महाभियोग से पहले इस्तीफा देकर बची कार्रवाई, जस्टिस वर्मा समेत तीन मामलों में ऐसा हुआ, मिलता है ये फायदा

नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने महाभियोग प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया। 9 अप्रैल को उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस्तीफा सौंपा, जिसके साथ ही संसद में प्रस्तावित कार्रवाई स्वतः समाप्त हो गई। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मामला है, जब किसी मौजूदा जज ने महाभियोग पूरा होने से पहले पद छोड़ दिया।

पहले भी आखिरी वक्त पर रुकी कार्रवाई
देश में किसी जज को पद से हटाने की प्रक्रिया काफी कठिन मानी जाती है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। अब तक किसी भी जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं जा सका है। इससे पहले भी दो मामलों में प्रक्रिया अंतिम चरण तक पहुंची, लेकिन इस्तीफे के कारण आगे नहीं बढ़ पाई।

दो जजों ने इसी तरह छोड़ा पद
2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगे थे। राज्यसभा ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया था, लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

उसी साल सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पी.डी. दिनाकरन पर भी गंभीर आरोप लगे थे। जांच समिति गठित हुई, लेकिन कार्रवाई आगे बढ़ने से पहले ही उन्होंने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पद छोड़ दिया।

इस्तीफे से नहीं रुकते रिटायरमेंट लाभ
महाभियोग से पहले इस्तीफा देने का सबसे बड़ा असर यह होता है कि पूरी संसदीय प्रक्रिया खत्म हो जाती है। मौजूदा नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे इस्तीफा देने वाले जज की पेंशन या अन्य रिटायरमेंट सुविधाएं रोकी जा सकें। इसलिए उन्हें सभी लाभ मिलते रहते हैं।

कैसे शुरू हुआ जस्टिस वर्मा का विवाद
यह मामला मार्च 2025 में सामने आया, जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में पदस्थ थे। उनके सरकारी आवास के एक स्टोररूम में आग लगने के बाद वहां से करीब 15 करोड़ रुपये का जला हुआ नकद मिला था। हालांकि, उन्होंने इस रकम से अपना कोई संबंध होने से इनकार किया और कहा कि घटना के समय वे शहर से बाहर थे।

जांच, ट्रांसफर और महाभियोग की तैयारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने जांच शुरू की। इसके बाद उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर किया गया और उनके न्यायिक अधिकार भी सीमित कर दिए गए।

जुलाई 2025 में 100 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद लोकसभा स्पीकर ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने 13 पन्नों का पत्र लिखकर जांच प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खुद को अलग कर लिया।

अब क्या रहेगा आगे का रास्ता
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई जज महाभियोग पूरा होने से पहले इस्तीफा दे देता है, तो पूरी प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाती है। ऐसे में जज को रिटायरमेंट के सभी लाभ मिलते रहते हैं। जस्टिस वर्मा के मामले में भी अब यही स्थिति मानी जा रही है।