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  • चैत्र नवरात्रि 2026: पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पाएँ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद

    चैत्र नवरात्रि 2026: पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पाएँ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व आज 19 मार्च 2026 से आरंभ हो चुका है जो 27 मार्च 2026 को राम नवमी के दिन संपन्न होगा। हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है जिन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री और सौभाग्य की देवी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में स्थिरता सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

    ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष घटस्थापना यानी कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। पहला मुहूर्त सुबह 06:52 से 07:43 तक रहेगा जिसकी अवधि लगभग 50 मिनट है। यदि इस समय पूजा संभव न हो तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 से 12:53 तक विशेष फलदायी माना गया है। शुभ मुहूर्त में की गई पूजा घर में सुख-समृद्धि और बरकत लेकर आती है।

    पूजा की शुरुआत प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा या मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। विधिपूर्वक कलश स्थापना की जाती है जो नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इसके बाद मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए उन्हें सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं क्योंकि सफेद रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है।

    भोग के रूप में मां को गाय के दूध से बनी मिठाई या अन्य सफेद खाद्य पदार्थ अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान घी का अखंड दीपक जलाना शुभ माना जाता है जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्रोच्चारण और प्रार्थना करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    पूजा के समापन पर आरती का विशेष महत्व होता है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय और शाम की आरती सूर्यास्त के बाद करना शुभ माना जाता है। परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ आरती में शामिल होना घर में प्रेम एकता और सामंजस्य को बढ़ाता है। मां शैलपुत्री की आरती के माध्यम से भक्त अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और जीवन में सुख-संपत्ति की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की पूजा से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है और मन के विकार दूर होते हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी आराधना करते हैं उन्हें हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है। इस प्रकार नवरात्रि का पहला दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

  • चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    मध्य प्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक नगर उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वास का एक अद्भुत संगम भी माना जाता है चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है इस मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसका संबंध सम्राट विक्रमादित्य की आस्था और भक्ति से भी जुड़ा हुआ है

    हरसिद्धि माता मंदिर विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ ही दूरी पर स्थित है और इसकी ऐतिहासिकता हजारों वर्षों पुरानी बताई जाती है मान्यता है कि माता सती की दाहिनी कोहनी यहां गिरी थी जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे मंगल चंडी शक्ति स्थल के रूप में जाना जाता है यहां माता को विशेष सिद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है

    चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा अर्चना का आयोजन होता है पहले दिन प्रातःकाल मंदिर के पट खोले जाते हैं और विधिवत पूजा की शुरुआत होती है शैलपुत्री माता की आराधना के साथ घट स्थापना की जाती है और इसके बाद नौ दिनों तक क्रमशः सभी नौ देवियों की पूजा की जाती है इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है और दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं

    हरसिद्धि मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की विशाल दीपमाला है जिसे सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया गया माना जाता है इस दीपमाला में लगभग 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तंभ हैं जिनमें एक साथ 1011 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं दीपों की यह ज्योति न केवल दृश्य रूप से आकर्षक होती है बल्कि इसे अत्यंत शुभ और पवित्र भी माना जाता है पहले यह दीपमाला केवल नवरात्रि के दौरान ही प्रज्वलित की जाती थी लेकिन अब श्रद्धालुओं की आस्था और बुकिंग के चलते इसे नियमित रूप से जलाया जाने लगा है

    भक्तों की मान्यता है कि संध्या आरती के समय जब दीपमाला प्रज्वलित होती है और भक्त माता के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं तो वह अवश्य पूर्ण होती है इसी विश्वास के कारण नवरात्रि के दिनों में मंदिर में भारी भीड़ रहती है और श्रद्धालु विशेष रूप से दीप जलाने के लिए पहुंचते हैं

    सम्राट विक्रमादित्य को इस मंदिर का प्रमुख भक्त और संरक्षक माना जाता है कहा जाता है कि उन्होंने यहां माता की कठोर तपस्या की और माता ने उन्हें विशेष कृपा प्रदान की जिसके बाद वे महान और न्यायप्रिय शासक बने यह कथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है और उनकी आस्था को और भी मजबूत बनाती है

    नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर का हर कोना भक्ति के रंग में रंगा रहता है भजन कीर्तन और मंत्रोच्चार से वातावरण गूंजता रहता है और श्रद्धालु माता की कृपा पाने के लिए पूरे मन से पूजा अर्चना करते हैं हरसिद्धि माता का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है जहां हर भक्त अपनी मनोकामना लेकर आता है और उसे पूर्ण होने की आशा के साथ लौटता है

  • चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व

    चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व


    नई दिल्ली । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च गुरुवार से शुरू हो रहा है। पंचांग के अनुसार चैत्र अमावस्या 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त होगी और प्रतिपदा आरंभ होने के साथ ही नवरात्रि प्रारंभ होगी। नवरात्रि 9 दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व परंपरागत रूप से घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ आरंभ होता है।

    घटस्थापना का उद्देश्य
    घटस्थापना देवी का आह्वान करने के लिए की जाती है। इसका महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि इससे घर में सुख-शांति सकारात्मक ऊर्जा और सौहार्द की भावना बनी रहती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करते हैं जिससे आपसी प्रेम और सहयोग की भावना मजबूत होती है और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं।

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:05 से 12:53 तक लाभ चौघड़िया: 12:29 से 1:59 तक सुबह का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:54 से 7:57 तक शुभ चौघड़िया इन समयों में घटस्थापना और कलश स्थापना करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं और पूजा का प्रभाव अधिकतम माना जाता है।

    पंचक और खरमास

    15 मार्च से खरमास शुरू हो चुके हैं। इस दौरान मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों के साथ सूर्य देव की पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के दौरान पंचक भी रहेगा जिसकी शुरुआत 16 मार्च शाम 6:14 से होगी और समाप्ति 20 मार्च रात 2:28 तक होगी।इस चैत्र नवरात्रि पर निर्धारित शुभ मुहूर्त में घटस्थापना और कलश स्थापना कर आप घर में सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।

  • मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

    मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में हर माह आने वाली मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि आज 17 मार्च को मनाई जा रही है। यह दिन भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। विशेष रूप से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी मिलने की भी मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि का आरंभ 17 मार्च सुबह 9:23 बजे से हुआ है, जो 18 मार्च सुबह 8:25 बजे तक रहेगी। शिव पूजा के लिए निशिता काल का विशेष महत्व होता है। इस दिन निशिता काल रात 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस समय की गई पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    जलाभिषेक का महत्व

    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर अभिषेक करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही रुद्राष्टकम या अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।मासिक शिवरात्रि का यह पावन अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

  • गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व

    गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च को मनाया जाएगा। इसी दिन से हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत मानी जाती है और चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर सृष्टि की रचना भगवान Brahma ने की थी इसलिए इसे नए साल की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है जहां इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है। वहीं कर्नाटक में इसे युगादी और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में उगादी के नाम से जाना जाता है।

    गुड़ी स्थापना की परंपरा

    गुड़ी पड़वा के दिन घरों में गुड़ी स्थापित करने की परंपरा है। गुड़ी को विजय समृद्धि और नए वर्ष के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार छत या किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है ताकि वह दूर से दिखाई दे सके। गुड़ी बनाने के लिए बांस के डंडे पर सुंदर कपड़ा बांधा जाता है और उस पर आम तथा नीम की पत्तियां फूल और ऊपर उल्टा चांदी तांबे या पीतल का कलश लगाया जाता है।

    तेल स्नान का महत्व
    गुड़ी पड़वा की सुबह जल्दी उठकर सुगंधित तेल से स्नान करने की परंपरा भी प्रचलित है। माना जाता है कि इससे शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं रक्त संचार बेहतर होता है और व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा के साथ नए वर्ष की शुरुआत करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन तेल स्नान करने से Lakshmi की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

    पारंपरिक व्यंजनों से होता है नए साल का स्वागत

    गुड़ी पड़वा के अवसर पर महाराष्ट्र में श्रीखंड पुरण पोली राइस चकली और भाकरवड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। परिवार और रिश्तेदारों के साथ इन पकवानों का आनंद लेते हुए लोग नए साल का स्वागत करते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन

    चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत जप पाठ तथा भक्ति के माध्यम से माता रानी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार नवरात्रि में माता दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन किस वाहन से होता है इसका विशेष महत्व माना जाता है। यह वाहन घटस्थापना के दिन के आधार पर निर्धारित होता है और इसे उस वर्ष की समग्र ऊर्जा तथा संभावित परिस्थितियों का संकेत भी माना जाता है।

    साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार यदि नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार या शुक्रवार से होती है तो माता रानी का आगमन डोली यानी पालकी पर माना जाता है। इसी कारण इस वर्ष माता का वाहन डोली निर्धारित किया गया है। शास्त्रों में यह परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि देवी का वाहन उस वर्ष के सामाजिक आर्थिक प्राकृतिक और राजनीतिक हालात के बारे में संकेत देता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्ताह के अलग-अलग दिनों के आधार पर माता का वाहन तय होता है। यदि नवरात्रि रविवार या सोमवार से शुरू हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। वहीं शनिवार या मंगलवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का वाहन घोड़ा माना जाता है जो संघर्ष युद्ध या अशांति का संकेत देता है। यदि नवरात्रि बुधवार से प्रारंभ हो तो माता नाव पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार या शुक्रवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन डोली पर माना जाता है।

    डोली या पालकी को ज्योतिषीय दृष्टि से सामान्यत शुभ संकेत नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसे वर्ष में सामाजिक या आर्थिक चुनौतियां स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं महामारी प्राकृतिक असंतुलन या आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि विद्वान यह भी बताते हैं कि यह भविष्यवाणी किसी निश्चित घटना का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक ऊर्जा का प्रतीकात्मक अर्थ है।

    धार्मिक आस्था के अनुसार माता की कृपा से सभी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा-पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कन्या पूजन हवन और दान-पुण्य करके माता का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

    इस प्रकार 2026 की चैत्र नवरात्रि में माता का आगमन डोली पर माना जा रहा है जिसे सतर्कता और संयम का संकेत समझा जा सकता है। आस्था और भक्ति के साथ मनाई गई नवरात्रि न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है बल्कि जीवन में सकारात्मकता और संतुलन भी लाती है।

  • शीतला अष्टमी 2026 कल: भूलकर भी न करें ये गलतियां, मां शीतला की कृपा से मिलती है रोगों से रक्षा

    शीतला अष्टमी 2026 कल: भूलकर भी न करें ये गलतियां, मां शीतला की कृपा से मिलती है रोगों से रक्षा


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र माह की शीतला अष्टमी का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से मां शीतला की पूजा के लिए समर्पित होता है जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। साल 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु मां शीतला की पूजा अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य सुख और रोगों से मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि मौसम बदलने के समय कई प्रकार की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है ऐसे में मां शीतला की पूजा करने से परिवार को रोगों से सुरक्षा और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है।

    शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन घरों में अलग अलग प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। परंपरा के अनुसार दाल भात पूरी दही लस्सी और हरी सब्जियां जैसे कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं। खास बात यह है कि इन सभी पकवानों को अगले दिन यानी शीतला अष्टमी के दिन ठंडा और बासी रूप में खाया जाता है। इस दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता। धार्मिक मान्यता के अनुसार ठंडा और बासी भोजन मां शीतला को प्रिय होता है और इससे शरीर को ठंडक भी मिलती है। इसलिए अष्टमी के दिन सबसे पहले इन व्यंजनों का भोग मां शीतला को लगाया जाता है और उसके बाद परिवार के लोग प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते हैं।

    शीतला अष्टमी के दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी जरूरी माना गया है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और उसके बाद मां शीतला के मंदिर जाकर दर्शन करने चाहिए। पूजा के दौरान मां शीतला को हल्दी दही और बाजरे का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नीम स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है और यह कई रोगों से बचाने में सहायक होता है। इसलिए पूजा के दौरान नीम की पत्तियां चढ़ाने की भी परंपरा है।

    धार्मिक दृष्टि से यह पर्व केवल पूजा अर्चना तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमें स्वास्थ्य और स्वच्छता का संदेश भी देता है। मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन आखिरी बार बासी भोजन किया जाता है और इसके बाद लंबे समय तक बासी भोजन करने से बचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक समय तक बासी भोजन करने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह पर्व हमें मौसम बदलने के समय साफ सफाई संतुलित भोजन और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की सीख भी देता है।

    इसके अलावा शीतला अष्टमी के दिन घर में पूजा करने के साथ साथ शीतला माता के मंदिर जाकर दर्शन करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। कई जगहों पर इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान बताया गया है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से की गई पूजा से मां शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को रोगों से रक्षा का आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

  • शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

    शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। शीतला अष्टमी को कई जगहों पर बासोड़ा या बासोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माता शीतला को ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता।

    वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को रात 1 बजकर 54 मिनट से हो रही है और यह तिथि 12 मार्च को सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च को रखा जाएगा। इस दिन श्रद्धालुओं को पूजा के लिए लगभग 12 घंटे का शुभ समय प्राप्त होगा।

    शीतला अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 36 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। वहीं इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 58 मिनट से 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा जिसे स्नान और ध्यान के लिए उत्तम समय माना जाता है। हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है। वहीं राहुकाल दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से 2 बजे तक रहेगा इसलिए इस समय में पूजा या शुभ कार्य करने से बचना चाहिए।

    इस वर्ष शीतला अष्टमी पर वज्र योग सिद्धि योग और ज्येष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। वज्र योग सुबह से लेकर 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा जिसके बाद सिद्धि योग प्रारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार वज्र योग को अधिक शुभ नहीं माना जाता इसलिए शीतला माता की पूजा सिद्धि योग में करना अधिक फलदायी माना जाता है। इस योग में की गई पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    शीतला अष्टमी का पर्व स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। शीतला माता को ठंडा भोजन प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन घर में नया भोजन नहीं बनाया जाता।

    परंपरा के अनुसार शीतला सप्तमी यानी  एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और अगले दिन वही ठंडा भोजन माता शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग भी उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को स्वास्थ्य सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

  • देवताओं की होली रंग पंचमी कल जानें तिथि पूजा विधि और भगवान को किस रंग का गुलाल चढ़ाना होता है शुभ

    देवताओं की होली रंग पंचमी कल जानें तिथि पूजा विधि और भगवान को किस रंग का गुलाल चढ़ाना होता है शुभ


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में होली के बाद आने वाला रंग पंचमी का पर्व बेहद खास और आध्यात्मिक महत्व वाला माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी को अबीर गुलाल अर्पित करने की परंपरा है इसलिए इसे देवताओं की होली भी कहा जाता है। देश के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की जाती है और भगवान को रंग अर्पित कर भक्त उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी देवताओं को अबीर गुलाल चढ़ाने से कुंडली के दोष कम होते हैं और जीवन में सुख समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार रंग पंचमी का पर्व चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष पंचमी तिथि 7 मार्च को शाम 7 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 8 मार्च को रात 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। पंचमी तिथि उदया तिथि के अनुसार 8 मार्च को पड़ रही है इसलिए इस वर्ष रंग पंचमी का पर्व 8 मार्च रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन कई स्थानों पर धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा होती है और कई जगह भव्य शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं। ढोल नगाड़ों की गूंज और भक्ति संगीत के साथ पूरा वातावरण उत्सवमय हो जाता है।

    रंग पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की पूजा करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। कई श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि विधि विधान के साथ पूजा करने से घर परिवार में सुख समृद्धि और शांति बनी रहती है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर एक चौकी रखकर उस पर राधा कृष्ण की प्रतिमा स्थापित की जाती है। भगवान को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराया जाता है और उन्हें फूल माला तथा फल अर्पित कर सुंदर श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद श्रद्धा भाव से भगवान को अबीर गुलाल अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान दीपक और धूप जलाकर मंत्रों का जाप किया जाता है और अंत में भगवान की आरती उतारी जाती है तथा प्रसाद का वितरण किया जाता है।

    ज्योतिष शास्त्र में रंग पंचमी के दिन अलग अलग रंग के गुलाल का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अलग अलग रंग जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। लाल रंग को ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है और इसे सूर्य तथा मंगल से जुड़ा हुआ रंग बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति के कामों में बाधा आ रही हो या आत्मविश्वास में कमी महसूस हो रही हो तो भगवान को लाल रंग का गुलाल अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    पीला रंग शुभता और मंगल कार्यों से जुड़ा माना जाता है और इसे देवगुरु बृहस्पति का रंग कहा जाता है। यदि विवाह या अन्य मांगलिक कार्यों में रुकावट आ रही हो या संतान की शिक्षा में परेशानी हो तो भगवान को पीले रंग का गुलाल अर्पित करना लाभकारी माना जाता है।

    हरा रंग समृद्धि शांति और संतुलन का प्रतीक माना जाता है और ज्योतिष के अनुसार इसका संबंध बुध ग्रह से होता है। यदि वाणी और बुद्धि में असंतुलन के कारण जीवन में समस्याएं आ रही हों तो रंग पंचमी के दिन भगवान को हरे रंग का गुलाल चढ़ाना शुभ माना जाता है।

    वहीं नीले रंग को वास्तु और ज्योतिष दोनों में विशेष महत्व दिया गया है। यह रंग सुरक्षा सत्य और गहराई का प्रतीक माना जाता है और इसे शनि ग्रह से जोड़ा जाता है। जीवन में आ रही कठिनाइयों को दूर करने और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए भगवान को नीले रंग का गुलाल अर्पित करना लाभकारी माना जाता है।

    इस तरह रंग पंचमी केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से पूजा करने से जीवन में सुख शांति और समृद्धि आने की मान्यता है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और देवी आगमन की खास बातें

    चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और देवी आगमन की खास बातें

    नई दिल्ली । साल में चार नवरात्रि आती हैं लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 19 मार्च 2026 को पड़ेगी जिसे हिंदू नव वर्ष की शुरुआत के रूप में भी माना जाता है। इस साल चैत्र नवरात्रि गुरुवार 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक रामनवमी के साथ समाप्त होंगे। यह नौ दिन का पर्व भक्तों के लिए मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना का अवसर लेकर आता है जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि आती है।

    चैत्र नवरात्रि की शुरुआत प्रतिपदा तिथि से होती है। 19 मार्च गुरुवार सुबह 6.52 बजे से प्रतिपदा तिथि प्रारंभ होगी और 20 मार्च शुक्रवार सुबह 4.52 बजे समाप्त होगी। धार्मिक मान्यता अनुसार उदया तिथि के आधार पर नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मानी जाएगी। इस दिन से भक्त मां दुर्गा के नौ रूपों की नौ दिनों तक पूजा अर्चना करेंगे।

    नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व है। इस दिन देवी के आवाहन के लिए घर या मंदिर में कलश स्थापित किया जाता है। साल 2026 में कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला मुहूर्त सुबह 6.52 बजे से 7.43 बजे तक रहेगा जबकि दूसरा मुहूर्त दोपहर 12.5 बजे से 12.53 बजे तक रहेगा। इन दोनों समयों में श्रद्धालु अपनी विधिपूर्वक पूजा और कलश स्थापना कर सकते हैं।

    नवरात्रि से पहले देवी आगमन का तरीका भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल मां दुर्गा का आगमन डोली पर नहीं होगा क्योंकि गुरुवार से नवरात्रि प्रारंभ होने के कारण इसे अशुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता अनुसार डोली पर देवी का आगमन अस्थिरता और समाज तथा राजनीति में उथल पुथल का संकेत माना जाता है। इसके विपरीत इस वर्ष मां दुर्गा का गमन हाथी पर होगा जिसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हाथी पर गमन सुख समृद्धि और अच्छी वर्षा का संकेत देता है जिससे पूरे देश में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।

    इस बार की विशेषता यह है कि चैत्र नवरात्रि में किसी भी तिथि का क्षय या वृद्धि नहीं होगी। यानी पूरे नौ दिनों तक श्रद्धालु बिना किसी बाधा के मां दुर्गा के नौ अलग अलग रूपों की पूजा कर सकेंगे। 19 मार्च से 27 मार्च तक चलने वाले इन नवरात्रियों में भक्तों को मां के पूरे नौ दिन की आराधना करने का अवसर मिलेगा।

    चैत्र नवरात्रि 2026 श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति समृद्धि और घर में खुशहाली का संदेश लेकर आ रहा है। कलश स्थापना से लेकर देवी आगमन तक हर चरण में धार्मिक मान्यताओं का पालन करना शुभ फलदायी माना गया है। इसलिए इस नवरात्रि पर भक्त अपने घर या मंदिर में विधिपूर्वक पूजा कर घर में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य की प्राप्ति कर सकते हैं।