2017-18 से 2021-22 के बीच किए गए ऑडिट में सामने आया कि कुल 518 झीलों के क्षेत्रफल में 2,851.26 हेक्टेयर की कमी आई है। यह गिरावट पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और जल संसाधनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत देती है। आंकड़ों के मुताबिक 1,537.07 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 315 झीलें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं, जबकि 203 झीलों का क्षेत्रफल 1,314.19 हेक्टेयर घटा है।
हालांकि 150 झीलों के क्षेत्र में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि और 29 झीलों में कोई बदलाव नहीं पाया गया, फिर भी कुल मिलाकर झीलों के घटते दायरे ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। खास बात यह है कि जिन 203 झीलों का जल क्षेत्र कम हुआ है, उनमें से 63 झीलों का क्षेत्रफल 50 प्रतिशत या उससे अधिक घट चुका है, जिससे उनके पूरी तरह खत्म होने का खतरा बढ़ गया है।
हालांकि 150 झीलों के क्षेत्र में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि और 29 झीलों में कोई बदलाव नहीं पाया गया, फिर भी कुल मिलाकर झीलों के घटते दायरे ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। खास बात यह है कि जिन 203 झीलों का जल क्षेत्र कम हुआ है, उनमें से 63 झीलों का क्षेत्रफल 50 प्रतिशत या उससे अधिक घट चुका है, जिससे उनके पूरी तरह खत्म होने का खतरा बढ़ गया है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जम्मू-कश्मीर सरकार का संरक्षण प्रयास सीमित दायरे में ही सिमटा रहा। केवल छह प्रमुख झीलों डल झील, वुलर झील, होकरसर, मानसबाल झील, सुरिनसर झील और मानसर झील के लिए ही संरक्षण और प्रबंधन योजनाएं बनाई गईं। बाकी 691 झीलों के लिए न तो कोई ठोस योजना तैयार की गई और न ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की योजनाओं का लाभ उठाने की पहल की गई।
2017 से 2022 के बीच कुल कैपेक्स बजट का लगभग एक प्रतिशत, यानी 560.65 करोड़ रुपये, केवल इन छह झीलों पर ही खर्च किया गया। रिपोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि व्यापक और समग्र संरक्षण नीति के अभाव में प्रदेश की झीलें तेजी से संकट की ओर बढ़ रही हैं।
