Tag: High Court

  • MP: ग्वालियर में अवैध खनन को लेकर HC सख्त…. वेतन और बेटे की स्कूल फीस समेत अफसरों से पूछे तीखे सवाल

    MP: ग्वालियर में अवैध खनन को लेकर HC सख्त…. वेतन और बेटे की स्कूल फीस समेत अफसरों से पूछे तीखे सवाल


    ग्वालियर।
    ग्वालियर (Gwalior) के बिलौआ में अवैध खनन (Illegal mining) को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की ग्वालियर बेंच में सुनवाई हुई. इस दौरान अदालत ने अफसरों पर तीखे प्रहार किए. करीब ढाई घंटे तक कलेक्टर रुचिका चौहान (Collector Ruchika Chauhan) कोर्ट में रहीं, वहीं प्रभारी माइनिंग अधिकारी पंकजध्वज मिश्रा की सैलरी और उनके बेटे के स्कूल की फीस को लेकर कोर्ट ने सीधा हिसाब मांगा गया।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में बिलौआ खदानों का ड्रोन वीडियो चलाया गया. जस्टिस ने वीडियो पॉज करवाकर कलेक्टर रुचिका चौहान से सीधे सवाल पूछे कि ”यह कौन सी जगह है? किसकी जमीन है? सर्वे नंबर क्या है? कितना क्षेत्र स्वीकृत है और कितनी खुदाई हो चुकी है?”


    जवाब न मिलने पर तल्खी

    जब तत्काल स्पष्ट जानकारी नहीं मिली तो कोर्ट ने 30 सितंबर तक का समय देते हुए कहा कि जितना समय चाहें ले लीजिए, लेकिन अगली सुनवाई पर एक-एक सवाल का स्पष्ट और सटीक जवाब देना होगा।


    10 साल का माल 1 साल में निकालने पर सवाल

    कोर्ट ने खनन की गति पर टिप्पणी करते हुए कहा, ”अगर 10 साल की लीज का माल 1 साल में ही निकाल लिया, तो बाकी 9 साल क्या करोगे?”


    51 हजार सैलरी, 9 लाख स्कूल फीस

    इसके बाद कोर्ट का रुख प्रभारी खनिज अधिकारी पंकजध्वज मिश्रा की तरफ मुड़ा. कोर्ट ने माइनिंग अधिकारी से पूछा कि उनके बेटे की सिंधिया स्कूल में फीस कितनी है? जवाब मिला- ‘करीब 9 लाख रुपये साल.’ जब कोर्ट ने पूछा कि आपकी महीने की तनख्वाह कितनी है? तो उन्होंने बताया- ‘करीब 51 हजार रुपये महीना.’

    कोर्ट ने 51 हजार मासिक वेतन और 9 लाख सालाना फीस के अंतर पर सवाल उठाए, जिस पर माइनिंग अफसर ने सफाई दी कि बेटे की पढ़ाई का खर्च उनकी पत्नी के मामा उठाते हैं. इसको लेकर अदालत ने टिप्पणी की।

    वहीं, माइनिंग अफसर की ओर से लोकायुक्त के आदेश को ‘क्लीन चिट’ बताकर पेश करने की कोशिश की गई, लेकिन जज ने खुद आदेश पढ़ा और साफ किया कि FIR दर्ज होने के कारण लोकायुक्त ने केस बंद किया था, जिसे ‘दोषमुक्ति’ या ‘क्लीन चिट’ नहीं कहा जा सकता।

    दरअसल, इससे पहले हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने ग्वालियर के खनिज अधिकारी घनश्याम यादव को जिले में काम करने से रोक दिया था और उनके आचरण पर गंभीर टिप्पणी की थी. राज्य सरकार को निर्देश दिए कि ग्वालियर में तत्काल ईमानदार और सक्षम खनिज अधिकारी की पोस्टिंग की जाए, तब तक पूरे खनिज विभाग की जिम्मेदारी कलेक्टर संभालेंगे।

    इसके बाद सरकार ने भिंड में पदस्थ खनिज अधिकारी पंकजध्वज मिश्रा को ग्वालियर भेजा तो उनकी नियुक्ति और पहले की पोस्टिंग को लेकर सवाल किए गए थे।


    AAG विवेक खेड़कर की खिंचाई

    सुनवाई के दौरान जब अपर महाधिवक्ता (AAG) विवेक खेड़कर ने माइनिंग अफसर का पक्ष रखने का प्रयास किया, तो अदालत ने उन पर भी कड़ा एतराज जताया. कोर्ट ने सख्त लहजे में टिप्पणी की कि अगर आप शासन का पक्ष छोड़कर अधिकारी का व्यक्तिगत बचाव करना चाहते हैं, तो फिर शासन का पक्ष छोड़ दीजिए। इस दौरान AAG कोर्ट में कई बार माफी मांगते और ‘सॉरी’ बोलते नजर आए. हाईकोर्ट ने मामले में विस्तृत अध्ययन और पूरी जानकारी के साथ 30 सितंबर को अगली रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

  • राज्यसभा चुनाव: मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त करने के मामले में हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

    राज्यसभा चुनाव: मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त करने के मामले में हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

    जबलपुर। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेत्री मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त किए जाने के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।

    मंगलवार को न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की एकलपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद निर्वाचित राज्यसभा सदस्य तरुण चुघ, रजनीश कुमार अग्रवाल और महेश केवट सहित प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचन अधिकारी, मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव तथा भारत के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय गुप्ता तथा अधिवक्ता आर्यन गुप्ता ने पक्ष रखा। याचिका में कहा गया है कि मीनाक्षी नटराजन ने राज्यसभा निर्वाचन के लिए नियमानुसार नामांकन पत्र प्रस्तुत किया था, लेकिन जांच के दौरान प्राप्त एक आपत्ति के आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया।

    याचिका के अनुसार नामांकन निरस्त करने का निर्णय चुनावी नियमों तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत जल्दबाजी में लिया गया और याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि नामांकन निरस्त करने का आधार तेलंगाना की एक अदालत में लंबित एक व्यक्तिगत परिवाद को बनाया गया।

    उक्त परिवाद में एक महिला की शिकायत पर मीनाक्षी नटराजन को प्रतिवादी बनाया गया था, जबकि अदालत ने केवल उनका पक्ष जानने के उद्देश्य से नोटिस जारी किया था। याचिका में कहा गया है कि उनके विरुद्ध न तो कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज था और न ही किसी न्यायालय में ऐसा कोई आपराधिक मामला लंबित था, जिसमें उनके खिलाफ आरोप तय किए गए हों।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि संबंधित परिवाद में उन्हें केवल औपचारिक रूप से अनावेदक बनाया गया था और उनके विरुद्ध किसी प्रकार के आपराधिक आरोप का उल्लेख नहीं था। इसके बावजूद निर्वाचन अधिकारी ने यह मानते हुए कि उन्होंने न्यायालय में लंबित प्रकरण की जानकारी नामांकन पत्र में छिपाई है, उनका नामांकन निरस्त कर दिया।

    याचिकाकर्ता का कहना है कि निर्वाचन अधिकारी का आदेश विधिक प्रावधानों की गलत व्याख्या पर आधारित है, जिससे उनके संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। याचिका में हाई कोर्ट से निर्वाचन अधिकारी के आदेश को निरस्त करने तथा नामांकन खारिज किए जाने की कार्रवाई को अवैध घोषित करने का अनुरोध किया गया है।

  • अवैध बैनर-होर्डिंग पर हाई कोर्ट सख्त: शिकायत मिलते ही 24 घंटे में कार्रवाई, जिम्मेदारों पर एफआईआर के निर्देश

    अवैध बैनर-होर्डिंग पर हाई कोर्ट सख्त: शिकायत मिलते ही 24 घंटे में कार्रवाई, जिम्मेदारों पर एफआईआर के निर्देश


    मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश में अब अवैध राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक बैनर-होर्डिंग लगाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इस मामले में अहम आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर अवैध बैनर और होर्डिंग हटाए जाएं। इतना ही नहीं, नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।

    न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने यह आदेश वैध होर्डिंग पर बिना अनुमति राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक बैनर लगाए जाने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने कहा कि जबलपुर हाई कोर्ट द्वारा वर्ष 2022 में दिए गए निर्देशों और 1 नवंबर 2019 के शासन परिपत्र का अक्षरशः पालन किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि सार्वजनिक स्थानों पर नियमों के विपरीत लगाए गए विज्ञापन और बैनर किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं।

    इस फैसले का प्रभाव भोपाल सहित पूरे मध्य प्रदेश में देखने को मिलेगा। भोपाल नगर निगम के अधिकारियों ने भी संकेत दिए हैं कि अदालत के आदेश के अनुरूप विशेष अभियान चलाकर अवैध राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक होर्डिंग हटाए जाएंगे। नगर निगम के अनुसार पहले चरण में सर्वे कराया जाएगा और नियमों का उल्लंघन करने वाले सभी स्ट्रक्चर चिन्हित किए जाएंगे। अयोध्या बायपास क्षेत्र में पहले ही पांच अवैध यूनिपोल हटाए जा चुके हैं। साथ ही संबंधित संस्था की बैंक गारंटी जब्त करने और बकाया शुल्क वसूलने जैसी कार्रवाई भी की गई है।

    आउटडोर मीडिया नियम-2017 के अनुसार बिना अनुमति लगाए गए फ्लेक्स, पोस्टर, कटआउट, सुरक्षा प्रमाणपत्र के बिना स्थापित विज्ञापन संरचनाएं, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के प्रतिबंधित दायरे में लगे होर्डिंग, ट्रैफिक संकेतों को ढंकने वाले विज्ञापन, फुटपाथ और सर्विस रोड पर लगाए गए यूनिपोल तथा निर्धारित मानकों से बड़े या असुरक्षित स्ट्रक्चर पूरी तरह अवैध माने जाते हैं।

    भोपाल में वीआईपी रोड, एमपी नगर, लिंक रोड, होशंगाबाद रोड, रायसेन रोड, अयोध्या बायपास, बैरसिया रोड, लालघाटी और गांधी नगर सहित कई प्रमुख क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे होर्डिंग लगे होने की बात सामने आई है जो नियमों के अनुरूप नहीं हैं। अनुमान है कि शहर में लगभग 20 प्रतिशत होर्डिंग किसी न किसी रूप में नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।

    दरअसल, यह मामला इंदौर की एक विज्ञापन कंपनी द्वारा दायर याचिका के बाद अदालत पहुंचा था। कंपनी का कहना था कि उसने नगर निगम से विधिवत अनुमति लेकर विज्ञापन संरचनाएं स्थापित की हैं, लेकिन उन पर बिना अनुमति राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक बैनर लगा दिए जाते हैं। इससे न केवल संरचनाओं को नुकसान पहुंचता है बल्कि कंपनी को आर्थिक हानि भी होती है।

    अदालत के इस आदेश के बाद उम्मीद की जा रही है कि शहरों में अवैध बैनर और होर्डिंग पर प्रभावी अंकुश लगेगा। इससे यातायात व्यवस्था बेहतर होगी, सार्वजनिक स्थानों की सुंदरता बढ़ेगी, वैध विज्ञापन एजेंसियों के हित सुरक्षित रहेंगे और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा

  • कोर्ट की कार्यवाही नहीं बनेगी वायरल कंटेंट, सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर लगाई रोक

    कोर्ट की कार्यवाही नहीं बनेगी वायरल कंटेंट, सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर लगाई रोक


    नई दिल्ली । देश में अदालतों की कार्यवाही के वीडियो और ऑडियो क्लिप्स को सोशल मीडिया पर वायरल करने के बढ़ते चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “अदालत कोई मनोरंजन चैनल नहीं है” और न्यायिक कार्यवाही के छोटे-छोटे हिस्सों को संदर्भ से अलग करके सोशल मीडिया पर प्रसारित करना न्यायपालिका की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करता है। इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर कोर्ट की कार्यवाही के ऑडियो-वीडियो क्लिप्स के प्रसारण पर सख्त नियम लागू कर दिए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार अब किसी भी अदालत की कार्यवाही का वीडियो या ऑडियो अंश सोशल मीडिया पर पोस्ट, रीपोस्ट, अपलोड, संपादित, स्टोर, प्रसारित या व्यावसायिक उपयोग करने से पहले संबंधित न्यायालय की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह निर्देश केवल सुप्रीम कोर्ट ही नहीं बल्कि देश के सभी हाई कोर्ट की कार्यवाहियों पर भी लागू रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के लिए सेक्रेटरी जनरल और हाई कोर्ट की कार्यवाही के लिए संबंधित रजिस्ट्रार जनरल की अनुमति आवश्यक होगी।

    मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड के वीडियो क्लिप्स को संदर्भ से अलग प्रस्तुत किया जाता है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की गलत तस्वीर सामने आती है। कई बार ऐसे वीडियो भ्रामक कैप्शन, संपादित अंशों या मीम्स के रूप में वायरल किए जाते हैं, जिससे आम लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा होती है और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर अनावश्यक सवाल खड़े हो सकते हैं।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में पारदर्शिता का उद्देश्य जनता को न्यायिक प्रक्रिया से अवगत कराना है, न कि उसे मनोरंजन या वायरल कंटेंट का माध्यम बनाना। लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा का दुरुपयोग कर अदालत की कार्यवाही को सनसनीखेज तरीके से पेश करना न्यायिक संस्थाओं की गरिमा के अनुरूप नहीं है।

    हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग से लिए गए वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे। कई मामलों में इन क्लिप्स को संदर्भ से हटाकर साझा किया गया, जिससे न्यायालयों ने गंभीर चिंता व्यक्त की। इसी पृष्ठभूमि में शीर्ष अदालत ने यह अंतरिम आदेश जारी किया है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहे।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा और सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। नए निर्देशों के बाद अदालत की कार्यवाही से जुड़े किसी भी ऑडियो या वीडियो अंश को साझा करने से पहले संबंधित न्यायालय की अनुमति लेना अनिवार्य होगा।

  • MP : हाईकोर्ट ने 350 करोड़ के स्कूल यूनिफॉर्म टेंडर पर लगाई रोक…. सरकार से मांगा जवाब

    MP : हाईकोर्ट ने 350 करोड़ के स्कूल यूनिफॉर्म टेंडर पर लगाई रोक…. सरकार से मांगा जवाब


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने राज्य के सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों (Government Primary and Middle Schools) में पढ़ने वाले 52 लाख से ज्यादा छात्र-छात्राओं को यूनिफॉर्म (Uniform) सप्लाई करने के लिए जारी 350 करोड़ रुपए के टेंडर पर रोक लगा दी है। यह रोक एक लोकल अपैरल एसोसिएशन द्वारा निविदा प्रक्रिया (बिडिंग प्रोसेस) में योग्यता की शर्तों को चुनौती देने के बाद लगाई गई है।

    कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजनल बेंच ने बुधवार को मामले की सुनवाई की और राज्य सरकार को एक हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, ‘तब तक संबंधित टेंडर को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा।’

    यह याचिका जबलपुर अपैरल इनोवेशन एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (JAIMA) ने टेंडर डॉक्यूमेंट में ‘प्रतिबंधात्मक शर्तों’ को चुनौती देते हुए दायर की थी। JAIMA की ओर से पेश वकील विमल कांत जैन ने कोर्ट को बताया कि मध्य प्रदेश टेक्स्टबुक कॉर्पोरेशन द्वारा टेंडर के लिए तय किए गए योग्यता मानदंड असल में लोकल इंडस्ट्रीज को बाहर कर देते हैं।

    उन्होंने कहा यूनिफॉर्म सप्लाई करने के लिए निविदा प्रपत्र में जो शर्तें दी गई थीं, उसके अनुसार, ‘स्पिनिंग मिलों के लिए 700 करोड़ और गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स के लिए 233 करोड़ रुपए का अनिवार्य सालाना टर्नओवर, प्रति वर्ष 50 लाख यूनिफ़ॉर्म की प्रोडक्शन क्षमता, और पिछले तीन वर्षों में 105 करोड़ रुपए के समान काम का पिछला अनुभव जैसी शर्तें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs), पावरलूम यूनिट्स, बुनकरों, महिलाओं के स्वयं-सहायता समूहों और छोटे पैमाने की इंडस्ट्रीज को इस प्रक्रिया से बाहर कर देती हैं।’

    JAIMA के सेक्रेटरी अजीत मोदी ने कहा कि ये शर्तें ‘मध्य प्रदेश स्टोर परचेज एंड सर्विस प्रोक्योरमेंट रूल्स, 2023’ के खिलाफ हैं, जिन्हें MSMEs के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने और लोकल इंडस्ट्रीज को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। उन्होंने आरोप लगाया, ‘इसके बजाय, ये मानदंड राज्य के बाहर की कुछ बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए गए लगते हैं।’

    इससे पहले 6 जुलाई को प्रकाशित एक रिपोर्ट में, MSME मंत्री चेतन कश्यप ने कहा था कि सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट सिस्टम का मकसद उद्योगपतियों और MSME व्यापारियों को सपोर्ट करना था और वे MSME व्यापारियों द्वारा उठाई गई चिंताओं पर गौर करेंगे।

    रिपोर्ट में स्वयं-सहायता समूहों के कई सदस्यों और MSME गारमेंट यूनिट मालिकों का भी जिक्र किया गया था, जिन्होंने दावा किया था कि स्वयं-सहायता समूहों से स्कूल यूनिफॉर्म बनाने का काम छीनने के सरकारी फैसले से राज्य भर में हजारों लोगों की आजीविका पर असर पड़ेगा।

    उधर कुछ दिन पहले स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कहा था कि नया सेंट्रलाइज्ड सिस्टम यूनिफॉर्म की एक जैसी क्वालिटी और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा, ‘महिलाओं को समय पर सप्लाई करने में दिक्कतें आ रही थीं और इस्तेमाल हो रहे कपड़े की क्वालिटी को लेकर भी समस्याएँ थीं।’

    मध्य प्रदेश में SHG (स्व-सहायता समूहों) की 1.4 लाख से ज्यादा महिलाओं को IIM इंदौर ने यूनिफॉर्म की सिलाई और सप्लाई के मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी थी। यह प्रोग्राम 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुरू किया था।

  • राजस्थान: ओपन जेल में रचेगी शादी, उम्रकैद की सजा काट रहे दो बंदियों को हाई कोर्ट से मिली अनुमति

    राजस्थान: ओपन जेल में रचेगी शादी, उम्रकैद की सजा काट रहे दो बंदियों को हाई कोर्ट से मिली अनुमति


    जोधपुर। राजस्थान की जोधपुर स्थित मंडोर ओपन जेल जल्द एक अनोखे विवाह की साक्षी बनेगी। हत्या के अलग-अलग मामलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दो बंदी आपसी सहमति से विवाह बंधन में बंधेंगे। राजस्थान हाई कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद जेल प्रशासन ने विवाह की तैयारियां शुरू कर दी हैं।

    जानकारी के अनुसार, नागौर निवासी मूलाराम पड़ोसी की हत्या के मामले में दोषी है और 16 जनवरी 2017 से उम्रकैद की सजा काट रहा है। वर्तमान में वह मंडोर ओपन जेल में बंद है। वहीं सीमा अपने पति की हत्या के मामले में दोषी ठहराई जा चुकी है और फिलहाल 40 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर है।

    पुनर्वास के आधार पर मांगी गई थी अनुमति
    मूलाराम की ओर से राजस्थान हाई कोर्ट में अस्थायी सजा निलंबन की याचिका दायर की गई थी। न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत को बताया गया कि मूलाराम और सीमा दोनों अपनी इच्छा से विवाह करना चाहते हैं।

    मूलाराम के अधिवक्ता कालूराम भाटी ने दलील दी कि विवाह से दोनों के पुनर्वास और सामाजिक सुधार की प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी तथा भविष्य में वे सामान्य पारिवारिक जीवन जी सकेंगे। उन्होंने बंदियों के वैवाहिक और संतानोत्पत्ति संबंधी अधिकारों से जुड़े हाई कोर्ट के एक पूर्व फैसले का भी हवाला दिया।

    सरकार ने भी नहीं जताई आपत्ति
    राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि दोनों विवाह करना चाहते हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि दोनों पहले लिव-इन रिलेशनशिप में रह चुके हैं। सुनवाई के दौरान लोक अभियोजकों ने कहा कि ओपन जेल के नियमों के तहत यदि दोनों विवाह करना चाहते हैं तो सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं है।

    कोर्ट ने दिए विवाह संबंधी निर्देश
    खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि विवाह समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था है और केवल दोषसिद्धि के आधार पर किसी बंदी को उसकी सहमति से विवाह करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने निर्देश दिया कि विवाह समारोह मंडोर ओपन जेल परिसर में ही आयोजित किया जाएगा। समारोह में दोनों पक्षों के अधिकतम 21-21 लोगों को शामिल होने की अनुमति होगी। विवाह संपन्न कराने के लिए एक पंडित भी मौजूद रहेगा। आवश्यकता पड़ने पर मेहमानों की संख्या बढ़ाने का निर्णय जेल प्रशासन ले सकेगा।

    हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह की तिथि की सूचना पहले से जेल प्रशासन को देना अनिवार्य होगा, जबकि पूरे समारोह का खर्च मूलाराम वहन करेगा। अधिवक्ता कालूराम भाटी के अनुसार, यह विवाह 22 जुलाई को आयोजित किया जा सकता है।

  • MP सरकार को बड़ा झटका…. HC ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगाई रोक

    MP सरकार को बड़ा झटका…. HC ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगाई रोक


    ग्वालियर।
    मध्य प्रदेश सरकार (Government of Madhya Pradesh) को राज्य परिवहन प्राधिकरण यानी एसटीए (State Transport Authority – STA) के पुनर्गठन मामले में बड़ा झटका लगा है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की ग्वालियर खंडपीठ (Gwalior Bench) ने 9 फरवरी 2026 को जारी पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है। सबसे अहम बात यह रही कि सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने खुद स्वीकार किया कि पूरी प्रक्रिया में कुछ कानूनी खामियां रह गई हैं। इन त्रुटियों को दूर करने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट से तीन महीने का समय मांगा है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब तलब किया है।

    यह मामला हरिशंकर सिंह पटेल एवं अन्य द्वारा दायर याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के समक्ष पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी और अधिवक्ता हिमांशु शर्मा ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य शासन ने मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत राज्य परिवहन प्राधिकरण की संरचना में परिवहन विभाग के सचिव को शामिल कर दिया है। याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक का दायित्व भी संभाल रहे हैं, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ऐसी व्यवस्था निष्पक्ष प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े कर सकती है।

    सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से भी यह स्वीकार किया गया कि पुनर्गठन की प्रक्रिया में कुछ कानूनी कमियां रह गई हैं। शासन ने अदालत से इन कमियों को दूर करने के लिए तीन माह का समय देने का अनुरोध किया। इसके बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी।

    इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया है कि याचिकाकर्ताओं, बस ऑपरेटरों और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया के जरिए राज्य परिवहन प्राधिकरण के कामकाज को ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरित करने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन यही आशंका इस मामले के केंद्र में मानी जा रही है। यदि भविष्य में ऐसा होता है तो प्रदेशभर के बस ऑपरेटरों और परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों को नई प्रशासनिक व्यवस्था का सामना करना पड़ सकता है।

    बता दें कि राज्य परिवहन प्राधिकरण प्रदेश में बस परमिट जारी करने, रूट आवंटन करने और परिवहन नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली प्रमुख संस्था है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस आदेश को परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल पुनर्गठन की प्रक्रिया पर रोक लग गई है और अब सभी की निगाहें अदालत की अगली सुनवाई और सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब पर टिकी हुई हैं।

  • मेटा का हाईकोर्ट में बयान: इंस्टाग्राम डेटा केवल सरकार के साथ साझा, यूजर्स की निजता पर जोर

    मेटा का हाईकोर्ट में बयान: इंस्टाग्राम डेटा केवल सरकार के साथ साझा, यूजर्स की निजता पर जोर


    नई दिल्ली। Meta Platforms ने अदालत को बताया कि इंस्टाग्राम की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा जारी रहेगी। कंपनी ने स्पष्ट किया कि पॉलिसी में बदलाव केवल इतना है कि यदि किसी आपराधिक जांच या कानूनी प्रक्रिया के तहत सरकार जानकारी मांगेगी, तभी डेटा उपलब्ध कराया जाएगा। कंपनी ने यह भी कहा कि किसी भी तीसरे पक्ष को यूजर्स का डेटा नहीं दिया जाएगा, जिससे निजता का संरक्षण सुनिश्चित रहेगा।

    इंस्टाग्राम की नई नीति पर विवाद
    Instagram की ओर से 8 मई से एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा में बदलाव की सूचना दी गई थी, जिसके बाद इसे लेकर याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह बदलाव यूजर्स की प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।

    कपिल सिब्बल ने दी नीति की कानूनी व्याख्या
    वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने अदालत में कहा कि कंपनी पूरी तरह कानून के दायरे में काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम या आपराधिक मामलों की जांच के तहत ही सरकार को डेटा उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी तरह की निजी जानकारी सार्वजनिक या तीसरे पक्ष को साझा नहीं की जाएगी।

    डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड पर उठे सवाल
    सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम के तहत बनाए गए डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया में अभी तक नियुक्तियां नहीं हुई हैं। इसी वजह से शिकायत सीधे अदालत में दायर करनी पड़ी।

    कोर्ट का रुख और आगे की प्रक्रिया
    अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए Meta Platforms से छह सप्ताह के भीतर विस्तृत लिखित जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई में कंपनी की नीति और स्पष्ट हो सकती है।

  • Harbhajan Singh की सुरक्षा पर HC सख्त: कहा- परिवार को खरोंच तक नहीं आनी चाहिए

    Harbhajan Singh की सुरक्षा पर HC सख्त: कहा- परिवार को खरोंच तक नहीं आनी चाहिए


    नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद और पूर्व क्रिकेटर Harbhajan Singh की सुरक्षा को लेकर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि हरभजन सिंह और उनके परिवार को किसी भी प्रकार की शारीरिक क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। यह आदेश उनकी सुरक्षा बहाल करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

    दरअसल, 24 अप्रैल को हरभजन सिंह ने आम आदमी पार्टी छोड़कर Bharatiya Janata Party (BJP) का दामन थामा। इसके तुरंत बाद पंजाब पुलिस ने उनकी सुरक्षा वापस ले ली थी। हालांकि, बाद में केंद्र सरकार ने जालंधर स्थित उनके घर के बाहर CRPF की तैनाती कर दी। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह पर्याप्त नहीं है और परिवार की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    याचिका में हरभजन सिंह ने आरोप लगाया कि उनकी सुरक्षा बिना किसी नोटिस और खतरे के ताजा आकलन के हटा दी गई, जिसे उन्होंने मनमाना निर्णय बताया। इसके बाद कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 12 मई को होगी। जस्टिस जगमोहन बंसल ने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि हरभजन सिंह और उनके परिवार के किसी भी सदस्य को शारीरिक नुकसान न पहुंचे।

    सुरक्षा हटने के बाद उनके घर के बाहर विरोध प्रदर्शन भी हुआ। AAP कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं के खिलाफ नारेबाजी की और दीवारों पर ‘गद्दार’ लिखा। याचिका में यह भी कहा गया कि 25 और 26 अप्रैल को उनके घर पर भीड़ ने हमला किया, लेकिन स्थानीय पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। उस समय हरभजन सिंह मुंबई में थे और उन्हें इस घटना की जानकारी फोन के जरिए मिली।

    याचिका में यह भी कहा गया कि सुरक्षा हटाने के बाद पुलिस को जरूरी इंतजाम करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार अब पंजाब सरकार को हरभजन सिंह और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।

    इस मामले ने सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक बदलाव के बीच संतुलन के सवाल को भी उजागर किया है। हरभजन सिंह की याचिका और कोर्ट के आदेश ने साफ कर दिया कि किसी भी नागरिक, खासकर सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं की सुरक्षा सर्वोपरि है।

  • भोजशाला मामले में लगातार पांचवे दिन हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, हिंदू पक्ष ने रखे ऐतिहासिक साक्ष्य

    भोजशाला मामले में लगातार पांचवे दिन हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, हिंदू पक्ष ने रखे ऐतिहासिक साक्ष्य


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शुक्रवार को लगातार पांचवें दिन हुई सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने कोर्ट के समक्ष ऐतिहासिक, शिल्पकला एवं प्राचीन ग्रंथों के आधार पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए।

    हिन्दू पक्षकारों ने दावा किया कि भोजशाला कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि मां सरस्वती को समर्पित मंदिर एवं संस्कृत शिक्षण केंद्र था, जिसका उल्लेख विभिन्न प्राचीन ग्रंथों, ब्रिटिशकालीन गजेटियर और राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथों में मिलता है।

    वहीं, वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए मामले को 28 अप्रैल तक टालने की मांग की, जिसे उच्च न्यायालय ने सख्ती से खारिज कर दिया और रोजाना (नियमित) सुनवाई जारी रखने का निर्देश दिया।

    हिंदू पक्ष की दूसरी याचिका पर सुनवाई के दौरान लखनऊ निवासी याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने उच्च न्यायालय को अवगत कराया कि राजा भोज द्वारा लिखित प्रसिद्ध ग्रंथ समरांग सूत्रधार में नगर नियोजन और मंदिर वास्तुकला का विस्तृत वर्णन है। इस ग्रंथ में मंदिरों की संरचना, आयाम, खंभों की बनावट, मूर्तियों की शैली और शिल्पकला के सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है।

    अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने तर्क दिया कि भोजशाला परिसर की संरचना, उसके आयाम, स्तंभों की बनावट एवं मूर्तिकला की शैली समरांग सूत्रधार में वर्णित सिद्धांतों से मेल खाती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उक्त स्थल मूल रूप से मंदिर था। उन्होंने 1304 ईस्वी में लिखित चिंतामणि, 19वीं सदी के धार गजेटियर तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि प्राचीन काल में धार ज्ञान-विज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा है और भोजशाला विद्या परंपरा का मुख्य स्थल थी।


    ब्रह्माजी की एक दुर्लभ मूर्ति समरांग सूत्रधार में वर्णित

    सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई में प्राप्त ब्रह्माजी की एक दुर्लभ मूर्ति समरांग सूत्रधार में वर्णित युवा ब्रह्मा के स्वरूप से साम्यता रखती है। साथ ही हिंगलाजगढ़, मंदसौर और रायसेन से प्राप्त मूर्तियों की शिल्प परंपरा भी उसी कालखंड से जुड़ी बताई गई। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि परमार कालीन राजवंश द्वारा अपनाई गई निर्माण शैली तथा उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर की वास्तुकला में भी समानताएं देखी जा सकती हैं।


    अगली सुनवाई 15 अप्रैल को

    हिंदू पक्ष ने कोर्ट में प्रस्तुत तर्कों के आधार पर दावा किया कि भोजशाला स्थल प्राचीन सरस्वती मंदिर था, जहां विद्या, कला और शास्त्रों का अध्ययन किया जाता था। मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को नीयत की गई है। इसमें हिंदू पक्ष समरांग सूत्रधार के आयामों और भोजशाला की संरचना के बीच समानताओं को और विस्तार से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा।