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  • क्यों लीजेंडरी किशोर कुमार ने डैनी डेंजोंगपा से गवाए थे ट्राइबल गीत?

    क्यों लीजेंडरी किशोर कुमार ने डैनी डेंजोंगपा से गवाए थे ट्राइबल गीत?

    नई दिल्ली।भारतीय संगीत जगत के बेताज बादशाह किशोर कुमार अपनी गायकी के साथ-साथ अपने काम के प्रति अनोखे जुनून के लिए भी जाने जाते थे। उनके जीवन का एक बेहद दिलचस्प और प्रेरक किस्सा अभिनेता डैनी डेंजोंगपा से जुड़ा है, जो यह दर्शाता है कि किशोर दा किसी भी अभिनेता के लिए अपनी आवाज को ढालने के लिए किस हद तक मेहनत करते थे। बात साल 1977 की है जब फिल्म ‘अभी तो जी लें’ का निर्माण हो रहा था। इस फिल्म में डैनी डेंजोंगपा एक अहम भूमिका निभा रहे थे और संगीतकार जगमोहन बक्शी व सपन सेनगुप्ता ने किशोर कुमार को डैनी के लिए एक गीत गाने का प्रस्ताव दिया। जैसे ही किशोर कुमार को पता चला कि उन्हें डैनी के लिए अपनी आवाज देनी है, उन्होंने तुरंत अभिनेता को अपने घर आने का न्यौता भेज दिया।

    उस समय डैनी फिल्म जगत में एक उभरते हुए कलाकार थे और किशोर कुमार जैसे महान गायक का बुलावा पाकर वह काफी घबरा गए थे। जब डैनी उनके घर पहुंचे, तो किशोर कुमार ने उनके सामने एक अजीब सी फरमाइश रख दी। उन्होंने डैनी से कहा कि वह उन्हें अपनी आवाज में कुछ नेपाली और असमी लोकगीत सुनाएं। डैनी काफी हैरान थे कि आखिर एक महान गायक उनसे गाने क्यों सुनना चाहता है, लेकिन उन्होंने हिचकते हुए किशोर दा को अपनी मातृभाषा के कुछ पारंपरिक गीत सुनाए। डैनी वहां से यह सोचकर चले गए कि शायद किशोर दा महज मनोरंजन के लिए गाने सुन रहे थे, लेकिन असल में उस महान कलाकार के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।

    दरअसल, किशोर कुमार केवल गाने नहीं सुन रहे थे, बल्कि वह डैनी की आवाज की बनावट, उनके चेहरे के हाव-भाव, गाना गाते समय उनके गले की हरकतों और उनके उच्चारण के लहजे को बहुत गहराई से समझ रहे थे। डैनी के जाने के बाद किशोर कुमार ने कई अन्य नेपाली और ट्राइबल गीतों का अध्ययन किया ताकि वह डैनी की आवाज के करीब पहुंच सकें। इसी कड़ी मेहनत का परिणाम था फिल्म का सुपरहिट गाना ‘तू लाली है सवेरे वाली’। जब यह गाना रिलीज हुआ, तो लोग अपनी कानों पर यकीन नहीं कर पाए। पर्दे पर डैनी को लिप-सिंकिंग करते देख ऐसा लग रहा था मानो वह खुद गा रहे हों। किशोर कुमार ने अपनी मूल आवाज को इस तरह बदला था कि उसमें डैनी का व्यक्तित्व पूरी तरह समा गया था।

    इतिहास गवाह है कि यह गाना न केवल उस समय हिट हुआ बल्कि आज भी किशोर कुमार के सबसे बेहतरीन प्रयोगों में गिना जाता है। डैनी खुद भी बाद में इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि किशोर दा की उस लगन ने उन्हें अचंभित कर दिया था। इसके बाद किशोर कुमार ने डैनी के लिए एक बंगाली गाना भी गाया, जिसमें फिर से वही जादू देखने को मिला। किशोर कुमार का यह अंदाज साबित करता है कि वह महज एक गायक नहीं बल्कि एक बेहतरीन अभिनेता भी थे, जो माइक के पीछे रहकर पर्दे पर दिखने वाले कलाकार की आत्मा को अपनी आवाज में उतार लेते थे। भले ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही, लेकिन डैनी और किशोर कुमार का यह अनूठा संगम संगीत प्रेमियों के लिए हमेशा एक अनमोल धरोहर बना रहेगा।

  • जब दिग्गज गायक ने एक नए अभिनेता के लिए अपनी फीस से किया था बड़ा समझौता..

    जब दिग्गज गायक ने एक नए अभिनेता के लिए अपनी फीस से किया था बड़ा समझौता..

    नई दिल्ली। अस्सी के दशक में जब बॉलीवुड की गलियों में एक नया लड़का अपनी थिरकन और मासूमियत से पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा सितारा उसके लिए अपनी शर्तें बदल देगा। यह कहानी है ‘चीची’ यानी गोविंदा और किशोर कुमार के उस अनकहे रिश्ते की, जिसने फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के नए मायने लिखे। साल 1986 में जब गोविंदा ने फिल्म ‘लव 86’ और ‘इल्जाम’ के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, तब वह महज एक उभरते हुए कलाकार थे। उनके पास टैलेंट तो था, लेकिन उस समय के सबसे महंगे और दिग्गज गायक किशोर कुमार की आवाज पाना उनके लिए एक सुनहरे सपने जैसा था।

    फिल्म ‘ड्यूटी’ गोविंदा के शुरुआती करियर की एक ऐसी फिल्म थी, जिसका बजट बेहद सीमित था। फिल्म के निर्देशक रविकांत नगैच और संगीतकार बाबला शाह इस बात को लेकर बेहद चिंतित थे कि इतने कम बजट में फिल्म को बड़े स्तर पर कैसे प्रमोट किया जाए। इसी बीच गोविंदा ने एक ऐसी मांग रख दी जिसने मेकर्स के पसीने छुड़ा दिए। गोविंदा चाहते थे कि फिल्म के दो महत्वपूर्ण गानों को केवल किशोर कुमार ही अपनी आवाज दें। गोविंदा का मानना था कि यदि किशोर दा जैसा बड़ा नाम उनके साथ जुड़ जाएगा, तो न केवल फिल्म की वैल्यू बढ़ जाएगी, बल्कि एक नए अभिनेता के तौर पर उन्हें इंडस्ट्री में वह गंभीरता मिलेगी जिसकी उन्हें तलाश थी।

    चुनौती यह थी कि किशोर कुमार उस दौर के सबसे व्यस्त और महंगे गायक थे। फिल्म का बजट इतना कम था कि निर्माता एक बड़े विलेन तक को कास्ट नहीं कर पा रहे थे, ऐसे में किशोर कुमार की भारी-भरकम फीस चुकाना नामुमकिन लग रहा था। जब संगीत निर्देशक बाबला शाह ने यह बात कल्याणजी-आनंदजी को बताई, तो कहानी में एक नया मोड़ आया। दरअसल, बाबला शाह दिग्गज संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के छोटे भाई थे। अपने भाई के भविष्य और गोविंदा के जुनून को देखते हुए कल्याणजी-आनंदजी ने किशोर कुमार से खास सिफारिश की। किशोर दा के संबंध इस जोड़ी से बेहद मधुर थे, इसलिए उन्होंने मित्रता और सम्मान के खातिर अपनी फीस काफी कम कर दी और गानों के लिए हामी भर दी।

    किशोर कुमार ने इस फिल्म के लिए ‘जिस महफिल में आता हूं’ और ‘तुम जिसे चाहो’ जैसे दो शानदार गाने गाए। इन गानों के रिलीज होते ही संगीत प्रेमियों के बीच तहलका मच गया। किशोर दा की जादुई आवाज और पर्दे पर गोविंदा के बेहतरीन डांस मूव्स ने वह जादू पैदा किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। इन गानों की सफलता ने गोविंदा को रातों-रात सुपरस्टार्स की कतार में खड़ा कर दिया। इसके बाद गोविंदा और किशोर कुमार की जोड़ी ने कई यादगार नगमे दिए, लेकिन फिल्म ‘ड्यूटी’ के वे दो गाने हमेशा इस बात के गवाह रहेंगे कि कैसे एक दिग्गज कलाकार ने अपनी दरियादिली से एक उभरते हुए सितारे की तकदीर बदल दी थी।

  • पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट

    पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट


    नई दिल्ली।भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा प्रयोगधर्मी और क्रिएटिव कहा जाता है तो वह हैं Rahul Dev Burman जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है। आरडी बर्मन को लोग यूं ही मैड जीनियस नहीं कहते थे। उनके संगीत में ऐसी अनोखी कल्पनाशीलता थी जिसे आज भी दोहराना आसान नहीं है। पंचम दा जब भी किसी गाने की रिकॉर्डिंग करते थे तो सिर्फ पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर निर्भर नहीं रहते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों से भी ऐसी आवाजें निकाल लेते थे जो गाने में नई जान भर देती थीं।

    उनकी इसी क्रिएटिव सोच का एक दिलचस्प उदाहरण 1968 में आई फिल्म Padosan के सुपरहिट गाने Mere Samne Wali Khidki Mein में देखने को मिलता है। यह गाना उस दौर में जितना लोकप्रिय था उतना ही आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। अक्सर लोग इस गाने को गुनगुनाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने में एक खास साउंड किसी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट से नहीं बल्कि एक साधारण कंघी से निकाला गया था।

    दरअसल फिल्म में Sunil Dutt एक शरारती पड़ोसी की भूमिका निभाते हैं जो सामने वाली खिड़की में रहने वाली लड़की को अपने अंदाज में रिझाने की कोशिश करता है। गाने का माहौल भी हल्का फुल्का और शरारत से भरा हुआ है। जब इस गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी चल रही थी तब पंचम दा को लग रहा था कि गाने में कुछ ऐसा होना चाहिए जो उसकी मस्ती और शरारत को और ज्यादा उभार सके। स्टूडियो में उस समय बड़े बड़े संगीतकार मौजूद थे। वायलिन, गिटार और कई अन्य वाद्ययंत्र तैयार थे लेकिन पंचम दा को कुछ अलग चाहिए था।

    बताया जाता है कि काफी देर सोचने के बाद अचानक पंचम दा ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक साधारण प्लास्टिक की कंघी निकाल ली। इसके बाद उन्होंने उस कंघी को एक खुरदुरी सतह पर रगड़ना शुरू किया। जैसे ही उससे कर्र कर्र जैसी आवाज निकली पंचम दा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि यही वह साउंड है जो गाने के शरारती मूड को और दिलचस्प बना सकता है।

    स्टूडियो में मौजूद लोग पहले तो यह देखकर हैरान रह गए कि एक मशहूर संगीतकार रिकॉर्डिंग के दौरान कंघी से आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है। खासतौर पर गायक Kishore Kumar को यह दृश्य काफी मजेदार लगा। उन्होंने पंचम दा को देखकर मजाक किया और सिर पकड़ लिया। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना तैयार हुआ तो हर कोई उनकी प्रतिभा का कायल हो गया।

    गाने की शुरुआत और बैकग्राउंड में जो हल्की क्रिक क्रिक जैसी आवाज सुनाई देती है वह असल में उसी कंघी से पैदा की गई थी। यह छोटी सी ध्वनि गाने में एक अलग तरह की मस्ती और चुलबुलापन जोड़ देती है। यही वजह है कि आज भी यह गाना सुनते समय श्रोताओं को अलग आनंद मिलता है भले ही वे उस साउंड के पीछे की कहानी से अनजान हों।

    आरडी बर्मन की खासियत यही थी कि वे संगीत को सिर्फ सुर और ताल तक सीमित नहीं रखते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों को भी संगीत का हिस्सा बना देते थे। कभी पानी की छपाक, कभी कांच की बोतल की टनकार और कभी चम्मच और ग्लास की आवाजें उनके गानों में सुनाई देती थीं। उनकी यही प्रयोगधर्मिता उन्हें बाकी संगीतकारों से अलग बनाती है।

    आज जब लोग इस गाने को ध्यान से सुनते हैं और कंघी से निकली उस आवाज़ को पहचानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि पंचम दा की क्रिएटिविटी कितनी अनोखी थी। यही कारण है कि दशकों बाद भी आरडी बर्मन का संगीत उतना ही ताजा और दिलचस्प लगता है जितना अपने दौर में था।