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  • राहुल गांधी की ‘सरप्राइज पॉलिटिक्स’: छोटा दस्ता, अचानक धरना और सरकार पर सीधा वार

    राहुल गांधी की ‘सरप्राइज पॉलिटिक्स’: छोटा दस्ता, अचानक धरना और सरकार पर सीधा वार


    नई दिल्ली। अचानक धरना, पुलिस थाने की ओर कूच या बिना पूर्व सूचना किसी जगह पहुंच जाना राहुल गांधी की हालिया राजनीति में ‘सरप्राइज’ एक अहम रणनीति के तौर पर उभरता दिख रहा है। पिछले कुछ महीनों में उनके ऐसे कई कदम सामने आए हैं, जिनमें बड़ी भीड़ के बजाय सीमित लोगों के साथ अचानक एक्शन लेकर राजनीतिक और मीडिया का ध्यान खींचने की कोशिश नजर आती है।

    औचक एक्शन, कम लोगों के साथ मैदान में उतरना
    राहुल गांधी इन दिनों मोदी सरकार को घेरने के लिए विरोध प्रदर्शन के पारंपरिक तरीकों से अलग रास्ता अपनाते दिख रहे हैं। कभी अचानक धरना, कभी पुलिस थाने की ओर मार्च और कभी किसी तय कार्यक्रम से अलग मौके पर पहुंच जाना—इन कदमों में एक बात समान रहती है, वह है औचक कार्रवाई।

    6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी मार्च के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला। पुलिस ने संसद मार्ग पर बैरिकेडिंग कर रखी थी। इसके बाद राहुल गांधी ने बैरिकेड पार किया और प्रियंका गांधी के साथ आकाशवाणी भवन परिसर में पहुंचकर धरना शुरू कर दिया। यह प्रदर्शन करीब आठ घंटे तक चला और बाद में पुलिस ने दोनों को हिरासत में लिया।

    अगले दिन भी विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी का काफिला अचानक जंतर-मंतर की ओर बढ़ा। इस तरह के कदमों ने पुलिस और प्रशासन के सामने पहले से तय विरोध-प्रदर्शन के प्रबंधन को चुनौती दी है।

    नया नहीं है यह तरीका
    हालांकि राहुल गांधी के लिए अचानक मैदान में उतरना कोई बिल्कुल नया प्रयोग नहीं है। इसकी झलक कई साल पहले भट्टा-पारसौल आंदोलन के दौरान भी दिखाई दी थी। उस समय वह बाइक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश पहुंचे थे और किसानों से मुलाकात की थी।

    फर्क इतना है कि हाल के वर्षों में इस तरह के राजनीतिक कदमों की आवृत्ति और दृश्यता बढ़ी है। अब अचानक किए गए किसी एक्शन को सोशल मीडिया और न्यूज कवरेज के जरिए बड़े राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश भी दिखाई देती है।

    मार्शल आर्ट से राजनीति तक
    राहुल गांधी अपने फिटनेस और मार्शल आर्ट्स अभ्यास को लेकर भी सार्वजनिक तौर पर बात करते रहे हैं। भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान उन्होंने शाम के समय जिउ-जित्सु और मार्शल आर्ट्स से जुड़े अभ्यास को लेकर वीडियो भी साझा किए थे। उनका कहना रहा है कि इन गतिविधियों का उद्देश्य फिटनेस के साथ युवाओं को मार्शल आर्ट्स से जोड़ना भी है।

    फिटनेस को लेकर राहुल गांधी ने अगस्त 2026 में भी बताया था कि वह व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद करीब एक घंटा शारीरिक प्रशिक्षण के लिए निकालते हैं। उनके मुताबिक इसमें ताकत, एरोबिक क्षमता और लचीलेपन पर काम शामिल होता है।

    धरना पॉलिटिक्स में फिटनेस भी जरूरी
    सड़क पर उतरकर किए जाने वाले लंबे राजनीतिक प्रदर्शनों में शारीरिक ऊर्जा भी एक अहम पहलू बन जाती है। राहुल गांधी के हालिया प्रदर्शनों में इसका उदाहरण देखने को मिला है। आकाशवाणी भवन के बाहर उनका धरना कई घंटे चला, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया।

    यानी जिस फिटनेस को राहुल गांधी पहले निजी अनुशासन के तौर पर पेश करते रहे हैं, उसे अब उनकी सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। कांग्रेस भी पिछले कुछ समय से राहुल गांधी की सड़क पर उतरकर सीधे विरोध करने वाली छवि को प्रमुखता देती दिख रही है।

    ‘अड़ियल तेवर’ या सोची-समझी रणनीति?
    हाल के प्रदर्शनों में राहुल गांधी का तरीका सरकार के साथ सीधे टकराव वाला नजर आया है। चाहे प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ते हुए धरने पर बैठना हो या संसद मार्ग पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग पर टिके रहना—उनके इन कदमों में पीछे हटने के बजाय मौके पर बने रहने का संदेश प्रमुख रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषण में इसे एक ऐसी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सिर्फ अपनी मांग दर्ज कराना नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन पर तत्काल राजनीतिक दबाव बनाना और घटनाक्रम को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाना भी है। हालिया प्रदर्शनों में राहुल गांधी के अचानक लिए गए फैसलों ने इसी तरह की चर्चा को बढ़ाया है।

    ‘ब्रांड मोदी’ के सामने अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश
    राहुल गांधी के सामने राजनीतिक चुनौती यह भी है कि नरेंद्र मोदी की राजनीति लंबे समय से एक मजबूत और स्थापित राजनीतिक ब्रांड के रूप में सामने रही है। ऐसे में राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि को उससे अलग रूप देने की कोशिश कांग्रेस की मौजूदा रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है।

    एक तरफ नरेंद्र मोदी की स्थापित सत्ता और संगठन आधारित राजनीति है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी की ओर से सड़क पर उतरने, अचानक विरोध करने और टकराव की स्थिति में पीछे नहीं हटने वाली छवि को उभारने का प्रयास नजर आता है।

    हालिया घटनाक्रम से यह जरूर स्पष्ट है कि राहुल गांधी की राजनीति में सरप्राइज, सीमित टीम के साथ अचानक एक्शन और दृश्यता वाले विरोध प्रदर्शन का इस्तेमाल बढ़ा है। अब यह रणनीति कांग्रेस को कितना राजनीतिक लाभ देती है और जनता के बीच राहुल गांधी की छवि को किस दिशा में ले जाती है, इसका आकलन आने वाले समय में राजनीतिक घटनाक्रम और जन प्रतिक्रिया से होगा।

  • पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल

    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने की तैयारी फिर तेज हो गई है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य सरकार जल्द विधानसभा में नाम परिवर्तन से जुड़ा विधेयक पेश करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि यह बिल अगले विधानसभा सत्र में लाया जा सकता है।

    समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य का नाम ‘बंगाल’ या ‘वेस्ट बंगाल’ रखने के बजाय ‘पश्चिम बंग’ किया जाएगा। उनके मुताबिक, इस नाम का उद्देश्य राज्य को उसके इतिहास और पहचान से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द इस दिशा में विधायी प्रक्रिया शुरू करेगी।

    वाराणसी में बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’
    समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाने की योजना की भी जानकारी दी। उनके मुताबिक, यह भवन राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग, केंद्र सरकार तथा कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के वंशजों के सहयोग से तैयार किया जाएगा।

    यह भवन केवल सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर ही नहीं, बल्कि बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी उपयोग किया जाएगा। प्रस्ताव में सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ अन्य सुविधाएं विकसित करने की बात कही गई है।

    भाजपा नेता ने वाराणसी और बंगाल के बीच पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कूचबिहार के राजपरिवार से जुड़े इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और इसके बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।

    पहले भी कई बार उठा है नाम बदलने का मुद्दा
    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा नया नहीं है। 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बाद में ‘बांग्ला’ नाम को लेकर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

    2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा दोबारा उठा। ममता बनर्जी सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में राज्य का नाम काफी नीचे आने के कारण राष्ट्रीय बैठकों में पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव का समर्थन भी हुआ, लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिली।

    इसके बाद 2016 में नाम बदलने की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। उस समय बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने का प्रस्ताव सामने आया। वर्ष 2018 में विधानसभा ने सर्वसम्मति से राज्य का नाम केवल ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव पारित किया था।

    हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। नाम परिवर्तन के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी होने की बात सामने आई। साथ ही भाजपा के एक वर्ग ने ‘बांग्ला’ नाम की ‘बांग्लादेश’ से समानता को लेकर भी आपत्ति जताई थी।

    अब आगे क्या होगा?
    समिक भट्टाचार्य ने अब एक बार फिर ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव सामने रखा है। हालांकि, केवल राज्य विधानसभा में विधेयक पेश और पारित होने से नाम तुरंत नहीं बदलेगा। राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे केंद्र और संसद की भूमिका भी होगी। मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को विधानसभा स्तर से आगे बढ़कर केंद्र की प्रक्रिया और संसद की मंजूरी से गुजरना होगा। इसलिए फिलहाल पश्चिम बंगाल का आधिकारिक नाम ‘पश्चिम बंग’ नहीं हुआ है; यह नाम बदलने की प्रस्तावित प्रक्रिया का हिस्सा है।

  • खुदरा चीनी की कीमतों में 15 प्रतिशत की गिरावट, एक्स-मिल दाम 28 प्रतिशत घटे, सरकार ने स्टॉक सीमा भी तय की

    खुदरा चीनी की कीमतों में 15 प्रतिशत की गिरावट, एक्स-मिल दाम 28 प्रतिशत घटे, सरकार ने स्टॉक सीमा भी तय की

    नई दिल्ली। खुदरा बाजार में चीनी की कीमतों में अगस्त के उच्चतम स्तर से करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, मिल से निकलने वाली चीनी यानी एक्स-मिल कीमतों में भी उच्चतम स्तर से करीब 28 प्रतिशत की कमी आई है। सरकार के अनुसार एक्स-मिल चीनी की कीमतें पिछले करीब तीन सप्ताह से स्थिर बनी हुई हैं। सरकार ने उम्मीद जताई है कि कम एक्स-मिल कीमतों का लाभ सप्लाई चेन तक पहुंचने के बाद खुदरा बाजार में चीनी की कीमतों में आगे भी कमी आ सकती है। अगस्त में चीनी की कीमतें अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची थीं, जिसके बाद औसत खुदरा कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिली है।

    सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और बाजार में चीनी की सुचारू आवाजाही बनाए रखने के लिए उठाए गए विभिन्न कदम हैं। जमाखोरी रोकने और सप्लाई व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के लिए चीनी डीलरों के स्टॉक रखने की अवधि घटाकर 15 दिन कर दी गई है। इसके साथ ही डीलरों के लिए स्टॉक रखने की अधिकतम सीमा 1,000 क्विंटल तय की गई है। ये नए नियम 15 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेंगे। नियमों के तहत डीलरों को चीनी मिलने की तारीख से 15 दिन से अधिक समय तक उसका स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी।

    इसके अलावा देश में किसी भी स्थान पर और किसी भी समय डीलर 1,000 क्विंटल से अधिक चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। हालांकि क्षेत्रीय बाजार की विशेष जरूरतों को देखते हुए कोलकाता और उसके आसपास के महानगरीय इलाकों तथा असम के लिए अलग सीमा निर्धारित की गई है। इन क्षेत्रों में चीनी डीलरों के लिए स्टॉक रखने की अधिकतम सीमा 2,000 क्विंटल तय की गई है। सरकार के अनुसार इन क्षेत्रों में आपूर्ति की जरूरतों और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह अलग सीमा तय की गई है।

    सरकार ने बताया कि कोलकाता में चीनी की आपूर्ति उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक से होती है। यहां से चीनी की आपूर्ति पूर्वी भारत के विभिन्न हिस्सों के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र में भी की जाती है। वहीं, असम के लिए अधिक स्टॉक सीमा तय करने के पीछे भौगोलिक चुनौतियों और परिवहन से जुड़ी लॉजिस्टिक्स को ध्यान में रखा गया है। सरकार के अनुसार पूर्वोत्तर क्षेत्र में उपभोक्ताओं के हितों को देखते हुए भी असम के लिए 2,000 क्विंटल की सीमा रखी गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संबंधित क्षेत्रों में चीनी की आपूर्ति को प्रभावित किए बिना स्टॉक नियंत्रण बनाए रखना है।

    नए नियमों का मुख्य उद्देश्य डिस्ट्रीब्यूशन चेन में चीनी के अनावश्यक जमावड़े को रोकना और मिलों से डीलरों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक इसकी आपूर्ति सुचारू बनाए रखना है। सरकार के अनुसार स्टॉक रखने की मात्रा और अवधि दोनों सीमित करने से सप्लाई चेन में चीनी की आवाजाही व्यवस्थित होगी। इससे जमाखोरी पर रोक लगाने, सट्टेबाजी को हतोत्साहित करने और डीलरों द्वारा लंबे समय तक चीनी जमा करके रखने की स्थिति को रोकने में मदद मिलेगी। सरकार का कहना है कि इन उपायों के जरिए बाजार में उचित कीमतों पर चीनी की लगातार उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी। वहीं, एक्स-मिल कीमतों में पहले ही करीब 28 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है और पिछले तीन सप्ताह से इसमें स्थिरता बनी हुई है।

  • MP: स्वामित्व योजना पर गतिरोध जारी….सरकार ने शुरू की पटवारियों पर कार्रवाई की तैयारी

    MP: स्वामित्व योजना पर गतिरोध जारी….सरकार ने शुरू की पटवारियों पर कार्रवाई की तैयारी


    भोपाल।
    स्वामित्व योजना (SVAMITVA Scheme) के तहत रजिस्ट्री से जुड़े काम को लेकर सरकार और पटवारियों (Government and Patwaris) के बीच गतिरोध खत्म नहीं हुआ है। सरकार के निर्देश के बावजूद पटवारी इस काम को करने के लिए तैयार नहीं हैं। अब सरकार ने पटवारियों पर कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए जिलों से उनके खिलाफ दर्ज पुराने मामलों और शिकायतों की जानकारी मांगी गई है।

    राजस्व विभाग (Department of Revenue) ने सभी जिलों को एक प्रारूप भेजकर पटवारियों के खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं। इसमें भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के साथ लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) की जांच और प्रकरणों की जानकारी भी मांगी गई है। सरकार ने ऐसे मामलों का भी ब्योरा मांगा है, जिनमें पटवारियों की आय से अधिक संपत्ति की शिकायत या प्रकरण सामने आए हों। इसके अलावा लंबे समय से अभियोजन की मंजूरी लंबित मामलों और जांच एजेंसियों की जांच में दोषी पाए गए पटवारियों की जानकारी भी मांगी गई है। जिलों से यह भी पूछा गया है कि संबंधित मामलों में आगे क्या कार्रवाई की जा सकती है।


    रजिस्ट्री के काम को लेकर नहीं बनी सहमति

    स्वामित्व योजना के तहत होने वाली रजिस्ट्री के काम से पटवारियों ने दूरी बना रखी है। पटवारी संघ का कहना है कि वे योजना से जुड़े काम के अलावा दूसरे राजस्व कार्य कर रहे हैं। संघ का कहना है कि सरकार के साथ बातचीत के बावजूद अभी तक इस मुद्दे पर कोई सहमति नहीं बनी है। पटवारियों की आपत्ति को दूर करने के लिए सरकार की ओर से उन्हें कुछ आश्वासन भी दिए गए थे। इनमें रजिस्ट्री के दस्तावेजों में पटवारियों के नाम नहीं लिखे जाने और विवादित मामलों की रजिस्ट्री का काम नहीं सौंपे जाने की बात शामिल थी। चार मंत्रियों की समिति ने भी पटवारियों के प्रतिनिधियों से चर्चा की थी। इसके बावजूद पटवारियों ने स्वामित्व योजना से जुड़े रजिस्ट्री कार्य से दूरी बनाए रखी है।


    अब पुराने प्रकरणों पर कार्रवाई की तैयारी

    पटवारियों के काम नहीं करने के रुख के बाद मुख्य सचिव ने स्वामित्व योजना के तहत रजिस्ट्री का काम गुरुवार से शनिवार तक करने के निर्देश दिए थे। साथ ही काम से इनकार करने वाले पटवारियों पर कार्रवाई की बात भी कही गई थी। अब सरकार ने जिलों से पुराने प्रकरणों की जानकारी मांगकर अगला कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि पटवारी संघ का कहना है कि स्वामित्व योजना के काम को लेकर उनका रुख अभी नहीं बदला है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और पटवारियों के बीच टकराव बढ़ने के आसार हैं।

  • वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम के छह अंतरे गाने को अनिवार्य करने वाले प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा। मामला कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा की ओर से दायर रिट याचिका से जुड़ा है।

    याचिका में केंद्र सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई है, जिसमें वंदे मातरम के छह पदों के गायन को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को लेकर संवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए हैं।

    टीएम कृष्णा की ओर से अदालत में कहा गया कि वंदे मातरम के चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। याचिका में तर्क दिया गया है कि लोगों को इन पदों का गायन करने के लिए बाध्य करना धार्मिक और वैचारिक समर्थन के लिए मजबूर करने के समान हो सकता है।

    याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से जुड़े हालिया संशोधन को भी चुनौती दी गई है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या इस तरह का प्रावधान कानून के स्तर पर लागू किया जा सकता है और इसके तहत किसी व्यक्ति पर गायन के लिए दबाव बनाया जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू की जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। अदालत ने हालांकि इस चरण पर यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत को केवल दो अंतरों तक सीमित रखा जाना चाहिए या छह अंतरों तक इसका गायन किया जाना चाहिए।

    मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने इस विषय को याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों के संदर्भ में देखा।

    केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान कानून बनाए जाने से जुड़े तर्क रखे। वहीं याचिका में उस संशोधन को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े कानून के दायरे में लाने की बात कही गई है।

    याचिकाकर्ता ने इस संशोधन को मनमाना बताते हुए अदालत से इसकी संवैधानिक वैधता की जांच करने की मांग की है। याचिका का मुख्य सवाल यह है कि राष्ट्रीय गीत के गायन को किस सीमा तक अनिवार्य किया जा सकता है और ऐसा नहीं करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया है, जिसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।

    मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन का प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा। अदालत अब केंद्र के जवाब के बाद इन मुद्दों पर आगे विचार करेगी।

  • UPI से भुगतान पर 0.4% एमडीआर का विरोध शुरू…. सरकार बोली- वापस नहीं होगा फैसला

    UPI से भुगतान पर 0.4% एमडीआर का विरोध शुरू…. सरकार बोली- वापस नहीं होगा फैसला


    नई दिल्ली।
    यूपीआई (UPI ) के जरिये 2000 से अधिक के भुगतान पर 0.4 फीसदी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (0.4% Merchant Discount Rate- MDR) लगाने का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है। कारोबारी संगठनों ने सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि फैसला वापस नहीं होगा।

    वहीं, बुधवार को टैक्स विशेषज्ञों ने यह खुलासा भी किया कि व्यापारियों को 0.4 फीसदी एमडीआर पर 18 फीसदी जीएसटी भी देना होगा। हालांकि, इसके बदले वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा कर पाएंगे जिससे उनका कुल टैक्स बोझ कम हो जाएगा। एनपीसीआई ने मंगलवार को यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क की घोषणा की थी जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है। यह 15 अक्तूबर से लागू होगा।


    एमडीआर को वापस नहीं लेगी केंद्र सरकार

    सरकारी सूत्रों ने कहा, एमडीआर को वापस नहीं लिया जाएगा। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से जब पूछा गया कि क्या सरकार एमडीआर को वापस लेने पर विचार कर रही है, तो उन्होंने कहा, फैसला लिया जा चुका है और इसे पलटने का सवाल नहीं है। अधिकारी ने कहा, संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति ने 32वीं रिपोर्ट में चेतावनी दी कि शून्य एमडीआर व्यवस्था सरकारी खजाने पर दबाव डालती है और इन्फ्रा में निवेश की क्षमता को सीमित करती है। इसलिए एक टिकाऊ राजस्व व्यवस्था बनाना जरूरी है।


    इन श्रेणियों में 5 रुपये एमडीआर

    रेलवे, टेलीकॉम सर्विस, इंश्योरेंस व फ्यूल जैसी खास श्रेणियों के कारोबारियों के लिए 2,000 रुपये से ज्यादा के भुगतान पर भी सिर्फ 5 रुपये का रियायती एमडीआर रेट लागू होगा। स्कूल फीस भुगतान भी 2000 से ज्यादा होने पर सिर्फ 5 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन एमडीआर लागू होगा।


    एमडीआर लागू करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

    यूपीआई से 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर एमडीआर लगाने के केंद्र के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता ने दाखिल की है। उन्होंने कोर्ट से कहा कि नई व्यवस्था मनमानी व भेदभावपूर्ण है और इससे देश में कारोबारियों पर आर्थिक बोझ पड़ेगा।

    पेट्रोल पंप एसोसिएशन ने वित्त मंत्रालय को भेजा पत्र
    एमडीआर के खिलाफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने मोर्चा खोल दिया है। एसोसिएशन ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर इस फैसले से पेट्रोल पंपों को बाहर रखने की मांग की है। यह स्थिति तब है जबकि पेट्रोप पंपों पर 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर प्रति ट्रांजेक्शन सिर्फ 5 रुपये शुल्क लगाए जाने का फैसला लिया गया है।


    मधुमक्खियों की तरह टैक्स जुटाए सरकार : लाहिड़ी

    नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने के फैसले का बचाव किया। उन्होंने चाणक्य का जिक्र करते हुए कहा, नागरिकों से टैक्स वैसे ही वसूलना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूल से शहद इकट्ठा करती है- धीरे-धीरे और बिना फूल की पंखुड़ियों को नुकसान पहुंचाए या तोड़े।


    फैसले के पीछे कोई विदेशी प्रभाव नहीं : वित्त मंत्रालय

    वित्त मंत्रालय ने बुधवार को कहा, यूपीआई लेन-देन पर 0.4% एमडीआर के फैसले के पीछे कोई विदेशी प्रभाव नहीं है। मंत्रालय ने एक्स पर पोस्ट में कहा, कुछ दावों में कहा गया है कि यह बदलाव विदेशी असर की वजह से हुआ है। यह बात गलत है। भारत के नीतिगत फैसले आजादी से लिए जाते हैं।

  • UPI पर नया नियम: ग्राहक से नहीं लिया जाएगा चार्ज, बड़े व्यापारियों पर लगेगा शुल्क

    UPI पर नया नियम: ग्राहक से नहीं लिया जाएगा चार्ज, बड़े व्यापारियों पर लगेगा शुल्क


    नई दिल्ली। UPI से पेमेंट करने वाले ग्राहकों के लिए राहत की बात है कि प्रस्तावित नए MDR ढांचे में उन्हें सीधे कोई चार्ज नहीं देना होगा। 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस फ्रेमवर्क के मुताबिक, 2,000 रुपए से अधिक के कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.40% MDR लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन होगी। छोटे दुकानदारों को इससे बाहर रखा गया है।

    नए नियम को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चार्ज किससे लिया जाएगा, छोटे दुकानदारों की पहचान कैसे होगी और क्या इसका बोझ ग्राहक पर डाला जा सकेगा? आइए 12 सवालों में समझते हैं पूरा मामला।

    1. क्या UPI से पेमेंट करने वाले ग्राहक को चार्ज देना होगा?

    नहीं। दिए गए फ्रेमवर्क के मुताबिक MDR P2M यानी Person-to-Merchant लेनदेन पर लागू होगा। ग्राहक 2,000 रुपए से ज्यादा का UPI भुगतान करता है तो भी उससे सीधे कोई MDR नहीं लिया जाएगा। यह शुल्क पात्र मर्चेंट से जुड़ेगा।

    2. कितना MDR देना होगा?

    2,000 रुपए से ज्यादा का भुगतान प्राप्त करने वाले पात्र बड़े व्यापारी पर 0.40% MDR लगेगा। हालांकि इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन तय की गई है। यानी किसी एक लेनदेन पर 300 रुपए से अधिक MDR नहीं लिया जाएगा।

    3. छोटे व्यापारियों को क्या छूट मिलेगी?

    छोटे व्यापारियों को MDR से छूट दी गई है। यानी पात्र छोटे व्यापारी 2,000 रुपए से कम या अधिक का UPI भुगतान प्राप्त करें, उन पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।

    4. छोटे व्यापारी की पहचान कैसे होगी?

    फ्रेमवर्क में P2PM यानी छोटे मर्चेंट की श्रेणी रखी गई है। इसके तहत दुकानदार और छोटे कारोबारी आते हैं। दिए गए नियम के अनुसार, QR कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपए तक का भुगतान प्राप्त करने वाले ऐसे व्यापारियों को MDR से छूट मिलेगी।

    5. 2,000 रुपए से कम के पेमेंट पर बड़े व्यापारी को भी MDR देना होगा?

    नहीं। 2,000 रुपए से कम के UPI भुगतान पर MDR लागू नहीं होगा। यह छूट छोटे और बड़े दोनों तरह के व्यापारियों के लिए होगी।

    6. कितने व्यापारियों पर पड़ेगा असर?

    दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2,000 रुपए से अधिक का भुगतान प्राप्त करने वाले बड़े व्यापारियों की हिस्सेदारी कुल UPI पेमेंट में करीब 5% है। वहीं करीब 95% छोटे व्यापारी बताए गए हैं, जिन पर नया MDR लागू नहीं होगा।

    7. सब्जी वाले, चाय की दुकान और छोटे दुकानदारों पर क्या असर होगा?

    छोटे कारोबारियों को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। P2PM श्रेणी में आने वाले ऐसे दुकानदार, जिनका QR कोड के जरिए मासिक डिजिटल कलेक्शन 1 लाख रुपए तक है, उन्हें 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान पर भी MDR नहीं देना होगा।

    8. क्या दुकानदार यह चार्ज ग्राहक से वसूल सकते हैं?

    नहीं। दिए गए नियमों के मुताबिक MDR का बोझ ग्राहक पर डालने की अनुमति नहीं होगी। इसी तरह Google Pay, PhonePe या Paytm जैसे UPI ऐप्स के जरिए इस MDR के नाम पर ग्राहक से अलग से प्लेटफॉर्म फीस वसूलने की बात भी इस फ्रेमवर्क में नहीं है।

    9. सरकार MDR का नया मॉडल क्यों ला रही है?

    दिए गए विवरण के अनुसार, UPI नेटवर्क के विस्तार, सर्वर क्षमता बढ़ाने और साइबर फ्रॉड से निपटने के लिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को लगातार खर्च करना पड़ता है। नए MDR मॉडल के जरिए इस डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने का तर्क दिया गया है।

    इसके अलावा MDR से मिलने वाली राशि का 5% हिस्सा विशेष फंड में जाने की बात कही गई है। इसका इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों और टियर-3 शहरों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के लिए किया जाना है।

    10. छोटे व्यापारी के खाते में अचानक 1 लाख रुपए आ जाएं तो क्या होगा?

    यह स्थिति मासिक कलेक्शन की सीमा पर निर्भर करेगी। दिए गए नियम के मुताबिक जिन व्यापारियों का मासिक भुगतान प्राप्त करने का आंकड़ा 1 लाख रुपए से कम है, उन्हें MDR से छूट मिलेगी। यदि किसी महीने उनका कलेक्शन निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाता है, तो उस महीने उनकी MDR पात्रता प्रभावित हो सकती है।

    वहीं, 2,000 रुपए से कम के व्यक्तिगत भुगतान पर MDR नहीं लगेगा। यानी केवल छोटे-छोटे लेनदेन होने से व्यापारी पर यह शुल्क नहीं आएगा।

    11. बीमा, रिचार्ज, रेलवे और पेट्रोल-डीजल पर कितना MDR होगा?

    कुछ विशेष सेक्टर के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। दिए गए विवरण के मुताबिक 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान पर अधिकतम 5 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन MDR लिया जाएगा।

    इसमें टेलीकॉम में 2,000 रुपए से अधिक का रिचार्ज, बीमा में 2,000 रुपए से अधिक का प्रीमियम, रेलवे टिकट और पेट्रोल-डीजल से जुड़े 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान शामिल हैं।

    12. क्या UPI का MDR कार्ड या वॉलेट से ज्यादा होगा?

    दिए गए फ्रेमवर्क के अनुसार UPI पर लागू MDR को क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या वॉलेट के मुकाबले कम रखने की बात कही गई है। यानी नए शुल्क का उद्देश्य UPI को महंगा भुगतान विकल्प बनाना नहीं, बल्कि बड़े मर्चेंट लेनदेन के लिए MDR व्यवस्था तैयार करना बताया गया है।

    ग्राहक के लिए सबसे जरूरी बात

    नए ढांचे को लेकर फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि ग्राहक से सीधे UPI MDR नहीं लिया जाना है। 2,000 रुपए से कम के भुगतान पर MDR नहीं है, जबकि छोटे व्यापारियों को भी निर्धारित शर्तों के तहत छूट दी गई है। मुख्य असर 2,000 रुपए से अधिक के पात्र बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर पड़ेगा, जहां 0.40% की दर और 300 रुपए की अधिकतम सीमा बताई गई है।

  • सिर्फ ₹20 सालाना में ₹2 लाख का दुर्घटना बीमा, जानिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की पात्रता और जरूरी शर्तें

    सिर्फ ₹20 सालाना में ₹2 लाख का दुर्घटना बीमा, जानिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की पात्रता और जरूरी शर्तें

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना देश में उपलब्ध कम प्रीमियम वाली सरकारी दुर्घटना बीमा योजनाओं में शामिल है। इस योजना की सबसे खास बात इसका बेहद कम सालाना प्रीमियम है। इसके लिए पात्र व्यक्ति को केवल 20 रुपये प्रति वर्ष का भुगतान करना होता है। अगर इस रकम को रोजाना के खर्च के हिसाब से देखा जाए तो यह करीब 5.5 पैसे प्रतिदिन बैठती है। यानी इसका दैनिक खर्च 50 पैसे से भी काफी कम है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत बीमित व्यक्ति को दुर्घटना से जुड़े मामलों में आर्थिक सुरक्षा मिलती है। योजना के अंतर्गत अधिकतम 2 लाख रुपये का बीमा कवर उपलब्ध है। यदि बीमित व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है या वह पूर्ण रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो 2 लाख रुपये की बीमा राशि का प्रावधान है।

    दुर्घटना के कारण आंशिक रूप से दिव्यांग होने की स्थिति में बीमा कवर की राशि 1 लाख रुपये है। इस तरह योजना दुर्घटना से होने वाली मृत्यु के साथ-साथ पूर्ण और आंशिक दिव्यांगता की स्थिति में भी आर्थिक सहायता का प्रावधान करती है।

    इस योजना का लाभ लेने के लिए आयु संबंधी पात्रता भी तय है। 18 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की उम्र तक के व्यक्ति इसमें शामिल हो सकते हैं। इसके लिए संबंधित व्यक्ति का बैंक या डाकघर में बचत खाता होना जरूरी है। योजना का लाभ लेने वाले व्यक्ति के खाते से निर्धारित प्रीमियम की राशि ऑटो-डेबिट माध्यम से तय समय पर काटी जाती है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की बीमा अवधि एक जून से अगले वर्ष 31 मई तक रहती है। यह वार्षिक आधार पर नवीनीकृत होने वाली योजना है। यानी योजना के तहत बीमा कवर एक साल की अवधि के लिए रहता है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसे आगे जारी रखा जा सकता है।

    इस बीमा योजना को सरकारी स्तर पर किफायती दुर्घटना बीमा सुविधा के तौर पर उपलब्ध कराया गया है। योजना के तहत बीमा सेवाएं सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध होती हैं। इसका उद्देश्य कम प्रीमियम में दुर्घटना से संबंधित बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना को समझने के लिए इसके प्रीमियम और कवर के बीच का अंतर भी महत्वपूर्ण है। केवल 20 रुपये सालाना प्रीमियम के बदले पात्र व्यक्ति को दुर्घटना में मृत्यु या पूर्ण दिव्यांगता की स्थिति में 2 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलता है। वहीं आंशिक दिव्यांगता की स्थिति में 1 लाख रुपये का कवर निर्धारित है।

    इस योजना की पात्रता में उम्र और बचत बैंक खाते की शर्त प्रमुख है। 18 से 70 वर्ष के बचत बैंक खाताधारक इस योजना के लिए पात्र हो सकते हैं। योजना की अवधि एक जून से 31 मई तक रहती है और प्रीमियम की राशि बैंक खाते से ऑटो-डेबिट के जरिए काटी जाती है।

  • E20 पेट्रोल पर सरकार की बड़ी तैयारी…. और ज्यादा एथनॉल मिलाने का बनाया प्लान

    E20 पेट्रोल पर सरकार की बड़ी तैयारी…. और ज्यादा एथनॉल मिलाने का बनाया प्लान


    नई दिल्ली।
    पेट्रोल (Petrol) में एथनॉल (Ethanol) मिलाने की मौजूदा E20 व्यवस्था (E20 system) के बाद सरकार अब इससे आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर (Tarun Kapoor) ने बुधवार को कहा कि सरकार पेट्रोल में 20 फीसदी से अधिक एथनॉल ब्लेंडिंग की अनुमति देने पर काम कर रही है। हालांकि, ज्यादा एथनॉल वाले ईंधन का इस्तेमाल फ्लेक्सी-फ्यूल व्हीकल्स (Flex-fuel vehicles-FFV) के जरिए किया जाएगा।


    क्या है सरकार का प्लान?

    एक कार्यक्रम में तरुण कपूर ने कहा कि E20 प्रोग्राम अबतक बहुत सफल रहा है और कई वाहन कंपनियों ने जल्द ही फ्लेक्सी-फ्यूल गाड़ियां पेश करने की योजना की घोषणा की है। उन्होंने कहा, ”अब हमारा ध्यान फ्लेक्सी-फ्यूल गाड़ियों पर है और ऐसी सम्मिश्रण की मंजूरी देना है जो E20 से ज्यादा हो।” उन्होंने कहा कि ऐसी गाड़ियों की पेशकश के साथ-साथ ईंधन बिक्री केंद्रों पर शुद्ध एथनॉल की उपलब्धता भी बढ़ानी होगी। कपूर ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के बीच जैव-ईंधन पर जोर देना और भी जरूरी हो गया है। इस संकट ने आपूर्ति में रुकावट डाली है और कच्चे तेल की कीमतों को लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है, साथ ही और बढ़ोतरी की आशंका भी बनी हुई है। उन्होंने कहा, ”यह जरूरी है कि हम देश में जो कुछ भी उपलब्ध है, उसका इस्तेमाल करने की कोशिश करें।”

    उन्होंने कहा कि देश में एथनॉल उत्पादन की क्षमता पेट्रोल में इसे मिलाने की जरूरतों से ज्यादा हो गई है और इस अतिरिक्त क्षमता का पूरा इस्तेमाल करने के लिए उद्योग को एथनॉल के अन्य इस्तेमाल के तरीकों पर भी विचार करना होगा।

    एथनॉल कितना, पेट्रोल कितना?
    बता दें कि E20 में 80 फीसदी पेट्रोल और 20 फीसदी एथनॉल मिलाया जाता है। सरकार अब E20 से आगे जाकर एथनॉल की मात्रा बढ़ाने पर विचार कर रही है। हालांकि, तरुण कपूर ने यह भी कहा कि इसका इस्तेमाल सामान्य पेट्रोल वाहनों के बजाय फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में करने की दिशा में काम किया जा रहा है। ये ऐसी गाड़ियां होती हैं, जिन्हें पेट्रोल के साथ अलग-अलग अनुपात में एथनॉल वाले ईंधन पर भी चलने के लिए डिजाइन किया जाता है।


    डीजल के लिए भी है प्लान

    डीजल सेग्मेंट के बारे में कपूर ने कहा कि सरकार जैव-ईंधन एडिटिव्स पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर आइसोब्यूटेनॉल के साथ किए जा रहे प्रयोग सफल होते हैं, तो यह जैव-ईंधन के लिए एक ‘बड़ा’ नया रास्ता खोल सकते हैं, क्योंकि रिफाइनरी उत्पादन में डीजल का बड़ा हिस्सा होता है। उन्होंने सरकार की नई गोवर्धन योजना का भी जिक्र किया, जो संपींडित बायोगैस (सीबीजी) को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग मंत्रालयों से मिलने वाले मदद को एक साथ लाती है। इस क्षेत्र में अब तक सीमित प्रगति हुई है।

  • तमिलनाडु में CM विजय के खिलाफ एकजुट हो रहे सारे विपक्षी दल…. सरकार गिराने की हो रही तैयारी!

    तमिलनाडु में CM विजय के खिलाफ एकजुट हो रहे सारे विपक्षी दल…. सरकार गिराने की हो रही तैयारी!


    चेन्नई। त
    मिलनाडु (Tamil Nadu) में मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय (Chief Minister C. Joseph Vijay) के विरोधी एकजुट होने की तैयारी कर रहे हैं। AIADMK यानी अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम ने एमके स्टालिन (M.K. Stalin) की डीएमके (DMK) को साथ आने का चैलेंज दे दिया है। साथ ही कहा है कि विजय की तमिलागा वेत्री कझगम (TVK) के खिलाफ नई पार्टियां भी साथ आ सकती हैं। हालांकि, इसपर डीएमके ने अब तक कोई रिप्लाई नहीं किया है।

    मंगलवार को पूर्व सीएम एडापड्डी के पलनीस्वामी से जब पूछा गया कि क्या टीवीके के खिलाफ गठबंधन तैयार हो रहा है या नहीं। इसपर उन्होंने कहा, ‘हां। हम भी टीवीके खिलाफ हैं। अगर कोई दूसरी पार्टी शामिल होना चाहती है, तो हम उनका स्वागत करेंगे। हमारा गठबंधन जैसा है, वैसा रहेगा। अगर दूसरी पार्टियां आना चाहती हैं, तो वो शामिल हो सकती हैं।’


    DMK को दिया चैलेंज

    इस दौरान उन्होंने तमिलनाडु के प्रमुख विपक्षी दल डीएमके को भी चैलेंज दे दिया है। उन्होंने कहा, ‘अगर नई पार्टियां हमारे साथ आना चाहती हैं, तो आ सकती हैं। क्या डीएमके… क्या डीएमके आएगी। क्या आप यह सवाल पूछ सकते हैं।’


    6 विधायक टूटे

    खास बात है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद अन्ना द्रमुक के 6 विधायक टूट गए थे। सभी विजय के साथ चले गए थे और बचे हुए भी दो गुटों में बंट गए थे। इधर, डीमके नेता आरएस भारती जून में दोनों दलों के साथ आने से इनकार कर चुके हैं, लेकिन कहा था कि अगर DMK और AIADMK भविष्य में साथ आते हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


    DMK चेता चुकी

    अगस्त में स्टालिन ने कहा था कि नकी पार्टी राजनीतिक वापसी करने में सक्षम है और वह पूरे राज्य में मतदाताओं का समर्थन फिर से हासिल करने पर ध्यान लगाएगी। स्टालिन ने यहां द्रमुक मुख्यालय अन्ना अरिवलयम में पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए कहा, ‘वह (विजय) विधानसभा को फिल्म का सेट समझते हैं और डायलॉग बोलते हैं।’

    स्टालिन ने कहा कि द्रमुक की नींव तत्काल राजनीतिक जीत या हार से कहीं आगे की है। उन्होंने कहा, ‘हम राजनीति में इसलिए नहीं आए क्योंकि हम ऊब गए थे। हम लड़ने के लिए आए थे। हमारे आंदोलन का जीवन केवल सफलता या विफलता तक सीमित नहीं है। चुनाव हारने के बाद अगले चुनाव तक सोए रहना अन्य दलों की आदत है। विपक्ष में रहते हुए भी हमारी पार्टी लोगों के लिए बिना सुस्ती के असाधारण रूप से काम करने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच जानी जाती है।’

    उन्होंने कहा, ‘हम वापसी करने में माहिर हैं और हम इसे अच्छी तरह करेंगे।’ उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से जमीनी स्तर पर जनसंपर्क मजबूत करने की अपील की।


    TVK की बैठक पर लेफ्ट दूर

    टीवीके बुधवार को चेन्नई में सहयोगी दलों के साथ दूसरी समन्वय बैठक करेगी, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भाकपा ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है। टीवीके मुख्यालय में होने वाली बैठक का उद्देश्य गठबंधन को औपचारिक रूप देना, साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करना, संचालन समिति गठित करना और गठबंधन का आधिकारिक नाम तय करना है। कांग्रेस, वीसीके, आईयूएमएल और एमडीएमके के बैठक में शामिल होने की संभावना है। वहीं वाम दलों ने बैठक से दूरी बनाई हैं।


    मतभेदों के बीच मीटिंग

    इस बीच, 2029 के लोकसभा चुनाव में विजय को प्रधानमंत्री पद का संभावित चेहरा बनाए जाने की टीवीके नेताओं की मांग को लेकर कांग्रेस के साथ भी मतभेद सामने आए हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का प्रमुख चेहरा बताया है। हालांकि, टीवीके ने ‘विजय फॉर पीएम’ की मांग को व्यक्तिगत राय करार दिया है।