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  • खाड़ी संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की तेज आर्थिक छलांग, 7.8 प्रतिशत जीडीपी पर भाजपा का राहुल गांधी को जवाब

    खाड़ी संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की तेज आर्थिक छलांग, 7.8 प्रतिशत जीडीपी पर भाजपा का राहुल गांधी को जवाब


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद रविशंकर प्रसाद ने भारत की 7.8 प्रतिशत आर्थिक विकास दर को देश की बदलती आर्थिक ताकत का बड़ा प्रमाण बताया है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत का यह प्रदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। खाड़ी क्षेत्र में संकट तेल आपूर्ति को लेकर चुनौतियां सप्लाई चेन में रुकावट और दुनिया के कई हिस्सों में जारी तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूत गति बनाए रखी है। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ऐसे कठिन वैश्विक माहौल में 7.8 प्रतिशत की विकास दर हासिल करना सामान्य उपलब्धि नहीं बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और मजबूत नीतिगत प्रबंधन का संकेत है।

    भाजपा नेता ने भारत की विकास दर की तुलना दुनिया की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से करते हुए कहा कि कई विकसित और उभरते देशों की विकास रफ्तार भारत की तुलना में काफी कम रही है। उन्होंने कनाडा जर्मनी ब्रिटेन अमेरिका मलेशिया और दक्षिण कोरिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक चुनौतियों के दौर में भारत ने अपेक्षाकृत अधिक मजबूत प्रदर्शन किया है। उनके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़े जोखिमों का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा लेकिन भारत ने इन परिस्थितियों में भी अपनी विकास गति को बनाए रखा।

    रविशंकर प्रसाद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को इस प्रदर्शन का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि मजबूत और स्थिर नेतृत्व किसी भी देश की आर्थिक प्रगति के लिए बेहद जरूरी होता है। संकट के समय सही फैसले लेने और चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता ही किसी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाती है। उन्होंने वित्त मंत्रालय और वित्त मंत्री के आर्थिक प्रबंधन की भी सराहना की और कहा कि सरकार की नीतियों के साथ मैन्युफैक्चरिंग व्यापार निर्माण और सेवा क्षेत्र के योगदान ने देश की विकास दर को मजबूत बनाया है।

    भाजपा सांसद ने वर्ष 2013 की आर्थिक स्थिति और वर्तमान भारत के बीच तुलना करते हुए कहा कि एक समय देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ्रैजाइल फाइव यानी कमजोर मानी जाने वाली प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया जाता था। उस दौर में निवेशकों के बीच भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता थी और नीतिगत ठहराव की चर्चा होती थी। उन्होंने अपने पुराने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कुछ निवेशक भारत में अपने निवेश को लेकर चिंतित थे लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। उनके अनुसार फ्रैजाइल फाइव से निकलकर 7.8 प्रतिशत की विकास दर तक पहुंचना भारत की आर्थिक यात्रा में बड़े बदलाव को दर्शाता है।

    रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत अर्थव्यवस्था बताने वाला दावा ताजा जीडीपी आंकड़ों के सामने टिकता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी आर्थिक विकास और आर्थिक प्रबंधन को समझने में असफल रहे हैं और लगातार ऐसे बयान देते हैं जो देश की आर्थिक उपलब्धियों के विपरीत दिखाई देते हैं। भाजपा नेता ने कहा कि एक ओर विपक्ष देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर बताने की कोशिश करता है जबकि दूसरी ओर ताजा आंकड़े भारत की तेज विकास गति का प्रमाण दे रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत की मौजूदा आर्थिक उपलब्धि को केवल एक तिमाही के आंकड़े तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह पिछले कई वर्षों में हुए व्यापक बदलाव का परिणाम है। वैश्विक संकटों युद्धों तेल आपूर्ति की अनिश्चितताओं और सप्लाई चेन की चुनौतियों के बावजूद भारत का मजबूत प्रदर्शन यह संकेत देता है कि देश की अर्थव्यवस्था कठिन परिस्थितियों का सामना करने में पहले से अधिक सक्षम हुई है। रविशंकर प्रसाद के अनुसार भारत आज वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच मजबूती के साथ खड़ा है और 7.8 प्रतिशत की विकास दर उसी बदलती आर्थिक तस्वीर का सबसे बड़ा प्रमाण है।

  • जी-20 मंच पर भारत की मजबूत आर्थिक कूटनीति: अमेरिका के साथ ग्रोथ एजेंडे पर सहमति, कई देशों ने बढ़ाई आर्थिक साझेदारी में रुचि

    जी-20 मंच पर भारत की मजबूत आर्थिक कूटनीति: अमेरिका के साथ ग्रोथ एजेंडे पर सहमति, कई देशों ने बढ़ाई आर्थिक साझेदारी में रुचि


    नई दिल्ली । जी-20 की बैठक में भारत ने वैश्विक आर्थिक विकास और वित्तीय संतुलन को लेकर अपना स्पष्ट और मजबूत रुख पेश किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि भारत अमेरिकी अध्यक्षता के तहत जी-20 में आर्थिक विकास वैश्विक असंतुलन को दूर करने और वित्तीय साक्षरता बढ़ाने जैसे प्रमुख मुद्दों पर अमेरिका के साथ पूरी तरह सहमत है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ हुई सकारात्मक और रचनात्मक द्विपक्षीय बैठक के बाद सीतारमण ने कहा कि नई दिल्ली और वाशिंगटन वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक जैसी सोच रखते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी अध्यक्षता ने विकास को प्राथमिकता दी है और वैश्विक आर्थिक असंतुलन को गंभीर चुनौती के रूप में सामने रखा है। साथ ही वित्तीय साक्षरता को भी विशेष महत्व दिया गया है और भारत इन सभी विषयों पर खुली और निष्पक्ष चर्चा का समर्थन करता है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि आर्थिक विकास जी-20 के वित्तीय ट्रैक का केंद्रीय विषय है और दुनिया की बदलती आर्थिक परिस्थितियों में वैश्विक असंतुलन को दूर करना भी बेहद जरूरी हो गया है। भारत चाहता है कि जी-20 के सदस्य देश उन सभी चुनौतियों पर गंभीर और व्यापक चर्चा करें जो अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। सीतारमण ने अमेरिकी अध्यक्षता द्वारा इन मुद्दों को प्राथमिकता देने की सराहना करते हुए कहा कि भारत एशविले में चल रही चर्चाओं में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है। उनका कहना है कि वैश्विक स्तर पर मजबूत आर्थिक सहयोग और बेहतर समन्वय के बिना आने वाली चुनौतियों का प्रभावी समाधान संभव नहीं होगा।

    जी-20 बैठक के दौरान सीतारमण ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ आर्थिक और वित्तीय मुद्दों पर अलग से बातचीत भी की। उन्होंने इस बैठक को बेहद सकारात्मक और रचनात्मक बताया। हालांकि बैठक के विस्तृत मुद्दों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई लेकिन उनके बयान से यह साफ संकेत मिला कि आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मौजूद असंतुलन को कम करने के विषय पर भारत और अमेरिका के बीच व्यापक सहमति बनी है। यह सहमति ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जब दुनिया कई आर्थिक और भू राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है।

    वित्त मंत्री ने जी-20 बैठक के दौरान पोलैंड कतर दक्षिण कोरिया और रूस के प्रतिनिधियों के साथ भी अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें कीं। उन्होंने कहा कि सभी देशों के प्रतिनिधियों के पास भारत की आर्थिक स्थिति और विकास से जुड़े तथ्य मौजूद थे और वे भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए उत्सुक दिखाई दिए। कुछ देशों के साथ आगे आर्थिक और वित्तीय संवाद की रूपरेखा भी तैयार की जा रही है। दक्षिण कोरिया के साथ इस साल के अंत में विशेष संवाद होगा जबकि कतर के साथ भी आर्थिक सहयोग को लेकर आगे बातचीत की जाएगी।

    भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था ने भी जी-20 मंच पर देश की स्थिति को मजबूती दी है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत ने 7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर्ज की है। इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि वित्तीय और पेशेवर सेवा क्षेत्र में 12.1 प्रतिशत का विस्तार दर्ज किया गया। सीतारमण ने इन आंकड़ों को वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की आर्थिक मजबूती का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा कि नई चुनौतियां सामने आने पर सरकार भारत को बेहतर और लाभकारी स्थिति में बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाती रहेगी।

    वित्त मंत्री की विदेश यात्रा की शुरुआत कनाडा से हुई जहां उन्होंने वहां के वित्त मंत्री के साथ बातचीत की। इसके बाद वह निवेश और वित्तीय एजेंसियों से चर्चा के लिए शिकागो पहुंचीं और फिर जी-20 बैठक में भाग लेने के लिए एशविले गईं। यहां कार्यक्रम पूरे होने के बाद वह न्यूयॉर्क में उन अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से मुलाकात करेंगी जो भारतीय बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। जी-20 मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी और कई देशों के साथ बढ़ते आर्थिक संवाद से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।

  • ग्रोथ के आंकड़ों पर सियासत गर्म, निर्मला सीतारमण बोलीं भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कहना करोड़ों मेहनतकश भारतीयों का अपमान

    ग्रोथ के आंकड़ों पर सियासत गर्म, निर्मला सीतारमण बोलीं भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कहना करोड़ों मेहनतकश भारतीयों का अपमान


    नई दिल्ली । एशविले में जी-20 वित्त मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान पर कड़ा पलटवार किया है जिसमें उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत अर्थव्यवस्था बताया था। सीतारमण ने कहा कि ऐसे बयान केवल सरकार की आलोचना नहीं हैं बल्कि उन करोड़ों भारतीय नागरिकों की मेहनत को भी कमतर आंकते हैं जिनके प्रयासों से देश लगातार आर्थिक प्रगति कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब भारत मजबूत विकास दर दर्ज कर रहा है और विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन देखने को मिल रहा है तब देश की अर्थव्यवस्था को नकारात्मक रूप से पेश करना तथ्यों से अलग तस्वीर दिखाने जैसा है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और सरकार से सवाल पूछना उसका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है लेकिन राजनीतिक विरोध के दौरान देश के नागरिकों की मेहनत और आर्थिक उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष को सरकार से असहमति रखने का पूरा अधिकार है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति में आम नागरिकों के योगदान को कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।

    सीतारमण ने भारत की आर्थिक स्थिति के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2026-27 वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.8 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की है। उन्होंने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि फाइनेंशियल और प्रोफेशनल सर्विस सेक्टर में 12.1 प्रतिशत का विस्तार देखने को मिला है। इसके साथ ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 700 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचना भी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि ये आंकड़े केवल कागजों पर दर्ज उपलब्धियां नहीं हैं बल्कि इसके पीछे देश के करोड़ों नागरिकों की कड़ी मेहनत और उनकी महत्वाकांक्षाएं हैं। भारत के लोग अपनी व्यक्तिगत प्रगति के साथ देश को विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाने में भी योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगातार बाहरी चुनौतियों के बावजूद भारत का आर्थिक प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है और यह देश की क्षमता को दर्शाता है।

    राहुल गांधी की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए सीतारमण ने कांग्रेस में मौजूद अर्थशास्त्रियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पार्टी में कई ऐसे लोग हैं जो आर्थिक आंकड़ों और वास्तविक तथ्यों को समझते हैं। इसलिए मजबूत विकास दर और अन्य सकारात्मक संकेतों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत कहना हैरान करने वाला है। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में सुधार की जरूरत हो सकती है और सरकार की नीतियों पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं लेकिन इससे देश की पूरी आर्थिक प्रगति को नकारा नहीं जा सकता।

    सीतारमण ने मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने कारोबार और निवेश को आसान बनाने के लिए 1000 से अधिक कानूनों को हटाया है और लगभग 40000 नियमों को सरल बनाया गया है। केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग तथा उद्योग और व्यापार जगत के साथ लगातार संवाद को भी आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण बताया गया।

    उन्होंने भरोसा जताया कि पहली तिमाही का मजबूत प्रदर्शन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए सकारात्मक संकेत है। आने वाली तिमाहियों में भी भारत की विकास गति बनाए रखने की उम्मीद है। जी-20 वित्त मंत्रियों की बैठक के दौरान अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों से होने वाली बातचीत में भी भारत की आर्थिक संभावनाओं और निवेश अवसरों पर जोर दिया जा रहा है। सीतारमण के बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आर्थिक आंकड़ों और विकास के मुद्दे पर राजनीतिक बहस के बीच देश की प्रगति को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।

  • ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान

    ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी मजबूती का प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान देश की GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के 7 प्रतिशत के अनुमान से काफी बेहतर है। एक साल पहले इसी अवधि में GDP ग्रोथ 6.9 प्रतिशत रही थी। ऐसे में ताजा आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पहली तिमाही में रियल GDP बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपए हो गई जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 75.46 लाख करोड़ रुपए थी। इसी दौरान रियल GVA में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह 73.82 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। नॉमिनल GDP भी 10.3 प्रतिशत बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपए रही। वहीं नॉमिनल GVA में 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मजबूत प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की अहम भूमिका रही है। फाइनेंस रियल एस्टेट IT और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में 12 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि देखने को मिली। इन सेक्टर्स में तेजी ने आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ घरेलू मांग को भी मजबूती प्रदान की। पैसेंजर व्हीकल और हाउसहोल्ड व्हीकल रजिस्ट्रेशन में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है जो उपभोक्ताओं के बीच खर्च करने की क्षमता और आर्थिक भरोसे का संकेत देती है।

    इस प्रदर्शन को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगाई और लागत दोनों को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद पहली तिमाही में GDP की रफ्तार 7.8 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती को दर्शाता है। हालांकि विशेषज्ञों के लिए आगे की तिमाहियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी क्योंकि लंबे समय तक चलने वाला वैश्विक तनाव आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकता है।

    GDP के आंकड़ों में इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने नई सीरीज के तहत 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया है। इसके साथ अर्थव्यवस्था को मापने की प्रक्रिया में कई नए आंकड़ों को शामिल किया गया है। GST नेटवर्क ई-वाहन डेटाबेस और घरेलू सेवाओं से जुड़े आंकड़े भी नई व्यवस्था का हिस्सा बनाए गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की GVA गणना में डबल डिफ्लेशन अप्रोच को भी शामिल किया गया है।

    नए बेस ईयर का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में समय के साथ आए बदलावों को ज्यादा सटीक तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है। मौजूदा अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान गिग इकोनॉमी ऑनलाइन सेवाओं और नए उपभोक्ता व्यवहार की भूमिका बढ़ी है। ऐसे में पुराने आधार वर्ष के बजाय नए आर्थिक ढांचे को ध्यान में रखकर आंकड़ों की गणना करना जरूरी माना गया है।

    हालांकि पहली तिमाही का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है लेकिन पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर अभी बाकी है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत रखा है। आगे की तिमाहियों में 6.4 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच वृद्धि का अनुमान जताया गया है। अगर वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का दबाव लंबे समय तक नहीं रहता है तो मजबूत घरेलू मांग और निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को आगे भी बनाए रख सकते हैं।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत पर मारुति चेयरमैन का भरोसा! 2031 तक 63 लाख कारों का बाजार होने का अनुमान

    भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत पर मारुति चेयरमैन का भरोसा! 2031 तक 63 लाख कारों का बाजार होने का अनुमान


    नई दिल्ली। मारुति सुजुकी इंडिया के चेयरमैन आरसी भार्गव ने भारतीय अर्थव्यवस्था और ऑटो सेक्टर को लेकर बड़ा भरोसा जताया है। उन्होंने कहा है कि जीएसटी 2.0 के सुधारों ने न केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर को फायदा पहुंचाया है बल्कि अर्थव्यवस्था के कई दूसरे क्षेत्रों को भी मजबूती दी है। पश्चिमी एशिया में युद्ध के कारण पैदा हुई वैश्विक अस्थिरता के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि आर्थिक सुधारों का असर जमीन पर दिखाई दे रहा है। भार्गव ने यह बात कंपनी की वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों को संबोधित करते हुए कही।

    भार्गव के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था मौजूदा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। पश्चिमी एशिया में युद्ध के कारण दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है लेकिन इसके बावजूद भारत का जीएसटी कलेक्शन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। उनका मानना है कि अगर जीएसटी में सुधार नहीं किए गए होते तो पिछले कुछ मुश्किल महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था इतना बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती। उन्होंने जीएसटी सुधारों को ऐतिहासिक बदलाव बताते हुए केंद्र सरकार और संबंधित सभी पक्षों के प्रयासों की सराहना की।

    मारुति सुजुकी चेयरमैन ने कहा कि आर्थिक सुधारों से देश की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है और इसका सीधा असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। जब कारोबार का विस्तार होता है तो रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से सुधारों की प्रक्रिया को और तेज करने की अपील की। साथ ही कारोबार करना आसान बनाने और तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनके अनुसार सरकारी कामकाज में तकनीक का अधिक इस्तेमाल होने से भ्रष्टाचार और देरी को कम करने में मदद मिल सकती है।

    आरसी भार्गव ने यह भी कहा कि देश में जितनी तेजी से संपत्ति का निर्माण होगा उतनी ही तेजी से सरकारी राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। उनका मानना है कि यदि सरकारी कार्यक्रम इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो आर्थिक विकास का लाभ समाज के ज्यादा बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है। इस दौरान उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद विकास की संभावनाओं को लेकर भी सकारात्मक रुख जाहिर किया।

    ऑटोमोबाइल सेक्टर की बात करें तो मारुति सुजुकी ने आने वाले वर्षों में कार बाजार के मजबूत विस्तार का अनुमान जताया है। कंपनी के अनुसार वर्ष 2031 तक भारत में कार इंडस्ट्री का आकार 61 लाख से 63 लाख यूनिट तक पहुंच सकता है। खासतौर पर छोटी कारों के बाजार में आने वाले वर्षों में तेज वृद्धि की उम्मीद जताई गई है। कंपनी इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता में लगातार विस्तार कर रही है।

    मारुति सुजुकी की इंस्टॉल्ड प्रोडक्शन क्षमता वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक 29 लाख यूनिट तक पहुंचाने की योजना है। इसके बाद वित्त वर्ष 2030-31 के अंत तक इसे बढ़ाकर 36.5 लाख यूनिट करने का लक्ष्य रखा गया है। कंपनी ने अगले पांच वर्षों के लिए अपना पूंजीगत खर्च भी बढ़ाकर 77500 करोड़ रुपए कर दिया है। भार्गव ने संकेत दिया कि कंपनी का यह बड़ा निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता और आने वाले समय में ऑटोमोबाइल बाजार में बढ़ती मांग पर भरोसे को दर्शाता है।

  • 2047 का विकसित भारत अब दूर नहीं! सिर्फ 20 साल बाकी, वित्त मंत्री सीतारमण बोलीं- सुधारों को चाहिए और ज्यादा समर्थन

    2047 का विकसित भारत अब दूर नहीं! सिर्फ 20 साल बाकी, वित्त मंत्री सीतारमण बोलीं- सुधारों को चाहिए और ज्यादा समर्थन


    नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को लेकर बड़ा संदेश देते हुए कहा है कि यह लक्ष्य अब मुश्किल से 20 वर्ष दूर रह गया है। ऐसे में भारत को आर्थिक और संरचनात्मक सुधारों की रफ्तार को और तेज करने के लिए व्यापक समर्थन की जरूरत होगी। अमेरिका के शिकागो में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिभाशाली और व्यापक अनुभव रखने वाले लोगों के साथ ऐसे लोगों का सहयोग भी जरूरी है जो नई सोच और नए विचारों के साथ भारत की विकास यात्रा को मजबूती दे सकें। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में पूंजी को बेहद महत्वपूर्ण बताया और कहा कि किसी देश की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त पूंजी आवश्यक होती है।

    सीतारमण ने भारत की आर्थिक नीतियों और राजकोषीय अनुशासन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार ने वर्ष 2030 तक कर्ज को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य तय किया है। सरकार इसी दिशा में लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर्ज का स्तर उनकी जीडीपी के 200 प्रतिशत से भी अधिक है लेकिन भारत ने अपने लिए राजकोषीय अनुशासन का स्पष्ट रास्ता चुना है। वित्त मंत्री के अनुसार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए तय किए गए लक्ष्यों की दिशा में भी सरकार ने निर्धारित प्रगति हासिल की है।

    वित्त मंत्री ने भारत की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि देश की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो रहा है और यह सुधार किसी नियम को दरकिनार करके हासिल नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक कल्याण के लिए जरूरी संसाधनों को रोककर भी आर्थिक मजबूती हासिल नहीं की जा रही है बल्कि अर्थव्यवस्था का उचित और संतुलित प्रबंधन इसकी मुख्य वजह है। उनके मुताबिक भारत ने आर्थिक विकास के साथ सामाजिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।

    सीतारमण ने वैश्विक आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हाल के दौर में कच्चे तेल एलपीजी और उर्वरक जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति में मुश्किलें सामने आईं। इन वस्तुओं को भारत तक पहुंचाने वाले जहाजों को पर्याप्त बीमा कवर मिलने में भी दिक्कतें आईं और जोखिम प्रीमियम काफी बढ़ गया। ऐसी परिस्थितियों में आयात और आपूर्ति व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता था।

    उन्होंने बताया कि सरकार ने बजट में एक घोषणा के जरिए ऐसा फंड उपलब्ध कराया जिससे जोखिम के कारण शिपिंग कंपनियों को चुकाने पड़ने वाले अतिरिक्त प्रीमियम में सहायता दी जा सके। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि वैश्विक संकट का सीधा असर भारतीय किसानों परिवारों और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र पर न पड़े। वित्त मंत्री के अनुसार इस कदम से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिली और भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की कोशिश की गई।

    उर्वरक की उपलब्धता का उदाहरण देते हुए सीतारमण ने कहा कि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति में कमी के बावजूद भारत में उर्वरक की कमी महसूस नहीं होने दी गई। सरकार ने बाजारों को लगातार यह जानकारी उपलब्ध कराई कि देश को कितनी मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता होगी। इससे आपूर्ति की योजना बनाने और जरूरत के मुताबिक संसाधन जुटाने में मदद मिली।

    वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच कई देशों की आर्थिक गणनाएं प्रभावित हुईं लेकिन भारत ने अपनी सीमाओं के बावजूद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अपने नागरिकों को सुरक्षित रखने की कोशिश की। उनके बयान का व्यापक संदेश यही रहा कि विकसित भारत 2047 का लक्ष्य हासिल करने के लिए आने वाले वर्षों में आर्थिक अनुशासन निवेश सुधार नवाचार और वैश्विक भारतीय समुदाय के सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। अब जब लक्ष्य लगभग दो दशक की दूरी पर है तब सुधारों की गति और उनके प्रभाव को बढ़ाना सरकार की बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।

  • आयात पर निर्भरता घटाएगी सरकार की नई योजना, देश में बनेंगे कंटेनर और 53 हजार से ज्यादा नौकरियां

    आयात पर निर्भरता घटाएगी सरकार की नई योजना, देश में बनेंगे कंटेनर और 53 हजार से ज्यादा नौकरियां


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार देश में कंटेनर निर्माण को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ी तैयारी कर रही है। प्रस्तावित कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग असिस्टेंस स्कीम यानी सीएमएएस के जरिए भारत में कंटेनर बनाने की क्षमता को मजबूत किया जाएगा। सरकार का अनुमान है कि इस योजना से देश में 53 हजार से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इनमें करीब 3000 प्रत्यक्ष रोजगार और 50000 से ज्यादा अप्रत्यक्ष रोजगार शामिल होंगे। इस योजना का असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इससे भारत के समुद्री परिवहन लॉजिस्टिक्स और निर्यात आयात से जुड़े पूरे इकोसिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के मुताबिक 10000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली सीएमएएस योजना कंटेनर निर्माण के क्षेत्र में निवेश तकनीकी विकास और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित होगी। इसके तहत अलग अलग आकार के कंटेनर जहाजों के बेड़े के विकास और घरेलू स्तर पर कंटेनरों की खरीद को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। सरकार का अनुमान है कि इससे करीब 99149 करोड़ रुपये के निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। इससे देश में कंटेनर निर्माण के साथ साथ इससे जुड़े सहायक उद्योगों को भी फायदा होगा। कॉर्नर कास्टिंग लकड़ी के फ्रेम और कॉर्टेन स्टील जैसे उत्पाद बनाने वाले उद्योगों में भी मांग बढ़ सकती है।

    भारत के लिए इस योजना की जरूरत इसलिए भी अहम है क्योंकि देश हर साल बड़ी संख्या में खाली कंटेनरों का आयात करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी जरूरतों और कंटेनरों की पुनःस्थिति के लिए हर साल करीब 20 लाख खाली कंटेनर आयात करता है। घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से इस आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ साथ देश में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा और लॉजिस्टिक्स की लागत तथा उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

    वैश्विक व्यापार में समुद्री परिवहन की भूमिका को देखते हुए कंटेनर किसी भी देश की सप्लाई चेन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन के अनुसार दुनिया के कुल माल व्यापार का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्ग से होता है। ऐसे में कंटेनरों की पर्याप्त उपलब्धता वैश्विक व्यापार की गति बनाए रखने के लिए जरूरी है। हाल के वर्षों में भू राजनीतिक तनावों के कारण समुद्री मार्गों पर दबाव और माल ढुलाई की लागत में उतार चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे माहौल में भारत का घरेलू कंटेनर निर्माण पर जोर रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सरकार का कहना है कि सीएमएएस भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी समुद्री विनिर्माण इकोसिस्टम तैयार करने में मदद करेगी। यह योजना मेक इन इंडिया और मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 जैसी पहलों के अनुरूप है। इसके जरिए देश की सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। सरकार पहले ही जहाज निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 70000 करोड़ रुपये के शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस पैकेज की घोषणा कर चुकी है। अब कंटेनर निर्माण को प्रोत्साहन मिलने से भारत के समुद्री विनिर्माण क्षेत्र को और व्यापक आधार मिलने की उम्मीद है। लंबे समय में यह कदम रोजगार बढ़ाने के साथ भारत को समुद्री निर्माण और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • Fitch का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम, BBB- रेटिंग बरकरार; FY27 में 6.4% GDP ग्रोथ का अनुमान

    Fitch का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम, BBB- रेटिंग बरकरार; FY27 में 6.4% GDP ग्रोथ का अनुमान


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और ऊर्जा संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को BBB- पर स्थिर आउटलुक के साथ बरकरार रखा है। इसके साथ ही भारत की अल्पकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग F3 पर भी कायम रखी गई है। फिच का यह आकलन ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और भू राजनीतिक तनाव का असर कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल रहा है। इसके बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर रेटिंग एजेंसी का भरोसा बना हुआ है।

    फिच के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत विकास क्षमता मौजूद है और पिछले कुछ वर्षों में देश ने अलग अलग आर्थिक झटकों का जिस तरह सामना किया है उससे इसकी लचीलापन क्षमता साबित हुई है। एजेंसी का मानना है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने का भारत का रिकॉर्ड और नीतिगत विश्वसनीयता में सुधार आगे भी आर्थिक वृद्धि का आधार बनेगा। हालांकि ऊर्जा संकट के कारण निकट अवधि में कुछ चुनौतियां जरूर बनी हुई हैं लेकिन इनसे भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विकास क्षमता पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।

    फिच ने मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष यानी FY27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह पिछले तीन वर्षों में दर्ज 7.4 प्रतिशत की औसत विकास दर से कम है लेकिन इसके बावजूद BBB रेटिंग वाले देशों की औसत विकास दर 2 प्रतिशत के मुकाबले भारत की अनुमानित वृद्धि तीन गुना से भी अधिक है। यही अंतर भारत की आर्थिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर अलग पहचान देता है। एजेंसी का कहना है कि हाल के वर्षों में भारत ने कई तरह के आर्थिक और बाहरी झटकों के बावजूद अपनी मजबूती बनाए रखी है और आगे भी यही रुझान जारी रहने की उम्मीद है।

    हालांकि भारत के सामने कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। फिच ने अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से जुड़ी अनिश्चितता को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है। भारत दुनिया का एक बड़ा शुद्ध ऊर्जा आयातक है ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों की कीमतों में तेजी का असर देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ सकता है। इसके बावजूद फिच को उम्मीद है कि ऊर्जा संकट से जुड़े जोखिम लंबे समय तक भारत की विकास संभावनाओं को प्रभावित नहीं करेंगे।

    महंगाई के मोर्चे पर भी फिच ने भारत को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक अनुमान दिया है। एजेंसी का अनुमान है कि FY27 में औसत महंगाई दर 4.1 प्रतिशत रह सकती है जबकि FY26 में यह 2.1 प्रतिशत थी। ऊर्जा संकट के कारण महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका जरूर है लेकिन फिच के मुताबिक यह भारतीय रिजर्व बैंक की 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर रहने की उम्मीद है। मुख्य महंगाई दर भी करीब 4 प्रतिशत के आसपास स्थिर बनी हुई है जिससे कीमतों के दबाव को लेकर फिलहाल बड़ी चिंता नहीं दिखाई दे रही है।
    महंगाई के मोर्चे पर भी फिच ने भारत को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक अनुमान दिया है। एजेंसी का अनुमान है कि FY27 में औसत महंगाई दर 4.1 प्रतिशत रह सकती है जबकि FY26 में यह 2.1 प्रतिशत थी। ऊर्जा संकट के कारण महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका जरूर है लेकिन फिच के मुताबिक यह भारतीय रिजर्व बैंक की 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर रहने की उम्मीद है। मुख्य महंगाई दर भी करीब 4 प्रतिशत के आसपास स्थिर बनी हुई है जिससे कीमतों के दबाव को लेकर फिलहाल बड़ी चिंता नहीं दिखाई दे रही है।

    फिच ने यह भी माना कि राजकोषीय नीति ने ऊर्जा संकट से पैदा होने वाले महंगाई के दबाव को सीमित करने में मदद की है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ है। हालांकि एजेंसी का अनुमान है कि ऊर्जा संकट के दूसरे दौर के प्रभाव और अल नीनो से जुड़े जोखिमों को देखते हुए आरबीआई साल के अंत में अपनी नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर सकता है। ऐसी स्थिति में रेपो रेट 5.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

    कुल मिलाकर फिच की ताजा रेटिंग भारत की आर्थिक मजबूती पर वैश्विक भरोसे को दर्शाती है। विकास दर में कुछ कमी का अनुमान होने के बावजूद भारत की वृद्धि क्षमता अभी भी दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और समान रेटिंग वाले देशों से काफी बेहतर बनी हुई है। ऊर्जा कीमतों और वैश्विक तनाव जैसी चुनौतियों के बीच आर्थिक स्थिरता बनाए रखना आने वाले समय में भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

  • भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल

    भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल


    नई दिल्ली। भारत में सोने को लेकर निवेश का नजरिया तेजी से बदल रहा है। कभी परंपरा और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाने वाला सोना अब डिजिटल निवेश और वित्तीय संपत्ति के रूप में भी देखा जाने लगा है। इस बदलाव में देश की Gen Z पीढ़ी की भूमिका अहम मानी जा रही है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की रिपोर्ट ‘स्वर्णिम उड़ान 2047’ के मुताबिक, युवा पीढ़ी पारंपरिक आभूषणों की तुलना में डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF जैसे विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रही है।

    Gen Z बदल रही गोल्ड में निवेश की परंपरा
    नई पीढ़ी सोने को केवल विरासत के तौर पर संभालकर रखने के बजाय इसे एक एसेट के रूप में देख रही है। डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF में निवेश के पीछे आसान खरीदारी, कम मात्रा में निवेश और जरूरत पड़ने पर उसे कैश में बदलने जैसी सुविधाएं प्रमुख वजह हैं।

    WGC के मुताबिक, वर्ष 2035 तक भारत की Gen Z की कुल खरीद क्षमता 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे में इस पीढ़ी की निवेश आदतों में बदलाव का असर देश के गोल्ड मार्केट के साथ-साथ व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    घरों में 31 हजार टन से ज्यादा सोना
    भारत के घरों में 31 हजार टन से अधिक सोना मौजूद होने का अनुमान है। इसकी कीमत 315 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है। इसके मुकाबले भारत के पास करीब 880 टन का आधिकारिक गोल्ड रिजर्व है। बड़ी मात्रा में घरेलू सोना अभी वित्तीय व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा नहीं है।

    ASSOCHAM की एक रिपोर्ट में भी भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की विशाल मात्रा का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, अगर घरेलू सोने का एक छोटा हिस्सा भी वित्तीय साधनों में लगाया जाता है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी मिल सकती है।

    सिर्फ 2% सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ा तो बड़ा फायदा
    रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि घरेलू सोने का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा भी वित्तीय साधनों में स्थानांतरित होने पर वर्ष 2047 तक भारत की GDP में 7.5 ट्रिलियन डॉलर तक का अतिरिक्त योगदान हो सकता है। वहीं, अगर घरों में रखा 5 प्रतिशत सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ता है तो भारत का आयात बिल करीब 90 अरब डॉलर तक कम हो सकता है।

    गोल्ड को उत्पादक संपत्ति में बदलने की तैयारी
    विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू सोने को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने पर मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और कृषि जैसे क्षेत्रों के लिए पूंजी उपलब्ध हो सकती है। गोल्ड मॉनिटाइजेशन, गोल्ड-लिंक्ड सेविंग स्कीम और गोल्ड लोन जैसे विकल्प इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। गोल्ड लोन के बढ़ते आंकड़े भी इस बदलाव की ओर संकेत करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में नवंबर 2025 तक गोल्ड लोन का आंकड़ा 24.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

    अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक संपत्ति बन सकता है सोना
    देश में 38 करोड़ से अधिक Gen Z की बड़ी आबादी है। इस पीढ़ी की बदलती निवेश प्राथमिकताएं गोल्ड मार्केट का स्वरूप बदल सकती हैं। अगर घरेलू सोना बड़ी मात्रा में वित्तीय प्रणाली में आता है तो बाजार में पूंजी की उपलब्धता बढ़ सकती है, निवेश के लिए अधिक संसाधन मिल सकते हैं और सोने के आयात पर निर्भरता घट सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की भी संभावना है। ऐसे में भारत के घरों में पड़ा पुस्तैनी सोना आने वाले वर्षों में सिर्फ आभूषण या विरासत नहीं, बल्कि देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

  • दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि

    दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि


    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में निर्यात के मोर्चे पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून के दौरान देश का कुल निर्यात वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर 11.37 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 232.73 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और व्यापारिक चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे माहौल में भारत का मजबूत निर्यात प्रदर्शन वैश्विक बाजार में उसकी बढ़ती साख और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दर्शाता है।

    पहली तिमाही के दौरान वस्तु निर्यात 129.32 अरब डॉलर दर्ज किया गया जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले काफी अधिक रहा। हालांकि इस दौरान आयात भी बढ़ने से वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 86.86 अरब डॉलर तक पहुंच गया लेकिन इसके बावजूद निर्यात में दर्ज हुई तेज वृद्धि भारतीय विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। दूसरी ओर सेवा क्षेत्र ने भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सेवा निर्यात बढ़कर 103.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जबकि सेवा व्यापार अधिशेष भी बढ़कर 49.43 अरब डॉलर दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी वित्तीय सेवाएं और अन्य पेशेवर सेवाएं वैश्विक स्तर पर लगातार भारत की पहचान मजबूत कर रही हैं।

    जून महीने के आंकड़े भी उत्साहजनक रहे। इस दौरान वस्तु निर्यात 40.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष जून के मुकाबले उल्लेखनीय वृद्धि है। वहीं सेवा निर्यात भी बढ़कर 33.03 अरब डॉलर रहा। लगातार बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारतीय निर्यातक बदलते वैश्विक बाजार की मांग के अनुरूप खुद को तेजी से ढाल रहे हैं और नए अवसरों का लाभ उठा रहे हैं।

    नॉन पेट्रोलियम निर्यात में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। अप्रैल से जून के दौरान यह 106.30 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.44 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि भारत का निर्यात केवल ऊर्जा उत्पादों पर निर्भर नहीं है बल्कि विनिर्माण और उच्च मूल्य वाले उत्पाद भी वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं।

    विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो रत्न एवं आभूषण उद्योग ने सबसे तेज वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा इंजीनियरिंग उत्पादों जैविक और अकार्बनिक रसायनों इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा चावल के निर्यात में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारत धीरे धीरे वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं और निर्यात बढ़ाने वाली नीतियों का सकारात्मक असर भी इन आंकड़ों में दिखाई देता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं और घरेलू उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती है तो आने वाले महीनों में भारत का निर्यात और अधिक मजबूत हो सकता है। हालांकि बढ़ते व्यापार घाटे को संतुलित करने और निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सरकार को लॉजिस्टिक्स लागत कम करने नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और घरेलू उद्योगों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करने होंगे। कुल मिलाकर पहली तिमाही के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी अपनी निर्यात क्षमता के दम पर विकास की नई कहानी लिख रहा है।