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  • कब है शनि जयंती ? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    कब है शनि जयंती ? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    नई दिल्ली। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि जयंती हर वर्ष ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष अमावस्या को मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन सूर्य देव और छाया के संयोग से शनिदेव का जन्म हुआ था। इसलिए यह दिन उनकी पूजा-अर्चना और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष महत्व रखता है। साल 2026 में शनि जयंती 16 मई को मनाई जाएगी। इस दिन विधि-विधान से पूजा और उपाय करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलने की मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त
    द्रिक पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 5:11 बजे से प्रारंभ होगी और 17 मई को रात 1:30 बजे समाप्त होगी। ऐसे में 16 मई को ही शनि जयंती और शनि अमावस्या मनाना शुभ रहेगा।

    पूजा विधि
    शनि जयंती के दिन संध्या काल को पूजा के लिए सबसे उत्तम समय माना गया है। इस दौरान श्रद्धा और नियम के साथ पूजा करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

    – संध्या समय स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
    – पश्चिम दिशा की ओर मुख करके शनिदेव का ध्यान करें।
    – शनि मंत्र या शनि स्तोत्र का पाठ करें।
    – पूजा के बाद पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
    – जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।

    क्या रखें ध्यान?
    इस दिन सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु व्रत भी रखते हैं, जिसे अपनी आस्था के अनुसार रखा जा सकता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा जीवन की बाधाओं को कम करती है और शनिदेव की कृपा दिलाती है।

  • आज नरसिंह जयंती का महापर्व: दुर्लभ संयोग में करें सही पूजा, इन गलतियों से दूर रहें वरना मिलेगा विपरीत फल

    आज नरसिंह जयंती का महापर्व: दुर्लभ संयोग में करें सही पूजा, इन गलतियों से दूर रहें वरना मिलेगा विपरीत फल


    नई दिल्ली । आज पूरे देश में नरसिंह जयंती का पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र और रक्षक अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित है जिनकी पूजा से भक्तों के जीवन से भय, बाधाएं और शत्रु समाप्त होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर विशेष फल मिलता है लेकिन छोटी-छोटी गलतियां भी पूजा का प्रभाव कम कर सकती हैं इसलिए सावधानी बेहद जरूरी मानी गई है।

    पंचांग के अनुसार इस वर्ष चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल की शाम से शुरू होकर 30 अप्रैल की रात तक रहेगी और उदयातिथि के आधार पर आज गुरुवार को ही नरसिंह जयंती मनाई जा रही है। इस बार का पर्व इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन दो बेहद शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहे हैं जो इसकी आध्यात्मिक शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं।

    पहला संयोग है गुरुवार का जो भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित दिन माना जाता है। ऐसे में नरसिंह जयंती का इस दिन पड़ना इसे और भी फलदायी बना देता है। दूसरा बड़ा संयोग है रवि योग का निर्माण जिसे ज्योतिष शास्त्र में सभी दोषों को समाप्त करने वाला और कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना जाता है। मान्यता है कि इस योग में की गई पूजा, व्रत और दान अक्षय फल प्रदान करते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

    इस पावन अवसर पर भक्तों को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और साफ-सुथरे तथा पीले या केसरिया रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान नरसिंह की मूर्ति या तस्वीर का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना गया है। पूजा के दौरान भगवान को प्रसन्न करने के लिए सत्तू, तिल और गुड़ का दान करना भी विशेष फलदायी बताया गया है। इन उपायों से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

    लेकिन जितना जरूरी सही पूजा करना है उतना ही जरूरी कुछ गलतियों से बचना भी है। इस दिन घर में किसी भी प्रकार का झगड़ा या क्लेश करना अशुभ माना जाता है क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और पूजा का फल नष्ट हो सकता है। इसके अलावा प्याज, लहसुन या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सात्विकता बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

    इसके साथ ही किसी भी असहाय या जरूरतमंद व्यक्ति का अपमान करना बहुत बड़ा दोष माना गया है। नरसिंह भगवान को धर्म और न्याय का प्रतीक माना जाता है इसलिए इस दिन करुणा, दया और सेवा भाव रखना विशेष रूप से जरूरी होता है। ऐसा करने से ही पूजा का पूरा लाभ प्राप्त होता है।

    नरसिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह आस्था और विश्वास का प्रतीक भी है। यह हमें सिखाता है कि यदि विश्वास अटूट हो तो भगवान किसी भी रूप में अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हो सकते हैं। इसलिए इस दिन श्रद्धा, नियम और सकारात्मक भाव के साथ पूजा करना ही सबसे बड़ा उपाय है जो जीवन में सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।

  • धार्मिक आस्था का पावन पर्व अक्षय तृतीया पर मंदिरों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब और विशेष परंपराएं

    धार्मिक आस्था का पावन पर्व अक्षय तृतीया पर मंदिरों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब और विशेष परंपराएं

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में अक्षय तृतीया को अत्यंत पवित्र और शुभ तिथि माना जाता है जिसे अक्षय यानी कभी समाप्त न होने वाले पुण्य का प्रतीक कहा गया है। यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है और मान्यता है कि इस दिन किए गए दान, पुण्य और शुभ कार्यों का फल अक्षय रूप से प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस दिन पूरे 24 घंटे को शुभ मुहूर्त माना जाता है और किसी विशेष समय की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन नए कार्यों की शुरुआत, विवाह, निवेश और व्यापारिक गतिविधियों को अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी दिन से कई महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं और परंपराओं की शुरुआत भी होती है, जिनमें चार धाम यात्रा का शुभारंभ प्रमुख है। गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिरों के कपाट इसी दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं, जबकि केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम भी इसी शुभ अवसर पर भक्तों के लिए दर्शन हेतु खुलते हैं।

    पुरी में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा की तैयारियों की शुरुआत भी अक्षय तृतीया से ही मानी जाती है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीन विशाल रथों का निर्माण कार्य विधिवत रूप से प्रारंभ होता है। मंदिर के पुजारी भगवान को माला अर्पित कर रथ निर्माण की परंपरा का शुभारंभ करते हैं, जो आगे चलकर विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का स्वरूप लेती है।

    वृंदावन में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व देखने को मिलता है। यहां बांके बिहारी मंदिर में भगवान के चरण कमलों के दर्शन वर्ष में केवल इसी दिन भक्तों को होते हैं। इसके अलावा मंदिरों में फूलों और चंदन से विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिससे पूरे वातावरण में भक्ति और उल्लास का माहौल बन जाता है।

    दक्षिण भारत में भी इस पर्व की अनूठी परंपराएं देखने को मिलती हैं। आंध्र प्रदेश के सिंहाचलम मंदिर में इस दिन भगवान वराह नरसिंह पर लगी चंदन की परत हटाकर उनके वास्तविक स्वरूप के दर्शन भक्तों को कराए जाते हैं। वहीं तमिलनाडु के कई विष्णु मंदिरों में गरुड़ वाहन पर भव्य शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। ओडिशा के रेमुना मंदिर में भगवान क्षीरचोरा गोपीनाथ को चंदन का लेप लगाकर गर्मी से राहत देने की परंपरा निभाई जाती है। यह आयोजन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया का संबंध कई पौराणिक घटनाओं से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ था, गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, महाभारत की रचना शुरू हुई थी और भगवान परशुराम का अवतार भी इसी दिन माना जाता है। साथ ही माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य और कुबेर को धन के देवता का स्थान भी इसी तिथि से जुड़ा हुआ बताया जाता है।

    इस दिन सोना, हल्दी, पीली सरसों, रूई और कौड़ी जैसी वस्तुओं की खरीद को शुभ माना जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा, दान और सत्कर्म कर जीवन में सुख, समृद्धि और अक्षय पुण्य की कामना करते हैं। अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं बल्कि आस्था, परंपरा और शुभता का अद्भुत संगम माना जाता है जो भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाता है।

  • सतुआ संक्रांति पर श्रद्धा का उत्सव, जानिए इसका धार्मिक और स्वास्थ्य महत्व

    सतुआ संक्रांति पर श्रद्धा का उत्सव, जानिए इसका धार्मिक और स्वास्थ्य महत्व


    नई दिल्ली। आज पूरे देश में सतुआ संक्रांति (सतुआन) का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन गर्मी की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और सनातन परंपरा में इसका विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन सत्तू, जल से भरा घड़ा, पंखा और मौसमी फलों का दान करने का विधान है। मान्यता है कि इससे देवता प्रसन्न होते हैं और पितरों को तृप्ति मिलती है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

    सूर्य के राशि परिवर्तन से जुड़ा है पर्व

    यह पर्व मेष संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है, जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान और सूर्य की उपासना का विशेष महत्व होता है। इसी के साथ खरमास का समापन भी हो जाता है और विवाह, उपनयन जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।

    सत्तू और घड़े के दान का धार्मिक महत्व

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सत्तू का दान करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, जबकि जल से भरा घड़ा दान करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है। बेल, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा और कच्चा आम जैसे ठंडक देने वाले फल भी दान किए जाते हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि को पराजित करने के बाद सबसे पहले सत्तू का सेवन किया था, तभी से इस दिन सत्तू का विशेष महत्व माना जाता है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार जिनकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है, वे इस दिन जल से भरा घड़ा दान करें तो उन्हें लाभ मिलता है।

    आस्था के साथ सेहत का भी ख्याल

    सतुआ संक्रांति सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मी के मौसम में सत्तू शरीर को ठंडक देने का काम करता है। सत्तू का शरबत पीने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और लू से बचाव होता है। यह फाइबर, प्रोटीन और मिनरल्स से भरपूर होता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है और पेट की गर्मी कम होती है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, घर से निकलने से पहले सत्तू का सेवन करने से हीट स्ट्रोक का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

    परंपरा और विज्ञान का अनोखा मेल

    सतुआ संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में परंपरा और विज्ञान का सुंदर उदाहरण है। जहां एक ओर दान-पुण्य से आत्मिक संतोष मिलता है, वहीं सत्तू जैसे पौष्टिक आहार से शरीर को भी राहत मिलती है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी लोगों की आस्था और जीवनशैली का अहम हिस्सा बना हुआ है।

  • रामनवमी पर राष्ट्रपति मुर्मु का संदेश: प्रभु राम से मिलते हैं जीवन के आदर्श

    रामनवमी पर राष्ट्रपति मुर्मु का संदेश: प्रभु राम से मिलते हैं जीवन के आदर्श


    नई दिल्ली।  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव रामनवमी के पावन अवसर पर देशभर में भक्ति और आस्था का माहौल देखने को मिला। इस खास दिन पर द्रौपदी मुर्मु, नरेंद्र मोदी, ओम बिरला समेत कई बड़े नेताओं ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं और भगवान राम के आदर्शों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया के जरिए देशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन त्याग, समरसता और आदर्श मूल्यों का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह पर्व हमें न्याय, कर्तव्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों से रामराज्य की परिकल्पना के अनुरूप एक समृद्ध, न्यायपूर्ण और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

    वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन त्याग, तप और संयम से भरा हुआ है। उनके आदर्श हर परिस्थिति में मजबूती से खड़े रहने की प्रेरणा देते हैं और मानवता के लिए सदैव मार्गदर्शक रहेंगे। उन्होंने कामना की कि भगवान राम की कृपा से सभी का कल्याण हो और देश आत्मनिर्भर व विकसित बनने की दिशा में आगे बढ़े।

    उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने संदेश में भगवान राम को धैर्य, त्याग और न्यायप्रियता का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनका जीवन संपूर्ण मानवता के लिए सर्वोच्च आदर्श है। उन्होंने प्रार्थना की कि समाज में अधर्म, अहंकार और अशांति का अंत हो तथा राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़े।

    लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इस अवसर पर कहा कि भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति, आस्था और लोकमंगल के प्रतीक हैं। उनके आदर्श आज भी सुशासन, न्याय और लोककल्याण के लिए प्रेरणा देते हैं। उन्होंने सभी से कर्तव्य, संस्कार और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया।

    इसके अलावा केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी देशवासियों को रामनवमी की शुभकामनाएं दीं। सभी नेताओं ने भगवान राम के आदर्शों सत्य, सेवा, समर्पण और धर्-को अपनाकर एक बेहतर समाज और राष्ट्र के निर्माण पर जोर दिया।

    देशभर में इस मौके पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और शोभायात्राओं का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव को उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया।

  • महाअष्टमी पर नवार्ण मंत्र जाप से मिलेगा विशेष फल, पूरी होंगी मनोकामनाएं

    महाअष्टमी पर नवार्ण मंत्र जाप से मिलेगा विशेष फल, पूरी होंगी मनोकामनाएं

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दौरान प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें महाअष्टमी का विशेष महत्व होता है, जो इस बार 26 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की विधि-विधान से पूजा की जाती है और कन्या पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन की गई पूजा, साधना या मंत्र जाप का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

    नवरात्रि को देवी भक्ति और साधना का सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दौरान श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं। विशेष रूप से महाअष्टमी का दिन साधना और मंत्र जाप के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।

    इसी संदर्भ में नवार्ण मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। यह मंत्र नवार्ण मंत्र यानी ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे के रूप में जाना जाता है। इस मंत्र को दुर्गा साधना का अत्यंत प्रभावशाली और सिद्ध मंत्र माना गया है। नवार्ण शब्द में नव का अर्थ नौ और अर्ण का अर्थ अक्षर होता है, जो इस मंत्र के नौ अक्षरों को दर्शाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर में देवी शक्ति का विशेष स्वरूप समाहित होता है। इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ-साथ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की शक्तियों से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि इस मंत्र का जाप करने से साधक को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक स्तर पर लाभ प्राप्त होता है।

    माना जाता है कि नवार्ण मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है, भय और नकारात्मकता दूर होती है तथा जीवन में शांति और संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही यह मंत्र तरक्की, सुख-समृद्धि और पारिवारिक सुख के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र एकाग्रता और सफलता में सहायक होता है, वहीं करियर और व्यवसाय में भी सकारात्मक परिणाम देता है।

    महाअष्टमी के दिन इस मंत्र का जाप विशेष रूप से फलदायी माना गया है। विधि के अनुसार प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता की पूजा करें और उसके बाद 108 दानों की माला से कम से कम तीन माला जाप करें। जाप करते समय मन को शांत, एकाग्र और श्रद्धा से पूर्ण रखना आवश्यक है। धार्मिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि यदि इस दिन नियमपूर्वक और सच्चे मन से मंत्र जाप किया जाए तो मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

    इस प्रकार महाअष्टमी का दिन केवल पूजा-अर्चना का ही नहीं बल्कि आत्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का भी विशेष अवसर है। नवार्ण मंत्र की साधना के माध्यम से श्रद्धालु मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर अपने जीवन को सुख, शांति और समृद्धि की दिशा में अग्रसर कर सकते हैं।

  • नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री

    नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री


    नई दिल्ली । नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि समर्पण और भाव का उत्सव भी है। शास्त्रों के अनुसार जब भक्त मां के दरबार में जाता है, तो वह केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी आस्था और कृतज्ञता भी अर्पित करता है। इसलिए मंदिर में खाली हाथ जाना उचित नहीं माना जाता। पूजा के दौरान स्वच्छ वस्त्र पहनना, पुरुषों का तिलक और महिलाओं का सिर ढकना भी अनिवार्य माना जाता है।

    माता के सोलह श्रृंगार का महत्व

    देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। इन श्रृंगारों में शामिल हैं:

    लाल चुनरी

    चूड़ी

    इत्र

    सिंदूर

    बिछिया

    महावर

    मेहंदी

    काजल

    गजरा

    कुमकुम

    बिंदी

    माला या मंगलसूत्र

    पायल

    नथ

    कान की बाली

    फूलों की वेणी

    यह श्रृंगार सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

    अर्पित वस्तुओं का महत्व

    अक्षत (चावल): अखंडता और समृद्धि का प्रतीक

    लाल पुष्प: शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार

    चुनरी: श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक, जीवन में सुरक्षा और सौभाग्य लाती है

    सिक्का: दान और त्याग का संकेत, आर्थिक स्थिरता की कामना

    ऋतु फल: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश

    इन अर्पणों का वास्तविक महत्व उनके पीछे छिपे भाव में होता है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। नवरात्रि में माता को समर्पण और भक्ति भाव के साथ श्रृंगार और अर्पण करने से मनोबल बढ़ता है, घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भक्त का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनता है।

  • चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि

    चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि


    नई दिल्ली । भारत के हर कोने में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव यानी राम नवमी का पर्व बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। साल 2026 में यह तिथि दो दिनों तक रहने के कारण लोगों में व्रत और पूजन की सही तारीख को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार नवमी तिथि इस बार 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। लेकिन सूर्योदय के समय नवमी तिथि विद्यमान रहने के कारण 27 मार्च को राम नवमी मनाना अधिक शुभ माना जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:13 बजे से दोपहर 1:41 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस समय में भगवान राम का पूजन और व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया जा सकता है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ने पर देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर जन्म लेने का निर्णय लिया। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ से प्राप्त खीर को कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने ग्रहण किया, और इस प्रकार चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जन्म के समय पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे, जो उनके दिव्य स्वरूप और प्रभाव को दर्शाता है।

    साथ ही, चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्रि में श्रद्धालु मां को सोलह श्रृंगार अर्पित करते हैं। इसमें लाल चुनरी, चूड़ी, इत्र, सिंदूर, बिछिया, महावर, मेहंदी, काजल, गजरा, कुमकुम, बिंदी, माला या मंगलसूत्र, पायल, नथ, कान की बाली और फूलों की वेणी शामिल हैं। ये श्रृंगार माता के सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक हैं।

    अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का भी विशेष महत्व है। अक्षत चावल, अखंडता और समृद्धि का प्रतीक है, लाल पुष्प शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं, चुनरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाती है, सिक्का दान और त्याग का संकेत देता है, जबकि ऋतु फल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं।

    सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस साल 2026 में राम नवमी और चैत्र नवरात्रि का संगम भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है, इसलिए तय मुहूर्त और विधि के अनुसार पूजन और व्रत करना अत्यंत शुभ माना गया है।

  • लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि

    लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व देशभर में भक्ति और आस्था के रंग में रंगा हुआ है। इस दौरान आने वाला एक विशेष दिन है लक्ष्मी पंचमी, जिसे इस साल 23 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए पूजन और लक्ष्मी चालीसा के पाठ से घर में धन धान्य, सुख समृद्धि और वैभव का वास होता है।

    लक्ष्मी पंचमी का यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ता है। इस दिन मां स्कंदमाता के साथ साथ मां लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। मान्यता है कि मां लक्ष्मी, जो समृद्धि, धन और सुख समृद्धि की देवी हैं, इस दिन अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं। देवी की कृपा से व्यक्ति न केवल भौतिक संपन्नता पाता है, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और विवेक की भी प्राप्ति होती है।

    इस अवसर पर व्रतियों और श्रद्धालुओं की परंपरा होती है कि वे सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा अर्चना करें। घर में या मंदिर में कमल पुष्प, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। साथ ही, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। लक्ष्मी चालीसा के पाठ से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और घर में धन संपत्ति और सुख समृद्धि बनी रहती है।

    लक्ष्मी चालीसा का पाठ भक्तों के हृदय में विश्वास और भक्ति का संचार करता है। इसमें माता लक्ष्मी के गुणों और उनके दिव्य रूप का वर्णन है। चालीसा के माध्यम से यह विश्वास प्रकट होता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इसका पाठ करता है, उसे सभी प्रकार की विपत्तियों और दुखों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही पुत्र, धन और संतान संपत्ति की प्राप्ति भी होती है।

    धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने वाले को माता लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलती है। वे अपने भक्तों के घर में सुख शांति, स्वास्थ्य, वैभव और समृद्धि का वास करती हैं। इसके साथ ही, यह पाठ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है। भक्त चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करें और इसे दूसरों को सुनाने की परंपरा अपनाएं, जिससे शुभ प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

    लक्ष्मी पंचमी और लक्ष्मी चालीसा का यह पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि यह भक्ति, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक भी है। इस दिन घर और मंदिरों में भक्तगण एकत्र होते हैं, भजन कीर्तन करते हैं, और मां लक्ष्मी की कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। इस दिन किए गए उपाय और पाठ से वर्षभर सुख समृद्धि बनी रहती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    इसलिए आज के दिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना न केवल धन वैभव और सुख की प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करता है। भक्तगण इस दिन माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए पूरे श्रद्धा भाव से पाठ करें और अपने परिवार के लिए समृद्धि और सुख की कामना करें।

  • नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि

    नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि


    नई दिल्ली:चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह स्वरूप साहस, शांति और शक्ति का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। मां के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होता है, जो उन्हें चंद्रघंटा नाम देता है। सिंह पर सवार और दस भुजाओं वाली मां का यह रूप भक्तों के सभी भय और कष्टों को दूर करने वाला माना जाता है।

    मां चंद्रघंटा का स्वरूप जहां एक ओर उग्रता और वीरता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह शांति और संतुलन का संदेश भी देता है। मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आत्मविश्वास, बुद्धि तथा मानसिक शांति में वृद्धि होती है।

    पूजा की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके की जाती है। स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाएं और मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद कलश स्थापना करें जिसमें जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें। घी का दीपक जलाकर मां को लाल फूल, चंदन, रोली और फल अर्पित करें। नैवेद्य में खीर या हलवा चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप विशेष महत्व रखता है।

    मां चंद्रघंटा का महामंत्र इस प्रकार है
    या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

    बीज मंत्र
    ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं चंद्रघंटायै नमः
    या
    ऐं श्रीं शक्तये नमः

    इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करने से मन को शांति मिलती है और मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    इसके अलावा चंद्रघंटा स्तोत्र और उपासना मंत्र का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है। नियमित रूप से इनका जाप करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    पूजा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करें। मन को शांत और एकाग्र रखें और किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार से दूर रहें। मां को सफेद या लाल फूल अर्पित करें और सात्विक भोजन का ही सेवन करें।

    माना जाता है कि सच्चे मन से की गई मां चंद्रघंटा की भक्ति से व्यक्ति को निर्भीकता, सफलता और आंतरिक शांति प्राप्त होती है। नवरात्रि का यह तीसरा दिन आत्मबल बढ़ाने और जीवन में स्थिरता लाने का विशेष अवसर माना जाता है।