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  • विष्णु पूजा में फूलों का विशेष महत्व, सही अर्पण से मिलती है लक्ष्मी कृपा और जीवन में सुख-शांति

    विष्णु पूजा में फूलों का विशेष महत्व, सही अर्पण से मिलती है लक्ष्मी कृपा और जीवन में सुख-शांति

    नई दिल्ली। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु की पूजा में फूलों का विशेष महत्व बताया गया है और बिना फूल अर्पण के पूजा अधूरी मानी जाती है।

    मान्यता है कि कुछ विशेष फूल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होते हैं। इन फूलों को गुरुवार के दिन अर्पित करने से न केवल भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, बल्कि मां लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है। इससे आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

    1. कदम का फूल: मोक्ष और पुण्य का प्रतीक
    गुरुवार के दिन भगवान विष्णु को कदम का फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह फूल अर्पित करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिलता है और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है। इसे लगातार कुछ गुरुवार तक अर्पित करने की परंपरा विशेष फलदायी मानी गई है।

    2. गुलाब का फूल: आर्थिक समृद्धि का संकेत
    लाल गुलाब का फूल भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों को प्रिय माना गया है। गुरुवार के दिन गुलाब अर्पित करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और नौकरी-व्यवसाय में आने वाली बाधाएं कम होती हैं। इसे नियमित गुरुवार को अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    3. कनेर और गेंदा: सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत
    पीले रंग के कनेर और गेंदे के फूल भगवान विष्णु की पूजा में विशेष स्थान रखते हैं। पीला रंग बृहस्पति ग्रह का प्रतीक माना जाता है। इन फूलों को अर्पित करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।

    4. चंपा और कमल: लक्ष्मी कृपा की प्राप्ति
    चंपा और कमल का फूल भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी दोनों को अत्यंत प्रिय है। विशेष रूप से कमल का फूल धन, समृद्धि और वैभव का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार को इन फूलों का अर्पण करने से घर में स्थायी सुख-समृद्धि आती है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

    5. पारिजात (हरसिंगार): इच्छापूर्ति का फूल
    पारिजात का फूल भगवान विष्णु को अति प्रिय माना जाता है। इसे अर्पित करने से धन-धान्य की कमी नहीं रहती और जीवन में सुख-संपन्नता बनी रहती है। मान्यता है कि लगातार कुछ गुरुवार तक इस फूल को अर्पित करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    धार्मिक मान्यता और महत्व
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा में सही फूलों का चयन जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोलता है, बल्कि आर्थिक और पारिवारिक जीवन में भी स्थिरता लाता है।

    गुरुवार को भगवान विष्णु को उनके प्रिय फूल अर्पित करना एक सरल लेकिन प्रभावशाली उपाय माना जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से जीवन में सकारात्मक बदलाव, धन-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त की जा सकती है।

  • पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर

    पुरुषोत्तम मास में सावधानी: घर में न रखें ये वस्तुएं, सुख-शांति पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग में Purushottam Maas को अत्यंत पवित्र और विशेष महीना माना जाता है। यह अवधि भगवान विष्णु को समर्पित होती है, जिसमें श्रद्धालु पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस महीने किए गए शुभ कार्य कई गुना फल देते हैं, लेकिन इसी के साथ वास्तु शास्त्र में कुछ विशेष सावधानियां भी बताई गई हैं।

    वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास के दौरान घर में रखी कुछ वस्तुएं नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकती हैं और परिवार की सुख-शांति पर असर डाल सकती हैं। इसलिए इस अवधि में विशेष रूप से घर की सफाई और अनावश्यक वस्तुओं को हटाने पर जोर दिया जाता है।

    सबसे पहले जिन चीजों से बचने की सलाह दी गई है, वे हैं टूटी हुई देवी-देवताओं की मूर्तियां। घर में किसी भी प्रकार की खंडित मूर्ति रखना वास्तु दोष का कारण माना जाता है। ऐसी मूर्तियां नकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं और पारिवारिक शांति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए इन्हें नदी या पवित्र जल में विसर्जित करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा सूखे या मुरझाए हुए पौधे भी इस पवित्र माह में अशुभ माने गए हैं। घर में रखे सूखे पौधे न केवल वातावरण की ताजगी को कम करते हैं, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाते हैं। इसके स्थान पर हरे-भरे पौधे, विशेषकर तुलसी का पौधा, अत्यंत शुभ माना गया है क्योंकि यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि लाता है।

    वास्तु शास्त्र में टूटे-फूटे कांच के बर्तनों को भी अशुभ बताया गया है। ऐसे बर्तन घर में रखने से आर्थिक परेशानियों और बाधाओं का संकेत मिलता है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में इन्हें तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए ताकि घर में समृद्धि और स्थिरता बनी रहे।

    इसी तरह बंद पड़ी या खराब घड़ियां भी नकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती हैं। समय रुकना प्रगति में बाधा का संकेत माना जाता है, और वास्तु के अनुसार यह परिवार के विकास और तरक्की को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी घड़ियों को या तो ठीक करवा लेना चाहिए या फिर घर से हटा देना चाहिए।

    पुरुषोत्तम मास में धार्मिक आस्था के साथ-साथ घर के वातावरण को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि इस अवधि में किया गया हर छोटा सुधार भी जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है।

    कुल मिलाकर यह पवित्र महीना भक्तों के लिए भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का अवसर है, और साथ ही यह समय घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करने और सकारात्मकता बढ़ाने का भी संदेश देता है।

  • अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’

    अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’



    नई दिल्ली(New Delhi)। सनातन परंपरा में समय को केवल तारीखों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी परंपरा में एक विशेष अवधि होती है जिसे अधिक मास कहा जाता है, जो इस वर्ष 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इसे अधिक ज्येष्ठ मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 30 दिनों तक चलने वाले इस अतिरिक्त महीने में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते। माना जाता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते।

    अधिक मास का आधार हिंदू पंचांग की खगोल गणना में छिपा है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है, जो तीन वर्षों में लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। सभी महीनों के अपने-अपने अधिपति थे, लेकिन इस अतिरिक्त मास का कोई स्वामी नहीं था। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा, जहां उन्होंने इसे “पुरुषोत्तम मास” का नाम दिया और इसे अपना संरक्षण प्रदान किया। तभी से यह महीना विशेष और अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यह समय सांसारिक कार्यों की बजाय आत्मिक उन्नति और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत को अत्यधिक फलदायी बताया गया है। वहीं व्यापार, निवेश या नए कार्यों की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है।

    शास्त्रों में वर्णन है कि इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। इसलिए इसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है, जहां भक्ति और आत्मचिंतन को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।

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  • बृहस्पतिवार पर पीला रंग पहनने का महत्व, जानें कैसे बढ़ती है खुशहाली और सकारात्मकता

    बृहस्पतिवार पर पीला रंग पहनने का महत्व, जानें कैसे बढ़ती है खुशहाली और सकारात्मकता


    नई दिल्ली। हिंदू मान्यताओं में गुरुवार को पीले वस्त्र पहनना बेहद शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की कृपा मिलती है, जिससे जीवन में तरक्की, धन और मानसिक शांति आती है। सनातन परंपरा में सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित माना गया है। गुरुवार यानी बृहस्पतिवार का संबंध भगवान विष्णु और देवताओं के गुरु बृहस्पति से माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन पूजा-पाठ, व्रत और पीले रंग के विशेष महत्व का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरुवार को पीले वस्त्र धारण करना शुभ फलदायी माना जाता है और इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
    ज्योतिष शास्त्र में पीले रंग को ज्ञान, समृद्धि, सुख और सौभाग्य का प्रतीक बताया गया है। यह रंग मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है। भोपाल के ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार को पीले कपड़े पहनने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच विकसित होती है और नकारात्मकता दूर होती है। यही वजह है कि धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह और शुभ कार्यों में पीले रंग का विशेष उपयोग किया जाता है।
    मान्यता है कि गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक परेशानियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। जिन लोगों के जीवन में बार-बार बाधाएं आती हैं या काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, उनके लिए भी यह उपाय लाभकारी माना गया है।
    धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का इंटरव्यू, परीक्षा, व्यापारिक सौदा या कोई महत्वपूर्ण काम गुरुवार को हो, तो पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। इससे मन शांत रहता है और सफलता की संभावना बढ़ती है। वहीं मानसिक तनाव, डर और चिंता से परेशान लोगों के लिए भी पीला रंग सकारात्मक प्रभाव डालने वाला माना गया है।
    ज्योतिष शास्त्र में विवाह में देरी या रिश्तों में बाधा आने पर भी गुरुवार के उपाय करने की सलाह दी जाती है। खासतौर पर अविवाहित लड़कियों को हर गुरुवार पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इससे विवाह के योग मजबूत होते हैं और योग्य जीवनसाथी मिलने की संभावना बढ़ती है।
    अगर किसी कारणवश पीले कपड़े पहनना संभव न हो, तो हल्दी का तिलक लगाना या कपड़ों पर हल्दी का स्पर्श करना भी शुभ माना जाता है। हल्दी को स्वयं शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
    धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार गुरुवार के दिन पीले रंग के साथ चने की दाल, हल्दी, केला और पीले फूलों का दान करना भी बेहद पुण्यकारी माना जाता है। इससे गुरु ग्रह मजबूत होता है और व्यक्ति को करियर, शिक्षा, विवाह और धन से जुड़े मामलों में लाभ मिलने लगता है।

  • आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि

    आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली। आज नृसिंह जयंती पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र अवतार भगवान नृसिंह को समर्पित है, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था। आधा मनुष्य और आधा सिंह के रूप में प्रकट होकर उन्होंने अधर्म का अंत किया और धर्म की स्थापना की।

    शुभ मुहूर्त और तिथि
    नृसिंह चतुर्दशी की तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे तक रहेगी। मध्याह्न संकल्प का समय सुबह 10:59 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा।
    वहीं, सायंकाल पूजा का शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक निर्धारित किया गया है।
    व्रत का पारण 1 मई को सुबह 5:41 बजे किया जाएगा।

    नृसिंह जयंती का महत्व
    वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह जयंती विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन संध्या समय खंभे से प्रकट होकर भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया था। यह पर्व भक्तों की रक्षा, शत्रुओं के नाश और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    भगवान नृसिंह की महिमा
    भगवान नृसिंह को शक्ति और संरक्षण के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, विरोधियों से राहत मिलती है और भय व संकटों से सुरक्षा प्राप्त होती है। साथ ही मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    पूजा विधि
    इस दिन सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई कर स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करें। चूंकि भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूली बेला में हुआ था, इसलिए सूर्यास्त के समय पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। पूजा के दौरान भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं, लाल फूल अर्पित करें और श्रद्धा से मंत्र जाप करते हुए अपनी मनोकामना व्यक्त करें।

    व्रत नियम
    व्रत रखने वाले भक्त इस दिन फलाहार या जलाहार ग्रहण करते हैं और संयम का पालन करते हैं। अगले दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है। जो व्रत नहीं रखते, वे भी भक्ति भाव से पूजा कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    यदि कोई व्यक्ति शत्रु या मुकदमे से परेशान है, तो भगवान नृसिंह को लाल फूल अर्पित कर लाल रेशमी धागा चढ़ाएं। इसके बाद घी का चौमुखी दीपक जलाकर “ऊं नृसिंहाय शत्रु भुजबल विधराय स्वाहा” मंत्र का 3, 5 या 11 माला जाप करें। पूजा के बाद उस धागे को दाहिने हाथ में बांधने से बाधाएं शांत होने की मान्यता है।

  • श्रीकृष्ण जन्मभूमि केसः अदालत में पेश होंगी भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की मूर्तियां

    श्रीकृष्ण जन्मभूमि केसः अदालत में पेश होंगी भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की मूर्तियां


    मथुरा ।
    श्रीकृष्ण जन्मभूमि (Shri Krishna Janmabhoomi) बनाम शाही ईदगाह मस्जिद (Shahi Eidgah Mosque) मामले में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के विश्वरूप एवं अन्य देवों की मूर्तियों के तथ्य अदालत में पेश किए जाएंगे। ये मूर्तियां समय समय पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि क्षेत्र में कराई गई खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थीं जो इस समय मथुरा के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। जन्मभूमि पक्ष ने पत्र के माध्यम से इन सभी के बारे में पूरी जानकारी संग्रहालय से प्राप्त कर ली है। जन्मभूमि पक्ष इसे अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण मानकर चल रहा है।

    मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद का मामला हाईकोर्ट में चल रहा है। जन्मभूमि पक्ष यह बात रख रहा है कि जहां वर्तमान में शाही ईदगाह मस्जिद बनी है वही क्षेत्र भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मस्थान है जबकि मस्जिद पक्ष इसका विरोध कर रहा है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट में जन्मभूमि पक्ष वाद बिंदू तय कराने के लिए अपनी दलील पेश कर रहा है जबकि मस्जिद पक्ष ने दलील दी है कि दूसरा पक्ष पहले यह तो साबित करे कि यह आस्था का विषय है। दोनों पक्ष अपनी अपनी बात के लिए तमाम साक्ष्य जुटा रहे हैं।

    इस मामले के वादी श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने आरटीआई के माध्यम से राजकीय संग्रहालय से उन मूर्तियों की जानकारी जुटाई है जो विभिन्न समय पर इस क्षेत्र में हुई खुदाई में प्राप्त हुई हैं। वहां से विधिवत सूचना प्रेषित कर दी गई है। ऐसी सात मूर्तियां एवं स्तंभ की जानकारी दी गई जो यहां से प्राप्त हुए हैं। इनमें से तीन मूर्ति व एक स्तंभ ऐसा है जिसे हिंदू पक्ष अपने लिए बेहद महत्वपूर्ण मानकर चल रहा है।

    ये भगवान कार्तिकेय एवं अग्निदेव की, देवी गंगा एवं विश्वरूप विष्णु भगवान की हैं। अन्य भगवान बुद्ध एवं जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ से जुड़े हैं। ये सभी कटरा केशवदेव, श्रीकृष्ण जन्मस्थान से प्राप्त हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र कटरा केशवदेव के ही नाम से जाना जाता है व अभिलेखों में भी दर्ज है।

    हमनें संग्रहालय से रखी इन मूर्तियों के बारे में जानकारी ली है। चाहे भगवान विष्णु का विश्वरूप हो या भगवान कार्तिकेय या नदी देवी की मूर्ति, सभी यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र हिंदू आस्था का केंद्र रहा है। खास तौर से भगवान कृष्ण से जुड़ा रहा है। हम ये सारे तथ्य अदालत में पेश कर रहे हैं।
    -एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह, अध्यक्ष श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास

    मामला अदालत में विचाराधीन है। इस दौरान विभिन्न साक्ष्य कोर्ट में पेश किए जाते हैं। जो भी सबूत वो कोर्ट में पेश करेंगे उसका अध्ययन कर हम अपनी दलील पेश करेंगे। पहले भी इस तरह के तथ्य पेश किए गए हैं।
    -एडवोकेट तनवीर अहमद, शाही ईदगाह मस्जिद सचिव एवं पैरोकार

  • वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..

    वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..


    नई दिल्ली:
    तमिलनाडु का प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर कांचीपुरम सदियों से धार्मिक आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी पवित्र नगर में स्थित वरदराज पेरुमल मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर माना जाता है। द्रविड़ शैली की भव्य वास्तुकला से सुसज्जित यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है।

    स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह मंदिर भगवान विष्णु के वरदराज पेरुमल स्वरूप की आराधना का केंद्र है, जहां वे अपनी दिव्य शक्ति और कृपा के प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर परिसर में विशाल गोपुरम, विस्तृत प्रांगण और बारीक नक्काशी इसकी प्राचीन कला और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। माना जाता है कि यह स्थान सदियों से भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र रहा है और यहां आने वाले श्रद्धालु इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।

    इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक भगवान विष्णु की प्रतिमा से जुड़ी जलवास की प्रथा है। मान्यता के अनुसार प्रतिमा को एक पवित्र जल कुंड में लंबे समय तक रखा जाता है और विशेष अवसरों पर ही भक्तों को इसके दर्शन प्राप्त होते हैं। इस परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है और इसे दिव्य संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि प्रतिमा वर्षों तक जल में रहने के बावजूद अपनी संरचना में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं दिखाती, जिससे इसकी पवित्रता और भी विशेष मानी जाती है।

    मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता गर्भगृह में स्थित दो छिपकलियों से संबंधित है, जिन्हें लेकर श्रद्धालुओं में विशेष विश्वास देखा जाता है। परंपरा के अनुसार इन छिपकलियों के दर्शन को शुभ माना जाता है और इसे जीवन में समृद्धि और बाधाओं के निवारण से जोड़कर देखा जाता है। यह मान्यता मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

    जलवास परंपरा के कारण भगवान विष्णु की प्रतिमा को लंबे अंतराल के बाद ही बाहर निकाला जाता है और इसी कारण भक्तों को इसके दर्शन का अवसर भी विशेष समय पर ही प्राप्त होता है। वर्तमान परंपरा के अनुसार अगली बार प्रतिमा के दर्शन कई वर्षों बाद होने की संभावना बताई जाती है, जिससे यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत प्रतीक्षित और दुर्लभ माना जाता है।

    वरदराज पेरुमल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है, जहां हर परंपरा और विश्वास गहरी आध्यात्मिक भावना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

  • कामदा एकादशी व्रत कथा: पति-पत्नी की खुशहाली और पापों का नाश केवल आज

    कामदा एकादशी व्रत कथा: पति-पत्नी की खुशहाली और पापों का नाश केवल आज


    नई दिल्ली । आज 29 मार्च 2026 को कामदा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर पड़ता है और हिन्दू नववर्ष का पहला एकादशी माना जाता है इसे हिन्दू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना जाता है और इस दिन व्रत रखने वालों के लिए कथा का पाठ करना बेहद शुभ होता है क्योंकि बिना कथा का पाठ किए पूजा अधूरी रह सकती है

    कथा के अनुसार प्राचीन काल में भोगीपुर नामक नगर में पुण्डरीक नामक राजा राज्य करता था वहां ललित और ललिता नामक पति-पत्न रहते थे जिनके बीच गहरा प्रेम था ललित राजा पुण्डरीक के दरबार में संगीत सुनाता था और एक बार गंधर्वों के साथ संगीत प्रस्तुत करते समय उसका ध्यान अपनी पत्नी पर गया और उसका सुर बिगड़ गया राजा ने इसे अपमान माना और क्रोध में आकर ललित को राक्षस बनने का श्राप दे दिया श्राप के प्रभाव से ललित मांस खाने लगा और उसका चेहरा भी भयानक हो गया लेकिन ललिता ने पति का साथ निभाना जारी रखा और लोगों से उपाय पूछने लगी

    दिन-ब-दिन ललित का स्वरूप और विकराल होता गया एक दिन वह जंगल की ओर गया और उसकी पत्नी भी पीछे-पीछे चली जंगल में ललिता को एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया वहां उसने ऋषियों का प्रणाम किया ऋषि ने पूछा कि तुम कौन हो और ललिता ने अपना नाम बताया और अपने पति को मिले श्राप के बारे में बताया ऋषि ने ललिता को बताया कि इस समय चैत्र माह की एकादशी का व्रत रखने और इसका पुण्य अपने पति को देने से ललित ठीक हो सकता है

    विधि-विधान से ललिता ने कामदा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी तिथि को व्रत का पारण ऋषि के सामने किया और पुण्यफल अपने पति को दिया इसके परिणामस्वरूप ललित धीरे-धीरे ठीक होने लगा इसके बाद पति-पत्नी ने निरंतर एकादशी व्रत का पालन करना शुरू किया और उनके जीवन में खुशहाली लौट आई कामदा एकादशी का व्रत रखने वालों के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है

    आज के दिन व्रत का पालन करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं यह व्रत माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु को समर्पित है व्रत रखने वाले को शारीरिक और मानसिक सुख की प्राप्ति होती है पितरों और पूर्वजों की कृपा मिलती है और परिवार में खुशहाली कायम होती है इस दिन कथा का पाठ करने से व्रत पूर्ण फल देता है और जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं

    इस अवसर पर भक्तों को चाहिए कि वे व्रत के दिन विधि-विधान से निर्जला या अन्न जल का व्रत करें और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के साथ कथा का पाठ अवश्य करें ताकि उनके जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली आए व्रत का पालन केवल आध्यात्मिक लाभ ही नहीं बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी शांति और सौभाग्य लेकर आता है

    कामदा एकादशी का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि जीवन में नैतिक और आध्यात्मिक दिशा देने वाला है व्रत और कथा का पालन करने से व्यक्ति का मन शुद्ध होता है उसका जीवन धर्म और भक्ति में समर्पित होता है और सभी पापों से मुक्ति मिलती है इस प्रकार आज कामदा एकादशी का व्रत रखने से जीवन में खुशहाली, स्वास्थ्य और समृद्धि सुनिश्चित होती है और पूजा अधूरी नहीं रहती

  • Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति

    Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति


    नई दिल्ली। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि पापमोचनी एकादशी इस वर्ष 16 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु और महादेव की शक्ति के संगम का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विशेष साधना और शिवलिंग पर कुछ सामग्रियों का अर्पण जीवन के जटिल कष्टों, शनि दोष और पुराने पापों से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावशाली है।

    पापमोचनी एकादशी पर शिवलिंग साधना का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर पांच महत्वपूर्ण चीजें अर्पित करके महादेव को प्रसन्न कर सकते हैं।

    1. शमी के पुष्प – रोग और दोषों से मुक्ति:
    नीलकंठेश्वर महादेव का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर शमी के फूल चढ़ाएं। यह उपाय शरीर के रोगों और कुंडली में उपस्थित दोषों को दूर करने में मदद करता है।

    2. बिल्वपत्र और शहद – उत्तम स्वास्थ्य का वरदान:
    शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय बिल्वपत्र पर थोड़ा शहद लगाकर अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार इससे समस्त पाप नष्ट होते हैं और भक्त को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    3. चावल और काले तिल – शनि दोष से राहत:
    शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान लोग इस दिन कच्चे चावल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। पूजन के बाद इसे जरूरतमंद को दान करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है।

    4. गाय का शुद्ध घी – संकटों का नाश:
    शुद्ध गाय के घी से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। यह उपाय घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है और जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों से सुरक्षा देता है।

    5. महामृत्युंजय मंत्र – संकट टालने की शक्ति:
    पूजा के अंत में महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें। एकादशी की पवित्र ऊर्जा और मंत्र का प्रभाव मिलकर जीवन के बड़े संकटों और कष्टों को टालने की क्षमता रखता है।

    पापमोचनी एकादशी का व्रत 16 मार्च 2026 को रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन की साधना से न केवल जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बल्कि जन्मों के पापों से भी मुक्ति पाने का अद्वितीय अवसर मिलता है।

  • Aamlaki Ekadashi 2026 : फरवरी में आमलकी एकादशी कब? ये हर पाप से मुक्ति का दिन, काशी के पंडित से जानें तरीका

    Aamlaki Ekadashi 2026 : फरवरी में आमलकी एकादशी कब? ये हर पाप से मुक्ति का दिन, काशी के पंडित से जानें तरीका


    नई दिल्ली । इस एकादशी पर व्रत से सभी पापों का नाश होता है. आंवले के पेड़ की पूजा का विधान है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. लोकल 18 ने इस बारे में काशी के पंडित संजय उपाध्याय से बात की. वे बताते हैं कि भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित मुराद पूरी होती है. आमलकी एकादशी व्रत विधि वाराणसी. सनातन धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्त्व है. हर महीने में दो एकादशी का व्रत होता है पहला कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. फरवरी महीने में भी दो एकादशी के व्रत हैं

    . इसी महीने में आमलकी एकादशी भी पड़ रही है. इस एकादशी के व्रत से सभी पापों का नाश होता है. फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जानते हैं. आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है. इसलिए इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा से भगवान विष्णु के पूजन का फल मिलता है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. लोकल 18 से बात करते हुए काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि 26 फरवरी को आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाएगा.


    क्या है पूजा का शुभ समय
    आमलकी एकादशी पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 9 बजकर 40 मिनट तक का समय बेहद शुभ है. इस समय में भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
    बाघ को मनुष्य योनी
    पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से दैवत्य की प्राप्ति होती है. कथाओं के मुताबिक, इस व्रत के प्रभाव से ही व्याघ्र (बाघ) को मनुष्य की योनि प्राप्त हुई थी. इस व्रत से मनुष्य की आर्थिक समस्याएं भी दूर होती हैं और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद उन्हें मिलता है. रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गवना कराते हैं. इस दौरान बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ जमकर होली खेलते हैं. काशी में इस दिन से शुरू हुआ रंगोत्सव होली तक चलता है. सदियों से यह परम्परा चली आ रही है.