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  • 2000 नोट वापसी में रिकॉर्ड: बाजार से लगभग खत्म, RBI ने जारी किए नए आंकड़े..

    2000 नोट वापसी में रिकॉर्ड: बाजार से लगभग खत्म, RBI ने जारी किए नए आंकड़े..

    नई दिल्ली। 2000 रुपये के नोटों को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है, जिसमें यह साफ हुआ है कि लगभग पूरी राशि बैंकिंग सिस्टम में वापस आ चुकी है। इन नोटों को चलन से हटाने के बाद से लगातार वापसी की प्रक्रिया चल रही थी और अब यह अपने अंतिम चरण के करीब पहुंच गई है।
    जानकारी के अनुसार, जब इन नोटों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, तब बाजार में इनकी कुल वैल्यू लगभग 3.56 लाख करोड़ रुपये थी। समय के साथ लोगों ने इन्हें बैंकिंग चैनल में जमा करना शुरू किया और अब यह आंकड़ा घटकर करीब 5,451 करोड़ रुपये तक रह गया है। इसका मतलब है कि लगभग पूरी मुद्रा वापस सिस्टम में आ चुकी है।
    वापसी की इस प्रक्रिया के दौरान लोगों को कई सुविधाएं दी गईं, ताकि वे आसानी से अपने पास मौजूद नोट बैंक खाते में जमा करा सकें। इसके लिए देशभर के अधिकृत केंद्रों पर इन्हें बदलने और जमा करने की व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा, डाक सेवाओं के जरिए भी नोट भेजने की सुविधा उपलब्ध कराई गई, जिससे दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोग भी इसका लाभ उठा सके।
    हालांकि इन नोटों को चलन से हटाने की घोषणा की गई थी, लेकिन इन्हें पूरी तरह अमान्य नहीं किया गया है। यानी ये अभी भी कानूनी रूप से वैध मुद्रा हैं, लेकिन रोजमर्रा के लेन-देन में इनका उपयोग लगभग खत्म हो चुका है।
    धीरे-धीरे हुई इस वापसी से यह साफ हो गया है कि बड़ी मात्रा में नकदी अब बैंकिंग सिस्टम में समाहित हो चुकी है। इससे नकदी प्रबंधन को संतुलित करने और वित्तीय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद मिली है।
    अब स्थिति यह है कि 2000 रुपये के नोट लगभग बाजार से गायब हो चुके हैं और केवल बहुत सीमित मात्रा में ही शेष बचे हैं। यह पूरा बदलाव देश की मुद्रा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।
  • आर्थिक मजबूती का संकेत, अप्रैल 2026 में रिकॉर्ड तोड़ GST कलेक्शन ₹2.43 लाख करोड़ तक पहुंचा, बाजार और व्यापार गतिविधियों में दिखी तेजी

    आर्थिक मजबूती का संकेत, अप्रैल 2026 में रिकॉर्ड तोड़ GST कलेक्शन ₹2.43 लाख करोड़ तक पहुंचा, बाजार और व्यापार गतिविधियों में दिखी तेजी

    नई दिल्ली।
    April 2026 भारत की आर्थिक कहानी में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है, जब वस्तु एवं सेवा कर यानी GST कलेक्शन ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए ₹2.43 लाख करोड़ का ऐतिहासिक आंकड़ा छू लिया। यह उपलब्धि केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं बल्कि देश की आर्थिक गतिविधियों में आई मजबूती और बाजार में बढ़ती रफ्तार का संकेत भी मानी जा रही है। इस भारी-भरकम कलेक्शन के पीछे घरेलू कारोबार की स्थिर गति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आए बदलावों का भी बड़ा योगदान देखा गया है।

    इस बार GST संग्रह में सबसे बड़ा प्रभाव आयात क्षेत्र से देखने को मिला है, जहां वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने टैक्स संग्रह को अप्रत्याशित रूप से ऊपर पहुंचा दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों के बढ़ने से आयात बिल महंगा हुआ, जिसका सीधा असर कर संग्रह पर पड़ा और यह हिस्सेदारी पिछले साल की तुलना में काफी अधिक दर्ज की गई। इसके साथ ही घरेलू बाजार में मांग स्थिर बनी रहने से भी कुल राजस्व को मजबूती मिली, जिससे पूरे कर ढांचे में संतुलन बना रहा।

    सरकारी अनुमानों के अनुसार अप्रैल 2026 में नेट GST कलेक्शन भी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर लगभग ₹2.11 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि देश में आर्थिक गतिविधियां लगातार विस्तार की ओर बढ़ रही हैं और कर अनुपालन में भी सुधार देखा जा रहा है। घरेलू लेनदेन से प्राप्त राजस्व में भी हल्की लेकिन स्थिर बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने कुल संग्रह को मजबूत आधार प्रदान किया।

    इस अवधि में एक और महत्वपूर्ण पहलू GST रिफंड से जुड़ा रहा, जहां कुल रिफंड राशि बढ़कर लगभग ₹31,793 करोड़ तक पहुंच गई। यह पिछले साल की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कारोबारी लेनदेन में तेजी के साथ-साथ कर समायोजन की प्रक्रिया भी सक्रिय रही है। विशेष रूप से घरेलू रिफंड में तेज उछाल देखा गया, जो लगभग आधे से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि निर्यात से जुड़े रिफंड में हल्की गिरावट दर्ज की गई, जो वैश्विक व्यापार परिस्थितियों में आए बदलावों का संकेत देती है।

    आर्थिक विश्लेषण में यह भी देखा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने आयात लागत को प्रभावित किया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से कर संग्रह बढ़ा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि वैश्विक बाजार की गतिविधियां भारत की कर प्रणाली पर सीधा प्रभाव डालती हैं। कुल मिलाकर अप्रैल 2026 का GST प्रदर्शन यह दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत और स्थिर विकास पथ पर आगे बढ़ रही है, जहां घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार दोनों मिलकर राजस्व वृद्धि को गति दे रहे हैं।

  • वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर

    वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू राजनीतिक तनावों के बीच देश की मौद्रिक नीति को लेकर बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले निर्णय से बच रहा है और आगे की दिशा आर्थिक आंकड़ों और जोखिमों के विस्तृत आकलन के आधार पर तय की जाएगी। उन्होंने इसे वेट एंड वॉच की स्थिति बताया और कहा कि मौजूदा समय में स्थिरता बनाए रखना प्राथमिकता है।

    अपने एक अंतरराष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों और वैश्विक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की भूमिका भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी आय के प्रवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि पश्चिम एशिया भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार क्षेत्र है, जो देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा, आयात का महत्वपूर्ण भाग और कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही उर्वरक आयात और विदेशी रेमिटेंस में भी इस क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह की गहरी आर्थिक निर्भरता के कारण किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

    आरबीआई गवर्नर ने विशेष रूप से दूसरे दौर के प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आपूर्ति व्यवधान यदि लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनका असर धीरे धीरे कीमतों और उत्पादन लागत पर फैल सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। इस प्रकार की स्थिति केवल अस्थायी नहीं होती बल्कि आर्थिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

    मौद्रिक नीति को लेकर उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में तटस्थ रुख बनाए हुए है और हाल के महीनों में की गई ब्याज दरों में कटौती के बाद अब स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति पूरी तरह डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाती है और बदलते आर्थिक संकेतकों के अनुसार लगातार जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करती रहती है ताकि नीति निर्णय संतुलित और प्रभावी बने रहें।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन की सराहना की और बताया कि यूनिफाइड पेमेंट सिस्टम के माध्यम से लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की डिजिटल प्रगति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक नए डिजिटल लोन सिस्टम पर काम चल रहा है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और छोटे व्यवसायों को त्वरित और आसान ऋण उपलब्ध कराना है।

    वित्तीय अनुशासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि देश का राजकोषीय घाटा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार कम हुआ है, जो आर्थिक प्रबंधन में सुधार का संकेत है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सरकारी ऋण अनुपात में भी धीरे धीरे सुधार देखा जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा ईरान युद्ध का असर… महंगे तेल ने बिगाड़ी हालत


    नई दिल्ली।
    ग्लोबल स्तर (Global Level) पर बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में तेज उछाल अब भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर भी असर दिखाने लगा है। हाल ही में आई मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) की रिपोर्ट में भी इसका संकेत साफ दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक, महंगे तेल की वजह से भारत की आर्थिक ग्रोथ पर दबाव बढ़ गया है। यही वजह है कि FY2027 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान घटाकर 6.2% कर दिया गया है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत पर कैसा पड़ेगा?

    आपको बता दें कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। इससे ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों की जेब पर दबाव बढ़ता है और खर्च कम हो जाता है, जिससे डिमांड भी कमजोर पड़ने लगती है।


    95 डॉलर प्रति बैरल होंगी तेल की कीमतें

    रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमतें औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं, तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी, कंपनियों का मुनाफा घटेगा और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, जो बढ़कर करीब 5.1% तक पहुंचने का अनुमान है।

    85% कच्चा तेल आयात
    भारत की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वह अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ जाता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी बढ़कर 2.5% तक जा सकता है। इससे रुपये पर भी दबाव बन सकता है।

    किस-किस पर होगा असर?
    इसका असर आम लोगों से लेकर कंपनियों और सरकार तक सभी पर पड़ता है, जहां आम आदमी की खरीदारी घटती है, वहीं कंपनियों के खर्च बढ़ जाते हैं और सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है। हालांकि, RBI (Reserve Bank of India) फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए स्थिति संभालने की कोशिश कर सकता है। अगर हालात और बिगड़ते हैं और तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो ग्रोथ 5.7% तक गिर सकती है और महंगाई 6% के पार जा सकती है। फिर भी मजबूत घरेलू मांग और सरकारी नीतियों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था इस चुनौती का सामना करने में सक्षम मानी जा रही है।

  • डॉलर के आगे कमजोर पड़ा रुपया, पहली बार 94 के पार, जानिए क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट ?

    डॉलर के आगे कमजोर पड़ा रुपया, पहली बार 94 के पार, जानिए क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट ?


    नई दिल्ली। भारतीय करेंसी में गिरावट का सिलसिला जारी है और शुक्रवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। पहली बार रुपया 94 के पार पहुंच गया। कारोबार के दौरान यह 94.84 तक फिसल गया, जबकि दिन के अंत में 94.81 पर बंद हुआ।

    विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर रुपये पर साफ दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अब तक रुपया करीब 11 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। यह गिरावट पिछले एक दशक में किसी भी वित्त वर्ष की तुलना में सबसे अधिक मानी जा रही है।

    रुपये में गिरावट के प्रमुख कारण

    विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल रुपये पर दबाव बना रहा है। जानकारों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रह सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है और इसका सीधा असर करेंसी पर पड़ रहा है।

    विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना भी एक बड़ी वजह है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक महीने में करीब 13 अरब डॉलर की निकासी की गई है, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ा है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने भी स्थिति को और कमजोर किया है। युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया करीब 4 फीसदी तक गिर चुका है। इस अनिश्चित माहौल ने निवेशकों के भरोसे को भी प्रभावित किया है।

    आगे क्या रह सकता है रुख?

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब तक ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये में बड़ी मजबूती की संभावना कम है। हालांकि सरकार अपने स्तर पर स्थिति संभालने की कोशिश कर रही है।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती का फैसला लिया है, जिससे आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, इससे सरकारी राजस्व पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • जनवरी के मुकाबले फरवरी में थोक महंगाई बढ़ी, मैन्युफैक्चरिंग और खाद्य कीमतों का असर

    जनवरी के मुकाबले फरवरी में थोक महंगाई बढ़ी, मैन्युफैक्चरिंग और खाद्य कीमतों का असर

    नई दिल्ली: भारत में थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई पर आधारित महंगाई दर फरवरी महीने में बढ़कर 2.13 प्रतिशत हो गई है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक खाद्य और गैर-खाद्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण यह वृद्धि दर्ज की गई है।

    इससे पहले जनवरी में थोक महंगाई दर 1.81 प्रतिशत थी जबकि पिछले साल फरवरी में यह 2.45 प्रतिशत दर्ज की गई थी। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के बयान के अनुसार फरवरी 2026 में महंगाई दर सकारात्मक रहने की मुख्य वजह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, बेसिक मेटल, खाद्य उत्पाद, गैर-खाद्य उत्पाद और टेक्सटाइल की कीमतों में वृद्धि रही।

    आंकड़ों के अनुसार फरवरी में खाद्य उत्पादों की थोक महंगाई दर 2.19 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 1.55 प्रतिशत थी। हालांकि सब्जियों की कीमतों में कुछ राहत देखने को मिली है। सब्जियों में थोक महंगाई दर जनवरी के 6.78 प्रतिशत से घटकर फरवरी में 4.73 प्रतिशत पर आ गई। इसके बावजूद दाल, आलू, अंडे, मांस और मछली जैसी वस्तुओं की कीमतों में पिछले महीने की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई है।

    मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी महंगाई का दबाव बढ़ा है। फरवरी में मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की थोक महंगाई दर जनवरी के 2.86 प्रतिशत से बढ़कर 2.92 प्रतिशत हो गई। वहीं गैर-खाद्य पदार्थों की श्रेणी में महंगाई दर जनवरी के 7.58 प्रतिशत से बढ़कर फरवरी में 8.80 प्रतिशत हो गई। हालांकि ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में महंगाई दर अभी भी नकारात्मक बनी हुई है। फरवरी में फ्यूल और पावर बास्केट की थोक महंगाई दर -3.78 प्रतिशत रही, जबकि जनवरी में यह -4.01 प्रतिशत थी।

    इससे पहले सरकार ने खुदरा महंगाई दर के भी आंकड़े जारी किए थे। फरवरी में खुदरा महंगाई दर 3.21 प्रतिशत दर्ज की गई, जो जनवरी के 2.74 प्रतिशत से 0.47 प्रतिशत अधिक है।ग्रामीण इलाकों में फरवरी में खुदरा महंगाई दर 3.37 प्रतिशत रही जबकि जनवरी में यह 2.73 प्रतिशत थी। वहीं शहरी क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर फरवरी में 3.02 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 2.75 प्रतिशत थी।

    खाद्य महंगाई की बात करें तो फरवरी में यह 3.47 प्रतिशत रही। ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई दर 3.46 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 3.48 प्रतिशत दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य और मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आने वाले महीनों में महंगाई पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।

  • AI के दौर में 80 लाख नौकरियों की दरकार, पी. चिदंबरम ने जताई सामाजिक विस्फोट की आशंका

    AI के दौर में 80 लाख नौकरियों की दरकार, पी. चिदंबरम ने जताई सामाजिक विस्फोट की आशंका


    नई दिल्ली । कृत्रिम मेधा एआई के तेजी से विस्तार के बीच भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार सृजन की है। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने चेतावनी दी है कि देश को हर साल कम से कम 80 लाख नई नौकरियां पैदा करनी होंगी, जबकि वास्तविक आवश्यकता इससे भी अधिक हो सकती है। उनका कहना है कि आधिकारिक बेरोजगारी दर भले 5.1 प्रतिशत बताई जाती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कहीं अधिक गंभीर है। युवा बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और लगभग 55 प्रतिशत लोग स्वरोजगार या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं, जो अस्थिर आय और असुरक्षित भविष्य का संकेत है।

    चिदंबरम ने कहा कि एआई मानव क्षमताओं और उत्पादकता को कई गुना बढ़ाने की क्षमता रखता है, लेकिन इसके साथ बड़े पैमाने पर रोजगार विस्थापन का खतरा भी जुड़ा है। उन्होंने डारियो अमोदेई के उस विश्लेषण का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि एआई अभूतपूर्व गति से श्रम बाजारों को बाधित कर सकता है और निकट भविष्य में वाइट कॉलर नौकरियों का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है। टिकट चेकर, बस और ट्रेन कंडक्टर, रेल सिग्नलकर्मी, स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट, बैंक कर्मचारी, अनुवादक और निजी शिक्षक जैसी पारंपरिक नौकरियां स्वचालन की चपेट में आ सकती हैं।

    हाल के घटनाक्रम भी इस आशंका को बल देते हैं। Microsoft के सीईओ ने संकेत दिया है कि कई भूमिकाओं में स्वचालन बढ़ेगा और कंपनी ने 2025 में हजारों कर्मचारियों की छंटनी की। इसी तरह Tata Consultancy Services ने पुनर्गठन के तहत बारह हजार से अधिक कर्मचारियों को हटाने की घोषणा की। टेक निवेशक विनोद खोसला का मानना है कि एआई के कारण आईटी सेवाएं और बीपीओ उद्योग आने वाले वर्षों में बुनियादी बदलाव से गुजरेंगे।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एआई को भविष्य और समृद्धि का माध्यम बताया है, लेकिन चिदंबरम का तर्क है कि भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना विकसित देशों से भिन्न है। यहां उच्चतर माध्यमिक स्तर पर नामांकन में गिरावट देखी जाती है और उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात 45-50 प्रतिशत के बीच है। अधिकांश स्नातक डिग्रीधारी रोजगार योग्य कौशल से वंचित रहते हैं, जिससे उपयुक्त नौकरी पाना कठिन हो जाता है।

    उन्होंने आगाह किया कि यदि शहरी क्षेत्रों में भी रोजगार सिमटने लगे और शिक्षित युवाओं को आईटी व अन्य कुशल क्षेत्रों में अवसर न मिलें, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। समाधान के तौर पर उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रबंधन में बड़े निवेश, कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा, गैर-रोजगारपरक पाठ्यक्रमों की समीक्षा और स्थानीय बाजारों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। एमएसएमई क्षेत्र को सबसे बड़ा रोजगार सृजक बताते हुए उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग इन उद्यमों की उत्पादकता बढ़ाने में किया जाए, न कि केवल लागत घटाने में।

    चिदंबरम का निष्कर्ष स्पष्ट है तकनीक को अपनाना अनिवार्य है, लेकिन इसके साथ रोजगार सृजन की सामाजिक जिम्मेदारी भी तय करनी होगी। अन्यथा, काम से वंचित समाज असंतुलन और असंतोष की ओर बढ़ सकता है। एआई का प्रभाव आने वाले वर्षों में और स्पष्ट होगा, इसलिए अभी से ठोस नीतिगत कदम उठाने का समय है।

  • शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1,048 अंक टूटा, निफ्टी 25,500 के नीचे फिसला

    शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1,048 अंक टूटा, निफ्टी 25,500 के नीचे फिसला


    नई दिल्ली /मुंबई में शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार भारी दबाव में नजर आया और कारोबार के अंत में प्रमुख सूचकांक तेज गिरावट के साथ बंद हुए। 13 फरवरी के कारोबारी सत्र में BSE Sensex 1,048.16 अंक यानी 1.25 प्रतिशत की गिरावट के साथ 82,626.76 पर बंद हुआ, जबकि NSE Nifty 50 336.10 अंक यानी 1.30 प्रतिशत टूटकर 25,471.10 पर आ गया। पूरे दिन बाजार में बिकवाली का दबाव बना रहा और निवेशकों की धारणा कमजोर दिखी।

    गिरावट का नेतृत्व मेटल शेयरों ने किया। सेक्टोरल सूचकांकों में Nifty Metal 3.31 प्रतिशत की गिरावट के साथ सबसे बड़ा लूजर रहा, जबकि Nifty Commodities 2.24 प्रतिशत नीचे बंद हुआ। इसके अलावा Nifty Realty 2.23 प्रतिशत, Nifty Energy 2.04 प्रतिशत, Nifty FMCG 1.90 प्रतिशत, Nifty Oil & Gas 1.88 प्रतिशत, Nifty PSE 1.68 प्रतिशत और Nifty Consumption 1.63 प्रतिशत की कमजोरी के साथ बंद हुए। इससे साफ है कि बिकवाली व्यापक रही और लगभग सभी प्रमुख सेक्टर दबाव में रहे।

    सेंसेक्स पैक में हिंदुस्तान यूनिलीवर, टाटा स्टील, टाइटन, टीसीएस, पावर ग्रिड, एशियन पेंट्स, एचडीएफसी बैंक, इन्फोसिस, आईटीसी, कोटक महिंद्रा बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसे दिग्गज शेयरों में गिरावट देखी गई। वहीं बजाज फाइनेंस और एसबीआई ही ऐसे शेयर रहे जो हरे निशान में बंद हुए।

    केवल लार्जकैप ही नहीं, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव रहा। Nifty Midcap 100 1,032.85 अंक यानी 1.71 प्रतिशत की गिरावट के साथ 59,438 पर बंद हुआ, जबकि Nifty Smallcap 100 311.20 अंक यानी 1.79 प्रतिशत गिरकर 17,032.90 पर आ गया। इससे संकेत मिलता है कि व्यापक बाजार में निवेशकों ने मुनाफावसूली या जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    एलकेपी सिक्योरिटीज के विश्लेषक रूपक दे ने कहा कि अमेरिकी बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के कारण निफ्टी की शुरुआत ही गिरावट के साथ हुई और दिनभर दबाव बना रहा। उन्होंने बताया कि इंडिया वीआईएक्स का 200 डीएमए के ऊपर जाना बाजार में बढ़ते डर को दर्शाता है। उनके अनुसार निफ्टी के लिए 25,500 का स्तर अहम सपोर्ट है और इसके नीचे जाने पर 25,000 का स्तर भी देखा जा सकता है। वहीं 25,800 के आसपास रुकावट का स्तर बना हुआ है।

    इस बीच कच्चे तेल की कीमतों में हल्की तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड करीब 0.55 प्रतिशत बढ़कर 68 डॉलर प्रति बैरल के आसपास और डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग आधा प्रतिशत चढ़कर 63 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। तेल कीमतों में बढ़ोतरी भी बाजार की धारणा पर असर डाल सकती है।

    कुल मिलाकर शुक्रवार का सत्र निवेशकों के लिए निराशाजनक रहा। वैश्विक संकेत, सेक्टोरल दबाव और तकनीकी कमजोरी ने मिलकर बाजार को लाल निशान में धकेल दिया। आने वाले सत्रों में 25,500 का स्तर निवेशकों की नजर में प्रमुख रहेगा।

  • भारत का वैश्विक बढ़त का सफर 6.4% GDP वृद्धि के साथ जारी नीति और बैंकिंग स्थिरता दे रही सहारा

    भारत का वैश्विक बढ़त का सफर 6.4% GDP वृद्धि के साथ जारी नीति और बैंकिंग स्थिरता दे रही सहारा


    नई दिल्ली।भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अगले वित्त वर्ष 2026-27 की तस्वीर मूडीज की ताज़ा रिपोर्ट में सामने आई है वैश्विक रेटिंग एजेंसी ने अनुमान जताया है कि भारत का GDP 6.4 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है और यह वृद्धि दर G20 देशों में सबसे अधिक रहने की संभावना है रिपोर्ट में कहा गया है कि मजबूत घरेलू खपत नीति आधारित प्रोत्साहन और बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता भारत की आर्थिक वृद्धि को सहारा देंगी

    मूडीज का यह अनुमान सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के आकलनों से थोड़ा कम है आर्थिक सर्वेक्षण में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.8 से 7.4 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान रखा गया था वहीं RBI ने हाल ही में अपनी नीतिगत समीक्षा में करीब सात प्रतिशत वृद्धि की संभावना व्यक्त की थी इसके बावजूद वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति मजबूत और अग्रणी मानी जा रही है

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कर ढांचे में किए गए हालिया बदलाव और उपभोक्ताओं की आय में संभावित वृद्धि से बाजार में मांग बढ़ेगी GST नियमों में संशोधन और आयकर में राहत से लोगों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि होने की उम्मीद है इससे घरेलू खपत को मजबूती मिलेगी और आर्थिक गतिविधियां गतिशील बनी रहेंगी

    बैंकिंग क्षेत्र के बारे में मूडीज ने सकारात्मक तस्वीर पेश की है अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में बैंकों की ऋण वृद्धि दर 11 से 13 प्रतिशत के बीच रहेगी साथ ही गैर निष्पादित परिसंपत्तियों का स्तर 2 से 2.5 प्रतिशत के दायरे में नियंत्रित रह सकता है हालांकि छोटे उद्योग और MSME क्षेत्र पर कुछ दबाव की संभावना जताई गई है लेकिन बैंकों की पूंजी क्षमता इस जोखिम को संभालने में सक्षम मानी गई है जिससे वित्तीय प्रणाली स्थिर बनी रहेगी

    रिपोर्ट में भारत अमेरिका व्यापार समझौते को भी महत्वपूर्ण कारक बताया गया है फरवरी 2026 में हुए इस समझौते से निर्यात क्षेत्र में नई गति आने की संभावना है इससे छोटे उद्यमों को राहत मिलेगी और निवेश वातावरण बेहतर बनेगा जिससे आर्थिक वृद्धि में स्थिरता आएगी

    मूडीज ने यह भी संकेत दिया है कि अगर महंगाई नियंत्रित बनी रहती है तो RBI भविष्य में भी ब्याज दरों में नरमी का रुख अपना सकता है वर्ष 2025 में केंद्रीय बैंक द्वारा की गई दर कटौती से वित्तीय परिस्थितियां पहले ही सहायक बनी हुई हैं कम ब्याज दरें निवेश और उपभोग दोनों को बढ़ावा दे सकती हैं जिससे आर्थिक वृद्धि की गति और मजबूत होगी

    कुल मिलाकर मूडीज की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में है घरेलू खपत स्थिर बैंकिंग प्रणाली और नीतिगत प्रोत्साहन अगले वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दिशा में सहारा बनेंगे भारत G20 में सबसे तेज़ विकास दर वाला देश बनकर उभर सकता है जिससे वैश्विक निवेशकों का भरोसा और अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ेगी

  • भारत-EU ट्रेड डील अर्थव्यवस्था के लिए 'गेम चेंजर', राज्यों को मिलेगा समृद्धि का नया मार्ग: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

    भारत-EU ट्रेड डील अर्थव्यवस्था के लिए 'गेम चेंजर', राज्यों को मिलेगा समृद्धि का नया मार्ग: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव


    भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत और यूरोपियन यूनियन बीच हुए ऐतिहासिक द्विपक्षीय व्यापार समझौते न्यू ट्रेड डील का पुरजोर स्वागत किया है। मुख्यमंत्री ने बुधवार को मीडिया को जारी एक विशेष संदेश में इस समझौते को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह ‘न्यू ट्रेड डील’ न केवल देश के निर्यात को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी, बल्कि इसका सीधा और सकारात्मक लाभ राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा।

    आयात में कमी और निर्यात में आएगी क्रांति मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने समझौते की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अपने आयात को नियंत्रित करना और स्वदेशी उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। यूरोपियन यूनियन के साथ हुई यह डील इसी दिशा में एक प्रभावी कदम है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस समझौते से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय वस्तुओं की पहुंच सुगम होगी, जिससे देश के भीतर वस्तुओं की कीमतों में कमी आएगी और आम जनता के लिए उत्पाद सस्ते होंगे। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह डील हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था को वह मजबूती प्रदान करेगी, जिसकी कल्पना प्रधानमंत्री मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प में की गई है।

    विश्व की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी की ओर बढ़ते कदम वैश्विक कूटनीति और आर्थिक उतार-चढ़ाव का जिक्र करते हुए डॉ. यादव ने कहा कि आज जब दुनिया के कई विकसित देशों में आर्थिक अस्थिरता का वातावरण बना हुआ है, तब प्रधानमंत्री श्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व ने डेढ़ अरब की आबादी वाले भारत को एक सुरक्षित और विकासशील आर्थिक धुरी के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अब विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर है और यूरोपियन यूनियन के साथ व्यापारिक संबंधों का यह नया अध्याय इस लक्ष्य को प्राप्त करने में उत्प्रेरक का कार्य करेगा।

    राज्यों के लिए विकास के नए द्वार मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस ट्रेड डील का लाभ केवल केंद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कृषि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग और हस्तशिल्प क्षेत्रों को भी अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेगा। निर्यात की नई संभावनाओं से राज्यों में रोजगार के अवसर सृजित होंगे और स्थानीय राजस्व में वृद्धि होगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस ऐतिहासिक कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए इसे ‘समृद्ध भारत’ की दिशा में एक निर्णायक प्रहार बताया।