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  • BRICS में ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर उठाए सवाल, बोले- पीएम मोदी की कूटनीति के आगे आसिम मुनीर की भूमिका कमजोर

    BRICS में ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर उठाए सवाल, बोले- पीएम मोदी की कूटनीति के आगे आसिम मुनीर की भूमिका कमजोर

    नई दिल्ली ।भारत की मेजबानी में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया के बदलते कूटनीतिक समीकरणों को लेकर भी चर्चा हुई। ईरान से आए पत्रकार बसीम लालेह ने पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत संवाद और कूटनीति के स्तर पर अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कूटनीतिक सक्रियता की सराहना की और पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर पर भी टिप्पणी की।

    लालेह के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के दौरान पाकिस्तान ने मध्यस्थता में अपनी भूमिका को प्रमुखता से पेश करने की कोशिश की, लेकिन वह इसमें सफल नहीं रहा। इसके विपरीत, भारत ने विभिन्न देशों के साथ सीधे संवाद के जरिए अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत की है। उन्होंने कहा कि BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ईरान और यूएई के नेताओं के साथ बातचीत इसका उदाहरण है।

    ईरानी पत्रकार ने बताया कि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच बातचीत हुई। इसके साथ ही अबू धाबी के क्राउन प्रिंस के साथ भी प्रधानमंत्री की चर्चा हुई। उनके अनुसार, इसके बाद यूएई और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता बनना पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर भी संवाद के जरिए आगे बढ़ने की संभावना बन सकती है।

    आसिम मुनीर को लेकर लालेह ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मुनीर कई मोर्चों पर असफल रहे हैं और भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता के बाद पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की भूमिका कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने आसिम मुनीर की छुट्टी कर दी है। हालांकि, यह टिप्पणी राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव के संदर्भ में की गई थी।

    लालेह ने BRICS सम्मेलन की मेजबानी और प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत ने मतभेदों को पीछे छोड़कर बातचीत और सहयोग पर जोर दिया है। उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संकट के समाधान के लिए संवाद महत्वपूर्ण है और भारत इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले दो महीनों में क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को लेकर सकारात्मक बदलाव दिखाई दे सकते हैं।

    पाकिस्तान की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए लालेह ने कहा कि पाकिस्तान खुद कई मामलों में दूसरे देशों पर निर्भर है। उनके अनुसार, इसी वजह से पाकिस्तान के लिए स्वतंत्र तरीके से विदेश नीति तय करना मुश्किल है। उन्होंने पाकिस्तान की कूटनीति को कमजोर बताते हुए कहा कि वह क्षेत्रीय शांति को लेकर कोई प्रभावी उदाहरण स्थापित नहीं कर पाया है।

    ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जो देश आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना करता रहा है, उसके लिए शांति की पहल का नेतृत्व करना मुश्किल होता है। उन्होंने पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को लगातार अधिक महत्व मिल रहा है।

    लालेह ने सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रम का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, सऊदी अरब पर हमले करने वालों के खिलाफ पाकिस्तान अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पाया है। उन्होंने सऊदी क्राउन प्रिंस के साथ पाकिस्तान और तुर्की से जुड़े मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का भी उल्लेख किया और कहा कि इस मामले में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    BRICS सम्मेलन के दौरान भारत की सक्रिय कूटनीति और पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर बहस तेज है। ईरानी पत्रकार बसीम लालेह की टिप्पणियों ने इस चर्चा को और बढ़ा दिया है। वहीं, भारत की ओर से विभिन्न देशों के साथ संवाद और सहयोग बढ़ाने की कोशिशों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है।

  • BRICS: नई दिल्ली घोषणापत्र पर ईरान को राजी करने के लिए करनी पड़ी मशक्कत

    BRICS: नई दिल्ली घोषणापत्र पर ईरान को राजी करने के लिए करनी पड़ी मशक्कत


    नई दिल्ली।
    ब्रिक्स देशों (BRICS Nations) ने एकतरफा टैरिफ, व्यापार प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों पर कड़ा रुख अपनाया है। शनिवार को सर्वसम्मति से जारी ‘नई दिल्ली घोषणापत्र-2026’ (New Delhi Declaration-2026’) में इन्हें वैश्विक व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं के लिए नुकसानदेह बताते हुए ऐसी कार्रवाइयों से बचने का आह्वान किया गया। वहीं नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर ईरान (Iran) को तैयार करना आसान नहीं था। इसके लिए शनिवार सुबह 4 बजे तक मान-मनौव्वल और मशक्कत चलती रही।

    ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) (World Trade Organization (WTO)) की विवाद निपटारा व्यवस्था बहाल करने और वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत बनाने पर जोर दिया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक में विकासशील देशों की आवाज और हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग की।


    आतंकवाद किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं

    45 पन्नों और 140 बिंदुओं के नई दिल्ली घोषणापत्र का ईरान और यूएई ने भी समर्थन किया। इसमें ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों की कड़ी निंदा की। कहा गया कि किसी भी वजह या मकसद से अंजाम दी गई आतंकवादी घटनाओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। ब्रिक्स ने आतंकवाद, इसकी आर्थिक मदद, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाना दिए जाने के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता दोहराई। घोषणापत्र में कहा गया है कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। ब्रिक्स देशों ने ब्रिक्स काउंटर -टेररिज्म वर्किंग ग्रुप और उसके पांच उप-समूहों के काम की सराहना करते हुए आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई।


    पहलगाम हमले की निंदा

    साझा घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की। इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे।


    स्थायी सदस्यता का समर्थन

    ब्रिक्स देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन भी दोहराया। घोषणापत्र में चीन और रूस ने भारत की बड़ी भूमिका के समर्थन की बात कही। यूएनएससी में सुधार को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि इसे अब और नहीं टाला जा सकता है।


    इजरायल को झटका

    यूएई फलस्तीन समस्या के द्वि राष्ट्र समाधान का समर्थक है। ईरान भी इस प्रस्ताव के पक्ष में रहा। हालांकि, ब्रिक्स का यह प्रस्ताव इजरायल के लिए कूटनीतिक झटका है।


    परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित हो मध्य एशिया

    नई दिल्ली घोषणा में समूचे मध्य एशिया को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करने का भी प्रस्ताव है। यदि संयुक्त राष्ट्र किसी क्षेत्र को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करता है तो वहां परमाणु हथियारों का निर्माण और वितरण निषेध होता है। ईरान पर अमेरिकी हमलों के मद्देनजर यह एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव है।


    कैसे राजी हुआ ईरान

    ब्रिक्स में संयुक्त बयान पर यूएई और ईरान आखिर कैसे राजी हुए, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा गया लेकिन सूत्रों का दावा है कि ईरान संयुक्त बयान में फलस्तीन को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव जोड़ने की शर्त पर माना। इन शर्तों में फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य घोषित करने की मांग प्रमुख रूप से शामिल है। यूएई ने भी इनका समर्थन किया। इसके बाद ईरान और यूएई की केमिस्ट्री में बदलाव दिखा।

    सूत्रों के अनुसार, एकमत करने के लिए भारत ने सभी पक्षों से शनिवार सुबह चार बजे तक बात की। दिल्ली घोषणा पत्र के प्रस्ताव संख्या 31 में कहा गया है कि हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि इजरायल-फलस्तीन संघर्ष का सही और स्थायी समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है। ब्रिक्स सभी वैश्विक संगठनों में फलस्तीन के सही प्रतिनिधित्व की जरूरत को मानता है जिसमें विश्व बैंक, आईएमएफ जैसी वित्तीय संस्थाएं भी शामिल हैं।

  • BRICS शिखर सम्मेलन में साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति, भारत ने ईरान-UAE तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज किए

    BRICS शिखर सम्मेलन में साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति, भारत ने ईरान-UAE तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज किए


    नई दिल्ली ।
    भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में BRICS Summit 2026 की शुरुआत हो गई है। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में भारत के साथ रूस, चीन, ब्राजील और BRICS के अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेता हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन के बीच साझा घोषणापत्र को लेकर सदस्य देशों के बीच सहमति बनने की खबर सामने आई है।

    साझा घोषणापत्र में किसी एक देश का सीधे तौर पर नाम लिए जाने की संभावना नहीं है। इसके बजाय किसी भी देश की ओर से किए जाने वाले एकतरफा युद्ध की निंदा किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। सदस्य देशों के बीच इस विषय पर सहमति बनने के संकेत मिले हैं। घोषणापत्र को शनिवार को अंतिम मंजूरी दिए जाने की संभावना है और इसके शाम करीब चार बजे जारी होने की बात कही गई है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच BRICS सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। सदस्य देशों की ओर से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद कम करने तथा साझा सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष के कारण तनाव की स्थिति बनी हुई है।

    BRICS में भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, ईरान, इंडोनेशिया, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है, समूह के मंच पर सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिश महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इसी बीच भारत दौरे पर पहुंचे ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिका और इजराइल को लेकर कड़ा रुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ईरान दबाव और धमकी के आगे आत्मसमर्पण नहीं करेगा। उनका कहना था कि तेहरान अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा रहेगा।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मसूद पेजेश्कियान के बीच भी मुलाकात हुई। बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षित नौवहन और नाविकों की सुरक्षा पर जोर दिया। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से निकालने की आवश्यकता पर बल दिया।

    मुलाकात के दौरान भारत और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई। पश्चिम एशिया में मौजूदा तनाव के बीच दोनों देशों के बीच बातचीत में सुरक्षित नौवहन और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख रहा।

    BRICS Summit 2026 भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने वर्ष 2026 में चौथी बार इस समूह की अध्यक्षता संभाली है। इसी वर्ष BRICS अपनी स्थापना के 20 वर्ष भी पूरे कर रहा है।

    शिखर सम्मेलन के दौरान साझा घोषणापत्र पर सहमति बनने की प्रक्रिया को सदस्य देशों के बीच सामूहिक रुख तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है। प्रस्तावित घोषणापत्र में किसी देश को सीधे निशाना बनाने के बजाय एकतरफा युद्ध की निंदा करने की बात सामने आई है।

    ईरान और UAE के बीच तनाव के बीच सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिश तथा प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की बातचीत ने सम्मेलन के कूटनीतिक पक्ष को भी प्रमुखता दी है। अब साझा घोषणापत्र को अंतिम मंजूरी मिलने और उसके जारी होने का इंतजार है।

  • BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच तनाव के बीच जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए मिसाइल हमले को लेकर एक नया आरोप सामने आया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान को चीन से जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की हाई-क्वालिटी सैटेलाइट तस्वीरें मिली थीं। अधिकारियों के अनुसार, इन तस्वीरों से ईरान को सैन्य अड्डे और वहां मौजूद अमेरिकी सैनिकों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती थी।

    अमेरिकी अधिकारियों ने जॉर्डन में मौजूद मुवफ्फक सलती एयर बेस पर हुए हमले और चीन से मिली तस्वीरों के बीच संबंध होने की बात कही है। उनके अनुसार, ईरान ने इस सैन्य अड्डे की साफ और विस्तृत सैटेलाइट तस्वीरें हासिल की थीं। माना जा रहा है कि ऐसी तस्वीरों से बेस की स्थिति और वहां की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाना आसान हो सकता था।

    यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाकर किए गए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी, जबकि चार अन्य सैनिक घायल हुए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैनिकों के रहने वाली जगह पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया गया था। हमले के समय कई अमेरिकी सैनिक सो रहे थे।

    यह हमला 24 घंटे के भीतर सैन्य अड्डे पर हुए तीन मिसाइल हमलों में से एक था। अप्रैल में हुए सीजफायर के बाद यह पहली ऐसी घटना थी, जिसमें अमेरिकी सैनिकों की जान गई। इसी वजह से हमले से जुड़ी जानकारी के स्रोत और उससे संबंधित संभावित सहायता को लेकर अमेरिकी स्तर पर जांच और सवालों का सिलसिला जारी है।

    हालांकि, अमेरिका ने यह दावा नहीं किया है कि चीन की सरकार ने सीधे तौर पर ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने में मदद की थी। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन के सामने सैटेलाइट तस्वीरों से संबंधित सवाल उठाए थे। इसके जवाब में चीन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।

    चीन ने अमेरिका से अपने आरोपों के समर्थन में सबूत भी मांगे हैं। अमेरिका की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चीन की कौन-सी कंपनी या संस्था ने कथित तौर पर ये सैटेलाइट तस्वीरें ईरान को उपलब्ध कराई थीं। इसलिए तस्वीरों की आपूर्ति से जुड़े संस्थानों की पहचान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    अमेरिका इससे पहले भी ईरान को सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराने के आरोप में चीन की तीन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर चुका है। ऐसे में जॉर्डन के सैन्य अड्डे से जुड़ा नया आरोप दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव के बीच सामने आया है।

    पूरे मामले में मुख्य सवाल यह है कि जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें ईरान तक किस माध्यम से पहुंचीं और उनका इस्तेमाल किस तरह किया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने तस्वीरों और हमले के बीच संबंध की संभावना जताई है, जबकि चीन ने सीधे तौर पर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है।

    जॉर्डन में हुए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत और चार सैनिकों के घायल होने के बाद यह मामला अमेरिका के लिए सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है। वहीं, चीन पर लगे आरोपों से अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति भी बनी हुई है।

  • सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    नई दिल्ली । सऊदी अरब पर हूतियों के बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को बड़ी चेतावनी दी है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ने पिछले 24 घंटे के दौरान तेहरान तक यह संदेश पहुंचाया है कि वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए कहे। ईरान को यह मैसेज तब दिया गया है जब हूतियों ने बीते दिनों सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले किए थे।

    पाकिस्तान की इस दखल को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय से सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ अपने रिश्तों को संभालता रहा है। अब इस्लामाबाद को डर है कि हूती हमले अगर और बढ़े तो प्रॉक्सी जंग एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा संकट में बदल सकती है।

    ईरान बोला- हूतियों पर हमारा कंट्रोल नहीं

    एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान ने मंगलवार को तेहरान तक अपना संदेश पहुंचाया था। ईरान की तरफ से जवाब दिया गया कि ईरान हूतियों को कंट्रोल नहीं करता। हालांकि, दो ईरानी सूत्रों ने अलग दावा किया है। उनके मुताबिक, तेहरान ने पिछले हफ्ते हूतियों से सऊदी अरब पर हमले करने को कहा था।

    दावा है कि ईरान ने इसके लिए अतिरिक्त पैसा और हथियार देने का वादा भी किया था। साथ ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के कई कमांडर हमलों के तालमेल में मदद के लिए यमन पहुंचे थे।

    सऊदी की रक्षा में पाकिस्तान-तुर्की की तैयारी

    पाकिस्तान की चेतावनी का एक बड़ा कारण सऊदी अरब के साथ उसका डिफेंस पैक्ट भी है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहले ही कहा है कि अगर हमले सऊदी की जमीन तक फैलते हैं तो रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद के बीच ज्वाइंट सिक्योरिटी अरेंजमेंट सामने आ सकता है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अधिकारियों ने रियाद में पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाकात की है। तीनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी है कि उनकी सेनाएं यमन में दाखिल नहीं होंगी और किसी भी जवाबी कार्रवाई को सऊदी की जमीन से अंजाम दिया जाएगा।

  • 20 साल बाद ईरान पर बड़ा एक्शन, IAEA ने परमाणु मामला UN सुरक्षा परिषद को भेजा

    20 साल बाद ईरान पर बड़ा एक्शन, IAEA ने परमाणु मामला UN सुरक्षा परिषद को भेजा


    नई दिल्ली। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने करीब 20 साल बाद पहली बार ईरान के मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंचाने का फैसला किया है। ईरान पर आरोप है कि उसने उन स्थानों पर मिले यूरेनियम के निशानों की जांच में पर्याप्त सहयोग नहीं किया, जिन्हें उसने परमाणु गतिविधियों के लिए घोषित नहीं किया था।

    पश्चिमी देशों के अधिकारियों को आशंका है कि इन स्थलों से मिले यूरेनियम के निशान इस बात का संकेत दे सकते हैं कि 2003 तक ईरान में एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम चल रहा था। हालांकि, ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है। उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा।

    सुरक्षा परिषद पहुंचने से क्या होगा?
    ईरान का मामला सुरक्षा परिषद में जाने के बाद उस पर नए प्रतिबंध लगाने या उसकी संपत्तियां जब्त करने जैसे कदमों की संभावना बन सकती है। हालांकि, तत्काल कड़े दंडात्मक कदम उठाए जाने की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि ईरान के प्रमुख सहयोगी रूस और चीन सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति रखते हैं।

    प्रस्ताव के पक्ष में 23 देशों ने वोट किया
    वियना स्थित IAEA मुख्यालय में बुधवार को 35 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में प्रस्ताव पर मतदान हुआ। राजनयिकों के मुताबिक 23 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। चीन, रूस और नाइजर ने इसका विरोध किया, जबकि आठ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। एक देश बकाया राशि के कारण वोट नहीं कर सका। यह प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने पेश किया था।

    जून 2025 से चल रही थी तैयारी
    ईरान को लेकर यह कूटनीतिक कदम जून 2025 से ही विचाराधीन था। उस समय IAEA बोर्ड ने पाया था कि जांच में सहयोग नहीं करने के कारण ईरान परमाणु प्रसार रोकने से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहा है।

    अब मामला सुरक्षा परिषद में भेजे जाने का फैसला ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ा हुआ है। कॉपी के मुताबिक, इस सप्ताह अमेरिका ने ईरान के पांच तेल टैंकरों को नष्ट किया और इसके जवाब में तेहरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। इसे छह महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष में तनाव बढ़ने के नए दौर के तौर पर देखा जा रहा है।

    IAEA ने ईरान से फिर सहयोग मांगा
    प्रस्ताव के मसौदे में IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रोसी से कहा गया है कि वे प्रस्ताव और पहले पारित प्रस्तावों की जानकारी IAEA के सभी सदस्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा को दें। प्रस्ताव में ईरान से पिछले समझौतों के अनुपालन में हुई कमियों को जल्द से जल्द दूर करने और IAEA की जरूरी शर्तों को पूरा करने की मांग दोहराई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान की परमाणु सामग्री का गलत इस्तेमाल न हो।

    इजरायल-अमेरिका के हमलों के बाद निरीक्षण रुका
    जून 2025 में 12 दिन तक चले संघर्ष के दौरान इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने हमलों से प्रभावित परमाणु स्थलों तक IAEA निरीक्षकों की पहुंच रोक दी। बमबारी के बाद से IAEA ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम के भंडार की स्थिति की भी पूरी तरह पुष्टि नहीं कर पाया है।

    ईरान के पास 60% तक संवर्धित 440.9 किलो यूरेनियम
    IAEA के अनुसार, ईरान के पास 60% शुद्धता तक संवर्धित 440.9 किलोग्राम (972 पाउंड) यूरेनियम का भंडार है। यह हथियार बनाने के लिए जरूरी करीब 90% शुद्धता के स्तर से तकनीकी रूप से ज्यादा दूर नहीं है।

    IAEA प्रमुख राफेल ग्रोसी ने पिछले साल एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार बनाने की दिशा में ले जाने का फैसला करता है, तो इस मात्रा से 10 परमाणु बम तक बनाए जा सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान के पास फिलहाल कोई परमाणु हथियार मौजूद है।

  • ईरान से युद्ध जीते तो सस्ता होगा तेल-गैस, ट्रंप का दावा; एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयास बिगाड़ने का आरोप

    ईरान से युद्ध जीते तो सस्ता होगा तेल-गैस, ट्रंप का दावा; एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयास बिगाड़ने का आरोप

    वाशिंगट। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि युद्ध में अमेरिका की जीत के बाद तेल और गैस की कीमतों में बड़ी गिरावट आएगी। ट्रंप ने कहा कि गैस की कीमत पहले तीन डॉलर प्रति गैलन तक आ सकती है और बाद में यह दो डॉलर प्रति गैलन से भी नीचे जा सकती है। दूसरी ओर ईरान ने अपनी ऊर्जा सुविधाओं और तेल टैंकरों पर किसी भी हमले की स्थिति में अमेरिका को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है।

    तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने इस्राइल पर अमेरिका और ईरान के बीच शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है। वहीं, इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरानी शासन के अंत को अपना प्रमुख लक्ष्य बताते हुए कहा है कि तेहरान की सरकार कमजोर पड़ चुकी है।

    ट्रंप का दावा- युद्ध के बाद घटेंगी तेल और गैस की कीमतें

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को अपने ट्रुथ सोशल अकाउंट पर कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध में जीत हासिल करने के बाद तेल की कीमतों में तेज गिरावट आएगी। उन्होंने कहा कि गैस की कीमत करीब तीन डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है और अंततः दो डॉलर प्रति गैलन से भी नीचे जाने की संभावना है।

    ट्रंप ने एक बार फिर कहा कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा।

    ईरान ने ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले की दी चेतावनी

    ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने अमेरिका को ईरान की ऊर्जा सुविधाओं पर हमला करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि ईरान का तेल और गैस उत्पादन तंत्र व्यापक क्षेत्र में फैला हुआ है और उसकी सुरक्षा आसान नहीं है।

    गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान की संपत्तियों को निशाना बनाया गया तो ईरान भी जवाबी कार्रवाई करेगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान पहले ही इस तरह के जवाब की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है।

    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिकी अधिकारियों की ओर से ईरान के तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की बात कही जा रही है।

    अमेरिकी अधिकारियों ने तेल टैंकरों को लेकर दी चेतावनी

    अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने कहा है कि यदि ईरान अमेरिकी जहाजों पर हमला करता है तो अमेरिका उसके तेल टैंकरों को निशाना बनाएगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान हो चुका है।

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने तीन ईरानी कच्चे तेल के टैंकरों पर कार्रवाई का वीडियो भी साझा किया है। अमेरिकी कमांड के अनुसार, ये टैंकर ऐसे नेटवर्क का हिस्सा थे, जिसके माध्यम से ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को आर्थिक मदद मिलती थी।

    सेंटकॉम कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने कहा कि अमेरिकी जहाजों पर हमला होने की स्थिति में ईरान की तेल आपूर्ति पर और बड़ी आर्थिक कीमत थोपी जा सकती है।

    एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाने का आरोप

    तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के लिए इस्राइल को जिम्मेदार ठहराते हुए उस पर शांति प्रयासों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस्राइल की कार्रवाई के कारण जून में ईरान और अमेरिका के बीच हुआ 14 सूत्री इस्लामाबाद समझौता प्रभावित हुआ।

    एर्दोगन के अनुसार, युद्ध का असर केवल ईरान और खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जब तक शांति को खतरे के रूप में देखने वाली सोच में बदलाव नहीं आता, तब तक क्षेत्रीय संकट समाप्त करना मुश्किल होगा।

    बताया गया है कि प्रस्तावित समझौते में सैन्य कार्रवाई रोकने, होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, प्रतिबंधों में राहत और ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर के अमेरिकी समर्थित आर्थिक विकास कार्यक्रम जैसे प्रावधान शामिल थे।

    नेतन्याहू बोले- ईरानी शासन का अंत करीब

    इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि ईरान की सरकार कमजोर हो चुकी है और उसके अस्तित्व पर संकट है। उन्होंने कहा कि ईरानी शासन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।

    नेतन्याहू ने कहा कि इस्राइल अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और अपने दुश्मनों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा। उन्होंने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें इस्राइल को आजमाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि ईरानी शासन को समाप्त करना अभी प्रमुख लक्ष्य है और इसके पूरा होने से मध्य पूर्व की स्थिति तथा क्षेत्र के लोगों का इतिहास स्थायी रूप से बदल सकता है।

  • अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत पर बदला ट्रंप प्रशासन का बयान, हॉवर्ड लुटनिक ने स्वीकार की अपनी बड़ी गलती

    अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत पर बदला ट्रंप प्रशासन का बयान, हॉवर्ड लुटनिक ने स्वीकार की अपनी बड़ी गलती

    नई दिल्ली ।ईरान में जारी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बीच अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ मंत्री के बयान में बदलाव ने सैनिकों की मौत के आंकड़ों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने पहले ईरान अभियान के दौरान किसी अमेरिकी सैन्यकर्मी की मौत नहीं होने की बात कही थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपने बयान को गलत बताते हुए 18 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत की पुष्टि की।

    लुटनिक ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए मृत सैनिकों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सैन्यकर्मियों के बलिदान को लेकर गलत जानकारी देना गंभीर चूक थी और इसके लिए वह माफी मांगते हैं। उनका यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान मारे गए और घायल हुए सैनिकों की संख्या को लेकर प्रशासन से लगातार सवाल किए जा रहे हैं।

    लुटनिक के अनुसार, यह गलती उस समय हुई जब वह एक कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी विषयों पर बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उनसे ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियान से जुड़े सवाल पूछे गए। जवाब देते समय उन्होंने गलत जानकारी दे दी और कहा कि किसी अमेरिकी सैन्यकर्मी की जान नहीं गई है।

    उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उस वक्त उनके दिमाग में वेनेजुएला में हुए एक अलग सैन्य अभियान की जानकारी थी। इसी वजह से उन्होंने ईरान से संबंधित सवाल का गलत उत्तर दे दिया। लुटनिक ने कहा कि उनका बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था और वह इसकी जिम्मेदारी लेते हैं।

    अमेरिकी मंत्री ने अपने स्पष्टीकरण में सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश की सेवा करने वाले अमेरिकी पुरुषों और महिलाओं के बलिदान को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से उन परिवारों के प्रति दुख जताया जिन्होंने ईरान में सैन्य कार्रवाई के दौरान अपने प्रियजनों को खोया है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। अमेरिकी अभियान से जुड़े नुकसान और सैन्यकर्मियों की स्थिति पर स्पष्ट जानकारी को लेकर प्रशासन के बयानों पर नजर रखी जा रही है। ऐसे में एक वरिष्ठ मंत्री के बयान में बदलाव ने सरकारी सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं।

    लुटनिक की सार्वजनिक माफी को प्रशासन की ओर से गलत सूचना को स्पष्ट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने अपने पहले बयान को सही ठहराने के बजाय सीधे तौर पर गलती स्वीकार की और मृत सैनिकों की संख्या के संबंध में संशोधित जानकारी सामने रखी।

    ईरान अभियान में अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत का मुद्दा अब केवल सैन्य कार्रवाई से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि अमेरिकी प्रशासन की जवाबदेही और आधिकारिक सूचनाओं की सटीकता से भी जुड़ गया है। 18 सैनिकों की मौत की बात स्वीकार किए जाने के बाद आगे की कार्रवाई और नुकसान से संबंधित आधिकारिक जानकारी पर भी विशेष ध्यान रहेगा।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच लुटनिक ने अमेरिकी सेना में सेवा देने वाले लोगों के योगदान और बलिदान को याद करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा के लिए काम करने वाले सैन्यकर्मियों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके बयान में हुई गलती के बाद दी गई माफी से प्रशासन की ओर से स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को लेकर अमेरिकी रणनीति और चीन की संभावित भूमिका पर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को अधिक जिम्मेदार देश बताते हुए कहा कि बीजिंग ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयास में सहयोग के लिए तैयार है।

    अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य ईरान की आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। ऐसे में चीन का सहयोग अमेरिकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चीन ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध रखने वाले देशों में शामिल है।

    वेंस ने कहा कि चीन सरकार इस मामले में सहयोग करने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका और चीन के बीच कई नीतिगत मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संबंधों को सकारात्मक बताया।

    ईरान और चीन की तुलना करते हुए वेंस ने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय विवादों में अपनी बात मनवाने के लिए वाणिज्यिक जहाजों पर उसी तरह गोलीबारी करने वाला देश नहीं है, जैसा अमेरिका ईरान के मामले में आरोप लगा रहा है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    वेंस के अनुसार तुर्किये, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देश भी अलग-अलग स्तर पर अमेरिका की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ देश सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन निजी तौर पर वे वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को लेकर ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में हैं।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर भी स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास आर्थिक, सैन्य, राजनयिक और गुप्त उपायों सहित कई विकल्प मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने इन विकल्पों की विस्तृत जानकारी देने से इनकार किया।

    वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अपनी योजनाओं को सार्वजनिक नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने से राष्ट्रपति ट्रंप की निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो सकती है। उनका कहना था कि राष्ट्रपति को परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने के लिए रणनीतिक गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है।

    वेंस ने हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान वहां वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने वाली गतिविधियां बंद नहीं करता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी लंबे समय तक व्यवधान से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसका असर एशिया और यूरोप सहित उन अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है जो पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करती हैं।

    अमेरिका की ओर से चीन के सहयोग का दावा इस पूरे घटनाक्रम में विशेष महत्व रखता है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ दबाव अभियान में संभावित सहयोग पश्चिम एशिया की बदलती कूटनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन वास्तव में अमेरिकी आर्थिक दबाव अभियान में किस स्तर तक सहयोग करता है और ईरान की प्रतिक्रिया क्या रहती है।

  • होर्मुज में बारूद, जहाजों पर खतरा, अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर क्यों गिराए बम?

    होर्मुज में बारूद, जहाजों पर खतरा, अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर क्यों गिराए बम?


    नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने ईरान के लारक आईलैंड पर एयर स्ट्राइक की है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान ने भी जवाबी हमला किया और जॉर्डन व कतर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए मिसाइलें दागने का दावा किया। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया के तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

    अमेरिकी सेना ने बताया है कि लारक आईलैंड पर हमला किसी बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक संभावित तत्काल खतरे को खत्म करने के लिए सीमित और सटीक कार्रवाई की गई।

    अमेरिका के मुताबिक क्या था खतरा?

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की माइन बिछाने वाली यूनिट समुद्र में माइंस तैनात करने की तैयारी कर रही थी। इसके लिए दो रॉकेट लॉन्चरों का इस्तेमाल किए जाने की आशंका थी।

    अमेरिका का दावा है कि अगर ये समुद्री माइंस होर्मुज स्ट्रेट के शिपिंग रूट में बिछा दी जातीं तो तेल टैंकरों और दूसरे व्यावसायिक जहाजों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। इसी वजह से अमेरिकी सेना ने इसे ‘इमिनेंट थ्रेट’ यानी तत्काल खतरा माना और दोनों लॉन्चरों को निशाना बनाया।

    लारक आईलैंड ही क्यों बना निशाना?

    लारक आईलैंड ईरान के दक्षिणी तट के पास फारस की खाड़ी में स्थित है और होर्मुज स्ट्रेट के बेहद करीब है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग रूट्स में से एक है। यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या जहाजों की आवाजाही में रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के साथ-साथ कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    इसी रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका का दावा है कि लारक आईलैंड पर मौजूद सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना और किसी संभावित खतरे को रोकना जरूरी था।

    पहले माइंस हटाईं, फिर हमला क्यों किया?

    अमेरिकी सेना के मुताबिक, उसने हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट के अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट से पहले बिछाई गई समुद्री माइंस को हटाने का अभियान पूरा किया था।

    इसके बाद अमेरिकी निगरानी में IRGC की गतिविधियां सामने आईं। अमेरिका का दावा है कि ईरान दो लॉन्चरों के जरिए नई समुद्री माइंस तैनात करने की तैयारी कर रहा था।

    वॉशिंगटन के मुताबिक, माइंस शिपिंग लेन में पहुंच जातीं तो तेल टैंकरों और दूसरे कमर्शियल जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती थी। इसलिए अमेरिका ने संभावित खतरे के बढ़ने का इंतजार करने के बजाय लॉन्चरों को निशाना बनाया।

    ईरान ने कैसे दिया जवाब?

    ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को आक्रामक हमला बताया है। IRGC ने दावा किया कि लारक आईलैंड पर अमेरिकी हमले में उसके कई जवान और अन्य लोग मारे गए या घायल हुए।

    इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों की मेजबानी करने वाले दो ठिकानों की ओर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। जॉर्डन ने अपने एयरस्पेस में आठ मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने का दावा किया है।

    होर्मुज में अब क्या स्थिति?

    अमेरिकी हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने स्ट्रेट में एक शिप-टू-शिप ऑयल ट्रांसफर भी रुकवाया है। वहीं, अमेरिकी एयर स्ट्राइक की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखी गई।

    ईरान और ओमान के बीच होर्मुज को लेकर आपसी सहमति बनी हुई है, लेकिन इसके बावजूद स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पहले ही कम हुई है।

    क्या बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है?

    फिलहाल अमेरिका का कहना है कि लारक आईलैंड पर कार्रवाई का उद्देश्य ईरान के सैन्य ढांचे को बड़े पैमाने पर तबाह करना नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों के लिए पैदा हो रहे तत्काल खतरे को खत्म करना था।

    दूसरी ओर, ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है और जवाबी कार्रवाई भी कर चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लारक आईलैंड पर अमेरिकी हमला और ईरान का पलटवार दोनों देशों को एक बड़े सैन्य टकराव की ओर ले जाएगा?