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  • कादर खान जयंती पर याद आए पुराने दिन, कब्रिस्तान में करते थे एक्टिंग की प्रैक्टिस, गोविंदा के साथ कॉमेडी से जीते करोड़ों दिल

    कादर खान जयंती पर याद आए पुराने दिन, कब्रिस्तान में करते थे एक्टिंग की प्रैक्टिस, गोविंदा के साथ कॉमेडी से जीते करोड़ों दिल


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में जब भी शानदार कॉमेडी और दमदार संवाद लेखन की बात होती है तो दिग्गज अभिनेता कादर खान का नाम सबसे पहले याद आने वाले कलाकारों में शामिल होता है। उन्होंने अपने अभिनय से कभी दर्शकों को खूब हंसाया तो कभी खलनायक बनकर पर्दे पर खौफ पैदा किया। उनकी लेखनी ने भी हिंदी फिल्मों को ऐसे संवाद दिए जो आज तक दर्शकों के जेहन में बसे हुए हैं। 22 अक्टूबर 1937 को अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान की 22 अक्टूबर 2026 को 89वीं जयंती मनाई जा रही है। इस मौके पर उनकी जिंदगी से जुड़े उन दिलचस्प किस्सों को याद किया जा रहा है जो बताते हैं कि किस तरह संघर्षों के बीच उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।

    कादर खान का बचपन आर्थिक तंगी के बीच बीता था। उनके पिता अब्दुल रहमान खान अरबी और इस्लामी साहित्य के विद्वान थे जबकि उनकी मां का नाम इकबाल बेगम था। परिवार में पहले तीन बच्चों की कम उम्र में मौत हो गई थी। इसके बाद उनकी मां को लगने लगा कि काबुल का माहौल उनके बच्चों के लिए ठीक नहीं है। इसी वजह से परिवार ने अफगानिस्तान छोड़कर मुंबई आने का फैसला किया। मुंबई में उनका परिवार कमाठीपुरा इलाके की एक छोटी सी चॉल में रहने लगा। यहां जिंदगी आसान नहीं थी और कई बार परिवार को खाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ता था। इन मुश्किल परिस्थितियों ने कादर खान को कम उम्र में ही जिंदगी की हकीकत से रूबरू करा दिया।

    दिलचस्प बात यह है कि कादर खान केवल अभिनय के क्षेत्र में ही प्रतिभाशाली नहीं थे बल्कि पढ़ाई में भी काफी अच्छे थे। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और बाद में सिद्दिकी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में प्रोफेसर के रूप में काम किया। एक ओर वह विद्यार्थियों को पढ़ाते थे तो दूसरी ओर उनके भीतर अभिनय और नाटक के प्रति जुनून लगातार बढ़ रहा था। यही जुनून आगे चलकर उन्हें फिल्मी दुनिया तक ले गया।

    कादर खान के शुरुआती दिनों का एक चर्चित किस्सा उनके अभिनय अभ्यास से जुड़ा है। बताया जाता है कि वह दक्षिण मुंबई के एक कब्रिस्तान में जाकर अकेले संवाद बोलने की प्रैक्टिस किया करते थे। वहां उन्हें कोई परेशान नहीं करता था और वह अपने अंदाज में अभिनय का अभ्यास कर सकते थे। इसी दौरान अभिनेता अशरफ खान की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने कादर खान की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें नाटक में काम करने का अवसर मिला। यहीं से उनके रंगमंच के सफर को नई दिशा मिली।

    फिल्मी दुनिया में कादर खान को शुरुआती पहचान एक संवाद लेखक के रूप में मिली। वर्ष 1972 में रिलीज हुई फिल्म जवानी दीवानी के संवाद लिखने के लिए उन्हें 1500 रुपये मिले थे। उस समय उनकी शिक्षक के रूप में मासिक तनख्वाह करीब 400 रुपये थी। इसके बाद फिल्मों में उनकी मांग बढ़ने लगी। फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई ने उन्हें फिल्म रोटी के संवाद लिखने का मौका दिया जिसके लिए उन्हें 1 लाख 21 हजार रुपये की फीस मिली। यह उनके करियर का बड़ा पड़ाव साबित हुआ। वर्ष 1973 में फिल्म दाग के जरिए उन्होंने बतौर अभिनेता भी हिंदी सिनेमा में कदम रखा।

    कादर खान ने अमिताभ बच्चन की कई चर्चित फिल्मों के संवाद लिखे। अमर अकबर एंथनी मुकद्दर का सिकंदर लावारिस शराबी कुली और अग्निपथ जैसी फिल्मों में उनके लेखन का प्रभाव देखने को मिला। गंभीर बातों को सरल और प्रभावशाली शब्दों में कहने की उनकी कला ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। अपने करियर में उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया।

    1990 के दशक में गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी बेहद लोकप्रिय हुई। कुली नंबर 1 हीरो नंबर 1 दूल्हे राजा आंखें और साजन चले ससुराल जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया। उनके योगदान के लिए उन्हें कई फिल्मफेयर पुरस्कार मिले और 2019 में मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 31 दिसंबर 2018 को कनाडा के टोरंटो में 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। आज भी उनके अभिनय और संवादों के जरिए उनकी विरासत हिंदी सिनेमा में जीवित है।

  • शम्मी कपूर की 95वीं जयंती आज, कभी एक दिन में पी जाते थे 100 सिगरेट, जानिए प्यार से लेकर ‘याहू’ कनेक्शन तक के दिलचस्प किस्से

    शम्मी कपूर की 95वीं जयंती आज, कभी एक दिन में पी जाते थे 100 सिगरेट, जानिए प्यार से लेकर ‘याहू’ कनेक्शन तक के दिलचस्प किस्से


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ सितारे ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ फिल्मों में नायक की छवि को भी नया रूप दिया। शम्मी कपूर उन्हीं कलाकारों में से एक थे। अपने खास हेयरस्टाइल बेफिक्र अंदाज जोशीले डांस और शरारती अदाकारी के दम पर उन्होंने ऐसी पहचान बनाई जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है। 21 अक्टूबर को उनकी 95वीं जयंती के मौके पर उनके फिल्मी सफर और निजी जिंदगी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से याद किए जा रहे हैं। फिल्म जंगली में उनका मशहूर अंदाज और जोरदार आवाज में बोला गया याहू आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पलों में गिना जाता है।

    शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था। उनका असली नाम शमशेर राज कपूर था। वह हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर तथा शशि कपूर के भाई थे। कपूर परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद शम्मी के लिए अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था। उन्होंने फिल्मों में आने से पहले पृथ्वी थिएटर में काम किया और जूनियर कलाकार के तौर पर हर महीने 50 रुपये वेतन पाया। इसी अनुभव ने उन्हें अभिनय की दुनिया को करीब से समझने का अवसर दिया।

    शम्मी कपूर ने 1953 में फिल्म जीवन ज्योति से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। उनकी शुरुआती फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकीं। रेल का डिब्बा लैला मजनू ठोकर और शमा परवाना जैसी फिल्मों में काम करने के बाद भी वह बड़ी सफलता से दूर रहे। लगातार मिल रही असफलताओं के बीच उन्होंने अपनी अभिनय शैली बदलने का फैसला किया। उस दौर में जहां अधिकतर नायक गंभीर और पारंपरिक अंदाज में दिखाई देते थे वहीं शम्मी कपूर ने अपने किरदारों में मस्ती ऊर्जा और बेफिक्री को शामिल किया।

    साल 1957 में आई फिल्म तुमसा नहीं देखा उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुई। इसके बाद उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। जंगली प्रोफेसर चाइना टाउन कश्मीर की कली तीसरी मंजिल जानवर और ब्रह्मचारी जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया। उन्होंने करीब 100 फिल्मों में काम किया और अपनी अलग पहचान स्थापित की। उनकी नृत्य शैली और पर्दे पर दिखाई देने वाली जबरदस्त ऊर्जा के कारण उन्हें भारत का एल्विस प्रेस्ली भी कहा गया। अमेरिकी गायक और अभिनेता एल्विस प्रेस्ली की रॉक एंड रोल शैली से प्रभावित उनका अंदाज उस समय हिंदी सिनेमा के लिए नया था।

    शम्मी कपूर की सफलता में संगीत का भी बड़ा योगदान रहा। मोहम्मद रफी की आवाज में गाए गए बदन पे सितारे आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा आसमान से आया फरिश्ता और चाहे कोई मुझे जंगली कहे जैसे गीत उनकी पहचान बन गए। शम्मी केवल गानों पर होंठ हिलाने तक सीमित नहीं रहते थे बल्कि चेहरे के भावों और पूरे शरीर की हरकतों से गीतों को जीवंत कर देते थे। संगीत की उनकी समझ ने उनके अभिनय को और प्रभावशाली बनाया।

    उनकी फिल्म जंगली के गीत में इस्तेमाल हुआ याहू शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में इंटरनेट कंपनी याहू के नाम को लेकर भी मजेदार किस्सा सामने आया। कहा जाता है कि उनके भतीजे रणधीर कपूर ने मजाक में उनसे पूछा था कि चाचा आपने इतनी बड़ी इंटरनेट कंपनी शुरू कर दी और हमें बताया भी नहीं। हालांकि कंपनी का नाम और शम्मी कपूर का मशहूर फिल्मी उद्गार अलग-अलग संदर्भों से जुड़े हैं। शम्मी को कंप्यूटर और इंटरनेट में भी गहरी दिलचस्पी थी। भारत में इंटरनेट के आम होने से पहले ही वह इसका इस्तेमाल करने लगे थे और उन्होंने कपूर परिवार की वेबसाइट भी बनाई थी।

    शम्मी कपूर की निजी जिंदगी में अभिनेत्री गीता बाली का खास स्थान था। दोनों ने 1955 में शादी की और उनके दो बच्चे आदित्य राज कपूर तथा कंचन कपूर हुए। साल 1965 में गीता बाली के निधन ने शम्मी को गहरा दुख पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने 1969 में नीला देवी गोहिल से विवाह किया। उनके जीवन से जुड़ा एक चर्चित किस्सा यह भी है कि वह हर साल 1 जनवरी से 21 जनवरी तक शराब नहीं पीते थे। बताया जाता है कि गीता बाली इसी अवधि में बीमार हुई थीं और 21 जनवरी को उनका निधन हुआ था।

    शम्मी कपूर की जिंदगी में कई संघर्ष और स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें भी आईं। उनकी पत्नी नीला देवी के एक इंटरव्यू के मुताबिक वह एक दिन में 100 सिगरेट तक पी लेते थे। बाद के वर्षों में उन्हें फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्याएं हुईं और स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। साल 2011 में आई फिल्म रॉकस्टार उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई जिसमें वह रणबीर कपूर के साथ नजर आए। शम्मी कपूर ने अपने अंदाज से हिंदी सिनेमा में नायक की परिभाषा बदल दी। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना उस कलाकार को सलाम करना है जिसने पर्दे पर आजादी मस्ती और संगीत को एक नई पहचान दी।

  • मंदाकिनी का बड़ा खुलासा फिल्मों में काम के बाद भी नहीं मिली फीस बताया कैसा था उस दौर का माहौल

    मंदाकिनी का बड़ा खुलासा फिल्मों में काम के बाद भी नहीं मिली फीस बताया कैसा था उस दौर का माहौल


    नई दिल्ली। 1985 में रिलीज हुई फिल्म राम तेरी गंगा मैली ने मंदाकिनी को रातोंरात पहचान दिला दी थी। राज कपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में मंदाकिनी ने राजीव कपूर के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की कहानी के साथ इसके कई दृश्य और गाने भी उस समय काफी चर्चा में रहे थे। फिल्म की सफलता ने मंदाकिनी को हिंदी सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया था। अब फिल्म के रिलीज होने के कई साल बाद मंदाकिनी ने अपने फिल्मी करियर के शुरुआती दौर से जुड़ी कुछ ऐसी बातें साझा की हैं जो काफी चर्चा में हैं।

    मंदाकिनी ने न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में अपने करियर के दिनों को याद किया। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री का काम करने का तरीका आज के मुकाबले काफी अलग था। मंदाकिनी के मुताबिक उन्होंने अपने करियर में करीब 16 से 17 फिल्मों में काम किया लेकिन उन्हें उन फिल्मों की पूरी फीस नहीं मिली। उन्होंने उस दौर को याद करते हुए फिल्म सेट के माहौल को बेहद अनौपचारिक और घर जैसा बताया।

    अभिनेत्री ने बताया कि फिल्मों में काम करने का अनुभव उनके लिए काफी अच्छा रहा। उनके अनुसार कलाकारों के बीच आपसी मेलजोल ज्यादा था और सेट पर सभी लोग साथ मिलकर समय बिताते थे। कलाकार एक साथ खाना खाते थे और किसी दूसरे कलाकार से मिलने के लिए पहले से अनुमति लेने जैसी औपचारिकता नहीं होती थी। लोग एक दूसरे के कमरे में भी आसानी से जा सकते थे। मंदाकिनी ने कहा कि उस समय का माहौल उन्हें काफी सहज और परिवार जैसा महसूस होता था।

    मंदाकिनी ने उस दौर के फिल्मी कॉन्ट्रैक्ट को लेकर भी अपनी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उस समय फिल्मों को साइन करने की प्रक्रिया काफी अनौपचारिक हुआ करती थी। कई बार कलाकारों से पहले फिल्म साइन करने के लिए कहा जाता था और भुगतान की बात बाद में होती थी। इस वजह से कई मौकों पर कलाकारों को अपनी फीस को लेकर इंतजार करना पड़ता था। मंदाकिनी ने इसी संदर्भ में बताया कि उनके साथ भी कई फिल्मों में ऐसा हुआ।

    उन्होंने यह भी बताया कि कभी कभी वह बिना फीस लिए भी फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हो जाती थीं। खासकर जब फिल्म से जुड़े लोग या उनके साथी कलाकार कुछ दिनों के काम के लिए मदद मांगते थे तो वह सहयोग कर देती थीं। उनके अनुसार उस समय इंडस्ट्री में काम करने का तरीका काफी अलग था और कई चीजें औपचारिक समझौते के बजाय आपसी भरोसे और बातचीत के आधार पर तय हो जाती थीं।

    मंदाकिनी के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में राम तेरी गंगा मैली का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। राज कपूर के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1985 में रिलीज हुई थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया था और मंदाकिनी को इसके बाद बड़ी पहचान मिली। फिल्म में उनके कई दृश्य उस समय चर्चा का विषय बने थे। खासतौर पर झरने के नीचे फिल्माया गया दृश्य और ब्रेस्ट फीडिंग सीन लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा में रहे।

    राम तेरी गंगा मैली को फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में भी सफलता मिली थी। फिल्म को विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार मिले थे। इसके संगीत और निर्देशन की भी काफी सराहना हुई थी। फिल्म की सफलता ने मंदाकिनी के करियर को नई ऊंचाई दी और वह दर्शकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गईं।

    अब इतने वर्षों बाद जब मंदाकिनी ने अपने शुरुआती फिल्मी सफर को याद किया है तो उनकी बातों से उस दौर के हिंदी फिल्म उद्योग के कामकाज की एक अलग तस्वीर सामने आती है। एक तरफ उन्होंने सेट के दोस्ताना माहौल और सहयोग को याद किया तो दूसरी तरफ यह भी बताया कि उस समय काम और भुगतान से जुड़े समझौते आज की तरह व्यवस्थित नहीं थे। इसी वजह से उनके मुताबिक कई फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें पूरी फीस नहीं मिल सकी।

  • गणेश चतुर्थी से जुड़े बॉलीवुड के वो सीन जो आज भी याद हैं गणपति उत्सव के बीच आया कहानी में बड़ा मोड़

    गणेश चतुर्थी से जुड़े बॉलीवुड के वो सीन जो आज भी याद हैं गणपति उत्सव के बीच आया कहानी में बड़ा मोड़


    नई दिल्ली। गणेश चतुर्थी का त्योहार देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। खासकर मुंबई में गणपति उत्सव का नजारा देखते ही बनता है। गलियों में गूंजते गणपति बप्पा मोरया के जयकारे और ढोल नगाड़ों की आवाज इस त्योहार को खास बना देती है। बॉलीवुड भी लंबे समय से गणेश उत्सव की इसी भव्यता को अपनी फिल्मों में दिखाता आया है। कई फिल्मों में गणपति पूजा और विसर्जन केवल धार्मिक आयोजन या गीतों तक सीमित नहीं रहे बल्कि इनका इस्तेमाल कहानी को नया मोड़ देने के लिए किया गया।

    बॉलीवुड की चर्चित फिल्म डॉन इसका बेहतरीन उदाहरण है। साल 2006 में रिलीज हुई इस फिल्म में शाह रुख खान ने डॉन का किरदार निभाया था। फिल्म के गणपति विसर्जन वाले दृश्य में जबरदस्त भीड़ और उत्सव के बीच पुलिस डॉन का पीछा करती है। इसी अफरा तफरी में डॉन घायल होकर कोमा में चला जाता है। इसके बाद कहानी पूरी तरह बदल जाती है। डॉन की जगह उसके हमशक्ल विजय को गैंग में भेजा जाता है। गणपति विसर्जन के बीच घटने वाली यह घटना फिल्म के सस्पेंस और पहचान से जुड़े सबसे बड़े मोड़ों में से एक बन जाती है।

    संजय दत्त की फिल्म वास्तव द रियलिटी में भी गणपति विसर्जन कहानी के बेहद भावुक और निर्णायक हिस्से के रूप में सामने आता है। रघु परिस्थितियों के कारण अपराध की दुनिया में पहुंच जाता है और धीरे धीरे एक खतरनाक गैंगस्टर बन जाता है। फिल्म के अंत में गणपति विसर्जन का जुलूस चल रहा होता है। चारों तरफ भीड़ और बप्पा के जयकारों के बीच रघु अपनी मां तक पहुंचता है। मां समझ जाती है कि उसका बेटा अपराध की दुनिया से वापस नहीं लौट सकता। इसके बाद वह ऐसा फैसला लेती है जो हिंदी सिनेमा के सबसे दर्दनाक क्लाइमेक्स में गिना जाता है। गणपति विसर्जन के बीच मां अपने ही बेटे को गोली मार देती है।

    ऋतिक रोशन की अग्निपथ में भी गणपति उत्सव कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ा है। देवा श्री गणेशा गीत के दौरान विजय गणपति पूजा करता है और इसके बाद अपने दुश्मन सूर्या को खत्म करने के लिए आगे बढ़ता है। सूर्या की हत्या के बाद कांचा चीना विजय और उसके परिवार को खत्म करने की कसम खाता है। इस तरह गणपति उत्सव के दौरान लिया गया फैसला आगे की कहानी में बड़े संघर्ष की नींव रखता है।

    राम गोपाल वर्मा की सरकार 3 में भी गणपति आरती के दौरान कहानी में बड़ा मोड़ आता है। अमिताभ बच्चन का किरदार सुभाष नागरे गणपति आरती कर रहा होता है तभी उस पर गोलीबारी होती है। यह हमला फिल्म में चल रही राजनीतिक साजिशों और सत्ता संघर्ष को नया मोड़ देता है।

    इन फिल्मों को देखकर साफ समझ आता है कि बॉलीवुड ने गणेश चतुर्थी को सिर्फ आस्था और उत्सव के दृश्य के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया। कई बार बप्पा की मौजूदगी कहानी के सबसे अहम मोड़ का कारण बनी। कहीं पहचान बदली तो कहीं रिश्तों की परीक्षा हुई और कहीं दुश्मनी ने नया रूप लिया। यही वजह है कि गणपति उत्सव से जुड़े ये फिल्मी दृश्य आज भी दर्शकों की यादों में खास जगह बनाए हुए हैं।

  • बड़े स्टार नहीं बड़ा बजट नहीं फिर भी बॉक्स ऑफिस पर छाई हनुमान अंश, 26वें दिन 50 करोड़ पार

    बड़े स्टार नहीं बड़ा बजट नहीं फिर भी बॉक्स ऑफिस पर छाई हनुमान अंश, 26वें दिन 50 करोड़ पार


    नई दिल्ली। बॉक्स ऑफिस पर इस समय फिल्म हनुमान अंश की सफलता ने सभी को हैरान कर दिया है. अगस्त में रिलीज हुई इस फिल्म ने शुरुआत में बेहद धीमी रफ्तार पकड़ी लेकिन बाद में इसकी कमाई ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि बड़े बजट की फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया. करीब 2 करोड़ रुपये की लागत में तैयार हुई हनुमान अंश ने 26 दिनों में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का नेट कलेक्शन कर लिया है. कम बजट और बिना बड़े सितारों वाली इस फिल्म की कमाई को इंडस्ट्री में एक बड़ी मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.

    हनुमान अंश 7 अगस्त को देशभर में 355 स्क्रीन्स पर रिलीज हुई थी. रिलीज के पहले दिन फिल्म ने केवल 10 लाख रुपये की कमाई की थी. शुरुआती आंकड़ों को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि फिल्म आगे चलकर इतना बड़ा कारोबार कर पाएगी. पहले 15 दिनों तक भी फिल्म की रफ्तार काफी सुस्त रही. कई दिनों में इसकी कमाई महज कुछ लाख रुपये तक सीमित रही.

    इसके बाद फिल्म की कहानी पूरी तरह बदल गई. तीसरे शनिवार को हनुमान अंश की कमाई में बड़ा उछाल देखने को मिला और फिल्म ने करीब 85 लाख रुपये जुटाए. अगले दिन रविवार को इसकी कमाई सीधे 2.20 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. शुरुआती दो हफ्तों में जहां फिल्म करीब 40 लाख रुपये ही कमा पाई थी वहीं तीसरे हफ्ते में इसने लगभग 10 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया. इसके साथ ही फिल्म की कुल कमाई करीब 10.40 करोड़ रुपये तक पहुंच गई.

    फिल्म की असली रफ्तार तीसरे हफ्ते के बाद देखने को मिली. उस समय सिनेमाघरों में कई दूसरी बड़ी फिल्में भी मौजूद थीं और उन्हें ज्यादा स्क्रीन मिली हुई थीं. इसके बावजूद हनुमान अंश ने दर्शकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर ली. 21वें दिन के बाद फिल्म की कमाई में लगातार तेजी देखने को मिली.

    चौथे हफ्ते में फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा प्रदर्शन किया जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी. कई दिनों में फिल्म ने 6 से 7 करोड़ रुपये तक की कमाई की. चौथे रविवार को तो फिल्म ने करीब 12 करोड़ रुपये का शानदार कलेक्शन किया. अकेले चौथे हफ्ते में हनुमान अंश ने लगभग 43.23 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन कर लिया.

    26वें दिन फिल्म ने 50 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया. इसके बाद चौथे मंगलवार को भी फिल्म ने करीब 8 करोड़ रुपये की कमाई की और इसकी कुल नेट कमाई 53.63 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. महज 2 करोड़ रुपये के बजट से बनी इस फिल्म का यह कारोबार करीब 25 गुना से ज्यादा बैठता है.

    हनुमान अंश की सफलता इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि फिल्म को शुरुआत में दर्शकों का बहुत बड़ा समर्थन नहीं मिला था. लेकिन धीरे धीरे माउथ पब्लिसिटी ने माहौल बदल दिया. फिल्म की कहानी और विषय ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचना शुरू किया और कम स्क्रीन के बावजूद इसकी कमाई बढ़ती चली गई.

    फिल्म की यह सफलता बताती है कि बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ बड़ा बजट या बड़े सितारे ही सफलता की गारंटी नहीं होते. मजबूत कहानी और दर्शकों से जुड़ाव भी किसी फिल्म को लंबी रेस का खिलाड़ी बना सकता है. अगर हनुमान अंश की रफ्तार आने वाले दिनों में भी बनी रहती है तो इसके 100 करोड़ रुपये के आंकड़े की ओर बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है.

  • अजय देवगन के धमाकेदार डेब्यू के पीछे थे कुकू कोहली, ‘फूल और कांटे’ से मिली पहचान; हार्ट अटैक ने ली जान

    अजय देवगन के धमाकेदार डेब्यू के पीछे थे कुकू कोहली, ‘फूल और कांटे’ से मिली पहचान; हार्ट अटैक ने ली जान


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के मशहूर फिल्म निर्देशक कुकू कोहली का निधन हो गया है। 1991 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म फूल और कांटे से अजय देवगन को बॉलीवुड में शानदार लॉन्च देने वाले कुकू कोहली ने मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती थे। जानकारी के मुताबिक स्टेंट प्रक्रिया के एक दिन बाद उन्हें अचानक हार्ट अटैक आया जिसके बाद उनकी मौत हो गई। उनके निधन की खबर सामने आते ही फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई और कई कलाकारों तथा फिल्म जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

    कुकू कोहली को हिंदी सिनेमा में अजय देवगन के शुरुआती करियर को मजबूत आधार देने वाले फिल्ममेकर के तौर पर याद किया जाता है। फूल और कांटे अजय देवगन की डेब्यू फिल्म थी और इसी फिल्म ने उन्हें रातोंरात दर्शकों के बीच पहचान दिला दी थी। फिल्म में अजय देवगन की एंट्री का वह दृश्य आज भी बॉलीवुड की सबसे चर्चित एंट्री में गिना जाता है जिसमें वह दो चलती मोटरसाइकिलों पर पैर रखकर अनोखे अंदाज में नजर आए थे। फिल्म की सफलता ने अजय देवगन को एक नए एक्शन स्टार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी।

    कुकू कोहली ने अपने करियर में कई लोकप्रिय फिल्मों का निर्देशन किया। फूल और कांटे के अलावा उन्होंने कोहराम सुहाग हकीकत और अनाड़ी नंबर वन जैसी फिल्मों के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया। उनकी फिल्मों में एक्शन ड्रामा और मनोरंजन का ऐसा मेल देखने को मिलता था जो उस दौर के दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय रहा। साल 2004 में उन्होंने वो तेरा नाम था फिल्म का निर्देशन किया था और यही उनके निर्देशन करियर की आखिरी फिल्म साबित हुई। इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से दूरी बना ली थी।

    फिल्ममेकर अशोक पंडित ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कुकू कोहली के निधन की जानकारी साझा की। उनके निधन को भारतीय सिनेमा के लिए बड़ी क्षति बताया जा रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में कुकू कोहली का योगदान खास तौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उन्होंने अजय देवगन जैसे कलाकार को शुरुआती दौर में ऐसा मंच दिया जिसने उनके लंबे और सफल फिल्मी करियर की नींव रखी।

    कुकू कोहली का असली नाम अवतार कोहली था। उनका जन्म 4 जून 1949 को पेशावर में हुआ था। बाद में वह मुंबई पहुंचे और फिल्मी दुनिया में अपना करियर शुरू किया। निर्देशन की दुनिया में आने से पहले उन्होंने दिग्गज फिल्ममेकर राज कपूर के साथ बतौर असिस्टेंट काम किया। राज कपूर के साथ काम करने के दौरान उन्होंने बॉबी सत्यम शिवम सुंदरम और प्रेम रोग जैसी चर्चित फिल्मों की मेकिंग को करीब से समझा। इस अनुभव ने उनकी फिल्म निर्माण की समझ को मजबूत किया और आगे चलकर उन्होंने खुद निर्देशन की कमान संभाली।

    कुकू कोहली की निजी जिंदगी भी कई वजहों से चर्चा में रही। उन्होंने 1990 में अभिनेत्री अरुणा ईरानी से शादी की थी। यह उनकी दूसरी शादी थी। उनकी पहली पत्नी रीटा कोहली थीं और पहली शादी से उनकी दो बेटियां पूजा कोहली और करिश्मा कोहली हैं। पूजा कोहली फिल्म निर्माण से जुड़ी रही हैं। कुकू कोहली और अरुणा ईरानी का रिश्ता लंबे समय तक फिल्मी दुनिया में चर्चा का विषय रहा।

    कुकू कोहली भले ही पिछले कई वर्षों से फिल्मों से दूर थे लेकिन उनका काम और खास तौर पर फूल और कांटे के जरिए अजय देवगन को दिया गया लॉन्च आज भी याद किया जाता है। एक ऐसी फिल्म जिसने एक नए अभिनेता को पहचान दिलाई और निर्देशक को भी हिंदी सिनेमा में अलग मुकाम दिया। उनके निधन से बॉलीवुड ने एक ऐसे फिल्ममेकर को खो दिया जिसने अपने दौर में मसाला और एक्शन फिल्मों को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। कुकू कोहली का नाम आने वाले समय में भी फूल और कांटे और अजय देवगन के यादगार डेब्यू के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा।

  • हीरो नंबर 1 की वापसी तय गोविंदा ने नई फिल्म रूपा का किया ऐलान नई एक्ट्रेस रानी स्वर्णकार के साथ आएंगे नजर

    हीरो नंबर 1 की वापसी तय गोविंदा ने नई फिल्म रूपा का किया ऐलान नई एक्ट्रेस रानी स्वर्णकार के साथ आएंगे नजर


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के हीरो नंबर 1 के नाम से मशहूर गोविंदा ने आखिरकार अपने प्रशंसकों को वह खुशखबरी दे दी जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। कई वर्षों तक बड़े पर्दे से दूर रहने के बाद गोविंदा अब एक बार फिर फिल्मों में वापसी करने जा रहे हैं। उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपनी नई फिल्म रूपा का ऐलान किया है। खास बात यह है कि इस फिल्म में वह सिर्फ मुख्य अभिनेता के रूप में ही नहीं बल्कि निर्माता की जिम्मेदारी भी संभालते नजर आएंगे। उनके साथ इस फिल्म में नई अभिनेत्री रानी स्वर्णकार बॉलीवुड में कदम रखेंगी।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गोविंदा ने अपने फिल्मी सफर के उतार चढ़ाव पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि उनके करियर में कई ऐसे मौके आए जब उन्हें नजरअंदाज किया गया और लोगों ने यह तक कह दिया कि अब उनकी वापसी संभव नहीं है। हालांकि उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। गोविंदा ने कहा कि उन्होंने एक नई शुरुआत करने का फैसला किया है और उन्हें विश्वास है कि उनकी नई फिल्म दर्शकों का दिल जीतने में सफल होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह फिल्म खासतौर पर युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है और उन्हें उम्मीद है कि थिएटर में इसे देखने वाले दर्शकों को एक नया अनुभव मिलेगा।

    गोविंदा ने बातचीत के दौरान अपनी जिंदगी में अंक 14 के महत्व का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वह न्यूमरोलॉजी में विश्वास करते हैं और 14 हमेशा उनके लिए बेहद शुभ साबित हुआ है। उनके अनुसार 14 वर्ष की उम्र से ही उनकी जिंदगी में इस अंक का खास महत्व रहा है। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने सिर्फ एक सप्ताह में 14 फिल्में साइन की थीं और इसके बाद करीब 14 वर्षों तक लगातार सुपरस्टारडम का दौर देखा। बाद में वह 14वीं लोकसभा के सदस्य भी बने। उन्होंने अपने संघर्ष के वर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि हर कठिन दौर के बाद उन्हें नई शुरुआत करने का मौका मिला और अब एक बार फिर वह उसी विश्वास के साथ फिल्मों में लौट रहे हैं।

    गोविंदा ने यह भी कहा कि इस बार उन्होंने ज्यादा इंतजार नहीं किया और तय कर लिया कि अब फिर से अभिनय की दुनिया में सक्रिय होना है। उन्होंने भगवान का आशीर्वाद मिलने की बात कहते हुए उम्मीद जताई कि फिल्म रूपा उनके करियर का नया अध्याय साबित होगी। उनके प्रशंसकों के लिए भी यह वापसी बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय से दर्शक उन्हें बड़े पर्दे पर देखने का इंतजार कर रहे थे।

    हाल ही में गोविंदा अपनी पत्नी सुनीता आहूजा का समर्थन करने के लिए रियलिटी शो लॉकअप 2 में भी पहुंचे थे। वहां उन्होंने अपनी चिरपरिचित कॉमिक टाइमिंग से सभी का मनोरंजन किया। शो के दौरान फराह खान के साथ उनकी मजेदार नोकझोंक और सुनीता आहूजा को लेकर किए गए हास्यपूर्ण संवाद सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में रहे। इससे साफ है कि गोविंदा आज भी अपनी सहज हास्य शैली और शानदार स्क्रीन प्रेजेंस से दर्शकों का मनोरंजन करने का हुनर रखते हैं।

    अब फिल्म रूपा के जरिए गोविंदा की वापसी पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है तो एक बार फिर बॉलीवुड को अपना चहेता हीरो नंबर 1 पुराने अंदाज में बड़े पर्दे पर देखने का मौका मिलेगा।

  • गोल्डन दौर को किया याद हेमा मालिनी ने बताया क्यों नहीं कर रहीं फिल्मों में वापसी और क्या है इसकी सबसे बड़ी वजह

    गोल्डन दौर को किया याद हेमा मालिनी ने बताया क्यों नहीं कर रहीं फिल्मों में वापसी और क्या है इसकी सबसे बड़ी वजह


    नई दिल्ली ।
    हिंदी सिनेमा की ड्रीम गर्ल के नाम से मशहूर हेमा मालिनी लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर हैं। उनके प्रशंसक अक्सर यह सवाल करते रहे हैं कि आखिर वह नई फिल्मों में नजर क्यों नहीं आतीं। अब खुद हेमा मालिनी ने इस सवाल का जवाब देते हुए अपनी चुप्पी तोड़ी है और साफ कहा है कि आज की फिल्मों का स्वरूप उनके दौर से पूरी तरह बदल चुका है। यही सबसे बड़ी वजह है कि उन्होंने फिल्मों से दूरी बना रखी है।

    एक बातचीत के दौरान हेमा मालिनी ने अपने लंबे फिल्मी सफर को याद करते हुए कहा कि उन्हें उस दौर का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला जिसे हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम काल कहा जाता है। उनके अनुसार उस समय बनने वाली फिल्मों में कहानी भावनाएं संगीत और अभिनय का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता था। खास बात यह थी कि महिला प्रधान फिल्मों को भी बराबर महत्व दिया जाता था और अभिनेत्रियों को दमदार किरदार निभाने का अवसर मिलता था।

    उन्होंने बताया कि अपने करियर में उन्हें सीता और गीता सपनों का सौदागर खुशबू शोले ड्रीम गर्ल सत्ते पे सत्ता त्रिशूल क्रांति और बागबान जैसी यादगार फिल्मों में काम करने का अवसर मिला। पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने लगभग दो सौ फिल्मों में अभिनय किया और कई निर्माता निर्देशकों ने बार बार उन्हें अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया। उस दौर में फिल्मों के गीत भी सफलता की सबसे बड़ी पहचान होते थे और हर फिल्म में कई यादगार गाने दर्शकों के दिलों में बस जाते थे।

    हेमा मालिनी का कहना है कि समय के साथ फिल्म निर्माण की शैली पूरी तरह बदल गई है। आज की फिल्मों की सोच प्रस्तुति और कहानी कहने का तरीका पहले से काफी अलग हो चुका है। उन्होंने स्वीकार किया कि कई लोग उनसे पूछते हैं कि वह अब फिल्मों में काम क्यों नहीं करतीं लेकिन उन्हें लगता है कि वर्तमान दौर की फिल्मों में खुद को सहज रूप से ढाल पाना उनके लिए आसान नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने नई फिल्मों से दूरी बनाए रखना बेहतर समझा।

    उन्होंने यह भी कहा कि हर दौर की अपनी अलग पहचान होती है और हर कलाकार उस दौर की जरूरतों के अनुसार काम करता है। उनका मानना है कि जिस तरह का सिनेमा उन्होंने अपने समय में किया वह आज भी दर्शकों के बीच पसंद किया जाता है और यही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनके अनुसार कलाकार के लिए यह संतोष की बात होती है कि वर्षों बाद भी उसके निभाए किरदार लोगों की यादों में जिंदा रहें।

    हेमा मालिनी ने अपने करियर की शुरुआत राज कपूर के साथ फिल्म सपनों का सौदागर से की थी। इसके बाद उन्होंने लगातार कई सफल फिल्मों में अभिनय कर खुद को हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल कर लिया। अपनी खूबसूरती और अभिनय के दम पर उन्होंने करोड़ों दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई और ड्रीम गर्ल की पहचान हासिल की।

    उनकी आखिरी फिल्म शिमला मिर्ची थी जो वर्ष 2020 में रिलीज हुई थी। इसके बाद उन्होंने कोई नई फिल्म स्वीकार नहीं की। फिलहाल वह सक्रिय राजनीति में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही हैं और सार्वजनिक जीवन के साथ परिवार को भी पूरा समय दे रही हैं। मुंबई में रहने के दौरान वह अपनी दोनों बेटियों और नाती नातिनों के साथ समय बिताना पसंद करती हैं। हालांकि फिल्मों से दूरी के बावजूद उनके प्रशंसकों के बीच उनका सम्मान और लोकप्रियता आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है।

  • हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता

    हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई बार ऐसे किस्से सामने आते हैं जो फिल्मों से ज्यादा उनकी शूटिंग के दौरान घटी घटनाओं की वजह से चर्चा में रहते हैं। कलाकार अक्सर अपने किरदार की जरूरत के अनुसार चुनौतीपूर्ण दृश्य निभाते हैं लेकिन कुछ मौके ऐसे भी आए जब कलाकारों ने व्यक्तिगत असहजता के कारण कुछ दृश्यों को करने से परहेज किया। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा साल 1988 में रिलीज हुई फिल्म रिहाई से जुड़ा है जिसमें हेमा मालिनी और नसीरुद्दीन शाह अहम भूमिकाओं में नजर आए थे।

    बताया जाता है कि फिल्म की कहानी के अनुसार नसीरुद्दीन शाह और हेमा मालिनी के बीच एक रोमांटिक दृश्य फिल्माया जाना था। जब अभिनेता को इस दृश्य के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने इसे करने में असहजता जताई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नसीरुद्दीन शाह का मानना था कि हेमा मालिनी जैसी वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अभिनेत्री के साथ इस तरह का दृश्य करना उनके लिए सहज नहीं था। उन्होंने निर्देशक से अपनी झिझक भी साझा की।

    कहा जाता है कि फिल्म की निर्देशक अरुणा राजे और स्वयं हेमा मालिनी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया ताकि दृश्य कहानी की जरूरत के अनुसार पूरा किया जा सके। हालांकि अभिनेता अपने फैसले पर कायम रहे। इसके बाद फिल्म की टीम ने वैकल्पिक तरीका अपनाते हुए संबंधित दृश्य को बॉडी डबल की मदद से फिल्माने का निर्णय लिया। इस तरह फिल्म की शूटिंग पूरी की गई और कहानी के प्रवाह को भी बनाए रखा गया।

    फिल्म रिहाई अपने समय की अलग विषयवस्तु वाली फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें ग्रामीण समाज महिलाओं के अकेलेपन सामाजिक बदलाव और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में हेमा मालिनी के अलावा विनोद खन्ना नसीरुद्दीन शाह और नीना गुप्ता जैसे कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। समीक्षकों ने इसकी कहानी और अभिनय की सराहना की थी।

    रिपोर्टों के मुताबिक इस फिल्म के लिए शुरुआत में अभिनेत्री स्मिता पाटिल पर भी विचार किया गया था। बाद में यह भूमिका हेमा मालिनी को मिली और उन्होंने मजबूत कहानी तथा महिला निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा के चलते फिल्म स्वीकार की। एक इंटरव्यू में हेमा मालिनी ने भी बताया था कि अरुणा राजे के निर्देशन में काम करना उनके लिए एक विशेष अनुभव था और यही वजह थी कि उन्होंने यह फिल्म करने का फैसला लिया।

    आज भी रिहाई केवल अपनी कहानी के लिए ही नहीं बल्कि शूटिंग से जुड़े इन दिलचस्प किस्सों के कारण भी याद की जाती है। यह घटना इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि कलाकारों की व्यक्तिगत सहजता और पेशेवर जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए फिल्म निर्माण के दौरान कई बार अलग-अलग समाधान तलाशने पड़ते हैं।

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    जब एक ही गाने ने बना दिया रिकॉर्ड! 20 मिनट के इस देशभक्ति ट्रैक की कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि फिल्मों की आत्मा माने जाते हैं। कई बार किसी फिल्म की कहानी भले ही दर्शकों के दिलों में खास जगह न बना पाए लेकिन उसके गाने वर्षों तक लोगों की जुबान पर बने रहते हैं। बॉलीवुड के इतिहास में ऐसे कई गीत हैं जिन्होंने लोकप्रियता के नए रिकॉर्ड बनाए लेकिन एक गीत ऐसा भी है जिसने अपनी असाधारण लंबाई के कारण अलग पहचान हासिल की। यह गीत फिल्म अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों का टाइटल ट्रैक है जिसे हिंदी फिल्मों के सबसे लंबे गीतों में गिना जाता है।

    साल 2004 में रिलीज हुई इस फिल्म का शीर्षक गीत लगभग 20 मिनट की अवधि का है। फिल्म में इसे एक साथ नहीं बल्कि तीन अलग-अलग हिस्सों में प्रस्तुत किया गया है ताकि कहानी का प्रवाह बना रहे और भावनात्मक प्रभाव भी कायम रहे। इस गीत में देशभक्ति वीरता बलिदान और सैनिकों के सम्मान की भावना को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है। यही वजह है कि यह गीत आज भी देशभक्ति गीतों की सूची में खास स्थान रखता है।

    इस गीत का संगीत मशहूर संगीतकार अनु मलिक ने तैयार किया था। भव्य ऑर्केस्ट्रा दमदार बोल और भावनात्मक प्रस्तुति ने इसे सामान्य फिल्मी गीतों से अलग पहचान दिलाई। गीत के हर हिस्से में सैनिकों के त्याग परिवारों की भावनाएं और राष्ट्र के प्रति समर्पण को प्रमुखता से उभारा गया है। यही कारण है कि यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि देशभक्ति का संदेश देने वाला एक सशक्त संगीतात्मक प्रस्तुतीकरण बन गया।

    फिल्म अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों का निर्देशन अनिल शर्मा ने किया था। इसमें अमिताभ बच्चन अक्षय कुमार बॉबी देओल दिव्या खोसला कुमार संदली सिन्हा और नगमा जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए थे। कहानी भारतीय सेना की तीन पीढ़ियों के संघर्ष बलिदान और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पर आधारित थी। फिल्म को समीक्षकों से सराहना मिली लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी।

    हालांकि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही लेकिन इसका शीर्षक गीत समय के साथ अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा। देशभक्ति के अवसरों पर आज भी यह गीत कई मंचों और कार्यक्रमों में सुनाई देता है। इसकी लंबाई के बावजूद दर्शकों की भावनाओं को अंत तक बांधे रखने की क्षमता इसे विशेष बनाती है।

    भारतीय सिनेमा में इतने लंबे गीत बहुत कम देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों का टाइटल ट्रैक आज भी बॉलीवुड के सबसे लंबे और यादगार देशभक्ति गीतों में शामिल माना जाता है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं बल्कि देश के वीर जवानों के साहस समर्पण और बलिदान को श्रद्धांजलि देने वाला भावनात्मक दस्तावेज बन चुका है।