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  • फिल्म 'दुल्हनिया ले आएगी' के प्रमोशनल इवेंट में हादसे की खबर से चिंता: बिस्तर से उठने में असमर्थ पीयूष मिश्रा के जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना

    फिल्म 'दुल्हनिया ले आएगी' के प्रमोशनल इवेंट में हादसे की खबर से चिंता: बिस्तर से उठने में असमर्थ पीयूष मिश्रा के जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा एवं रंगमंच के दिग्गज अभिनेता, गीतकार और लेखक पीयूष मिश्रा के प्रशंसकों के लिए चिंताजनक खबर सामने आई है। अभिनेता अपने घर के बाथरूम में अचानक फिसलकर गिर पड़े, जिससे वे गंभीर रूप से चोटिल हो गए हैं। इस अचानक हुए हादसे में उनके एक हाथ में गंभीर फ्रैक्चर आ गया है। डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें पूर्ण रूप से बेड रेस्ट की सलाह दी है। हादसे के कारण वे अपनी आगामी फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ के प्रचार अभियानों और साक्षात्कारों का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। इस दुखद घटना की जानकारी फिल्म के निर्देशक द्वारा एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान दी गई, जिसके बाद से ही मनोरंजन जगत और प्रशंसकों के बीच उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थनाएं की जा रही हैं।

    मुंबई में आयोजित फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ के एक विशेष प्रमोशनल कार्यक्रम के दौरान जब मुख्य भूमिका निभा रहे पीयूष मिश्रा अनुपस्थित रहे, तो मीडिया द्वारा उनकी स्थिति पर सवाल पूछा गया। इस पर फिल्म के निर्देशक आकाशादित्य लामा ने घटना का विवरण साझा करते हुए बताया कि अभिनेता के मैनेजर ने उन्हें हादसे की सूचना दी। निर्देशक के अनुसार, पीयूष मिश्रा पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याओं से भी जूझ रहे थे, लेकिन इसके बावजूद वे अपने पेशेवर प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए प्रयासरत थे। हालांकि, इस दुर्घटना के बाद उनकी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे फिलहाल बिस्तर से उठ सकें, जिसके कारण वे आगामी सभी कार्यक्रमों से दूर रहेंगे।

    आकाशादित्य लामा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ आगामी 24 जुलाई को देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह फिल्म कॉमेडी, पारिवारिक रिश्तों, रोमांस और सामाजिक ताने-बाने से भरपूर एक मनोरंजक सिनेमा प्रस्तुत करने का दावा करती है। हाल ही में जारी हुए इसके ट्रेलर को दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया है। फिल्म की मुख्य स्टारकास्ट में पीयूष मिश्रा के साथ-साथ अभिनेत्री खुशाली कुमार, वरिष्ठ अभिनेता महेश मांजरेकर, ओंकार कपूर, लैरिसा बोनेसी और स्नेहिल दीक्षित मेहरा जैसे कई नामचीन कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आने वाले हैं।

    फिल्म की रिलीज से ठीक पहले मुख्य कलाकार के इस तरह चोटिल हो जाने से फिल्म की पूरी टीम चिंतित है। हालांकि, निर्माताओं और सह-कलाकारों ने पीयूष मिश्रा के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि इस समय उनका स्वास्थ्य और पूर्ण इलाज सबसे पहली प्राथमिकता है। सिनेमा जगत के तमाम हस्तियों और उनके प्रशंसकों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अभिनेता के जल्द से जल्द स्वस्थ होकर काम पर लौटने की कामना की है। 24 जुलाई को रिलीज हो रही इस फिल्म से पूरी टीम को काफी उम्मीदें हैं, और दर्शक भी पर्दे पर पीयूष मिश्रा के अभिनय को देखने का उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं।

  • भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार स्मिता पाटिल के असमय निधन की कहानी आज भी कला जगत को झकझोर देती है। समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा दोनों में अपनी सशक्त अदाकारी की छाप छोड़ने वाली इस महान अभिनेत्री की जीवन यात्रा बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में समाप्त हुई थी। वर्ष 1986 में अपने पहले बच्चे के जन्म के ठीक दो सप्ताह बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका निधन हो गया था। प्रसव के बाद शरीर में फैले घातक संक्रमण और सही समय पर चिकित्सीय सलाह न लेने की वजह से उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी।

    पुत्र के जन्म के बाद परिवार में खुशियों का माहौल था, लेकिन प्रसवोत्तर संक्रमण ने अभिनेत्री को अपनी चपेट में ले लिया था। शुरुआती दौर में स्वास्थ्य में आ रही गिरावट को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया गया, जिससे संक्रमण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलता चला गया। स्थानीय चिकित्सकों द्वारा प्राथमिक उपचार और ड्रिप दिए जाने के बावजूद उनके शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहा। अपने नवजात शिशु के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वे अस्पताल जाने से बचती रहीं, जिससे स्थिति लगातार नियंत्रण से बाहर होती चली गई।

    निधन वाले दिन अभिनेत्री की स्थिति में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। शाम के समय उनका चेहरा पीला पड़ने लगा और उन्हें लगातार खून की उल्टियां होने लगीं। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल मुंबई के जसलोक अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक वे कोमा की स्थिति में जा चुकी थीं। विशेषज्ञों की टीम ने उन्हें बचाने के भरसक प्रयास किए और स्थिति को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के डॉक्टरों से भी संपर्क साधने की कोशिशें की गईं, परंतु संक्रमण मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका था।

    अस्पताल में भर्ती कराए जाने के कुछ ही घंटों भीतर आंतरिक रक्तस्राव और अंगों के काम न करने की वजह से स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। अंततः देर रात चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। केवल इकत्तीस वर्ष की आयु में स्मिता पाटिल का इस तरह अचानक चले जाना संपूर्ण भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक कभी न पूरा होने वाला घाटा था। उनके निधन के बाद उनके नवजात शिशु का पालन-पोषण उनके माता-पिता द्वारा किया गया, जबकि भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को आज भी अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।

  • मोबाइल स्क्रॉल करते-करते बढ़ रही कब्ज की गंभीर बीमारी, अब युवा और बच्चे भी चपेट में

    मोबाइल स्क्रॉल करते-करते बढ़ रही कब्ज की गंभीर बीमारी, अब युवा और बच्चे भी चपेट में


    भोपाल । स्मार्टफोन आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसकी एक छोटी-सी आदत स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। खासकर टॉयलेट में बैठकर लंबे समय तक मोबाइल स्क्रॉल करना अब सिर्फ समय बिताने की आदत नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की वजह बनता जा रहा है। भोपाल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव रघुवंशी के अनुसार लगातार लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहने और बार-बार जोर लगाने से ऑब्स्ट्रक्टेड डिफिकेशन सिंड्रोम (ODS) जैसी गंभीर समस्या विकसित हो सकती है। यही वजह है कि अब कब्ज के साथ-साथ पाइल्स, फिशर और रेक्टल प्रोलैप्स जैसी बीमारियों के मामले भी बढ़ रहे हैं।

    डॉ. रघुवंशी बताते हैं कि हाल ही में उनके पास 70 वर्षीय एक बुजुर्ग मरीज पहुंचे, जो करीब 35 वर्षों से कब्ज की समस्या से परेशान थे। लगभग 20 साल तक उनका इलाज आईबीएस-सी (IBS-C) मानकर किया जाता रहा, लेकिन राहत नहीं मिली। जब विशेष जांच और एनोरेक्टल मैनोमेट्री की गई तो पता चला कि असली समस्या ऑब्स्ट्रक्टेड डिफिकेशन सिंड्रोम थी। बायोफीडबैक थेरेपी के आठ सत्रों के बाद मरीज की हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ। पहले जहां उन्हें शौचालय में लगभग एक घंटा लग जाता था, वहीं अब यह समय घटकर करीब पांच मिनट रह गया और कब्ज की दवाओं की आवश्यकता भी लगभग समाप्त हो गई।

    ऐसा ही एक अन्य मामला 40 वर्षीय महिला का सामने आया, जो दस वर्षों से कब्ज से जूझ रही थीं। लगातार जोर लगाने की आदत के कारण उनके मलाशय का हिस्सा बाहर आने लगा। जांच में पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों की कमजोरी और ODS की पुष्टि हुई। समय पर बायोफीडबैक थेरेपी मिलने से बिना सर्जरी ही उनकी स्थिति में 90 से 95 प्रतिशत तक सुधार दर्ज किया गया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या मोबाइल फोन नहीं, बल्कि मोबाइल देखते हुए लंबे समय तक टॉयलेट सीट पर बैठे रहने की आदत है। पहले लोग शौचालय में अखबार पढ़ते थे, अब उसकी जगह मोबाइल ने ले ली है। जब व्यक्ति स्क्रीन पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर लेता है तो मस्तिष्क और आंत के बीच का प्राकृतिक समन्वय प्रभावित होने लगता है। इससे मलत्याग का सामान्य रिफ्लेक्स कमजोर पड़ता है और धीरे-धीरे कब्ज की समस्या बढ़ने लगती है।

    डॉ. रघुवंशी के अनुसार पहले कब्ज को मुख्य रूप से 40 से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति तेजी से बदली है। अब स्कूल जाने वाले बच्चे, किशोर और 20 से 40 वर्ष आयु वर्ग के युवा भी बड़ी संख्या में कब्ज की शिकायत लेकर क्लीनिक पहुंच रहे हैं। उनके क्लीनिकल अनुभव के मुताबिक पिछले दस वर्षों में कब्ज के मरीजों की संख्या में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। वहीं कब्ज के हर दस मरीजों में से तीन से चार ऐसे मिलते हैं, जो टॉयलेट में मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत स्वीकार करते हैं। हालांकि डॉक्टर स्पष्ट करते हैं कि यह उनके चिकित्सकीय अनुभव पर आधारित है और इस विषय पर व्यापक भारतीय वैज्ञानिक अध्ययन अभी उपलब्ध नहीं हैं।

    विशेषज्ञ स्वस्थ पाचन तंत्र के लिए कुछ सरल आदतें अपनाने की सलाह देते हैं। भोजन में पर्याप्त मात्रा में फाइबर, हरी सब्जियां, मौसमी फल और सलाद शामिल करें। दिनभर पर्याप्त पानी पिएं, नियमित व्यायाम करें, 7 से 8 घंटे की नींद लें और रोज सुबह एक निश्चित समय पर शौच जाने की आदत विकसित करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टॉयलेट में अनावश्यक समय बिताने और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने से बचें। छोटी-सी यह सावधानी भविष्य में कई गंभीर बीमारियों से बचाने में मददगार साबित हो सकती है।

  • हार्ट को रखना है हमेशा हेल्दी? आज ही छोड़ दें ये 5 खराब आदतें, कम होगा दिल की बीमारियों का खतरा

    हार्ट को रखना है हमेशा हेल्दी? आज ही छोड़ दें ये 5 खराब आदतें, कम होगा दिल की बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली।
    स्वस्थ और लंबी जिंदगी के लिए दिल का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। आधुनिक जीवनशैली, अनियमित खानपान और बढ़ते तनाव के कारण हृदय संबंधी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उम्र या आनुवंशिक कारण ही नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कई आदतें भी हार्ट हेल्थ को प्रभावित करती हैं। यदि समय रहते इन आदतों में सुधार कर लिया जाए तो हृदय रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    लंबे समय तक लगातार बैठे रहना दिल के लिए नुकसानदायक माना जाता है। ऑफिस में घंटों कुर्सी पर काम करना या घर पर लंबे समय तक मोबाइल और टीवी के सामने बैठे रहना ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित करता है। इससे वजन बढ़ने, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हृदय रोग का जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हर 45 से 60 मिनट के बाद कुछ मिनट टहलें या हल्की स्ट्रेचिंग जरूर करें।

    जरूरत से ज्यादा नमक और प्रोसेस्ड फूड का सेवन भी हार्ट हेल्थ के लिए हानिकारक हो सकता है। पैकेज्ड स्नैक्स, चिप्स, इंस्टेंट फूड और प्रोसेस्ड मीट में सोडियम की मात्रा अधिक होती है, जिससे रक्तचाप बढ़ सकता है और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसके बजाय ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और घर का संतुलित भोजन अधिक लाभकारी माना जाता है।

    पर्याप्त नींद न लेना भी दिल की सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। लगातार कम नींद लेने से तनाव हार्मोन बढ़ सकते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है। अधिकांश वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की अच्छी गुणवत्ता वाली नींद जरूरी मानी जाती है।

    लगातार तनाव में रहना भी हृदय रोगों का बड़ा कारण बन सकता है। काम का दबाव, आर्थिक समस्याएं या निजी जीवन की परेशानियां लंबे समय तक बनी रहने पर रक्तचाप बढ़ सकता है। तनाव के कारण कई लोग धूम्रपान, अधिक भोजन या अन्य अस्वस्थ आदतों की ओर भी आकर्षित हो जाते हैं। नियमित योग, ध्यान, गहरी सांस लेने के अभ्यास और व्यायाम तनाव कम करने में मदद कर सकते हैं।

    धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन भी हृदय के लिए बेहद नुकसानदायक है। धूम्रपान रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा सकता है। वहीं अधिक मात्रा में शराब का सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ाने के साथ हृदय की कार्यक्षमता पर भी असर डाल सकता है। इन आदतों से दूरी बनाना दिल की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, रोज कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित आहार लेना, वजन और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराना, तनाव को नियंत्रित रखना और किसी भी असामान्य लक्षण जैसे सीने में दर्द, सांस फूलना या अत्यधिक थकान महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना हृदय को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकता है।

  • बार बार होने वाला सिरदर्द हो सकता है गंभीर बीमारी का संकेत नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

    बार बार होने वाला सिरदर्द हो सकता है गंभीर बीमारी का संकेत नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी


    नई दिल्ली । नई दिल्ली से प्राप्त मेडिकल जानकारी के अनुसार सिरदर्द को अक्सर लोग सामान्य समस्या मानकर टाल देते हैं। थकान नींद की कमी तनाव या लंबे समय तक स्क्रीन पर काम करने के बाद होने वाला सिरदर्द आम माना जाता है और आराम करने या पानी पीने से ठीक भी हो जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर सिरदर्द सामान्य नहीं होता। जब यह समस्या बार बार होने लगे या इसके साथ शरीर में असामान्य बदलाव दिखाई देने लगें तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है।

    डॉक्टरों के अनुसार ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर स्थिति के शुरुआती संकेत बहुत साधारण हो सकते हैं। यही कारण है कि कई लोग इन्हें थकान या मानसिक दबाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। दिमाग में जब असामान्य कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं तो वे आसपास के हिस्सों पर दबाव डालती हैं। इस दबाव के कारण अलग अलग तरह के लक्षण सामने आ सकते हैं और यह इस बात पर निर्भर करता है कि ट्यूमर दिमाग के किस हिस्से में है और कितना बढ़ चुका है।

    अगर यह समस्या सोचने समझने या याददाश्त से जुड़े हिस्से को प्रभावित करती है तो व्यक्ति को भूलने की समस्या होने लगती है। ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है। कई लोग इसे उम्र या तनाव का असर मान लेते हैं जबकि यह गंभीर संकेत हो सकता है।

    यदि ट्यूमर दृष्टि से जुड़े हिस्से को प्रभावित करता है तो धुंधला दिखना दोहरी छवि दिखाई देना या नजर कमजोर होना जैसी समस्या हो सकती है। कुछ मामलों में बोलने में कठिनाई या सही शब्द चुनने में परेशानी भी देखी जा सकती है। ये लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

    इसके अलावा दिमाग के संतुलन और मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाले हिस्से पर असर पड़ने से चलने में लड़खड़ाहट हाथ पैरों में कमजोरी और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। कुछ मरीजों में व्यवहार में बदलाव चिड़चिड़ापन या सामाजिक दूरी भी बढ़ सकती है जिसे मानसिक तनाव समझ लिया जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हर सिरदर्द खतरनाक नहीं होता लेकिन कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि सिरदर्द लगातार बढ़ रहा हो बार बार हो रहा हो नींद से जगा रहा हो या पहले से अलग और अधिक तीव्र महसूस हो तो डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए।

    यदि सिरदर्द के साथ उल्टी संतुलन बिगड़ना नजर में बदलाव कमजोरी या मानसिक भ्रम जैसे लक्षण भी दिखें तो स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत जांच कराना जरूरी हो जाता है। समय पर पहचान और उपचार से कई गंभीर समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है इसलिए लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

  • बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान

    बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान


    नई दिल्ली। बच्चों में होने वाली सबसे आम लेकिन बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है दस्त, जिसे चिकित्सा भाषा में Diarrhea कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है, यदि समय पर ध्यान न दिया जाए। विशेषकर छोटे बच्चों में दस्त के कारण शरीर में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की तेजी से कमी हो जाती है, जिससे निर्जलीकरण (Dehydration), कमजोरी और कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नेशनल हेल्थ मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार National Health Mission लगातार लोगों को जागरूक कर रहा है कि बच्चों में दस्त को हल्के में लेना गंभीर भूल साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत उपचार ही बच्चे की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि दस्त से बचाव के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है शिशु को शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध देना। स्तनपान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है और कई संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह प्राकृतिक रूप से बच्चे के शरीर को मजबूत आधार देता है।

    दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है स्वच्छता का पालन। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण दस्त फैलाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। इसलिए बच्चों के आसपास साफ-सफाई रखना, हाथों को नियमित धोना और सुरक्षित पेयजल का उपयोग करना बेहद जरूरी माना गया है। इसके साथ ही रोटावायरस और खसरा जैसी बीमारियों के खिलाफ समय पर टीकाकरण भी बच्चों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

    तीसरा और सबसे जरूरी कदम है—यदि बच्चे को दस्त हो जाए तो तुरंत उपचार शुरू करना। डॉक्टरों के अनुसार हर बार दस्त होने पर बच्चे को Oral Rehydration Solution (ओआरएस) देना चाहिए ताकि शरीर में पानी और नमक की कमी पूरी हो सके। इसके साथ ही चिकित्सक की सलाह पर जिंक की गोली 14 दिनों तक देना भी लाभकारी माना जाता है, जो दस्त की अवधि और गंभीरता को कम करने में मदद करता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि माता-पिता समय पर इन उपायों को अपनाएं तो बच्चों को गंभीर स्थिति में पहुंचने से बचाया जा सकता है। दस्त के दौरान सबसे बड़ी चुनौती शरीर में तेजी से होने वाला पानी का नुकसान होता है, जिसे समय रहते रोका जाए तो स्थिति सामान्य की जा सकती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि बच्चों को हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक आहार दिया जाए तथा किसी भी तरह की लापरवाही न बरती जाए। दस्त के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

    कुल मिलाकर, जागरूकता, स्वच्छता और सही उपचार ही बच्चों को इस खतरनाक लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी से सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी

    नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी


    नई दिल्ली।
    देश के कई हिस्सों में नौतपा की शुरुआत के साथ भीषण गर्मी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और तेज धूप लोगों की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। डॉक्टरों का कहना है कि सामान्य लोगों की तुलना में पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इस दौरान अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। बढ़ती गर्मी शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे में लापरवाही कई बार बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा के दौरान शरीर पर हीट स्ट्रेस तेजी से बढ़ता है। अत्यधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स की कमी होने लगती है। इसका सीधा असर शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। खासतौर पर डायबिटीज, हार्ट, किडनी, अस्थमा और मोटापे से पीड़ित लोगों में जोखिम ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर इन मरीजों को समय रहते सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।

    डायबिटीज के मरीजों में गर्मी का असर कई तरह से दिखाई देता है। शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड शुगर का स्तर प्रभावित हो सकता है। कई बार डिहाइड्रेशन के कारण शुगर अचानक बढ़ या घट सकती है, जिससे मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है। इसके अलावा इंसुलिन की कार्यक्षमता पर भी अधिक तापमान असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों को समय-समय पर पानी पीने और शुगर की नियमित जांच करते रहने की सलाह दी जा रही है।

    किडनी रोगियों के लिए भी नौतपा का समय चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। अधिक पसीना निकलने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पहले से मौजूद समस्या गंभीर हो सकती है। डॉक्टरों का मानना है कि पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना ऐसे मरीजों के लिए बेहद जरूरी है।

    हार्ट मरीजों के लिए भी बढ़ती गर्मी चिंता का विषय है। अत्यधिक तापमान शरीर के तापमान नियंत्रण तंत्र पर दबाव डालता है। कई मामलों में हीट स्ट्रोक या हीट एग्जॉशन की स्थिति बन सकती है, जिससे दिल पर अतिरिक्त भार पड़ता है। इसी तरह अस्थमा और सांस संबंधी मरीजों में गर्म हवा और वातावरणीय बदलाव सांस लेने में परेशानी बढ़ा सकते हैं।

    डॉक्टरों की सलाह है कि नौतपा के दौरान दोपहर में अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचना चाहिए। हल्के और सूती कपड़े पहनने, पर्याप्त पानी पीने, तला-भुना भोजन कम खाने और शरीर को ठंडा रखने जैसे छोटे उपाय बड़ी समस्याओं से बचा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही सावधानी और संतुलित दिनचर्या अपनाकर भीषण गर्मी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • क्या ज्यादा आम खाने से चेहरे पर निकलते हैं पिंपल्स? गर्मियों की सबसे चर्चित बहस पर डॉक्टरों ने बताई त्वचा की असली कहानी

    क्या ज्यादा आम खाने से चेहरे पर निकलते हैं पिंपल्स? गर्मियों की सबसे चर्चित बहस पर डॉक्टरों ने बताई त्वचा की असली कहानी

    नई दिल्ली। गर्मियों का मौसम आते ही आम की मिठास लोगों के बीच उत्साह बढ़ा देती है, लेकिन इसके साथ एक पुरानी बहस भी फिर चर्चा में आ जाती है। अक्सर यह माना जाता है कि ज्यादा आम खाने से चेहरे पर पिंपल्स निकलने लगते हैं। कई लोग त्वचा खराब होने के डर से आम खाने से दूरी तक बना लेते हैं। खासतौर पर युवाओं के बीच यह धारणा काफी आम हो चुकी है कि आम और मुंहासों का सीधा संबंध होता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय इस सोच से अलग दिखाई देती है। उनका मानना है कि आम को सीधे तौर पर पिंपल्स की वजह मानना पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता।

    विशेषज्ञों के अनुसार त्वचा पर मुंहासे निकलने के पीछे कई शारीरिक और जीवनशैली से जुड़े कारण जिम्मेदार होते हैं। हार्मोनल बदलाव, ऑयली स्किन, तनाव, अनियमित दिनचर्या, कम नींद, गलत खानपान और पर्याप्त पानी की कमी जैसे कई कारण त्वचा की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा आनुवंशिक कारण भी त्वचा पर असर डालते हैं। ऐसे में केवल आम को दोष देना एक अधूरी समझ मानी जा सकती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आम अपने आप में पोषण से भरपूर फल है। इसमें शरीर और त्वचा के लिए जरूरी कई पोषक तत्व पाए जाते हैं जो त्वचा की सेहत को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। इसमें मौजूद विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में सीमित मात्रा में आम का सेवन नुकसान की बजाय लाभ देने वाला माना जाता है।

    हालांकि समस्या तब बढ़ सकती है जब लोग आम को अत्यधिक मात्रा में खाना शुरू कर देते हैं या उसे असंतुलित खानपान के साथ शामिल करते हैं। गर्मियों में कई लोग आम के साथ अत्यधिक मीठे, क्रीमी या तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन भी करते हैं। ऐसे खाद्य संयोजन शरीर में सूजन से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं, जिसका प्रभाव त्वचा पर दिखाई दे सकता है। यही वजह है कि कई बार लोग वास्तविक कारणों को नजरअंदाज कर आम को जिम्मेदार मान लेते हैं।

    गर्मी के मौसम में त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ने के पीछे मौसम भी बड़ी भूमिका निभाता है। अधिक पसीना आना, त्वचा पर धूल-मिट्टी जमा होना, चेहरे को बार-बार छूना और साफ-सफाई की कमी त्वचा के रोमछिद्रों को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण चेहरे पर दाने और मुंहासों की समस्या बढ़ सकती है। ऐसे में लोग मौसम और दिनचर्या के प्रभाव को समझने के बजाय सीधे आम को कारण मान लेते हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कुछ लोगों में आम से जुड़ी एलर्जी जैसी स्थिति देखने को मिल सकती है। कई बार चेहरे के आसपास लाल दाने, खुजली या छोटे चकत्ते दिखाई देते हैं जिन्हें लोग पिंपल समझ लेते हैं। जबकि कई मामलों में यह त्वचा की एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है। इसलिए त्वचा पर होने वाले हर बदलाव को एक्ने मान लेना भी सही नहीं माना जाता।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित मात्रा में आम का सेवन, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और सही स्किन केयर आदतें अपनाने से त्वचा को स्वस्थ रखा जा सकता है। इसलिए आम को पूरी तरह दोष देने के बजाय जीवनशैली और शरीर की वास्तविक जरूरतों को समझना अधिक जरूरी माना जा रहा है।

  • कोविड के बाद अब इबोला की चिंता: अफ्रीका में बढ़ते संक्रमण ने बढ़ाई बेचैनी, भारत ने बढ़ाई निगरानी

    कोविड के बाद अब इबोला की चिंता: अफ्रीका में बढ़ते संक्रमण ने बढ़ाई बेचैनी, भारत ने बढ़ाई निगरानी


    नई दिल्ली। दुनिया एक बार फिर एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती को लेकर सतर्क होती दिखाई दे रही है। अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तेजी से फैल रहे इबोला संक्रमण ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। कोविड महामारी के अनुभव के बाद अब किसी भी संभावित स्वास्थ्य संकट को लेकर सरकारें पहले से अधिक सतर्क नजर आ रही हैं। इसी बीच भारत ने भी एहतियात के तौर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं और लोगों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। फिलहाल देश में राहत की बात यह है कि इबोला संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन जोखिम को देखते हुए सतर्कता बढ़ा दी गई है।

    भारत सरकार ने नागरिकों को कांगो, युगांडा और साउथ सूडान जैसे देशों की गैर-जरूरी यात्रा से फिलहाल बचने की सलाह दी है। इसके साथ ही इन क्षेत्रों में रह रहे भारतीय नागरिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने और स्थानीय स्वास्थ्य नियमों का पालन करने की सलाह दी गई है। सरकार का मानना है कि समय रहते सावधानी अपनाना किसी भी संभावित खतरे को रोकने की दिशा में सबसे प्रभावी कदम साबित हो सकता है। स्वास्थ्य एजेंसियां लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं और हर जरूरी तैयारी को मजबूत किया जा रहा है।

    इबोला एक बेहद गंभीर और जानलेवा वायरल बीमारी मानी जाती है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसकी तेज संक्रमण क्षमता और गंभीर प्रभाव हैं। इसके शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन बाद में स्थिति गंभीर रूप ले सकती है। कई मामलों में शरीर के अंदरूनी हिस्सों में ब्लीडिंग जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी की मृत्यु दर भी काफी अधिक मानी जाती है, जिससे यह संक्रमण और अधिक चिंताजनक बन जाता है।

    इस बार फैल रहा संक्रमण बूंदीबुग्यो स्ट्रेन से जुड़ा बताया जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि इस स्ट्रेन के लिए अभी तक कोई व्यापक रूप से स्वीकृत वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं माना जा रहा है। यही वजह है कि संक्रमण की रोकथाम और शुरुआती पहचान को सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना जा रहा है। कई देशों ने अपनी सीमाओं और एयरपोर्ट पर निगरानी बढ़ानी शुरू कर दी है ताकि प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले यात्रियों की जांच समय पर की जा सके।

    भारत में भी स्वास्थ्य तंत्र को अलर्ट मोड पर रखा गया है। एयरपोर्ट और सीमावर्ती क्षेत्रों पर निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि घबराने की बजाय जागरूक और सतर्क रहने की जरूरत है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए समय पर तैयारी और सावधानी सबसे अहम भूमिका निभाती है।

    फिलहाल देश में संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए सतर्कता को प्राथमिकता दी जा रही है। आने वाले दिनों में स्वास्थ्य एजेंसियों की नजर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर बनी रहेगी। यदि लोग स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करें और अनावश्यक जोखिम से बचें, तो किसी भी संभावित खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

  • मां को दोष देना बंद करो, साइंस समझो: बच्चे की हालत बिगड़ने पर मां को ताने, डॉक्टर का फूटा गुस्सा

    मां को दोष देना बंद करो, साइंस समझो: बच्चे की हालत बिगड़ने पर मां को ताने, डॉक्टर का फूटा गुस्सा



    नई दिल्ली। बच्चों की तबीयत बिगड़ने पर अक्सर परिवारों में सबसे पहले मां को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। ऐसा ही एक मामला पीडियाट्रिशियन डॉ. माधवी भारद्वाज के सामने आया, जहां 20 महीने के बच्चे को दौरे पड़ने पर परिवार ने मां की देखभाल पर सवाल उठाए।

    डॉक्टर ने बताया कि बच्चा अचानक बुखार और दौरे की स्थिति में अस्पताल लाया गया था, जहां समय पर इलाज देकर उसकी हालत को स्थिर कर दिया गया। इसके बावजूद घरवालों ने मां से कहा कि अगर उसने ठीक से ध्यान रखा होता, तो यह स्थिति नहीं आती।

    इस पर डॉ. माधवी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि लोगों को पहले मेडिकल साइंस समझनी चाहिए। उन्होंने बताया कि 6 महीने से 5 साल तक के बच्चों में तेज बुखार के दौरान फेब्राइल सीजर्स (दौरे) आम होते हैं और यह हमेशा लापरवाही का नतीजा नहीं होता।

    डॉक्टर ने यह भी कहा कि समाज में अक्सर मांओं को हर स्थिति के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है, जबकि कई बार यह पूरी तरह मेडिकल कंडीशन होती है। उन्होंने अपील की कि लोगों को दोष देने के बजाय समाधान और सही इलाज पर ध्यान देना चाहिए।