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  • होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने दावा किया है कि क्षेत्रीय चुनौतियों के बावजूद बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में सफलता हासिल की गई है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा व्यापार की रणनीतियों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों, तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है। हाल के महीनों में इसी मार्ग को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच अमेरिका ने वैकल्पिक संचालन व्यवस्था अपनाकर तेल परिवहन जारी रखने का प्रयास किया।

    जानकारी के अनुसार तेल परिवहन की प्रक्रिया को कई चरणों में अंजाम दिया गया। शुरुआती चरण में खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल को टैंकरों के माध्यम से निर्धारित समुद्री क्षेत्रों तक पहुंचाया गया। इसके बाद समुद्र में ही एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल स्थानांतरित करने की व्यवस्था अपनाई गई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य संवेदनशील समुद्री मार्गों पर जोखिम को कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को बाधित होने से बचाना बताया जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रणनीति केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। समुद्र में जहाज-से-जहाज तेल हस्तांतरण लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा उद्योग का हिस्सा रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका उपयोग अधिक व्यापक स्तर पर देखने को मिला है। इससे तेल परिवहन करने वाली कंपनियों को वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध हुए और संभावित अवरोधों के बावजूद आपूर्ति जारी रखी जा सकी।

    समुद्री गतिविधियों की निगरानी करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जहाजों ने अपनी लोकेशन संबंधी सार्वजनिक सूचनाओं को सीमित रखा, जिसके कारण उनकी गतिविधियों पर सामान्य निगरानी प्रणालियों की पकड़ कम रही। ऐसी गतिविधियों को अक्सर ‘डार्क ट्रांजिट’ की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों और सुरक्षा मानकों के संदर्भ में लगातार बहस का विषय बनी रहती है।

    ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बनाए रखना था। यदि तेल आपूर्ति बाधित होती तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता था, जिसका असर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार करना ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक शक्तियां केवल सैन्य क्षमता ही नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा को भी अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल रखेंगी। होर्मुज क्षेत्र से जुड़ी ताजा गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक हित अब पहले से कहीं अधिक गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में होने वाला प्रत्येक घटनाक्रम वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान

    US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान


    तेहरान।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (America-Iran War) में भारतीय नाविकों (Indian sailors) की मौत के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद अब तक 6 भारतीयों की मौत हो चुकी है। वहीं बीते एक सप्ताह में भारतीय नाविकों वाले 3 जहाजों पर हमले हुए हैं। अमेरिका (America) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में ओमान के तट के पास इन जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। बीते बुधवार को पालाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर ‘एमटी सेट्टेबेलो’ पर हुए हालिया हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है। ये नाविक हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। इसके बाद अब इलाके में तैनात भारतीयों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। ऐसे में समझते हैं कि इस वक्त कितने भारतीय नाविक समंदर में तैनात हैं और किस तरह उन्हें हर रोज अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है।

    आंकड़ों की बात करें तो भारतीय नाविक आज अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल शिपिंग इंडस्ट्री की रीढ़ बन चुके हैं। भारत मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ग्लोबल मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा इस वक्त 3 लाख से अधिक भारतीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर जहाजों, बल्क कैरियर और तेल टैंकरों पर सक्रिय रूप से तैनात हैं।

    ये भारतीय अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग, फर्राटेदार अंग्रेजी और तकनीक में निपुण होने की वजह से वैश्विक शिपिंग कंपनियां की पहली पसंद होते हैं। यही वजह है कि फारस की खाड़ी, लाल सागर या ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले लगभग हर बड़े कमर्शियल जहाज पर भारतीय नाविक होते हैं।


    क्यों जान जोखिम में डालने को मजबूर?

    हर साल हजारों भारतीय युवा इस नौकरी की तरफ क्यों आते हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं। विदेशी झंडे वाले जहाजों पर मिलने वाली सैलरी डॉलर में होती है। यह सैलरी भारत में मिलने वाली किसी भी शुरुआती कॉर्पोरेट या इंजीनियरिंग नौकरी की तुलना में कई गुना अधिक होती है। वहीं भारतीय कानूनों के अनुसार, अगर कोई नाविक एक वित्तीय वर्ष में 183 दिनों से अधिक देश से बाहर बिताता है, तो उसे NRI का दर्जा मिलता है और कमाई पूरी तरह से टैक्स-फ्री हो जाती है। इस तरह युवा इस जॉब की तरफ आकर्षित होते हैं।


    नहीं होता रास्ता बदलने का ऑप्शन

    अब समझते हैं कि नाविकों को रिस्क क्यों लेना पड़ता है। जहाजों पर काम करने वाले नाविकों के लिए खतरा तब बढ़ जाता है जब वे अनजाने में ‘ग्रे फ्लीट’ या ‘डार्क फ्लीट’ का हिस्सा बन जाते हैं। ये वैसे संदिग्ध जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर चोरी-छिपे तेल और ईंधन की सप्लाई करते हैं। इनमें क्रू मेंबर्स के पास यह चुनने का अधिकार बहुत कम या न के बराबर होता है कि उनका जहाज किस देश से होकर गुजरेगा। रूट शिपिंग कंपनियां ही तय करती हैं। समुद्री यूनियनों ने लगातार यह मांग उठाई है कि नाविकों को संकट की घड़ी में हाई-रिस्क जोन में जाने से इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम न होने के कारण भारतीय नाविकों को मजबूरन इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।

  • होर्मुज रहे हमेशा खुला … ट्रंप-जिनपिंग के बीच बनी सहमति, कई मुद्दों पर हुई विस्तृत चर्चा

    होर्मुज रहे हमेशा खुला … ट्रंप-जिनपिंग के बीच बनी सहमति, कई मुद्दों पर हुई विस्तृत चर्चा


    बीजिंग।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के बीच बीजिंग (Beijing) के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई ऐतिहासिक शिखर बैठक में दोनों नेताओं ने वैश्विक स्थिरता और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने का संकल्प लिया। इस मुलाकात में ताइवान, हॉर्मुज स्ट्रेट, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। साल 2017 के बाद चीन में दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की बैठक थी। बैठक ऐसे समय में हुई जब विश्व युद्ध की आशंकाओं, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रहा है।

    जिनपिंग ने ट्रंप का औपचारिक स्वागत करते हुए ताइवान मुद्दे पर सख्त चेतावनी दी। उन्होंने इसे चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। जिनपिंग ने चेतावनी देते हुए कहा कि ताइवान पर कोई भी गलत कदम दोनों देशों के बीच टकराव और युद्ध की स्थिति पैदा कर सकता है। उन्होंने पूछा कि क्या चीन और अमेरिका थ्यूसीडाइड्स ट्रैप से बच सकते हैं? और इसके बजाय बड़े देशों के बीच सहयोग का नया मॉडल बनाने का सुझाव दिया।

    हॉर्मुज और ईरान पर सहमति
    दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि विश्व के तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हॉर्मुज स्ट्रेट हमेशा खुला और सुरक्षित रहना चाहिए। जिनपिंग ने स्पष्ट किया कि चीन इस मार्ग पर किसी भी प्रकार की सैन्य तैनाती या टोल वसूली का विरोध करता है। दोनों पक्ष इस बात पर भी एकमत हुए कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाए। वहीं, ट्रंप ने बैठक को ‘बेहद सकारात्मक और सफल’ बताया। उन्होंने जिनपिंग को अपना दोस्त और महान नेता करार दिया। वाइट हाउस के अनुसार, दोनों नेताओं ने रिश्तों को और मजबूत बनाने, व्यापार सहयोग बढ़ाने, अमेरिकी कंपनियों के लिए चीनी बाजार खोलने और चीन से अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर जोर दिया।


    बैठक में उद्योगपतियों ने भी लिया हिस्सा

    जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि भागीदार बनना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि 2026 दोनों देशों के संबंधों में नया अध्याय साबित हो। दोनों नेता इस बात पर सहमत हुए कि मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाए और रिश्तों को कभी बिगड़ने नहीं दिया जाए। बता दें कि इस बैठक में एलन मस्क, टिम कुक समेत अमेरिका के कई प्रमुख उद्योगपतियों ने भी हिस्सा लिया। बैठक के बाद आयोजित राजकीय भोज में ट्रंप ने जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन को सितंबर में वाइट हाउस आने का निमंत्रण दिया।

  • होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक

    होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जंग के बाद अब एक नया मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में फंसे जहाजों को निकालने के लिए चलाए गए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ (‘Project Freedom’) को थोड़े समय के लिए रोक दिया है. साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और एक पक्का समझौता होने के करीब है. लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी. हालांकि, राष्ट्रपति के इस ऐलान के बाद तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

    इन सब के बीच सबसे बड़ी बात है कि अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को खत्म करने का ऐलान किया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने ये ऐलान किया है. उन्होंने साफ किया कि अब अमेरिका किसी नई लड़ाई की स्थिति नहीं चाहता और शांति का रास्ता अपनाना चाहता है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि पाकिस्तान और दूसरे देशों की मांग पर और अमेरिका की ‘जबरदस्त सैन्य सफलता’ के बाद दोनों पक्षों ने मिलकर यह ऑपरेशन थोड़े समय के लिए रोकने का फैसला किया।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत एक ‘पूरे और आखिरी समझौते’ की तरफ बढ़ रही है और बहुत अच्छी प्रगति हुई है. यह रोकना दरअसल यह देखने के लिए किया गया है कि क्या यह समझौता आखिरकार हो सकता है.


    लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी

    यहां एक बहुत जरूरी बात है. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कहा कि भले ही प्रोजेक्ट फ्रीडम रुक गया हो लेकिन होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिका की नाकेबंदी पूरी तरह जारी रहेगी. यानी जहाजों को निकालने का काम रुका है लेकिन ईरान पर दबाव कम नहीं हुआ.


    डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी क्या दी?

    एक पत्रकार ने राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा कि ईरान को संघर्ष विराम यानी युद्ध रोकने के समझौते का उल्लंघन करने के लिए क्या करना होगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाब दिया कि तुम्हें पता चल जाएगा. उन्होंने कहा कि ईरान जानता है कि उसे क्या नहीं करना है. इसके बाद ट्रंप ने एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि ईरान ने छोटी-छोटी नावों से छोटे-छोटे हथियारों से हमला किया था. और फिर उन्होंने कहा कि अब ईरान के पास कोई नाव ही नहीं बची. यानी राष्ट्रपति ट्रंप का सीधा इशारा था कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उनके पास लड़ने के लिए कुछ बचा ही नहीं.


    ईरान के आम लोगों के बारे में डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के लोग विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं लेकिन उनके पास बंदूकें नहीं हैं. फिर उन्होंने कहा कि अगर 2 लाख लोग प्रदर्शन कर रहे हों और 5 या 6 बीमार सोच वाले लोग बंदूक लेकर आ जाएं और उन्हें आंखों के बीच गोली मारने लगें तो बहुत कम लोग वहां खड़े रह पाएंगे.


    UN का ईरान को अल्टीमेटम

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र में एक अहम प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसमें ईरान को सख्त चेतावनी दी गई है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर ईरान जहाजों पर हमले नहीं रोकता, अवैध टोल वसूली बंद नहीं करता और समुद्र में लगाए गए माइंस की जानकारी साझा नहीं करता, तो उस पर प्रतिबंध या अन्य कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

  • अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल

    अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल


    तेहरान।
    ईरान (Iran) अपने तेल (Oil) को इकट्ठा करने के लिए नए तरीके खोजने में जुटा है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी (American naval blockade) ने उसके निर्यात (Export) को लगभग रोक दिया है। ईरान पूरी तरह उत्पादन बंद करना नहीं चाहता। ऐसे में वह पुराने और कबाड़ टैंकों में बिना बिके तेल को भरने में जुटा है। ईरान के भीतर तेल का भंडार बढ़ने के साथ ही वह अब जंक स्टोरेज (कबाड़ भंडारण) के रूप में जाने जाने वाले पुराने स्थलों को फिर से चालू कर रहा है। वह कामचलाऊ कंटेनरों का उपयोग कर रहा है।

    इसके साथ ही रेल के जरिये चीन को कच्चा तेल भेजने की कोशिश भी कर रहा है। वह किसी टैंक, जहाज, कामचलाऊ जगह या फिर उसे जमीन के नीचे ही छोड़ने पर काम कर रहा है। ये असामान्य कदम बुनियादी ढांचे के संकट को टालने और हॉर्मुज को लेकर जारी गतिरोध में वाशिंगटन के दबाव को कम करने के लिए उठाए जा रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच यह युद्ध अब इस बात की होड़ बन गया कि पहले कौन झुकता है।


    रेल से भेजने की कोशिश काफी महंगी

    ईरान के तेल-निर्यातक संघ के प्रवक्ता हामिद हुसैनी के अनुसार, ईरान अब रेल के जरिये चीन को तेल भेजने की कोशिश कर रहा है। रेल मार्ग तेहरान को चीन के यीवू और शीआन शहरों से जोड़ता है। हालांकि, यह समुद्री मार्ग की तुलना में बहुत महंगा है।

    तेल न बिक पाना और उसे इकट्ठा करना देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालता है। इससे वह देश बातचीत की मेज पर आने या युद्ध की स्थिति में झुकने को मजबूर हो सकता है।


    तेल रखने की जगह जल्द खत्म होगी

    रिपोर्ट के अनुसार, यदि नाकाबंदी जारी रही तो मई के मध्य तक ईरान का उत्पादन मौजूदा स्तर से आधे से भी कम (12 से 13 लाख बैरल रोज) गिर सकता है। ईरान के पास तेल रखने की जगह दो हफ्ते से भी कम समय में खत्म हो सकती है। ईरान के पास जमीन पर मौजूद तेल का भंडार नाकाबंदी के दौरान 46 लाख बैरल बढ़कर अब लगभग 4.9 करोड़ बैरल हो गया।

    1. सबसे पहले तेल को बड़े-बड़े जमीनी टैंकों में भरा जाता है। जब ये टैंक भर जाते हैं, तो वे पुराने या कबाड़ टैंकों का भी इस्तेमाल करते हैं।

    2. जब जमीन पर जगह खत्म हो जाती है, तो तेल को समुद्री जहाजों में भरकर समुद्र में ही खड़ा कर दिया जाता है। इसे फ्लोटिंग स्टोरेज कहते हैं।

    3. अधिक तेल को निकालने के लिए देश भारी छूट पर तेल बेचने लगते हैं ताकि खरीदार आकर्षित हों।

    4. अगर भंडारण की जगह बिल्कुल खत्म होने वाली हो, तो तेल के कुओं को बंद करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सबसे आखिरी और जोखिम भरा रास्ता है। क्योंकि, कुओंको दोबारा शुरू करना तकनीकी रूप से कठिन और महंगा होता है।

  • ईरान के लिए ‘परमाणु हथियार’ जैसा है होर्मुज, पूर्व अमेरिकी जनरल ने बताया-इसे खोलना क्यों आसान नहीं

    ईरान के लिए ‘परमाणु हथियार’ जैसा है होर्मुज, पूर्व अमेरिकी जनरल ने बताया-इसे खोलना क्यों आसान नहीं

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब बातचीत के दौर में पहुंच चुका है, लेकिन Strait of Hormuz को लेकर हालात अब भी बेहद जटिल बने हुए हैं। Iran ने इस अहम समुद्री मार्ग पर नियंत्रण सख्त कर रखा है, जबकि United States ने ईरानी जहाजों के खिलाफ नाकाबंदी कर दी है।

    इस बीच पूर्व अमेरिकी जनरल और नाटो के सुप्रीम अलाइड कमांडर रह चुके Wesley Clark ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका जबरन होर्मुज को खोलने की कोशिश करता है, तो यह उसके लिए बेहद महंगा और लंबा सैन्य अभियान साबित हो सकता है।

    CNN से बातचीत में क्लार्क ने कहा कि मौजूदा हालात 1980 के दशक के “टैंकर युद्ध” से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने साफ किया कि आज का ईरान पहले से कहीं ज्यादा तैयार और रणनीतिक रूप से मजबूत है। ऐसे में किसी भी सैन्य कार्रवाई की कीमत बहुत भारी हो सकती है।

    ‘ईरान का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है होर्मुज’

    क्लार्क ने होर्मुज की रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा कि यह तेहरान के लिए किसी परमाणु बम से कम नहीं है। उनके मुताबिक, ईरान इस जलमार्ग का इस्तेमाल केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव के तौर पर भी कर रहा है।

    उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के सामने कई तरह के खतरे मौजूद हैं-समुद्री बारूदी सुरंगें, तेज रफ्तार हमलावर नौकाएं, मिसाइलें और आधुनिक ड्रोन। ये सभी मिलकर किसी भी ऑपरेशन को बेहद जोखिमभरा बना देते हैं।

    ‘किले में तब्दील हो चुका है यह रास्ता’

    क्लार्क के अनुसार, ईरान ने दशकों में होर्मुज को एक किलेबंद क्षेत्र में बदल दिया है। संकरे समुद्री मार्ग और आसपास की पहाड़ियों का फायदा उठाते हुए ईरानी सेना यहां हर गतिविधि पर नजर रख सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को उन्नत तकनीकी सहयोग, खासकर China से, उसकी सैन्य क्षमता को और मजबूत बनाता है।

    खोलना ही नहीं, सुरक्षित रखना भी चुनौती

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका किसी तरह इस समुद्री मार्ग को खोल भी ले, तब भी इसे सुरक्षित बनाए रखना आसान नहीं होगा। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि ईरान ने सीमित हमलों के जरिए ही व्यापारिक जहाजों पर दबाव बना दिया, जिसके बाद कई जहाजों ने खुद ही उसके साथ तालमेल बैठा लिया।

    असल चुनौती यही है कि जब तक ईरान की सहमति न हो, तब तक Strait of Hormuz को पूरी तरह सुरक्षित और सुचारू रूप से चालू रखना लगभग असंभव माना जा रहा है।

  • हॉर्मुज में भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर ईरानी फायरिंग के बाद ऐक्शन में भारत…

    हॉर्मुज में भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर ईरानी फायरिंग के बाद ऐक्शन में भारत…


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में दो भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps.- IRGC) के सैनिकों द्वारा की गई गोलीबारी की घटना को बेहद गंभीरता से लिया है। यह घटना 18 अप्रैल को हुई थी। सरकार ने तत्काल कूटनीतिक कदम उठाते हुए ईरानी राजदूत को तलब किया और इस घटना पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। अभी भी हॉर्मुज में करीब 14 भारतीय जहाज फंसे हैं जिन्हें सुरक्षित निकालने के लिए भारत ने प्रयास तेज कर दिए हैं। दूसरी ओर भारतीय नौसेना ने 7 युद्धपोत तैनात कर जहाजों को एस्कॉर्ट करना शुरू कर दिया है।


    कूटनीतिक प्रतिक्रिया और भारत का रुख

    गोलीबारी की घटना के बाद भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरानी दूत से मुलाकात कर भारत की गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस क्षेत्र से गुजरने वाले भारतीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पुष्टि की है कि भारत ने राजनयिक चैनलों के माध्यम से तेजी से कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा- हम भारतीय जहाजों की सुरक्षा के संबंध में ईरानी अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में हैं और उन्हें सुरक्षित रास्ता दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।

    यह फायरिंग ईरानी अधिकारियों और स्थानीय IRGC यूनिट के बीच ‘संचार की कमी’ का नतीजा प्रतीत होती है। राहत की बात ये है कि जहाजों को कोई बड़ा ढांचागत नुकसान नहीं पहुंचा है। घटना के दौरान जहाजों के कुछ हिस्सों में शीशे (कांच) टूटने की सूचना मिली है।


    UKMTO की रिपोर्ट और हमलों का विवरण

    यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने भी अपनी रिपोर्ट में इस घटना का जिक्र किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 18 अप्रैल को कुल तीन जहाजों को निशाना बनाया गया, जिनमें से दो भारतीय थे।

    पहली घटना: एक भारतीय ध्वज वाले तेल टैंकर के पास दो ईरानी सैन्य गनबोट (हथियारबंद नावें) आईं और बिना किसी पूर्व चेतावनी या रेडियो संपर्क के फायरिंग शुरू कर दी। गनीमत रही कि चालक दल पूरी तरह सुरक्षित बच गया।

    दूसरी घटना: इसके कुछ ही समय बाद, ओमान के तट के पास एक अन्य भारतीय सुपरटैंकर को निशाना बनाया गया। इस जहाज पर एक अज्ञात प्रोजेक्टाइल (गोला/मिसाइल) टकराने की खबर है, जिससे इस अहम समुद्री मार्ग में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

    इस गंभीर घटना के बीच, भारतीय नौसेना ने क्षेत्र में 7 युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। फंसे जहाजों को लारक आइलैंड से दूर रहने और केवल अनुमति मिलने पर आगे बढ़ने की एडवाइजरी जारी की गई है। नौसेना जहाजों को एस्कॉर्ट कर रही है।


    वर्तमान स्थिति और भारतीय जहाजों की मौजूदगी

    इस समय स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। हॉर्मुज स्ट्रेट में कम से कम 14 भारतीय ध्वज वाले जहाज अभी भी लंगर डाले हुए हैं, जिनमें तीन बड़े तेल टैंकर और एक एलपीजी (LPG) कैरियर शामिल हैं। 28 फरवरी को मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद से भारत पहले ही 10 भारतीय एलपीजी और तेल टैंकरों को इस क्षेत्र से सुरक्षित निकाल चुका है। अब बाकी बचे 14 जहाजों की सुरक्षित वापसी के प्रयास किए जा रहे हैं। ईरान में भारी संख्या में भारतीय नागरिक भी मौजूद हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना नई दिल्ली की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। भारत लगातार ईरान पर कूटनीतिक दबाव बना रहा है ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी घटना की पुनरावृत्ति न हो और भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी मिल सके।

  • होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी

    होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने ईरान (Iran) को चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता। बता दें, शुक्रवार को लेबनान (Lebanon.) में हुए सीजफायर का स्वागत करते हुए ईरान (Iran) ने होर्मुज पर लगे प्रतिंबध को हटा दिया था। हालांकि, जब ट्रंप होर्मुज के पास लगे अमेरिकी ब्लाकेड को हटाने से इनकार कर दिया, तो शनिवार को ईरान ने फिर से होर्मुज के दरवाजे बंद कर दिए।

    होर्मुज पर बदलते हालात पर ट्रंप ने शनिवार को ओवेल ऑफिस में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, “हम उनसे बात कर रहे हैं। वे स्ट्रेट को फिर से बंद करना चाहते हैं। जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे हैं और वे हमें ब्लैकमेल नहीं कर सकते।”

    इससे पहले ईरानी सेना की कमांड ने एक होर्मुज पर अमेरिकी कमांड को वादाखिलाफी बताया। ईरान की तरफ से कहा गया कि ईरानी बंदरगाहों के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी ब्लाकेड को न हटाकर अमेरिका ने अपना वादा तोड़ा है। बयान में आगे कहा गया, “जब तक अमेरिका ईरान आने वाले सभी जहाजों के लिए आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सख्त नियंत्रण में रहेगी।”

    शनिवार सुबह होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति को अपने देश और दुनिया के सामने रखते हुए ईरानी सरकारी टीवी ने बताया कि होर्मुज पर वापस नियंत्रण हासिल कर लिया गया है। ईरान की तरफ से होर्मुज पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास में ही दो भारतीय तेल टैंकरों के ऊपर गोलीबारी की खबर सामने आई है। इस घटना को लेकर सरकार ने ईरानी राजदूत को भी समन किया है।

    बता दें, 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट ने पूरे विश्व को ऊर्जा संकट में धकेल दिया है। हमले के कुछ दिन बाद ही ईरान ने होर्मुज के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया, जिसकी वजह से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं। पांच हफ्तों की लड़ाई के बाद अमेरिका और ईरान ने सीजफायर की घोषणा कर दी, लेकिन इजरायल ने लेबनान पर हमला करना जारी रखा। इसकी वजह से ईरान ने होर्मुज को खोलने से इनकार कर दिया। अमेरिकी और ईरान के बीच हुई वार्ता के बाद इजरायल ने भी लेबनान के साथ सीजफायर का ऐलान कर दिया। इसके बाद ईरान ने शुक्रवार को सीजफायर की अवधि तक होर्मुज के रास्ते व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिए। लेकिन फिर ट्रंप के बायन के बाद व्यवस्था बिगड़ गई।

  • अमेरिकी नाकाबंदी के बीच होर्मुज से गुजरा माल्टा का ध्वज लगा जहाज…

    अमेरिकी नाकाबंदी के बीच होर्मुज से गुजरा माल्टा का ध्वज लगा जहाज…


    दुबई।
    माल्टा (Malta.) का ध्वज लगे एक जहाज (Ship) ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz.) से पश्चिम की ओर यात्रा शुरू की। यह पहला कच्चा तेल (Crude oil.) ले जाने वाला टैंकर बताया जा रहा है, जब से अमेरिका (America.) ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी लगाई है। यह जानकारी दुनिया भर में जहाजों की निगरानी करने वाले शिपिंग ट्रैकिंग मॉनिटर के हवाले से दी गई है।

    माल्टा का ध्वज लगा तेल टैंकर अगियोस फैनोरियोस-I के गुरुवार को इराक के बसरा बंदरगाह पहुंचने की उम्मीद है, जहां अमेरिका की नाकेबंदी लागू नहीं है। मरीन ट्रैफिक के अनुसार, यह जहाज ओमान की खाड़ी में लगभग दो दिन तक रुका रहा और फिर उसने दोबारा मार्ग तय किया।

    इस बीच, अमेरिका की नौसेना ने कहा कि वह ईरान के आसपास व्यापारिक जहाजों पर कार्रवाई करने के लिए तैयार है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों ने क्षेत्र में मौजूद व्यापारिक जहाजों को चेतावनी दी है कि वे जहाजों को रोक सकते हैं और नाकेबंदी लागू करने के लिए बल प्रयोग कर सकते हैं।

    नौसेना के रेडियो संदेश में कहा, ईरानी बंदरगाहों की ओर या वहां से आने-जाने वाले जहाजों को रोका जा सकता है और जब्त किया जा सकता है। यह संदेश अमेरिकी सेना की मध्य कमान (सेंटकॉम) की ओर से सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया है। एक सैन्य अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर पुष्टि की कि यह संदेश इस समय क्षेत्र के सभी जहाजों को प्रसारित किया जा रहा है। रेडियो संदेश में आगे कहा गया, अगर आप नाकेबंदी का पालन नहीं करेंगे, तो बल प्रयोग किया जाएगा।

  • होर्मुज की नाकेबंदी….जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए US ने तैनात किए 15 युद्धपोत

    होर्मुज की नाकेबंदी….जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए US ने तैनात किए 15 युद्धपोत


    वाशिंगटन।
    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच गजब की तनातनी शुरू हो गई है। फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में स्थित इस अहम समुद्री रास्ते पर ईरान के बाद अमेरिका ने पहरा लगा दिया है, जिसके बाद तनाव बढ़ता ही जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अपनी धमकियों के बाद अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए पूरा दम लगा दिया है। अमेरिका ने इस क्षेत्र में 15 से ज्यादा युद्धपोत तैनात किए गए हैं, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय इलाकों के आसपास नाकेबंदी लागू कर रहे हैं।

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड फोर्स ने बताया है कि अमेरिका बहुत सख्ती से नाकेबंदी लागू कर रहा है। ऑपरेशन में अमेरिका का खास युद्धपोत यूएसएस ट्रिपोली (LHA-7) भी शामिल है। यहां से एफ-35बी लाइटनिंग II स्टील्थ फाइटर जेट, एमवी-22 ओस्प्रे विमान और हेलिकॉप्टर लगातार होर्मुज की ओर भेजे जा रहे हैं। CENTCOM ने बताया कि यूएसएस ट्रिपोली खास तरह से डिजाइन किया गया है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा फाइटर जेट तैनात किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर यह जहाज 20 से ज्यादा एफ-35बी जेट ऑपरेट कर सकता है।


    नाकेबंदी शुरू

    CENTCOM के मुताबिक, यह नाकेबंदी तय समय से शुरू कर दी गई है और इसे सख्ती से लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले हर जहाज पर नजर रखी जाएगी। हालांकि, अमेरिका ने साफ किया है कि जो जहाज ईरान के अलावा दूसरे देशों के बंदरगाहों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहे हैं, उन्हें नहीं रोका जाएगा। CENTCOM ने एक बयान में कहा, “नाकेबंदी सभी देशों के उन पोतों के खिलाफ निष्पक्ष रूप से लागू की जाएगी, जो ईरान के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं या वहां से बाहर जा रहे हैं। गैर-ईरानी बंदरगाहों के बीच यात्रा करने वाले जहाजों को होर्मुज से गुजरने की इजाजत दी जाएगी।”

    वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान की कोई फास्ट अटैकर जहाज़ें नाकेबंदी के पास आईं, तो उन्हें तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा। हालांकि विश्लेषकों का कहना कि अमेरिका के लिए केवल बल प्रयोग के जरिये जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल करना मुश्किल होगा। फिलहाल यह स्पष्ट भी नहीं है कि नाकेबंदी कैसे काम करेगी या ईरान जवाब में क्या कदम उठाएगा।


    नहीं हो पाया था युद्धविराम

    इससे पहले अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच 28 फरवरी को हुए सशर्त युद्ध-विराम समझौते को स्थायी शांति में बदलने के लिए पिछले शनिवार को पाकिस्तान में हुई बातचीत बेनतीजा रही थी, जिसके बाद अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को निशाना बनाया है। दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिर से शुरू होगी या नहीं, इस संबंध में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है।


    ईरान ने दी बड़ी धमकी

    अमेरिकी एक्शन के जवाब में ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के सभी बंदरगाहों को निशाना बनाने की धमकी दी है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग के मुताबिक, “फारस की खाड़ी और ओमान सागर में सुरक्षा या तो सभी के लिए होगी या किसी के लिए भी नहीं।” ईरानी सेना ने कहा, “इस क्षेत्र का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा।”