Tag: Hindu festival

  • डोल ग्यारस के दिन जरूर करें भगवान विष्णु की पूजा जानिए शुभ मान्यता और इस पर्व से जुड़ी खास परंपराएं

    डोल ग्यारस के दिन जरूर करें भगवान विष्णु की पूजा जानिए शुभ मान्यता और इस पर्व से जुड़ी खास परंपराएं


    नई दिल्ली। डोल ग्यारस हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। इसे जलझूलनी एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में इस दिन भगवान की विशेष पूजा अर्चना की जाती है और मंदिरों से डोल यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में इसमें शामिल होकर भगवान के दर्शन करते हैं और सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

    डोल ग्यारस का पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। कई स्थानों पर भगवान की प्रतिमा को सुंदर तरीके से सजाकर डोल में विराजमान किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु भगवान को जलाशय या नदी के किनारे ले जाते हैं। वहां पूजा अर्चना और जल से संबंधित धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। इसी वजह से इस पर्व को जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है।

    डोल ग्यारस के दिन व्रत रखने की परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और धार्मिक मान्यता के अनुसार उपवास रखते हैं। कुछ लोग पूरे दिन निर्जला व्रत करते हैं जबकि कई श्रद्धालु फलाहार करते हैं। सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पूजा में भगवान को पीले फूल तुलसी की पत्तियां फल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। विष्णु मंत्र का जाप करने के साथ भगवान की आरती की जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करने से मन को शांति मिलती है।

    इस पर्व से जुड़ी डोल यात्रा सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है। कई शहरों और गांवों में मंदिरों से भगवान की सवारी निकाली जाती है। डोल को फूलों और रंग बिरंगी सजावट से सजाया जाता है। श्रद्धालु भजन और कीर्तन करते हुए यात्रा में शामिल होते हैं। कई जगहों पर ढोल नगाड़ों के साथ भगवान की सवारी निकाली जाती है। मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं और पूरे वातावरण में धार्मिक उत्साह नजर आता है।

    डोल ग्यारस को लेकर एक धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान विष्णु के शयनकाल में परिवर्तन होता है। इसी कारण यह तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। श्रद्धालु इस दिन दान पुण्य भी करते हैं। जरूरतमंद लोगों को भोजन वस्त्र और अन्य आवश्यक सामग्री देना शुभ माना जाता है। कई लोग गौ सेवा और धार्मिक स्थलों पर सेवा कार्य भी करते हैं।

    डोल ग्यारस केवल पूजा और व्रत का पर्व नहीं है बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। डोल यात्रा में अलग अलग वर्गों के लोग एक साथ शामिल होते हैं। मंदिरों में होने वाले आयोजन लोगों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। यही वजह है कि आज भी डोल ग्यारस का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा और डोल यात्रा के साथ यह पर्व लोगों के जीवन में सुख शांति और सकारात्मकता की कामना का संदेश देता है।

  • हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी आज एक साथ बना खास संयोग सुबह निर्जला व्रत तो दोपहर में होगी बप्पा की स्थापना

    हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी आज एक साथ बना खास संयोग सुबह निर्जला व्रत तो दोपहर में होगी बप्पा की स्थापना


    भोपाल। भोपाल में आज धार्मिक आस्था का अनोखा संगम देखने को मिलेगा। हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही दिन पड़ने से शहर में सुबह से लेकर रात तक धार्मिक आयोजनों की रौनक बनी रहेगी। दिन की शुरुआत महिलाओं के निर्जला व्रत से होगी। इसके बाद दोपहर में शुभ मुहूर्त में घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की स्थापना की जाएगी। शाम को प्रदोष काल में महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन करेंगी। इसके बाद रातभर जागरण और आराधना का सिलसिला चलेगा।

    तिथि भेद के कारण इस बार हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का यह विशेष संयोग बना है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 14 सितंबर की सुबह 7 बजकर 6 मिनट तक तृतीया तिथि रहेगी। इसके बाद चतुर्थी तिथि का आरंभ होगा। गणेश प्रतिमा स्थापना के लिए सुबह 11 बजकर 2 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसी अवधि में घरों और गणेश पंडालों में विधि-विधान से भगवान गणेश की स्थापना की जाएगी।

    हरतालिका तीज के अवसर पर महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखेंगी। शाम को प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाएगी। मान्यता के अनुसार महिलाएं इस दौरान सुखी दांपत्य जीवन और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। पूजन के बाद रातभर जागरण कर तीज की पूजा और आराधना की जाएगी। इस वजह से आज शहर के कई इलाकों में देर रात तक धार्मिक गतिविधियां जारी रहने की संभावना है।

    गणेश उत्सव को लेकर भी भोपाल में तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। शहर में 300 से अधिक बड़े गणेश पंडाल सजकर तैयार हैं जबकि 700 से ज्यादा छोटी झांकियां और अन्य धार्मिक आयोजन भी बनाए गए हैं। रविवार सुबह से ही कई स्थानों पर गणपति बप्पा की अगवानी शुरू हो गई थी। सोमवार को शुभ मुहूर्त में गणेश प्रतिमाओं की स्थापना के साथ उत्सव का विधिवत आगाज होगा।

    टीटी नगर जहांगीराबाद जवाहर चौक कोलार मंगलवारा और बरखेड़ा पठानी सहित कई इलाकों में गणेश प्रतिमाओं की दुकानें सजी हुई हैं। रविवार को बड़ी संख्या में लोग अपने घरों और पंडालों के लिए भगवान गणेश की प्रतिमाएं खरीदते नजर आए। बाजारों में गणेश प्रतिमाओं के साथ पूजा सामग्री और सजावट की वस्तुओं की भी मांग रही।

    वहीं हरतालिका तीज को लेकर भी शहर के प्रमुख बाजारों में महिलाओं की भीड़ दिखाई दी। न्यू मार्केट और दस नंबर समेत कई बाजारों में महिलाओं ने चूड़ी मेहंदी साड़ी और साज-श्रृंगार की सामग्री खरीदी। पूजन सामग्री की दुकानों पर भी दिनभर ग्राहकों की आवाजाही रही।

    तीज और गणेश चतुर्थी के बाद धार्मिक पर्वों का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। 15 सितंबर को ऋषि पंचमी मनाई जाएगी। इस दिन सप्त ऋषियों और अरुंधती का पूजन किया जाएगा। इसके बाद 19 सितंबर को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में भी भोपाल में धार्मिक आयोजनों और आस्था से जुड़े कार्यक्रमों की रौनक बनी रहेगी

  • गणेश चतुर्थी पर क्यों खास मानी जाती है गणपति पूजा जानिए बप्पा की स्थापना से लेकर विसर्जन तक की पूरी जानकारी

    गणेश चतुर्थी पर क्यों खास मानी जाती है गणपति पूजा जानिए बप्पा की स्थापना से लेकर विसर्जन तक की पूरी जानकारी


    नई दिल्ली। गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश को बुद्धि विवेक सुख समृद्धि और शुभता का देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणपति का स्मरण करने की परंपरा है। यही वजह है कि गणेश चतुर्थी के अवसर पर घरों और सार्वजनिक स्थानों पर गणपति की प्रतिमा स्थापित करके विधि विधान से पूजा की जाती है। इस पर्व के दौरान भक्त भगवान गणेश से परिवार की सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
    गणेश चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद घर और पूजा स्थल की साफ सफाई करनी चाहिए। पूजा के स्थान को स्वच्छ करके वहां गणपति की प्रतिमा स्थापित की जाती है। मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करते समय श्रद्धा और शुद्ध भावना का विशेष महत्व होता है। पूजा के दौरान गणेश जी को दूर्वा अर्पित की जाती है। दूर्वा को भगवान गणेश का प्रिय माना जाता है। इसके साथ ही मोदक और अन्य मिठाइयों का भोग लगाया जाता है।

    गणपति पूजा में सिंदूर और लाल फूल अर्पित करने की भी परंपरा है। भक्त भगवान गणेश का ध्यान करते हुए मंत्रों का जाप करते हैं और आरती करते हैं। पूजा के दौरान परिवार के सभी सदस्य एक साथ शामिल होकर भगवान गणेश से अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की प्रार्थना कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा गया है इसलिए भक्त उनसे जीवन में आने वाली परेशानियों को दूर करने की कामना करते हैं।

    गणेश चतुर्थी केवल पूजा का पर्व नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। कई स्थानों पर बड़े पंडाल लगाए जाते हैं जहां श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। घरों में भी कई परिवार अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार गणपति की स्थापना करते हैं। गणेश उत्सव के दौरान भजन कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस दौरान पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है। गणपति की प्रतिमा और सजावट के लिए पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प माना जाता है।

    गणेश प्रतिमा का विसर्जन भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अलग अलग परिवार और परंपराएं अपनी मान्यता के अनुसार गणपति विसर्जन का दिन तय करती हैं। विसर्जन से पहले भगवान गणेश की विधिवत पूजा और आरती की जाती है। भक्त गणपति से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हुए श्रद्धा के साथ प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थानों और कृत्रिम विसर्जन कुंडों का इस्तेमाल करना बेहतर होता है।

    गणेश चतुर्थी का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन में बुद्धि विवेक अनुशासन और सकारात्मक सोच को अपनाने की प्रेरणा भी देता है। भगवान गणेश की पूजा करते समय दिखावे से अधिक श्रद्धा और स्वच्छ भावना को महत्व देना चाहिए। यही इस पावन पर्व की सबसे बड़ी भावना मानी जाती है।

  • Krishna Janmashtami 2026: कब होगा लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव? जानें अष्टमी तिथि महानिशीथ काल और पूजा का सही समय

    Krishna Janmashtami 2026: कब होगा लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव? जानें अष्टमी तिथि महानिशीथ काल और पूजा का सही समय


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बेहद खास माना जाता है। हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस दिन देशभर में भक्त व्रत रखते हैं और रात के समय भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विशेष पूजा करते हैं। इस बार जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है लेकिन पंचांग गणना के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज 4 सितंबर 2026 शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन मंदिरों और घरों में कान्हा के जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां की जाएंगी।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में मध्यरात्रि के समय का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन भक्त सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन भगवान कृष्ण का स्मरण करते हैं। घरों में लड्डू गोपाल के लिए पालना सजाया जाता है। उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और फूलों से श्रृंगार किया जाता है। मंदिरों में भी जन्माष्टमी के लिए विशेष सजावट की जाती है।

    पंचांग के अनुसार इस वर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि और जन्मोत्सव की परंपरा को ध्यान में रखते हुए 4 सितंबर को ही जन्माष्टमी का व्रत रखा जाएगा। इसी वजह से 3 सितंबर या 5 सितंबर को लेकर जो भ्रम है उसे दूर किया जा सकता है।

    जन्माष्टमी के दिन पूजा के लिए कई शुभ समय बताए गए हैं। सुबह 5 बजकर 46 मिनट से 10 बजकर 26 मिनट तक पूजा का समय रहेगा। इसके बाद दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 1 बजकर 33 मिनट तक भी पूजा की जा सकती है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 36 मिनट से दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक बताया गया है। शाम के समय 4 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 14 मिनट तक और रात में 9 बजकर 7 मिनट से 10 बजकर 33 मिनट तक पूजा का समय रहेगा। इसके अलावा रात 12 बजकर 5 मिनट से सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक भी पूजा के लिए समय बताया गया है।

    जन्माष्टमी की सबसे खास पूजा महानिशीथ काल में मानी जाती है। इस साल महानिशीथ काल रात 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इसी दौरान भक्त श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएंगे। लड्डू गोपाल का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करने के बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाएंगे। मुकुट मोरपंख आभूषण और फूलों की माला से उनका श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद भगवान को पालने में विराजमान कर झूला झुलाया जाएगा और माखन मिश्री पंजीरी सहित सात्विक भोग अर्पित किया जाएगा।

    इस साल जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बताया गया है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण का रोहिणी नक्षत्र से विशेष संबंध माना जाता है। पंचांग के अनुसार रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 12 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर रात 11 बजकर 4 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा हर्षण योग बुधादित्य योग हंस योग और मालव्य योग जैसे शुभ योग बनने की बात भी कही गई है।

    जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले भक्त अगले दिन यानी 5 सितंबर को पारण करेंगे। धर्मशास्त्रीय परंपरा के अनुसार सूर्योदय के बाद सुबह 6 बजे के पश्चात पारण किया जा सकता है। हालांकि अलग अलग क्षेत्रों में पंचांग और स्थानीय परंपरा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण का समय देखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी पर श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से सुख शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।

  • गुरु पूर्णिमा 2026 पर भूलकर भी न करें ये गलतियां जानें पूजा विधि महत्व और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी

    गुरु पूर्णिमा 2026 पर भूलकर भी न करें ये गलतियां जानें पूजा विधि महत्व और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा का पर्व ज्ञान श्रद्धा और गुरु भक्ति का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। यह दिन केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं बल्कि माता पिता शिक्षक और जीवन में सही मार्ग दिखाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर होता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से गुरु की पूजा करने और उनका आशीर्वाद लेने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं तथा सफलता के नए मार्ग खुलते हैं।

    वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई बुधवार को मनाई जाएगी। यह पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया और महाभारत सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना की थी। इसी कारण उन्हें आदिगुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है।

    गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर भगवान विष्णु भगवान शिव और महर्षि वेदव्यास का स्मरण करें। यदि आपके गुरु मौजूद हैं तो उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और यदि गुरु दूर हैं तो मन ही मन उनका ध्यान करके कृतज्ञता प्रकट करें। गुरु को फल मिठाई वस्त्र या अपनी श्रद्धा के अनुसार कोई उपहार अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

    इस दिन गुरु मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। गुरु ही व्यक्ति को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य और ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसलिए इस दिन गुरु की सेवा और सम्मान को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।

    गुरु पूर्णिमा पर दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र पुस्तकें या दक्षिणा देना शुभ माना जाता है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है क्योंकि गुरु का आशीर्वाद शिक्षा और करियर में सफलता दिलाने वाला माना गया है। कई लोग इस दिन धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन शुरू करते हैं या नई शिक्षा ग्रहण करने का संकल्प लेते हैं।

    यदि किसी कारणवश आप अपने गुरु के पास नहीं जा सकते तो उनके चित्र के सामने दीपक जलाकर प्रणाम करें और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही सच्ची गुरु भक्ति मानी जाती है। इस दिन क्रोध अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए तथा संयम और विनम्रता का पालन करना चाहिए।

    गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि जीवन में ज्ञान अनुशासन संस्कार और सकारात्मक सोच को अपनाने की प्रेरणा देने वाला उत्सव भी है। जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु का सम्मान करता है उसके जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है और सफलता के नए द्वार खुलते हैं। इसलिए इस पावन अवसर पर गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को नई दिशा देने का संकल्प अवश्य लें।

    गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त ( Guru Purnima 2026 Pujan Shubh Muhurat)

    29 जुलाई को दिनभर पूर्णिमा तिथि रहने के कारण गुरु पूजन और स्नान-दान के लिए पूरा दिन शुभ रहेगा.

    स्नान दान का मुहूर्त- सुबह 4 4 बजकर 17 मिनट से लेकर सुबह 4 बजकर 59 मिनट तक रहेगा.

    प्रातःकाल पूजा का मुहूर्त: सुबह 05:40 बजे से सुबह 09:05 बजे तक

    अभिजित व शुभ चौघड़िया मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:55 बजे तक

    संध्या पूजा मुहूर्त: शाम 05:30 बजे से शाम 07:15 बजे तक

  • मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे आसान उपाय शुक्रवार की पूजा में रखें इन नियमों का ध्यान मिलेगा सुख समृद्धि और वैभव

    मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे आसान उपाय शुक्रवार की पूजा में रखें इन नियमों का ध्यान मिलेगा सुख समृद्धि और वैभव


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सच्ची श्रद्धा और पूर्ण विधि विधान से माता लक्ष्मी की पूजा करने वाले भक्तों पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है। जिन घरों में नियमित रूप से शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन किया जाता है वहां सुख समृद्धि वैभव और खुशहाली का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केवल पूजा करना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि पूजा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। इन नियमों का पालन करने से माता लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं और जीवन में आर्थिक उन्नति के साथ मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।

    शुक्रवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ और हल्के रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के मंदिर और मुख्य द्वार की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए क्योंकि स्वच्छता को माता लक्ष्मी का सबसे प्रिय गुण माना गया है। घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाना और दीपक जलाना भी शुभ फलदायी माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

    पूजा के समय माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ लाल या गुलाबी वस्त्र पर स्थापित करें। देवी को कमल का फूल अर्पित करना सबसे शुभ माना गया है। इसके साथ लाल पुष्प अक्षत रोली हल्दी चंदन धूप दीप और नैवेद्य अर्पित करें। माता को खीर बताशे मिश्री सफेद मिठाई या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा के दौरान श्रीसूक्त लक्ष्मी चालीसा और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

    शुक्रवार के दिन घर में किसी भी प्रकार का कलह विवाद या कटु वचन बोलने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि जिस घर में प्रेम शांति और सम्मान का वातावरण रहता है वहां माता लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करती हैं। इस दिन क्रोध अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहना भी आवश्यक माना गया है।

    यदि संभव हो तो शुक्रवार का व्रत रखें और सात्विक भोजन ग्रहण करें। लहसुन प्याज और तामसिक भोजन से परहेज करना शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन सफेद रंग की वस्तुओं का दान भी करते हैं। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र या धन का दान करने से माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आर्थिक बाधाएं धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं।

    शुक्रवार की शाम घर के मंदिर और मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की पवित्र ज्योति घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और सुख समृद्धि का मार्ग खोलती है। पूजा के बाद पूरे परिवार के साथ माता लक्ष्मी की आरती करना और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इससे परिवार में एकता प्रेम और सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

    धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि माता लक्ष्मी केवल धन ही नहीं बल्कि सौभाग्य संतोष सफलता और खुशहाली की भी प्रतीक हैं। इसलिए उनकी पूजा केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं बल्कि सदाचार ईमानदारी और परिश्रम के साथ जीवन को बेहतर बनाने की भावना से करनी चाहिए। सच्ची श्रद्धा स्वच्छ मन और नियमों के साथ की गई शुक्रवार की पूजा व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि और नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।

  • शुक्रवार का व्रत ऐसे करें मां लक्ष्मी बरसाएंगी धन और सुख समृद्धि जानें पूजा से लेकर पारण तक के नियम

    शुक्रवार का व्रत ऐसे करें मां लक्ष्मी बरसाएंगी धन और सुख समृद्धि जानें पूजा से लेकर पारण तक के नियम


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन वैभव ऐश्वर्य और सुख समृद्धि की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी तथा मां संतोषी की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं परिवार में खुशहाली आती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जो लोग लंबे समय से धन संबंधी समस्याओं नौकरी व्यापार में रुकावट या पारिवारिक तनाव का सामना कर रहे हैं उनके लिए शुक्रवार का व्रत विशेष फलदायी माना गया है। हालांकि इस व्रत का पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसे विधि विधान और निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाए।

    शुक्रवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ या सफेद अथवा गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर की साफ सफाई कर मां लक्ष्मी और मां संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा के दौरान कमल का फूल सफेद पुष्प धूप दीप चंदन अक्षत और मिठाई अर्पित करना शुभ माना जाता है। मां लक्ष्मी को खीर बताशे या सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है जबकि मां संतोषी को गुड़ और चने का प्रसाद अर्पित किया जाता है।

    व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन मन और वाणी दोनों पर संयम रखना चाहिए। किसी के प्रति कटु शब्द बोलने झूठ कहने क्रोध करने या विवाद में पड़ने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार का व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन की शुद्धता और सकारात्मक सोच का भी प्रतीक है। इस दिन दान पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को भोजन वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता देने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

    यदि आप मां संतोषी का व्रत कर रहे हैं तो इस दिन खट्टी चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाता है। नींबू इमली अचार कच्चा आम या किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु खाने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। वहीं मां लक्ष्मी के व्रत में सात्विक भोजन ग्रहण करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक माना गया है।

    शाम के समय दीपक जलाकर मां लक्ष्मी की आरती करें और श्रीसूक्त कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी मंत्र का जाप करें। परिवार के साथ मिलकर आरती करने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है और सुख समृद्धि का वास होता है। पूजा के बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटें और अगले दिन श्रद्धापूर्वक व्रत का पारण करें।

    ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित रूप से शुक्रवार का व्रत करने से धन लाभ के नए अवसर प्राप्त होते हैं वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख शांति बनी रहती है। यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि आत्मसंयम सकारात्मक सोच और सेवा भावना को मजबूत करने का भी एक प्रभावी माध्यम माना जाता है।

  • मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का अचूक उपाय शुक्रवार व्रत की पूरी विधि पूजा नियम और शुभ फल

    मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का अचूक उपाय शुक्रवार व्रत की पूरी विधि पूजा नियम और शुभ फल


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखकर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं उनके जीवन में आर्थिक समृद्धि सुख शांति और वैभव का आगमन होता है। यह व्रत केवल धन प्राप्ति का माध्यम नहीं बल्कि मन की शुद्धि सकारात्मक ऊर्जा और परिवार में सुखद वातावरण स्थापित करने का भी महत्वपूर्ण साधन माना गया है।

    शुक्रवार के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ और विशेष रूप से सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के पूजा स्थान की साफ सफाई कर मां लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। पूजा स्थल पर सफेद या लाल वस्त्र बिछाकर मां लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद कमल का फूल गुलाब या सुगंधित पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मां को खीर बताशे मिश्री सफेद मिठाई नारियल और मौसमी फल का भोग लगाया जाता है।

    पूजा के दौरान श्रीसूक्त लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र कनकधारा स्तोत्र अथवा लक्ष्मी चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करना लाभकारी माना जाता है। इसके साथ ही ओम श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी की आरती करें और पूरे परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक आचरण अपनाते हैं। कई लोग केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ श्रद्धालु एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन लहसुन प्याज मांस मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है। साथ ही किसी का अपमान करने कटु वचन बोलने या क्रोध करने से भी बचना चाहिए क्योंकि मां लक्ष्मी को शांति स्वच्छता और सदाचार अत्यंत प्रिय माने गए हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार शुक्रवार के दिन जरूरतमंद लोगों को सफेद वस्त्र चावल चीनी दूध दही या मिठाई का दान करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली आर्थिक परेशानियां धीरे धीरे दूर होने लगती हैं। घर में स्वच्छता बनाए रखना और शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाना भी शुभ फलदायी माना गया है।

    ज्योतिष के अनुसार शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह से भी माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र कमजोर हो तो शुक्रवार का व्रत और मां लक्ष्मी की आराधना लाभदायक मानी जाती है। इससे वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होने की मान्यता है।

    धार्मिक आस्था के साथ किया गया शुक्रवार का व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला माना जाता है। नियमित रूप से इस व्रत का पालन करने से आत्मविश्वास बढ़ता है मन को शांति मिलती है और परिवार में प्रेम सौहार्द तथा समृद्धि का वातावरण बनता है। श्रद्धा विश्वास और सच्चे मन से मां लक्ष्मी की आराधना करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।

  • 14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात

    14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात


    नई दिल्ली । 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है। मंगलवार के साथ अमावस्या का संयोग बनने के कारण इसे भौमवती अमावस्या कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि स्नान दान पितरों के तर्पण और भगवान हनुमान की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि विधान से किए गए धार्मिक कार्यों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार आषाढ़ अमावस्या की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर पितरों का स्मरण किया जाता है। जिन लोगों के लिए संभव हो वे तिल और जल से पितरों का तर्पण भी कर सकते हैं। मान्यता है कि इससे पितृ दोष के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    चूंकि इस बार अमावस्या मंगलवार को पड़ रही है इसलिए भगवान हनुमान की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन हनुमान मंदिर में जाकर सिंदूर चमेली का तेल लाल फूल और गुड़ चने का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक शांति साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।

    आषाढ़ अमावस्या पर दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र तिल गुड़ फल या दक्षिणा का दान करना पुण्यदायी माना जाता है। गाय को हरा चारा खिलाना और पक्षियों को दाना पानी देना भी शुभ माना जाता है। इन कार्यों को सेवा और करुणा की भावना से करने की परंपरा रही है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन एक सरल उपाय भी किया जाता है। शाम के समय दो या तीन लौंग के साथ कपूर जलाकर पूरे घर में उसका धुआं किया जाता है। मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक वातावरण बनता है। हालांकि इसे धार्मिक आस्था का हिस्सा माना जाता है और इसके आध्यात्मिक महत्व को ही प्रमुखता दी जाती है।

    आषाढ़ अमावस्या के दिन क्रोध झूठ और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। सात्विक भोजन करना ईश्वर का स्मरण करना और जरूरतमंद लोगों की सहायता करना इस दिन के शुभ कार्यों में शामिल माना गया है। कई श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखकर दिनभर पूजा पाठ और दान पुण्य करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भौमवती अमावस्या आत्मचिंतन सेवा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए स्नान दान तर्पण और हनुमान जी की आराधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होने की मान्यता है। हालांकि इन मान्यताओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

  • निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल

    निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधि विधान से निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें वर्ष भर की 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून गुरुवार को रखा जाएगा लेकिन इसकी तैयारी और नियम एक दिन पहले दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब श्रद्धालु दशमी तिथि से ही संयम और नियमों का पालन शुरू कर दें। इस दिन भोजन और दिनचर्या दोनों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

    दशमी तिथि के दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन में प्याज लहसुन और तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शाम के समय सूर्यास्त से पहले हल्का और सुपाच्य भोजन कर लेना उचित माना गया है। इसके बाद अन्न का त्याग कर देना चाहिए। कई श्रद्धालु दशमी की रात से ही जल का सेवन भी बंद कर देते हैं ताकि अगले दिन निर्जला व्रत का पालन पूरी निष्ठा के साथ कर सकें।

    एकादशी के दिन बाल धोना शुभ नहीं माना जाता इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को दशमी तिथि में ही स्नान के साथ बाल धो लेने चाहिए। इससे व्रत के दिन किसी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती और धार्मिक नियमों का पालन भी हो जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है। बिना तुलसी के विष्णु पूजन अधूरा माना जाता है। हालांकि एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को स्पर्श करना या पत्तियां तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि में ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी माता को दूर से प्रणाम कर दीपक अर्पित किया जा सकता है।

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दशमी तिथि की रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया गया यह संकल्प व्रत की सफलता का आधार माना जाता है। इसके बाद व्रती को द्वादशी तिथि में पारण होने तक नियमों का पालन करना चाहिए।

    निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का महापर्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा आराधना जप और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए यदि आप इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत रखने जा रहे हैं तो दशमी तिथि से ही इसकी तैयारी शुरू कर लें ताकि आपको व्रत का संपूर्ण और शुभ फल प्राप्त हो सके।