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  • ईरान पर ट्रंप का बदला रुख! सैन्य कार्रवाई से पीछे हटे अमेरिका, अब आर्थिक दबाव की रणनीति

    ईरान पर ट्रंप का बदला रुख! सैन्य कार्रवाई से पीछे हटे अमेरिका, अब आर्थिक दबाव की रणनीति


    वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ किसी नए बड़े सैन्य अभियान की संभावना से फिलहाल दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। अमेरिका अब तेहरान पर सैन्य कार्रवाई के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ता दिख रहा है। रविवार को ‘एक्सियोस’ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने ईरान को लेकर अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाया।

    ट्रंप ने किसी नई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देने के बजाय कहा कि उनका प्रशासन फिलहाल कम आक्रामक रुख अपना रहा है। उन्होंने ईरान की खराब होती अर्थव्यवस्था और वहां बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही।

    ट्रंप बोले- ईरान से आंशिक बातचीत जारी
    ट्रंप ने कहा कि ईरान में भारी महंगाई है और उसके पास पर्याप्त धन नहीं है। ऐसे में अमेरिका फिलहाल स्थिति को शांत रखते हुए तेहरान के साथ आंशिक बातचीत कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की आर्थिक हालत बेहद खराब है और उसके पास अपने सैनिकों को वेतन देने तक के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी ने भी ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है।

    खाड़ी देशों ने सैन्य कार्रवाई से बचने की दी सलाह
    अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनके खाड़ी सहयोगियों ने उन्हें बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू करने के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की सलाह दी थी। इसके अलावा अमेरिका में कच्चे तेल की कीमत करीब 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। इससे वाशिंगटन को तत्काल सैन्य कार्रवाई किए बिना ईरान पर दबाव बनाए रखने का अवसर मिल रहा है। ट्रंप ने पूरे घटनाक्रम की तुलना शतरंज के खेल से की और कहा कि मामला अंततः सुलझ ही जाता है।

    होर्मुज समझौते पर नई शर्तों से अटका मामला
    इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर अमेरिका, ईरान और ओमान के बीच प्रस्तावित समझौते पर भी पेच फंस गया है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख मोहम्मद बागेर जोलकद्र ने शनिवार को मांग रखी कि अमेरिका युद्ध को पूरी तरह समाप्त करे, नौसैनिक नाकेबंदी हटाए और अपनी सेना वापस बुलाए।

    उन्होंने प्रतिबंध हटाने, फ्रीज की गई संपत्तियां बहाल करने और युद्ध क्षतिपूर्ति देने की भी मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई रोकने और अमेरिकी धमकियों तथा ईरान के कथित अपमान को बंद करने की मांग रखी। वहीं, अमेरिका ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को खारिज किया है। इसमें वाणिज्यिक जहाजों से टोल वसूलने की किसी भी कोशिश का विरोध शामिल है।

    होर्मुज जलमार्ग खोलना बन सकता है ट्रंप की प्राथमिकता
    ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल कर देता है, तो ट्रंप नया परमाणु समझौता किए बिना भी पीछे हटने के लिए तैयार हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो यह अमेरिकी रणनीति में बड़ा बदलाव होगा। परमाणु मुद्दा पिछले कई महीनों से वाशिंगटन की प्रमुख मांगों में शामिल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत लगातार मुश्किल बनी हुई है।

    ट्रंप का मानना है कि ईरान के परमाणु ठिकानों के नष्ट होने के बाद उसके लिए परमाणु क्षमताओं को दोबारा खड़ा करना बेहद कठिन होगा। अमेरिका का यह भी मानना है कि उसकी खुफिया एजेंसियां ईरान की किसी गुप्त परमाणु गतिविधि का पता लगाने में सक्षम होंगी।

    ईरान के यूरेनियम भंडार पर ट्रंप ने चिंता को किया खारिज
    राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के जमीन के नीचे मौजूद यूरेनियम भंडार को लेकर उठ रही चिंताओं को भी कमतर बताया। जुलाई में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) के शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा था कि परमाणु सामग्री जमीन के बहुत नीचे है और दूसरे देशों के लिए उसे हासिल करना संभव नहीं होगा। ऐसे में मौजूदा हालात में ट्रंप प्रशासन व्यापक परमाणु समझौते की तुलना में होर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलने और ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने को प्राथमिकता दे सकता है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें

    ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में जारी रणनीतिक और कूटनीतिक तनाव के बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को फिर से खोलने की प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिका द्वारा रखी गई शर्तों को स्वीकार करने पर निर्भर करेगी। जब तक अमेरिका ईरान की सभी मांगों और शर्तों को पूरी तरह से नहीं मान लेता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही बहाल नहीं की जाएगी।

    आईआरजीसी के आधिकारिक प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य को खोलने के लिए कुछ विशेष व्यवस्थाएं और कड़ी शर्तें तय की गई हैं। उन्होंने कहा कि यह मार्ग तभी खोला जाएगा जब अमेरिकी प्रशासन क्षेत्रीय बातचीत और मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप पूरी तरह बंद करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रशासन के समक्ष रखी गई शर्तें ओमान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं से अलग हैं।

    दूसरी तरफ, कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर नए प्रोटोकॉल पर सहमति बनती दिख रही है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि दोनों देश एक व्यावहारिक और नई जहाजरानी व्यवस्था पर समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जलमार्ग को पूर्ण रूप से चालू करने से पहले अमेरिका से जुड़े कुछ आर्थिक और तकनीकी मुद्दों का समाधान होना बाकी है।

    ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र ने अमेरिका के समक्ष रखी गई शर्तों की विस्तृत रूपरेखा साझा की है। ईरान की प्रमुख मांगों में उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य धमकियों और कार्रवाइयों को तुरंत रोकना, फारस की खाड़ी क्षेत्र में नाकाबंदी में शामिल नौसैनिक और वायुसैनिक बलों की वापसी, संघर्ष के दौरान हुए वित्तीय और ढांचागत नुकसान का उचित मुआवजा देना, आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना और विदेश में जब्त की गई ईरानी परिसंपत्तियों को तत्काल जारी करना शामिल है।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां कूटनीतिक समझौते के लिए सबसे उपयुक्त अवसर प्रस्तुत करती हैं। हालांकि, उन्होंने दृढ़ता से दोहराया कि तेहरान अपने नागरिकों के अधिकारों और राष्ट्रीय स्वाभिमान से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा। उन्होंने देश की आंतरिक क्षमताओं और जनता के भरोसे को प्राथमिकता देने की बात कही।

    इसके अतिरिक्त, क्षेत्र में यमन के मारिब शहर से भी हिंसा की खबरें सामने आई हैं। यमनी सशस्त्र बलों ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर आवासीय इलाकों और विस्थापित लोगों के शिविरों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले करने का आरोप लगाया है। इन हमलों में दो लोगों की मौत हुई है और चौदह अन्य नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। यमनी सैन्य नेतृत्व ने उचित समय और स्थान पर इन हमलों का कड़ा जवाब देने की घोषणा की है।

  • पेजेशकियान ने 48 घंटे में ईरान पर कब्जे की कथित योजना का किया खुलासा, मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील

    पेजेशकियान ने 48 घंटे में ईरान पर कब्जे की कथित योजना का किया खुलासा, मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील

    नई दिल्ली । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिका और इजरायल के साथ जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने यह लड़ाई शुरू नहीं की थी, बल्कि उसके खिलाफ पहले सैन्य कार्रवाई की गई। पेजेशकियान के अनुसार, ईरान पर लगातार दबाव बनाया गया और उसे कमजोर करने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बावजूद देश अपनी स्थिति पर मजबूती से कायम है। उन्होंने कहा कि ईरानी नेतृत्व ने संकट के बीच देश की एकता और मजबूती बनाए रखने पर जोर दिया है।

    पेजेशकियान ने बताया कि संघर्ष शुरू होने से पहले उनकी सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहती थी। उनका कहना है कि ईरान युद्ध नहीं चाहता था और तनाव को कूटनीतिक माध्यमों से कम करने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि, उनके मुताबिक दूसरी ओर से सैन्य कार्रवाई की गई, जिसके बाद हालात तेजी से बदल गए। राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान पर सैन्य और राजनीतिक दबाव के बावजूद देश ने अपने फैसलों से पीछे हटने के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। उनके बयान में ईरान की ओर से संघर्ष को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश दिखाई देती है।

    ईरानी राष्ट्रपति ने विरोधियों की कथित रणनीति का जिक्र करते हुए कहा कि यह अनुमान लगाया गया था कि ईरान ज्यादा समय तक दबाव का सामना नहीं कर पाएगा। उनके अनुसार, सीरिया जैसे हालात पैदा करके 48 घंटे के भीतर ईरान पर कब्जा करने या उसे कमजोर करने की योजना बनाई गई थी। पेजेशकियान ने दावा किया कि यह आकलन गलत साबित हुआ। उन्होंने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों के दौरान ईरान ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया और देश को टूटने नहीं दिया। राष्ट्रपति ने भरोसा जताया कि ईरान आने वाले समय में भी अपने फैसलों और राष्ट्रीय हितों पर कायम रहेगा।

    पेजेशकियान ने मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि अगर मुस्लिम देश एक साथ खड़े होते हैं तो बाहरी दबाव और चुनौतियों का सामना करना कम मुश्किल हो सकता है। उनके इस आह्वान को मौजूदा क्षेत्रीय संकट के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। ईरान का मानना है कि क्षेत्रीय देशों की एकजुटता से बाहरी दबाव का प्रभाव कम किया जा सकता है। ऐसे में पेजेशकियान का संदेश केवल घरेलू जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम देशों के लिए भी राजनीतिक संकेत देता है।

    ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को लेकर भी पेजेशकियान ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उनसे संपर्क करना आसान नहीं है। हालांकि, इसके बावजूद उन्होंने खामेनेई की मौजूदगी को देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। राष्ट्रपति की यह टिप्पणी ईरान के मौजूदा नेतृत्व और संकट के दौरान निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खामेनेई की भूमिका को लेकर ईरानी नेतृत्व की प्राथमिकता भी इस बयान में दिखाई देती है।

    पेजेशकियान के बयान ऐसे समय में सामने आए हैं जब ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। ईरानी राष्ट्रपति एक तरफ बातचीत की कोशिशों और युद्ध शुरू नहीं करने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसी भी दबाव के सामने मजबूती से खड़े रहने का संदेश दे रहे हैं। आने वाले समय में सैन्य गतिविधियों के साथ कूटनीतिक प्रयास भी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बातचीत का रास्ता खुलता है तो तनाव कम करने की संभावना बन सकती है, लेकिन सैन्य टकराव बढ़ने की स्थिति में इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

  • ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर नियंत्रण के लिए बिल का ड्राफ्ट पेश किया, नियम तोड़ने पर भारी जुर्माने का प्रावधान

    ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर नियंत्रण के लिए बिल का ड्राफ्ट पेश किया, नियम तोड़ने पर भारी जुर्माने का प्रावधान

    नई दिल्ली । ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को नियंत्रित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। ईरानी सांसदों ने इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों के लिए नए नियमों से जुड़े एक विधेयक का ड्राफ्ट तैयार किया है। इस प्रस्ताव में कुछ जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक जुर्माना लगाने का प्रावधान शामिल किया गया है।

    यह बिल फिलहाल ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की समीक्षा में है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात को नियंत्रित करना और ईरान के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना बताया जा रहा है। हालांकि, इस कदम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता भी बढ़ सकती है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है।

    प्रस्तावित ड्राफ्ट में इजरायल से जुड़े जहाजों और कुछ अन्य देशों या कंपनियों से जुड़े सैन्य तथा नागरिक कार्गो पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि ऐसे जहाजों को मुआवजा मिलने तक ट्रांजिट की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके अलावा नियमों का उल्लंघन करने वाले जहाजों पर उनके कार्गो मूल्य का 20 प्रतिशत तक जुर्माना लगाने का प्रावधान भी प्रस्ताव में शामिल किया गया है।

    ईरान की योजना के अनुसार, जिन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दी जाएगी, उनसे नौवहन सेवाओं के खर्च को पूरा करने के लिए शुल्क लिया जा सकता है। यह शुल्क ईरानी मुद्रा में जमा करना होगा। ईरान का कहना है कि यह व्यवस्था समुद्री सुरक्षा और सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का परिवहन होता है। किसी भी तरह की बाधा या नियंत्रण व्यवस्था का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। इसी कारण ईरान के इस कदम पर कई देशों की नजर बनी हुई है।

    इससे पहले भी ईरान की ओर से होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कानून बनाने की कोशिश की गई थी। शुरुआती प्रस्तावों में केवल उन देशों के जहाजों को निशाना बनाने की बात कही गई थी, जिन्हें ईरान अपना विरोधी मानता है। नए ड्राफ्ट में प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाते हुए अधिक जहाजों और कार्गो को शामिल किया गया है।

    इसी बीच ईरान और ओमान के बीच होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े समुद्री मार्गों को लेकर बातचीत भी जारी है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, दोनों देशों के बीच नौवहन मार्ग के भौगोलिक निर्देशांकों को लेकर सहमति बन चुकी है और संयुक्त बयान की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। हालांकि, इस समझौते को लेकर ओमान की ओर से अभी सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ईरान अपने नियंत्रण वाले समुद्री मार्गों से गुजरने वाले जहाजों की निगरानी करेगा। ईरान का कहना है कि वह समुद्री सुरक्षा और नौवहन व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार रखेगा। इस व्यवस्था को लेकर क्षेत्रीय देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

    होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान के नए कदम ऐसे समय सामने आए हैं जब मध्य पूर्व में पहले से ही राजनीतिक और सैन्य तनाव बना हुआ है। समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का अतिरिक्त नियंत्रण या प्रतिबंध वैश्विक व्यापार के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है। आने वाले दिनों में इस बिल की समीक्षा और क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रिया पर दुनिया की नजर रहेगी।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान-ओमान की नई व्यवस्था से बढ़ी हलचल, अमेरिका ने मुक्त नौवहन को लेकर जताई आपत्ति

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान-ओमान की नई व्यवस्था से बढ़ी हलचल, अमेरिका ने मुक्त नौवहन को लेकर जताई आपत्ति


    नई दिल्ली । दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और ओमान के बीच एक अहम समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत दोनों देश इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा, मार्गदर्शन और यातायात प्रबंधन की संयुक्त जिम्मेदारी निभाएंगे। इसके बदले जहाजों से सर्विस फीस लेने का प्रावधान किया गया है, जिसे दोनों देशों के बीच समान रूप से साझा किया जाएगा। इस प्रस्तावित व्यवस्था ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है क्योंकि अमेरिका ने इसका खुलकर विरोध दर्ज कराया है।

    ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच नए शिपिंग रूट और उसके संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं पर व्यापक सहमति बन चुकी है। अब समझौते को अंतिम रूप देने के लिए संयुक्त बयान की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि नए समुद्री मार्ग के भौगोलिक निर्देशांक तय किए जा चुके हैं और तकनीकी स्तर पर अधिकांश प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि समझौते की औपचारिक घोषणा जल्द की जा सकती है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों को निर्धारित समुद्री मार्ग का पालन करना होगा। सुरक्षा, निगरानी और नौवहन सहायता की जिम्मेदारी ईरान और ओमान संयुक्त रूप से निभाएंगे। इसके बदले जहाजों से सर्विस फीस वसूली जाएगी, जिसे दोनों देशों के बीच बराबर-बराबर बांटा जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य समुद्री यातायात को अधिक संगठित और सुरक्षित बनाना बताया जा रहा है।

    अमेरिका ने इस प्रस्तावित समझौते पर गंभीर आपत्ति जताई है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर ऐसी कोई व्यवस्था स्वीकार्य नहीं हो सकती, जिससे मुक्त और निर्बाध नौवहन के सिद्धांत पर प्रभाव पड़े। अमेरिका का मानना है कि वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सभी देशों को समान और स्वतंत्र पहुंच मिलनी चाहिए तथा किसी भी नई व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के मूल सिद्धांत प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    ईरान का कहना है कि प्रस्तावित मॉडल का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करना है। अधिकारियों के अनुसार नई व्यवस्था इस प्रकार तैयार की गई है कि वाणिज्यिक जहाज अपनी यात्रा के दोनों चरणों में निर्धारित समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरेंगे, जिससे यातायात प्रबंधन अधिक प्रभावी बनाया जा सके। ईरान का यह भी दावा है कि यह व्यवस्था क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और समुद्री गतिविधियों में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

    होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत रणनीतिक महत्व रखता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और ऊर्जा संसाधन इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में लागू होने वाली किसी भी नई व्यवस्था का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान और ओमान इस समझौते को कब अंतिम रूप देते हैं और इसके बाद वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।

  • ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

    ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान की ओर से बातचीत की पहल हुई है और कई क्षेत्रीय देशों के सहयोग से संवाद आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब, यूएई और कतर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल नहीं होने को कई विश्लेषक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    पिछले कुछ समय से पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। इस दौरान उसने दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका सीमित या नगण्य मानी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं रहे हैं। ईरान पहले भी पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है। वहीं अमेरिका के कुछ नेताओं ने भी समय-समय पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। ऐसे माहौल में ट्रंप का बयान क्षेत्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पाकिस्तान को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और दावों ने भी चर्चा को प्रभावित किया है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान, चीन और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तथा हथियारों की आपूर्ति से जुड़े दावे किए गए थे। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। इन घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर भी बहस जारी है।

    इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौते का अवसर नहीं अपनाता है तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप के अनुसार मौजूदा समय किसी सकारात्मक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है और सभी पक्षों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

    हालांकि दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक वार्ता की बात से इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि ऐसी किसी प्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी नए समझौते का रास्ता निकलता है, इस पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी। साथ ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • होर्मुज पर ईरान की दोटूक चेतावनी, दूसरा समुद्री रास्ता बना तो अमेरिकी युद्धपोत होंगे निशाने पर

    होर्मुज पर ईरान की दोटूक चेतावनी, दूसरा समुद्री रास्ता बना तो अमेरिकी युद्धपोत होंगे निशाने पर


    नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में वैकल्पिक समुद्री मार्ग बनाने के लिए अमेरिकी युद्धपोत तैनात किए गए तो उन्हें मिसाइलों से निशाना बनाया जाएगा। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत जारी होने का दावा किया है, लेकिन तेहरान ने किसी भी तरह की वार्ता से इनकार कर दिया है।

    ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सलाहकार और एक्सपीडियेंसी काउंसिल के सदस्य जनरल मोहसिन रेजाई ने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में दूसरा समुद्री मार्ग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका इस उद्देश्य से युद्धपोत भेजता है तो ईरान सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।

    अमेरिका को व्यवहार बदलने की नसीहत
    रेजाई ने कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता की प्राथमिकता यह है कि अमेरिका अपने रवैये में वास्तविक बदलाव दिखाए। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका कुछ अहम शर्तों पर आगे बढ़ता है तो इसे सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका समुद्री नाकेबंदी जारी रखता है तो उसके जहाजों और सैन्य ठिकानों को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

    ओमान से सुरक्षा पर चर्चा, अमेरिका से नहीं
    ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ किसी प्रकार की बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि फिलहाल केवल ओमान के साथ होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और प्रबंधन को लेकर चर्चा चल रही है। बघाई ने कहा कि निकट भविष्य में न तो कोई विदेशी प्रतिनिधिमंडल ईरान आएगा और न ही ईरानी वार्ताकार विदेश जाएंगे।

    ट्रंप बोले- बातचीत जारी है
    दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में कहा कि ईरान के साथ वार्ता जारी है और जल्द ही औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य देशों के अनुरोध पर यह संवाद आगे बढ़ रहा है। ट्रंप ने कहा कि उनकी कोशिश होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समाधान निकालने की है।

    ट्रंप का नया दावा
    बाद में ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को “दोहरे रवैये वाला” बताते हुए कहा कि ईरान ने ही बैठक की इच्छा जताई है और निकट भविष्य में वार्ता तय है। उन्होंने यह भी दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नौसेना का पूरा नियंत्रण है और अमेरिका की अनुमति के बिना वहां कोई गतिविधि संभव नहीं है।

    तेल बाजार पर पड़ा असर
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता की अटकलों के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में राहत देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। माना जा रहा है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव कम होता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने से ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है।

  • सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता

    सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता


    नई दिल्ली।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Crown Prince Mohammed bin Salman) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) से फोन पर बात की है. इस दौरान उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना की बड़े पैमाने पर नए हमले करने के प्लान पर चिंता जताई है।

    दो अमेरिकी अधिकारियों और इस फोन कॉल की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने इस बातचीत की पुष्टि की है. सूत्र ने ‘एक्सियोस’ को बताया, ‘सऊदी अरब ने अमेरिका की इस प्लानिंग पर गंभीर चिंता जताई है और पूरे प्लान पर सफाई मांगी है।

    दरअसल, जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए ईरानी मिसाइल हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही में हो रही रुकावटों के जवाब में ट्रंप बेहद सख्त रुख अपना रहे हैं. वो आने वाले दिनों में ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर जोरदार हमले करने के बारे में सोच रहे हैं।

    बातचीत की जानकारी रखने वाले दूसरे सूत्र ने बताया कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से हमलों को रोकने की अपील की है. हालांकि व्हाइट हाउस और वॉशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास ने इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।


    सऊदी रक्षा मंत्री ने भी दिया शांति का संदेश

    इससे पहले, बुधवार को ट्रंप ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से मुलाकात की थी. सूत्रों के मुताबिक, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ हुई बैठक में सऊदी रक्षा मंत्री ने बताया था कि उनका देश ईरान के साथ मामले को सुलझाने और तनाव घटाने के पक्ष में है।


    ईरान ने दी धमकी

    दूसरी तरफ, ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो वो इजरायल और खाड़ी देशों के ऊर्जा और बुनियादी ठिकानों पर पलटवार करेगा. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्रियों से बात की।

    अपने टेलीग्राम चैनल पर जारी बयान के मुताबिक अराघची ने सऊदी विदेश मंत्री से कहा, ‘अमेरिका या इजरायल की किसी भी कार्रवाई या उसमें क्षेत्रीय देशों की भागीदारी का ईरान के सशस्त्र बल करारा और बराबर का जवाब देंगे।


    कतर कर रहा मध्यस्थता की कोशिश

    बता दें कि मिडिल-ईस्ट की जंग रोकने के लिए सऊदी अरब के साथ-साथ कतर, UAE, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश भी अमेरिका और ईरान पर दबाव बना रहे हैं. शनिवार को कतर ने ईरानी विदेश मंत्री, व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकॉफ और ओमान के अधिकारियों से अलग-अलग बातचीत की, ताकि होर्मुज को फिर से खोलने पर सहमति बन सके।

  • ईरान के सत्ता गलियारों में बढ़ी हलचल, मोजतबा खामेनेई की लोकेशन पर सस्पेंस बरकरार

    ईरान के सत्ता गलियारों में बढ़ी हलचल, मोजतबा खामेनेई की लोकेशन पर सस्पेंस बरकरार


    नई दिल्ली। ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई पिछले कई महीनों से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं और इसी वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चाएं तेज हो गई हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषणों में दावा किया जा रहा है कि उनकी लोकेशन को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं लेकिन अब तक कोई आधिकारिक और स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी सामने नहीं आई है। यही कारण है कि यह मामला दुनिया की सबसे चर्चित भू राजनीतिक पहेलियों में शामिल होता जा रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार मोजतबा खामेनेई ने अपने पिता अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद से उन्होंने कुछ लिखित संदेश जरूर जारी किए हैं लेकिन किसी सार्वजनिक कार्यक्रम टेलीविजन संबोधन या आधिकारिक समारोह में दिखाई नहीं दिए। उनकी अनुपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    कई विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिका और इजरायल की खुफिया एजेंसियां उनकी गतिविधियों पर नजर रखने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई आधुनिक डिजिटल माध्यमों का बहुत सीमित उपयोग करते हैं या उनसे पूरी तरह दूरी बनाए हुए हैं। यदि ऐसा है तो इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के जरिए उनकी लोकेशन का पता लगाना स्वाभाविक रूप से अधिक कठिन हो सकता है।

    उनकी गैरमौजूदगी को लेकर अलग अलग तरह की अटकलें भी सामने आती रही हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि वह सुरक्षा कारणों से किसी सुरक्षित स्थान पर रह रहे हैं जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों में उनके स्वास्थ्य को लेकर भी दावे किए गए हैं। हालांकि इन दावों की पुष्टि ईरानी सरकार या किसी विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत की ओर से नहीं की गई है। इसलिए इन खबरों को केवल अपुष्ट रिपोर्टों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के बीच किसी भी शीर्ष नेतृत्व के लिए सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सख्त बनाया जाना असामान्य नहीं है। ईरान लंबे समय से पश्चिमी देशों और इजरायल के साथ तनावपूर्ण संबंधों का सामना करता रहा है। ऐसे माहौल में शीर्ष नेतृत्व की सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित करना सुरक्षा रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हालांकि इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं इसका स्पष्ट उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान की सरकार अपने प्रशासनिक और राजनीतिक कामकाज को सामान्य रूप से जारी रखने का दावा करती रही है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने यह भी कहा है कि सर्वोच्च नेतृत्व आवश्यक निर्णय ले रहा है लेकिन उनके सार्वजनिक कार्यक्रम सीमित हैं। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार इस विषय पर नजर बनाए हुए हैं और किसी आधिकारिक तस्वीर या सार्वजनिक उपस्थिति का इंतजार कर रहे हैं।

    फिलहाल मोजतबा खामेनेई की मौजूदगी को लेकर कई तरह की चर्चाएं जरूर हैं लेकिन उनके ठिकाने या स्वास्थ्य संबंधी किसी भी दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इस मामले को लेकर सामने आ रही अपुष्ट जानकारियों के बजाय आधिकारिक बयानों और विश्वसनीय स्रोतों पर ही भरोसा करना उचित होगा। आने वाले समय में यदि ईरान की ओर से कोई सार्वजनिक उपस्थिति या आधिकारिक जानकारी जारी की जाती है तो इस रहस्य से जुड़ी कई अटकलों पर विराम लग सकता है।