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  • अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया पर की वापसी, बोले- अभी और आराम की जरूरत

    अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया पर की वापसी, बोले- अभी और आराम की जरूरत

    नई दिल्ली । अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कुछ दिनों तक सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने के बाद एक बार फिर वापसी की है। उन्होंने अपनी सेहत और आराम को लेकर पहले ही जानकारी दी थी कि उन्हें कुछ समय के लिए बातचीत और लिखने से दूर रहने की सलाह दी गई है। अब करीब तीन दिन बाद उनकी वापसी से प्रशंसकों को राहत मिली है। हालांकि, अभिनेता ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें अभी पूरी तरह सहज होने के लिए और आराम की जरूरत है।

    अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखे नए संदेश में बताया कि उन्हें फिलहाल आराम जारी रखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वह अपनी मौजूदा स्थिति के अनुरूप खुद को ढालने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, वह इंसानी शरीर की विशेषताओं और उसकी कार्यप्रणाली के बारे में भी विचार कर रहे हैं। उनके इस संदेश से संकेत मिलता है कि वह अभी अपनी दिनचर्या को संभलकर आगे बढ़ा रहे हैं और रिकवरी के लिए समय दे रहे हैं।

    अभिनेता ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी एक छोटा-सा संदेश साझा किया। उन्होंने केवल ‘चलो’ लिखा, जिसके बाद उनके प्रशंसकों को उनकी वापसी की जानकारी मिली। इससे पहले उन्होंने कुछ दिनों तक सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं रह पाने के लिए अपने चाहने वालों से माफी मांगी थी। उन्होंने बताया था कि उन्हें आराम करने और अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए समय निकालने की सलाह दी गई है। इसी कारण वह नियमित रूप से लिख नहीं पा रहे थे और बातचीत भी सीमित रखनी पड़ रही थी।

    अमिताभ बच्चन ने दशहरे के अवसर पर प्रशंसकों को शुभकामनाएं देते हुए भी अपनी स्थिति का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें सख्त आराम करने और रिकवरी पर ध्यान देने के लिए कहा गया है। इस वजह से वह पहले की तरह अधिक बातचीत नहीं कर सकेंगे। उनके इस संदेश के बाद प्रशंसकों के बीच उनकी सेहत को लेकर चिंता बढ़ गई थी। अब उनके दोबारा सक्रिय होने से लोगों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन अभिनेता ने अभी अपनी पूरी तरह स्वस्थ होने की कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई है।

    अमिताभ बच्चन की सेहत को लेकर चिंता उस समय भी बढ़ी थी, जब उन्होंने टेलीविजन कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति 18’ के सेट पर अपने घुटने में चोट लगने की जानकारी दी थी। अभिनेता ने कार्यक्रम के दौरान बताया था कि शूटिंग से एक दिन पहले वह फिसलकर गिर गए थे, जिससे उनके घुटने में चोट आई थी। उन्होंने बताया था कि आमतौर पर वह मंच के बीच में खड़े होकर अपना संवाद बोलते हैं, लेकिन चोट के कारण उस दिन ऐसा करना मुश्किल हो रहा था।

    हालांकि, उस समय अमिताभ बच्चन ने चोट को बहुत गंभीर नहीं बताया था। फिलहाल उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह घुटने की चोट के कारण दी है या इसका कोई अन्य कारण है। इसलिए उनकी मौजूदा रिकवरी और पहले लगी चोट के बीच संबंध को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिलहाल अभिनेता आराम कर रहे हैं और धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर सक्रिय हो रहे हैं।

  • रात में नींद नहीं आती तो अपनाएं ये आसान उपाय, तनाव से लेकर मोबाइल इस्तेमाल तक जानें प्रमुख कारण

    रात में नींद नहीं आती तो अपनाएं ये आसान उपाय, तनाव से लेकर मोबाइल इस्तेमाल तक जानें प्रमुख कारण

    नई दिल्ली । रात में बिस्तर पर जाने के बाद भी देर तक नींद न आना, बार-बार आंख खुलना या सुबह उठने के बाद थकान महसूस होना कई लोगों की परेशानी है। कभी-कभी काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां या दिनचर्या में बदलाव इसकी वजह बन सकते हैं। वहीं, कुछ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण भी पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती। नींद पूरी नहीं होने का असर व्यक्ति के मूड, एकाग्रता और रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ सकता है। ऐसे में नींद की परेशानी के कारणों को समझना और सोने की आदतों में सुधार करना जरूरी है।

    नींद न आने की एक प्रमुख वजह तनाव और जरूरत से ज्यादा सोचना हो सकती है। कार्यालय के काम, आर्थिक चिंताएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां या भविष्य को लेकर बेचैनी होने पर दिमाग शांत करना मुश्किल हो जाता है। शरीर आराम करना चाहता है, लेकिन मन में विचार चलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को बिस्तर पर जाने के बाद भी नींद आने में समय लग सकता है।

    सोने और जागने का समय बार-बार बदलना भी नींद की प्राकृतिक लय को प्रभावित करता है। देर रात तक जागना, सुबह अलग-अलग समय पर उठना या दिन में लंबे समय तक सोना रात की नींद में बाधा बन सकता है। शरीर को नियमित समय पर सोने और जागने की आदत डालने से इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है।

    सोने से ठीक पहले मोबाइल चलाना, वीडियो देखना या लैपटॉप पर काम करना भी नींद को प्रभावित कर सकता है। स्क्रीन की रोशनी और लगातार मिलने वाली सूचनाएं दिमाग को सक्रिय बनाए रख सकती हैं। इससे शरीर को आराम की स्थिति में आने में परेशानी होती है। इसलिए सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना बेहतर माना जाता है।

    खानपान की आदतों पर ध्यान देना भी जरूरी है। शाम या रात में चाय-कॉफी पीने से कुछ लोगों की नींद प्रभावित हो सकती है, क्योंकि इनमें मौजूद कैफीन सतर्कता बढ़ाता है। इसके अलावा देर रात भारी भोजन करने से पेट में असहजता या एसिडिटी हो सकती है, जिससे सोने में परेशानी आती है। कैफीन के प्रति संवेदनशील लोगों को दोपहर के बाद इसका सेवन सीमित करने से लाभ मिल सकता है।

    कुछ मामलों में दर्द, एसिडिटी, दवाओं के दुष्प्रभाव या सोते समय सांस लेने में परेशानी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी नींद बिगाड़ सकती हैं। तेज खर्राटों के साथ सांस रुकने जैसी समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि नींद की परेशानी बार-बार हो रही है, तो इसके पीछे की वजह जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    बेहतर नींद के लिए सबसे पहले सोने और जागने का समय तय करें। कोशिश करें कि छुट्टी वाले दिन भी इस समय में बहुत अधिक बदलाव न हो। नियमित दिनचर्या शरीर की प्राकृतिक नींद-जागने की लय को बनाए रखने में मदद करती है। सोने से करीब 30 से 60 मिनट पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूरी बनाएं। इस दौरान हल्की किताब पढ़ना, धीमा संगीत सुनना या शांत वातावरण में बैठना उपयोगी हो सकता है।

    यदि अगले दिन के कामों को लेकर चिंता बनी रहती है, तो सोने से पहले जरूरी कामों की सूची कागज पर लिख लें। कुछ मिनट धीरे-धीरे सांस लेने का अभ्यास भी मन को शांत करने में मदद कर सकता है। दिन के समय नियमित टहलना, हल्का व्यायाम करना और सुबह प्राकृतिक रोशनी में समय बिताना नींद की गुणवत्ता के लिए उपयोगी आदतें हैं। हालांकि, सोने के बिल्कुल पहले बहुत तेज व्यायाम करने से कुछ लोगों को परेशानी हो सकती है।

    दिन में झपकी लेने की आदत है, तो उसे छोटा रखें और देर शाम सोने से बचें। यदि बिस्तर पर काफी देर तक लेटने के बाद भी नींद नहीं आती, तो खुद पर सोने का दबाव न डालें। उठकर कुछ समय शांत गतिविधि करें और नींद महसूस होने पर वापस बिस्तर पर जाएं। बार-बार घड़ी देखने से बचना भी मददगार हो सकता है।

    अगर नींद की समस्या लगातार बनी रहती है, दिनभर थकान रहती है या कामकाज और मानसिक स्थिति प्रभावित होने लगती है, तो डॉक्टर से सलाह लें। लगातार परेशानी को केवल तनाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही कारण की पहचान और समय पर मदद से नींद में सुधार की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।

  • लालकृष्ण आडवाणी की सेहत में हुआ सुधार…. अस्पताल से हुए डिस्चार्ज

    लालकृष्ण आडवाणी की सेहत में हुआ सुधार…. अस्पताल से हुए डिस्चार्ज


    नई दिल्ली।
    भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) को इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ( Hospital) से डिस्चार्ज (Discharge) कर दिया गया है. अस्पताल प्रशासन की ओर से जारी बयान के अनुसार, 98 वर्षीय वरिष्ठ नेता की सेहत में सुधार हुआ है, इसलिए उन्हें सोमवार को अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है. अस्पताल प्रशासन ने अपने बयान में कहा कि आडवाणी को छाती में संक्रमण के कारण 16 अक्टूबर को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था और राहत मिलने के बाद उन्हें छुट्टी दी जा रही है. आडवाणी न्यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. विनीत सूरी की देखरेख में थे और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।

    पूर्व उपप्रधानमंत्री को 16 अक्टूबर की शाम 7:30 बजे छाती में संक्रमण के चलते इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के पल्मोनरी (फेफड़ों से संबंधित) विभाग में भर्ती कराया गया था।


    दिग्गजों ने जाना हाल

    इससे पहले शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी अस्पताल में आडवाणी से मुलाकात की और उनका हालचाल जाना. ऐसा पहली बार नहीं है जब हाल के महीनों में इस वरिष्ठ नेता को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है. इससे पहले, इस साल मई में भी उन्हें उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था. तब वे कुछ दिनों तक डॉक्टरों की देखरेख में रहे और फिर उन्हें छुट्टी दे दी गई थी।

    इसके अलावा, दिसंबर 2024 में भी आडवाणी को इलाज और जांच के लिए इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती कराया गया था. उनका इलाज एक न्यूरोलॉजिस्ट की देखरेख में हुआ था।


    शानदार सफर

    8 नवंबर 1927 को कराची में जन्मे आडवाणी भाजपा के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक हैं. उन्होंने भाजपा को एक छोटी राजनीतिक ताकत से बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित करने में अहम भूमिका निभाई।

    आडवाणी कई बार भाजपा के अध्यक्ष रहे और उन्होंने पूरे देश में पार्टी के संगठनात्मक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. 1990 में उनकी देशव्यापी ‘राम रथ यात्रा’ भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुई, जिससे भाजपा की राजनीतिक पहुंच का विस्तार हुआ।

    उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में 2002 से 2004 तक भारत के उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया. अपने राजनीतिक करियर के दौरान, उन्होंने गृह मंत्रालय सहित कई महत्वपूर्ण विभागों (पोर्टफोलियो) की जिम्मेदारी भी संभाली. सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को देखते हुए, आडवाणी को 2024 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

    इससे पहले, 2015 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था. आडवाणी भाजपा के एक वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी के राजनीतिक इतिहास का एक अहम हिस्सा रहे हैं।

  • दतिया के उड़ीना गांव में त्रयोदशी भोज के बाद बिगड़ी ग्रामीणों की तबीयत, रसगुल्लों की गुणवत्ता पर उठे सवाल

    दतिया के उड़ीना गांव में त्रयोदशी भोज के बाद बिगड़ी ग्रामीणों की तबीयत, रसगुल्लों की गुणवत्ता पर उठे सवाल

    मध्य प्रदेश। के दतिया जिले के भांडेर तहसील अंतर्गत उड़ीना गांव में त्रयोदशी भोज के बाद कई ग्रामीणों की तबीयत बिगड़ने का मामला सामने आया है। 15 अक्टूबर को आयोजित इस कार्यक्रम में भोजन करने के बाद लोगों को उल्टी, पेट दर्द और सिरदर्द जैसी शिकायतें होने लगीं। घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गांव में शिविर लगाकर प्रभावित लोगों का इलाज शुरू किया। हालांकि, ग्रामीणों के बीमार पड़ने की वास्तविक वजह की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    जानकारी के अनुसार, गांव के निवासी तिलक सिंह यादव के पिता एदल सिंह पटेल का बीमारी के चलते निधन हो गया था। उनके निधन के बाद परिवार की ओर से त्रयोदशी का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे थे। भोजन के दौरान लोगों ने अन्य व्यंजनों के साथ रसगुल्ले भी खाए। इसके बाद कई लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी और गांव में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी को लेकर चिंता बढ़ गई।

    इस घटना में लगभग एक हजार लोगों के बीमार होने की बात सामने आई है। हालांकि, इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही बीमारी के दायरे का सही आकलन किया जा सकेगा।

    ग्रामीणों के बीमार पड़ने के बाद रसगुल्लों की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे। आशंका जताई जा रही है कि मिठाई तैयार करने में इस्तेमाल किया गया मावा खराब हो सकता था। मावा या खोया दूध को पकाकर तैयार किया जाता है और कई प्रकार की मिठाइयों में इसका उपयोग होता है। यदि मिठाई बनाने में इस्तेमाल की गई सामग्री दूषित हो, तो उसे खाने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि, उड़ीना गांव की घटना में खराब मावे को बीमारी का कारण मानने की अभी पुष्टि नहीं हुई है।

    मामले में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर उठ रही आशंकाओं के बीच जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। यह स्पष्ट होना बाकी है कि रसगुल्ले तैयार करने में किस सामग्री का इस्तेमाल किया गया था, मावा कहां से लाया गया था और मिठाई बनाने की प्रक्रिया में साफ-सफाई के मानकों का पालन हुआ था या नहीं। जांच पूरी होने से पहले किसी खाद्य सामग्री या व्यक्ति को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

    घटना की जानकारी मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने 17 अक्टूबर को गांव में चिकित्सा शिविर लगाया। शिविर में बीमार ग्रामीणों की जांच की गई और आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया गया। कुछ मरीजों को जिला अस्पताल के अलावा इंदरगढ़ और भांडेर के अस्पतालों में भी इलाज के लिए जाना पड़ा। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने प्रभावित लोगों की स्थिति का आकलन किया और जरूरत के अनुसार उपचार दिया।

    भांडेर के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. जयंत यादव के अनुसार, गांव में लगाए गए शिविर के दौरान जांच किए गए लोगों में गंभीर लक्षण नहीं पाए गए। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई गई है और किसी गंभीर समस्या की जानकारी सामने नहीं आई है। इसके बावजूद घटना के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि बीमारी के स्रोत का पता लगाया जा सके।

    यह घटना सार्वजनिक और पारिवारिक आयोजनों में भोजन की गुणवत्ता तथा स्वच्छता के महत्व को रेखांकित करती है। ऐसे कार्यक्रमों में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, उसे तैयार करने के तरीके और सुरक्षित रखरखाव पर ध्यान देना आवश्यक है। भोजन करने के बाद उल्टी, पेट दर्द या सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए। उड़ीना गांव में ग्रामीणों के बीमार पड़ने के मामले में अब बीमारी के वास्तविक कारण की पुष्टि और प्रभावित लोगों की स्थिति पर आगे की जानकारी महत्वपूर्ण रहेगी।

  • पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले

    पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले


    मध्य प्रदेश। में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य देशभर में पराली जलाने के मामलों में पहले स्थान पर रहा। पूरे देश में इस साल कुल 33,028 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 17,067 मामलों की रही। यह राष्ट्रीय आंकड़े का आधे से भी अधिक है। उपग्रह आधारित आंकड़ों से सामने आई इस स्थिति ने खेतों में फसल अवशेष जलाने और उससे होने वाले प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में वर्ष 2021 से पहले पराली जलाने की घटनाएं सालाना पांच हजार से कम रहती थीं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने के साथ बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में प्रदेश में पराली जलाने के 16,074 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,067 हो गई। इस तरह एक साल में 993 घटनाओं की वृद्धि दर्ज की गई।

    वर्तमान सीजन में भी पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 350 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों के निपटान से जुड़ी चुनौती को दर्शाता है। यदि खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उनके प्रबंधन के प्रभावी उपाय उपलब्ध नहीं होते, तो ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।

    राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी पराली जलाने के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में 5,769 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में बढ़कर 7,290 हो गईं। राजस्थान में भी इनकी संख्या 2024 के 2,762 मामलों से बढ़कर 2025 में 2,890 हो गई।

    इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। पंजाब में वर्ष 2021 में 71,304 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। हरियाणा में भी 2021 के 6,984 मामलों की तुलना में 2025 में 662 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से अलग-अलग राज्यों में पराली प्रबंधन की स्थिति में आए बदलाव का पता चलता है।

    देशभर में पराली जलाने की कुल घटनाओं में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। वर्ष 2021 में कुल 92,407 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या घटकर 56,157 और 2023 में 57,242 रही। वर्ष 2024 में कुल 36,893 मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 33,028 हो गई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में बढ़ते मामले राज्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।

    पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। सर्दियों में जब धुआं और कोहरा एक साथ मौजूद रहते हैं, तो स्मॉग की स्थिति बन सकती है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर खराब या बहुत खराब श्रेणी तक पहुंचने की आशंका रहती है, हालांकि इसका वास्तविक स्तर स्थान और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है। सांस की एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए धुएं के संपर्क में आना विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, फेफड़ों की कार्यक्षमता में किसी निश्चित प्रतिशत की कमी या अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने का आकलन करने के लिए संबंधित अध्ययन और स्वास्थ्य आंकड़ों की पुष्टि आवश्यक है।

    पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई, जुर्माने और जागरूकता संबंधी प्रयास किए जाते हैं। लेकिन किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग और उनका उचित प्रबंधन पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है। मध्य प्रदेश में बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभावी रोकथाम और किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

  • नींद में भी एक्टिव रहता है दिमाग, शरीर की मरम्मत से लेकर याददाश्त और हार्मोन तक होते हैं कई जरूरी काम

    नींद में भी एक्टिव रहता है दिमाग, शरीर की मरम्मत से लेकर याददाश्त और हार्मोन तक होते हैं कई जरूरी काम


    नई दिल्ली: सोने का मतलब केवल शरीर को आराम देना नहीं है। जब हम नींद में होते हैं, तब भी शरीर के भीतर कई जरूरी प्रक्रियाएं लगातार चलती रहती हैं। दिमाग दिनभर मिली जानकारी को व्यवस्थित करने और याददाश्त से जुड़े काम करता रहता है, जबकि शरीर की कोशिकाएं खुद को दुरुस्त करने में जुटी रहती हैं। हार्मोन और इम्यून सिस्टम से जुड़ी गतिविधियां भी इस दौरान जारी रहती हैं। यही वजह है कि पर्याप्त और अच्छी नींद को शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए जरूरी माना जाता है। रात में शरीर अलग-अलग नींद के चरणों से गुजरता है और हर चरण का अपना महत्व होता है। कभी दिमाग दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करता है, तो कभी शरीर की मरम्मत और ऊर्जा बहाली से जुड़े काम तेज होते हैं।

    वयस्कों के लिए रात में 7 से 9 घंटे की नींद जरूरी मानी जाती है। गहरी नींद के दौरान दिमाग, हार्मोन, इम्यून सिस्टम और शरीर के कई दूसरे हिस्से अपना काम जारी रखते हैं। रात में नींद नॉन-आरईएम और आरईएम चरणों से होकर गुजरती है। ये चरण रात में कई बार आते हैं और आम तौर पर एक नींद चक्र करीब 80 से 100 मिनट का होता है। नॉन-आरईएम नींद के तीसरे चरण को गहरी नींद कहा जाता है। इस दौरान शरीर की धड़कन और सांस की गति धीमी हो जाती है और शरीर मरम्मत तथा ऊर्जा बहाली से जुड़े काम करता है। वहीं आरईएम नींद के दौरान दिमाग काफी सक्रिय रहता है और सपने अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।

    नींद के दौरान दिमाग का काम केवल सपने देखने तक सीमित नहीं रहता। यह दिनभर हासिल की गई जानकारियों को व्यवस्थित करने और याददाश्त बनाने की प्रक्रिया में भी शामिल रहता है। नींद की कमी या खराब नींद का असर ध्यान केंद्रित करने, नई जानकारी समझने और चीजों को याद रखने की क्षमता पर पड़ सकता है। आरईएम और नॉन-आरईएम नींद के अलग-अलग चरण सीखने और याददाश्त से जुड़े विभिन्न कामों में भूमिका निभाते हैं। इस दौरान शरीर भी अपने स्तर पर जरूरी बदलावों से गुजरता रहता है, इसलिए पूरी और अच्छी नींद अगले दिन शरीर और दिमाग को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    गहरी नींद में शरीर के ऊतकों की वृद्धि और मरम्मत से जुड़े काम होते हैं। इसी दौरान कुछ हार्मोन भी रिलीज होते हैं। ग्रोथ हार्मोन शरीर के विकास के साथ मांसपेशियों और ऊतकों की मरम्मत में भूमिका निभाता है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने ग्लिम्फैटिक सिस्टम नाम की एक व्यवस्था का भी अध्ययन किया है, जो दिमाग से कुछ मेटाबॉलिज्म संबंधी अपशिष्ट पदार्थों को हटाने का काम करती है। इस तरह रात की नींद को केवल आराम का समय समझना सही नहीं है। नींद के दौरान शरीर में मरम्मत, याददाश्त, हार्मोन और दिमागी गतिविधियों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। यही कारण है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त और अच्छी नींद को जरूरी माना जाता है।

  • दिल को स्वस्थ रखने के लिए रोज अपनाएं ये 7 आसान आदतें, डाइट के साथ नींद और तनाव पर भी दें ध्यान

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए रोज अपनाएं ये 7 आसान आदतें, डाइट के साथ नींद और तनाव पर भी दें ध्यान

    नई दिल्ली ।दिल को स्वस्थ रखने के लिए केवल एक्सरसाइज करना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। रोजमर्रा की जीवनशैली में खानपान, शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव और कुछ आदतों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर नाश्ता छोड़ देते हैं, लंबे समय तक बैठे रहते हैं, पैकेज्ड फूड का अधिक सेवन करते हैं या देर रात तक जागते हैं। इन आदतों में सुधार करके दिल की सेहत का बेहतर ध्यान रखा जा सकता है।

    दिन की शुरुआत संतुलित नाश्ते से करना अच्छी आदत हो सकती है। भोजन में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, नट्स, बीज और प्रोटीन के बेहतर स्रोत शामिल किए जा सकते हैं। वहीं बहुत अधिक नमक, मीठे पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और अनहेल्दी फैट वाली चीजों का सेवन सीमित रखना बेहतर है।

    अगर काम के कारण लंबे समय तक कुर्सी पर बैठना पड़ता है तो बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना जरूरी है। फोन पर बात करते समय चलना, जहां संभव हो सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और नियमित वॉक जैसी छोटी गतिविधियां दिनभर की शारीरिक सक्रियता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

    खाने के बीच बार-बार पैकेज्ड स्नैक्स लेने की आदत पर भी ध्यान देना चाहिए। भोजन की मात्रा संतुलित रखना और पर्याप्त पानी पीना रोज की दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल या मोटापे जैसी स्थितियों से जूझ रहे लोगों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।

    नींद को नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। व्यस्त दिनचर्या के कारण देर रात तक जागने की आदत बन सकती है, लेकिन पर्याप्त और नियमित नींद शरीर के लिए जरूरी है। कोशिश करनी चाहिए कि सोने और जागने का समय नियमित रहे। रात में सोने से पहले मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल कम करना भी नींद की दिनचर्या को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

    तनाव को नियंत्रित करने के लिए दिन में कुछ समय खुद के लिए निकालना उपयोगी हो सकता है। शांत बैठना, मेडिटेशन करना या काम के बीच छोटा ब्रेक लेना तनाव संभालने के आसान तरीके हो सकते हैं। लगातार तनावपूर्ण दिनचर्या के बजाय काम और आराम के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

    धूम्रपान और तंबाकू का सेवन दिल तथा रक्त वाहिकाओं के लिए नुकसानदायक माना जाता है। इसलिए हृदय की सेहत को ध्यान में रखते हुए इनसे दूरी बनाना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति तंबाकू का सेवन करता है तो इसे छोड़ने के लिए चिकित्सकीय सलाह और उचित सहायता ली जा सकती है।

    शराब का सेवन भी सीमित रखना जरूरी है। अत्यधिक शराब पीना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए शराब का सेवन करने वाले लोगों को इसकी मात्रा को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।

    दिल की सेहत के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ, एक्सरसाइज या उपाय पर निर्भर रहने के बजाय पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और तंबाकू से दूरी जैसी आदतों को लगातार अपनाने से स्वस्थ दिनचर्या बनाने में मदद मिल सकती है।

  • वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    नई दिल्ली । क्या आपकी उम्र 30 साल या उससे ज्यादा है? अगर हां, तो अब अपनी सेहत को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने का समय है। कई ऐसी बीमारियां हैं जो पहले अधिक उम्र के लोगों में आम मानी जाती थीं, लेकिन अब कम उम्र में भी सामने आ रही हैं। खास बात यह है कि शुरुआती दौर में इन बीमारियों के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझता रहता है, जबकि शरीर के भीतर बीमारी धीरे-धीरे बढ़ रही होती है।

    सिर्फ सामान्य वजन होना या रोजमर्रा के काम आसानी से कर पाना हमेशा अच्छी सेहत की गारंटी नहीं है। हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक बिना किसी खास संकेत के रह सकते हैं। इसी तरह प्रीडायबिटीज और डायबिटीज भी शुरुआती चरण में कई लोगों में बिना स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। इसलिए केवल बाहरी फिटनेस के आधार पर अपनी सेहत का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता।

    भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की गाइडलाइन के अनुसार, बिना लक्षण वाले लोगों में भी 30 वर्ष की उम्र के बाद डायबिटीज और लिपिड प्रोफाइल की जांच पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति को कितनी बार और कौन-कौन से टेस्ट कराने चाहिए, यह उसकी उम्र, पारिवारिक इतिहास और स्वास्थ्य जोखिमों के आधार पर अलग हो सकता है।

    भारतीयों में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा महत्वपूर्ण है। ब्लड शुगर बढ़ने के बावजूद कई लोगों को लंबे समय तक प्यास अधिक लगना, बार-बार पेशाब आना या अत्यधिक थकान जैसे स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। ऐसे में नियमित स्क्रीनिंग से ब्लड शुगर में होने वाले बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

    परिवार में अगर किसी सदस्य को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अधिक वजन की समस्या रही है तो 30 वर्ष के बाद स्वास्थ्य को लेकर अधिक सतर्क रहना जरूरी हो जाता है। पारिवारिक इतिहास के साथ कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित खानपान और अधिक वजन जैसे कारक भी मेटाबोलिक बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट बीमारी कहा जाता है, क्योंकि बहुत से लोगों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। सिरदर्द या चक्कर नहीं आ रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि ब्लड प्रेशर सामान्य है। इसी तरह बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल भी आमतौर पर कोई खास लक्षण नहीं देता और इसका पता रक्त जांच के जरिए लगाया जाता है।

    सामान्य वजन वाले लोगों को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उन्हें मेटाबोलिक समस्याओं का खतरा नहीं है। शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान, धूम्रपान और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास जैसे कारण सामान्य वजन के बावजूद जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    30 वर्ष के बाद नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है। डायबिटीज की स्क्रीनिंग और जोखिम के अनुसार लिपिड प्रोफाइल भी कराया जा सकता है। डॉक्टर आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास, वजन, खानपान और ब्लड प्रेशर जैसे कारकों को देखकर तय कर सकते हैं कि आपके लिए कौन-कौन से परीक्षण जरूरी हैं।

    अगर लगातार थकान, वजन में असामान्य बदलाव या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या महसूस हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच से संभावित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान शुरुआती चरण में की जा सकती है।

  • राजेश शर्मा की तबीयत बिगड़ने पर बड़ा खुलासा, एक्टर ने जहरीले कीड़े के काटने की खबर को बताया झूठ, डायबिटीज को बताया असली वजह

    राजेश शर्मा की तबीयत बिगड़ने पर बड़ा खुलासा, एक्टर ने जहरीले कीड़े के काटने की खबर को बताया झूठ, डायबिटीज को बताया असली वजह


    नई दिल्ली ।
    अभिनेता राजेश शर्मा ने अपनी सेहत को लेकर चल रही खबरों पर सफाई दी है। कुछ समय पहले ऐसी खबरें सामने आई थीं कि शूटिंग के दौरान उन्हें किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अब अभिनेता ने खुद इन खबरों को गलत बताया है और अपनी तबीयत खराब होने की असली वजह बताई है।

    राजेश शर्मा ने बताया कि उनके सीधे पैर में लंबे समय से त्वचा से जुड़ी समस्या चल रही थी। बाद में वहां संक्रमण हो गया, जिसके कारण उन्हें इलाज कराना पड़ा। अभिनेता के मुताबिक उनका इलाज अब पूरा हो चुका है और वह धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि वह एक-दो सप्ताह में दोबारा काम पर लौट सकेंगे।

    कीड़े के काटने की खबर पर सफाई देते हुए राजेश शर्मा ने कहा कि यह गलत खबर थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभास की फिल्म के सेट पर उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना के लिए न तो प्रभास जिम्मेदार थे और न ही फिल्म की यूनिट। अभिनेता के मुताबिक हैदराबाद में शूटिंग के दौरान उनके साथ ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

    राजेश शर्मा ने बताया कि हैदराबाद से कोलकाता लौटने के बाद उनकी स्थिति ज्यादा बिगड़ गई। उन्होंने इसके पीछे अपनी डायबिटीज का स्तर काफी बढ़ जाना भी एक बड़ी वजह बताया। अभिनेता ने स्वीकार किया कि शुरुआत में उन्होंने अपनी स्वास्थ्य स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया था। इसके बाद समस्या बढ़ती गई और उन्हें उपचार की जरूरत पड़ी।

    इससे पहले अभिनेत्री सुदीपा चटर्जी ने राजेश शर्मा की तबीयत को लेकर जानकारी साझा की थी। उन्होंने बताया था कि अभिनेता को कीड़े ने काट लिया है और उनकी हालत खराब होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अब राजेश शर्मा ने इस दावे को गलत बताया है।

    अभिनेता ने कहा कि सुदीपा उनकी दोस्त हैं और वह उनकी सेहत को लेकर चिंतित थीं। हालांकि, उस समय उन्हें भी पूरी और सही जानकारी नहीं थी। इसी वजह से कीड़े के काटने की बात सामने आई।

    जुलाई में सुदीपा चटर्जी ने सोशल मीडिया पर राजेश शर्मा की तबीयत को लेकर एक पोस्ट साझा किया था। उस पोस्ट के मुताबिक रामोजी फिल्म सिटी में फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता वहां के एक तकनीशियन से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक जहरीले कीड़े के काटने की बात कही गई थी। पोस्ट में बताया गया था कि इसके बाद उनकी हालत खराब हुई और वह हैदराबाद से कोलकाता के लिए फ्लाइट से रवाना हुए।

    यात्रा के दौरान उन्हें बुखार और बेचैनी जैसी परेशानी हुई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, अब अभिनेता की ओर से सामने आई जानकारी ने उस समय बताई गई वजह को गलत साबित किया है। राजेश शर्मा ने अपनी बीमारी के पीछे पैर के संक्रमण और बढ़ी हुई डायबिटीज को प्रमुख कारण बताया है।

    अभिनेता फिलहाल उपचार के बाद रिकवरी कर रहे हैं और जल्द ही काम पर लौटने की उम्मीद जता रहे हैं। उनकी सफाई के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी तबीयत बिगड़ने की वजह जहरीले कीड़े का काटना नहीं थी, जैसा कि पहले बताया गया था।

  • अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया

    अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया


    नई दिल्ली । 
    स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले जोखिमों की चर्चा में आमतौर पर धूम्रपान, शराब, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता को प्रमुख कारण माना जाता है। हालांकि, लंबे समय तक बना रहने वाला अकेलापन भी शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। हेल्थ एजुकेटर और डॉक्टर एरिक बर्ग ने अकेलेपन को लेकर लोगों को सावधान किया है और इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान देने की बात कही है।

    अकेलापन केवल किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अकेले रहना नहीं है। समस्या तब बढ़ सकती है जब व्यक्ति लंबे समय तक सामाजिक संपर्क से दूर रहे, उसके पास बातचीत करने वाले लोग कम हों या उसे भावनात्मक रूप से अलग-थलग महसूस हो। ऐसी स्थिति लगातार बनी रहने पर तनाव और मानसिक दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर शरीर के अलग-अलग तंत्रों पर पड़ सकता है।

    डॉक्टर एरिक बर्ग के अनुसार, लंबे समय तक सामाजिक अलगाव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में अकेलेपन की तुलना कई अन्य स्वास्थ्य जोखिमों से करते हुए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत बताई। हालांकि, अकेलेपन को सीधे तौर पर प्रतिदिन 15 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान पहुंचाने वाला बताना एक लोकप्रिय स्वास्थ्य दावा है, जिसे संदर्भ और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सावधानी से समझना जरूरी है।

    लगातार अकेलेपन और तनाव की स्थिति में शरीर का तनाव प्रतिक्रिया तंत्र सक्रिय रह सकता है। इससे तनाव से जुड़े हार्मोन और रक्तचाप प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक बढ़ा हुआ तनाव हृदय स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है और हृदय रोग तथा स्ट्रोक जैसे रोगों से जुड़े अन्य जोखिमों को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

    अकेलेपन का असर प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी पड़ सकता है। लगातार मानसिक तनाव शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। इससे संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया और बीमारी से उबरने की प्रक्रिया पर असर पड़ने की संभावना रहती है।

    मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर सामाजिक संपर्क की कमी चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं के जोखिम से जुड़ी हुई है। परिवार, दोस्तों और समाज के साथ स्वस्थ संवाद व्यक्ति को भावनात्मक समर्थन देता है। जब यह संपर्क लगातार कम हो जाता है तो तनाव से निपटने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और नकारात्मक भावनाएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

    अकेलेपन का संबंध नींद की गुणवत्ता से भी देखा गया है। लगातार चिंता, असुरक्षा या तनाव के कारण कुछ लोगों को सोने में परेशानी हो सकती है। पर्याप्त और अच्छी नींद नहीं मिलने पर दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

    लंबे समय तक सामाजिक अलगाव का असर सोचने और समझने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। सामाजिक गतिविधियों और बातचीत से दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। उम्र बढ़ने के साथ सामाजिक अलगाव और संज्ञानात्मक गिरावट के बीच संबंध को लेकर भी शोध हुआ है। हालांकि, अकेलापन अकेले ही डिमेंशिया का कारण है, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अकेलेपन को नजरअंदाज करने के बजाय नियमित सामाजिक संपर्क बनाए रखना उपयोगी हो सकता है। परिवार और दोस्तों से बातचीत, सामुदायिक गतिविधियों में भागीदारी, पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार कदम हो सकते हैं। लंबे समय तक अकेलापन महसूस करने वाले व्यक्ति को इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी मानने के बजाय स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में गंभीरता से लेना चाहिए।