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  • आयात पर निर्भरता घटाएगी सरकार की नई योजना, देश में बनेंगे कंटेनर और 53 हजार से ज्यादा नौकरियां

    आयात पर निर्भरता घटाएगी सरकार की नई योजना, देश में बनेंगे कंटेनर और 53 हजार से ज्यादा नौकरियां


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार देश में कंटेनर निर्माण को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ी तैयारी कर रही है। प्रस्तावित कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग असिस्टेंस स्कीम यानी सीएमएएस के जरिए भारत में कंटेनर बनाने की क्षमता को मजबूत किया जाएगा। सरकार का अनुमान है कि इस योजना से देश में 53 हजार से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इनमें करीब 3000 प्रत्यक्ष रोजगार और 50000 से ज्यादा अप्रत्यक्ष रोजगार शामिल होंगे। इस योजना का असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इससे भारत के समुद्री परिवहन लॉजिस्टिक्स और निर्यात आयात से जुड़े पूरे इकोसिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के मुताबिक 10000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली सीएमएएस योजना कंटेनर निर्माण के क्षेत्र में निवेश तकनीकी विकास और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित होगी। इसके तहत अलग अलग आकार के कंटेनर जहाजों के बेड़े के विकास और घरेलू स्तर पर कंटेनरों की खरीद को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। सरकार का अनुमान है कि इससे करीब 99149 करोड़ रुपये के निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। इससे देश में कंटेनर निर्माण के साथ साथ इससे जुड़े सहायक उद्योगों को भी फायदा होगा। कॉर्नर कास्टिंग लकड़ी के फ्रेम और कॉर्टेन स्टील जैसे उत्पाद बनाने वाले उद्योगों में भी मांग बढ़ सकती है।

    भारत के लिए इस योजना की जरूरत इसलिए भी अहम है क्योंकि देश हर साल बड़ी संख्या में खाली कंटेनरों का आयात करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी जरूरतों और कंटेनरों की पुनःस्थिति के लिए हर साल करीब 20 लाख खाली कंटेनर आयात करता है। घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से इस आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ साथ देश में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा और लॉजिस्टिक्स की लागत तथा उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

    वैश्विक व्यापार में समुद्री परिवहन की भूमिका को देखते हुए कंटेनर किसी भी देश की सप्लाई चेन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन के अनुसार दुनिया के कुल माल व्यापार का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्ग से होता है। ऐसे में कंटेनरों की पर्याप्त उपलब्धता वैश्विक व्यापार की गति बनाए रखने के लिए जरूरी है। हाल के वर्षों में भू राजनीतिक तनावों के कारण समुद्री मार्गों पर दबाव और माल ढुलाई की लागत में उतार चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे माहौल में भारत का घरेलू कंटेनर निर्माण पर जोर रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सरकार का कहना है कि सीएमएएस भारत में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी समुद्री विनिर्माण इकोसिस्टम तैयार करने में मदद करेगी। यह योजना मेक इन इंडिया और मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 जैसी पहलों के अनुरूप है। इसके जरिए देश की सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। सरकार पहले ही जहाज निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 70000 करोड़ रुपये के शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस पैकेज की घोषणा कर चुकी है। अब कंटेनर निर्माण को प्रोत्साहन मिलने से भारत के समुद्री विनिर्माण क्षेत्र को और व्यापक आधार मिलने की उम्मीद है। लंबे समय में यह कदम रोजगार बढ़ाने के साथ भारत को समुद्री निर्माण और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • Fitch का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम, BBB- रेटिंग बरकरार; FY27 में 6.4% GDP ग्रोथ का अनुमान

    Fitch का भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम, BBB- रेटिंग बरकरार; FY27 में 6.4% GDP ग्रोथ का अनुमान


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और ऊर्जा संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को BBB- पर स्थिर आउटलुक के साथ बरकरार रखा है। इसके साथ ही भारत की अल्पकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग F3 पर भी कायम रखी गई है। फिच का यह आकलन ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और भू राजनीतिक तनाव का असर कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल रहा है। इसके बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर रेटिंग एजेंसी का भरोसा बना हुआ है।

    फिच के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत विकास क्षमता मौजूद है और पिछले कुछ वर्षों में देश ने अलग अलग आर्थिक झटकों का जिस तरह सामना किया है उससे इसकी लचीलापन क्षमता साबित हुई है। एजेंसी का मानना है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने का भारत का रिकॉर्ड और नीतिगत विश्वसनीयता में सुधार आगे भी आर्थिक वृद्धि का आधार बनेगा। हालांकि ऊर्जा संकट के कारण निकट अवधि में कुछ चुनौतियां जरूर बनी हुई हैं लेकिन इनसे भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विकास क्षमता पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।

    फिच ने मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष यानी FY27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह पिछले तीन वर्षों में दर्ज 7.4 प्रतिशत की औसत विकास दर से कम है लेकिन इसके बावजूद BBB रेटिंग वाले देशों की औसत विकास दर 2 प्रतिशत के मुकाबले भारत की अनुमानित वृद्धि तीन गुना से भी अधिक है। यही अंतर भारत की आर्थिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर अलग पहचान देता है। एजेंसी का कहना है कि हाल के वर्षों में भारत ने कई तरह के आर्थिक और बाहरी झटकों के बावजूद अपनी मजबूती बनाए रखी है और आगे भी यही रुझान जारी रहने की उम्मीद है।

    हालांकि भारत के सामने कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। फिच ने अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से जुड़ी अनिश्चितता को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है। भारत दुनिया का एक बड़ा शुद्ध ऊर्जा आयातक है ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों की कीमतों में तेजी का असर देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ सकता है। इसके बावजूद फिच को उम्मीद है कि ऊर्जा संकट से जुड़े जोखिम लंबे समय तक भारत की विकास संभावनाओं को प्रभावित नहीं करेंगे।

    महंगाई के मोर्चे पर भी फिच ने भारत को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक अनुमान दिया है। एजेंसी का अनुमान है कि FY27 में औसत महंगाई दर 4.1 प्रतिशत रह सकती है जबकि FY26 में यह 2.1 प्रतिशत थी। ऊर्जा संकट के कारण महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका जरूर है लेकिन फिच के मुताबिक यह भारतीय रिजर्व बैंक की 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर रहने की उम्मीद है। मुख्य महंगाई दर भी करीब 4 प्रतिशत के आसपास स्थिर बनी हुई है जिससे कीमतों के दबाव को लेकर फिलहाल बड़ी चिंता नहीं दिखाई दे रही है।
    महंगाई के मोर्चे पर भी फिच ने भारत को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक अनुमान दिया है। एजेंसी का अनुमान है कि FY27 में औसत महंगाई दर 4.1 प्रतिशत रह सकती है जबकि FY26 में यह 2.1 प्रतिशत थी। ऊर्जा संकट के कारण महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका जरूर है लेकिन फिच के मुताबिक यह भारतीय रिजर्व बैंक की 2 से 6 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर रहने की उम्मीद है। मुख्य महंगाई दर भी करीब 4 प्रतिशत के आसपास स्थिर बनी हुई है जिससे कीमतों के दबाव को लेकर फिलहाल बड़ी चिंता नहीं दिखाई दे रही है।

    फिच ने यह भी माना कि राजकोषीय नीति ने ऊर्जा संकट से पैदा होने वाले महंगाई के दबाव को सीमित करने में मदद की है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक पर तत्काल दबाव कुछ कम हुआ है। हालांकि एजेंसी का अनुमान है कि ऊर्जा संकट के दूसरे दौर के प्रभाव और अल नीनो से जुड़े जोखिमों को देखते हुए आरबीआई साल के अंत में अपनी नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर सकता है। ऐसी स्थिति में रेपो रेट 5.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

    कुल मिलाकर फिच की ताजा रेटिंग भारत की आर्थिक मजबूती पर वैश्विक भरोसे को दर्शाती है। विकास दर में कुछ कमी का अनुमान होने के बावजूद भारत की वृद्धि क्षमता अभी भी दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और समान रेटिंग वाले देशों से काफी बेहतर बनी हुई है। ऊर्जा कीमतों और वैश्विक तनाव जैसी चुनौतियों के बीच आर्थिक स्थिरता बनाए रखना आने वाले समय में भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

  • भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल

    भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल


    नई दिल्ली। भारत में सोने को लेकर निवेश का नजरिया तेजी से बदल रहा है। कभी परंपरा और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाने वाला सोना अब डिजिटल निवेश और वित्तीय संपत्ति के रूप में भी देखा जाने लगा है। इस बदलाव में देश की Gen Z पीढ़ी की भूमिका अहम मानी जा रही है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की रिपोर्ट ‘स्वर्णिम उड़ान 2047’ के मुताबिक, युवा पीढ़ी पारंपरिक आभूषणों की तुलना में डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF जैसे विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रही है।

    Gen Z बदल रही गोल्ड में निवेश की परंपरा
    नई पीढ़ी सोने को केवल विरासत के तौर पर संभालकर रखने के बजाय इसे एक एसेट के रूप में देख रही है। डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF में निवेश के पीछे आसान खरीदारी, कम मात्रा में निवेश और जरूरत पड़ने पर उसे कैश में बदलने जैसी सुविधाएं प्रमुख वजह हैं।

    WGC के मुताबिक, वर्ष 2035 तक भारत की Gen Z की कुल खरीद क्षमता 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे में इस पीढ़ी की निवेश आदतों में बदलाव का असर देश के गोल्ड मार्केट के साथ-साथ व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    घरों में 31 हजार टन से ज्यादा सोना
    भारत के घरों में 31 हजार टन से अधिक सोना मौजूद होने का अनुमान है। इसकी कीमत 315 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है। इसके मुकाबले भारत के पास करीब 880 टन का आधिकारिक गोल्ड रिजर्व है। बड़ी मात्रा में घरेलू सोना अभी वित्तीय व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा नहीं है।

    ASSOCHAM की एक रिपोर्ट में भी भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की विशाल मात्रा का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, अगर घरेलू सोने का एक छोटा हिस्सा भी वित्तीय साधनों में लगाया जाता है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी मिल सकती है।

    सिर्फ 2% सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ा तो बड़ा फायदा
    रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि घरेलू सोने का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा भी वित्तीय साधनों में स्थानांतरित होने पर वर्ष 2047 तक भारत की GDP में 7.5 ट्रिलियन डॉलर तक का अतिरिक्त योगदान हो सकता है। वहीं, अगर घरों में रखा 5 प्रतिशत सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ता है तो भारत का आयात बिल करीब 90 अरब डॉलर तक कम हो सकता है।

    गोल्ड को उत्पादक संपत्ति में बदलने की तैयारी
    विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू सोने को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने पर मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और कृषि जैसे क्षेत्रों के लिए पूंजी उपलब्ध हो सकती है। गोल्ड मॉनिटाइजेशन, गोल्ड-लिंक्ड सेविंग स्कीम और गोल्ड लोन जैसे विकल्प इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। गोल्ड लोन के बढ़ते आंकड़े भी इस बदलाव की ओर संकेत करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में नवंबर 2025 तक गोल्ड लोन का आंकड़ा 24.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

    अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक संपत्ति बन सकता है सोना
    देश में 38 करोड़ से अधिक Gen Z की बड़ी आबादी है। इस पीढ़ी की बदलती निवेश प्राथमिकताएं गोल्ड मार्केट का स्वरूप बदल सकती हैं। अगर घरेलू सोना बड़ी मात्रा में वित्तीय प्रणाली में आता है तो बाजार में पूंजी की उपलब्धता बढ़ सकती है, निवेश के लिए अधिक संसाधन मिल सकते हैं और सोने के आयात पर निर्भरता घट सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की भी संभावना है। ऐसे में भारत के घरों में पड़ा पुस्तैनी सोना आने वाले वर्षों में सिर्फ आभूषण या विरासत नहीं, बल्कि देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

  • दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि

    दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि


    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में निर्यात के मोर्चे पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून के दौरान देश का कुल निर्यात वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर 11.37 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 232.73 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और व्यापारिक चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे माहौल में भारत का मजबूत निर्यात प्रदर्शन वैश्विक बाजार में उसकी बढ़ती साख और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दर्शाता है।

    पहली तिमाही के दौरान वस्तु निर्यात 129.32 अरब डॉलर दर्ज किया गया जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले काफी अधिक रहा। हालांकि इस दौरान आयात भी बढ़ने से वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 86.86 अरब डॉलर तक पहुंच गया लेकिन इसके बावजूद निर्यात में दर्ज हुई तेज वृद्धि भारतीय विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। दूसरी ओर सेवा क्षेत्र ने भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सेवा निर्यात बढ़कर 103.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जबकि सेवा व्यापार अधिशेष भी बढ़कर 49.43 अरब डॉलर दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी वित्तीय सेवाएं और अन्य पेशेवर सेवाएं वैश्विक स्तर पर लगातार भारत की पहचान मजबूत कर रही हैं।

    जून महीने के आंकड़े भी उत्साहजनक रहे। इस दौरान वस्तु निर्यात 40.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष जून के मुकाबले उल्लेखनीय वृद्धि है। वहीं सेवा निर्यात भी बढ़कर 33.03 अरब डॉलर रहा। लगातार बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारतीय निर्यातक बदलते वैश्विक बाजार की मांग के अनुरूप खुद को तेजी से ढाल रहे हैं और नए अवसरों का लाभ उठा रहे हैं।

    नॉन पेट्रोलियम निर्यात में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। अप्रैल से जून के दौरान यह 106.30 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.44 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि भारत का निर्यात केवल ऊर्जा उत्पादों पर निर्भर नहीं है बल्कि विनिर्माण और उच्च मूल्य वाले उत्पाद भी वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं।

    विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो रत्न एवं आभूषण उद्योग ने सबसे तेज वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा इंजीनियरिंग उत्पादों जैविक और अकार्बनिक रसायनों इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा चावल के निर्यात में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारत धीरे धीरे वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं और निर्यात बढ़ाने वाली नीतियों का सकारात्मक असर भी इन आंकड़ों में दिखाई देता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं और घरेलू उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती है तो आने वाले महीनों में भारत का निर्यात और अधिक मजबूत हो सकता है। हालांकि बढ़ते व्यापार घाटे को संतुलित करने और निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सरकार को लॉजिस्टिक्स लागत कम करने नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और घरेलू उद्योगों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करने होंगे। कुल मिलाकर पहली तिमाही के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी अपनी निर्यात क्षमता के दम पर विकास की नई कहानी लिख रहा है।

  • तेल सस्ता तो बाजार मजबूत: निफ्टी-सेंसेक्स ने तीसरे सप्ताह भी दिखाई तेजी, आगे इन आंकड़ों पर रहेगी नजर

    तेल सस्ता तो बाजार मजबूत: निफ्टी-सेंसेक्स ने तीसरे सप्ताह भी दिखाई तेजी, आगे इन आंकड़ों पर रहेगी नजर


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार ने लगातार तीसरे सप्ताह मजबूती का प्रदर्शन करते हुए निवेशकों का भरोसा कायम रखा। कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट और पश्चिम एशिया में भू राजनीतिक तनाव कम होने से बाजार को मजबूत समर्थन मिला। इसके साथ ही भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते की उम्मीदों ने भी निवेशकों का उत्साह बढ़ाया। सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन निफ्टी और सेंसेक्स दोनों बढ़त के साथ बंद हुए और पूरे सप्ताह बाजार सकारात्मक दायरे में बना रहा।

    साप्ताहिक कारोबार के दौरान निफ्टी में 0.18 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई जबकि अंतिम कारोबारी सत्र में यह 24 हजार 56 अंक पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स 109 अंक की बढ़त के साथ 77 हजार 100 अंक पर बंद हुआ। पूरे सप्ताह सेंसेक्स में करीब 0.39 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। हालांकि प्रमुख सूचकांकों की मजबूती के बीच व्यापक बाजार में मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य होते हालात से कच्चे तेल की कीमतें फिर से युद्ध पूर्व स्तर के करीब पहुंच गई हैं। इसका सीधा फायदा भारत जैसे तेल आयातक देशों को मिल रहा है। सस्ता कच्चा तेल महंगाई पर दबाव कम करता है और चालू खाते के घाटे तथा राजकोषीय स्थिति को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए मौद्रिक नीति में लचीलापन बनाए रखने की संभावना मजबूत होती है।

    इस सप्ताह सेक्टर आधारित प्रदर्शन की बात करें तो फार्मा और हेल्थकेयर शेयरों में सबसे अधिक तेजी देखने को मिली। निजी बैंकों के शेयरों को भी आरबीआई की एफसीएनआर जमा स्वैप योजना से जुड़ी स्पष्टता का लाभ मिला। दूसरी ओर धातु क्षेत्र के शेयरों पर कमोडिटी कीमतों में गिरावट का असर दिखाई दिया जबकि उपभोक्ता मांग को लेकर बनी चिंताओं के कारण कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर भी दबाव में रहा।

    हालांकि बाजार के लिए कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि देश में मानसून का असमान वितरण कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकता है जिससे महंगाई बढ़ने का जोखिम बना रहेगा। इसके बावजूद निवेशकों का रुझान फिलहाल सकारात्मक बना हुआ है।

    तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार निकट भविष्य में निफ्टी के लिए 24 हजार 400 और 24 हजार 500 अंक प्रमुख प्रतिरोध स्तर रहेंगे जबकि 23 हजार 900 और 23 हजार 800 अंक मजबूत समर्थन माने जा रहे हैं। बैंक निफ्टी के लिए 57 हजार 500 से 57 हजार 400 का दायरा सपोर्ट और 58 हजार 900 से 59 हजार का स्तर रेजिस्टेंस माना जा रहा है।

    आने वाले सप्ताह में निवेशकों की नजर कंपनियों के पहली तिमाही के नतीजों पर रहेगी। इसके साथ ही अमेरिका के पीसीई महंगाई आंकड़े नॉन फार्म पेरोल बेरोजगारी दर तथा भारत के औद्योगिक उत्पादन और जून महीने के पीएमआई आंकड़े भी बाजार की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत बुनियादी आधार वाली कंपनियों में लंबी अवधि के निवेश के अवसर अभी भी बने हुए हैं।

  • आज शेयर बाजार में रह सकती है तेजी की धार, निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों पर

    आज शेयर बाजार में रह सकती है तेजी की धार, निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों पर


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में आज कारोबार की शुरुआत सकारात्मक माहौल के साथ होने की उम्मीद जताई जा रही है। बीते कुछ कारोबारी सत्रों में बाजार ने मजबूती दिखाई है और निवेशकों का भरोसा लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेत, कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी और घरेलू आर्थिक गतिविधियों में सुधार की उम्मीदें बाजार को मजबूती प्रदान कर सकती हैं। हालांकि दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, इसलिए निवेशकों को सोच-समझकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद और लगातार बढ़ रही निवेश गतिविधियां शेयर बाजार को समर्थन दे रही हैं। विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर भी आज बाजार की नजर बनी रहेगी। यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से खरीदारी जारी रहती है, तो बाजार में तेजी का रुख और मजबूत हो सकता है। वहीं किसी भी नकारात्मक वैश्विक संकेत का असर बाजार की चाल पर दिखाई दे सकता है।

    आज आईटी, बैंकिंग, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़े शेयर निवेशकों के आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। पिछले कुछ समय से आईटी कंपनियों के शेयरों में मजबूती देखने को मिली है, जबकि बैंकिंग सेक्टर भी बाजार को सहारा देता नजर आ रहा है। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर भी निवेशकों की विशेष नजर रह सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी भारतीय बाजार के लिए सकारात्मक मानी जा रही है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में कमी से महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है। इसका सकारात्मक असर शेयर बाजार की धारणा पर भी दिखाई देता है।

    विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही महत्वपूर्ण स्तरों के आसपास कारोबार कर रहे हैं। यदि बाजार शुरुआती बढ़त को बनाए रखने में सफल रहता है, तो निवेशकों का उत्साह और बढ़ सकता है। हालांकि मुनाफावसूली के कारण बीच-बीच में दबाव भी देखने को मिल सकता है। ऐसे में बाजार की दिशा दिनभर बदलती परिस्थितियों के अनुसार तय होगी।

    खुदरा निवेशकों के लिए सलाह दी जा रही है कि वे अफवाहों या त्वरित लाभ के लालच में निवेश करने के बजाय मजबूत बुनियादी स्थिति वाली कंपनियों का चयन करें। लंबी अवधि की निवेश रणनीति अपनाने वाले निवेशकों के लिए मौजूदा बाजार परिस्थितियां बेहतर अवसर प्रदान कर सकती हैं। वहीं अल्पकालिक निवेशकों को स्टॉप लॉस का उपयोग करते हुए सतर्कता बरतनी चाहिए।

    कुल मिलाकर आज का कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेतों के साथ शुरू हो सकता है। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं और घरेलू स्तर पर निवेशकों का भरोसा कायम रहता है, तो बाजार में मजबूती का रुख देखने को मिल सकता है। हालांकि किसी भी अप्रत्याशित घटनाक्रम को देखते हुए निवेशकों को सतर्क रहना होगा।

  • रेपो रेट स्थिर, अर्थव्यवस्था को मिला भरोसा; विकास की रफ्तार पर सकारात्मक असर

    रेपो रेट स्थिर, अर्थव्यवस्था को मिला भरोसा; विकास की रफ्तार पर सकारात्मक असर


    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक) द्वारा नीतिगत रेपो दर को यथावत रखने के फैसले को अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत ने संतुलित और दूरदर्शी कदम बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखकर लिया गया है, जो दीर्घकालिक विकास की संभावनाओं को मजबूत करेगा।

    वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत
    विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत घरेलू मांग के कारण स्थिर बनी हुई है। पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने कहा कि मौजूदा नीति एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिससे मध्यम और दीर्घकालिक विकास के लिए अनुकूल माहौल बना रहेगा।

    मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर नजर
    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि मुद्रास्फीति बढ़कर 5.9 प्रतिशत के करीब पहुंचती है, तो आने वाले समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। हालांकि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और आरबीआई का रुख स्थिरता बनाए रखने पर केंद्रित है।

    विदेशी निवेश और मुद्रा बाजार को समर्थन
    अर्थशास्त्रियों ने यह भी कहा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और एनआरआई जमा जैसे उपायों से विदेशी मुद्रा प्रवाह को मजबूती मिल रही है। इससे रुपये की स्थिरता को भी समर्थन मिला है और बाजार में सकारात्मक संकेत देखे जा रहे हैं।

    रियल एस्टेट और बैंकिंग सेक्टर को राहत
    बैंकिंग और हाउसिंग सेक्टर के विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिर ब्याज दरों से ऋण प्रवाह बेहतर होगा और रियल एस्टेट सेक्टर को सीधा लाभ मिलेगा। इससे आवास की मांग में भी वृद्धि होने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर विशेषज्ञों की राय है कि RBI का यह कदम फिलहाल स्थिरता और भरोसा बनाए रखने वाला है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक चुनौतियों के बीच मजबूती देता है और भविष्य में विकास की राह को सुरक्षित बनाता है।

  • आरबीआई का बड़ा ऐलान, केंद्र सरकार को मिलेगा रिकॉर्ड ₹2.87 लाख करोड़ का डिविडेंड, आर्थिक मजबूती को मिलेगा सहारा

    आरबीआई का बड़ा ऐलान, केंद्र सरकार को मिलेगा रिकॉर्ड ₹2.87 लाख करोड़ का डिविडेंड, आर्थिक मजबूती को मिलेगा सहारा

    नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय घटनाक्रम में भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को रिकॉर्ड स्तर का डिविडेंड देने का निर्णय लिया है। यह राशि करीब 2.87 लाख करोड़ रुपये निर्धारित की गई है, जो अब तक के इतिहास में सबसे बड़े सरप्लस ट्रांसफर में से एक माना जा रहा है। इस निर्णय से सरकार की राजकोषीय स्थिति को मजबूती मिलने की उम्मीद है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और भू-राजनीतिक तनाव कई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

    नई दिल्ली। यह फैसला मुंबई में आयोजित भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की। बैठक में देश और दुनिया की आर्थिक स्थिति की विस्तृत समीक्षा की गई, जिसमें संभावित जोखिमों और भविष्य की वित्तीय चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। बैंक ने वित्तीय प्रदर्शन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि इस वर्ष सरप्लस ट्रांसफर की स्थिति मजबूत है और इसे केंद्र सरकार को हस्तांतरित किया जा सकता है।

    आरबीआई के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक की बैलेंस शीट का आकार उल्लेखनीय रूप से बढ़कर लगभग 91.97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो सालाना आधार पर 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाता है। इसी अवधि में बैंक की कुल आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे केंद्रीय बैंक की वित्तीय स्थिति और मजबूत हुई है।

    डिविडेंड के इस बड़े निर्णय के पीछे बैंक की आय में वृद्धि और जोखिम प्रावधानों के बाद बची शुद्ध आय प्रमुख कारण रही है। रिपोर्ट के अनुसार, जोखिम प्रावधान और अन्य वैधानिक फंड में हस्तांतरण से पहले शुद्ध आय में भी पिछले वर्ष की तुलना में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हुई है, जिससे सरकार को बड़ी राशि हस्तांतरित करना संभव हुआ।

    नई दिल्ली। विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई का यह कदम सरकार के लिए वित्तीय रूप से राहत देने वाला साबित हो सकता है। इस राशि का उपयोग बुनियादी ढांचे, विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं में किया जा सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था में निवेश और मांग दोनों को समर्थन मिलेगा।

    इसके साथ ही आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि आर्थिक पूंजी ढांचे के तहत एक सुरक्षित जोखिम बफर बनाए रखना जरूरी है, ताकि किसी भी संभावित आर्थिक अनिश्चितता का सामना किया जा सके। इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि पर्याप्त प्रावधानों के बाद शेष राशि को केंद्र सरकार को हस्तांतरित किया जाए।

    इस ऐतिहासिक डिविडेंड के बाद सरकार की वित्तीय स्थिति को अतिरिक्त मजबूती मिलने की उम्मीद है, जो आगामी बजट और आर्थिक नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • बाजार पर मंडरा रहा वैश्विक तनाव का साया, ईरान-अमेरिका टकराव और कच्चे तेल से तय होगी अगली चाल

    बाजार पर मंडरा रहा वैश्विक तनाव का साया, ईरान-अमेरिका टकराव और कच्चे तेल से तय होगी अगली चाल

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां घरेलू मजबूती से अधिक वैश्विक घटनाक्रम उसकी दिशा तय करते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले सप्ताह में बाजार की चाल कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर रहने वाली है, जिनमें ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां और देश के प्रमुख आर्थिक आंकड़े शामिल हैं। इन सभी कारकों के कारण निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है और बाजार में सतर्कता बढ़ती जा रही है।

    वैश्विक स्तर पर ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने ऊर्जा बाजारों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग को लेकर उठ रहे विवादों ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर चिंता बढ़ा दी है। इसी अनिश्चितता के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका भी गहरा रही है। ऊर्जा कीमतों में यह अस्थिरता सीधे तौर पर भारतीय बाजारों पर भी असर डाल रही है, क्योंकि भारत अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।

    इसी बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार की धारणा को कमजोर किया है। लगातार हो रही निकासी ने घरेलू बाजार में तरलता और विश्वास दोनों पर दबाव बनाया है। निवेशक फिलहाल सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इक्विटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विदेशी निवेशकों की रणनीति में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    घरेलू स्तर पर आने वाले आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की गतिविधियों से जुड़े संकेतक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। इसके अलावा बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े आंकड़े, क्रेडिट ग्रोथ और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी जानकारियां भी बाजार की धारणा को प्रभावित करेंगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह तय होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक दबावों के बीच कितनी मजबूती से खड़ी है।

    बीते सप्ताह बाजार में गिरावट का रुख देखने को मिला, जहां प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। कई सेक्टर्स में बिकवाली हावी रही, विशेषकर रियल्टी, आईटी और ऑटो जैसे क्षेत्रों में कमजोरी देखने को मिली। हालांकि कुछ क्षेत्रों जैसे फार्मा और मेटल में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही, लेकिन समग्र रूप से बाजार नकारात्मक रुझान में बंद हुआ।

  • क्या भारत में लागू होगा पेट्रोल-डीजल कोटा सिस्टम? जानिए Fuel Rationing का पूरा मतलब

    क्या भारत में लागू होगा पेट्रोल-डीजल कोटा सिस्टम? जानिए Fuel Rationing का पूरा मतलब


    नई दिल्ली। ईरान संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच पेट्रोल-डीजल सप्लाई को लेकर चर्चा तेज है। ऐसे में जानिए क्या होता है फ्यूल राशनिंग और क्या भारत में इसकी जरूरत पड़ सकती है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान संकट के बीच वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच भारत में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या भविष्य में पेट्रोल-डीजल पर कोटा सिस्टम यानी फ्यूल राशनिंग लागू हो सकता है।
    क्या होता है Fuel Rationing सिस्टम?
    फ्यूल राशनिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सरकार सीमित ईंधन आपूर्ति की स्थिति में हर व्यक्ति या वाहन के लिए पेट्रोल, डीजल या गैस की एक तय सीमा निर्धारित कर देती है। इसका उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का संतुलित और आवश्यक उपयोग सुनिश्चित करना होता है।
    यह व्यवस्था आमतौर पर तब लागू की जाती है जब-

    युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण सप्लाई बाधित हो
    कच्चे तेल की भारी कमी हो जाए
    लॉजिस्टिक या सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित हो
    देश में ऊर्जा संकट जैसी स्थिति बन जाए
    ऐसे हालात में सरकार प्राथमिकता तय करती है, जैसे कि एंबुलेंस, पुलिस, सार्वजनिक परिवहन और जरूरी सेवाओं को पहले ईंधन उपलब्ध कराना।
    क्या भारत में लागू हो सकता है कोटा सिस्टम?

    विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल भारत में फ्यूल राशनिंग लागू होने की कोई स्थिति नहीं है। देश के पास पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं और पेट्रोलियम मंत्रालय लगातार वैश्विक हालात पर नजर बनाए हुए है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर जरूर पड़ता है, लेकिन अभी सप्लाई व्यवस्था स्थिर बनी हुई है। सरकार का फोकस फिलहाल कीमतों को नियंत्रित रखने और वैकल्पिक स्रोतों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर है।


    विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल भारत में फ्यूल राशनिंग लागू होने की कोई स्थिति नहीं है। देश के पास पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं और पेट्रोलियम मंत्रालय लगातार वैश्विक हालात पर नजर बनाए हुए है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर जरूर पड़ता है, लेकिन अभी सप्लाई व्यवस्था स्थिर बनी हुई है। सरकार का फोकस फिलहाल कीमतों को नियंत्रित रखने और वैकल्पिक स्रोतों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर है।

    आगे क्या हो सकता है?
    अगर भविष्य में पश्चिम एशिया का तनाव लंबा चलता है और तेल आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित होती है, तो ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि कोटा सिस्टम जैसी सख्त व्यवस्था अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनाई जाती है। फिलहाल सरकार ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा रखने की अपील की है।