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  • आरबीआई से सरकार को मिल सकता है अब तक का सबसे बड़ा लाभांश, आर्थिक दबाव के बीच मजबूत होगी वित्तीय स्थिति

    आरबीआई से सरकार को मिल सकता है अब तक का सबसे बड़ा लाभांश, आर्थिक दबाव के बीच मजबूत होगी वित्तीय स्थिति


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस वित्त वर्ष में केंद्र सरकार को अब तक का सबसे बड़ा लाभांश देने की तैयारी में है, जिससे सरकार को वित्तीय मोर्चे पर बड़ी राहत मिल सकती है।

    यह लाभांश सरकार के लिए ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब वैश्विक अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उतार-चढ़ाव के कारण आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। इस संभावित आय से सरकार को बजट प्रबंधन और विकास योजनाओं को संतुलित रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    पिछले वित्त वर्ष में भी RBI ने सरकार को रिकॉर्ड स्तर का लाभांश दिया था, जिसने सरकारी खजाने को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी। इस बार भी अनुमान लगाया जा रहा है कि राशि पिछले आंकड़ों को पार कर सकती है, जिससे गैर-कर राजस्व में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है।

    आरबीआई की ओर से लाभांश का निर्धारण उसके केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा तय आर्थिक पूंजी ढांचे के आधार पर किया जाता है, जिसमें जोखिम प्रावधानों और वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रखा जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत हर साल सरकार को अधिशेष राशि हस्तांतरित की जाती है।

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन में सुधार भी इस संभावित वृद्धि का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, बढ़ता ऋण विस्तार और मजबूत आय के चलते बैंकिंग क्षेत्र के मुनाफे में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सकारात्मक असर समग्र वित्तीय प्रणाली पर पड़ा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आने वाले वित्त वर्ष में गैर-कर राजस्व में भी स्थिरता या हल्की बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है, जबकि कर संग्रह में भी वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इससे सरकार को अपने राजकोषीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।

  • अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत

    अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत


    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जारी एक नई आकलन रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर से बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की औसत खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। हालांकि हाल के महीनों में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है, लेकिन वैश्विक और घरेलू परिस्थितियां आगे चलकर स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।

    पिछले कुछ समय में खुदरा महंगाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन यह अब भी सीमित दायरे में बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में उपभोक्ता कीमतों पर बड़ा दबाव पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन आने वाले समय में यह स्थिति बदल सकती है। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती लागत इस दबाव का एक प्रमुख कारण मानी जा रही है, जिसका असर धीरे-धीरे परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।

    कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि भी एक अहम चिंता का विषय बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहने की आशंका है, जिससे आयात बिल बढ़ सकता है और इसका सीधा असर घरेलू बाजार की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे न केवल ईंधन बल्कि वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का जोखिम रहता है।

    हालांकि सरकार की ओर से ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के प्रयासों से अभी तक उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिली है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जैसे-जैसे लागत बढ़ेगी, कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे महंगाई में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

    इसके अलावा खाद्य महंगाई को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। मौसम से जुड़े जोखिम, खासकर कम मानसून और अल नीनो जैसी परिस्थितियां, कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि फसल उत्पादन में गिरावट आती है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है, जिससे आम लोगों की खर्च क्षमता पर असर पड़ सकता है।

    अर्थव्यवस्था से जुड़े जानकारों का मानना है कि फिलहाल महंगाई स्थिर दिख रही है, लेकिन यह स्थिरता अस्थायी हो सकती है। आने वाले महीनों में ऊर्जा, परिवहन और खाद्य क्षेत्रों से जुड़े कारक मिलकर महंगाई की दिशा तय करेंगे।

  • भारत ने दिखाई आर्थिक मजबूती की मिसाल: संकट के समय भी लगातार आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था, बोले पीयूष गोयल

    भारत ने दिखाई आर्थिक मजबूती की मिसाल: संकट के समय भी लगातार आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था, बोले पीयूष गोयल


    नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर चल रहे आर्थिक और भू-राजनीतिक संकटों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूती दिखा रही है। इसी संदर्भ में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत ने हर चुनौती के समय खुद को पहले से अधिक मजबूत बनाकर दुनिया के सामने एक भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया है।

    नई दिल्ली में आयोजित एक बड़े बिजनेस समिट को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत की आर्थिक नींव स्थिर और मजबूत बनी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के विभिन्न देश अब भारत की क्षमता और स्थिरता पर अधिक विश्वास जता रहे हैं, जो देश की बढ़ती आर्थिक ताकत का संकेत है।

    उन्होंने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि केवल सरकार के प्रयासों से आर्थिक प्रगति संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए उद्योग जगत, व्यापार क्षेत्र और आम नागरिकों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है। उनका मानना है कि जब सभी हिस्से मिलकर काम करते हैं, तभी देश की आर्थिक गति और अधिक मजबूत होती है।

    पीयूष गोयल ने भारतीय उद्योगों से यह भी अपील की कि वे घरेलू आपूर्तिकर्ताओं और स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता दें। उनके अनुसार, बदलते वैश्विक माहौल में आत्मनिर्भरता केवल एक नीति नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी औद्योगिक क्षमता को भीतर से मजबूत करना होगा, ताकि बाहरी निर्भरता कम हो सके।

    उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई विकसित देश अपने घरेलू उद्योगों को प्राथमिकता देकर मजबूत औद्योगिक नेटवर्क तैयार कर चुके हैं। भारत को भी इसी दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, जहां उद्योग एक-दूसरे का समर्थन करें और देश के भीतर मजबूत सप्लाई चेन विकसित हो।

    मंत्री ने यह भी कहा कि आज की परिस्थितियों में सामान्य व्यापारिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है। वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए भारत को अपनी रणनीति को और अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना होगा। उनका कहना था कि यह केवल एक विकल्प नहीं बल्कि भविष्य की जरूरत है।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत की आर्थिक मजबूती केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास का परिणाम है जो दुनिया अब भारत पर जता रही है। विभिन्न वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश ने उत्पादन, निवेश और विकास के क्षेत्र में लगातार प्रगति दिखाई है।

  • स्विगी का वित्त वर्ष 2025-26 में घाटा 33% बढ़ा, पहुंचा 4,154 करोड़ पर

    स्विगी का वित्त वर्ष 2025-26 में घाटा 33% बढ़ा, पहुंचा 4,154 करोड़ पर


    नई दिल्ली। मुंबई में ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म ने वित्त वर्ष 2025-26 के अपने ताजा नतीजे जारी किए हैं, जिनमें कंपनी के शुद्ध घाटे में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस वित्त वर्ष में स्विगी का कुल शुद्ध घाटा बढ़कर 4,154 करोड़ रुपये पहुंच गया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 3,117 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत अधिक है।
    हालांकि, चौथी तिमाही के आंकड़ों में कंपनी की स्थिति कुछ बेहतर नजर आई है। 31 मार्च 2026 को समाप्त तिमाही में स्विगी का घाटा घटकर 800 करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1,081 करोड़ रुपये था। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी के खर्च नियंत्रण और ऑपरेशनल सुधारों का असर धीरे-धीरे दिखने लगा है।
    रेवेन्यू के मोर्चे पर कंपनी ने मजबूत वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में परिचालन से आय 45 प्रतिशत बढ़कर 6,383 करोड़ रुपये पहुंच गई। वहीं, कुल आय 46.74 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 6,649 करोड़ रुपये दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 4,531 करोड़ रुपये थी।
    कंपनी के खर्चों में भी बढ़ोतरी देखी गई है। विज्ञापन और बिक्री प्रमोशन पर खर्च बढ़कर 1,577 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 36 प्रतिशत अधिक है। यह संकेत देता है कि कंपनी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है।
    स्विगी के प्रबंधन ने बताया कि उसका क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म इंस्टामार्ट लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और यूनिट इकॉनॉमिक्स को सुधारने पर ध्यान दिया जा रहा है। कंपनी के अनुसार, इंस्टामार्ट का ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू (GOV) 68.8 प्रतिशत बढ़कर 7,881 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वहीं, फूड डिलीवरी सेगमेंट में भी स्थिर ग्रोथ देखी गई है, जहां कुल ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू 9,005 करोड़ रुपये रही और ऑर्डर संख्या 18.3 मिलियन तक पहुंच गई।
    स्विगी के एमडी और सीईओ ने कहा है कि कंपनी का फोकस अब लाभप्रदता और ऑपरेशनल दक्षता बढ़ाने पर है। उनका लक्ष्य आने वाली तिमाहियों में बेहतर मार्जिन और ब्रेकईवन की दिशा में आगे बढ़ना है।
    कुल मिलाकर, हालांकि स्विगी का वार्षिक घाटा बढ़ा है, लेकिन रेवेन्यू ग्रोथ और क्विक कॉमर्स सेगमेंट में मजबूत प्रदर्शन यह संकेत देता है कि कंपनी विस्तार और स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
  • 2000 नोट वापसी में रिकॉर्ड: बाजार से लगभग खत्म, RBI ने जारी किए नए आंकड़े..

    2000 नोट वापसी में रिकॉर्ड: बाजार से लगभग खत्म, RBI ने जारी किए नए आंकड़े..

    नई दिल्ली। 2000 रुपये के नोटों को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है, जिसमें यह साफ हुआ है कि लगभग पूरी राशि बैंकिंग सिस्टम में वापस आ चुकी है। इन नोटों को चलन से हटाने के बाद से लगातार वापसी की प्रक्रिया चल रही थी और अब यह अपने अंतिम चरण के करीब पहुंच गई है।
    जानकारी के अनुसार, जब इन नोटों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, तब बाजार में इनकी कुल वैल्यू लगभग 3.56 लाख करोड़ रुपये थी। समय के साथ लोगों ने इन्हें बैंकिंग चैनल में जमा करना शुरू किया और अब यह आंकड़ा घटकर करीब 5,451 करोड़ रुपये तक रह गया है। इसका मतलब है कि लगभग पूरी मुद्रा वापस सिस्टम में आ चुकी है।
    वापसी की इस प्रक्रिया के दौरान लोगों को कई सुविधाएं दी गईं, ताकि वे आसानी से अपने पास मौजूद नोट बैंक खाते में जमा करा सकें। इसके लिए देशभर के अधिकृत केंद्रों पर इन्हें बदलने और जमा करने की व्यवस्था की गई थी। इसके अलावा, डाक सेवाओं के जरिए भी नोट भेजने की सुविधा उपलब्ध कराई गई, जिससे दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोग भी इसका लाभ उठा सके।
    हालांकि इन नोटों को चलन से हटाने की घोषणा की गई थी, लेकिन इन्हें पूरी तरह अमान्य नहीं किया गया है। यानी ये अभी भी कानूनी रूप से वैध मुद्रा हैं, लेकिन रोजमर्रा के लेन-देन में इनका उपयोग लगभग खत्म हो चुका है।
    धीरे-धीरे हुई इस वापसी से यह साफ हो गया है कि बड़ी मात्रा में नकदी अब बैंकिंग सिस्टम में समाहित हो चुकी है। इससे नकदी प्रबंधन को संतुलित करने और वित्तीय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद मिली है।
    अब स्थिति यह है कि 2000 रुपये के नोट लगभग बाजार से गायब हो चुके हैं और केवल बहुत सीमित मात्रा में ही शेष बचे हैं। यह पूरा बदलाव देश की मुद्रा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा रहा है।
  • आर्थिक मजबूती का संकेत, अप्रैल 2026 में रिकॉर्ड तोड़ GST कलेक्शन ₹2.43 लाख करोड़ तक पहुंचा, बाजार और व्यापार गतिविधियों में दिखी तेजी

    आर्थिक मजबूती का संकेत, अप्रैल 2026 में रिकॉर्ड तोड़ GST कलेक्शन ₹2.43 लाख करोड़ तक पहुंचा, बाजार और व्यापार गतिविधियों में दिखी तेजी

    नई दिल्ली।
    April 2026 भारत की आर्थिक कहानी में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है, जब वस्तु एवं सेवा कर यानी GST कलेक्शन ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए ₹2.43 लाख करोड़ का ऐतिहासिक आंकड़ा छू लिया। यह उपलब्धि केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं बल्कि देश की आर्थिक गतिविधियों में आई मजबूती और बाजार में बढ़ती रफ्तार का संकेत भी मानी जा रही है। इस भारी-भरकम कलेक्शन के पीछे घरेलू कारोबार की स्थिर गति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आए बदलावों का भी बड़ा योगदान देखा गया है।

    इस बार GST संग्रह में सबसे बड़ा प्रभाव आयात क्षेत्र से देखने को मिला है, जहां वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने टैक्स संग्रह को अप्रत्याशित रूप से ऊपर पहुंचा दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों के बढ़ने से आयात बिल महंगा हुआ, जिसका सीधा असर कर संग्रह पर पड़ा और यह हिस्सेदारी पिछले साल की तुलना में काफी अधिक दर्ज की गई। इसके साथ ही घरेलू बाजार में मांग स्थिर बनी रहने से भी कुल राजस्व को मजबूती मिली, जिससे पूरे कर ढांचे में संतुलन बना रहा।

    सरकारी अनुमानों के अनुसार अप्रैल 2026 में नेट GST कलेक्शन भी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर लगभग ₹2.11 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि देश में आर्थिक गतिविधियां लगातार विस्तार की ओर बढ़ रही हैं और कर अनुपालन में भी सुधार देखा जा रहा है। घरेलू लेनदेन से प्राप्त राजस्व में भी हल्की लेकिन स्थिर बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने कुल संग्रह को मजबूत आधार प्रदान किया।

    इस अवधि में एक और महत्वपूर्ण पहलू GST रिफंड से जुड़ा रहा, जहां कुल रिफंड राशि बढ़कर लगभग ₹31,793 करोड़ तक पहुंच गई। यह पिछले साल की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कारोबारी लेनदेन में तेजी के साथ-साथ कर समायोजन की प्रक्रिया भी सक्रिय रही है। विशेष रूप से घरेलू रिफंड में तेज उछाल देखा गया, जो लगभग आधे से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि निर्यात से जुड़े रिफंड में हल्की गिरावट दर्ज की गई, जो वैश्विक व्यापार परिस्थितियों में आए बदलावों का संकेत देती है।

    आर्थिक विश्लेषण में यह भी देखा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने आयात लागत को प्रभावित किया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से कर संग्रह बढ़ा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि वैश्विक बाजार की गतिविधियां भारत की कर प्रणाली पर सीधा प्रभाव डालती हैं। कुल मिलाकर अप्रैल 2026 का GST प्रदर्शन यह दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत और स्थिर विकास पथ पर आगे बढ़ रही है, जहां घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार दोनों मिलकर राजस्व वृद्धि को गति दे रहे हैं।

  • वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर

    वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू राजनीतिक तनावों के बीच देश की मौद्रिक नीति को लेकर बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले निर्णय से बच रहा है और आगे की दिशा आर्थिक आंकड़ों और जोखिमों के विस्तृत आकलन के आधार पर तय की जाएगी। उन्होंने इसे वेट एंड वॉच की स्थिति बताया और कहा कि मौजूदा समय में स्थिरता बनाए रखना प्राथमिकता है।

    अपने एक अंतरराष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों और वैश्विक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की भूमिका भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी आय के प्रवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि पश्चिम एशिया भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार क्षेत्र है, जो देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा, आयात का महत्वपूर्ण भाग और कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही उर्वरक आयात और विदेशी रेमिटेंस में भी इस क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह की गहरी आर्थिक निर्भरता के कारण किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

    आरबीआई गवर्नर ने विशेष रूप से दूसरे दौर के प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आपूर्ति व्यवधान यदि लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनका असर धीरे धीरे कीमतों और उत्पादन लागत पर फैल सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। इस प्रकार की स्थिति केवल अस्थायी नहीं होती बल्कि आर्थिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

    मौद्रिक नीति को लेकर उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में तटस्थ रुख बनाए हुए है और हाल के महीनों में की गई ब्याज दरों में कटौती के बाद अब स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति पूरी तरह डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाती है और बदलते आर्थिक संकेतकों के अनुसार लगातार जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करती रहती है ताकि नीति निर्णय संतुलित और प्रभावी बने रहें।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन की सराहना की और बताया कि यूनिफाइड पेमेंट सिस्टम के माध्यम से लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की डिजिटल प्रगति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक नए डिजिटल लोन सिस्टम पर काम चल रहा है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और छोटे व्यवसायों को त्वरित और आसान ऋण उपलब्ध कराना है।

    वित्तीय अनुशासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि देश का राजकोषीय घाटा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार कम हुआ है, जो आर्थिक प्रबंधन में सुधार का संकेत है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सरकारी ऋण अनुपात में भी धीरे धीरे सुधार देखा जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा ईरान युद्ध का असर… महंगे तेल ने बिगाड़ी हालत


    नई दिल्ली।
    ग्लोबल स्तर (Global Level) पर बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में तेज उछाल अब भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर भी असर दिखाने लगा है। हाल ही में आई मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) की रिपोर्ट में भी इसका संकेत साफ दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक, महंगे तेल की वजह से भारत की आर्थिक ग्रोथ पर दबाव बढ़ गया है। यही वजह है कि FY2027 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान घटाकर 6.2% कर दिया गया है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत पर कैसा पड़ेगा?

    आपको बता दें कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। इससे ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों की जेब पर दबाव बढ़ता है और खर्च कम हो जाता है, जिससे डिमांड भी कमजोर पड़ने लगती है।


    95 डॉलर प्रति बैरल होंगी तेल की कीमतें

    रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमतें औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं, तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी, कंपनियों का मुनाफा घटेगा और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, जो बढ़कर करीब 5.1% तक पहुंचने का अनुमान है।

    85% कच्चा तेल आयात
    भारत की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वह अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ जाता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी बढ़कर 2.5% तक जा सकता है। इससे रुपये पर भी दबाव बन सकता है।

    किस-किस पर होगा असर?
    इसका असर आम लोगों से लेकर कंपनियों और सरकार तक सभी पर पड़ता है, जहां आम आदमी की खरीदारी घटती है, वहीं कंपनियों के खर्च बढ़ जाते हैं और सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है। हालांकि, RBI (Reserve Bank of India) फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए स्थिति संभालने की कोशिश कर सकता है। अगर हालात और बिगड़ते हैं और तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो ग्रोथ 5.7% तक गिर सकती है और महंगाई 6% के पार जा सकती है। फिर भी मजबूत घरेलू मांग और सरकारी नीतियों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था इस चुनौती का सामना करने में सक्षम मानी जा रही है।

  • डॉलर के आगे कमजोर पड़ा रुपया, पहली बार 94 के पार, जानिए क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट ?

    डॉलर के आगे कमजोर पड़ा रुपया, पहली बार 94 के पार, जानिए क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट ?


    नई दिल्ली। भारतीय करेंसी में गिरावट का सिलसिला जारी है और शुक्रवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। पहली बार रुपया 94 के पार पहुंच गया। कारोबार के दौरान यह 94.84 तक फिसल गया, जबकि दिन के अंत में 94.81 पर बंद हुआ।

    विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर रुपये पर साफ दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अब तक रुपया करीब 11 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। यह गिरावट पिछले एक दशक में किसी भी वित्त वर्ष की तुलना में सबसे अधिक मानी जा रही है।

    रुपये में गिरावट के प्रमुख कारण

    विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल रुपये पर दबाव बना रहा है। जानकारों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रह सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है और इसका सीधा असर करेंसी पर पड़ रहा है।

    विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना भी एक बड़ी वजह है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक महीने में करीब 13 अरब डॉलर की निकासी की गई है, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ा है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने भी स्थिति को और कमजोर किया है। युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया करीब 4 फीसदी तक गिर चुका है। इस अनिश्चित माहौल ने निवेशकों के भरोसे को भी प्रभावित किया है।

    आगे क्या रह सकता है रुख?

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब तक ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये में बड़ी मजबूती की संभावना कम है। हालांकि सरकार अपने स्तर पर स्थिति संभालने की कोशिश कर रही है।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती का फैसला लिया है, जिससे आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, इससे सरकारी राजस्व पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • जनवरी के मुकाबले फरवरी में थोक महंगाई बढ़ी, मैन्युफैक्चरिंग और खाद्य कीमतों का असर

    जनवरी के मुकाबले फरवरी में थोक महंगाई बढ़ी, मैन्युफैक्चरिंग और खाद्य कीमतों का असर

    नई दिल्ली: भारत में थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई पर आधारित महंगाई दर फरवरी महीने में बढ़कर 2.13 प्रतिशत हो गई है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक खाद्य और गैर-खाद्य उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण यह वृद्धि दर्ज की गई है।

    इससे पहले जनवरी में थोक महंगाई दर 1.81 प्रतिशत थी जबकि पिछले साल फरवरी में यह 2.45 प्रतिशत दर्ज की गई थी। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के बयान के अनुसार फरवरी 2026 में महंगाई दर सकारात्मक रहने की मुख्य वजह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, बेसिक मेटल, खाद्य उत्पाद, गैर-खाद्य उत्पाद और टेक्सटाइल की कीमतों में वृद्धि रही।

    आंकड़ों के अनुसार फरवरी में खाद्य उत्पादों की थोक महंगाई दर 2.19 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 1.55 प्रतिशत थी। हालांकि सब्जियों की कीमतों में कुछ राहत देखने को मिली है। सब्जियों में थोक महंगाई दर जनवरी के 6.78 प्रतिशत से घटकर फरवरी में 4.73 प्रतिशत पर आ गई। इसके बावजूद दाल, आलू, अंडे, मांस और मछली जैसी वस्तुओं की कीमतों में पिछले महीने की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई है।

    मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी महंगाई का दबाव बढ़ा है। फरवरी में मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की थोक महंगाई दर जनवरी के 2.86 प्रतिशत से बढ़कर 2.92 प्रतिशत हो गई। वहीं गैर-खाद्य पदार्थों की श्रेणी में महंगाई दर जनवरी के 7.58 प्रतिशत से बढ़कर फरवरी में 8.80 प्रतिशत हो गई। हालांकि ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में महंगाई दर अभी भी नकारात्मक बनी हुई है। फरवरी में फ्यूल और पावर बास्केट की थोक महंगाई दर -3.78 प्रतिशत रही, जबकि जनवरी में यह -4.01 प्रतिशत थी।

    इससे पहले सरकार ने खुदरा महंगाई दर के भी आंकड़े जारी किए थे। फरवरी में खुदरा महंगाई दर 3.21 प्रतिशत दर्ज की गई, जो जनवरी के 2.74 प्रतिशत से 0.47 प्रतिशत अधिक है।ग्रामीण इलाकों में फरवरी में खुदरा महंगाई दर 3.37 प्रतिशत रही जबकि जनवरी में यह 2.73 प्रतिशत थी। वहीं शहरी क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर फरवरी में 3.02 प्रतिशत रही, जो जनवरी में 2.75 प्रतिशत थी।

    खाद्य महंगाई की बात करें तो फरवरी में यह 3.47 प्रतिशत रही। ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई दर 3.46 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 3.48 प्रतिशत दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य और मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आने वाले महीनों में महंगाई पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।