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  • राजपाल यादव को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत, 1.5 करोड़ रुपए डिमांड ड्राफ्ट जमा करने के बाद मिली राहत

    राजपाल यादव को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत, 1.5 करोड़ रुपए डिमांड ड्राफ्ट जमा करने के बाद मिली राहत


    नई दिल्ली । हाईकोर्ट में सोमवार को अभिनेता राजपाल यादव की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान जमानत राशि के भुगतान के तरीके को लेकर महत्वपूर्ण बहस हुई। उनके वकील ने अदालत को बताया कि वे 1.5 करोड़ रुपए की राशि एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद) के जरिए जमा करने को तैयार हैं, लेकिन जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट कर दिया कि यह राशि केवल डिमांड ड्राफ्ट डीडी के माध्यम से ही स्वीकार की जाएगी।

    अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि पहले ही 25 लाख रुपए का एक डीडी जमा हो चुका है और 75 लाख रुपए का दूसरा डीडी भी कोर्ट में प्रस्तुत किया गया था। न्यायालय ने निर्देश दिया कि शेष 1.5 करोड़ रुपए की राशि भी निर्धारित समय, यानी दोपहर 3 बजे तक डीडी के रूप में जमा कराई जाए। जस्टिस शर्मा ने दोहराया कि न्यायालय के आदेशों का पालन तय प्रारूप में ही किया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी।

    निर्धारित समयसीमा के भीतर शेष राशि जमा होने के बाद अदालत ने राजपाल यादव को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। इस तरह अदालत की सख्ती के बावजूद शर्तों का पालन करने पर उन्हें राहत मिल गई। मामले में आगे की सुनवाई नियत तिथि पर होगी, लेकिन फिलहाल भुगतान की शर्त पूरी होने से अभिनेता जमानत पर बाहर आ गए हैं।

  • दिल्ली मेट्रो अपडेट: T20 वर्ल्ड कप मैच के लिए DMRC ने बढ़ाई आखिरी ट्रेन की टाइमिंग, यात्रियों को राहत

    दिल्ली मेट्रो अपडेट: T20 वर्ल्ड कप मैच के लिए DMRC ने बढ़ाई आखिरी ट्रेन की टाइमिंग, यात्रियों को राहत


    नई दिल्ली। 12 फरवरी, 2026 को अरुण जेटली स्टेडियम में होने वाले ICC T20 वर्ल्ड कप मैच के मद्देनजर दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने मेट्रो समय सारिणी में खास बदलाव किया है। मैच के कारण स्टेडियम और आसपास भारी भीड़ के मद्देनजर DMRC ने प्रमुख मेट्रो लाइनों पर आखिरी ट्रेन का समय लगभग 90 मिनट तक बढ़ा दिया है, ताकि दर्शक और सामान्य यात्री आसानी से घर लौट सकें।

    रेड लाइन (लाइन 1) पर शहीद स्थल से रिठाला रूट की आखिरी ट्रेन अब रात 12:10 से 12:15 बजे तक चलेगी। येलो लाइन (लाइन 2) पर समयपुर बादली से गुरुग्राम के मिलेनियम सिटी सेंटर तक ट्रेन 12:20 बजे तक उपलब्ध रहेगी। ब्लू लाइन (लाइन 3 और 4) की नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी से द्वारका सेक्टर 21 तक की आखिरी ट्रेनें 11:35 और 11:45 बजे तक चलेंगी। ग्रीन लाइन (लाइन 5) की कुछ ट्रेनें 1:00 बजे तक उपलब्ध रहेंगी। वायलेट, पिंक, मैजेंटा, ग्रे लाइन और एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन पर भी ट्रेन समय में बदलाव किया गया है।

    DMRC ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव केवल 12 फरवरी के लिए है। 13 फरवरी से मेट्रो टाइमिंग पहले की तरह सामान्य हो जाएगी। इस निर्णय से न केवल मैच देखने वाले दर्शकों को सुविधा मिली है, बल्कि देर रात सफर करने वाले यात्रियों को भी राहत मिली है।

    DMRC के इस कदम से यह सुनिश्चित होगा कि मैच खत्म होने के बाद भी लोग सुरक्षित और समय पर घर पहुंच सकें। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे अपनी यात्रा की योजना नई टाइमिंग के अनुसार बनाएं और भीड़भाड़ वाले समय में अतिरिक्त समय रखें।

  • नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती


    जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने न्याय व्यवस्था, बेल सिस्टम और भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की। ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में उमर खालिद के मामले से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि वे अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बोल रहे हैं।

    पूर्व CJI ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलना अधिकार का विषय है, क्योंकि भारतीय कानून ‘इनोसेंस की पूर्वधारणा’ यानी निर्दोषता की धारणा पर आधारित है।उन्होंने कहा,प्री-ट्रायल बेल कभी सजा नहीं हो सकती।

    अगर कोई व्यक्ति 5–7 साल अंडरट्रायल रहकर अंत में बरी हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?

    बेल कब रोकी जा सकती है, सरल उदाहरण से समझाया
    चंद्रचूड़ ने बेल डिनाय करने की स्थितियों को आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि बेल न देने के तीन क्लासिक एक्सेप्शन होते हैं
    आरोपी छूटने के बाद अपराध दोहरा सकता हो (जैसे सीरियल रेप या मर्डर केस)
    आरोपी भाग जाने की आशंका हो। आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता होउन्होंने स्पष्ट कहा,अगर ये तीनों परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो बेल नियम है, अपवाद नहीं।

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर चिंता
    पूर्व CJI ने कहा कि आज की बड़ी समस्या यह है कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कानून ‘निर्दोषता’ की जगह ‘दोष’ की धारणा को बैठा देते हैं।

    उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अदालतों को यह जांचना चाहिए कि, क्या वाकई नेशनल सिक्योरिटी का मामला बनता हैक्या डिटेंशन प्रोपोर्शनल है। वरना लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं।

    स्पीडी ट्रायल नहीं तो आर्टिकल 21 का उल्लंघन
    चंद्रचूड़ ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रायल समय पर पूरे नहीं होते।अगर ट्रायल रीजनेबल टाइम में खत्म नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। भले ही कोई कानून बेल से मना करे, लेकिन संविधान सर्वोच्च है।

    उमर खालिद का जिक्र
    उन्होंने कहा कि उमर खालिद को करीब 5 साल जेल में हो चुके हैं।मैं अपनी कोर्ट की आलोचना करने में झिझक रहा हूं, क्योंकि कुछ समय पहले तक मैं इसी संस्थान का नेतृत्व कर रहा था।

    लेकिन सिद्धांत साफ हैंअगर ट्रायल आगे नहीं बढ़ सकता, तो बेल ही नियम है, शर्तें लगाई जा सकती हैं।

    जिला अदालतों में बेल न देने की प्रवृत्ति चिंताजनकपूर्व CJI ने कहा कि हाईकोर्ट और जिला अदालतों में बेल न देने की आदत बन गई है, जो चिंता का विषय है।उन्होंने बताया कि जिला अदालतें न्याय प्रणाली का पहला इंटरफेस हैं, लेकिन वहां जज बेल देने से डरते हैं।जजों को लगता है कि बेल दी तो उनकी नीयत पर सवाल उठेंगेखासतौर पर फाइनेंशियल फ्रॉड जैसे मामलों में। नतीजा यह है कि केस सीधे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में हर साल करीब 70 हजार मामले आ रहे हैं।

    जजों पर नैतिक दबाव से डर का माहौल
    चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि कोई जिला जज गलत बेल देता है, तो उसे कानूनी तरीके से रिवर्स किया जाना चाहिए, लेकिन मोरल प्रेशर नहीं बनाना चाहिए।

    हाईकोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी भी किसी जज का करियर तबाह कर सकती है। प्रमोशन रुक जाता है। इससे ऐसा इकोसिस्टम बनता है, जहां जज डर के माहौल में काम करते हैं।

    करप्शन पर स्पष्ट संदेश
    पूर्व CJI ने अंत में कहा, मैं भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहा, लेकिन सच यह है कि जज भी उसी समाज से आते हैं, जहां करप्शन है।हालांकि जज से समाज से कहीं ऊंचे नैतिक मानदंडों की अपेक्षा की जाती है। करप्शन रोकने के लिए जवाबदेही तय करने वाला प्रभावी सिस्टम जरूरी है।गलत फैसले को तुरंत करप्ट कह देना आसान है, लेकिन सच को समझना ज्यादा जरूरी है।”

  • MP: बच्चे चीनी मांझे से पतंग उड़ाते पकड़े गए तो माता-पिता होंगे जिम्मेदार, HC के सख्त निर्देश

    MP: बच्चे चीनी मांझे से पतंग उड़ाते पकड़े गए तो माता-पिता होंगे जिम्मेदार, HC के सख्त निर्देश

    भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने चीनी मांझे (Chinese kite string) पर लगे प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ किया है कि यदि कोई बच्चा इस घातक डोर से पतंग उड़ाते पकड़ा गया तो उसके माता-पिता (Parents) को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। साथ ही चीनी मांझे की बिक्री या उपयोग करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) (लापरवाहीपूर्ण कृत्य के कारण होने वाली मृत्यु) के तहत कार्रवाई होगी।


    बेचने वालों पर भी चलेगा लापरवाही से मौत का केस

    मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने आदेश दिया है कि लोगों को जागरूक किया जाए कि चीनी मांझे को बेचने या इस्तेमाल करने पर आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) के तहत मामला दर्ज हो सकता है। यह धारा लापरवाही के कारण होने वाली मृत्यु से संबंधित है। अदालत ने पिछले साल 11 दिसंबर को चीनी मांझे से होने वाली मौतों और हादसों पर चिंता जताते हुए खुद जनहित याचिका के तौर पर संज्ञान लिया।


    सरकार ने कहा- चलाएंगे अभियान

    मध्य प्रदेश सरकार ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की अदालत को बताया कि चीनी मांझे की बिक्री पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। चीनी मांझे से होने वाले हादसों को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं। चीनी मांझे के इस्तेमाल और बिक्री को हतोत्साहित करने के लिए अखबारों और टीवी चैनलों के माध्यम से एक बड़ा जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।


    अभिभावक को भी ठहराया जा सकता है जिम्मेदार

    अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जागरूकता अभियान में यह साफ बताया जाए कि चीनी मांझे की बिक्री या इस्तेमाल करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) के तहत केस चलेगा। यदि कोई नाबालिग बच्चा इस खतरनाक मांझे से पतंग उड़ाता पाया गया तो इसके लिए उसके माता-पिता या अभिभावक को भी कानूनन जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।


    आसपास के जिलों में भी किया जाएगा लागू

    इंदौर के कलेक्टर शिवम वर्मा ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि प्रशासन जल्द निर्देशों का पालन करते हुए जरूरी आदेश जारी करेगा। अदालत को यह भी भरोसा दिया गया कि निर्देशों को इंदौर आसपास के जिलों में भी लागू किया जाएगा। बता दें कि पिछले डेढ़ महीने में इंदौर में चीनी मांझे से गला कटने के कारण दो लोगों की जान जा चुकी है। प्रशासन ने चीनी मांझे पर पूरी तरह रोक लगा रखी है फिर भी कई लोग चोरी से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

  • पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर

    पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर


    जबलपुर। मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के तहत कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में यह दावा किया गया है कि इन नियमों का पालन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है। यह मामला अब हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए रखा गया है और कोर्ट ने 13 जनवरी को मामले की सुनवाई निर्धारित की है।

    याचिकाकर्ता सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे हैं, जो मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के दो महत्वपूर्ण प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार इन नियमों में उल्लेखित कुछ बातें आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के लिए भेदभावपूर्ण हैं और इससे संविधान की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है। विशेष रूप से पदोन्नति के संबंध में नियम 11 में कहा गया है कि पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची बनाई जाएगी, उसके बाद अनारक्षित वर्ग की सूची बनेगी। इसके कारण, अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी यदि मेरिट में बेहतर हैं, तो भी वे आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों से पीछे रह सकते हैं और उन्हें पदोन्नति का मौका नहीं मिल सकता।

    इस नियम को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है, जिनमें यह साफ किया गया था कि पदोन्नति के लिए आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को प्राथमिकता देना एक सीमा तक ही उचित है, और यदि अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी मेरिट में बेहतर हैं तो उन्हें पदोन्नति का अवसर दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार के तहत असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए।
    इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करेंगे।

    हाई कोर्ट ने इस मामले को पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न कर दिया है जिससे यह मामला एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाएगा।सुरेश कुमरे ने कहा कि यदि यह नियम लागू होता है तो यह न केवल उन कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण होगा बल्कि यह सरकारी प्रशासन में भी असंतुलन पैदा कर सकता है। इसलिए वे इस नियम को चुनौती देने के लिए कोर्ट पहुंचे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी कर्मचारियों को समान अवसर मिले और कोई भी वर्ग अपने मेरिट के आधार पर पदोन्नति से वंचित न रहे। हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 13 जनवरी को तय की गई है और अब सबकी निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं।

  • नाबालिग को जेल में रखने के मामले में HC ने सरकार को लगाई फटकार, 5 लाख मुआवज़ा देने का आदेश

    नाबालिग को जेल में रखने के मामले में HC ने सरकार को लगाई फटकार, 5 लाख मुआवज़ा देने का आदेश

    पटना। पटना हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते एक नाबालिग को ₹5 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसे बिहार पुलिस ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया था। कोर्ट ने इस काम को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन बताया।

    जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रितेश कुमार की डिवीजन बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी कानून की तय प्रक्रिया की पूरी तरह से अनदेखी करके सिर्फ़ डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DIG) के कहने पर की गई, जबकि नाबालिग को पहले ही चार्जशीट में बरी कर दिया गया।
    हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मुआवज़े की रकम और ₹15,000 का मुक़दमे का खर्च राज्य सरकार देगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यह खर्च उन दोषी पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाना चाहिए, जो प्रशासनिक जांच के बाद ज़िम्मेदार पाए जाएंगे।

    संक्षेप में मामला
    याचिकाकर्ता (एक नाबालिग) ने गैर-कानूनी हिरासत से रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ता का नाम शुरू में ज़मीन विवाद और मारपीट के मामले में FIR में है।
    हालांकि, शुरुआती जांच के दौरान, IO को याचिकाकर्ता सहित दस आरोपियों के खिलाफ़ अपर्याप्त सबूत मिले। नतीजतन, 1 सितंबर, 2025 को चार्जशीट दायर की गई, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम आरोपी के तौर पर था, लेकिन उस पर आरोप नहीं लगाए गए। इसलिए उसे ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया।

    हालांकि, इसके बाद शिकायतकर्ता ने DIG, कोसी रेंज, सहरसा से संपर्क किया और याचिकाकर्ता-नाबालिग सहित दस आरोपियों को बरी किए जाने की शिकायत की।

    DIG ने एक सुपरविज़न नोट में IO को जांच आगे बढ़ाने का यह मानते हुए निर्देश दिया कि आरोप सच हैं और निर्देश दिया कि बाकी आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए।
    DIG के सुपरविज़न नोट को केस डायरी में शामिल किया गया और फिर IO सीधे आरोपी के घर पर छापा मारने गया। उसने मौजूदा याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया, उसकी उम्र 19 साल बताई और उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।

    दरअसल, मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के समय भी इस बात पर ध्यान नहीं दिलाया गया कि याचिकाकर्ता का नाम केस में चार्जशीट न किए गए लोगों की लिस्ट में था। यहां तक ​​कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने भी मामले के इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया।

    सीधे-सीधे, बिना सोचे-समझे, याचिकाकर्ता को जेल भेज दिया।
    हाईकोर्ट की टिप्पणियां
    बेंच ने पुलिस के काम करने के तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई। उसने कहा कि एक बार जब चार्जशीट दायर हो गई, जिसमें याचिकाकर्ता को ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया दिखाया गया, तो IO मजिस्ट्रेट के सामने आगे की जांच के लिए आवेदन किए बिना उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा:
    “इस मामले में याचिकाकर्ता की आज़ादी छीन ली गई और पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई से उसके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ। DIG, कोशी रेंज का आरोपों को सच मानकर मामले की जांच करने का निर्देश निर्दोषता की धारणा के सिद्धांतों के खिलाफ है, जो आपराधिक कानून न्यायशास्त्र का मुख्य सिद्धांत है। I.O. ने बिना किसी ठोस सबूत के 16 साल से कम उम्र के छात्र याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया।

    वह इस मामले में ऐसा नहीं कर सकता था।”
    हाईकोर्ट ने इस मामले में क्षेत्राधिकार मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी असंतोष व्यक्त किया। उसने कहा कि जब याचिकाकर्ता को पेश किया गया तो मजिस्ट्रेट यह देखने में विफल रहा कि पिछली रिपोर्ट में उसे ‘चार्जशीटेड नहीं’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
    इसके अलावा, उसने कहा कि याचिकाकर्ता के नाबालिग होने के बावजूद (बाद में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने पुष्टि की कि घटना के समय उसकी उम्र 15 साल, 06 महीने और 08 दिन थी), मजिस्ट्रेट ने उसे ऑब्जर्वेशन होम के बजाय जेल भेज दिया क्योंकि उसने बिना सोचे-समझे काम किया।

    कोर्ट ने दुख जताते हुए कहा,
    “जांच एजेंसी द्वारा पावर के गलत इस्तेमाल और याचिकाकर्ता के अधिकार और आज़ादी की रक्षा करने में कोर्ट की नाकामी के कारण उसे अब तक ढाई महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा है”।
    इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा ऑब्जर्वेशन होम/चिल्ड्रन होम से तुरंत रिहा किया जाए। इस संबंध में, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, मधेपुरा द्वारा तुरंत एक उचित रिहाई आदेश जारी किया जाएगा।

    कोर्ट ने राज्य को आदेश दिया कि वह उस युवा लड़के को एक महीने के अंदर शारीरिक और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजे के तौर पर ₹5 लाख का भुगतान करे। इसके अलावा, उसे मुकदमेबाजी के खर्च के तौर पर ₹15,000 दिए गए।
    कोर्ट ने सक्षम अथॉरिटी/पुलिस महानिदेशक, बिहार को भी निर्देश दिया कि वे इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर जांच करें, जांच के दौरान सामने आने वाले सबूतों के आधार पर उचित कार्रवाई करें, और दोषी अधिकारियों से लागत और मुआवजे की रकम वसूल करें।

    कोर्ट ने आदेश दिया,
    “याचिकाकर्ता को दिए जाने वाला जुर्माना और मुआवजे की रकम जांच पूरी होने के बाद इस आदेश की कॉपी मिलने/सूचित होने की तारीख से छह महीने के अंदर दोषी अधिकारियों से वसूल की जाएगी”। याचिकाकर्ता की ओर से वकील शाश्वत कुमार, अमन आलम और अमरनाथ कुमार पेश हुए।

  • इंदौर दूषित पानी से 18 मौतें. 3 मरीज वेंटिलेटर पर. प्रशासन ने की कार्रवाई

    इंदौर दूषित पानी से 18 मौतें. 3 मरीज वेंटिलेटर पर. प्रशासन ने की कार्रवाई


    इंदौर । इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण पिछले कुछ दिनों में 18 मौतें हो चुकी हैं. और अब तक 429 लोग अस्पतालों में भर्ती हो चुके हैं। बुधवार तक 330 मरीजों को छुट्टी मिल चुकी है. लेकिन 99 मरीज अभी भी इलाजरत हैं। अस्पतालों में ICU में मरीजों की संख्या बढ़ी है. जिनमें से 3 मरीज वेंटिलेटर पर हैं। इस गंभीर स्थिति ने इलाके के लोगों को खौफ में डाल दिया है. और अब वे टैंकर और आरओ के पानी पर निर्भर हैं। कलेक्टर शिवम वर्मा और नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल ने बुधवार को क्षेत्र का निरीक्षण किया. और सीवरेज तथा नर्मदा पाइपलाइन के लीकेज को ठीक करने के निर्देश दिए। इलाके में पानी की सप्लाई टेस्टिंग की जा रही है. और लोगों को पानी उबालकर और छानकर पीने की सलाह दी जा रही है।
    स्वास्थ्य विभाग ने 61 टीमों का गठन किया था. जिनमें से 5013 घरों का सर्वे किया गया। इस सर्वे के माध्यम से 24786 लोगों को उचित सलाह दी गई और घर-घर दवाइयां भी वितरित की गईं। इसके साथ ही. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ICMR के सर्वे में पाया गया कि इलाके की 17 गलियां संक्रमित पाई गई हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी की. और कहा कि इंदौर की छवि को इस घटना ने गंभीर नुकसान पहुंचाया है। कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ पानी हर नागरिक कामौलिक अधिकार है और यदि भविष्य में जरूरत पड़ी तो दोषीअधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही. मुआवजे की राशि पर भी उचित निर्देश दिए जा सकते हैं।
    वहीं. कांग्रेस ने इस मुद्दे पर प्रदर्शन की योजना बनाई है। पार्टी की अध्यक्ष रीना बौरासी सेतिया ने पूरे प्रदेश में कैंडल मार्च आयोजित करने कीघोषणा की है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी मंगलवार को प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुंचे और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की। इंदौर में दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों के सिलसिले ने पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है. और प्रशासन की ओर से इस समस्या के समाधान के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।

  • SC की अनुमति के बावजूद किसी भी हाईकोर्ट में नहीं हुई एड-हॉक जज की नियुक्ति

    SC की अनुमति के बावजूद किसी भी हाईकोर्ट में नहीं हुई एड-हॉक जज की नियुक्ति


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा करीब एक साल पहले लंबित आपराधिक मामलों के निस्तारण के लिए मार्ग प्रशस्त किए जाने के बावजूद अब तक किसी भी हाई कोर्ट (High Court) में तदर्थ (एड-हॉक) न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment Ad-Hoc Judges) नहीं हुई है। वजह, उच्च न्यायालयों ने इस दिशा में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया से परिचित लोगों के अनुसार, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी ने भी तदर्थ न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश नहीं की है।

    सर्वोच्च न्यायालय ने 18 लाख से अधिक आपराधिक मामलों के लंबित होने पर चिंता व्यक्त करते हुए 30 जनवरी, 2025 को उच्च न्यायालयों को तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की अनुमति दी थी। जिनकी संख्या न्यायालय की कुल स्वीकृत संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। केंद्रीय विधि मंत्रालय को हालांकि, अभी तक किसी भी हाई कोर्ट के कॉलेजियम से सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ आधार पर नियुक्त करने के लिए कोई सिफारिश प्राप्त नहीं हुई है।

    संविधान का अनुच्छेद 224ए उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों के प्रबंधन में सहायता के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देता है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, संबंधित उच्च न्यायालय के कॉलेजियम विधि मंत्रालय के न्याय विभाग को उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले उम्मीदवारों के नाम या सिफारिशें भेजते हैं। इसके बाद विभाग उम्मीदवारों के बारे में जानकारी और विवरण जोड़ता है और फिर उन्हें उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम को भेज देता है। इसके बाद उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम अंतिम निर्णय लेता है और सरकार को चयनित व्यक्तियों को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश करता है। राष्ट्रपति नवनियुक्त न्यायाधीश के ‘नियुक्ति पत्र’ पर हस्ताक्षर करते हैं।

    तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया स्थायी जैसी ही रहेगी, सिवाय इसके कि राष्ट्रपति नियुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त की जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि एक मामले को छोड़कर, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ उच्च न्यायालय न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने का कोई पूर्व उदाहरण नहीं है। उच्च न्यायालयों में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति पर 20 अप्रैल, 2021 को दिए गए फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कुछ शर्तें लगाई थीं। हालांकि, बाद में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई (एक अन्य पूर्व प्रधान न्यायाधीश) और सूर्यकांत (वर्तमान प्रधान न्यायाधीश) की विशेष पीठ ने कुछ शर्तों में ढील दी और कुछ को स्थगित रखा।

    पूर्व प्रधान न्यायाधीश एसए बोब्डे द्वारा लिखित इस फैसले में, लंबित मामलों को निस्तारित करने के लिए सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को दो से तीन साल की अवधि के लिए तदर्थ न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।

  • इंदौर: भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 लोगों की मौत सरकार ने हाई कोर्ट में मृतकों की संख्या कम बताई विपक्षी दलों का आरोप

    इंदौर: भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 लोगों की मौत सरकार ने हाई कोर्ट में मृतकों की संख्या कम बताई विपक्षी दलों का आरोप


    इंदौर । इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है। इस घटना ने इलाके में हड़कंप मचा दिया है और 35 से अधिक लोग गंभीर हालत में अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। सभी मरीजों में उल्टी दस्त और संक्रमण के लक्षण पाए गए हैं जिससे पानी की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि यह सभी मौतें गंदे और दूषित पानी पीने के कारण हुईं।
    मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन सक्रिय हो गए हैं लेकिन मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।इस बीच सरकार ने हाई कोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों में मृतकों की संख्या कम बताई जबकि हकीकत यह है कि अब तक 16 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि जैसे कोरोना महामारी के दौरान मौतों के आंकड़े छिपाए गए थे उसी तरह अब भी सरकार मृतकों के असली आंकड़े छिपा रही है ताकि जिम्मेदारी से बचा जा सके।

    कांग्रेस नेताओं ने कहा कि इस मामले में सरकार की नाकामी पूरी तरह से उजागर हो चुकी है और अब समय आ गया है कि सच्चाई सामने लाई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए ताकि और लोगों की जान बचाई जा सके और दूषित पानी के कारण फैलने वाले संक्रमण को रोका जा सके।

    स्थानीय निवासियों की चिंता और बढ़ गई है क्योंकि दूषित पानी पीने से संक्रमण फैलने की संभावना अधिक है। स्वास्थ्य विभाग ने इलाके में पानी की जांच शुरू कर दी है और पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं लेकिन जनता की परेशानी लगातार बनी हुई है।यह मामला प्रशासन और सरकार की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है क्योंकि दूषित पानी पीने से होने वाली मौतें आम बात नहीं हैं और यह स्थिति तत्काल ध्यान देने योग्य है।

  • ग्वालियर हाईकोर्ट ने 48 साल पुराने भूमि विवाद में किया फैसला, कब्जा अवैध, नगर निगम को कार्रवाई की अनुमति

    ग्वालियर हाईकोर्ट ने 48 साल पुराने भूमि विवाद में किया फैसला, कब्जा अवैध, नगर निगम को कार्रवाई की अनुमति



    ग्वालियर।
    ग्वालियर के तानसेन रोड पर नेचुरोपैथी अस्पताल के सामने की जमीन को लेकर 48 साल से चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लीज की अवधि समाप्त होने के बाद जमीन पर कब्जा रखना पूरी तरह गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने कहा कि लीज खत्म होते ही उसका स्वतः अंत हो जाता है और उसके बाद जमीन पर बने रहना अतिक्रमण माना जाएगा।

    हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए अपीलकर्ताओं की दूसरी अपील खारिज कर दी।

    कोर्ट ने साथ ही नगर निगम ग्वालियर को जमीन पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने की पूरी अनुमति दे दी है। अब नगर निगम इस जमीन पर उचित कार्रवाई कर सकता है और भविष्य में ऐसे मामलों को नियंत्रित कर सकेगा।

    यह विवाद तानसेन रोड पर स्थित नेचुरोपैथी अस्पताल के सामने की 3161.6 वर्गफुट जमीन को लेकर था। अपीलकर्ता, डॉ. मणिकांत शर्मा के वारिस, नगर निगम के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर रहे थे। उनका दावा था कि यह जमीन उनके पिता को लीज पर दी गई थी और बाद में इसका नवीनीकरण भी हुआ।

    सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि लीज केवल 31 मार्च 1977 तक वैध थी और उसके बाद कोई वैध नवीनीकरण नहीं हुआ।

    अपीलकर्ताओं के वकील ने भी कोर्ट में माना कि लीज बढ़ाने से जुड़े कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मान भी लिया जाए कि 1976 में लीज को 30 साल के लिए बढ़ाया गया था, तो वह 2007 में समाप्त हो चुकी थी।

    इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि बिना वैध लीज के जमीन पर कब्जा अवैध है, और अब नगर निगम को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है। इस निर्णय से ग्वालियर में भूमि विवादों को लेकर प्रशासनिक स्पष्टता बढ़ेगी और भविष्य में ऐसे मामलों में कानून के पालन को मजबूती मिलेगी।

    हाईकोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि जमीन पर कब्जा कानून और दस्तावेजों के आधार पर ही वैध माना जाएगा और किसी भी प्रकार का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 48 साल पुराने इस विवाद का यह निपटारा ग्वालियर के भूमि विवाद मामलों में नियम और अनुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।