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  • निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल

    निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधि विधान से निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें वर्ष भर की 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून गुरुवार को रखा जाएगा लेकिन इसकी तैयारी और नियम एक दिन पहले दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब श्रद्धालु दशमी तिथि से ही संयम और नियमों का पालन शुरू कर दें। इस दिन भोजन और दिनचर्या दोनों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

    दशमी तिथि के दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन में प्याज लहसुन और तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शाम के समय सूर्यास्त से पहले हल्का और सुपाच्य भोजन कर लेना उचित माना गया है। इसके बाद अन्न का त्याग कर देना चाहिए। कई श्रद्धालु दशमी की रात से ही जल का सेवन भी बंद कर देते हैं ताकि अगले दिन निर्जला व्रत का पालन पूरी निष्ठा के साथ कर सकें।

    एकादशी के दिन बाल धोना शुभ नहीं माना जाता इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को दशमी तिथि में ही स्नान के साथ बाल धो लेने चाहिए। इससे व्रत के दिन किसी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती और धार्मिक नियमों का पालन भी हो जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है। बिना तुलसी के विष्णु पूजन अधूरा माना जाता है। हालांकि एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को स्पर्श करना या पत्तियां तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि में ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी माता को दूर से प्रणाम कर दीपक अर्पित किया जा सकता है।

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दशमी तिथि की रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया गया यह संकल्प व्रत की सफलता का आधार माना जाता है। इसके बाद व्रती को द्वादशी तिथि में पारण होने तक नियमों का पालन करना चाहिए।

    निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का महापर्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा आराधना जप और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए यदि आप इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत रखने जा रहे हैं तो दशमी तिथि से ही इसकी तैयारी शुरू कर लें ताकि आपको व्रत का संपूर्ण और शुभ फल प्राप्त हो सके।

  • 11 जून को व्रत-पूजा से मिल सकता है विशेष लाभ, ज्योतिषीय दृष्टि से अहम दिन

    11 जून को व्रत-पूजा से मिल सकता है विशेष लाभ, ज्योतिषीय दृष्टि से अहम दिन


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है, लेकिन 11 जून 2026 का दिन और भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि इस दिन परमा एकादशी का दुर्लभ योग बन रहा है। यह एकादशी अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास में पड़ रही है, जो तीन साल में एक बार आता है। यही कारण है कि इस दिन का महत्व सामान्य एकादशी से कई गुना अधिक बताया जा रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परमा एकादशी को मोक्षदायिनी तिथि माना गया है। कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से 100 यज्ञों के बराबर फल प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में धन, समृद्धि और सुख-शांति का वास होता है। यही नहीं, यह व्रत पापों के नाश और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी खोलता है।

    पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 11 जून 2026 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर शुरू होगी और उसी दिन रात 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर परमा एकादशी का व्रत 11 जून, गुरुवार को ही रखा जाएगा। इसके अगले दिन 12 जून को व्रत का पारण किया जाएगा, जिसका शुभ समय सुबह 5 बजकर 23 मिनट से 8 बजकर 10 मिनट तक बताया गया है।

    परमा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। पूजा के दौरान पीले वस्त्रों का उपयोग शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त पीले कपड़े पर चांदी का सिक्का और हल्दी की गांठ रखकर पूजा करते हैं और उसे बाद में तिजोरी या धन स्थान पर रख देते हैं। मान्यता है कि इससे घर में धन और समृद्धि बढ़ती है।

    इसके अलावा इस दिन शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का चौमुखी दीपक जलाने का भी विशेष महत्व बताया गया है। दीपक में हल्दी या कुमकुम मिलाना शुभ माना जाता है। भक्त तुलसी की परिक्रमा करते हुए मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि परिक्रमा के दौरान तुलसी पौधे को स्पर्श नहीं किया जाता।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा गया है कि यदि इस दिन व्रत और पूजा का अवसर चूक गया, तो ऐसा दुर्लभ योग लंबे समय तक फिर नहीं मिलता। यही कारण है कि श्रद्धालु इस तिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं।

    परमा एकादशी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आस्था, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक मानी जाती है। यह दिन भक्तों को भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर प्रदान करता है।

  • पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर

    पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग में Purushottam Maas को अत्यंत पवित्र और विशेष महीना माना जाता है। यह अवधि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, जिसमें श्रद्धालु पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस महीने किए गए शुभ कार्य कई गुना फल देते हैं, लेकिन इसी के साथ वास्तु शास्त्र में कुछ विशेष सावधानियां भी बताई गई हैं।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास के दौरान घर में रखी कुछ वस्तुएं नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकती हैं और परिवार की सुख-शांति पर असर डाल सकती हैं। इसलिए इस अवधि में विशेष रूप से घर की सफाई और अनावश्यक वस्तुओं को हटाने पर जोर दिया जाता है।

    सबसे पहले जिन चीजों से बचने की सलाह दी गई है, वे हैं टूटी हुई देवी-देवताओं की मूर्तियां। घर में किसी भी प्रकार की खंडित मूर्ति रखना वास्तु दोष का कारण माना जाता है। ऐसी मूर्तियां नकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और पारिवारिक शांति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए इन्हें नदी या पवित्र जल में विसर्जित करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा सूखे या मुरझाए हुए पौधे भी इस पवित्र माह में अशुभ माने गए हैं। घर में रखे सूखे पौधे न केवल वातावरण की ताजगी को कम करते हैं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाते हैं। इसके स्थान पर हरे-भरे पौधे, विशेषकर तुलसी का पौधा, अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाता है।

    वास्तु शास्त्र में टूटे-फूटे कांच के बर्तनों को भी अशुभ बताया गया है। ऐसे बर्तन घर में रखने से आर्थिक परेशानियों और बाधाओं का संकेत मिलता है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में इन्हें तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए ताकि घर में समृद्धि और स्थिरता बनी रहे।

    इसी तरह बंद पड़ी या खराब घड़ियां भी नकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती हैं। समय रुकना प्रगति में बाधा का संकेत माना जाता है, और वास्तु के अनुसार यह परिवार के विकास और तरक्की को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी घड़ियों को या तो ठीक करवा लेना चाहिए या फिर घर से हटा देना चाहिए।

    पुरुषोत्तम मास में धार्मिक आस्था के साथ-साथ घर के वातावरण को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में किया गया हर छोटा सुधार भी जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है।

    कुल मिलाकर यह पवित्र महीना भक्तों के लिए भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर है, और साथ ही यह समय घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करने और सकारात्मकता बढ़ाने का भी संदेश देता है।

  • एकादशी व्रत के नियम क्या हैं? जानिए सही पूजा विधि और धार्मिक महत्व

    एकादशी व्रत के नियम क्या हैं? जानिए सही पूजा विधि और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है, यानी सालभर में कुल 24 एकादशी व्रत रखे जाते हैं। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
    किसकी पूजा होती है?
    एकादशी के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। कई भक्त भगवान कृष्ण की पूजा भी करते हैं, क्योंकि उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु का यह मंत्र अत्यंत शुभ माना जाता है:
    ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    एकादशी व्रत के निय
    व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।
    घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
    इस दिन सात्विक भोजन करें और कई लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं।
    लहसुन, प्याज, चावल और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
    क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
    भगवान विष्णु के मंत्रों और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।
    जरूरतमंदों को दान करना पुण्यदायी माना गया है।

    एकादशी व्रत की पूजा विधि
    एकादशी के दिन सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित करें।
    पूजा के दौरान विष्णु चालीसा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और मंत्र जाप करें। तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। अंत में भगवान की आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटें।

    एकादशी व्रत का महत्व
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत मन और शरीर को शुद्ध करने वाला माना जाता है। यह व्रत आत्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया एकादशी व्रत व्यक्ति को मोक्ष और पुण्य फल प्रदान करता है।

  • अपरा एकादशी व्रत का महत्व क्या है? जानिए पूजा के नियम और सही तिथि

    अपरा एकादशी व्रत का महत्व क्या है? जानिए पूजा के नियम और सही तिथि


    नई दिल्ली ।  हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
    अपरा एकादशी 2026 की सही तिथि
    वर्ष 2026 में अपरा एकादशी का व्रत 13 मई, बुधवार को रखा जाएगा। उदया तिथि के अनुसार इसी दिन व्रत और पूजा करना शुभ माना गया है। बुधवार को पड़ने के कारण इस बार इस व्रत का महत्व और भी अधिक माना जा रहा है।
    अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
    धार्मिक ग्रंथों में अपरा एकादशी को अत्यंत फलदायी व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत सुख, शांति, धन, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ और तीर्थ स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जो लोग आर्थिक परेशानियों, मानसिक तनाव या जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना गया है।

    पूजा के नियम

    अपरा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें।
    पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है:
    ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और लहसुन, प्याज, चावल तथा तामसिक भोजन से दूरी बनानी चाहिए। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत भी रखते हैं। जरूरतमंदों को दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
    इन बातों का रखें ध्यान
    क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहें
    भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा श्रद्धा से करें
    तुलसी पूजा जरूर करें
    अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया अपरा एकादशी व्रत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लेकर आता है।

  • आज ज्येष्ठ का दूसरा बड़ा मंगल, जानिए हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

    आज ज्येष्ठ का दूसरा बड़ा मंगल, जानिए हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली ।
    आज 12 मई को ज्येष्ठ माह का दूसरा बड़ा मंगल मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी माह के मंगलवार को भगवान राम और हनुमान जी की पहली भेंट हुई थी। इसलिए ज्येष्ठ के मंगलवार को विशेष रूप से बजरंगबली की पूजा का महत्व माना जाता है।

    मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, पूजा-पाठ करने, दान देने और भंडारा करवाने से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हालांकि इस बार बड़ा मंगल पंचक काल में पड़ रहा है, जिसके चलते कई लोग पूजा के शुभ समय और पंचक के प्रभाव को लेकर सवाल कर रहे हैं।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    दूसरे बड़े मंगल पर पूजा का शुभ समय सुबह 8:55 बजे से दोपहर 1:59 बजे तक रहेगा। इसके अलावा शाम को भी पूजा की जा सकती है। संध्या पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7:03 बजे से रात 8:06 बजे तक बताया गया है। इस दिन हनुमान जी को चोला चढ़ाना बेहद शुभ माना जाता है।

    पंचक में भी कर सकते हैं पूजा
    इस बार बड़ा मंगल रोग पंचक में पड़ रहा है। सामान्य तौर पर पंचक में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है, लेकिन ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी की पूजा पंचक में भी की जा सकती है। कहा जाता है कि पंचमुखी हनुमान की आराधना करने से भय, तनाव और शत्रु बाधाएं दूर होती हैं। इस दौरान भंडारा करवाना भी शुभ माना गया है। हालांकि नए मांगलिक कार्य शुरू करने से बचने की सलाह दी गई है।

    ऐसे करें हनुमान जी की पूजा
    बड़ा मंगल पर हनुमान जी को सिंदूर, लाल चंदन और लाल फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। साथ ही चमेली के तेल का दीपक जलाने का भी विशेष महत्व है।

    भक्त इस मंत्र का जाप कर सकते हैं:-
    “ॐ नमो भगवते पंचवदनाय, पूर्वकपि मुखाय, सकल शत्रु संहारणाय स्वाहा।”
    इस दिन हनुमान चालीसा, हनुमान बीसा और सुंदरकांड का पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है। हालांकि पंचक के दौरान हवन और यज्ञ करने से बचने की सलाह दी गई है।

    इन बातों का रखें ध्यान
    – पूजा के दौरान काले और नीले रंग के कपड़े पहनने से बचें। लाल, पीले और सफेद रंग को शुभ माना गया है।
    – व्रत रखने वाले लोगों को गुस्सा और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए।
    – पूरे दिन सात्विक भोजन करें और मांसाहार व शराब से परहेज रखें।
    – ब्रह्मचर्य का पालन करना भी शुभ माना गया है।

  • बड़ा मंगल: भक्ति, सेवा और आस्था का पावन पर्व

    बड़ा मंगल: भक्ति, सेवा और आस्था का पावन पर्व



    नई दिल्ली। बड़ा मंगल हिंदू धर्म में भगवान हनुमान जी को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और लोकप्रिय पर्व है। यह विशेष रूप से ज्येष्ठ माह के मंगलवारों को मनाया जाता है। उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में इस पर्व को बड़े उत्साह, श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिलता है और जगह-जगह भंडारों का आयोजन होता है।

    बड़ा मंगल क्यों मनाया जाता है?
    बड़ा मंगल मनाने का मुख्य उद्देश्य भगवान Hanuman जी की आराधना करना और उनके आशीर्वाद से जीवन में शक्ति, साहस और संकटों से मुक्ति प्राप्त करना है।

    मान्यता है कि हनुमान जी संकटमोचक हैं और उनकी पूजा करने से:

    जीवन के कष्ट दूर होते हैं

    भय और नकारात्मकता समाप्त होती है

    आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है

    मंगल ग्रह से जुड़े दोषों का प्रभाव कम होता है

    जीवन में सुख, शांति और सफलता मिलती है

    बड़ा मंगल की शुरुआत और इतिहास
    बड़ा मंगल की परंपरा बहुत पुरानी मानी जाती है, हालांकि इसका कोई एक निश्चित ऐतिहासिक प्रमाणित आरंभ नहीं मिलता। यह परंपरा मुख्य रूप से अवध क्षेत्र से जुड़ी हुई है।

    ऐसा माना जाता है कि, यह परंपरा कई सौ वर्ष पुरानी हैमुगल काल और अवध के नवाबों के समय में यह परंपरा और अधिक लोकप्रिय हुईलखनऊ में हनुमान मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा का आयोजन शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे उत्तर भारत में फैल गई। समय के साथ यह पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक सेवा का भी प्रतीक बन गया।

    बड़ा मंगल की परंपराएं और आयोजन
    बड़ा मंगल के दिन देशभर में विशेष धार्मिक और सामाजिक आयोजन किए जाते हैं:

    1. विशेष पूजा और आरती
    हनुमान मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लगती है। हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और आरती का पाठ किया जाता है।

    2. भंडारे और लंगर
    इस दिन सबसे खास परंपरा भंडारे की होती है, जिसमें हजारों लोगों को मुफ्त भोजन कराया जाता है। यह सेवा भावना का प्रतीक है।

    3. सेवा कार्य
    भक्त गरीबों, जरूरतमंदों और राहगीरों की सेवा करते हैं, जो इस पर्व की सबसे सुंदर विशेषता है।

    4. भक्ति और जुलूस
    कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और धार्मिक जुलूस निकाले जाते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

    बड़ा मंगल का सामाजिक महत्व
    बड़ा मंगल केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सेवा भावना का भी प्रतीक है। यह दिन लोगों को जोड़ने का कार्य करता है और समाज में दया, करुणा और सहयोग की भावना को बढ़ाता है।इस दिन अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और सभी लोग एक साथ सेवा और भक्ति में शामिल होते हैं।

    बड़ा मंगल का आधुनिक महत्व
    आज के समय में भी बड़ा मंगल की परंपरा उतनी ही मजबूत है। बदलते समय के साथ डिजिटल माध्यमों से भी भक्ति कार्यक्रम साझा किए जाते हैंबड़े स्तर पर भंडारों का आयोजन होता हैयुवा पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ रही हैयह पर्व आधुनिक समाज में भी आस्था और सेवा का संतुलन बनाए हुए है।बड़ा मंगल हमें यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और मानवता में निहित है। हनुमान जी की आराधना हमें जीवन में शक्ति, साहस और सकारात्मकता प्रदान करती है।यह पर्व हर साल भक्तों को यह याद दिलाता है कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और मानवता की सेवा ही सच्ची पूजा है।

  • गुरु प्रदोष व्रत 2026: 14 मई को बन रहा शुभ योग, शिव कृपा से पूरी होंगी मनोकामनाएं, जानें मुहूर्त और पूजा विधि

    गुरु प्रदोष व्रत 2026: 14 मई को बन रहा शुभ योग, शिव कृपा से पूरी होंगी मनोकामनाएं, जानें मुहूर्त और पूजा विधि



    नई दिल्ली। मई 2026 का पहला प्रदोष व्रत 14 मई, गुरुवार को रखा जाएगा, जिसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ रहा है और इसका विशेष महत्व इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह भगवान शिव को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करने पर जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि 14 मई को दिन में लगभग 11:21 बजे शुरू होकर 15 मई सुबह 8:32 बजे तक रहेगी। लेकिन प्रदोष काल (संध्या समय) में तिथि होने के कारण व्रत 14 मई को ही रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:22 बजे से 7:04 बजे तक रहेगा, जो शिव आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति को शत्रुओं पर विजय, मानसिक शांति और जीवन में स्थिरता मिलती है। इसके साथ ही जिन लोगों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर होता है, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।

    व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर घी का दीपक जलाकर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। दिनभर शिव नाम का जप और सात्त्विक विचार रखने की सलाह दी जाती है। शाम के समय शिव मंदिर में जाकर पंचामृत से अभिषेक, बेलपत्र अर्पण, चंदन और दीपदान करना अत्यंत शुभ माना गया है।

    पूजा के अंत में गुरु प्रदोष व्रत कथा का पाठ और आरती की जाती है। प्रसाद का वितरण परिवार में करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

  • निर्जला एकादशी 2026: सबसे पवित्र व्रत का शुभ समय, पूजा विधि और भीमसेनी एकादशी का महत्व

    निर्जला एकादशी 2026: सबसे पवित्र व्रत का शुभ समय, पूजा विधि और भीमसेनी एकादशी का महत्व



    नई दिल्ली। निर्जला एकादशी को हिंदू धर्म की सभी एकादशियों में सबसे कठिन और अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। इस दिन बिना जल और अन्न ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस एक व्रत को करने से पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है, जिससे पापों का नाश और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    निर्जला एकादशी 2026 कब है?
    हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून 2026 को शाम 6:13 बजे होगी और इसका समापन 25 जून 2026 को शाम 8:10 बजे होगा।
    उदयातिथि के आधार पर इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026 (गुरुवार) को रखा जाएगा।

    पूजा और व्रत का महत्व
    निर्जला एकादशी के दिन भक्त पूरे दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इस व्रत में तुलसी पत्र, पीले फूल, दीपक और विष्णु सहस्रनाम का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। यह व्रत आत्मसंयम, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खोलता है।

    निर्जला एकादशी 2026 पारण समय
    एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है।
    इस वर्ष व्रत का पारण 26 जून 2026 (शुक्रवार) को किया जाएगा।
    पारण का शुभ समय सुबह 5:41 बजे से 8:25 बजे तक रहेगा।

    इसे भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
    पौराणिक मान्यता के अनुसार, पांडवों में भीमसेन अत्यधिक भूख के कारण अन्य एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। तब महर्षि वेद व्यास ने उन्हें वर्ष की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य पाने के लिए निर्जला एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाता है।

    निर्जला एकादशी न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आत्मसंयम और भक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा भी मानी जाती है। जो भक्त सच्चे मन से यह व्रत करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है।

  • वट सावित्री व्रत 2026: राशि अनुसार मंत्र जाप से बढ़ेगा सौभाग्य और सुख-शांति

    वट सावित्री व्रत 2026: राशि अनुसार मंत्र जाप से बढ़ेगा सौभाग्य और सुख-शांति




    नई दिल्ली । वट सावित्री व्रत 2026 इस वर्ष 16 मई को ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाया जाएगा, जिसमें सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद) की पूजा कर अपने पति की लंबी उम्र, सुख और समृद्ध वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने और वट वृक्ष की परिक्रमा करने से सौभाग्य और पारिवारिक सुख में वृद्धि होती है।

    शास्त्रों के अनुसार वट सावित्री पूजा के दौरान यदि महिलाएं अपनी राशि के अनुसार मंत्रों का जाप करें तो इसका प्रभाव और अधिक शुभ माना जाता है। ऐसा करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और वैवाहिक जीवन में स्थिरता मिलती है। इस दिन शिव, विष्णु और देवी से जुड़े मंत्रों का जप विशेष फलदायी माना गया है।

    मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि के लिए अलग-अलग मंत्र बताए गए हैं, जिनका जाप श्रद्धा भाव से करने पर जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य बढ़ता है। यह परंपरा भारतीय संस्कृति में पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख का प्रतीक मानी जाती है और वर्षों से महिलाएं इसे श्रद्धापूर्वक निभाती आ रही हैं।