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  • जब सूर्या का क्रिकेट से उठ गया था भरोसा! पत्नी ने याद दिलाई 5 साल की मेहनत, ऐसे लौटा मैदान में जोश

    जब सूर्या का क्रिकेट से उठ गया था भरोसा! पत्नी ने याद दिलाई 5 साल की मेहनत, ऐसे लौटा मैदान में जोश


    नई दिल्ली। सूर्यकुमार यादव की क्रिकेट कहानी में उतार चढ़ाव हमेशा देखने को मिले हैं लेकिन हाल ही में सामने आया उनका एक खुलासा फैन्स को हैरान करने वाला है। भारत को 2026 का टी20 वर्ल्ड कप जिताने वाले सूर्यकुमार यादव एक समय क्रिकेट से संन्यास लेने के बारे में सोचने लगे थे। टीम से बाहर होने और कप्तानी गंवाने के बाद वह इस कदर निराश हो गए थे कि उन्हें अपने क्रिकेट करियर का आगे का रास्ता भी साफ नजर नहीं आ रहा था। हालांकि इस मुश्किल दौर में उनकी पत्नी देविशा शेट्टी ने उनका साथ दिया और उन्हें उनके पुराने जुनून की याद दिलाकर दोबारा मैदान पर लौटने के लिए प्रेरित किया।

    आकाश चोपड़ा को दिए इंटरव्यू में सूर्यकुमार यादव ने बताया कि टीम से बाहर होने के बाद करीब 40 से 50 दिनों तक वह घर पर बिल्कुल खाली बैठे रहे। इस दौरान उनके मन में लगातार यह सवाल चल रहा था कि अब आगे क्या करना है और क्या उन्हें क्रिकेट खेलना भी जारी रखना चाहिए। उनके मुताबिक भविष्य को लेकर तस्वीर पूरी तरह धुंधली हो गई थी। एक ऐसे खिलाड़ी के लिए यह दौर बेहद मुश्किल था जिसने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बनाई थी।

    सूर्यकुमार के लिए स्थिति उस समय और कठिन हो गई जब उन्हें कप्तानी से हटाकर टी20 टीम से भी बाहर कर दिया गया। चयनकर्ताओं ने उनकी जगह श्रेयस अय्यर को टी20 टीम की कप्तानी सौंपी। लगातार बड़े मुकाम हासिल करने के बाद अचानक टीम से बाहर होना सूर्या के लिए बड़ा झटका था। इसी दौरान उनके मन में संन्यास लेने का विचार आया।

    लेकिन इस कठिन समय में पत्नी देविशा उनकी सबसे बड़ी ताकत बनीं। देविशा ने उन्हें पीछे मुड़कर अपने उस दौर को याद करने के लिए कहा जब वह 13 से 15 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर रहे थे। उन्होंने सूर्या से सवाल किया कि आखिर उन्होंने तब बल्ला क्यों उठाया था। देविशा ने उन्हें उनके अंदर मौजूद क्रिकेट के जुनून और खेल के प्रति पागलपन की याद दिलाई।

    उन्होंने सूर्यकुमार को पिछले पांच साल की उनकी उपलब्धियां भी याद दिलाईं। पांच वर्ल्ड कप खेलना, दो बार आईसीसी टी20 प्लेयर ऑफ द ईयर का पुरस्कार जीतना, दुनिया की नंबर एक टी20 रैंकिंग हासिल करना, 2024 टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में शानदार कैच लेना और 2026 में कप्तान के तौर पर वर्ल्ड कप ट्रॉफी उठाना उनकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। देविशा ने उन्हें समझाया कि जिस मुकाम तक पहुंचने में कई खिलाड़ियों को 20 से 25 साल लग जाते हैं उसे सूर्या ने महज पांच साल में हासिल किया है।

    पत्नी की बातों का सूर्यकुमार पर गहरा असर हुआ और उन्होंने धीरे धीरे क्रिकेट में वापसी की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने दोबारा जिम जाना शुरू किया दोस्तों के साथ समय बिताया और टेनिस तथा रबर बॉल क्रिकेट खेलकर अपने पुराने जुनून को फिर से महसूस किया। सूर्या के मुताबिक पिछले दो तीन हफ्तों में उनके अंदर वह पुराना जोश दोबारा लौट आया है।

    अब सूर्यकुमार के लिए क्रिकेट सिर्फ उनका करियर नहीं बल्कि उनकी बेटी के लिए भी एक प्रेरणा बन गया है। उनका कहना है कि जब वह अपनी बेटी को देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि अब उन्हें उसके लिए खेलना है। 35 साल के सूर्यकुमार का मानना है कि उनके अंदर क्रिकेट के लिए प्यार फोकस और अनुशासन वापस आ चुका है। वह अपने बचे हुए तीन से चार साल यानी करीब 38 से 39 साल की उम्र तक उसी जुनून और पागलपन के साथ क्रिकेट खेलना चाहते हैं।

  • महज 15 साल की उम्र में कप्तानी का मौका ईशान किशन के चोटिल होते ही वैभव सूर्यवंशी बने ईस्ट जोन के कार्यवाहक कप्तान

    महज 15 साल की उम्र में कप्तानी का मौका ईशान किशन के चोटिल होते ही वैभव सूर्यवंशी बने ईस्ट जोन के कार्यवाहक कप्तान


    नई दिल्ली। दलीप ट्रॉफी के सेमीफाइनल मुकाबले में युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के लिए रविवार का दिन बेहद खास रहा। ईस्ट जोन और सेंट्रल जोन के बीच खेले जा रहे मुकाबले में सूर्यवंशी को पहली बार सीनियर फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कप्तानी की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। ईस्ट जोन के नियमित कप्तान ईशान किशन चोटिल होने के कारण मैदान से बाहर चले गए जिसके बाद टीम के उपकप्तान वैभव सूर्यवंशी ने कुछ समय के लिए कार्यवाहक कप्तान की भूमिका निभाई। इतनी कम उम्र में सीनियर क्रिकेट में कप्तानी की जिम्मेदारी मिलना सूर्यवंशी के लगातार बढ़ते कद को दर्शाता है।

    दरअसल सेंट्रल जोन की बल्लेबाजी के दौरान विकेटकीपिंग कर रहे ईशान किशन के दाहिने अंगूठे में चोट लग गई। चोट के कारण उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा। इसके बाद विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी कुमार कुशाग्र ने संभाली जबकि ईस्ट जोन के उपकप्तान वैभव सूर्यवंशी को टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी दी गई। यह सूर्यवंशी का सीनियर फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कप्तानी का पहला अनुभव रहा। इससे पहले वह अपनी बल्लेबाजी और कभी कभी गेंदबाजी को लेकर सुर्खियां बटोर चुके हैं।

    दलीप ट्रॉफी में सूर्यवंशी का प्रदर्शन पहले से ही चर्चा में रहा है। नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में उनके बल्ले से केवल आठ रन निकले थे लेकिन गेंदबाजी में उन्होंने शानदार योगदान दिया। उन्होंने महज 11 रन देकर दो विकेट हासिल किए थे। इस प्रदर्शन ने यह भी दिखाया कि सूर्यवंशी केवल बल्लेबाजी तक सीमित नहीं हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर गेंद से भी टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

    सूर्यवंशी ने खुद अपनी गेंदबाजी को लेकर दिलचस्प बात साझा की थी। उनका कहना था कि बल्लेबाजों को अक्सर गेंदबाजी करने में मजा आता है और गेंदबाजों को बल्लेबाजी करने में। ईस्ट जोन के पिछले मुकाबले में जब विरोधी टीम के विकेट नहीं गिर रहे थे तब उन्हें दो तीन ओवर गेंदबाजी करने के लिए कहा गया था। सूर्यवंशी ने खुद को विकेट लेने वाला खिलाड़ी बताते हुए मजाकिया अंदाज में कहा था कि ईशान किशन को शायद पता नहीं था कि वह विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं।

    ईस्ट जोन और सेंट्रल जोन के सेमीफाइनल में टॉस जीतकर ईस्ट जोन ने रजत पाटीदार की कप्तानी वाली सेंट्रल जोन टीम को पहले बल्लेबाजी के लिए आमंत्रित किया। सेंट्रल जोन की टीम में सारांश जैन की भी वापसी हुई है। सारांश ने इसी महीने श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो टेस्ट में भारत के लिए टेस्ट डेब्यू किया था।

    पहले दिन के शुरुआती सत्र में ईस्ट जोन के गेंदबाजों ने सेंट्रल जोन पर दबाव बनाए रखा। 32 ओवर के बाद सेंट्रल जोन का स्कोर 81 रन पर तीन विकेट था। अभिजीत के सरकार और मुकेश कुमार ने शानदार गेंदबाजी करते हुए विकेट हासिल किए। अभिजीत ने पहले घंटे में अमन मोखाडे और कुणाल चंदेला को पवेलियन भेजा जबकि भारतीय तेज गेंदबाज मुकेश कुमार ने दूसरे घंटे के अंत में कप्तान रजत पाटीदार को 12 रन के निजी स्कोर पर क्लीन बोल्ड कर दिया।

    वैभव सूर्यवंशी के लिए यह जिम्मेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बेहद कम उम्र में लगातार बड़े मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं। आईपीएल और घरेलू क्रिकेट में अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से चर्चा में आए सूर्यवंशी अब कप्तानी और गेंदबाजी जैसे पहलुओं में भी अनुभव हासिल कर रहे हैं। ईशान किशन की चोट से पैदा हुई स्थिति ने उन्हें अचानक नेतृत्व की भूमिका में ला खड़ा किया लेकिन यह मौका उनके क्रिकेटिंग सफर में एक अहम पड़ाव साबित हो सकता है। आने वाले समय में उनके खेल के साथ नेतृत्व क्षमता पर भी सभी की नजर रहेगी।

  • 60 विकेट लेकर जम्मू-कश्मीर को बनाया रणजी चैंपियन अब इंग्लैंड में आजमाएंगे किस्मत! आकिब नबी पर टीम इंडिया की नजर

    60 विकेट लेकर जम्मू-कश्मीर को बनाया रणजी चैंपियन अब इंग्लैंड में आजमाएंगे किस्मत! आकिब नबी पर टीम इंडिया की नजर


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के तेज गेंदबाज आकिब नबी के लिए भारतीय क्रिकेट में एक और बड़ा मौका दस्तक दे रहा है। रणजी ट्रॉफी के पिछले सीजन में अपनी घातक गेंदबाजी से तहलका मचाने वाले नबी अब इंग्लैंड की काउंटी चैंपियनशिप में सरे की टीम के लिए खेलते नजर आ सकते हैं। उन्हें मौजूदा डिवीजन वन सीजन के कुछ मुकाबलों के लिए सरे के साथ जोड़े जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि वह 2 सितंबर से द ओवल में यॉर्कशायर के खिलाफ होने वाले मुकाबले के लिए उपलब्ध हो सकते हैं। इसके बाद ससेक्स और ग्लैमॉर्गन के खिलाफ होने वाले मुकाबलों में भी उनके खेलने की संभावना जताई जा रही है।

    आकिब नबी ने रणजी ट्रॉफी के पिछले सीजन में अपनी गेंदबाजी से जबरदस्त प्रभाव छोड़ा था। उन्होंने महज 12.56 की औसत से 60 विकेट हासिल किए और टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। उनकी शानदार गेंदबाजी के दम पर जम्मू-कश्मीर ने पहली बार रणजी ट्रॉफी का खिताब अपने नाम किया। घरेलू क्रिकेट में इस प्रदर्शन के बाद नबी को भारतीय टीम के भविष्य के तेज गेंदबाजों में एक महत्वपूर्ण नाम माना जा रहा है।

    इंग्लैंड का संभावित काउंटी कार्यकाल नबी के लिए सिर्फ विदेशी क्रिकेट खेलने का मौका नहीं होगा बल्कि भारतीय टीम के नजरिए से भी इसे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीम मैनेजमेंट और राष्ट्रीय चयनकर्ता न्यूजीलैंड के आगामी टेस्ट दौरे को ध्यान में रखते हुए नबी को तेज गेंदबाजों के अनुकूल परिस्थितियों में खेलने का अनुभव दिलाना चाहते हैं। इंग्लैंड में रेड कूकाबुरा गेंद से गेंदबाजी करते हुए नबी की स्विंग और परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने की क्षमता को परखा जा सकता है। न्यूजीलैंड में टेस्ट क्रिकेट के दौरान भी तेज गेंदबाजों को अनुकूल परिस्थितियां मिलने की उम्मीद रहती है ऐसे में यह अनुभव उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

    नबी श्रीलंका के खिलाफ भारत की हालिया टेस्ट सीरीज का भी हिस्सा रहे थे। भारत ने यह सीरीज 1-0 से अपने नाम की लेकिन नबी को प्लेइंग इलेवन में जगह नहीं मिली थी। अब इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेलने का मौका उन्हें विदेशी परिस्थितियों में खुद को साबित करने का अवसर देगा। खास बात यह है कि इंग्लैंड में कई भारतीय खिलाड़ी पहले से काउंटी क्रिकेट में सक्रिय हैं जिससे नबी को वहां के माहौल और परिस्थितियों को समझने में भी मदद मिल सकती है।

    इंग्लैंड में भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी की बात करें तो बाएं हाथ के स्पिनर मानव सुथार वार्विकशायर के साथ फिर जुड़ने वाले हैं। कुलदीप यादव भी यॉर्कशायर के लिए काउंटी क्रिकेट खेलने लौटेंगे। सरे की टीम में भारतीय लेग स्पिनर राहुल चाहर और अनकैप्ड बल्लेबाजी ऑलराउंडर महिपाल लोमरोर भी शामिल हैं। ऐसे में नबी को विदेशी परिस्थितियों में भारतीय खिलाड़ियों के साथ खेलने और अनुभव साझा करने का मौका मिल सकता है।

    काउंटी चैंपियनशिप में अपना संभावित कार्यकाल पूरा करने के बाद नबी के इंडिया ए टीम से जुड़ने की उम्मीद है। 22 सितंबर से पुडुचेरी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ होने वाले दो रेड बॉल मुकाबलों में उनके खेलने की संभावना है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर की टीम के साथ उनके जुड़ने को लेकर भी स्थिति पर नजर रहेगी क्योंकि 1 से 5 अक्टूबर तक श्रीनगर में रेस्ट ऑफ इंडिया के खिलाफ ईरानी कप मुकाबला होना है।

    इस बीच भारतीय तेज गेंदबाजी के अनुभवी चेहरे मोहम्मद शमी और मुकेश कुमार के भी काउंटी चैंपियनशिप के बाद के चरणों में खेलने की संभावना जताई गई है। दोनों फिलहाल दलीप ट्रॉफी के सेमीफाइनल में ईस्ट जोन की ओर से खेल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में भारतीय तेज गेंदबाजों के लिए विदेशी परिस्थितियों में खुद को परखने के कई अहम मौके सामने आ सकते हैं। आकिब नबी के लिए सरे का संभावित काउंटी कार्यकाल इसी दिशा में उनके करियर का बड़ा पड़ाव साबित हो सकता है।

  • 154.5 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मचाई सनसनी 4 विश्व कप खेले 315 विकेट झटके ऐसी रही मैसूर एक्सप्रेस की क्रिकेट यात्रा

    154.5 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मचाई सनसनी 4 विश्व कप खेले 315 विकेट झटके ऐसी रही मैसूर एक्सप्रेस की क्रिकेट यात्रा


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में जब तेज गेंदबाजों की बात होती है तो जवागल श्रीनाथ का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। मैसूर एक्सप्रेस के नाम से मशहूर श्रीनाथ ने अपनी गति स्विंग और गेंद को अलग अलग अंदाज में इस्तेमाल करने की क्षमता से लंबे समय तक बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं। 31 अगस्त 1969 को कर्नाटक के मैसूर में जन्मे दाएं हाथ के तेज गेंदबाज श्रीनाथ ने उस दौर में भारतीय तेज गेंदबाजी को नई पहचान दी जब टीम में तेज गति के गेंदबाजों की संख्या सीमित हुआ करती थी। कपिल देव के बाद श्रीनाथ भारतीय तेज गेंदबाजी का सबसे प्रमुख चेहरा बने और कपिल के संन्यास के बाद उन्होंने भारतीय आक्रमण की जिम्मेदारी संभाली।

    श्रीनाथ ने 1991 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा। शुरुआती दौर में उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी तेज गति थी लेकिन करियर के दौरान उन्होंने अपनी गेंदबाजी में स्विंग और धीमी गेंद जैसे हथियार भी जोड़े। 1997 में चोट ने उनके करियर को बड़ा झटका दिया और उन्हें लगभग पूरा साल क्रिकेट से बाहर रहना पड़ा। उस समय उनकी वापसी को लेकर सवाल उठने लगे थे लेकिन श्रीनाथ ने हार नहीं मानी। वापसी के बाद उन्होंने अपनी गेंदबाजी में बदलाव किया और 1998 उनके करियर के सबसे शानदार वर्षों में शामिल हो गया। चोट के बाद उनकी गति कुछ प्रभावित हुई लेकिन विकेट लेने की क्षमता और गेंदबाजी की समझ और मजबूत होती गई।

    1999 वनडे विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ श्रीनाथ ने 154.5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंककर अपनी गति का जबरदस्त प्रदर्शन किया। लंबे समय तक यह वनडे क्रिकेट में किसी भारतीय गेंदबाज द्वारा फेंकी गई सबसे तेज गेंद का रिकॉर्ड रहा। बाद में 2023 में उमरान मलिक ने श्रीलंका के खिलाफ 156 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद डालकर यह रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। इसके बावजूद श्रीनाथ की तेज गेंदबाजी भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक खास मुकाम रखती है।

    श्रीनाथ ने भारत की ओर से चार वनडे विश्व कप खेले। 1992 1996 1999 और 2003 में वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे। 2003 विश्व कप से पहले उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला किया था लेकिन तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने उन्हें वापसी के लिए तैयार किया। श्रीनाथ ने भी कप्तान के भरोसे को सही साबित किया और 2003 विश्व कप में शानदार गेंदबाजी करते हुए 11 मैचों में 16 विकेट हासिल किए। इस प्रदर्शन ने भारत को फाइनल तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका निभाई।

    2002 में भी श्रीनाथ उस भारतीय टीम का हिस्सा थे जिसने श्रीलंका के साथ संयुक्त रूप से आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब जीता था। इसके बाद 2003 विश्व कप के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। उनके आंकड़े उनकी महानता की गवाही देते हैं। श्रीनाथ ने भारत के लिए 229 वनडे मैचों में 315 विकेट हासिल किए और वह वनडे क्रिकेट में भारत के सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले तेज गेंदबाज हैं। कुल भारतीय गेंदबाजों में केवल अनिल कुंबले उनसे आगे हैं। वह 300 से ज्यादा वनडे विकेट लेने वाले भारत के एकमात्र तेज गेंदबाज भी रहे हैं।

    टेस्ट क्रिकेट में भी श्रीनाथ का प्रदर्शन शानदार रहा। उन्होंने 67 टेस्ट मैचों में 236 विकेट अपने नाम किए। करीब 12 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर में उन्होंने भारतीय तेज गेंदबाजी को लगातार मजबूती दी और कई मुश्किल विदेशी दौरों पर टीम की गेंदबाजी की अगुआई की।

    अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद श्रीनाथ ने कमेंट्री या कोचिंग को अपना मुख्य पेशा बनाने के बजाय मैच रेफरी के रूप में नई पारी शुरू की। वह आईसीसी के प्रतिष्ठित मैच रेफरी के रूप में लंबे समय से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। क्रिकेट में उनके योगदान के लिए 1999 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। तेज गति स्विंग अनुभव और लगातार प्रदर्शन की बदौलत जवागल श्रीनाथ भारतीय क्रिकेट में उस दौर के प्रतीक बन गए जब एक अकेला तेज गेंदबाज पूरी गेंदबाजी इकाई की पहचान बन सकता था।

  • विदेशी पिचों पर सचिन या कोहली कौन बेहतर? एबी डिविलियर्स की राय ने बढ़ाई चर्चा, आंकड़ों में किसका पलड़ा भारी

    विदेशी पिचों पर सचिन या कोहली कौन बेहतर? एबी डिविलियर्स की राय ने बढ़ाई चर्चा, आंकड़ों में किसका पलड़ा भारी

    नई दिल्ली । सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली भारतीय क्रिकेट के ऐसे दो नाम हैं जिनकी तुलना अक्सर होती रही है। दोनों ने अलग-अलग दौर में भारतीय बल्लेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और दुनिया के मुश्किल क्रिकेटिंग हालात में अपनी काबिलियत साबित की। अब दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान एबी डिविलियर्स ने दोनों दिग्गजों की विदेशी परिस्थितियों में सफलता को लेकर अपनी राय रखी है। डिविलियर्स की टिप्पणी के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि सचिन और विराट में आखिर बेहतर बल्लेबाज कौन था।

    डिविलियर्स ने सचिन तेंदुलकर की उपलब्धियों को कमतर आंकने के बजाय यह कहा कि सचिन ने भारतीय बल्लेबाजों के लिए एक रास्ता तैयार किया था। उनके मुताबिक सचिन उन शुरुआती भारतीय बल्लेबाजों में थे जिन्होंने यह विश्वास पैदा किया कि उपमहाद्वीप से आने वाला बल्लेबाज तेज गेंदबाजों की उछाल और सीम वाली परिस्थितियों में भी सफल हो सकता है। हालांकि डिविलियर्स का मानना है कि विराट कोहली ने इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए उसे एक अलग स्तर तक पहुंचाया।

    डिविलियर्स की बात का सबसे चर्चित हिस्सा यही रहा कि उन्होंने विराट कोहली को विदेशी परिस्थितियों में सचिन से अधिक मजबूत बताया। उनकी राय के मुताबिक कोहली ने विदेशों में भारतीय बल्लेबाजी के आत्मविश्वास को और बढ़ाया और टीम इंडिया को विदेशी मैदानों पर एक मजबूत टेस्ट टीम बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस बयान ने सोशल मीडिया और क्रिकेट जगत में सचिन बनाम विराट की पुरानी बहस को फिर हवा दे दी है।

    हालांकि अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है। सचिन तेंदुलकर ने 200 टेस्ट मैचों में 15,921 रन बनाए और टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज बने हुए हैं। उनके टेस्ट करियर का बड़ा हिस्सा विदेशी मैदानों पर भी सफल रहा। आंकड़ों के अनुसार सचिन ने दक्षिण अफ्रीका इंग्लैंड न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में 63 टेस्ट खेलकर 51.30 की औसत से 5,387 रन बनाए। इस दौरान उन्होंने 17 शतक और 23 अर्धशतक लगाए।

    वहीं विराट कोहली ने 123 टेस्ट मैचों में 9,230 रन बनाए। भारत के बाहर खेले गए 66 टेस्ट में उनके नाम 4,774 रन दर्ज हैं। चार प्रमुख विदेशी देशों दक्षिण अफ्रीका इंग्लैंड न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में कोहली ने 46 टेस्ट मैचों में 42.08 की औसत से 3,661 रन बनाए। उनके नाम इन परिस्थितियों में 12 शतक और 14 अर्धशतक रहे। यानी कुल विदेशी आंकड़ों में सचिन का पलड़ा मजबूत नजर आता है जबकि डिविलियर्स ने कोहली के प्रभाव और उनके दौर में भारतीय टीम की मानसिकता में आए बदलाव को अधिक महत्व दिया।

    डिविलियर्स ने मौजूदा भारतीय बल्लेबाजों का भी जिक्र किया और कहा कि सचिन और विराट ने अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए मिसाल कायम की। केएल राहुल और देवदत्त पडिक्कल जैसे बल्लेबाजों को उन्होंने इसी परंपरा का हिस्सा बताया। हालांकि राहुल की विदेशी टेस्ट बल्लेबाजी पर उन्होंने सुधार की गुंजाइश भी बताई। डिविलियर्स के मुताबिक राहुल की तकनीक शानदार है लेकिन विदेशों में उनके औसत से ज्यादा की उम्मीद की जाती है। उन्होंने सलाह दी कि राहुल जब क्रीज पर जम जाएं तो अपनी पारियों को बड़े स्कोर में बदलें और शतक के बाद भी बल्लेबाजी जारी रखते हुए 150 से 180 रन जैसे बड़े स्कोर बनाने की कोशिश करें।

    दरअसल सचिन और विराट की तुलना सिर्फ आंकड़ों से पूरी तरह तय नहीं हो सकती। सचिन ने ऐसे दौर में भारतीय क्रिकेट को विश्व मंच पर स्थापित किया जब विदेशी परिस्थितियों में भारतीय बल्लेबाजों के सामने कई तरह की चुनौतियां थीं। विराट ने उसी आधार को आगे बढ़ाते हुए फिटनेस आक्रामकता और विदेशी जीत की मानसिकता को नई पहचान दी। इसलिए डिविलियर्स का बयान किसी एक खिलाड़ी को पूरी तरह महान साबित करने के बजाय दोनों की विरासत और उनके प्रभाव के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखता है। यही वजह है कि सचिन बनाम विराट की बहस शायद क्रिकेट प्रशंसकों के बीच कभी खत्म नहीं होने वाली।

  • एक सीरीज में मचाया तहलका फिर टीम इंडिया से हुए दूर, जानिए विजय भारद्वाज का पूरा क्रिकेट सफर

    एक सीरीज में मचाया तहलका फिर टीम इंडिया से हुए दूर, जानिए विजय भारद्वाज का पूरा क्रिकेट सफर


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट में कई ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिनका अंतरराष्ट्रीय करियर बेहद छोटा रहा लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनकी उपलब्धियां किसी बड़े सितारे से कम नहीं रहीं। विजय भारद्वाज भी इसी सूची में शामिल हैं। 15 अगस्त 1975 को बेंगलुरु में जन्मे इस ऑलराउंडर ने भारतीय टीम में धमाकेदार अंदाज में दस्तक दी थी। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 1999-2000 के एलजी कप में उनके प्रदर्शन ने उन्हें रातोंरात चर्चा में ला दिया था। गेंद और बल्ले दोनों से प्रभाव छोड़ने वाले भारद्वाज को उस टूर्नामेंट में प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया था।

    एलजी कप में विजय भारद्वाज ने अपनी ऑफ स्पिन गेंदबाजी से शानदार प्रदर्शन करते हुए 10 विकेट हासिल किए थे। निचले क्रम में बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने 89 रन भी बनाए थे। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय क्रिकेट के भविष्य के अहम खिलाड़ियों में गिना जाने लगा। उनकी उपयोगिता यह थी कि वह जरूरत के मुताबिक बल्लेबाजी के साथ गेंदबाजी और फील्डिंग में भी योगदान दे सकते थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उस शुरुआती सफलता को वह लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सके।

    विजय भारद्वाज ने सितंबर 1999 में भारत के लिए वनडे डेब्यू किया और इसके बाद टेस्ट क्रिकेट में भी मौका मिला। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर कुल तीन टेस्ट और 10 वनडे तक ही सीमित रहा। तीन टेस्ट की तीन पारियों में उन्होंने 28 रन बनाए और एक विकेट लिया। वहीं 10 वनडे में उन्होंने 136 रन बनाने के साथ 16 विकेट अपने नाम किए। उनका आखिरी वनडे मुकाबला 2002 में जिम्बाब्वे के खिलाफ रहा। इसके बाद उनकी भारतीय टीम में वापसी नहीं हो सकी।

    लेकिन अगर विजय भारद्वाज के पूरे क्रिकेट करियर को केवल भारत के लिए खेले 13 मुकाबलों के आधार पर देखा जाए तो उनकी कहानी अधूरी रह जाएगी। कर्नाटक के लिए उनका घरेलू क्रिकेट करियर बेहद प्रभावशाली रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 96 मैचों की 149 पारियों में 5553 रन बनाए। इस दौरान उनके बल्ले से 14 शतक और 26 अर्धशतक निकले। गेंदबाजी में भी उन्होंने 59 विकेट हासिल किए। लिस्ट ए क्रिकेट में उनके नाम 1707 रन और 46 विकेट दर्ज हैं।

    कर्नाटक के मजबूत दौर में भारद्वाज टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। वह 1990 के दशक में कर्नाटक की तीन रणजी ट्रॉफी खिताबी जीत का हिस्सा रहे। 2000 से 2002 तक उन्होंने कर्नाटक की कप्तानी भी की। घरेलू क्रिकेट में उनके लगातार प्रदर्शन ने साबित किया कि वह सिर्फ एक सीरीज के खिलाड़ी नहीं थे बल्कि लंबे समय तक उच्च स्तर पर प्रदर्शन करने की क्षमता रखते थे। उनके करियर पर चोटों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी असर पड़ा और यही वजह रही कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका सफर अपेक्षा के मुताबिक आगे नहीं बढ़ सका।

    4 नवंबर 2006 को विजय भारद्वाज ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास ले लिया। इसके बाद उन्होंने खेल से दूरी बनाने के बजाय कोचिंग और कमेंट्री को अपना नया रास्ता बनाया। वह नेशनल क्रिकेट एकेडमी से लेवल थ्री कोच के रूप में प्रमाणित हैं। आईपीएल के शुरुआती दौर में वह रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के सहायक कोच भी रहे। इसके अलावा ओमान क्रिकेट टीम के फील्डिंग कोच के रूप में भी काम किया। बाद के वर्षों में उन्होंने कन्नड़ क्रिकेट कमेंट्री और विश्लेषण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

    विजय भारद्वाज की कहानी यही बताती है कि किसी खिलाड़ी के करियर को केवल अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। भारत के लिए उनका सफर भले ही छोटा रहा लेकिन कर्नाटक क्रिकेट में उनका योगदान और बाद में कोचिंग व कमेंट्री के जरिए खेल से जुड़ाव उनकी क्रिकेट विरासत को आज भी खास बनाता है।

  • देर रात ऋषभ पंत ने CM पुष्कर धामी को किया मैसेज, बोले- ‘भटक रहा हूं…’ रखी बड़ी डिमांड

    देर रात ऋषभ पंत ने CM पुष्कर धामी को किया मैसेज, बोले- ‘भटक रहा हूं…’ रखी बड़ी डिमांड


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत इन दिनों श्रीलंका दौरे पर हैं लेकिन इसी बीच उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बन गया है। पंत ने देर रात उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को टैग करते हुए अपने लिए जमीन खरीदने में मदद की अपील की। क्रिकेटर ने बताया कि वह लंबे समय से उत्तराखंड में अपना घर बनाने और दिल्ली से अपना बेस अपने गृह राज्य में शिफ्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि जमीन की तलाश में उन्हें लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पंत के मुताबिक वह करीब तीन साल से जमीन का इंतजार कर रहे हैं और अब उन्होंने मुख्यमंत्री से इस मामले में मदद करने का अनुरोध किया है।

    ऋषभ पंत ने शुक्रवार और शनिवार की दरम्यानी रात करीब 12 बजकर 46 मिनट पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को टैग करते हुए पोस्ट किया। उन्होंने अपने संदेश में उत्तराखंड के प्रति अपने लगाव का जिक्र किया और कहा कि वह अपने राज्य में वापस लौटना चाहते हैं। पंत ने बताया कि वह उत्तराखंड में ऐसी जगह तलाश रहे हैं जहां सुविधाओं के साथ अपना घर बनाया जा सके और अपना बेस दिल्ली से उत्तराखंड शिफ्ट किया जा सके। लेकिन जमीन खरीदने की प्रक्रिया उनके लिए आसान नहीं रही है।

    पंत ने मुख्यमंत्री से जमीन खरीदने की प्रक्रिया को स्पष्ट कराने और इसमें मदद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह उत्तराखंड से जुड़े हुए हैं और अपने पहाड़ी लोगों के बीच वापस लौटना चाहते हैं। क्रिकेटर ने यह भी इच्छा जताई कि वह अपने राज्य के विकास और निर्माण में योगदान देना चाहते हैं। इसी वजह से वह उत्तराखंड में स्थायी रूप से अपना घर बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

    ऋषभ पंत ने अपनी अपील में जमीन को लेकर एक विकल्प भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि अगर सरकार उन्हें जमीन उपलब्ध कराने की अनुमति देती है तो वह उसे निर्धारित सरकारी दर पर खरीदने के लिए तैयार हैं। पंत के लिए यह केवल जमीन खरीदने का मामला नहीं है बल्कि उत्तराखंड में अपना पहला घर बनाने से जुड़ा सपना है। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले पर गंभीरता से ध्यान देने और उन्हें सही प्रक्रिया बताने की अपील की।

    पंत का उत्तराखंड से पुराना और गहरा जुड़ाव रहा है। उनका परिवार राज्य से जुड़ा हुआ है और वह कई मौकों पर उत्तराखंड के प्रति अपना लगाव जाहिर कर चुके हैं। अब उन्होंने सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री से मदद मांगकर यह साफ कर दिया है कि वह अपने गृह राज्य में वापस लौटकर यहां अपना स्थायी ठिकाना बनाना चाहते हैं।

    पंत की अपील पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने क्रिकेटर को उत्तराखंड का गौरव बताते हुए कहा कि पंत ने अपने शानदार खेल और उपलब्धियों से देश और दुनिया में देवभूमि का नाम रोशन किया है। मुख्यमंत्री ने उनकी मातृभूमि के प्रति प्रेम और उत्तराखंड लौटकर योगदान देने की भावना की सराहना की और जरूरी सहयोग का भरोसा दिया।

    ऋषभ पंत इस समय भारतीय टेस्ट टीम के साथ श्रीलंका दौरे पर हैं और टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया के अहम खिलाड़ियों में शामिल हैं। अब उनकी जमीन से जुड़ी अपील के बाद निगाहें उत्तराखंड सरकार की अगली कार्रवाई पर हैं। अगर सरकारी स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो पंत का अपने पहाड़ में पहला घर बनाने का सपना जल्द पूरा हो सकता है।

  • भारत का सबसे महान क्रिकेटर कौन? अजिंक्य रहाणे ने लिया सचिन तेंदुलकर का नाम, बताया क्यों हैं सभी युगों के महान खिलाड़ी

    भारत का सबसे महान क्रिकेटर कौन? अजिंक्य रहाणे ने लिया सचिन तेंदुलकर का नाम, बताया क्यों हैं सभी युगों के महान खिलाड़ी


    नई दिल्ली। भारत में क्रिकेट को लेकर जब भी महान खिलाड़ियों की चर्चा होती है तो सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे नाम सबसे पहले सामने आते हैं। दोनों ने अलग अलग दौर में भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयां दी हैं और दुनियाभर में अपनी पहचान बनाई है। ऐसे में जब पूर्व भारतीय बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे से भारत के सबसे महान क्रिकेटर का नाम पूछा गया तो उनके सामने आसान सवाल नहीं था। हालांकि काफी सोचने के बाद रहाणे ने जिस खिलाड़ी का नाम लिया वह क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर हैं।

    हाल ही में क्रिकेट से संन्यास लेने वाले अजिंक्य रहाणे ने स्टिक टू क्रिकेट के एक एपिसोड में भारत के ऑल टाइम महान क्रिकेटर को लेकर अपनी पसंद बताई। उनसे जब पूछा गया कि भारत का अब तक का सबसे महान क्रिकेटर कौन है तो उन्होंने कहा कि एक नाम चुनना काफी मुश्किल है लेकिन शायद सचिन तेंदुलकर। रहाणे ने सचिन को सभी युगों का महान खिलाड़ी बताया। उनके इस जवाब ने एक बार फिर सचिन तेंदुलकर की महानता और भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान को चर्चा के केंद्र में ला दिया।

    रहाणे की सचिन से मुलाकात केवल एक प्रशंसक और महान खिलाड़ी के तौर पर नहीं रही है। उन्हें कई बार सचिन के साथ ड्रेसिंग रूम साझा करने का मौका भी मिला। रहाणे ने 2011 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था और इसके बाद भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने भारत के मजबूत मध्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विराट कोहली तथा चेतेश्वर पुजारा जैसे खिलाड़ियों के साथ लंबे समय तक टीम का हिस्सा रहे।

    सचिन के साथ रहाणे का जुड़ाव घरेलू क्रिकेट और आईपीएल तक भी रहा। 2009 के आईपीएल सीजन में दोनों मुंबई इंडियंस की टीम में साथ थे। इसके अलावा घरेलू क्रिकेट में भी दोनों ने मुंबई के लिए साथ खेला। रहाणे को भारत की ओर से सचिन के साथ टेस्ट मैच खेलने का अवसर भी मिला। ऐसे में सचिन के खेल को करीब से देखने वाले रहाणे के लिए उन्हें भारत का महानतम क्रिकेटर चुनना काफी खास माना जा रहा है।

    सचिन तेंदुलकर का अंतरराष्ट्रीय करियर करीब 24 वर्षों तक चला। उन्होंने 1989 में महज 16 वर्ष की उम्र में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था। इसके बाद उन्होंने भारतीय क्रिकेट को कई ऐतिहासिक उपलब्धियां दिलाईं। सचिन ने कुल 664 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले जिनमें 200 टेस्ट 463 वनडे और एक टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबला शामिल है।

    टेस्ट क्रिकेट में सचिन के नाम 15,921 रन हैं जबकि वनडे क्रिकेट में उन्होंने 18,426 रन बनाए। वह टेस्ट और वनडे दोनों प्रारूपों में लंबे समय तक सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे। उनका नाम क्रिकेट इतिहास में कई ऐसे रिकॉर्ड के साथ दर्ज है जिन्हें हासिल करना किसी भी बल्लेबाज के लिए बेहद कठिन माना जाता है। वह दुनिया के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने 200 टेस्ट मैच खेले हैं।

    सचिन के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में 2011 वनडे विश्व कप जीत भी शामिल है। भारतीय टीम ने घरेलू मैदान पर विश्व कप अपने नाम किया और सचिन के लिए यह ट्रॉफी उनके लंबे करियर की सबसे भावुक उपलब्धियों में से एक रही। उन्होंने वर्षों तक विश्व कप जीतने का सपना देखा था और आखिरकार 2011 में यह सपना पूरा हुआ।

    विराट कोहली भी आधुनिक क्रिकेट के सबसे बड़े बल्लेबाजों में शामिल हैं और उनकी उपलब्धियों की तुलना अक्सर सचिन से की जाती है। इसके बावजूद रहाणे ने अपने ऑल टाइम महान क्रिकेटर के रूप में सचिन का नाम चुना है। उनका यह चयन इस बात को दर्शाता है कि सचिन तेंदुलकर का प्रभाव केवल उनके आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने कई पीढ़ियों के क्रिकेटरों को प्रेरित किया है।

  • रविचंद्रन अश्विन को पांचवें नंबर पर रखना पड़ा भारी, अर्शदीप सिंह बोले पर्सनली मैसेज कर मांगूंगा माफी

    रविचंद्रन अश्विन को पांचवें नंबर पर रखना पड़ा भारी, अर्शदीप सिंह बोले पर्सनली मैसेज कर मांगूंगा माफी


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज अर्शदीप सिंह एक बार फिर अपने बेबाक और मजाकिया अंदाज की वजह से सुर्खियों में हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने पसंदीदा भारतीय गेंदबाजों की रैंकिंग तैयार की। इस सूची में रविचंद्रन अश्विन को पांचवें स्थान पर रखने के बाद उन्हें खुद ही एहसास हुआ कि भारत के दिग्गज स्पिनर के साथ शायद कुछ ज्यादा ही अन्याय हो गया है। इसके बाद उन्होंने हंसते हुए कहा कि वह अश्विन भाई से व्यक्तिगत रूप से मैसेज करके माफी मांगेंगे।

    एक यूट्यूब इंटरव्यू के दौरान अर्शदीप सिंह से उनके पसंदीदा पांच भारतीय गेंदबाजों का चयन करने और उन्हें क्रमवार रैंक देने के लिए कहा गया। उन्होंने बिना ज्यादा सोच विचार किए अपनी सूची तैयार की जिसमें पहले स्थान पर भुवनेश्वर कुमार को रखा। अर्शदीप ने कहा कि भुवनेश्वर उनके निजी पसंदीदा गेंदबाज हैं और उनके लिए वह हमेशा विशेष रहेंगे इसलिए इस मामले में वह थोड़े पक्षपाती भी हैं।

    दूसरे स्थान पर उन्होंने मोहम्मद शमी को चुना। अर्शदीप के मुताबिक शमी की सीम पोजिशन और किसी भी पिच पर गेंद को स्विंग कराने की क्षमता उन्हें दुनिया के बेहतरीन तेज गेंदबाजों में शामिल करती है। तीसरे स्थान पर उन्होंने चाइनामैन स्पिनर कुलदीप यादव को रखा और कहा कि विकेट लेने की उनकी कला उन्हें बेहद खास बनाती है। चौथे नंबर पर युजवेंद्र चहल को जगह मिली जिनके साथ अर्शदीप आईपीएल में पंजाब किंग्स के लिए खेल चुके हैं। उन्होंने चहल के अनुभव और शानदार रिकॉर्ड की भी जमकर तारीफ की।

    जब सूची में आखिरी नाम रविचंद्रन अश्विन का आया तो अर्शदीप खुद असहज नजर आए। उन्होंने तुरंत कहा कि वह अश्विन को सबसे नीचे रखना नहीं चाहते थे लेकिन सूची में ऊपर कोई स्थान बचा ही नहीं था। इसके बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि सॉरी अश्विन भाई मैं आपको पर्सनली मैसेज करके माफी मांग लूंगा। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और क्रिकेट प्रशंसकों को उनका अंदाज काफी पसंद आया।

    अर्शदीप ने यह भी याद दिलाया कि इंडियन प्रीमियर लीग में पंजाब टीम के लिए खेलते समय रविचंद्रन अश्विन उनके पहले कप्तान रहे थे। उन्होंने कहा कि अश्विन केवल महान स्पिनर ही नहीं बल्कि शानदार लीडर और सीनियर खिलाड़ी भी हैं जिनसे उन्होंने काफी कुछ सीखा है। यही वजह है कि उन्हें सूची में नीचे रखने पर उन्हें खुद भी अजीब महसूस हुआ।

    हाल के महीनों में अर्शदीप भारतीय टीम के सीमित ओवरों के अहम गेंदबाज बनकर उभरे हैं। इंग्लैंड दौरे पर उन्होंने वनडे और टी20 सीरीज में टीम का हिस्सा रहते हुए प्रभावशाली प्रदर्शन किया। इसके बाद जिम्बाब्वे के खिलाफ टी20 सीरीज में उन्हें आराम दिया गया जबकि श्रीलंका दौरे की टेस्ट टीम में उन्हें शामिल नहीं किया गया है। हालांकि आगामी सीमित ओवरों की सीरीज में उनसे एक बार फिर शानदार प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।

    क्रिकेट के मैदान पर अपनी सटीक गेंदबाजी और मैदान के बाहर अपने हंसमुख स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले अर्शदीप सिंह का यह बयान एक बार फिर दिखाता है कि भारतीय टीम के खिलाड़ियों के बीच आपसी सम्मान और दोस्ताना माहौल कितना मजबूत है। यही कारण है कि उनका यह हल्का फुल्का मजाक भी फैंस के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

  • 'कैप नंबर 278 अब यहीं तक': अजिंक्य रहाणे ने लिया संन्यास, भारतीय क्रिकेट का भरोसेमंद बल्लेबाज बोला अलविदा

    'कैप नंबर 278 अब यहीं तक': अजिंक्य रहाणे ने लिया संन्यास, भारतीय क्रिकेट का भरोसेमंद बल्लेबाज बोला अलविदा


    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट के सबसे शांत, संयमित और भरोसेमंद खिलाड़ियों में गिने जाने वाले अजिंक्य रहाणे ने आखिरकार क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। 2020-21 की ऐतिहासिक बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया की धरती पर टीम इंडिया को अविस्मरणीय जीत दिलाने वाले रहाणे ने सोशल मीडिया पर भावुक संदेश साझा करते हुए अपने दो दशक लंबे क्रिकेट सफर को विराम दिया। उनके इस फैसले के साथ भारतीय क्रिकेट का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसे साहस, धैर्य और टीम भावना के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

    संन्यास की घोषणा करते हुए रहाणे ने लिखा कि कैप नंबर 278 अब यहीं तक है। उन्होंने अपने प्रशंसकों, साथियों और भारतीय क्रिकेट से जुड़े हर व्यक्ति का आभार जताते हुए कहा कि हर शुरुआत का एक अंत होता है और उन्हें लगता है कि अब आगे बढ़ने का यही सही समय है। उन्होंने कहा कि बल्लेबाजी में हमेशा सही टाइमिंग पर भरोसा किया और अब संन्यास लेने के लिए भी यही सही समय है।

    मुंबई के डोंबिवली से निकलकर भारतीय टीम तक का सफर तय करने वाले रहाणे ने कहा कि उनका बचपन सिर्फ एक सपना लेकर बीता कि एक दिन भारत की जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन्होंने हमेशा देश और टीम को खुद से ऊपर रखा और पूरी ईमानदारी के साथ क्रिकेट खेला। उनका मानना रहा कि अगर नीयत साफ हो तो खेल हमेशा आपका साथ देता है।

    रहाणे के करियर का सबसे स्वर्णिम अध्याय 2020-21 का ऑस्ट्रेलिया दौरा माना जाता है। एडिलेड टेस्ट में भारत के 36 रन पर ऑलआउट होने और विराट कोहली के स्वदेश लौटने के बाद टीम पूरी तरह दबाव में थी। ऐसे मुश्किल समय में रहाणे ने कप्तानी संभाली और मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर शानदार शतक लगाकर टीम में नया आत्मविश्वास भरा। उनकी कप्तानी में युवा और चोटों से जूझ रही भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में 2-1 से हराकर इतिहास रच दिया। यही वजह है कि उन्हें आज भी मेलबर्न का हीरो कहा जाता है।

    रहाणे लंबे समय तक विदेशी परिस्थितियों में भारत के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज रहे। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 85 टेस्ट, 90 वनडे और 20 टी-20 मुकाबले खेले। टेस्ट क्रिकेट में उनके नाम 5077 रन, 12 शतक और 26 अर्धशतक दर्ज हैं। वनडे में उन्होंने 2962 रन बनाए, जिसमें तीन शतक और 24 अर्धशतक शामिल रहे। टी-20 अंतरराष्ट्रीय में उन्होंने 375 रन बनाए। तीनों प्रारूपों को मिलाकर रहाणे ने भारत के लिए 8414 अंतरराष्ट्रीय रन बनाए और 15 शतक जड़े।

    वह 2015 विश्व कप में सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली भारतीय टीम का अहम हिस्सा रहे। इसके अलावा 2023 विश्व टेस्ट चैंपियनशिप चक्र में भी उन्होंने भारत के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि जुलाई 2023 में वेस्टइंडीज के खिलाफ आखिरी टेस्ट खेलने के बाद उन्हें टीम में दोबारा मौका नहीं मिला। उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर वापसी की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रीय टीम में वापसी का सपना पूरा नहीं हो सका।

    अपने विदाई संदेश में रहाणे ने कहा कि क्रिकेट ने उन्हें जीत भी दिखाई और हार भी, लेकिन एक जगह वह कभी नहीं हारे और वह था लोगों का प्यार। उन्होंने कहा कि अब वह अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को अपने अनुभव और खेल से सीखे गए मूल्यों को देना चाहते हैं ताकि भारतीय क्रिकेट आगे भी नई ऊंचाइयों को छूता रहे।

    अजिंक्य रहाणे भले ही मैदान पर अब बल्लेबाजी करते नजर नहीं आएंगे, लेकिन उनकी शांत कप्तानी, कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभाने का जज्बा और मेलबर्न में खेली गई ऐतिहासिक पारी भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगी।