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  • महाअष्टमी पर नवार्ण मंत्र जाप से मिलेगा विशेष फल, पूरी होंगी मनोकामनाएं

    महाअष्टमी पर नवार्ण मंत्र जाप से मिलेगा विशेष फल, पूरी होंगी मनोकामनाएं

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दौरान प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें महाअष्टमी का विशेष महत्व होता है, जो इस बार 26 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की विधि-विधान से पूजा की जाती है और कन्या पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन की गई पूजा, साधना या मंत्र जाप का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

    नवरात्रि को देवी भक्ति और साधना का सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दौरान श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं। विशेष रूप से महाअष्टमी का दिन साधना और मंत्र जाप के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।

    इसी संदर्भ में नवार्ण मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। यह मंत्र नवार्ण मंत्र यानी ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे के रूप में जाना जाता है। इस मंत्र को दुर्गा साधना का अत्यंत प्रभावशाली और सिद्ध मंत्र माना गया है। नवार्ण शब्द में नव का अर्थ नौ और अर्ण का अर्थ अक्षर होता है, जो इस मंत्र के नौ अक्षरों को दर्शाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर में देवी शक्ति का विशेष स्वरूप समाहित होता है। इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ-साथ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की शक्तियों से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि इस मंत्र का जाप करने से साधक को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक स्तर पर लाभ प्राप्त होता है।

    माना जाता है कि नवार्ण मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है, भय और नकारात्मकता दूर होती है तथा जीवन में शांति और संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही यह मंत्र तरक्की, सुख-समृद्धि और पारिवारिक सुख के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र एकाग्रता और सफलता में सहायक होता है, वहीं करियर और व्यवसाय में भी सकारात्मक परिणाम देता है।

    महाअष्टमी के दिन इस मंत्र का जाप विशेष रूप से फलदायी माना गया है। विधि के अनुसार प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता की पूजा करें और उसके बाद 108 दानों की माला से कम से कम तीन माला जाप करें। जाप करते समय मन को शांत, एकाग्र और श्रद्धा से पूर्ण रखना आवश्यक है। धार्मिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि यदि इस दिन नियमपूर्वक और सच्चे मन से मंत्र जाप किया जाए तो मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

    इस प्रकार महाअष्टमी का दिन केवल पूजा-अर्चना का ही नहीं बल्कि आत्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का भी विशेष अवसर है। नवार्ण मंत्र की साधना के माध्यम से श्रद्धालु मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर अपने जीवन को सुख, शांति और समृद्धि की दिशा में अग्रसर कर सकते हैं।

  • नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री

    नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री


    नई दिल्ली । नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि समर्पण और भाव का उत्सव भी है। शास्त्रों के अनुसार जब भक्त मां के दरबार में जाता है, तो वह केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी आस्था और कृतज्ञता भी अर्पित करता है। इसलिए मंदिर में खाली हाथ जाना उचित नहीं माना जाता। पूजा के दौरान स्वच्छ वस्त्र पहनना, पुरुषों का तिलक और महिलाओं का सिर ढकना भी अनिवार्य माना जाता है।

    माता के सोलह श्रृंगार का महत्व

    देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। इन श्रृंगारों में शामिल हैं:

    लाल चुनरी

    चूड़ी

    इत्र

    सिंदूर

    बिछिया

    महावर

    मेहंदी

    काजल

    गजरा

    कुमकुम

    बिंदी

    माला या मंगलसूत्र

    पायल

    नथ

    कान की बाली

    फूलों की वेणी

    यह श्रृंगार सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

    अर्पित वस्तुओं का महत्व

    अक्षत (चावल): अखंडता और समृद्धि का प्रतीक

    लाल पुष्प: शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार

    चुनरी: श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक, जीवन में सुरक्षा और सौभाग्य लाती है

    सिक्का: दान और त्याग का संकेत, आर्थिक स्थिरता की कामना

    ऋतु फल: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश

    इन अर्पणों का वास्तविक महत्व उनके पीछे छिपे भाव में होता है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। नवरात्रि में माता को समर्पण और भक्ति भाव के साथ श्रृंगार और अर्पण करने से मनोबल बढ़ता है, घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भक्त का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनता है।

  • चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि

    चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि


    नई दिल्ली । भारत के हर कोने में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव यानी राम नवमी का पर्व बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। साल 2026 में यह तिथि दो दिनों तक रहने के कारण लोगों में व्रत और पूजन की सही तारीख को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार नवमी तिथि इस बार 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। लेकिन सूर्योदय के समय नवमी तिथि विद्यमान रहने के कारण 27 मार्च को राम नवमी मनाना अधिक शुभ माना जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:13 बजे से दोपहर 1:41 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस समय में भगवान राम का पूजन और व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया जा सकता है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ने पर देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर जन्म लेने का निर्णय लिया। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ से प्राप्त खीर को कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने ग्रहण किया, और इस प्रकार चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जन्म के समय पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे, जो उनके दिव्य स्वरूप और प्रभाव को दर्शाता है।

    साथ ही, चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्रि में श्रद्धालु मां को सोलह श्रृंगार अर्पित करते हैं। इसमें लाल चुनरी, चूड़ी, इत्र, सिंदूर, बिछिया, महावर, मेहंदी, काजल, गजरा, कुमकुम, बिंदी, माला या मंगलसूत्र, पायल, नथ, कान की बाली और फूलों की वेणी शामिल हैं। ये श्रृंगार माता के सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक हैं।

    अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का भी विशेष महत्व है। अक्षत चावल, अखंडता और समृद्धि का प्रतीक है, लाल पुष्प शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं, चुनरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाती है, सिक्का दान और त्याग का संकेत देता है, जबकि ऋतु फल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं।

    सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस साल 2026 में राम नवमी और चैत्र नवरात्रि का संगम भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है, इसलिए तय मुहूर्त और विधि के अनुसार पूजन और व्रत करना अत्यंत शुभ माना गया है।

  • लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि

    लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व देशभर में भक्ति और आस्था के रंग में रंगा हुआ है। इस दौरान आने वाला एक विशेष दिन है लक्ष्मी पंचमी, जिसे इस साल 23 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए पूजन और लक्ष्मी चालीसा के पाठ से घर में धन धान्य, सुख समृद्धि और वैभव का वास होता है।

    लक्ष्मी पंचमी का यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ता है। इस दिन मां स्कंदमाता के साथ साथ मां लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। मान्यता है कि मां लक्ष्मी, जो समृद्धि, धन और सुख समृद्धि की देवी हैं, इस दिन अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं। देवी की कृपा से व्यक्ति न केवल भौतिक संपन्नता पाता है, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और विवेक की भी प्राप्ति होती है।

    इस अवसर पर व्रतियों और श्रद्धालुओं की परंपरा होती है कि वे सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा अर्चना करें। घर में या मंदिर में कमल पुष्प, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। साथ ही, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। लक्ष्मी चालीसा के पाठ से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और घर में धन संपत्ति और सुख समृद्धि बनी रहती है।

    लक्ष्मी चालीसा का पाठ भक्तों के हृदय में विश्वास और भक्ति का संचार करता है। इसमें माता लक्ष्मी के गुणों और उनके दिव्य रूप का वर्णन है। चालीसा के माध्यम से यह विश्वास प्रकट होता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इसका पाठ करता है, उसे सभी प्रकार की विपत्तियों और दुखों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही पुत्र, धन और संतान संपत्ति की प्राप्ति भी होती है।

    धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने वाले को माता लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलती है। वे अपने भक्तों के घर में सुख शांति, स्वास्थ्य, वैभव और समृद्धि का वास करती हैं। इसके साथ ही, यह पाठ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है। भक्त चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करें और इसे दूसरों को सुनाने की परंपरा अपनाएं, जिससे शुभ प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

    लक्ष्मी पंचमी और लक्ष्मी चालीसा का यह पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि यह भक्ति, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक भी है। इस दिन घर और मंदिरों में भक्तगण एकत्र होते हैं, भजन कीर्तन करते हैं, और मां लक्ष्मी की कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। इस दिन किए गए उपाय और पाठ से वर्षभर सुख समृद्धि बनी रहती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    इसलिए आज के दिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना न केवल धन वैभव और सुख की प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करता है। भक्तगण इस दिन माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए पूरे श्रद्धा भाव से पाठ करें और अपने परिवार के लिए समृद्धि और सुख की कामना करें।

  • नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि

    नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि


    नई दिल्ली:चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह स्वरूप साहस, शांति और शक्ति का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। मां के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होता है, जो उन्हें चंद्रघंटा नाम देता है। सिंह पर सवार और दस भुजाओं वाली मां का यह रूप भक्तों के सभी भय और कष्टों को दूर करने वाला माना जाता है।

    मां चंद्रघंटा का स्वरूप जहां एक ओर उग्रता और वीरता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह शांति और संतुलन का संदेश भी देता है। मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आत्मविश्वास, बुद्धि तथा मानसिक शांति में वृद्धि होती है।

    पूजा की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके की जाती है। स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाएं और मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद कलश स्थापना करें जिसमें जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें। घी का दीपक जलाकर मां को लाल फूल, चंदन, रोली और फल अर्पित करें। नैवेद्य में खीर या हलवा चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप विशेष महत्व रखता है।

    मां चंद्रघंटा का महामंत्र इस प्रकार है
    या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

    बीज मंत्र
    ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं चंद्रघंटायै नमः
    या
    ऐं श्रीं शक्तये नमः

    इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करने से मन को शांति मिलती है और मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    इसके अलावा चंद्रघंटा स्तोत्र और उपासना मंत्र का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है। नियमित रूप से इनका जाप करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    पूजा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करें। मन को शांत और एकाग्र रखें और किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार से दूर रहें। मां को सफेद या लाल फूल अर्पित करें और सात्विक भोजन का ही सेवन करें।

    माना जाता है कि सच्चे मन से की गई मां चंद्रघंटा की भक्ति से व्यक्ति को निर्भीकता, सफलता और आंतरिक शांति प्राप्त होती है। नवरात्रि का यह तीसरा दिन आत्मबल बढ़ाने और जीवन में स्थिरता लाने का विशेष अवसर माना जाता है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पाएँ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद

    चैत्र नवरात्रि 2026: पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पाएँ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व आज 19 मार्च 2026 से आरंभ हो चुका है जो 27 मार्च 2026 को राम नवमी के दिन संपन्न होगा। हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है जिन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री और सौभाग्य की देवी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में स्थिरता सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

    ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष घटस्थापना यानी कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। पहला मुहूर्त सुबह 06:52 से 07:43 तक रहेगा जिसकी अवधि लगभग 50 मिनट है। यदि इस समय पूजा संभव न हो तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 से 12:53 तक विशेष फलदायी माना गया है। शुभ मुहूर्त में की गई पूजा घर में सुख-समृद्धि और बरकत लेकर आती है।

    पूजा की शुरुआत प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा या मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। विधिपूर्वक कलश स्थापना की जाती है जो नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इसके बाद मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए उन्हें सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं क्योंकि सफेद रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है।

    भोग के रूप में मां को गाय के दूध से बनी मिठाई या अन्य सफेद खाद्य पदार्थ अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान घी का अखंड दीपक जलाना शुभ माना जाता है जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्रोच्चारण और प्रार्थना करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    पूजा के समापन पर आरती का विशेष महत्व होता है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय और शाम की आरती सूर्यास्त के बाद करना शुभ माना जाता है। परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ आरती में शामिल होना घर में प्रेम एकता और सामंजस्य को बढ़ाता है। मां शैलपुत्री की आरती के माध्यम से भक्त अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और जीवन में सुख-संपत्ति की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की पूजा से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है और मन के विकार दूर होते हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी आराधना करते हैं उन्हें हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है। इस प्रकार नवरात्रि का पहला दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

  • चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    मध्य प्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक नगर उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वास का एक अद्भुत संगम भी माना जाता है चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है इस मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसका संबंध सम्राट विक्रमादित्य की आस्था और भक्ति से भी जुड़ा हुआ है

    हरसिद्धि माता मंदिर विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ ही दूरी पर स्थित है और इसकी ऐतिहासिकता हजारों वर्षों पुरानी बताई जाती है मान्यता है कि माता सती की दाहिनी कोहनी यहां गिरी थी जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे मंगल चंडी शक्ति स्थल के रूप में जाना जाता है यहां माता को विशेष सिद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है

    चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा अर्चना का आयोजन होता है पहले दिन प्रातःकाल मंदिर के पट खोले जाते हैं और विधिवत पूजा की शुरुआत होती है शैलपुत्री माता की आराधना के साथ घट स्थापना की जाती है और इसके बाद नौ दिनों तक क्रमशः सभी नौ देवियों की पूजा की जाती है इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है और दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं

    हरसिद्धि मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की विशाल दीपमाला है जिसे सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया गया माना जाता है इस दीपमाला में लगभग 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तंभ हैं जिनमें एक साथ 1011 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं दीपों की यह ज्योति न केवल दृश्य रूप से आकर्षक होती है बल्कि इसे अत्यंत शुभ और पवित्र भी माना जाता है पहले यह दीपमाला केवल नवरात्रि के दौरान ही प्रज्वलित की जाती थी लेकिन अब श्रद्धालुओं की आस्था और बुकिंग के चलते इसे नियमित रूप से जलाया जाने लगा है

    भक्तों की मान्यता है कि संध्या आरती के समय जब दीपमाला प्रज्वलित होती है और भक्त माता के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं तो वह अवश्य पूर्ण होती है इसी विश्वास के कारण नवरात्रि के दिनों में मंदिर में भारी भीड़ रहती है और श्रद्धालु विशेष रूप से दीप जलाने के लिए पहुंचते हैं

    सम्राट विक्रमादित्य को इस मंदिर का प्रमुख भक्त और संरक्षक माना जाता है कहा जाता है कि उन्होंने यहां माता की कठोर तपस्या की और माता ने उन्हें विशेष कृपा प्रदान की जिसके बाद वे महान और न्यायप्रिय शासक बने यह कथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है और उनकी आस्था को और भी मजबूत बनाती है

    नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर का हर कोना भक्ति के रंग में रंगा रहता है भजन कीर्तन और मंत्रोच्चार से वातावरण गूंजता रहता है और श्रद्धालु माता की कृपा पाने के लिए पूरे मन से पूजा अर्चना करते हैं हरसिद्धि माता का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है जहां हर भक्त अपनी मनोकामना लेकर आता है और उसे पूर्ण होने की आशा के साथ लौटता है

  • चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व

    चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व


    नई दिल्ली । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च गुरुवार से शुरू हो रहा है। पंचांग के अनुसार चैत्र अमावस्या 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त होगी और प्रतिपदा आरंभ होने के साथ ही नवरात्रि प्रारंभ होगी। नवरात्रि 9 दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व परंपरागत रूप से घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ आरंभ होता है।

    घटस्थापना का उद्देश्य
    घटस्थापना देवी का आह्वान करने के लिए की जाती है। इसका महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि इससे घर में सुख-शांति सकारात्मक ऊर्जा और सौहार्द की भावना बनी रहती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करते हैं जिससे आपसी प्रेम और सहयोग की भावना मजबूत होती है और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं।

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:05 से 12:53 तक लाभ चौघड़िया: 12:29 से 1:59 तक सुबह का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:54 से 7:57 तक शुभ चौघड़िया इन समयों में घटस्थापना और कलश स्थापना करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं और पूजा का प्रभाव अधिकतम माना जाता है।

    पंचक और खरमास

    15 मार्च से खरमास शुरू हो चुके हैं। इस दौरान मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों के साथ सूर्य देव की पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के दौरान पंचक भी रहेगा जिसकी शुरुआत 16 मार्च शाम 6:14 से होगी और समाप्ति 20 मार्च रात 2:28 तक होगी।इस चैत्र नवरात्रि पर निर्धारित शुभ मुहूर्त में घटस्थापना और कलश स्थापना कर आप घर में सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

  • मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

    मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में हर माह आने वाली मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि आज 17 मार्च को मनाई जा रही है। यह दिन भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। विशेष रूप से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी मिलने की भी मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि का आरंभ 17 मार्च सुबह 9:23 बजे से हुआ है, जो 18 मार्च सुबह 8:25 बजे तक रहेगी। शिव पूजा के लिए निशिता काल का विशेष महत्व होता है। इस दिन निशिता काल रात 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस समय की गई पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    जलाभिषेक का महत्व

    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर अभिषेक करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही रुद्राष्टकम या अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।मासिक शिवरात्रि का यह पावन अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

  • गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व

    गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च को मनाया जाएगा। इसी दिन से हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत मानी जाती है और चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर सृष्टि की रचना भगवान Brahma ने की थी इसलिए इसे नए साल की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है जहां इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है। वहीं कर्नाटक में इसे युगादी और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में उगादी के नाम से जाना जाता है।

    गुड़ी स्थापना की परंपरा

    गुड़ी पड़वा के दिन घरों में गुड़ी स्थापित करने की परंपरा है। गुड़ी को विजय समृद्धि और नए वर्ष के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार छत या किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है ताकि वह दूर से दिखाई दे सके। गुड़ी बनाने के लिए बांस के डंडे पर सुंदर कपड़ा बांधा जाता है और उस पर आम तथा नीम की पत्तियां फूल और ऊपर उल्टा चांदी तांबे या पीतल का कलश लगाया जाता है।

    तेल स्नान का महत्व
    गुड़ी पड़वा की सुबह जल्दी उठकर सुगंधित तेल से स्नान करने की परंपरा भी प्रचलित है। माना जाता है कि इससे शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं रक्त संचार बेहतर होता है और व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा के साथ नए वर्ष की शुरुआत करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन तेल स्नान करने से Lakshmi की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

    पारंपरिक व्यंजनों से होता है नए साल का स्वागत

    गुड़ी पड़वा के अवसर पर महाराष्ट्र में श्रीखंड पुरण पोली राइस चकली और भाकरवड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। परिवार और रिश्तेदारों के साथ इन पकवानों का आनंद लेते हुए लोग नए साल का स्वागत करते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।