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  • आईने में चेहरा गौर से देखिए, कहीं शरीर कोई खतरे का संकेत तो नहीं दे रहा? इन बदलावों पर तुरंत दें ध्यान

    आईने में चेहरा गौर से देखिए, कहीं शरीर कोई खतरे का संकेत तो नहीं दे रहा? इन बदलावों पर तुरंत दें ध्यान


    नई दिल्ली । चेहरा सिर्फ हमारी पहचान और खूबसूरती का हिस्सा नहीं है बल्कि कई बार यह शरीर के अंदर चल रही स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के संकेत भी दे सकता है। आंखों का रंग बदलना हो या त्वचा का असामान्य रूप से पीला पड़ना होंठों का नीला दिखना या आंखों के आसपास लगातार सूजन रहना इन बदलावों को हमेशा केवल कॉस्मेटिक समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में होने वाले कई बदलाव चेहरे और आंखों पर दिखाई देने लगते हैं। हालांकि केवल चेहरे के लक्षणों के आधार पर किसी बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती लेकिन ऐसे बदलाव लगातार बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।

    सबसे पहले बात आंखों और त्वचा के पीले पड़ने की करें तो यह पीलिया का संकेत हो सकता है। शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ने पर आंखों का सफेद हिस्सा और त्वचा पीली दिखाई देने लगती है। इसके पीछे हेपेटाइटिस लिवर से जुड़ी बीमारी पित्त की पथरी या पित्त की नलियों से जुड़ी समस्या समेत कई कारण हो सकते हैं। कई मामलों में इसके साथ पेशाब का रंग गहरा और मल का रंग सामान्य से हल्का भी दिखाई दे सकता है। इसलिए आंखों में अचानक पीलापन नजर आए तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है।

    इसी तरह चेहरे या त्वचा का रंग सामान्य से ज्यादा फीका या पीला नजर आना भी शरीर में आयरन की कमी से जुड़े एनीमिया का संकेत हो सकता है। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी होता है और हीमोग्लोबिन शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर त्वचा के रंग में बदलाव के साथ लगातार थकान कमजोरी या थोड़ी मेहनत में सांस फूलने जैसी समस्या हो रही है तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

    चेहरे और होंठों का नीला पड़ना भी गंभीर संकेत हो सकता है। होंठ जीभ या चेहरे का अचानक नीला दिखना सायनोसिस कहलाता है और यह रक्त में ऑक्सीजन की कमी या रक्त संचार से जुड़ी परेशानी की ओर इशारा कर सकता है। फेफड़ों की बीमारी वायुमार्ग में रुकावट कुछ हृदय संबंधी समस्याएं या रक्त प्रवाह में बाधा इसके संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं। ऐसा बदलाव अचानक दिखाई दे तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।

    आंखों की पलकों के आसपास छोटे पीले या पीले-सफेद उभार भी ध्यान देने लायक होते हैं। इन्हें जैंथेलाज्मा कहा जाता है और ये कुछ लोगों में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर डॉक्टर की सलाह से लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराई जा सकती है।

    चेहरे पर लगातार सूजन भी शरीर में किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकती है। आंखों के आसपास सूजन कई कारणों से हो सकती है और कुछ मामलों में यह किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी देखी जाती है। वहीं चेहरे का फूला हुआ दिखना अंडरएक्टिव थायरॉयड जैसी स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। दूसरी ओर एलर्जी या किसी दवा की प्रतिक्रिया के कारण भी चेहरे और आंखों के आसपास सूजन आ सकती है।

    खास बात यह है कि चेहरे में दिखने वाले हर बदलाव का मतलब किसी गंभीर बीमारी से नहीं होता। मौसम त्वचा की सामान्य स्थिति एलर्जी खानपान या दूसरी वजहों से भी बदलाव हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई असामान्य बदलाव अचानक दिखाई दे लगातार बना रहे या उसके साथ कमजोरी सांस लेने में परेशानी दर्द अथवा अन्य लक्षण भी मौजूद हों तो खुद से बीमारी का अनुमान लगाने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना सबसे सुरक्षित तरीका है। आईना बीमारी की पुष्टि नहीं करता लेकिन शरीर के संकेतों पर समय रहते ध्यान देने में जरूर मदद कर सकता है।

  • रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा

    रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली । नींद हमारे शरीर और दिमाग को आराम देने के साथ अगले दिन बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार करती है। यही वजह है कि पर्याप्त नींद को स्वस्थ जीवनशैली का बेहद जरूरी हिस्सा माना जाता है। अगर रात की नींद बार-बार अधूरी रह रही है तो इसका असर सिर्फ सुबह की थकान या दिनभर की सुस्ती तक सीमित नहीं रहता बल्कि धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार याददाश्त एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगता है। गुस्सा जल्दी आना छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना किसी काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना और जरूरी बातें भूल जाना कई बार नींद पूरी न होने से भी जुड़ा हो सकता है।

    एक रात नींद कम होने पर अगले दिन थकान सिरदर्द सुस्ती और काम करने में परेशानी महसूस होना सामान्य हो सकता है। कभी-कभार ऐसा होने पर आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती लेकिन जब नींद की कमी लगातार बनी रहती है तो इसका असर रोजमर्रा की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। व्यक्ति को छोटे-छोटे फैसले लेने में भी परेशानी हो सकती है और पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकने की समस्या बढ़ सकती है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न मिलने की स्थिति में शरीर और दिमाग दोनों पर दबाव बढ़ता है।

    नींद की कमी का सीधा असर व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। पर्याप्त आराम न मिलने पर व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में भी ज्यादा चिड़चिड़ा हो सकता है और छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है। भावनाओं को नियंत्रित करना भी मुश्किल महसूस हो सकता है। यही समस्या अगर लंबे समय तक जारी रहे तो तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। नींद और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध काफी गहरा माना जाता है और लगातार नींद की समस्या रहने पर चिंता तथा अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

    याददाश्त और एकाग्रता पर भी नींद की कमी का असर पड़ता है। रात में शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिलने पर अगले दिन किसी काम पर ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। चीजें याद रखने में दिक्कत हो सकती है और काम या पढ़ाई का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। बच्चों और किशोरों के लिए पर्याप्त नींद विशेष रूप से जरूरी है क्योंकि नींद उनकी सीखने की क्षमता ध्यान याददाश्त और व्यवहार से जुड़ी होती है। इसलिए बच्चों में लगातार नींद की परेशानी को केवल आदत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    कम नींद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने को वजन बढ़ने मधुमेह और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को रात में सोने में परेशानी होती है जबकि कुछ लोग पर्याप्त समय बिस्तर पर रहने के बाद भी सुबह तरोताजा महसूस नहीं करते। कुछ नींद संबंधी विकारों में रात के समय सांस लेने में रुकावट या सांस के अनियमित होने जैसी समस्या भी हो सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को पर्याप्त समय सोने के बावजूद अच्छी गुणवत्ता वाली नींद नहीं मिल पाती।

    कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर गाड़ी चलाते समय बार-बार झपकी आने लगे टीवी देखते या किताब पढ़ते समय थोड़ी देर में ही नींद आने लगे दिन के समय बहुत ज्यादा नींद महसूस हो काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाए या चीजें याद रखने में पहले से ज्यादा परेशानी होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ना और काम करने की क्षमता में कमी आना भी लगातार खराब नींद के संकेत हो सकते हैं।

    इसलिए नींद को केवल आराम का समय समझने के बजाय स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत मानना जरूरी है। अगर रात में लगातार सोने में परेशानी हो रही है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी दिनभर अत्यधिक नींद और थकान बनी रहती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय रहते नींद से जुड़ी समस्या के कारणों की पहचान करने और जरूरी सुधार करने से रोजमर्रा की कार्यक्षमता मानसिक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • रोज योग करते हैं फिर भी नहीं दिख रहा असर तो अपनाइए सही नियम बढ़ेगी ऊर्जा मिलेगा बेहतर स्वास्थ्य

    रोज योग करते हैं फिर भी नहीं दिख रहा असर तो अपनाइए सही नियम बढ़ेगी ऊर्जा मिलेगा बेहतर स्वास्थ्य


    नई दिल्ली। योग भारत की प्राचीन जीवन पद्धति है जो केवल शरीर को स्वस्थ रखने तक सीमित नहीं है बल्कि मानसिक शांति आत्मिक संतुलन और सकारात्मक जीवनशैली का भी आधार मानी जाती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं लेकिन कई लोग सही नियमों की जानकारी के बिना योग करते हैं जिसकी वजह से उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। योग का वास्तविक फायदा तभी मिलता है जब इसे सही समय सही स्थान और सही विधि से किया जाए।

    योग करने का सबसे उपयुक्त समय सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के आसपास माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध रहता है और शरीर तथा मन दोनों अधिक सक्रिय होते हैं। यदि सुबह समय न मिल पाए तो शाम को भी योग किया जा सकता है लेकिन भोजन के कम से कम तीन से चार घंटे बाद ही अभ्यास करना चाहिए। भरे पेट योग करने से शरीर पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है और कई बार पाचन संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

    योग हमेशा शांत स्वच्छ और हवादार स्थान पर करना चाहिए। खुली हवा में किया गया योग शरीर को अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है जिससे फेफड़े बेहतर तरीके से काम करते हैं। योग करते समय ढीले और आरामदायक सूती कपड़े पहनना सबसे अच्छा माना जाता है ताकि शरीर की गतिविधियों में किसी तरह की रुकावट न आए।

    योग शुरू करने से पहले कुछ मिनट गहरी सांस लेकर शरीर और मन को शांत करना चाहिए। इसके बाद हल्के वार्मअप से मांसपेशियों को तैयार करें ताकि चोट लगने की संभावना कम हो जाए। किसी भी आसन को जल्दबाजी में करने की बजाय धीरे धीरे और पूरी एकाग्रता के साथ करना चाहिए। योग प्रतियोगिता नहीं बल्कि संतुलन और संयम का अभ्यास है इसलिए अपनी क्षमता से अधिक शरीर पर दबाव नहीं डालना चाहिए।

    योग के दौरान सांसों का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक आसन में सांस लेने और छोड़ने की सही प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है क्योंकि प्राणायाम और नियंत्रित श्वास शरीर में ऊर्जा का संचार करती है। यदि सांसों पर नियंत्रण सही रहेगा तो योग का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है और मानसिक तनाव भी तेजी से कम होता है।

    किसी भी गंभीर बीमारी उच्च रक्तचाप हृदय रोग गर्भावस्था या हाल ही में हुई सर्जरी की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही योग करना चाहिए। कुछ कठिन आसनों का अभ्यास प्रशिक्षित योग शिक्षक की देखरेख में करना अधिक सुरक्षित माना जाता है। गलत तरीके से किया गया योग लाभ की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है।

    योग करने के बाद तुरंत भारी भोजन नहीं करना चाहिए। पहले कुछ मिनट शवासन में आराम करें ताकि शरीर सामान्य अवस्था में लौट सके। इसके बाद हल्का गुनगुना पानी या पौष्टिक आहार लिया जा सकता है। योग के साथ संतुलित भोजन पर्याप्त नींद और सकारात्मक सोच भी जरूरी है क्योंकि स्वस्थ जीवन केवल आसनों से नहीं बल्कि अच्छी दिनचर्या से बनता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित और अनुशासित तरीके से किया गया योग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है मानसिक तनाव कम करता है पाचन सुधारता है हृदय को स्वस्थ रखता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। यदि योग को रोजमर्रा की आदत बना लिया जाए और उसके मूल नियमों का पालन किया जाए तो यह केवल बीमारी से बचाने का माध्यम नहीं बल्कि संपूर्ण स्वस्थ और संतुलित जीवन की मजबूत नींव बन सकता है।

  • फिट दिखना नहीं है स्वस्थ दिल की गारंटी ICMR की रिपोर्ट में सामने आई भारतीयों के कोलेस्ट्रॉल की चौंकाने वाली सच्चाई

    फिट दिखना नहीं है स्वस्थ दिल की गारंटी ICMR की रिपोर्ट में सामने आई भारतीयों के कोलेस्ट्रॉल की चौंकाने वाली सच्चाई


    नई दिल्ली । भारत में हृदय रोग तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो चुके हैं और अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक नई स्टडी ने इस खतरे को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। अध्ययन के अनुसार देश के लगभग 10 में से 9 वयस्क किसी न किसी प्रकार की असामान्य कोलेस्ट्रॉल समस्या से प्रभावित हैं। यह स्थिति केवल बुजुर्गों या अधिक वजन वाले लोगों तक सीमित नहीं है बल्कि कम उम्र के युवा और सामान्य दिखने वाले स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ नियमित स्वास्थ्य जांच और बेहतर जीवनशैली अपनाने पर लगातार जोर दे रहे हैं।

    इस अध्ययन में देशभर के 23665 लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में पाया गया कि लगभग 87 प्रतिशत से अधिक लोगों में रक्त में वसा का स्तर सामान्य नहीं था। किसी में खराब कोलेस्ट्रॉल अधिक मिला तो किसी में ट्राइग्लिसराइड्स बढ़े हुए पाए गए जबकि बड़ी संख्या में लोगों में अच्छे कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से कम था। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर हृदय रोग हार्ट अटैक स्ट्रोक और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा सकती है।

    अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि 30 से 39 वर्ष की आयु वर्ग में यह समस्या सबसे अधिक देखने को मिली। इसका मतलब है कि जिस उम्र में लोग अपने करियर और परिवार की जिम्मेदारियों में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं उसी समय उनके दिल की सेहत सबसे बड़े खतरे का सामना कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली फास्ट फूड शारीरिक गतिविधि की कमी तनाव और अनियमित दिनचर्या इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में असामान्य कोलेस्ट्रॉल की समस्या अधिक पाई गई लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं रही। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गई बल्कि पूरे देश में तेजी से फैल रही है। महिलाओं में भी पुरुषों की तुलना में यह समस्या अधिक दर्ज की गई जिससे महिलाओं के हृदय स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत महसूस की जा रही है।

    विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि केवल मोटापा मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों में ही नहीं बल्कि ऐसे लोगों में भी असामान्य कोलेस्ट्रॉल पाया गया जो देखने में पूरी तरह स्वस्थ थे और जिन्हें पहले से कोई बड़ी बीमारी नहीं थी। इससे यह धारणा भी टूटती है कि केवल अधिक वजन वाले लोगों को ही हृदय रोग का खतरा होता है।

    डॉक्टरों के अनुसार समय समय पर लिपिड प्रोफाइल जांच कराना बेहद जरूरी है। इस साधारण रक्त जांच से कुल कोलेस्ट्रॉल अच्छे कोलेस्ट्रॉल खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर आसानी से पता चल जाता है। यदि शुरुआत में ही गड़बड़ी का पता चल जाए तो खानपान में सुधार नियमित व्यायाम वजन नियंत्रित रखने धूम्रपान और शराब से दूरी बनाने तथा आवश्यकता पड़ने पर दवा के जरिए इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना कम से कम तीस मिनट व्यायाम करना हरी सब्जियां फल साबुत अनाज और फाइबर युक्त भोजन लेना तले भुने और अधिक वसा वाले खाद्य पदार्थों से बचना पर्याप्त नींद लेना और तनाव को नियंत्रित रखना बेहद आवश्यक माना जाता है। साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना भी उतना ही जरूरी है ताकि किसी भी समस्या का समय रहते पता चल सके।

    स्वस्थ जीवन केवल बाहरी फिटनेस से नहीं बल्कि शरीर के भीतर संतुलित स्वास्थ्य से बनता है। इसलिए यदि आप खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं तब भी समय समय पर कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना और संतुलित जीवनशैली अपनाना आपके दिल को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।

  • फिट दिखना नहीं है स्वस्थ दिल की गारंटी ICMR की रिपोर्ट में सामने आई भारतीयों के कोलेस्ट्रॉल की चौंकाने वाली सच्चाई

    फिट दिखना नहीं है स्वस्थ दिल की गारंटी ICMR की रिपोर्ट में सामने आई भारतीयों के कोलेस्ट्रॉल की चौंकाने वाली सच्चाई


    नई दिल्ली । भारत में हृदय रोग तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो चुके हैं और अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक नई स्टडी ने इस खतरे को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। अध्ययन के अनुसार देश के लगभग 10 में से 9 वयस्क किसी न किसी प्रकार की असामान्य कोलेस्ट्रॉल समस्या से प्रभावित हैं। यह स्थिति केवल बुजुर्गों या अधिक वजन वाले लोगों तक सीमित नहीं है बल्कि कम उम्र के युवा और सामान्य दिखने वाले स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ नियमित स्वास्थ्य जांच और बेहतर जीवनशैली अपनाने पर लगातार जोर दे रहे हैं।

    इस अध्ययन में देशभर के 23665 लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में पाया गया कि लगभग 87 प्रतिशत से अधिक लोगों में रक्त में वसा का स्तर सामान्य नहीं था। किसी में खराब कोलेस्ट्रॉल अधिक मिला तो किसी में ट्राइग्लिसराइड्स बढ़े हुए पाए गए जबकि बड़ी संख्या में लोगों में अच्छे कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से कम था। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर हृदय रोग हार्ट अटैक स्ट्रोक और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा सकती है।

    अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि 30 से 39 वर्ष की आयु वर्ग में यह समस्या सबसे अधिक देखने को मिली। इसका मतलब है कि जिस उम्र में लोग अपने करियर और परिवार की जिम्मेदारियों में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं उसी समय उनके दिल की सेहत सबसे बड़े खतरे का सामना कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली फास्ट फूड शारीरिक गतिविधि की कमी तनाव और अनियमित दिनचर्या इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में असामान्य कोलेस्ट्रॉल की समस्या अधिक पाई गई लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं रही। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गई बल्कि पूरे देश में तेजी से फैल रही है। महिलाओं में भी पुरुषों की तुलना में यह समस्या अधिक दर्ज की गई जिससे महिलाओं के हृदय स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत महसूस की जा रही है।

    विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि केवल मोटापा मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों में ही नहीं बल्कि ऐसे लोगों में भी असामान्य कोलेस्ट्रॉल पाया गया जो देखने में पूरी तरह स्वस्थ थे और जिन्हें पहले से कोई बड़ी बीमारी नहीं थी। इससे यह धारणा भी टूटती है कि केवल अधिक वजन वाले लोगों को ही हृदय रोग का खतरा होता है।

    डॉक्टरों के अनुसार समय समय पर लिपिड प्रोफाइल जांच कराना बेहद जरूरी है। इस साधारण रक्त जांच से कुल कोलेस्ट्रॉल अच्छे कोलेस्ट्रॉल खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर आसानी से पता चल जाता है। यदि शुरुआत में ही गड़बड़ी का पता चल जाए तो खानपान में सुधार नियमित व्यायाम वजन नियंत्रित रखने धूम्रपान और शराब से दूरी बनाने तथा आवश्यकता पड़ने पर दवा के जरिए इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना कम से कम तीस मिनट व्यायाम करना हरी सब्जियां फल साबुत अनाज और फाइबर युक्त भोजन लेना तले भुने और अधिक वसा वाले खाद्य पदार्थों से बचना पर्याप्त नींद लेना और तनाव को नियंत्रित रखना बेहद आवश्यक माना जाता है। साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना भी उतना ही जरूरी है ताकि किसी भी समस्या का समय रहते पता चल सके।

    स्वस्थ जीवन केवल बाहरी फिटनेस से नहीं बल्कि शरीर के भीतर संतुलित स्वास्थ्य से बनता है। इसलिए यदि आप खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं तब भी समय समय पर कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना और संतुलित जीवनशैली अपनाना आपके दिल को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।

  • बारिश के मौसम में स्वास्थ्य को रखना है सुरक्षित तो अपनाएं ये आसान उपाय छोटी सी सावधानी बचाएगी बड़ी बीमारियों से

    बारिश के मौसम में स्वास्थ्य को रखना है सुरक्षित तो अपनाएं ये आसान उपाय छोटी सी सावधानी बचाएगी बड़ी बीमारियों से


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है वहीं कई तरह की मौसमी बीमारियों का खतरा भी साथ लेकर आता है। बारिश के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया वायरस और मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। ऐसे में यदि खानपान स्वच्छता और दिनचर्या पर ध्यान न दिया जाए तो वायरल बुखार डेंगू मलेरिया टाइफाइड फूड पॉइजनिंग और पेट से जुड़ी कई समस्याएं आसानी से घेर सकती हैं। इसलिए इस मौसम में स्वास्थ्य की देखभाल को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो जाता है।

    बारिश के दिनों में सबसे पहले स्वच्छ भोजन और साफ पानी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हमेशा उबला या फिल्टर किया हुआ पानी पीना बेहतर माना जाता है। खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थ और कटे हुए फल खाने से बचना चाहिए क्योंकि इनमें संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। घर का ताजा और गर्म भोजन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है।

    मानसून के दौरान रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखना बेहद आवश्यक है। इसके लिए संतुलित आहार का सेवन करें जिसमें हरी सब्जियां मौसमी फल दालें सूखे मेवे और पर्याप्त प्रोटीन शामिल हो। विटामिन सी से भरपूर फल शरीर को संक्रमण से लड़ने में सहायता करते हैं। साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है ताकि शरीर हाइड्रेटेड बना रहे।

    बारिश में भीगने के बाद लंबे समय तक गीले कपड़ों में नहीं रहना चाहिए। घर पहुंचते ही सूखे कपड़े पहनें और शरीर को अच्छी तरह पोंछ लें। गीले जूते और मोजे पहनकर रहने से फंगल संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पैरों की साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें और उन्हें पूरी तरह सुखाकर ही जूते पहनें।

    मच्छरों से बचाव मानसून में सबसे जरूरी सावधानियों में से एक है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें क्योंकि यही मच्छरों के पनपने का सबसे बड़ा कारण बनता है। रात में मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले सुरक्षित उत्पादों का इस्तेमाल करें। यदि तेज बुखार शरीर दर्द या लगातार कमजोरी महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    बारिश के मौसम में नियमित व्यायाम और पर्याप्त नींद भी स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि बाहर निकलना संभव न हो तो घर के अंदर हल्का व्यायाम योग या प्राणायाम किया जा सकता है। इससे शरीर सक्रिय रहता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। मानसिक तनाव कम करने के लिए भी नियमित दिनचर्या बनाए रखना लाभदायक होता है।

    बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है। उन्हें बारिश में भीगने से बचाएं और किसी भी तरह के संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर इलाज में देरी न करें। व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे हाथ धोना साफ कपड़े पहनना और आसपास सफाई बनाए रखना संक्रमण से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
    बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है। उन्हें बारिश में भीगने से बचाएं और किसी भी तरह के संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर इलाज में देरी न करें। व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे हाथ धोना साफ कपड़े पहनना और आसपास सफाई बनाए रखना संक्रमण से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।

    मानसून का मौसम आनंद और ताजगी लेकर आता है लेकिन थोड़ी सी लापरवाही स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। यदि संतुलित आहार स्वच्छता नियमित व्यायाम और समय पर चिकित्सा सलाह को जीवनशैली का हिस्सा बना लिया जाए तो बारिश के पूरे मौसम का आनंद बिना किसी बीमारी के लिया जा सकता है। सावधानी ही इस मौसम में स्वस्थ रहने की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • बरसात में जरा सी लापरवाही पड़ सकती है भारी, इन आसान उपायों से रखें सेहत का पूरा ख्याल और रहें बीमारियों से दूर

    बरसात में जरा सी लापरवाही पड़ सकती है भारी, इन आसान उपायों से रखें सेहत का पूरा ख्याल और रहें बीमारियों से दूर


    नई दिल्ली । बरसात का मौसम गर्मी से राहत लेकर आता है लेकिन यही मौसम कई तरह की बीमारियों का कारण भी बन सकता है। वातावरण में बढ़ी नमी बैक्टीरिया वायरस और फंगस को तेजी से पनपने का मौका देती है जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में यदि खानपान और साफ सफाई का ध्यान न रखा जाए तो वायरल बुखार डेंगू मलेरिया टाइफाइड फूड पॉइजनिंग और पेट संबंधी समस्याएं आसानी से घेर सकती हैं। इसलिए मानसून का आनंद लेने के साथ अपनी सेहत की सुरक्षा करना भी बेहद जरूरी है।

    बारिश के मौसम में सबसे पहले स्वच्छ भोजन और शुद्ध पानी का सेवन करना चाहिए। बाहर खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थों से जितना हो सके बचें क्योंकि इनमें संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है। हमेशा ताजा और गर्म भोजन ही खाएं। लंबे समय तक रखा हुआ खाना दोबारा खाने से बचें क्योंकि नमी के कारण उसमें बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो सकते हैं। पीने के लिए हमेशा उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी ही इस्तेमाल करें ताकि पानी से फैलने वाली बीमारियों से बचा जा सके।

    इस मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखना भी बेहद आवश्यक है। रोजाना मौसमी फल हरी सब्जियां दालें दूध दही और प्रोटीन युक्त भोजन को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। विटामिन सी से भरपूर फल जैसे संतरा आंवला नींबू और अमरूद इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें ताकि शरीर हाइड्रेट रहे और विषैले तत्व बाहर निकल सकें।

    बरसात के दौरान मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें। कूलर गमले टायर और पानी रखने वाले बर्तनों की नियमित सफाई करें। सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले उपाय अपनाएं। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना भी सुरक्षित रहता है।

    बरसात में भीगने के बाद लंबे समय तक गीले कपड़ों में नहीं रहना चाहिए। भीगने पर तुरंत सूखे कपड़े पहनें और शरीर को अच्छी तरह पोंछ लें। गीले जूते और मोजे पहनने से फंगल संक्रमण हो सकता है इसलिए पैरों की सफाई और सूखापन बनाए रखना जरूरी है। यदि त्वचा पर खुजली या लाल चकत्ते दिखाई दें तो डॉक्टर की सलाह लें।

    हाथों की स्वच्छता भी संक्रमण से बचाव का सबसे आसान तरीका है। खाना खाने से पहले और बाहर से आने के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथ धोने की आदत डालें। बच्चों को भी यही आदत सिखाएं क्योंकि वे संक्रमण की चपेट में जल्दी आ सकते हैं।

    यदि लगातार बुखार तेज सिरदर्द शरीर में दर्द उल्टी दस्त या कमजोरी जैसी समस्या महसूस हो तो घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें। समय पर जांच और इलाज गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद करता है।

    बरसात का मौसम प्रकृति की खूबसूरती और ठंडक का एहसास कराता है लेकिन थोड़ी सी सावधानी आपकी सेहत को सुरक्षित रख सकती है। संतुलित आहार स्वच्छता पर्याप्त आराम और नियमित व्यायाम अपनाकर आप पूरे मानसून स्वस्थ और ऊर्जावान रह सकते हैं।

  • Rainy Season Health Care: बारिश में रोज पिएं अदरक की चाय शरीर रहेगा गर्म पाचन होगा बेहतर और बीमारियां रहेंगी दूर

    Rainy Season Health Care: बारिश में रोज पिएं अदरक की चाय शरीर रहेगा गर्म पाचन होगा बेहतर और बीमारियां रहेंगी दूर


    नई दिल्ली । बरसात का मौसम अपने साथ ठंडी हवाएं हरियाली और सुहाना माहौल लेकर आता है लेकिन यही मौसम सर्दी खांसी वायरल संक्रमण गले की खराश और पाचन संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ा देता है। ऐसे समय में अगर खानपान का सही ध्यान रखा जाए तो कई मौसमी बीमारियों से बचा जा सकता है। भारतीय घरों में बरसों से अदरक की चाय को बारिश के मौसम का सबसे भरोसेमंद घरेलू पेय माना जाता है। इसकी गर्म तासीर और औषधीय गुण शरीर को भीतर से मजबूत बनाने में मदद करते हैं और यही कारण है कि मानसून में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है।

    अदरक में प्राकृतिक रूप से ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। नियमित और संतुलित मात्रा में अदरक वाली चाय पीने से मौसमी संक्रमण का खतरा कम हो सकता है। बारिश के दिनों में वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं ऐसे में अदरक का सेवन शरीर को संक्रमण से लड़ने में सहायक माना जाता है।

    बरसात के दौरान सर्दी जुकाम और गले में खराश की समस्या सबसे आम होती है। अदरक की गर्माहट गले को आराम देती है और बलगम को बाहर निकालने में मदद करती है। अगर चाय में तुलसी या काली मिर्च भी मिला दी जाए तो इसका असर और अधिक प्रभावी हो सकता है। यही वजह है कि कई लोग हल्की सर्दी महसूस होते ही सबसे पहले अदरक की चाय का सहारा लेते हैं।

    बारिश के मौसम में पाचन तंत्र भी अक्सर कमजोर पड़ जाता है। बाहर का भोजन या दूषित पानी पेट खराब होने की वजह बन सकता है। अदरक पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है और गैस अपच तथा पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत दिला सकता है। भोजन के बाद एक कप हल्की अदरक वाली चाय शरीर को आराम देने के साथ पाचन प्रक्रिया को भी बेहतर बना सकती है।

    अदरक की चाय शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाने और ठंड महसूस होने की स्थिति में शरीर को गर्म रखने में भी सहायक मानी जाती है। बारिश में भीगने के बाद एक कप गर्म अदरक की चाय शरीर को तुरंत सुकून देती है और थकान कम करने में मदद करती है। इसके अलावा इसमें मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में भी भूमिका निभाते हैं।

    हालांकि अदरक की चाय का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अत्यधिक सेवन से कुछ लोगों को एसिडिटी या पेट में जलन की शिकायत हो सकती है। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर ब्लड थिनर दवाओं या किसी गंभीर बीमारी की समस्या है उन्हें नियमित रूप से अधिक मात्रा में अदरक लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं को भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही इसका सेवन करना चाहिए।

    बरसात के मौसम में केवल अदरक की चाय पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। संतुलित भोजन स्वच्छ पानी पर्याप्त नींद और साफ सफाई का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। यदि अदरक की चाय को स्वस्थ जीवनशैली के साथ शामिल किया जाए तो यह मानसून के दौरान शरीर को ऊर्जा देने रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने और मौसमी बीमारियों से बचाव में उपयोगी साबित हो सकती है।:

  • चलते समय घुटनों से आती है कट-कट की आवाज? जानिए कहीं जोड़ों की चिकनाई तो नहीं हो रही कम

    चलते समय घुटनों से आती है कट-कट की आवाज? जानिए कहीं जोड़ों की चिकनाई तो नहीं हो रही कम


    नई दिल्ली । घुटनों में दर्द चलने में तकलीफ सुबह उठते समय अकड़न या चलते समय कट कट की आवाज आना आजकल केवल बढ़ती उम्र की समस्या नहीं रह गई है। बदलती जीवनशैली बढ़ता वजन लंबे समय तक बैठे रहने की आदत और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कम उम्र के लोग भी जोड़ों की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। यदि आपको भी लंबे समय से घुटनों में दर्द या जकड़न महसूस हो रही है तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज न करें क्योंकि यह जोड़ों की चिकनाई कम होने का संकेत हो सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार हमारे शरीर के प्रत्येक जोड़ के बीच एक विशेष प्रकार का द्रव मौजूद होता है जिसे सिनोवियल फ्लूइड कहा जाता है। यह द्रव जोड़ों को आसानी से हिलने डुलने में मदद करता है और हड्डियों को आपस में रगड़ खाने से बचाता है। जब किसी कारण से इस द्रव की मात्रा कम होने लगती है या जोड़ों की कार्टिलेज घिसने लगती है तब घुटनों में दर्द अकड़न और सूजन जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। यही स्थिति आम भाषा में घुटनों की ग्रीस कम होना कहलाती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि बढ़ती उम्र मोटापा ऑस्टियोआर्थराइटिस पुरानी चोट शारीरिक निष्क्रियता और लंबे समय तक भारी वजन उठाने की आदत इस समस्या के प्रमुख कारण हो सकते हैं। इसके अलावा महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद हार्मोनल बदलाव के कारण भी जोड़ों की समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। डायबिटीज विटामिन डी की कमी और गठिया जैसी बीमारियां भी घुटनों की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं।

    यदि सुबह उठते समय घुटनों में जकड़न महसूस हो बैठने के बाद उठने में दर्द हो सीढ़ियां चढ़ने उतरने में कठिनाई आए या चलते समय घुटनों से आवाज आने लगे तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने से समस्या बढ़ सकती है और चलने फिरने में भी परेशानी होने लगती है।

    जोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार बेहद जरूरी है। ओमेगा थ्री फैटी एसिड से भरपूर अखरोट अलसी के बीज और फैटी फिश का सेवन लाभदायक माना जाता है। हरी पत्तेदार सब्जियां दूध दही और पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन लेने से हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत रहती हैं। विटामिन डी और कैल्शियम भी जोड़ों और हड्डियों की मजबूती के लिए आवश्यक पोषक तत्व हैं। ऑलिव ऑयल का सीमित उपयोग शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है।

    इसके साथ ही कुछ आदतों में बदलाव भी जरूरी है। तला भुना भोजन जंक फूड और अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं इसलिए इनका सेवन कम करना चाहिए। यदि वजन अधिक है तो उसे नियंत्रित करना जरूरी है क्योंकि अतिरिक्त वजन का सीधा दबाव घुटनों पर पड़ता है। रोजाना तेज चाल से चलना तैराकी साइकिल चलाना और योग जैसी लो इम्पैक्ट एक्सरसाइज जोड़ों को सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में मदद करती हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि घुटनों की ग्रीस कम होने की समस्या का समय रहते पता चल जाए तो दवाओं फिजियोथेरेपी सही खानपान और नियमित व्यायाम की मदद से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए यदि लंबे समय से घुटनों में दर्द या अकड़न बनी हुई है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेकर सही जांच और उपचार जरूर कराएं।

  • मानसून हेल्थ गाइड बरसात में संक्रमण और वायरल बीमारियों से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी सावधानियां

    मानसून हेल्थ गाइड बरसात में संक्रमण और वायरल बीमारियों से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन अपने साथ कई तरह की बीमारियों का खतरा भी लेकर आता है। इस दौरान हवा में नमी बढ़ने गंदा पानी जमा होने और मच्छरों के तेजी से पनपने के कारण डेंगू मलेरिया चिकनगुनिया टाइफाइड वायरल बुखार और पेट से जुड़ी बीमारियों के मामले बढ़ने लगते हैं। ऐसे में थोड़ी सी सावधानी आपकी और पूरे परिवार की सेहत को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार मानसून में सबसे पहले साफ और सुरक्षित पानी पीने पर ध्यान देना चाहिए। हमेशा उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी ही पिएं क्योंकि दूषित पानी से टाइफाइड हेपेटाइटिस ए और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। बाहर खुले में मिलने वाले पेय पदार्थों और बर्फ का सेवन करने से भी बचना चाहिए।

    बारिश के मौसम में ताजा और गर्म भोजन खाना सबसे सुरक्षित माना जाता है। लंबे समय तक रखा हुआ भोजन या खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थ संक्रमण का कारण बन सकते हैं। फल और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही इस्तेमाल करें तथा भोजन बनाने और खाने से पहले हाथों को साबुन से अच्छी तरह साफ करें।

    मच्छरों से बचाव भी मानसून में बेहद जरूरी है। घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें क्योंकि यही डेंगू और मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों का सबसे बड़ा प्रजनन स्थल होता है। रात में मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाली क्रीम या रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना भी फायदेमंद रहता है।

    बारिश में भीगने के बाद देर तक गीले कपड़े पहनकर नहीं रहना चाहिए। घर पहुंचते ही सूखे कपड़े पहनें और शरीर को अच्छी तरह पोंछ लें। लंबे समय तक नमी रहने से सर्दी जुकाम फंगल संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पैरों को भी साफ और सूखा रखना जरूरी है क्योंकि गीले जूते और मोजे संक्रमण का कारण बन सकते हैं।

    रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखने के लिए संतुलित आहार लेना जरूरी है। मौसमी फल हरी सब्जियां दालें और विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और नियमित व्यायाम या योग को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। पर्याप्त नींद भी शरीर को संक्रमण से लड़ने की ताकत देती है।

    यदि तेज बुखार लगातार सिरदर्द शरीर में दर्द उल्टी दस्त या त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज न करें। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेने से बचें और समय रहते चिकित्सकीय जांच कराएं। डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों में शुरुआती इलाज गंभीर स्थिति से बचा सकता है।

    बरसात का मौसम आनंद और राहत लेकर आता है लेकिन थोड़ी सी लापरवाही स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। स्वच्छता संतुलित खानपान और समय पर सावधानी अपनाकर आप मानसून का भरपूर आनंद ले सकते हैं और खुद को कई मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रख सकते हैं।