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  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को घरेलू बाजारों ने मजबूत शुरुआत की और प्रमुख सूचकांकों सेंसेक्स तथा निफ्टी में डेढ़ प्रतिशत के आसपास की तेजी दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना ने निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल तैयार किया, जिसका लाभ भारतीय बाजार को भी मिला।

    कारोबार की शुरुआत से ही निवेशकों में खरीदारी का उत्साह देखने को मिला। बीएसई सेंसेक्स ने करीब 1,200 अंकों की मजबूती के साथ कारोबार शुरू किया, जबकि एनएसई निफ्टी भी लगभग 24 हजार अंकों के स्तर के करीब पहुंच गया। शुरुआती घंटों में दोनों प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ हरे निशान में कारोबार करते रहे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम कम होने की धारणा ने निवेशकों को इक्विटी बाजारों की ओर आकर्षित किया है।

    विशेष रूप से व्यापक बाजार में भी मजबूती देखने को मिली। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में अच्छी खरीदारी दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि तेजी केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। निवेशकों ने विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई और बाजार का समग्र रुझान सकारात्मक बना रहा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो धातु, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं से जुड़े शेयरों में उल्लेखनीय तेजी रही। वित्तीय सेवाओं, तेल एवं गैस तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर, फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र में सीमित दबाव दर्ज किया गया, हालांकि इससे बाजार की कुल सकारात्मक धारणा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की खबर रही। दोनों देशों के बीच शांति समझौते की दिशा में हुई प्रगति को वैश्विक निवेशकों ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर बनी अनिश्चितता दूर होने से ऊर्जा आपूर्ति संबंधी चिंताएं भी कम हुई हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके सुचारु संचालन से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ी है।

    इस सकारात्मक घटनाक्रम का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई। तेल की कीमतों में कमी को भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। इससे आयात बिल पर दबाव घट सकता है और महंगाई नियंत्रण में रखने के प्रयासों को भी समर्थन मिल सकता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिस्थितियां और अधिक अनुकूल हो सकती हैं। कम तेल कीमतों का लाभ उद्योगों, परिवहन क्षेत्र और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। साथ ही आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति से जुड़े अनुमानों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    फिलहाल बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर बनी हुई है, लेकिन सप्ताह की शुरुआत जिस मजबूती के साथ हुई है, उसने निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है। आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान समझौते से जुड़े आगे के घटनाक्रम और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति निवेशकों की नजर में प्रमुख कारक बने रहेंगे।

  • तेल बाजार में लौटी स्थिरता, अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत से कच्चा तेल टूटा, एशियाई और भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार उछाल

    तेल बाजार में लौटी स्थिरता, अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत से कच्चा तेल टूटा, एशियाई और भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार उछाल

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक सहमति तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की घोषणा ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को बड़ी राहत दी है। इस घटनाक्रम के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों में सकारात्मक संकेत देखने को मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता कम होने से आने वाले समय में ऊर्जा बाजारों में स्थिरता बढ़ सकती है।

    सप्ताह के पहले कारोबारी दिन अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार दबाव में दिखाई दिए। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब पांच प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई और यह 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी तेज गिरावट के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि तेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीदों से प्रेरित रही।

    हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया था। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में इसके संचालन को लेकर किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत दिए जाने के बाद निवेशकों के बीच भरोसा बढ़ा। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी अतिरिक्त प्रतिबंध के खोलने की घोषणा ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी चिंताओं को काफी हद तक कम कर दिया। बाजार ने इस खबर को सकारात्मक रूप से लिया और तेल की कीमतों में तत्काल प्रतिक्रिया देखने को मिली।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौता औपचारिक रूप लेता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और अधिक सुचारु हो सकती है। इससे न केवल ऊर्जा बाजारों को राहत मिलेगी बल्कि कई देशों में महंगाई के दबाव को भी कम करने में मदद मिल सकती है। तेल की कीमतें कम होने से परिवहन, विनिर्माण और अन्य ऊर्जा-आधारित क्षेत्रों की लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

    इस घटनाक्रम का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी उत्साह का माहौल दिखाई दिया। जापान, हांगकांग, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया सहित कई बाजारों में निवेशकों ने खरीदारी बढ़ाई, जिससे प्रमुख सूचकांकों में मजबूत बढ़त दर्ज की गई। निवेशकों को उम्मीद है कि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव कम होगा और व्यापारिक माहौल अधिक अनुकूल बनेगा।

    भारतीय शेयर बाजारों में भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिला। सप्ताह की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों मजबूती के साथ खुले। विश्लेषकों के अनुसार भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट विशेष रूप से लाभकारी होती है क्योंकि इससे आयात लागत कम होती है और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।

    वैश्विक स्तर पर अब निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित औपचारिक समझौते पर टिकी हुई है। यदि वार्ताएं सफल रहती हैं तो ऊर्जा बाजारों में स्थिरता और वैश्विक आर्थिक विश्वास को अतिरिक्त मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद कमोडिटी बाजार में जोरदार उछाल, सोना-चांदी की कीमतों ने छुए नए शिखर

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद कमोडिटी बाजार में जोरदार उछाल, सोना-चांदी की कीमतों ने छुए नए शिखर

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव में कमी आने और शांति समझौते की पुष्टि के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में सकारात्मक माहौल देखने को मिला है। इस घटनाक्रम का असर भारतीय कमोडिटी बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जहां सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोना और चांदी की कीमतों में मजबूत तेजी दर्ज की गई। निवेशकों की बढ़ती सक्रियता और बाजार की बेहतर होती धारणा के बीच दोनों प्रमुख कीमती धातुओं ने शुरुआती कारोबार में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की।

    कमोडिटी बाजार में कारोबारी गतिविधियों की शुरुआत के साथ ही सोने की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। बाजार खुलते ही सोना अपने पिछले बंद स्तर की तुलना में हजारों रुपये की बढ़त के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। शुरुआती सत्र में कीमतें लगातार मजबूत बनी रहीं और दिन के उच्च स्तर तक पहुंच गईं। निवेशकों ने इसे वैश्विक परिस्थितियों में आए बदलाव और बाजार की स्थिरता की दिशा में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा।

    चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला। कारोबार शुरू होते ही चांदी की कीमतों में जोरदार तेजी आई और शुरुआती घंटों में ही यह तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज करने में सफल रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक मांग और निवेशकों की नई खरीदारी ने चांदी को अतिरिक्त समर्थन प्रदान किया है। इसके चलते चांदी ने महत्वपूर्ण स्तरों को पार करते हुए नई मजबूती के संकेत दिए हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की पुष्टि से वैश्विक निवेशकों में विश्वास बढ़ा है। लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितता कम होने से वित्तीय बाजारों में स्थिरता लौटने की उम्मीद जगी है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने की खबर को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय तेल और ऊर्जा व्यापार की दृष्टि से अत्यंत अहम माना जाता है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोना फिलहाल एक महत्वपूर्ण तकनीकी स्तर के करीब कारोबार कर रहा है। यदि कीमतें मौजूदा प्रतिरोध क्षेत्र के ऊपर स्थिर रहने में सफल होती हैं तो निकट अवधि में इसमें और तेजी देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, प्रमुख समर्थन स्तरों के नीचे फिसलने पर कीमतों में सीमित गिरावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल बाजार का रुख सकारात्मक बना हुआ है और निवेशक आगे के वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए हैं।

    चांदी के संबंध में भी विशेषज्ञों का दृष्टिकोण उत्साहजनक बना हुआ है। प्रमुख प्रतिरोध स्तरों को पार करने की स्थिति में इसमें और मजबूती देखने को मिल सकती है। हालांकि बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा तेजी को बनाए रखने के लिए कीमतों का ऊंचे स्तरों पर टिके रहना आवश्यक होगा। यदि ऐसा होता है तो निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है।

    वित्तीय बाजारों के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक संकेतक, ऊर्जा बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम सोना एवं चांदी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। फिलहाल शांति समझौते से पैदा हुए सकारात्मक माहौल ने निवेशकों को राहत दी है और कीमती धातुओं के बाजार में नई ऊर्जा का संचार किया है।

  • पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति

    पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में कई महीनों से जारी तनाव के बीच एलपीजी (LPG), पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) को लेकर राहत भरी खबर है। आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) और एलपीजी के दाम (LPG Price) में कटौती देखने को मिल सकती है। बड़ी खबर यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shehbaz Sharif) ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। इस समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट को फिर से आवाजाही के लिए खोलने और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी है।


    भारत के लिए क्यों है अहम यह शांति समझौता?

    भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए बड़ी मात्रा में तेल और LPG की सप्लाई होती है। अगर यह समझौता सफल रहता है तो पेट्रोल-डीजल पर दबाव कम हो सकता है। LPG कीमतों में राहत की उम्मीद बढ़ सकती है। साथ ही महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।


    ऑयल मार्केट में बड़ी गिरावट

    शांति समझौते की खबर आते ही ब्रेंट क्रूड 3% से ज्यादा टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गया। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी 3.4% गिरकर 81.99 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज खुलने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई सामान्य हो सकती है, जिससे ऊर्जा बाजार पर दबाव कम होगा।


    शेयर बाजार में लौटी रौनक

    इस खबर के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में जोरदार तेजी आई, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। S&P 500 फ्यूचर्स में 0.8% की तेजी आई और बिटकॉइन 2.1% उछलकर 65,341 डॉलर पर पहुंच गया जबकि, एथेरियम 3.1% बढ़कर 1,721 डॉलर पर। निवेशक अब मान रहे हैं कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को राहत मिलेगी।

    – रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित समझौते में अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे।
    – होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी खत्म होगी।
    – ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत शुरू होगी।
    – ईरान के तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत मिल सकती है।
    – लेबनान में सैन्य गतिविधियां रोकने पर भी सहमति बनी है।
    – समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना बताई गई है।

    बता दें दिल्ली में पेट्रोल करीब ₹102 प्रति लीटर और डीजल ₹95 प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है। जबकि, यहां आज भी 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत ₹942 और 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत ₹3,113.50 है। ईरान युद्ध के दौरान घरेलू एलपीजी सिलेंडर 89 रुपये महंगा हुआ है और कमर्शियल 1373 रुपये। पेट्रोल और डीजल चार बार में 7.50-7.50 रुपये महंगे हुए।

  • होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने दावा किया है कि क्षेत्रीय चुनौतियों के बावजूद बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में सफलता हासिल की गई है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा व्यापार की रणनीतियों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों, तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है। हाल के महीनों में इसी मार्ग को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच अमेरिका ने वैकल्पिक संचालन व्यवस्था अपनाकर तेल परिवहन जारी रखने का प्रयास किया।

    जानकारी के अनुसार तेल परिवहन की प्रक्रिया को कई चरणों में अंजाम दिया गया। शुरुआती चरण में खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल को टैंकरों के माध्यम से निर्धारित समुद्री क्षेत्रों तक पहुंचाया गया। इसके बाद समुद्र में ही एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल स्थानांतरित करने की व्यवस्था अपनाई गई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य संवेदनशील समुद्री मार्गों पर जोखिम को कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को बाधित होने से बचाना बताया जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रणनीति केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। समुद्र में जहाज-से-जहाज तेल हस्तांतरण लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा उद्योग का हिस्सा रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका उपयोग अधिक व्यापक स्तर पर देखने को मिला है। इससे तेल परिवहन करने वाली कंपनियों को वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध हुए और संभावित अवरोधों के बावजूद आपूर्ति जारी रखी जा सकी।

    समुद्री गतिविधियों की निगरानी करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जहाजों ने अपनी लोकेशन संबंधी सार्वजनिक सूचनाओं को सीमित रखा, जिसके कारण उनकी गतिविधियों पर सामान्य निगरानी प्रणालियों की पकड़ कम रही। ऐसी गतिविधियों को अक्सर ‘डार्क ट्रांजिट’ की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों और सुरक्षा मानकों के संदर्भ में लगातार बहस का विषय बनी रहती है।

    ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बनाए रखना था। यदि तेल आपूर्ति बाधित होती तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता था, जिसका असर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार करना ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक शक्तियां केवल सैन्य क्षमता ही नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा को भी अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल रखेंगी। होर्मुज क्षेत्र से जुड़ी ताजा गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक हित अब पहले से कहीं अधिक गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में होने वाला प्रत्येक घटनाक्रम वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान

    US-Iran War: भारतीय नाविकों की मौत पर उठे सवाल, होर्मुज में 6 की जा चुकी हैं जान


    तेहरान।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (America-Iran War) में भारतीय नाविकों (Indian sailors) की मौत के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद अब तक 6 भारतीयों की मौत हो चुकी है। वहीं बीते एक सप्ताह में भारतीय नाविकों वाले 3 जहाजों पर हमले हुए हैं। अमेरिका (America) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में ओमान के तट के पास इन जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। बीते बुधवार को पालाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर ‘एमटी सेट्टेबेलो’ पर हुए हालिया हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है। ये नाविक हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। इसके बाद अब इलाके में तैनात भारतीयों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। ऐसे में समझते हैं कि इस वक्त कितने भारतीय नाविक समंदर में तैनात हैं और किस तरह उन्हें हर रोज अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है।

    आंकड़ों की बात करें तो भारतीय नाविक आज अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल शिपिंग इंडस्ट्री की रीढ़ बन चुके हैं। भारत मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ग्लोबल मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा इस वक्त 3 लाख से अधिक भारतीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर जहाजों, बल्क कैरियर और तेल टैंकरों पर सक्रिय रूप से तैनात हैं।

    ये भारतीय अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग, फर्राटेदार अंग्रेजी और तकनीक में निपुण होने की वजह से वैश्विक शिपिंग कंपनियां की पहली पसंद होते हैं। यही वजह है कि फारस की खाड़ी, लाल सागर या ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले लगभग हर बड़े कमर्शियल जहाज पर भारतीय नाविक होते हैं।


    क्यों जान जोखिम में डालने को मजबूर?

    हर साल हजारों भारतीय युवा इस नौकरी की तरफ क्यों आते हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं। विदेशी झंडे वाले जहाजों पर मिलने वाली सैलरी डॉलर में होती है। यह सैलरी भारत में मिलने वाली किसी भी शुरुआती कॉर्पोरेट या इंजीनियरिंग नौकरी की तुलना में कई गुना अधिक होती है। वहीं भारतीय कानूनों के अनुसार, अगर कोई नाविक एक वित्तीय वर्ष में 183 दिनों से अधिक देश से बाहर बिताता है, तो उसे NRI का दर्जा मिलता है और कमाई पूरी तरह से टैक्स-फ्री हो जाती है। इस तरह युवा इस जॉब की तरफ आकर्षित होते हैं।


    नहीं होता रास्ता बदलने का ऑप्शन

    अब समझते हैं कि नाविकों को रिस्क क्यों लेना पड़ता है। जहाजों पर काम करने वाले नाविकों के लिए खतरा तब बढ़ जाता है जब वे अनजाने में ‘ग्रे फ्लीट’ या ‘डार्क फ्लीट’ का हिस्सा बन जाते हैं। ये वैसे संदिग्ध जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर चोरी-छिपे तेल और ईंधन की सप्लाई करते हैं। इनमें क्रू मेंबर्स के पास यह चुनने का अधिकार बहुत कम या न के बराबर होता है कि उनका जहाज किस देश से होकर गुजरेगा। रूट शिपिंग कंपनियां ही तय करती हैं। समुद्री यूनियनों ने लगातार यह मांग उठाई है कि नाविकों को संकट की घड़ी में हाई-रिस्क जोन में जाने से इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम न होने के कारण भारतीय नाविकों को मजबूरन इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।

  • होर्मुज रहे हमेशा खुला … ट्रंप-जिनपिंग के बीच बनी सहमति, कई मुद्दों पर हुई विस्तृत चर्चा

    होर्मुज रहे हमेशा खुला … ट्रंप-जिनपिंग के बीच बनी सहमति, कई मुद्दों पर हुई विस्तृत चर्चा


    बीजिंग।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के बीच बीजिंग (Beijing) के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई ऐतिहासिक शिखर बैठक में दोनों नेताओं ने वैश्विक स्थिरता और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने का संकल्प लिया। इस मुलाकात में ताइवान, हॉर्मुज स्ट्रेट, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। साल 2017 के बाद चीन में दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की बैठक थी। बैठक ऐसे समय में हुई जब विश्व युद्ध की आशंकाओं, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रहा है।

    जिनपिंग ने ट्रंप का औपचारिक स्वागत करते हुए ताइवान मुद्दे पर सख्त चेतावनी दी। उन्होंने इसे चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। जिनपिंग ने चेतावनी देते हुए कहा कि ताइवान पर कोई भी गलत कदम दोनों देशों के बीच टकराव और युद्ध की स्थिति पैदा कर सकता है। उन्होंने पूछा कि क्या चीन और अमेरिका थ्यूसीडाइड्स ट्रैप से बच सकते हैं? और इसके बजाय बड़े देशों के बीच सहयोग का नया मॉडल बनाने का सुझाव दिया।

    हॉर्मुज और ईरान पर सहमति
    दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि विश्व के तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हॉर्मुज स्ट्रेट हमेशा खुला और सुरक्षित रहना चाहिए। जिनपिंग ने स्पष्ट किया कि चीन इस मार्ग पर किसी भी प्रकार की सैन्य तैनाती या टोल वसूली का विरोध करता है। दोनों पक्ष इस बात पर भी एकमत हुए कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाए। वहीं, ट्रंप ने बैठक को ‘बेहद सकारात्मक और सफल’ बताया। उन्होंने जिनपिंग को अपना दोस्त और महान नेता करार दिया। वाइट हाउस के अनुसार, दोनों नेताओं ने रिश्तों को और मजबूत बनाने, व्यापार सहयोग बढ़ाने, अमेरिकी कंपनियों के लिए चीनी बाजार खोलने और चीन से अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर जोर दिया।


    बैठक में उद्योगपतियों ने भी लिया हिस्सा

    जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि भागीदार बनना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि 2026 दोनों देशों के संबंधों में नया अध्याय साबित हो। दोनों नेता इस बात पर सहमत हुए कि मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाए और रिश्तों को कभी बिगड़ने नहीं दिया जाए। बता दें कि इस बैठक में एलन मस्क, टिम कुक समेत अमेरिका के कई प्रमुख उद्योगपतियों ने भी हिस्सा लिया। बैठक के बाद आयोजित राजकीय भोज में ट्रंप ने जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन को सितंबर में वाइट हाउस आने का निमंत्रण दिया।

  • होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक

    होर्मुज में फंसे जहाज निकालने के लिए US का बड़ा कदम….प्रोजेक्ट फ्रीडम पर लगाया अस्थायी ब्रेक


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जंग के बाद अब एक नया मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में फंसे जहाजों को निकालने के लिए चलाए गए ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ (‘Project Freedom’) को थोड़े समय के लिए रोक दिया है. साथ ही उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और एक पक्का समझौता होने के करीब है. लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी. हालांकि, राष्ट्रपति के इस ऐलान के बाद तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

    इन सब के बीच सबसे बड़ी बात है कि अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को खत्म करने का ऐलान किया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्क रूबियो ने ये ऐलान किया है. उन्होंने साफ किया कि अब अमेरिका किसी नई लड़ाई की स्थिति नहीं चाहता और शांति का रास्ता अपनाना चाहता है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि पाकिस्तान और दूसरे देशों की मांग पर और अमेरिका की ‘जबरदस्त सैन्य सफलता’ के बाद दोनों पक्षों ने मिलकर यह ऑपरेशन थोड़े समय के लिए रोकने का फैसला किया।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत एक ‘पूरे और आखिरी समझौते’ की तरफ बढ़ रही है और बहुत अच्छी प्रगति हुई है. यह रोकना दरअसल यह देखने के लिए किया गया है कि क्या यह समझौता आखिरकार हो सकता है.


    लेकिन नाकेबंदी जारी रहेगी

    यहां एक बहुत जरूरी बात है. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कहा कि भले ही प्रोजेक्ट फ्रीडम रुक गया हो लेकिन होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिका की नाकेबंदी पूरी तरह जारी रहेगी. यानी जहाजों को निकालने का काम रुका है लेकिन ईरान पर दबाव कम नहीं हुआ.


    डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी क्या दी?

    एक पत्रकार ने राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा कि ईरान को संघर्ष विराम यानी युद्ध रोकने के समझौते का उल्लंघन करने के लिए क्या करना होगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाब दिया कि तुम्हें पता चल जाएगा. उन्होंने कहा कि ईरान जानता है कि उसे क्या नहीं करना है. इसके बाद ट्रंप ने एक बड़ी बात कही. उन्होंने कहा कि ईरान ने छोटी-छोटी नावों से छोटे-छोटे हथियारों से हमला किया था. और फिर उन्होंने कहा कि अब ईरान के पास कोई नाव ही नहीं बची. यानी राष्ट्रपति ट्रंप का सीधा इशारा था कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना को इतना नुकसान पहुंचाया है कि उनके पास लड़ने के लिए कुछ बचा ही नहीं.


    ईरान के आम लोगों के बारे में डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के लोग विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं लेकिन उनके पास बंदूकें नहीं हैं. फिर उन्होंने कहा कि अगर 2 लाख लोग प्रदर्शन कर रहे हों और 5 या 6 बीमार सोच वाले लोग बंदूक लेकर आ जाएं और उन्हें आंखों के बीच गोली मारने लगें तो बहुत कम लोग वहां खड़े रह पाएंगे.


    UN का ईरान को अल्टीमेटम

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र में एक अहम प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसमें ईरान को सख्त चेतावनी दी गई है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर ईरान जहाजों पर हमले नहीं रोकता, अवैध टोल वसूली बंद नहीं करता और समुद्र में लगाए गए माइंस की जानकारी साझा नहीं करता, तो उस पर प्रतिबंध या अन्य कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

  • अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल

    अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल


    तेहरान।
    ईरान (Iran) अपने तेल (Oil) को इकट्ठा करने के लिए नए तरीके खोजने में जुटा है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी (American naval blockade) ने उसके निर्यात (Export) को लगभग रोक दिया है। ईरान पूरी तरह उत्पादन बंद करना नहीं चाहता। ऐसे में वह पुराने और कबाड़ टैंकों में बिना बिके तेल को भरने में जुटा है। ईरान के भीतर तेल का भंडार बढ़ने के साथ ही वह अब जंक स्टोरेज (कबाड़ भंडारण) के रूप में जाने जाने वाले पुराने स्थलों को फिर से चालू कर रहा है। वह कामचलाऊ कंटेनरों का उपयोग कर रहा है।

    इसके साथ ही रेल के जरिये चीन को कच्चा तेल भेजने की कोशिश भी कर रहा है। वह किसी टैंक, जहाज, कामचलाऊ जगह या फिर उसे जमीन के नीचे ही छोड़ने पर काम कर रहा है। ये असामान्य कदम बुनियादी ढांचे के संकट को टालने और हॉर्मुज को लेकर जारी गतिरोध में वाशिंगटन के दबाव को कम करने के लिए उठाए जा रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच यह युद्ध अब इस बात की होड़ बन गया कि पहले कौन झुकता है।


    रेल से भेजने की कोशिश काफी महंगी

    ईरान के तेल-निर्यातक संघ के प्रवक्ता हामिद हुसैनी के अनुसार, ईरान अब रेल के जरिये चीन को तेल भेजने की कोशिश कर रहा है। रेल मार्ग तेहरान को चीन के यीवू और शीआन शहरों से जोड़ता है। हालांकि, यह समुद्री मार्ग की तुलना में बहुत महंगा है।

    तेल न बिक पाना और उसे इकट्ठा करना देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालता है। इससे वह देश बातचीत की मेज पर आने या युद्ध की स्थिति में झुकने को मजबूर हो सकता है।


    तेल रखने की जगह जल्द खत्म होगी

    रिपोर्ट के अनुसार, यदि नाकाबंदी जारी रही तो मई के मध्य तक ईरान का उत्पादन मौजूदा स्तर से आधे से भी कम (12 से 13 लाख बैरल रोज) गिर सकता है। ईरान के पास तेल रखने की जगह दो हफ्ते से भी कम समय में खत्म हो सकती है। ईरान के पास जमीन पर मौजूद तेल का भंडार नाकाबंदी के दौरान 46 लाख बैरल बढ़कर अब लगभग 4.9 करोड़ बैरल हो गया।

    1. सबसे पहले तेल को बड़े-बड़े जमीनी टैंकों में भरा जाता है। जब ये टैंक भर जाते हैं, तो वे पुराने या कबाड़ टैंकों का भी इस्तेमाल करते हैं।

    2. जब जमीन पर जगह खत्म हो जाती है, तो तेल को समुद्री जहाजों में भरकर समुद्र में ही खड़ा कर दिया जाता है। इसे फ्लोटिंग स्टोरेज कहते हैं।

    3. अधिक तेल को निकालने के लिए देश भारी छूट पर तेल बेचने लगते हैं ताकि खरीदार आकर्षित हों।

    4. अगर भंडारण की जगह बिल्कुल खत्म होने वाली हो, तो तेल के कुओं को बंद करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सबसे आखिरी और जोखिम भरा रास्ता है। क्योंकि, कुओंको दोबारा शुरू करना तकनीकी रूप से कठिन और महंगा होता है।

  • ईरान के लिए ‘परमाणु हथियार’ जैसा है होर्मुज, पूर्व अमेरिकी जनरल ने बताया-इसे खोलना क्यों आसान नहीं

    ईरान के लिए ‘परमाणु हथियार’ जैसा है होर्मुज, पूर्व अमेरिकी जनरल ने बताया-इसे खोलना क्यों आसान नहीं

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब बातचीत के दौर में पहुंच चुका है, लेकिन Strait of Hormuz को लेकर हालात अब भी बेहद जटिल बने हुए हैं। Iran ने इस अहम समुद्री मार्ग पर नियंत्रण सख्त कर रखा है, जबकि United States ने ईरानी जहाजों के खिलाफ नाकाबंदी कर दी है।

    इस बीच पूर्व अमेरिकी जनरल और नाटो के सुप्रीम अलाइड कमांडर रह चुके Wesley Clark ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका जबरन होर्मुज को खोलने की कोशिश करता है, तो यह उसके लिए बेहद महंगा और लंबा सैन्य अभियान साबित हो सकता है।

    CNN से बातचीत में क्लार्क ने कहा कि मौजूदा हालात 1980 के दशक के “टैंकर युद्ध” से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने साफ किया कि आज का ईरान पहले से कहीं ज्यादा तैयार और रणनीतिक रूप से मजबूत है। ऐसे में किसी भी सैन्य कार्रवाई की कीमत बहुत भारी हो सकती है।

    ‘ईरान का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है होर्मुज’

    क्लार्क ने होर्मुज की रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा कि यह तेहरान के लिए किसी परमाणु बम से कम नहीं है। उनके मुताबिक, ईरान इस जलमार्ग का इस्तेमाल केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव के तौर पर भी कर रहा है।

    उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के सामने कई तरह के खतरे मौजूद हैं-समुद्री बारूदी सुरंगें, तेज रफ्तार हमलावर नौकाएं, मिसाइलें और आधुनिक ड्रोन। ये सभी मिलकर किसी भी ऑपरेशन को बेहद जोखिमभरा बना देते हैं।

    ‘किले में तब्दील हो चुका है यह रास्ता’

    क्लार्क के अनुसार, ईरान ने दशकों में होर्मुज को एक किलेबंद क्षेत्र में बदल दिया है। संकरे समुद्री मार्ग और आसपास की पहाड़ियों का फायदा उठाते हुए ईरानी सेना यहां हर गतिविधि पर नजर रख सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को उन्नत तकनीकी सहयोग, खासकर China से, उसकी सैन्य क्षमता को और मजबूत बनाता है।

    खोलना ही नहीं, सुरक्षित रखना भी चुनौती

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका किसी तरह इस समुद्री मार्ग को खोल भी ले, तब भी इसे सुरक्षित बनाए रखना आसान नहीं होगा। हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि ईरान ने सीमित हमलों के जरिए ही व्यापारिक जहाजों पर दबाव बना दिया, जिसके बाद कई जहाजों ने खुद ही उसके साथ तालमेल बैठा लिया।

    असल चुनौती यही है कि जब तक ईरान की सहमति न हो, तब तक Strait of Hormuz को पूरी तरह सुरक्षित और सुचारू रूप से चालू रखना लगभग असंभव माना जा रहा है।