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  • आबकारी नीति केस: केजरीवाल-सिसोदिया को मिली राहत पर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी सीबीआई

    आबकारी नीति केस: केजरीवाल-सिसोदिया को मिली राहत पर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी सीबीआई


    नई दिल्ली। केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को निचली अदालत द्वारा आरोपमुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया है। एजेंसी इस आदेश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर करेगी।

    यह कदम राउज एवेन्यू कोर्ट के उस फैसले के बाद उठाया गया है जिसमें केजरीवाल सिसोदिया सहित 21 अन्य आरोपियों को आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने चार्जशीट में नामित किसी भी आरोपी के विरुद्ध आरोप तय करने से इनकार कर दिया था।

    सीबीआई के प्रवक्ता का कहना है कि निचली अदालत ने जांच से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया। इसी आधार पर एजेंसी ने उच्च न्यायालय में अपील करने का फैसला लिया है।

    अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की थी कि सीबीआई ने वरिष्ठ नेताओं को बिना किसी ठोस सामग्री के आरोपी बनाया। न्यायालय ने आरोपपत्र में कई खामियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। साथ ही केजरीवाल को भी पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में इस प्रकरण में शामिल किया गया। अदालत ने जांच प्रक्रिया में कमियों को लेकर एजेंसी को फटकार भी लगाई।

    फैसले के बाद केजरीवाल ने न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए इसे उनकी पार्टी को कमजोर करने की राजनीतिक साजिश बताया। वहीं सिसोदिया ने कहा कि अदालत का निर्णय संविधान और कानून के शासन में उनके विश्वास को मजबूत करता है।

  • सेवाधाम आश्रम में 51 दिन में 11 बच्चों की मौत, 50 से अधिक की हालत गंभीर; हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

    सेवाधाम आश्रम में 51 दिन में 11 बच्चों की मौत, 50 से अधिक की हालत गंभीर; हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान


    उज्जैन । अंबोदिया स्थित अंकित सेवाधाम आश्रम में बीते डेढ़ माह के भीतर 11 बच्चों की मौत ने शहर में हड़कंप मचा दिया है। 20 नवंबर 2025 से 10 जनवरी 2026 के बीच हुई इन मौतों में अधिकांश बच्चे बहु-दिव्यांग थे और 10 से 18 वर्ष की आयु वर्ग में आते थे। बच्चों को गंभीर स्थिति में जिला अस्पताल उज्जैन लाया गया था लेकिन इलाज के दौरान उनकी जान बचाई नहीं जा सकी।

    इस मामले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। कोर्ट ने मुख्य सचिव महिला एवं बाल विकास प्रमुख सचिव आयुक्त कलेक्टर उज्जैन जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी और आश्रम अधीक्षक को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। अदालत ने आश्रम की निरीक्षण रिपोर्ट पेश करने के निर्देश भी दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।

    शासकीय चरक अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 2025 में 8 और जनवरी 2026 में 2 बच्चों की मौत हुई। सभी मामलों में पोस्टमॉर्टम शासकीय चरक भवन अस्पताल में थाना भैरवगढ़ पुलिस की मौजूदगी में कराया गया। अस्पताल के आरएमओ डॉ. चिन्मय चिंचोलेकर ने बताया कि अधिकांश बच्चों में एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियां पाई गईं और कुछ को मृत अवस्था में लाया गया जबकि कुछ की इलाज के दौरान मौत हुई।

    अंकित सेवाधाम आश्रम में वर्तमान में लगभग 250 निराश्रित और दिव्यांग बच्चे रह रहे हैं जिनमें से 50 से अधिक की हालत गंभीर बताई जा रही है। आश्रम संचालक सुधीर भाई गोयल ने कहा कि आश्रम में आने वाले अधिकांश बच्चे पहले से ही गंभीर बीमारियों से पीड़ित होते हैं। कई बच्चे स्वयं चलने-उठने या भोजन करने में असमर्थ हैं।

    करीब 1.5 साल पहले इंदौर के युग पुरुष धाम आश्रम में बच्चों की मौत और बीमारी के मामलों के बाद प्रशासन ने उस आश्रम की मान्यता रद्द कर दी थी। इसके बाद वहां रह रहे 86 दिव्यांग बच्चों को उज्जैन के सेवाधाम आश्रम में शिफ्ट किया गया जिनमें अधिकांश मृतक भी शामिल थे।

    सुधीर भाई गोयल ने कहा कि मृतक बच्चे पहले से गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे। उनमें सांस लेने में कठिनाई खून की कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं थीं। उन्होंने यह भी बताया कि बच्चों का इलाज पहले से ही विभिन्न अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में चल रहा था और उनकी गंभीर स्थिति के कारण उन्हें आश्रम में रखा गया।

    मामले की संवेदनशीलता और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए हाईकोर्ट ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। अदालत के नोटिस के बाद आश्रम और संबंधित स्वास्थ्य सुविधाओं की निगरानी और कड़ी करने की संभावना जताई जा रही है।

  • इंदौर भागीरथपुरा जल कांड: 35 मौतों की जांच के लिए आयोग गठित, नागरिकों से मांगे साक्ष्य

    इंदौर भागीरथपुरा जल कांड: 35 मौतों की जांच के लिए आयोग गठित, नागरिकों से मांगे साक्ष्य


    इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में कथित रूप से दूषित पानी से हुई 35 मौतों के मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए आयोग गठित करने का आदेश दिया। अदालत के निर्देश पर अब औपचारिक रूप से जांच प्रक्रिया शुरू हो गई है।

    पूर्व जस्टिस सुनील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय आयोग का गठन किया गया है। आयोग को घटना की पूरी सच्चाई उजागर करने का जिम्मा सौंपा गया है। इसमें पानी की गुणवत्ता प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदारी तय करना और शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई हुई या नहीं सभी पहलुओं की गहन जांच शामिल है। आयोग यह भी देखेगा कि किन विभागों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध रही।

    आयोग ने भागीरथपुरा क्षेत्र के नागरिकों से अपील की है कि वे अपने पास मौजूद साक्ष्य मेडिकल रिपोर्ट पानी की जांच से जुड़े दस्तावेज शिकायत पत्र या अन्य प्रमाण 28 फरवरी तक आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी दस्तावेज और प्रमाण समय पर जमा करना अनिवार्य होगा ताकि जांच निष्पक्ष और तथ्य आधारित हो।

    इस मामले ने नगर निगम और संबंधित विभागों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिक लंबे समय से पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायत करते रहे हैं। आयोग की जांच से यह स्पष्ट होगा कि दूषित पानी की आपूर्ति क्यों हुई चेतावनी संकेतों को अनदेखा किया गया या नहीं और कौन-कौन जिम्मेदार है। जांच रिपोर्ट के आने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी चाहे वह प्रशासनिक हो या आपराधिक। फिलहाल क्षेत्र के नागरिक आयोग की जांच प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं जिसे इस मामले में सच्चाई सामने लाने का अहम माध्यम माना जा रहा है।

  • यूजीसी मानकों के पालन और पारदर्शिता पर बहस, राज्य सरकार को समय मिला..

    यूजीसी मानकों के पालन और पारदर्शिता पर बहस, राज्य सरकार को समय मिला..


    जबलपुर । रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह की अंतिम मोहलत दी है यह आदेश शुक्रवार को न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान दिया अगली सुनवाई 23 मार्च को निर्धारित की गई है

    याचिका में नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए गए
    याचिका एनएसयूआई के जिला अध्यक्ष सचिन रजक द्वारा दायर की गई है याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने तर्क दिया कि कुलगुरु की नियुक्ति निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं हुई याचिका में कहा गया कि पीएचडी उपाधि के बाद न्यूनतम दस वर्ष का शैक्षणिक अनुभव अनिवार्य होता है जबकि इस मानदंड का पालन नहीं किया गया

    यूजीसी मानकों और चयन प्रक्रिया पर बहस
    सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं और चयन प्रक्रिया के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है याचिका में तर्क दिया गया कि यदि प्राध्यापक पद पर मूल नियुक्ति ही नियमों के विरुद्ध रही हो तो कुलगुरु पद पर की गई नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है

    राज्य सरकार ने मांगा अतिरिक्त समय
    राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता वेद प्रकाश तिवारी ने न्यायालय में पक्ष रखा और जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय का अनुरोध किया न्यायालय ने आदेश में कहा कि प्रतिवादियों को 7 अप्रैल 2025 को नोटिस तामील किया जा चुका है लेकिन अब तक कोई जवाब प्रस्तुत नहीं हुआ इसे देखते हुए चार सप्ताह का अंतिम अवसर दिया गया

    सार्वजनिक हित और विशेषज्ञों की राय
    मामला उच्च शिक्षा प्रशासन और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा होने के कारण इसे सार्वजनिक हित से महत्वपूर्ण माना जा रहा है विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय का अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासनिक नियुक्तियों के मानकों और जवाबदेही के दायरे को स्पष्ट कर सकता है

    आगामी सुनवाई पर सभी की नजरें
    फिलहाल सभी पक्षों की नजर अगली सुनवाई पर टिकी है जहां राज्य सरकार का जवाब और न्यायालय की टिप्पणी मामले की दिशा तय कर सकती है यह विवाद न केवल आरडीवीवी बल्कि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक नियुक्तियों के लिए भी उदाहरण बन सकता है

  • राजपाल यादव को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत, 1.5 करोड़ रुपए डिमांड ड्राफ्ट जमा करने के बाद मिली राहत

    राजपाल यादव को हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत, 1.5 करोड़ रुपए डिमांड ड्राफ्ट जमा करने के बाद मिली राहत


    नई दिल्ली । हाईकोर्ट में सोमवार को अभिनेता राजपाल यादव की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान जमानत राशि के भुगतान के तरीके को लेकर महत्वपूर्ण बहस हुई। उनके वकील ने अदालत को बताया कि वे 1.5 करोड़ रुपए की राशि एफडीआर (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद) के जरिए जमा करने को तैयार हैं, लेकिन जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट कर दिया कि यह राशि केवल डिमांड ड्राफ्ट डीडी के माध्यम से ही स्वीकार की जाएगी।

    अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि पहले ही 25 लाख रुपए का एक डीडी जमा हो चुका है और 75 लाख रुपए का दूसरा डीडी भी कोर्ट में प्रस्तुत किया गया था। न्यायालय ने निर्देश दिया कि शेष 1.5 करोड़ रुपए की राशि भी निर्धारित समय, यानी दोपहर 3 बजे तक डीडी के रूप में जमा कराई जाए। जस्टिस शर्मा ने दोहराया कि न्यायालय के आदेशों का पालन तय प्रारूप में ही किया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी।

    निर्धारित समयसीमा के भीतर शेष राशि जमा होने के बाद अदालत ने राजपाल यादव को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। इस तरह अदालत की सख्ती के बावजूद शर्तों का पालन करने पर उन्हें राहत मिल गई। मामले में आगे की सुनवाई नियत तिथि पर होगी, लेकिन फिलहाल भुगतान की शर्त पूरी होने से अभिनेता जमानत पर बाहर आ गए हैं।

  • दिल्ली मेट्रो अपडेट: T20 वर्ल्ड कप मैच के लिए DMRC ने बढ़ाई आखिरी ट्रेन की टाइमिंग, यात्रियों को राहत

    दिल्ली मेट्रो अपडेट: T20 वर्ल्ड कप मैच के लिए DMRC ने बढ़ाई आखिरी ट्रेन की टाइमिंग, यात्रियों को राहत


    नई दिल्ली। 12 फरवरी, 2026 को अरुण जेटली स्टेडियम में होने वाले ICC T20 वर्ल्ड कप मैच के मद्देनजर दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने मेट्रो समय सारिणी में खास बदलाव किया है। मैच के कारण स्टेडियम और आसपास भारी भीड़ के मद्देनजर DMRC ने प्रमुख मेट्रो लाइनों पर आखिरी ट्रेन का समय लगभग 90 मिनट तक बढ़ा दिया है, ताकि दर्शक और सामान्य यात्री आसानी से घर लौट सकें।

    रेड लाइन (लाइन 1) पर शहीद स्थल से रिठाला रूट की आखिरी ट्रेन अब रात 12:10 से 12:15 बजे तक चलेगी। येलो लाइन (लाइन 2) पर समयपुर बादली से गुरुग्राम के मिलेनियम सिटी सेंटर तक ट्रेन 12:20 बजे तक उपलब्ध रहेगी। ब्लू लाइन (लाइन 3 और 4) की नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी से द्वारका सेक्टर 21 तक की आखिरी ट्रेनें 11:35 और 11:45 बजे तक चलेंगी। ग्रीन लाइन (लाइन 5) की कुछ ट्रेनें 1:00 बजे तक उपलब्ध रहेंगी। वायलेट, पिंक, मैजेंटा, ग्रे लाइन और एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन पर भी ट्रेन समय में बदलाव किया गया है।

    DMRC ने स्पष्ट किया है कि यह बदलाव केवल 12 फरवरी के लिए है। 13 फरवरी से मेट्रो टाइमिंग पहले की तरह सामान्य हो जाएगी। इस निर्णय से न केवल मैच देखने वाले दर्शकों को सुविधा मिली है, बल्कि देर रात सफर करने वाले यात्रियों को भी राहत मिली है।

    DMRC के इस कदम से यह सुनिश्चित होगा कि मैच खत्म होने के बाद भी लोग सुरक्षित और समय पर घर पहुंच सकें। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे अपनी यात्रा की योजना नई टाइमिंग के अनुसार बनाएं और भीड़भाड़ वाले समय में अतिरिक्त समय रखें।

  • नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती


    जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने न्याय व्यवस्था, बेल सिस्टम और भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की। ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में उमर खालिद के मामले से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि वे अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बोल रहे हैं।

    पूर्व CJI ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलना अधिकार का विषय है, क्योंकि भारतीय कानून ‘इनोसेंस की पूर्वधारणा’ यानी निर्दोषता की धारणा पर आधारित है।उन्होंने कहा,प्री-ट्रायल बेल कभी सजा नहीं हो सकती।

    अगर कोई व्यक्ति 5–7 साल अंडरट्रायल रहकर अंत में बरी हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?

    बेल कब रोकी जा सकती है, सरल उदाहरण से समझाया
    चंद्रचूड़ ने बेल डिनाय करने की स्थितियों को आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि बेल न देने के तीन क्लासिक एक्सेप्शन होते हैं
    आरोपी छूटने के बाद अपराध दोहरा सकता हो (जैसे सीरियल रेप या मर्डर केस)
    आरोपी भाग जाने की आशंका हो। आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता होउन्होंने स्पष्ट कहा,अगर ये तीनों परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो बेल नियम है, अपवाद नहीं।

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर चिंता
    पूर्व CJI ने कहा कि आज की बड़ी समस्या यह है कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कानून ‘निर्दोषता’ की जगह ‘दोष’ की धारणा को बैठा देते हैं।

    उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अदालतों को यह जांचना चाहिए कि, क्या वाकई नेशनल सिक्योरिटी का मामला बनता हैक्या डिटेंशन प्रोपोर्शनल है। वरना लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं।

    स्पीडी ट्रायल नहीं तो आर्टिकल 21 का उल्लंघन
    चंद्रचूड़ ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रायल समय पर पूरे नहीं होते।अगर ट्रायल रीजनेबल टाइम में खत्म नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। भले ही कोई कानून बेल से मना करे, लेकिन संविधान सर्वोच्च है।

    उमर खालिद का जिक्र
    उन्होंने कहा कि उमर खालिद को करीब 5 साल जेल में हो चुके हैं।मैं अपनी कोर्ट की आलोचना करने में झिझक रहा हूं, क्योंकि कुछ समय पहले तक मैं इसी संस्थान का नेतृत्व कर रहा था।

    लेकिन सिद्धांत साफ हैंअगर ट्रायल आगे नहीं बढ़ सकता, तो बेल ही नियम है, शर्तें लगाई जा सकती हैं।

    जिला अदालतों में बेल न देने की प्रवृत्ति चिंताजनकपूर्व CJI ने कहा कि हाईकोर्ट और जिला अदालतों में बेल न देने की आदत बन गई है, जो चिंता का विषय है।उन्होंने बताया कि जिला अदालतें न्याय प्रणाली का पहला इंटरफेस हैं, लेकिन वहां जज बेल देने से डरते हैं।जजों को लगता है कि बेल दी तो उनकी नीयत पर सवाल उठेंगेखासतौर पर फाइनेंशियल फ्रॉड जैसे मामलों में। नतीजा यह है कि केस सीधे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में हर साल करीब 70 हजार मामले आ रहे हैं।

    जजों पर नैतिक दबाव से डर का माहौल
    चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि कोई जिला जज गलत बेल देता है, तो उसे कानूनी तरीके से रिवर्स किया जाना चाहिए, लेकिन मोरल प्रेशर नहीं बनाना चाहिए।

    हाईकोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी भी किसी जज का करियर तबाह कर सकती है। प्रमोशन रुक जाता है। इससे ऐसा इकोसिस्टम बनता है, जहां जज डर के माहौल में काम करते हैं।

    करप्शन पर स्पष्ट संदेश
    पूर्व CJI ने अंत में कहा, मैं भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहा, लेकिन सच यह है कि जज भी उसी समाज से आते हैं, जहां करप्शन है।हालांकि जज से समाज से कहीं ऊंचे नैतिक मानदंडों की अपेक्षा की जाती है। करप्शन रोकने के लिए जवाबदेही तय करने वाला प्रभावी सिस्टम जरूरी है।गलत फैसले को तुरंत करप्ट कह देना आसान है, लेकिन सच को समझना ज्यादा जरूरी है।”

  • MP: बच्चे चीनी मांझे से पतंग उड़ाते पकड़े गए तो माता-पिता होंगे जिम्मेदार, HC के सख्त निर्देश

    MP: बच्चे चीनी मांझे से पतंग उड़ाते पकड़े गए तो माता-पिता होंगे जिम्मेदार, HC के सख्त निर्देश

    भोपाल। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने चीनी मांझे (Chinese kite string) पर लगे प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ किया है कि यदि कोई बच्चा इस घातक डोर से पतंग उड़ाते पकड़ा गया तो उसके माता-पिता (Parents) को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। साथ ही चीनी मांझे की बिक्री या उपयोग करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) (लापरवाहीपूर्ण कृत्य के कारण होने वाली मृत्यु) के तहत कार्रवाई होगी।


    बेचने वालों पर भी चलेगा लापरवाही से मौत का केस

    मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने आदेश दिया है कि लोगों को जागरूक किया जाए कि चीनी मांझे को बेचने या इस्तेमाल करने पर आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) के तहत मामला दर्ज हो सकता है। यह धारा लापरवाही के कारण होने वाली मृत्यु से संबंधित है। अदालत ने पिछले साल 11 दिसंबर को चीनी मांझे से होने वाली मौतों और हादसों पर चिंता जताते हुए खुद जनहित याचिका के तौर पर संज्ञान लिया।


    सरकार ने कहा- चलाएंगे अभियान

    मध्य प्रदेश सरकार ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की अदालत को बताया कि चीनी मांझे की बिक्री पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। चीनी मांझे से होने वाले हादसों को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं। चीनी मांझे के इस्तेमाल और बिक्री को हतोत्साहित करने के लिए अखबारों और टीवी चैनलों के माध्यम से एक बड़ा जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा।


    अभिभावक को भी ठहराया जा सकता है जिम्मेदार

    अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जागरूकता अभियान में यह साफ बताया जाए कि चीनी मांझे की बिक्री या इस्तेमाल करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (1) के तहत केस चलेगा। यदि कोई नाबालिग बच्चा इस खतरनाक मांझे से पतंग उड़ाता पाया गया तो इसके लिए उसके माता-पिता या अभिभावक को भी कानूनन जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।


    आसपास के जिलों में भी किया जाएगा लागू

    इंदौर के कलेक्टर शिवम वर्मा ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि प्रशासन जल्द निर्देशों का पालन करते हुए जरूरी आदेश जारी करेगा। अदालत को यह भी भरोसा दिया गया कि निर्देशों को इंदौर आसपास के जिलों में भी लागू किया जाएगा। बता दें कि पिछले डेढ़ महीने में इंदौर में चीनी मांझे से गला कटने के कारण दो लोगों की जान जा चुकी है। प्रशासन ने चीनी मांझे पर पूरी तरह रोक लगा रखी है फिर भी कई लोग चोरी से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

  • पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर

    पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर


    जबलपुर। मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के तहत कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में यह दावा किया गया है कि इन नियमों का पालन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है। यह मामला अब हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए रखा गया है और कोर्ट ने 13 जनवरी को मामले की सुनवाई निर्धारित की है।

    याचिकाकर्ता सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे हैं, जो मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के दो महत्वपूर्ण प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार इन नियमों में उल्लेखित कुछ बातें आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के लिए भेदभावपूर्ण हैं और इससे संविधान की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है। विशेष रूप से पदोन्नति के संबंध में नियम 11 में कहा गया है कि पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची बनाई जाएगी, उसके बाद अनारक्षित वर्ग की सूची बनेगी। इसके कारण, अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी यदि मेरिट में बेहतर हैं, तो भी वे आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों से पीछे रह सकते हैं और उन्हें पदोन्नति का मौका नहीं मिल सकता।

    इस नियम को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है, जिनमें यह साफ किया गया था कि पदोन्नति के लिए आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को प्राथमिकता देना एक सीमा तक ही उचित है, और यदि अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी मेरिट में बेहतर हैं तो उन्हें पदोन्नति का अवसर दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार के तहत असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए।
    इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करेंगे।

    हाई कोर्ट ने इस मामले को पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न कर दिया है जिससे यह मामला एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाएगा।सुरेश कुमरे ने कहा कि यदि यह नियम लागू होता है तो यह न केवल उन कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण होगा बल्कि यह सरकारी प्रशासन में भी असंतुलन पैदा कर सकता है। इसलिए वे इस नियम को चुनौती देने के लिए कोर्ट पहुंचे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी कर्मचारियों को समान अवसर मिले और कोई भी वर्ग अपने मेरिट के आधार पर पदोन्नति से वंचित न रहे। हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 13 जनवरी को तय की गई है और अब सबकी निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं।

  • नाबालिग को जेल में रखने के मामले में HC ने सरकार को लगाई फटकार, 5 लाख मुआवज़ा देने का आदेश

    नाबालिग को जेल में रखने के मामले में HC ने सरकार को लगाई फटकार, 5 लाख मुआवज़ा देने का आदेश

    पटना। पटना हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते एक नाबालिग को ₹5 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसे बिहार पुलिस ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया था। कोर्ट ने इस काम को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन बताया।

    जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रितेश कुमार की डिवीजन बेंच ने कहा कि गिरफ्तारी कानून की तय प्रक्रिया की पूरी तरह से अनदेखी करके सिर्फ़ डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DIG) के कहने पर की गई, जबकि नाबालिग को पहले ही चार्जशीट में बरी कर दिया गया।
    हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मुआवज़े की रकम और ₹15,000 का मुक़दमे का खर्च राज्य सरकार देगी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यह खर्च उन दोषी पुलिस अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाना चाहिए, जो प्रशासनिक जांच के बाद ज़िम्मेदार पाए जाएंगे।

    संक्षेप में मामला
    याचिकाकर्ता (एक नाबालिग) ने गैर-कानूनी हिरासत से रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ता का नाम शुरू में ज़मीन विवाद और मारपीट के मामले में FIR में है।
    हालांकि, शुरुआती जांच के दौरान, IO को याचिकाकर्ता सहित दस आरोपियों के खिलाफ़ अपर्याप्त सबूत मिले। नतीजतन, 1 सितंबर, 2025 को चार्जशीट दायर की गई, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम आरोपी के तौर पर था, लेकिन उस पर आरोप नहीं लगाए गए। इसलिए उसे ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया।

    हालांकि, इसके बाद शिकायतकर्ता ने DIG, कोसी रेंज, सहरसा से संपर्क किया और याचिकाकर्ता-नाबालिग सहित दस आरोपियों को बरी किए जाने की शिकायत की।

    DIG ने एक सुपरविज़न नोट में IO को जांच आगे बढ़ाने का यह मानते हुए निर्देश दिया कि आरोप सच हैं और निर्देश दिया कि बाकी आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए।
    DIG के सुपरविज़न नोट को केस डायरी में शामिल किया गया और फिर IO सीधे आरोपी के घर पर छापा मारने गया। उसने मौजूदा याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया, उसकी उम्र 19 साल बताई और उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।

    दरअसल, मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के समय भी इस बात पर ध्यान नहीं दिलाया गया कि याचिकाकर्ता का नाम केस में चार्जशीट न किए गए लोगों की लिस्ट में था। यहां तक ​​कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने भी मामले के इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया।

    सीधे-सीधे, बिना सोचे-समझे, याचिकाकर्ता को जेल भेज दिया।
    हाईकोर्ट की टिप्पणियां
    बेंच ने पुलिस के काम करने के तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई। उसने कहा कि एक बार जब चार्जशीट दायर हो गई, जिसमें याचिकाकर्ता को ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया दिखाया गया, तो IO मजिस्ट्रेट के सामने आगे की जांच के लिए आवेदन किए बिना उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा:
    “इस मामले में याचिकाकर्ता की आज़ादी छीन ली गई और पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई से उसके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ। DIG, कोशी रेंज का आरोपों को सच मानकर मामले की जांच करने का निर्देश निर्दोषता की धारणा के सिद्धांतों के खिलाफ है, जो आपराधिक कानून न्यायशास्त्र का मुख्य सिद्धांत है। I.O. ने बिना किसी ठोस सबूत के 16 साल से कम उम्र के छात्र याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया।

    वह इस मामले में ऐसा नहीं कर सकता था।”
    हाईकोर्ट ने इस मामले में क्षेत्राधिकार मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी असंतोष व्यक्त किया। उसने कहा कि जब याचिकाकर्ता को पेश किया गया तो मजिस्ट्रेट यह देखने में विफल रहा कि पिछली रिपोर्ट में उसे ‘चार्जशीटेड नहीं’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
    इसके अलावा, उसने कहा कि याचिकाकर्ता के नाबालिग होने के बावजूद (बाद में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने पुष्टि की कि घटना के समय उसकी उम्र 15 साल, 06 महीने और 08 दिन थी), मजिस्ट्रेट ने उसे ऑब्जर्वेशन होम के बजाय जेल भेज दिया क्योंकि उसने बिना सोचे-समझे काम किया।

    कोर्ट ने दुख जताते हुए कहा,
    “जांच एजेंसी द्वारा पावर के गलत इस्तेमाल और याचिकाकर्ता के अधिकार और आज़ादी की रक्षा करने में कोर्ट की नाकामी के कारण उसे अब तक ढाई महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा है”।
    इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा ऑब्जर्वेशन होम/चिल्ड्रन होम से तुरंत रिहा किया जाए। इस संबंध में, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, मधेपुरा द्वारा तुरंत एक उचित रिहाई आदेश जारी किया जाएगा।

    कोर्ट ने राज्य को आदेश दिया कि वह उस युवा लड़के को एक महीने के अंदर शारीरिक और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजे के तौर पर ₹5 लाख का भुगतान करे। इसके अलावा, उसे मुकदमेबाजी के खर्च के तौर पर ₹15,000 दिए गए।
    कोर्ट ने सक्षम अथॉरिटी/पुलिस महानिदेशक, बिहार को भी निर्देश दिया कि वे इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर जांच करें, जांच के दौरान सामने आने वाले सबूतों के आधार पर उचित कार्रवाई करें, और दोषी अधिकारियों से लागत और मुआवजे की रकम वसूल करें।

    कोर्ट ने आदेश दिया,
    “याचिकाकर्ता को दिए जाने वाला जुर्माना और मुआवजे की रकम जांच पूरी होने के बाद इस आदेश की कॉपी मिलने/सूचित होने की तारीख से छह महीने के अंदर दोषी अधिकारियों से वसूल की जाएगी”। याचिकाकर्ता की ओर से वकील शाश्वत कुमार, अमन आलम और अमरनाथ कुमार पेश हुए।