत्व के चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आलम के मुताबिक, शिशिर ने छात्र नेताओं की ओर से यूनुस से संपर्क किया और दोनों पक्षों के बीच शुरुआती बातचीत कराने में मदद की।

    कैसे हुई यूनुस और छात्र नेताओं के बीच बातचीत?
    शफीकुल आलम ने फेसबुक पोस्ट में बताया कि अगस्त 2024 में जब हसीना विरोधी आंदोलन तेज हो रहा था, तब छात्र नेता ऐसे भरोसेमंद व्यक्ति की तलाश में थे, जो उनकी बात मोहम्मद यूनुस तक पहुंचा सके। उस समय AFP की फैक्ट-चेक टीम के संपादक कदरुद्दीन शिशिर ने यह जिम्मेदारी संभाली।

    आलम के अनुसार, शिशिर ढाका स्थित AFP कार्यालय में उनके पास ही बैठते थे और उन्होंने पूरी बातचीत गोपनीय तरीके से कराई। उन्होंने लिखा कि शिशिर ने छात्र नेताओं की ओर से सबसे पहले यूनुस से संपर्क किया और दोनों पक्षों के बीच शुरुआती बातचीत का रास्ता बनाया।

    आलम ने दावा किया कि उस समय शेख हसीना की सरकार कमजोर पड़ रही थी, लेकिन यह संपर्क बेहद जोखिम भरा था। यदि सरकार को इसकी जानकारी मिल जाती तो शिशिर और AFP की पूरी टीम को कथित तौर पर ‘आइनाघर’ पहुंचा दिया जाता।

    ‘आइनाघर’ बांग्लादेश में एक कथित गुप्त हिरासत केंद्र के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है। हसीना शासन के दौरान यहां राजनीतिक विरोधियों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने, प्रताड़ित करने और उनकी हत्या किए जाने के आरोप लगते रहे हैं।

    आलम ने यह भी कहा कि शिशिर ने सरकार की कथित कार्रवाई से जुड़े वीडियो सबूत जुटाने शुरू कर दिए थे। AFP ने अगस्त 2024 के घटनाक्रम के दौरान बताया था कि इंटरनेट ब्लैकआउट के बीच उसका ढाका ब्यूरो उन चुनिंदा स्थानों में शामिल था, जहां से बाहरी दुनिया तक खबरें पहुंचाई जा सकती थीं।

    हसीना के देश छोड़ने से पहले शुरू हुई थी यूनुस की भूमिका?
    शफीकुल आलम के दावे से यह सवाल उठ रहा है कि क्या मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाने की बातचीत शेख हसीना के देश छोड़ने से पहले ही शुरू हो गई थी।

    बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ बड़े जनआंदोलन में बदल गया। हिंसक प्रदर्शनों के बीच 5 अगस्त 2024 को हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा। वह भारत पहुंचीं।

    इसके अगले दिन, 6 अगस्त को छात्र आंदोलन के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस घोषणा में नाहिद इस्लाम और आसिफ महमूद जैसे छात्र नेता शामिल थे। बाद में ये दोनों यूनुस सरकार में सलाहकार बने।

    8 अगस्त 2024 को पेरिस से ढाका लौटने के बाद यूनुस ने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार की जिम्मेदारी संभाली। शफीकुल आलम के ताजा बयान के मुताबिक, यूनुस को नेतृत्व सौंपने के लिए संपर्क की प्रक्रिया हसीना के देश छोड़ने से पहले ही शुरू हो चुकी थी। हालांकि, छात्र नेताओं की ओर से संभावित अंतरिम नेतृत्व पर बातचीत होना और पूरे सत्ता परिवर्तन की साजिश पहले से तैयार होना दो अलग-अलग बातें हैं।

    यूनुस का पुराना बयान भी फिर चर्चा में
    इस विवाद के बीच सितंबर 2024 में न्यूयॉर्क के एक कार्यक्रम में मोहम्मद यूनुस की ओर से दिया गया बयान भी चर्चा में आ गया है। उस दौरान उन्होंने अपने विशेष सहायक महफूज आलम को पूरी क्रांति के पीछे का दिमाग बताया था।

    यूनुस ने जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन को अचानक हुआ घटनाक्रम मानने के बजाय व्यवस्थित तरीके से तैयार किया गया आंदोलन बताया था। उन्होंने कहा था कि इसकी नेतृत्व व्यवस्था इस तरह बनाई गई थी कि किसी एक नेता के पकड़े जाने पर भी आंदोलन जारी रह सके।

    यूनुस के उस बयान और शफीकुल आलम के ताजा दावे को जोड़कर अब आंदोलन की तैयारी और सत्ता परिवर्तन के बाद नेतृत्व तय करने की प्रक्रिया पर चर्चा हो रही है।

    हसीना की वापसी के बयान के बीच नया घटनाक्रम
    शफीकुल आलम का यह दावा ऐसे समय आया है, जब भारत में रह रहीं शेख हसीना ने बांग्लादेश लौटने की बात दोहराई है। 19 अक्टूबर को एक ऑनलाइन कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि वह दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें गिरफ्तारी, प्रताड़ना या जान से मारे जाने का डर नहीं है।

    इसी बीच 28 अक्टूबर को ढाका में बांग्लादेश वायुसेना के पूर्व फ्लाइट लेफ्टिनेंट के.एम. तहसिफ सौरी का शव तुराग नदी से बरामद किया गया। 28 वर्षीय तहसिफ का नाम उस वीडियो से जोड़ा गया था, जिसमें कथित तौर पर 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को देश छोड़ते हुए दिखाया गया था।

    तहसिफ को अगस्त 2024 में वायुसेना से सेवा मुक्त कर दिया गया था। उनके परिवार ने हत्या की आशंका जताई है, जबकि पुलिस के मुताबिक मौत के कारणों का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा। फिलहाल उनकी मौत और हसीना के देश छोड़ने वाले वीडियो के बीच किसी संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।

    यूनुस का कार्यकाल खत्म, अब तारिक रहमान की सरकार
    बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बनी अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने वाले मोहम्मद यूनुस ने फरवरी 2026 में पद छोड़ दिया। 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को बहुमत मिला और उसके नेता तारिक रहमान ने 17 फरवरी को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

    यूनुस के कार्यकाल में हसीना विरोधी आंदोलन से जुड़े कई छात्र नेताओं को अंतरिम सरकार में जगह मिली थी। बाद में इनमें से कुछ नेताओं ने नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) बनाई, जिसने जमात गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा।

    अब शफीकुल आलम के बयान ने अगस्त 2024 के घटनाक्रम को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। हालांकि, उनके दावे को सत्ता परिवर्तन की पूर्व नियोजित साजिश का प्रमाण मानने के लिए स्वतंत्र पुष्टि और अतिरिक्त साक्ष्यों की जरूरत होगी।

  • इजरायल चुनाव के रुझानों में फंसा बहुमत का पेंच, नेतन्याहू गठबंधन को सरकार के लिए 2 सीटों की जरूरत

    इजरायल चुनाव के रुझानों में फंसा बहुमत का पेंच, नेतन्याहू गठबंधन को सरकार के लिए 2 सीटों की जरूरत


    नई दिल्ली। इजरायल के राष्ट्रीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर पकड़ को चुनौती मिलती दिख रही है। मंगलवार को मतदान खत्म होने के बाद आए एग्जिट पोल में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को मामूली बढ़त दिखाई गई है। हालांकि, दोनों खेमे बहुमत के जरूरी आंकड़े से दूर हैं। इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में छोटे दलों का समर्थन और गठबंधन की बातचीत अगली सरकार का फैसला कर सकती है।

    एग्जिट पोल में दोनों गठबंधन बहुमत से दूर
    इजरायल के चुनाव में नेतन्याहू के लिकुड गठबंधन और विपक्षी खेमे के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। विभिन्न टीवी चैनलों के एग्जिट पोल में नेतन्याहू के समर्थक गठबंधन को करीब 50 सीटें, जबकि आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 52 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया। अरब दलों को मिलाकर करीब 18 सीटें मिलने का अनुमान है।

    ये आंकड़े एग्जिट पोल के अनुमान हैं, आधिकारिक अंतिम नतीजे नहीं। मतगणना और विशेष श्रेणी के मतों की गिनती के बाद सीटों का वितरण बदल सकता है। फिलहाल किसी भी मुख्य गठबंधन के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं हैं।

    लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन सरकार बनाना आसान नहीं
    प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, गादी आइजनकोट की याशर पार्टी विपक्ष के प्रमुख दलों में शामिल है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी नेतन्याहू के सामने विपक्षी खेमे के प्रमुख चेहरों में हैं।

    हालांकि, इजरायल की संसदीय व्यवस्था में सबसे बड़ी पार्टी बनना अपने आप सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। किसी भी नेता को संसद में बहुमत का समर्थन जुटाना होगा। यदि छोटे दलों के साथ समझौता नहीं हो पाया, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।

    77.7 प्रतिशत मतदान, 25 साल में सबसे ज्यादा
    इजरायल के केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार, इस बार मतदान 77.7 प्रतिशत रहा। यह 1999 के बाद मतदान समाप्त होने के समय दर्ज सबसे ऊंचे आंकड़ों में से एक है और 2022 के चुनाव की तुलना में करीब सात प्रतिशत अंक अधिक है।

    7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान से जुड़े संघर्षों के बाद यह पहला राष्ट्रीय चुनाव था। इस वजह से देश की सुरक्षा, सैन्य रणनीति और नेतन्याहू के नेतृत्व को लेकर मतदाताओं की राय चुनाव के केंद्र में रही।

    अरब दलों के समर्थन पर नेतन्याहू का विरोध
    नेतन्याहू ने अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाने की संभावना का विरोध किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने विपक्ष पर अरब पार्टियों के सहारे सरकार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया और इजरायल में एकजुट जायोनी बहुमत की वकालत की।

    दूसरी ओर, अरब दलों को मिलने वाली संभावित सीटें सरकार गठन में अहम भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, विपक्षी खेमे के लिए भी इन दलों का समर्थन हासिल करना आसान नहीं है। इस मुद्दे पर अलग-अलग दलों के रुख से गठबंधन बनाने की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।

    अंतिम नतीजों के बाद शुरू होगी सरकार बनाने की कवायद
    मतदान के बाद सामने आए एग्जिट पोल किसी स्पष्ट विजेता की तस्वीर पेश नहीं करते। अंतिम मतगणना के बाद भी यदि कोई गठबंधन 61 सीटों तक नहीं पहुंचता है, तो राजनीतिक दलों को समर्थन जुटाने और साझा सरकार बनाने के लिए बातचीत करनी होगी।

    इस चुनाव का नतीजा केवल सबसे बड़ी पार्टी तय करने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती संसद में बहुमत का समर्थन हासिल करना है। इसलिए नेतन्याहू और आइजनकोट, दोनों के लिए आने वाले दिन निर्णायक होंगे।

  • मध्य प्रदेश के सरकारी पोर्टल्स पर साइबर हमले का खतरा, NIC का अलर्ट जारी, विशेषज्ञों की टीमें 24 घंटे निगरानी में जुटीं

    मध्य प्रदेश के सरकारी पोर्टल्स पर साइबर हमले का खतरा, NIC का अलर्ट जारी, विशेषज्ञों की टीमें 24 घंटे निगरानी में जुटीं

    मध्य प्रदेश: में सरकारी वेबसाइटों और ऑनलाइन पोर्टल्स की साइबर सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है। PHP सॉफ्टवेयर में गंभीर सुरक्षा खामी सामने आने के बाद राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ने राज्य के आईटी तंत्र को अलर्ट किया है। इस खतरे को देखते हुए प्रदेश में सरकारी वेबसाइटों और सर्वरों की निगरानी तेज कर दी गई है। कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम (CERT) की तकनीकी टीम लगातार 24 घंटे निगरानी कर रही है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की समय रहते पहचान की जा सके।

    प्रदेश में बिजली, राजस्व, नागरिक आपूर्ति और विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी कई वेबसाइटें PHP तकनीक पर संचालित होती हैं। ऐसे में सॉफ्टवेयर की सुरक्षा में सामने आई कमी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, इस खामी का फायदा उठाकर हमलावर दूर से ही सरकारी सर्वर तक अनधिकृत पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में इसके लिए सामान्य लॉगिन या पासवर्ड की आवश्यकता नहीं पड़ने का जोखिम भी बताया गया है।

    साइबर सुरक्षा से जुड़ी इस कमजोरी को गंभीर श्रेणी में रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी गंभीरता का आकलन 10 में से 9.2 अंक के रूप में किया गया है। यह रेटिंग संभावित खतरे की गंभीरता को दर्शाती है। इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ सर्वरों को निशाना बनाने की शुरुआती कोशिशें भी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, इन प्रयासों के मध्य प्रदेश में होने की पुष्टि नहीं हुई है।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा खामी को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो सरकारी विभागों के महत्वपूर्ण डेटा की चोरी होने और ऑनलाइन सेवाओं के बाधित होने का खतरा पैदा हो सकता है। सरकारी पोर्टल्स के माध्यम से नागरिकों को विभिन्न सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसे में सर्वर की सुरक्षा में सेंध लगने से विभागीय कामकाज के साथ-साथ आम लोगों को मिलने वाली डिजिटल सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

    अलर्ट में पुराने सॉफ्टवेयर संस्करणों का इस्तेमाल करने वाले विभागों को विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत बताई गई है। जिन वेबसाइटों पर PHP के पुराने या अपडेट नहीं किए गए संस्करण चल रहे हैं, उनके अधिक जोखिम में होने की आशंका है। तकनीकी सलाह के मुताबिक, पुराने संस्करणों में मौजूद सुरक्षा कमजोरियों को दूर करना जरूरी है, ताकि हमलावर उनका फायदा न उठा सकें।

    इसी के तहत सरकारी वेबसाइटों और सर्वरों का प्रबंधन करने वाली तकनीकी टीमों को सॉफ्टवेयर अपडेट करने और उपलब्ध सुरक्षा पैच लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही सर्वरों पर आने वाले इंटरनेट ट्रैफिक की लगातार निगरानी करने को कहा गया है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या अनधिकृत पहुंच की कोशिश सामने आने पर तत्काल कार्रवाई करना इस निगरानी व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है।

    प्रदेश में साइबर सुरक्षा की स्थिति को लेकर वैभव श्रीवास्तव, एसपी एटीएस एवं ज्वाइंट डायरेक्टर CERT ने बताया कि सुरक्षा संबंधी अलर्ट प्राप्त हुआ है और उनकी टीम लगातार सातों दिन, 24 घंटे निगरानी कर रही है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में पिछले दो वर्षों से काम किया जा रहा है और अब तक ऐसी कोई घटना सामने नहीं आई है। टीम लगातार स्थिति पर नजर रख रही है।

    सरकारी पोर्टल्स की सुरक्षा के लिए फिलहाल सॉफ्टवेयर अपडेट, सर्वर मॉनिटरिंग और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने को प्राथमिकता दी जा रही है। तकनीकी टीमों के सामने चुनौती यह है कि संभावित कमजोरियों को जल्द दूर किया जाए और सरकारी डिजिटल सेवाओं को सुरक्षित तथा सुचारु बनाए रखा जाए।

  • जजों की नियुक्ति में सरकार के आगे नरम पड़ जाते थे पूर्व CJI चंद्रचूड़; SC के पूर्व जज कौल का दावा

    जजों की नियुक्ति में सरकार के आगे नरम पड़ जाते थे पूर्व CJI चंद्रचूड़; SC के पूर्व जज कौल का दावा


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पूर्व न्यायाधीश (Former Judge) जस्टिस संजय किशन कौल (Justice Sanjay Kishan Kaul) ने अपनी आत्मकथा विदाउट फियर ऑफ फेवर (Without Fear of Favour) में कई दावे किए हैं। इस किताब ने देश की शीर्ष न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों पर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जस्टिस कौल का दावा है कि जजों की नियुक्ति के मामलों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ (DY Chandrachud) का सरकार की तरफ झुकाव रहता था। डीवाई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले ही सरकार से अनौपचारिक सहमति लेने की कोशिश करते थे।

    दिसंबर 2023 में रिटायर हुए जस्टिस कौल के अनुसार, सरकार के साथ संबंधों को संभालने को लेकर उनके और तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ के बीच गंभीर मतभेद थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस कौल ने अपनी किताब में लिखा है कि कॉलेजियम की चर्चा से पहले सरकार की सहमति लेना एक गलत संदेश देता है। जब भी न्यायपालिका सरकार को मौका देगी तो राजनीतिक वर्ग अपनी बात मनवाने की कोशिश करेगा।

    जस्टिस कौल ने अपनी किताब में कॉलेजियम से जुड़ी एक घटना का जिक्र किया है। जजों के छह खाली पदों को भरा जाना था। कॉलेजियम के सदस्य पहले ही पांच नामों पर सहमत हो चुके थे। कौल लिखते हैं, “बैठक में जाते समय सीजेआई ने एक छठा नाम सुझाया। बाकी जजों ने इसका विरोध किया। मुझे शक हुआ कि यह नाम सरकार के कहने पर सुझाया गया है। इसके बाद CJI उन्हें एक तरफ ले गए और सोचने लगे कि क्या उन्हें सरकार का रुख जानने के लिए फोन करना चाहिए।”

    कौल आगे लिखते हैं, “मेरा शक सही निकला और मैंने उनसे समझदारी से काम लेने को कहा। कॉलेजियम की बैठक के बीच वे ऐसा नहीं कर सकते थे।”

    एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज उम्मीदवार की नियुक्ति के समय सरकार ने उनकी जाति और धार्मिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए। जस्टिस कौल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह के सवाल बेतुके थे। जब चंद्रचूड़ ने सरकार के रुख को साझा किया तो जस्टिस कौल इतने नाराज हो गए कि उन्होंने फाइल बंद की और कॉलेजियम की बैठक से वॉकआउट कर दिया। बाद में सरकार ने अपना रुख बदला और उस जज की नियुक्ति हो गई।


    ‘रीढ़ की हड्डी’ वाले जजों का सम्मान करती है सरकार

    आत्मकथा में जस्टिस कौल ने लिखा, “मेरा अनुभव रहा है कि सरकार उन जजों का बहुत अधिक सम्मान करती है जिनमें रीढ़ की हड्डी यानी कि दृढ़ता होती है। जब न्यायपालिका मजबूती से अपनी बात रखती है तो सरकार को पीछे हटना पड़ता है।” उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का काम सरकार के साथ संतुलन बनाना है न कि विपक्ष की भूमिका निभाना। 2015 में रद्द किए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को तुरंत खारिज करने के बजाय एक मौका दिया जाना चाहिए था।

    उन्होंने राफेल लड़ाकू विमान मामले का भी जिक्र किया, जिसमें उनकी बेंच ने इस सौदे को दी गई चुनौती को खारिज कर दिया था। उन्होंने लिखा, “जो लोग मौजूदा सरकार का विरोध करते हैं वे उम्मीद करते हैं कि अदालत उनकी मदद के लिए आगे आएगी। लेकिन अदालत का काम यह नहीं है।”


    जस्टिस चंद्रचूड़ क्या बोले?

    जस्टिस कौल के इन दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “मैंने अभी किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए संदर्भ जाने बिना टिप्पणी करना कठिन है। हालांकि, मेरे कार्यकाल में कॉलेजियम की बैठकें बेहद सम्मानजनक और सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई हैं। मुझे ऐसी किसी घटना की याद नहीं है जब जस्टिस कौल कॉलेजियम की बैठक से वॉकआउट कर गए हों। सरकार के साथ संवाद एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि जजों की नियुक्ति का वारंट राष्ट्रपति ही जारी करते हैं।”


    कॉलेजियम की कमियों पर सवाल

    जस्टिस कौल ने अपनी किताब में उस न्यायिक प्रणाली की भी आलोचना की है जिसमें उन्होंने 22 वर्षों तक सेवा दी। उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली को अत्यधिक अपारदर्शी और कमियों से भरी बताया, जिसमें अनौपचारिक चैनलों के जरिए सरकारी दबाव की गुंजाइश बनी रहती है। इसके अलावा उन्होंने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में कुछ महत्वपूर्ण मामलों के उनके बेंच से हटाए जाने और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन को टाले जाने पर भी अपनी निराशा व्यक्त की है।

  • इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !

    इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने घरेलू स्तर पर चीनी (Sugar) की उपलब्धता बनाए रखने के लिए गन्ने के उत्पादों से बने इथेनॉल के पेट्रोल में मिश्रण (Petrol Sugarcane-Ethanol Blending) पर फिलहाल रोक लगाने का फैसला किया है। इसके तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनियों ने पेट्रोल में इथेनॉल (Ethanol Blending) मिलाने के लिए 2026-27 आपूर्ति वर्ष की ताजा खरीद निविदा में गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को शामिल नहीं किया है।


    कितना इथेनॉल खरीदने की तैयारी, क्या पेट्रोल में भी मिश्रण?

    भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने 16 अक्तूबर को पेट्रोलियम विपणन कंपनियों की ओर से जारी निविदा में नवंबर से शुरू होने वाले आपूर्ति वर्ष के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां मांगी हैं। इसका उद्देश्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की जरूरत को पूरा करना है।


    मक्के से बने इथेनॉल पर क्या फैसला हुआ?

    निविदा के अनुसार, मक्का, टूटे चावल, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खरीदे गए अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की आपूर्ति के लिए बोलियां लगाई जा सकती हैं। निविदा में मक्के से बने इथेनॉल पर प्रोत्साहन राशि भी घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है, जो पहले 71.86 रुपये प्रति लीटर थी।


    कच्चे माल की खरीद की रणनीति में क्या बदलाव?

    गन्ने उत्पादों से बने इथेनॉल की खरीद पर पाबंदी से पेट्रोल मिश्रण कार्यक्रम के लिए कच्चे माल की खरीद की रणनीति में बदलाव होगा। इस कार्यक्रम में कच्चे तेल के आयात को कम करने व वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कटौती के लिए अनाज व गन्ने दोनों से बने इथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता रहा है।


    क्या गन्ने का उत्पादन हो सकता है प्रभावित?

    सरकार की तरफ से यह कदम घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उठाया गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण उत्पादन घटने और कीमतें बढ़ने का जोखिम पैदा हुआ है।

  • इथेनॉल बनाने में अब नहीं होगा चीनी का इस्तेमाल… दाम बढ़ने के बाद सरकार का बड़ा कदम…

    इथेनॉल बनाने में अब नहीं होगा चीनी का इस्तेमाल… दाम बढ़ने के बाद सरकार का बड़ा कदम…


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (India Government) ने चीनी (Sugar) की बढ़ती कीमतों (Rising Prices) पर काबू पाने और घरेलू बाजार में इसकी सप्लाई बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने तेल कंपनियों (Oil Companies) को निर्देश दिया है कि साल 2026-27 के सप्लाई में चीनी से इथेनॉल (Ethanol) बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल शून्य किया जाए। इसके तहत गन्ने के रस, चीनी, चीनी की चाशनी और बी-हैवी मोलासेस (गुड़ बनाने की प्रक्रिया में बचने वाला गाढ़ा लिक्विड पदार्थ) से बने इथेनॉल की खरीद के लिए ताजा टेंडर में बोली नहीं मांगी गई है।


    क्या है डिटेल

    शुक्रवार को जारी टेंडर के मुताबिक, तेल कंपनियां नवंबर से शुरू होने वाले सप्लाई वर्ष के लिए करीब 11 अरब लीटर इथेनॉल खरीदने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, इस बार कंपनियां मक्का, टूटे चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) से खरीदे गए अतिरिक्त चावल से बने इथेनॉल की सप्लाई के लिए बोली लगा सकती हैं।


    चीनी की कीमतों पर काबू पाने की कोशिश

    भारत दुनिया में चीनी की सबसे ज्यादा खपत करने वाले देशों में शामिल है। पिछले कुछ समय से देश में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की चिंता बनी हुई है। वहीं, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना प्रोडक्शन राज्यों में कम बारिश के कारण चीनी प्रोडक्शन प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि गन्ने और चीनी का ज्यादा हिस्सा घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए उपलब्ध रहे। इसी वजह से इथेनॉल बनाने में चीनी के इस्तेमाल को सीमित करने का फैसला लिया गया है।


    मक्का और चावल से बने इथेनॉल को मिलेगा मौका

    सरकार के नए टेंडर में इथेनॉल बनाने के लिए मक्का, टूटे चावल और अतिरिक्त चावल के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। इससे चीनी आधारित कच्चे माल के बजाय अनाज से इथेनॉल बनाने पर जोर बढ़ सकता है। इथेनॉल पेट्रोल में मिलाया जाता है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण घटाने में मदद मिल सकती है। भारत ने इसी दिशा में इस साल देशभर में पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य यानी E20 लागू किया है। हालांकि, कुछ वाहन चालकों ने चिंता जताई है कि ज्यादा इथेनॉल मिला पेट्रोल पुराने वाहनों के इंजन और उनके पुर्जों पर असर डाल सकता है।


    मक्का से बने इथेनॉल की खरीद कीमत भी घटाई

    तेल कंपनियों ने मक्का से बने इथेनॉल के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन में भी कटौती की है। टेंडर के मुताबिक, यह प्रोत्साहन 5.79 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके साथ ही मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर से घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर रह गई है। इस बदलाव से इथेनॉल उत्पादकों की कमाई और उत्पादन से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है।


    पहले भी चीनी उत्पादन बढ़ाने पर हो रहा था विचार

    इससे पहले अगस्त में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले गन्ने की मात्रा सीमित करने पर विचार कर रही थी। इसका मकसद चीनी उत्पादन बढ़ाना और कीमतों को काबू में लाना था। अब ताजा टेंडर में चीनी आधारित कच्चे माल से बने इथेनॉल की खरीद को शामिल नहीं किया गया है। इससे साफ है कि फिलहाल सरकार घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने पर जोर दे रही है।

  • सरकार ने देर रात पेट्रोल पर दो रुपये बढ़ाया विंडफॉल टैक्स… डीजल पर 16 रुपये घटाया, नई दरें आज से लागू

    सरकार ने देर रात पेट्रोल पर दो रुपये बढ़ाया विंडफॉल टैक्स… डीजल पर 16 रुपये घटाया, नई दरें आज से लागू


    नई दिल्ली।
    पेट्रोल-डीजल (Petrol and Diesel) पर विंडफॉल टैक्स (Windfall Tax) को लेकर सरकार ने गुरुवार को देर रात एक बड़ा फैसला किया। केंद्र सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर टैक्स 2 रुपये बढ़ाकर 2.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया है, जबकि डीजल पर लगने वाला शुल्क 16 रुपये से घटाकर 8.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। रॉयटर्स के मुताबक नई दरें 16 अक्टूबर 2026 यानी आज से लागू हो गई हैं।


    पेट्रोल-डीजल पर नई टैक्स दरें

    सरकार के फैसले के मुताबिक, पेट्रोल के निर्यात पर अब 2.50 रुपये प्रति लीटर की दर से विंडफॉल टैक्स लगेगा। वहीं, डीजल के निर्यात पर टैक्स में 7.50 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है। एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

    क्या इससे देश में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
    इस फैसले का सीधा असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ेगा। सरकार ने घरेलू खपत के लिए जारी किए जाने वाले पेट्रोल और डीजल पर लागू मौजूदा शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया है। इसलिए केवल निर्यात टैक्स में बदलाव के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे या घटेंगे।


    पेट्रोल-डीजल के दाम कब बदलते हैं?

    जिन देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पूरी तरह बाजार तय करता है, वहां कच्चे तेल की कीमत बदलने का असर बहुत जल्दी दिखता है। जबकि, भारत में फ्यूल की कीमत जारी तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियां करती हैं, लेकिन नियंत्रण सरकार का होता है। क्योंकि, भारत में 90 प्रतिशत से अधिक पेट्रोल पंपों पर सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है। प्राइवेट कंपनियां जैसे नायरा और रिलायंस-बीपी दाम खुद बढ़ाती या घटती हैं। इसके अलावा ईंधन के दाम टैक्स पर भी निर्भर करता है। ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी ज्यादा होगी तो कच्चे तेल की कीमत बदलने का असर अपेक्षाकृत कम होता है।


    पेट्रोल-डीजल के रेट जारी

    रात को विंडफॉल टैक्स में हुए बदलाव के बाद आज शुक्रवार सुबह HPCL, IOCL और BPCL ने पेट्रोल-डीजल के रेट जारी कर दी हैं। आज दिल्ली में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये और डीजल की 95.20 पर स्थिर है। यानी पेट्रोल-डीजल के रेट में कोई बदलाव नहीं हुआ है।


    विंडफॉल टैक्स की हर 15 दिन में होती है समीक्षा

    सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को देखते हुए विंडफॉल टैक्स के रेट की समीक्षा हर 15 दिन में करती है। इस तरह के टैक्स का उद्देश्य ईंधन के निर्यात और घरेलू उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना है।

    बता दें भारत ने पहली बार जुलाई 2022 में फ्यूल के एक्सपोर्ट पर विंडफॉल टैक्स, जिसे अप्रत्याशित कर भी कहा जाता है, लगाया और दो साल बाद उन्हें वापस ले लिया।इसके बाद ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद सरकार ने मार्च 2026 में विंडफॉल टैक्स को फिर से लागू किया।