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  • गुरु पूर्णिमा 2026 पर भूलकर भी न करें ये गलतियां जानें पूजा विधि महत्व और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी

    गुरु पूर्णिमा 2026 पर भूलकर भी न करें ये गलतियां जानें पूजा विधि महत्व और शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा का पर्व ज्ञान श्रद्धा और गुरु भक्ति का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। यह दिन केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं बल्कि माता पिता शिक्षक और जीवन में सही मार्ग दिखाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर होता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से गुरु की पूजा करने और उनका आशीर्वाद लेने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं तथा सफलता के नए मार्ग खुलते हैं।

    वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई बुधवार को मनाई जाएगी। यह पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया और महाभारत सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना की थी। इसी कारण उन्हें आदिगुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है।

    गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर भगवान विष्णु भगवान शिव और महर्षि वेदव्यास का स्मरण करें। यदि आपके गुरु मौजूद हैं तो उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और यदि गुरु दूर हैं तो मन ही मन उनका ध्यान करके कृतज्ञता प्रकट करें। गुरु को फल मिठाई वस्त्र या अपनी श्रद्धा के अनुसार कोई उपहार अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

    इस दिन गुरु मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। गुरु ही व्यक्ति को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य और ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसलिए इस दिन गुरु की सेवा और सम्मान को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।

    गुरु पूर्णिमा पर दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र पुस्तकें या दक्षिणा देना शुभ माना जाता है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है क्योंकि गुरु का आशीर्वाद शिक्षा और करियर में सफलता दिलाने वाला माना गया है। कई लोग इस दिन धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन शुरू करते हैं या नई शिक्षा ग्रहण करने का संकल्प लेते हैं।

    यदि किसी कारणवश आप अपने गुरु के पास नहीं जा सकते तो उनके चित्र के सामने दीपक जलाकर प्रणाम करें और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही सच्ची गुरु भक्ति मानी जाती है। इस दिन क्रोध अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए तथा संयम और विनम्रता का पालन करना चाहिए।

    गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि जीवन में ज्ञान अनुशासन संस्कार और सकारात्मक सोच को अपनाने की प्रेरणा देने वाला उत्सव भी है। जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु का सम्मान करता है उसके जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है और सफलता के नए द्वार खुलते हैं। इसलिए इस पावन अवसर पर गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को नई दिशा देने का संकल्प अवश्य लें।

    गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त ( Guru Purnima 2026 Pujan Shubh Muhurat)

    29 जुलाई को दिनभर पूर्णिमा तिथि रहने के कारण गुरु पूजन और स्नान-दान के लिए पूरा दिन शुभ रहेगा.

    स्नान दान का मुहूर्त- सुबह 4 4 बजकर 17 मिनट से लेकर सुबह 4 बजकर 59 मिनट तक रहेगा.

    प्रातःकाल पूजा का मुहूर्त: सुबह 05:40 बजे से सुबह 09:05 बजे तक

    अभिजित व शुभ चौघड़िया मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:55 बजे तक

    संध्या पूजा मुहूर्त: शाम 05:30 बजे से शाम 07:15 बजे तक

  • मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे आसान उपाय शुक्रवार की पूजा में रखें इन नियमों का ध्यान मिलेगा सुख समृद्धि और वैभव

    मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का सबसे आसान उपाय शुक्रवार की पूजा में रखें इन नियमों का ध्यान मिलेगा सुख समृद्धि और वैभव


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सच्ची श्रद्धा और पूर्ण विधि विधान से माता लक्ष्मी की पूजा करने वाले भक्तों पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है। जिन घरों में नियमित रूप से शुक्रवार को लक्ष्मी पूजन किया जाता है वहां सुख समृद्धि वैभव और खुशहाली का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केवल पूजा करना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि पूजा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। इन नियमों का पालन करने से माता लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं और जीवन में आर्थिक उन्नति के साथ मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।

    शुक्रवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ और हल्के रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के मंदिर और मुख्य द्वार की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए क्योंकि स्वच्छता को माता लक्ष्मी का सबसे प्रिय गुण माना गया है। घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाना और दीपक जलाना भी शुभ फलदायी माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

    पूजा के समय माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ लाल या गुलाबी वस्त्र पर स्थापित करें। देवी को कमल का फूल अर्पित करना सबसे शुभ माना गया है। इसके साथ लाल पुष्प अक्षत रोली हल्दी चंदन धूप दीप और नैवेद्य अर्पित करें। माता को खीर बताशे मिश्री सफेद मिठाई या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा के दौरान श्रीसूक्त लक्ष्मी चालीसा और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

    शुक्रवार के दिन घर में किसी भी प्रकार का कलह विवाद या कटु वचन बोलने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि जिस घर में प्रेम शांति और सम्मान का वातावरण रहता है वहां माता लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करती हैं। इस दिन क्रोध अहंकार और नकारात्मक विचारों से दूर रहना भी आवश्यक माना गया है।

    यदि संभव हो तो शुक्रवार का व्रत रखें और सात्विक भोजन ग्रहण करें। लहसुन प्याज और तामसिक भोजन से परहेज करना शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन सफेद रंग की वस्तुओं का दान भी करते हैं। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र या धन का दान करने से माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आर्थिक बाधाएं धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं।

    शुक्रवार की शाम घर के मंदिर और मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की पवित्र ज्योति घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और सुख समृद्धि का मार्ग खोलती है। पूजा के बाद पूरे परिवार के साथ माता लक्ष्मी की आरती करना और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इससे परिवार में एकता प्रेम और सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

    धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि माता लक्ष्मी केवल धन ही नहीं बल्कि सौभाग्य संतोष सफलता और खुशहाली की भी प्रतीक हैं। इसलिए उनकी पूजा केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं बल्कि सदाचार ईमानदारी और परिश्रम के साथ जीवन को बेहतर बनाने की भावना से करनी चाहिए। सच्ची श्रद्धा स्वच्छ मन और नियमों के साथ की गई शुक्रवार की पूजा व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि और नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।

  • शुक्रवार का व्रत ऐसे करें मां लक्ष्मी बरसाएंगी धन और सुख समृद्धि जानें पूजा से लेकर पारण तक के नियम

    शुक्रवार का व्रत ऐसे करें मां लक्ष्मी बरसाएंगी धन और सुख समृद्धि जानें पूजा से लेकर पारण तक के नियम


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन वैभव ऐश्वर्य और सुख समृद्धि की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी तथा मां संतोषी की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं परिवार में खुशहाली आती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जो लोग लंबे समय से धन संबंधी समस्याओं नौकरी व्यापार में रुकावट या पारिवारिक तनाव का सामना कर रहे हैं उनके लिए शुक्रवार का व्रत विशेष फलदायी माना गया है। हालांकि इस व्रत का पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसे विधि विधान और निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाए।

    शुक्रवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ या सफेद अथवा गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर की साफ सफाई कर मां लक्ष्मी और मां संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा के दौरान कमल का फूल सफेद पुष्प धूप दीप चंदन अक्षत और मिठाई अर्पित करना शुभ माना जाता है। मां लक्ष्मी को खीर बताशे या सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है जबकि मां संतोषी को गुड़ और चने का प्रसाद अर्पित किया जाता है।

    व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन मन और वाणी दोनों पर संयम रखना चाहिए। किसी के प्रति कटु शब्द बोलने झूठ कहने क्रोध करने या विवाद में पड़ने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार का व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन की शुद्धता और सकारात्मक सोच का भी प्रतीक है। इस दिन दान पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को भोजन वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता देने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

    यदि आप मां संतोषी का व्रत कर रहे हैं तो इस दिन खट्टी चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाता है। नींबू इमली अचार कच्चा आम या किसी भी प्रकार की खट्टी वस्तु खाने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। वहीं मां लक्ष्मी के व्रत में सात्विक भोजन ग्रहण करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक माना गया है।

    शाम के समय दीपक जलाकर मां लक्ष्मी की आरती करें और श्रीसूक्त कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी मंत्र का जाप करें। परिवार के साथ मिलकर आरती करने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है और सुख समृद्धि का वास होता है। पूजा के बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटें और अगले दिन श्रद्धापूर्वक व्रत का पारण करें।

    ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित रूप से शुक्रवार का व्रत करने से धन लाभ के नए अवसर प्राप्त होते हैं वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और घर में सुख शांति बनी रहती है। यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि आत्मसंयम सकारात्मक सोच और सेवा भावना को मजबूत करने का भी एक प्रभावी माध्यम माना जाता है।

  • मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का अचूक उपाय शुक्रवार व्रत की पूरी विधि पूजा नियम और शुभ फल

    मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने का अचूक उपाय शुक्रवार व्रत की पूरी विधि पूजा नियम और शुभ फल


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखकर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं उनके जीवन में आर्थिक समृद्धि सुख शांति और वैभव का आगमन होता है। यह व्रत केवल धन प्राप्ति का माध्यम नहीं बल्कि मन की शुद्धि सकारात्मक ऊर्जा और परिवार में सुखद वातावरण स्थापित करने का भी महत्वपूर्ण साधन माना गया है।

    शुक्रवार के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ और विशेष रूप से सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के पूजा स्थान की साफ सफाई कर मां लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। पूजा स्थल पर सफेद या लाल वस्त्र बिछाकर मां लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद कमल का फूल गुलाब या सुगंधित पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मां को खीर बताशे मिश्री सफेद मिठाई नारियल और मौसमी फल का भोग लगाया जाता है।

    पूजा के दौरान श्रीसूक्त लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र कनकधारा स्तोत्र अथवा लक्ष्मी चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करना लाभकारी माना जाता है। इसके साथ ही ओम श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी की आरती करें और पूरे परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक आचरण अपनाते हैं। कई लोग केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ श्रद्धालु एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन लहसुन प्याज मांस मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है। साथ ही किसी का अपमान करने कटु वचन बोलने या क्रोध करने से भी बचना चाहिए क्योंकि मां लक्ष्मी को शांति स्वच्छता और सदाचार अत्यंत प्रिय माने गए हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार शुक्रवार के दिन जरूरतमंद लोगों को सफेद वस्त्र चावल चीनी दूध दही या मिठाई का दान करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली आर्थिक परेशानियां धीरे धीरे दूर होने लगती हैं। घर में स्वच्छता बनाए रखना और शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाना भी शुभ फलदायी माना गया है।

    ज्योतिष के अनुसार शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह से भी माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र कमजोर हो तो शुक्रवार का व्रत और मां लक्ष्मी की आराधना लाभदायक मानी जाती है। इससे वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होने की मान्यता है।

    धार्मिक आस्था के साथ किया गया शुक्रवार का व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाला माना जाता है। नियमित रूप से इस व्रत का पालन करने से आत्मविश्वास बढ़ता है मन को शांति मिलती है और परिवार में प्रेम सौहार्द तथा समृद्धि का वातावरण बनता है। श्रद्धा विश्वास और सच्चे मन से मां लक्ष्मी की आराधना करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।

  • 14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात

    14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात


    नई दिल्ली । 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है। मंगलवार के साथ अमावस्या का संयोग बनने के कारण इसे भौमवती अमावस्या कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि स्नान दान पितरों के तर्पण और भगवान हनुमान की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि विधान से किए गए धार्मिक कार्यों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार आषाढ़ अमावस्या की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर पितरों का स्मरण किया जाता है। जिन लोगों के लिए संभव हो वे तिल और जल से पितरों का तर्पण भी कर सकते हैं। मान्यता है कि इससे पितृ दोष के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    चूंकि इस बार अमावस्या मंगलवार को पड़ रही है इसलिए भगवान हनुमान की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन हनुमान मंदिर में जाकर सिंदूर चमेली का तेल लाल फूल और गुड़ चने का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक शांति साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।

    आषाढ़ अमावस्या पर दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र तिल गुड़ फल या दक्षिणा का दान करना पुण्यदायी माना जाता है। गाय को हरा चारा खिलाना और पक्षियों को दाना पानी देना भी शुभ माना जाता है। इन कार्यों को सेवा और करुणा की भावना से करने की परंपरा रही है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन एक सरल उपाय भी किया जाता है। शाम के समय दो या तीन लौंग के साथ कपूर जलाकर पूरे घर में उसका धुआं किया जाता है। मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक वातावरण बनता है। हालांकि इसे धार्मिक आस्था का हिस्सा माना जाता है और इसके आध्यात्मिक महत्व को ही प्रमुखता दी जाती है।

    आषाढ़ अमावस्या के दिन क्रोध झूठ और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। सात्विक भोजन करना ईश्वर का स्मरण करना और जरूरतमंद लोगों की सहायता करना इस दिन के शुभ कार्यों में शामिल माना गया है। कई श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखकर दिनभर पूजा पाठ और दान पुण्य करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भौमवती अमावस्या आत्मचिंतन सेवा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए स्नान दान तर्पण और हनुमान जी की आराधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होने की मान्यता है। हालांकि इन मान्यताओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

  • निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल

    निर्जला एकादशी 2026 से पहले कर लें ,ये जरूरी तैयारियां तभी मिलेगा व्रत का पूर्ण फल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है लेकिन सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विधि विधान से निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उन्हें वर्ष भर की 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून गुरुवार को रखा जाएगा लेकिन इसकी तैयारी और नियम एक दिन पहले दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब श्रद्धालु दशमी तिथि से ही संयम और नियमों का पालन शुरू कर दें। इस दिन भोजन और दिनचर्या दोनों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

    दशमी तिथि के दिन केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन में प्याज लहसुन और तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शाम के समय सूर्यास्त से पहले हल्का और सुपाच्य भोजन कर लेना उचित माना गया है। इसके बाद अन्न का त्याग कर देना चाहिए। कई श्रद्धालु दशमी की रात से ही जल का सेवन भी बंद कर देते हैं ताकि अगले दिन निर्जला व्रत का पालन पूरी निष्ठा के साथ कर सकें।

    एकादशी के दिन बाल धोना शुभ नहीं माना जाता इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को दशमी तिथि में ही स्नान के साथ बाल धो लेने चाहिए। इससे व्रत के दिन किसी प्रकार की असुविधा भी नहीं होती और धार्मिक नियमों का पालन भी हो जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व है। बिना तुलसी के विष्णु पूजन अधूरा माना जाता है। हालांकि एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को स्पर्श करना या पत्तियां तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल दशमी तिथि में ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी माता को दूर से प्रणाम कर दीपक अर्पित किया जा सकता है।

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दशमी तिथि की रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास के साथ लिया गया यह संकल्प व्रत की सफलता का आधार माना जाता है। इसके बाद व्रती को द्वादशी तिथि में पारण होने तक नियमों का पालन करना चाहिए।

    निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं बल्कि आत्मसंयम और भक्ति का महापर्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा आराधना जप और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा पूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में सुख समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए यदि आप इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत रखने जा रहे हैं तो दशमी तिथि से ही इसकी तैयारी शुरू कर लें ताकि आपको व्रत का संपूर्ण और शुभ फल प्राप्त हो सके।

  • 11 जून को व्रत-पूजा से मिल सकता है विशेष लाभ, ज्योतिषीय दृष्टि से अहम दिन

    11 जून को व्रत-पूजा से मिल सकता है विशेष लाभ, ज्योतिषीय दृष्टि से अहम दिन


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है, लेकिन 11 जून 2026 का दिन और भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि इस दिन परमा एकादशी का दुर्लभ योग बन रहा है। यह एकादशी अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास में पड़ रही है, जो तीन साल में एक बार आता है। यही कारण है कि इस दिन का महत्व सामान्य एकादशी से कई गुना अधिक बताया जा रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परमा एकादशी को मोक्षदायिनी तिथि माना गया है। कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से 100 यज्ञों के बराबर फल प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में धन, समृद्धि और सुख-शांति का वास होता है। यही नहीं, यह व्रत पापों के नाश और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी खोलता है।

    पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 11 जून 2026 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर शुरू होगी और उसी दिन रात 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर परमा एकादशी का व्रत 11 जून, गुरुवार को ही रखा जाएगा। इसके अगले दिन 12 जून को व्रत का पारण किया जाएगा, जिसका शुभ समय सुबह 5 बजकर 23 मिनट से 8 बजकर 10 मिनट तक बताया गया है।

    परमा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। पूजा के दौरान पीले वस्त्रों का उपयोग शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त पीले कपड़े पर चांदी का सिक्का और हल्दी की गांठ रखकर पूजा करते हैं और उसे बाद में तिजोरी या धन स्थान पर रख देते हैं। मान्यता है कि इससे घर में धन और समृद्धि बढ़ती है।

    इसके अलावा इस दिन शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का चौमुखी दीपक जलाने का भी विशेष महत्व बताया गया है। दीपक में हल्दी या कुमकुम मिलाना शुभ माना जाता है। भक्त तुलसी की परिक्रमा करते हुए मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि परिक्रमा के दौरान तुलसी पौधे को स्पर्श नहीं किया जाता।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भी कहा गया है कि यदि इस दिन व्रत और पूजा का अवसर चूक गया, तो ऐसा दुर्लभ योग लंबे समय तक फिर नहीं मिलता। यही कारण है कि श्रद्धालु इस तिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं।

    परमा एकादशी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आस्था, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक मानी जाती है। यह दिन भक्तों को भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर प्रदान करता है।

  • पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर

    पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग में Purushottam Maas को अत्यंत पवित्र और विशेष महीना माना जाता है। यह अवधि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, जिसमें श्रद्धालु पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस महीने किए गए शुभ कार्य कई गुना फल देते हैं, लेकिन इसी के साथ वास्तु शास्त्र में कुछ विशेष सावधानियां भी बताई गई हैं।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास के दौरान घर में रखी कुछ वस्तुएं नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकती हैं और परिवार की सुख-शांति पर असर डाल सकती हैं। इसलिए इस अवधि में विशेष रूप से घर की सफाई और अनावश्यक वस्तुओं को हटाने पर जोर दिया जाता है।

    सबसे पहले जिन चीजों से बचने की सलाह दी गई है, वे हैं टूटी हुई देवी-देवताओं की मूर्तियां। घर में किसी भी प्रकार की खंडित मूर्ति रखना वास्तु दोष का कारण माना जाता है। ऐसी मूर्तियां नकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और पारिवारिक शांति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए इन्हें नदी या पवित्र जल में विसर्जित करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा सूखे या मुरझाए हुए पौधे भी इस पवित्र माह में अशुभ माने गए हैं। घर में रखे सूखे पौधे न केवल वातावरण की ताजगी को कम करते हैं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाते हैं। इसके स्थान पर हरे-भरे पौधे, विशेषकर तुलसी का पौधा, अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाता है।

    वास्तु शास्त्र में टूटे-फूटे कांच के बर्तनों को भी अशुभ बताया गया है। ऐसे बर्तन घर में रखने से आर्थिक परेशानियों और बाधाओं का संकेत मिलता है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में इन्हें तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए ताकि घर में समृद्धि और स्थिरता बनी रहे।

    इसी तरह बंद पड़ी या खराब घड़ियां भी नकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती हैं। समय रुकना प्रगति में बाधा का संकेत माना जाता है, और वास्तु के अनुसार यह परिवार के विकास और तरक्की को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी घड़ियों को या तो ठीक करवा लेना चाहिए या फिर घर से हटा देना चाहिए।

    पुरुषोत्तम मास में धार्मिक आस्था के साथ-साथ घर के वातावरण को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में किया गया हर छोटा सुधार भी जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है।

    कुल मिलाकर यह पवित्र महीना भक्तों के लिए भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर है, और साथ ही यह समय घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करने और सकारात्मकता बढ़ाने का भी संदेश देता है।

  • एकादशी व्रत के नियम क्या हैं? जानिए सही पूजा विधि और धार्मिक महत्व

    एकादशी व्रत के नियम क्या हैं? जानिए सही पूजा विधि और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है, यानी सालभर में कुल 24 एकादशी व्रत रखे जाते हैं। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
    किसकी पूजा होती है?
    एकादशी के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। कई भक्त भगवान कृष्ण की पूजा भी करते हैं, क्योंकि उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु का यह मंत्र अत्यंत शुभ माना जाता है:
    ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    एकादशी व्रत के निय
    व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।
    घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
    इस दिन सात्विक भोजन करें और कई लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं।
    लहसुन, प्याज, चावल और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
    क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
    भगवान विष्णु के मंत्रों और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।
    जरूरतमंदों को दान करना पुण्यदायी माना गया है।

    एकादशी व्रत की पूजा विधि
    एकादशी के दिन सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित करें।
    पूजा के दौरान विष्णु चालीसा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और मंत्र जाप करें। तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। अंत में भगवान की आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटें।

    एकादशी व्रत का महत्व
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत मन और शरीर को शुद्ध करने वाला माना जाता है। यह व्रत आत्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया एकादशी व्रत व्यक्ति को मोक्ष और पुण्य फल प्रदान करता है।

  • अपरा एकादशी व्रत का महत्व क्या है? जानिए पूजा के नियम और सही तिथि

    अपरा एकादशी व्रत का महत्व क्या है? जानिए पूजा के नियम और सही तिथि


    नई दिल्ली ।  हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
    अपरा एकादशी 2026 की सही तिथि
    वर्ष 2026 में अपरा एकादशी का व्रत 13 मई, बुधवार को रखा जाएगा। उदया तिथि के अनुसार इसी दिन व्रत और पूजा करना शुभ माना गया है। बुधवार को पड़ने के कारण इस बार इस व्रत का महत्व और भी अधिक माना जा रहा है।
    अपरा एकादशी का धार्मिक महत्व
    धार्मिक ग्रंथों में अपरा एकादशी को अत्यंत फलदायी व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत सुख, शांति, धन, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ और तीर्थ स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जो लोग आर्थिक परेशानियों, मानसिक तनाव या जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना गया है।

    पूजा के नियम

    अपरा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें।
    पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है:
    ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और लहसुन, प्याज, चावल तथा तामसिक भोजन से दूरी बनानी चाहिए। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत भी रखते हैं। जरूरतमंदों को दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
    इन बातों का रखें ध्यान
    क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहें
    भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा श्रद्धा से करें
    तुलसी पूजा जरूर करें
    अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया अपरा एकादशी व्रत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लेकर आता है।