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  • 2021 नंदीग्राम चुनाव में ममता बनर्जी की पैर की चोट पर फिर विवाद, सुवेंदु अधिकारी ने जांच कराने की बात कही

    2021 नंदीग्राम चुनाव में ममता बनर्जी की पैर की चोट पर फिर विवाद, सुवेंदु अधिकारी ने जांच कराने की बात कही

    नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान नंदीग्राम में ममता बनर्जी ने पैर की चोट को लेकर गलत दावा किया था। अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले की जांच शुरू करेगी। उन्होंने एक मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि उसमें पैर में फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का कोई सबूत नहीं मिला था। अधिकारी ने कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण वह फिलहाल मामले से जुड़ी पूरी जानकारी साझा नहीं करेंगे और 9 अक्टूबर के बाद अपने आरोपों के बारे में विस्तार से बताएंगे। नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनावों के चलते फिलहाल आदर्श आचार संहिता लागू है।

    अधिकारी के अनुसार, नंदीग्राम में 2021 के चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के पैर में चोट लगी थी और बाद में उन्हें व्हीलचेयर पर प्रचार करते हुए देखा गया था। उन्होंने कहा कि उनके पास उस समय की मेडिकल रिपोर्ट है, जिसमें फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का प्रमाण नहीं होने की बात दर्ज है। अधिकारी ने इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर मामले की जांच कराने की बात कही है। उन्होंने कहा कि 9 अक्टूबर के बाद वह अपने आरोपों और मामले से जुड़ी अन्य जानकारी सामने रखेंगे।

    वहीं, तृणमूल कांग्रेस विधायक कुणाल घोष ने सुवेंदु अधिकारी के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि चोट लगने की स्थिति में पट्टी या अन्य उपचार की जरूरत केवल फ्रैक्चर होने पर ही नहीं होती। उनके अनुसार, किसी गंभीर चोट या फ्रैक्चर जैसी चोट में भी पट्टी की जरूरत हो सकती है। उन्होंने अधिकारी के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि उन्हें कैसे पता है कि उस समय फ्रैक्चर नहीं हुआ था। इस तरह 2021 में हुई चोट को लेकर मुख्यमंत्री के आरोप और तृणमूल कांग्रेस की प्रतिक्रिया सामने आई है।

    दरअसल, 10 मार्च 2021 को नंदीग्राम के बिरुलिया इलाके के रेयापारा में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के बाएं पैर में चोट लगी थी। उस समय उन्होंने शुरुआत में दावा किया था कि कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें धक्का दिया, जिससे वह अपनी कार के खुले दरवाजे से टकरा गईं और उनके बाएं पैर में चोट लगी। बाद में उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा था कि चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ ने उन्हें धक्का दिया था। उन्हें इलाज के लिए एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां जांच के बाद उनके बाएं टखने और पैर की हड्डी तथा लिगामेंट में गंभीर चोटें होने की जानकारी सामने आई थी।

    घटना के बाद ममता बनर्जी को व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार करते देखा गया था। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 210 से अधिक सीटें जीती थीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 77 सीटों पर जीत मिली थी। अब सुवेंदु अधिकारी ने उस समय पैर में लगी चोट से जुड़े मामले की जांच कराने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि 9 अक्टूबर के बाद वह इस मामले से संबंधित और जानकारी सामने रखेंगे। वहीं, तृणमूल कांग्रेस की ओर से अधिकारी के आरोपों को खारिज किया गया है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने TMC के चार फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से किया इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने TMC के चार फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से किया इनकार

    नई दिल्ली, 1 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट को चार डेबिट-फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। इन चार खातों में करीब 804 करोड़ रुपये की राशि मौजूद है। TMC गुट ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत से इन खातों को संचालित करने की अनुमति मांगी थी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से भी मना कर दिया, जिसमें खातों को संचालित करने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार किया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह फिलहाल मामले के गुण-दोष में नहीं जा रहा है, क्योंकि मुख्य मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित है। पीठ ने हाई कोर्ट से मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया है। अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से चुनाव चिह्न पर रोक लगाए जाने के बाद इन बैंक खातों में मौजूद राशि पर अधिकार किसका है, यह महत्वपूर्ण सवाल अभी न्यायिक निर्णय के लिए लंबित है। ऐसे में शीर्ष अदालत ने इस स्तर पर खातों को संचालित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

    यह मामला पहले फ्रीज किए गए तीन HDFC बैंक खातों से अलग है। TMC गुट ने जिन चार बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति मांगी थी, उन्हें डेबिट लेनदेन के लिए फ्रीज किया गया था। पार्टी ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए इन खातों के संचालन की अनुमति मांगी थी। TMC गुट की ओर से कहा गया था कि खातों पर रोक के कारण पार्टी के कामकाज पर असर पड़ रहा है और इसलिए इन्हें संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, इस मांग पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया गया है।

    इससे पहले 27 अगस्त को कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC गुट को करीब 804 करोड़ रुपये वाले इन चार बैंक खातों को संचालित करने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। शीर्ष अदालत ने अब हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। साथ ही लंबित मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया है। इस दौरान अदालत ने खातों में मौजूद राशि पर अधिकार को लेकर उठे सवाल को भी महत्वपूर्ण माना है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद चारों फ्रीज बैंक खातों को संचालित करने की मांग पर फिलहाल राहत नहीं मिली है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मामले के मूल विवाद पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अदालत के अनुसार, खातों में मौजूद धन पर अधिकार किसका है, यह सवाल अभी लंबित है और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के जरिए तय किया जाना बाकी है। 1 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केवल हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया और मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया।

  • ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस

    ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद शुक्रवार को कई नए मोड़ से गुजरा। चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाले पारंपरिक चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज कर दोनों गुटों को नए नाम और प्रतीक आवंटित किए। इसके कुछ ही समय बाद नंदीग्राम उपचुनाव में ममता बनर्जी गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। ममता ने इसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया, लेकिन कुछ घंटे बाद ही पुलिस ने मिलन प्रधान को एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया।

    घटनाक्रम के बीच ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े मामले के अलावा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से निर्णय में देरी को लेकर भी अलग याचिका दायर की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक पहली याचिका में आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जबकि दूसरी में अयोग्यता की प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान पार्टी के नाम और प्रतीक को लेकर किए गए इंतजाम पर सवाल उठाया गया है। इन मामलों पर 21 सितंबर को सुनवाई संभावित बताई जा रही है।

    ममता गुट को मिला नया नाम और चुनाव चिह्न

    चुनाव आयोग के अंतरिम इंतजाम के तहत ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाला प्रतीक फिलहाल दोनों गुटों के इस्तेमाल के लिए रोक दिया गया है। यह व्यवस्था अक्टूबर में होने वाले उपचुनावों के मद्देनजर अंतरिम तौर पर की गई है।

    ममता गुट ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कैडर और मूल संगठनात्मक ढांचे को पर्याप्त महत्व दिए बिना बागी गुट के दावों को प्राथमिकता दी। गुट का कहना है कि पार्टी के नाम और पारंपरिक चिह्न पर अंतिम फैसला करने से पहले विधायकों की सदस्यता से जुड़े विवाद का निपटारा होना चाहिए।

    10 बागी विधायकों की सदस्यता पर भी विवाद

    ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की है। इस मामले में विधानसभा सचिवालय की ओर से संबंधित विधायकों को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा गया है।

    सूची में ऋतब्रत बनर्जी के अलावा अरूप राय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं।

    विवाद केवल विधायकों की सदस्यता तक सीमित नहीं है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी दोनों खेमों के बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। ममता गुट ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी। ममता गुट ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त में हाईकोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए ऋतब्रत को फिलहाल सीमित अवधि के लिए पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।

    एक दिन में बदली नंदीग्राम की तस्वीर

    6 अक्टूबर को प्रस्तावित नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में शुक्रवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे पहले वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी। नामांकन वापस लेने की वजह तत्काल स्पष्ट नहीं हो सकी। ममता बनर्जी ने बाद में कहा कि उनकी प्रत्याशी पर दबाव बनाया गया था।

    इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने कांग्रेस को ‘सिस्टर पार्टी’ बताते हुए इसे INDIA ब्लॉक को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया। हालांकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उनकी पार्टी ने TMC से समर्थन नहीं मांगा था।

    समर्थन के कुछ घंटे बाद मिलन प्रधान गिरफ्तार

    ममता के समर्थन की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस के नंदीग्राम प्रत्याशी मिलन प्रधान को पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्टों के अनुसार मामला 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़ा है और उनके खिलाफ पहले से गिरफ्तारी वारंट लंबित था। उन्हें अदालत में पेश किए जाने की बात कही गई है।

    गिरफ्तारी के समय को लेकर कांग्रेस और ममता गुट ने सवाल उठाए। ममता बनर्जी ने कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ा, जबकि कांग्रेस नेताओं ने भी गिरफ्तारी की टाइमिंग पर आपत्ति जताई। दूसरी ओर, पुलिस और भाजपा की ओर से इसे कानून के तहत कार्रवाई बताया गया और राजनीतिक आरोपों को खारिज किया गया। इसलिए गिरफ्तारी के पीछे राजनीतिक मंशा होने का दावा फिलहाल संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में ही सामने आया है।

    28 साल पुरानी पार्टी पहचान पर कानूनी लड़ाई

    ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। ‘फूल-घास’ वाला पारंपरिक चुनाव चिह्न लंबे समय से पार्टी की पहचान रहा है। मौजूदा विवाद में पहली बार दोनों गुट इस नाम और प्रतीक पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने फिलहाल दोनों को अलग-अलग नाम और चिह्न देकर उपचुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अंतरिम इंतजाम किया है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव 6 अक्टूबर को और मतगणना 9 अक्टूबर को प्रस्तावित है। ऐसे में ममता गुट के लिए एक ओर मूल पार्टी नाम और प्रतीक को लेकर कानूनी लड़ाई अहम है, वहीं दूसरी ओर बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला भी इससे जुड़ा हुआ है।

    राहुल गांधी का भाजपा पर आरोप, भाजपा ने पलटवार किया

    कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान की गिरफ्तारी पर राहुल गांधी ने भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है और भाजपा निष्पक्ष चुनाव में भरोसा नहीं करती। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा विपक्षी दलों और चुनावी मुकाबले को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

    भाजपा ने इन आरोपों को विपक्ष की प्रतिक्रिया बताते हुए पलटवार किया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद में आयोग अपने नियमों के तहत निर्णय लेता है। इस पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और नंदीग्राम उपचुनाव की आगे की प्रक्रिया पर हैं।

  • ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती

    ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही सियासी लड़ाई अब नंदीग्राम उपचुनाव तक पहुंच गई है। टीएमसी के बागी खेमे ने बुधवार को पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी। बागी गुट का कहना है कि यदि ममता बनर्जी इस सीट से मैदान में उतरती हैं तो वह उनके खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाहर बागी टीएमसी के प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा कि उनका गुट चाहता है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ें, जीतें और विधानसभा में वापस लौटें। उन्होंने स्पष्ट किया कि ममता के सामने उनका गुट प्रत्याशी नहीं उतारेगा।

    ‘भाजपा विरोधी वोट नहीं बंटने देंगे’

    बागी टीएमसी विधायक मदन मित्रा ने कहा कि ममता बनर्जी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित होने से रोकने के लिए लिया गया है।

    मदन मित्रा ने कहा कि अगर उनका गुट भाजपा की ‘बी टीम’ होता तो विपक्षी वोटों को बांटने के लिए दो के बजाय तीन या चार उम्मीदवार मैदान में उतार सकता था। उनके मुताबिक नंदीग्राम में ममता को वॉकओवर देने का फैसला यह दिखाएगा कि उनका गुट भाजपा के इशारे पर काम नहीं कर रहा है।

    नंदीग्राम में पहले हार चुकी हैं ममता

    नंदीग्राम ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में बेहद महत्वपूर्ण सीट रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने तत्कालीन करीबी सहयोगी और भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ यहां से चुनाव लड़ा था। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

    2026 के विधानसभा चुनाव में भी शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम से जीत हासिल की। उन्होंने ममता बनर्जी को उनके गृह क्षेत्र भवानीपुर में भी हराया। इस चुनाव के बाद शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम विधानसभा सीट खाली कर दी। इसी वजह से अब नंदीग्राम में उपचुनाव कराया जा रहा है।

    पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी घमासान

    बागी गुट का यह ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब टीएमसी के दोनों धड़ों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने अभी फैसला नहीं किया है कि आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

    रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा कर रहा है। उसका कहना है कि अगर नामांकन की अंतिम तारीख से पहले चुनाव आयोग उसके पक्ष में फैसला नहीं करता है तो वह निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहा है।

    6 अक्टूबर को नंदीग्राम में वोटिंग

    नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। बुधवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। 17 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 19 सितंबर तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकेंगे। मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

  • ममता की पार्टी का कानूनी मोर्चे पर दबदबा कायम, TMC ने जीतीं 15 सीटें; BJP और लेफ्ट को 3-3 सीट

    ममता की पार्टी का कानूनी मोर्चे पर दबदबा कायम, TMC ने जीतीं 15 सीटें; BJP और लेफ्ट को 3-3 सीट


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार तृणमूल कांग्रेस के लिए राहत देने वाला बड़ा नतीजा सामने आया है। पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के चुनाव में TMC ने 23 में से 15 निर्वाचित सीटों पर जीत हासिल कर अपना दबदबा बरकरार रखा है। बीजेपी के सत्ता में आने के बावजूद बार काउंसिल चुनाव में पार्टी महज तीन सीटों पर सिमट गई। लेफ्ट फ्रंट को भी तीन सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस ने दो सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी पिछली संख्या बरकरार रखी। नतीजों को TMC के लिए संगठनात्मक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा झटका लगा था।

    पश्चिम बंगाल बार काउंसिल की कुल 23 निर्वाचित सीटों के लिए चुनाव हुआ था और बुधवार को इसके नतीजे घोषित किए गए। इस चुनाव में TMC समर्थित उम्मीदवारों ने स्पष्ट बढ़त बनाई। रिपोर्टों के मुताबिक ममता बनर्जी की सिफारिश पर कई TMC उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया था। पार्टी के लीगल सेल से जुड़े कई प्रमुख चेहरे भी चुनाव जीतने में सफल रहे। शुभाशीष चक्रवर्ती सबसे बड़े अंतर से जीत दर्ज करने वाले उम्मीदवारों में रहे। उनके अलावा बैश्वानर चटर्जी अंसार मंडल अशोक देब इंद्रनील बसु और सिद्धार्थ मुखर्जी जैसे TMC समर्थित उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की।

    इस चुनाव की एक खास बात महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का परिणाम भी रहा। कुल 23 निर्वाचित सीटों में पांच सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। इनमें से चार सीटों पर TMC समर्थित उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया दो अतिरिक्त महिला सदस्यों को मनोनीत करेगा। इसके बाद पश्चिम बंगाल बार काउंसिल की कुल सदस्य संख्या 25 हो जाएगी।

    बीजेपी के लिए यह परिणाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की थी। इसके बावजूद बार काउंसिल के चुनाव में बीजेपी अपनी पिछली तीन सीटों की संख्या से आगे नहीं बढ़ सकी। यानी विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बावजूद वकीलों की इस प्रतिनिधि संस्था में पार्टी का प्रदर्शन पिछली बार के बराबर रहा। दूसरी ओर TMC ने 15 सीटों के साथ अपना नियंत्रण कायम रखा है। लेफ्ट फ्रंट की सीटें पिछली बार के चार से घटकर तीन हो गईं जबकि कांग्रेस अपनी दो सीटों को बचाने में सफल रही।

    इस चुनाव में कुल 75 उम्मीदवार मैदान में थे। TMC ने 23 उम्मीदवार उतारे थे जबकि बीजेपी की ओर से 22 उम्मीदवार चुनाव लड़े। लेफ्ट फ्रंट ने 12 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे और 18 निर्दलीय उम्मीदवार भी मुकाबले में थे। मतदान प्रक्रिया में राज्य के अलग अलग जिला अदालतों से जुड़े वकीलों ने हिस्सा लिया था। अब नतीजे आने के बाद TMC समर्थित खेमे में नए बोर्ड के गठन की तैयारी शुरू होने की उम्मीद है।

    राजनीतिक नजरिए से देखें तो बार काउंसिल का चुनाव विधानसभा चुनाव से बिल्कुल अलग प्रकृति का है और इसके नतीजों को सीधे राज्य की राजनीतिक लोकप्रियता का पैमाना नहीं माना जा सकता। फिर भी विधानसभा चुनाव के बाद TMC के लिए यह जीत मनोबल बढ़ाने वाली जरूर है। पार्टी इसे ऐसे समय में हासिल करने में सफल रही है जब उसे चुनावी हार के बाद संगठनात्मक चुनौतियों और अंदरूनी राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा संकेत देता है कि राज्य के कानूनी समुदाय के बीच उसका संगठनात्मक प्रभाव अभी TMC से काफी पीछे है।

  • संसद की तस्वीर बनी सियासत का केंद्र, टीएमसी सांसद की मौजूदगी से ममता बनर्जी पर उठे सवाल

    संसद की तस्वीर बनी सियासत का केंद्र, टीएमसी सांसद की मौजूदगी से ममता बनर्जी पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । संसद की कैंटीन में हुई एक सामान्य मुलाकात की तस्वीर ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय और आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ एक ही टेबल पर भोजन करते नजर आए। तस्वीर सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में दोनों नेताओं के भाजपा से नजदीकियां बढ़ने और संभावित दलबदल की अटकलें शुरू हो गईं। हालांकि टीएमसी नेताओं ने इन सभी अटकलों को सिरे से खारिज करते हुए इसे संसद परिसर की सामान्य सामाजिक मुलाकात बताया है।

    तस्वीर वायरल होने के बाद सबसे पहले सौगत रॉय ने पूरे घटनाक्रम पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि संसद की कैंटीन में वे पहले से बैठे थे, बाद में अमित शाह और भाजपा के अन्य नेता उसी मेज पर आकर बैठे और कुछ ही देर में वहां से चले गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दौरान किसी तरह की राजनीतिक बातचीत नहीं हुई। उनका कहना था कि भाजपा की ओर से संपर्क किए जाने की चर्चा निराधार है और वास्तविकता यह है कि उनकी पार्टी उन नेताओं से संपर्क कर रही है जो एनडीए में चले गए हैं, ताकि उन्हें वापस लाया जा सके।

    दूसरी ओर शत्रुघ्न सिन्हा ने भी तस्वीर को लेकर उठे विवाद को अनावश्यक बताया। उन्होंने कहा कि जेपी नड्डा उनके पुराने मित्र हैं और संसद में साथ बैठकर भोजन करना कोई असामान्य बात नहीं है। उन्होंने दोहराया कि इस मुलाकात का राजनीति या पार्टी बदलने जैसी किसी संभावना से कोई संबंध नहीं है।

    टीएमसी के अन्य नेताओं ने भी तस्वीरों को लेकर चल रही चर्चाओं को खारिज किया। सांसद कल्याण बनर्जी और विधायक कुणाल घोष ने कहा कि संसद या विधानसभा जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अलग-अलग दलों के नेताओं का मिलना-जुलना सामान्य प्रक्रिया है। ऐसी तस्वीरों को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि विचारधारा और राजनीतिक प्रतिबद्धता किसी तस्वीर से तय नहीं होती।

    हालांकि पार्टी के भीतर से अलग स्वर भी सुनाई दिए। टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने तस्वीरों को ध्यान से देखा है और संभव है कि इसके पीछे कोई रणनीति हो। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से उनका कोई संबंध नहीं है और राजनीति में इस तरह की गतिविधियां होती रहती हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। हाल के दिनों में राज्य की राजनीति में कई नेताओं के दल बदलने और राजनीतिक समीकरण बदलने की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में संसद की कैंटीन में सामने आई यह तस्वीर भी चर्चा का विषय बन गई है। हालांकि फिलहाल न तो सौगत रॉय और न ही शत्रुघ्न सिन्हा ने भाजपा में शामिल होने जैसी किसी संभावना के संकेत दिए हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के भीतर अलग-अलग दलों के नेताओं के बीच सामाजिक संबंध और औपचारिक मुलाकातें लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा हैं। इसलिए केवल एक तस्वीर के आधार पर किसी राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में यदि इस घटनाक्रम पर कोई नया राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है, तभी इन अटकलों की वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।

  • TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा

    TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है। इसी बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेजकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।

    दरअसल सोमवार को पार्टी के बागी नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर तृणमूल कांग्रेस की समानांतर वर्किंग कमेटी बनाने का दावा किया था। इस बैठक में ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा की गई और उनकी जगह अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इतना ही नहीं बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार का पद देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

    बागी नेताओं की इस कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत राजनीतिक जवाबी रणनीति अपनाई। उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्यों की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी। इस सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है जबकि अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव और सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष के रूप में दर्शाया गया है।

    नई सूची के चुनाव आयोग तक पहुंचने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध और प्रभावी बनाए रखने के लिए सक्रिय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बागी गुट को सीधा संदेश देने की रणनीति भी है।

    दूसरी ओर बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उनका दावा है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और नए संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए। इसी वजह से उन्होंने समानांतर कार्यसमिति के गठन को उचित ठहराया है।

    अब पार्टी पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुट आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला आधिकारिक संगठन है तो दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि विवाद और बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग के साथ-साथ अदालत तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी ने नई सूची भेजकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह पार्टी नेतृत्व को लेकर किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में नए समीकरण पैदा कर सकता है और TMC के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?

    TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress को बड़ा झटका देते हुए उसके 20 बागी सांसदों ने खुद को Nationalist Citizens Party of India में विलय करने का दावा किया है। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपने और संसद में अलग बैठने की मांग के साथ इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि राजनीतिक तौर पर यह कदम बागी सांसदों के लिए सुरक्षित दिखाई देता है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ इसे इतना आसान नहीं मान रहे हैं।

    दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने पर सदस्यता गंवानी पड़ सकती है। इसी खतरे से बचने के लिए बागी सांसदों ने ‘विलय’ का रास्ता चुना है। उनके पास कुल 28 में से 20 सांसदों का समर्थन है, जो दो-तिहाई की कानूनी शर्त पूरी करता है। लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू होता है।

    क्या केवल सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में विलय कर सकता है?
    संविधान विशेषज्ञों और संसद के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि दल-बदल कानून के तहत केवल सांसदों या विधायकों का समूह किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए, तो उसे विलय नहीं माना जा सकता। कानून के अनुसार मूल राजनीतिक दल का भी दूसरी पार्टी में विलय होना जरूरी है। उनका तर्क है कि दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल के विलय की बात कही गई है, न कि केवल संसदीय दल के। ऐसे में सांसदों का यह कदम कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्यों बन सकते हैं परेशानी?
    इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया जा रहा है। वर्ष 2023 में हुए Shiv Sena Political Crisis से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘मूल राजनीतिक दल’ और ‘विधायक या सांसद दल’ अलग-अलग इकाइयाँ हैं। अदालत ने कहा था कि किसी पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि खुद को संगठन का मालिक नहीं मान सकते। पार्टी के आधिकारिक फैसलों का अधिकार मूल संगठन और उसके नेतृत्व के पास ही रहता है। यही सिद्धांत अब TMC के पक्ष को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

    ममता खेमे की कानूनी तैयारी शुरू
    TMC नेतृत्व ने बागी सांसदों के कदम को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर किसी अलग गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की गई है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में बागी विधायकों को मिली मान्यता के खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया है। पार्टी का कहना है कि संगठन स्तर पर किसी प्रकार का विलय नहीं हुआ है, इसलिए सांसदों का दावा संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

    NCPI को अचानक मिला राष्ट्रीय महत्व
    त्रिपुरा में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त Nationalist Citizens Party of India अब अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। 2023 में गठित यह छोटी पार्टी अब बागी सांसदों के कारण संसद में उल्लेखनीय उपस्थिति का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम कानूनी सुरक्षा हासिल करने की रणनीति हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला अदालतों और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

    आगे क्या होगा?
    अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष और न्यायपालिका पर टिकी हैं। यदि बागी सांसदों का ‘विलय’ कानूनी रूप से मान्य माना जाता है तो यह दल-बदल कानून की नई व्याख्या का रास्ता खोल सकता है। लेकिन यदि अदालतों ने इसे केवल ‘दल-बदल’ माना, तो सांसदों की सदस्यता पर संकट गहरा सकता है। फिलहाल यह मामला भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून की प्रभावशीलता, उसकी खामियों और भविष्य में संभावित संशोधनों को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।

  • ममता बनर्जी को एक और झटका…..असली TMC के नाम और सिंबल पर दावा ठोकेंगे बागी सांसद!

    ममता बनर्जी को एक और झटका…..असली TMC के नाम और सिंबल पर दावा ठोकेंगे बागी सांसद!


    कोलकाता
    । पश्चिम बंगाल (West Bengal) में सत्ता छिनते ही ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को एक के बाद झटके मिले रहे हैं। रविवार को ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को गहरा जख्म देकर तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के बागी सांसदों ने अब त्रिपुरा की एक पार्टी संग विलय का फैसला कर लिया है। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) से मिलकर लोकसभा में अलग सीट की व्यवस्था करने की मांग भी की है। इधर पार्टी से नए-नए बागी हुए सुदीप बंदोपाध्याय ने रविवार को संकेत दे दिए हैं कि बागी खेमा अगले महीने टीएमसी के नाम और सिंबल पर अपना दावा ठोकेगा। ऐसे में यह चर्चाएं भी तेज हो गई हैं कि NDA को लोकसभा में अपना सबसे बड़ा सहयोगी मिलने जा रहा है।

    इससे पहले लोकसभा में दो-तिहाई सांसदों की बगावत के बाद, बागी खेमे को जिस ‘हेवीवेट’ की तलाश थी, वह भी अब पूरी हो गई है। कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद और लोकसभा में टीएमसी के संसदीय दल के नेता रहे सुदीप बंदोपाध्याय भी अब आधिकारिक तौर पर बागी गुट में शामिल हो गए हैं। बागी गुट में शामिल होते ही सुदीप बंदोपाध्याय ने ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा है बागियों का त्रिपुरा नेशनल सिटीजंस पार्टी (NCP) में विलय केवल एक अस्थायी व्यवस्था है।


    क्या है प्लान?

    लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों का समर्थन होने की बात दोहराते हुए सुदीप बंदोपाध्याय ने बागियों की लॉन्ग टर्म रणनीति का खुलासा किया। उन्होंने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा, “जब आप 2-तिहाई बहुमत के साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो यही सिस्टम है। आप पहले ही दिन जा के नहीं बोल सकते कि हमें पार्टी का सिंबल दे दो।” उन्होंने आगे कहा कि बागी खेमा जुलाई में चुनाव आयोग और कोर्ट के सामने आधिकारिक मांग रखेगा कि उन्हें ही असली तृणमूल माना जाए, क्योंकि हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है। इसके बाद कोर्ट इस पर फैसला करेगा।

    गौरतलब है कि रविवार को तृणमूल कांग्रेस में संकट उस वक्त और गहरा गया जब बागी सांसदों ने त्रिपुरा की एक बेहद कम चर्चित ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी। यह पार्टी अब लोकसभा में भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकार को समर्थन देगी। लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी सांसदों की अगुवाई करने वालीं काकोली घोष दस्तीदार ने एक बयान में कहा कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बिरला को सौंपे गए आवेदन पर साइन किए हैं। उन्होंने कहा, ”तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई लोकसभा सदस्यों ने एक अलग समूह के रूप में मान्यता देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। हम नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपना विलय करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करेंगे।”


    त्रिपुरा की पार्टी है NCPI

    ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ त्रिपुरा की एक रजिस्टर्ड पार्टी है। हालांकि इसकी कोई खास राजनीतिक मौजूदगी नहीं है। पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इसके उम्मीदवार या तो नोटा से पीछे रहे या उन्हें उससे बस कुछ ही ज्यादा वोट मिले। इस बीच भाजपा ने कहा है कि अगर टीएमसी के सांसद NDA का समर्थन करना चाहते हैं तो यह देश के लिए अच्छा होगा।


    बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी बनेगी TMC

    लोकसभा में अगर टीएमसी के इस खेमे ने NDA को समर्थन दिया तो पार्टी बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी भी बन सकती है। बता दें कि बीजेपी के पास केंद्र में फिलहाल NDA के दो बड़े सहयोगी का समर्थन है। इसमें आंध्र प्रदेश की टीडीपी में 16 सांसद और ​जनता दल (यूनाइटेड) के 12 सांसद शामिल हैं। अब 20 से ज्यादा बागी टीएमसी सांसदों के समर्थन ने सदन में NDA की संख्या 313 तक बढ़ सकती है।

  • TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत

    TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी कलह अब संसद तक पहुंचती नजर आ रही है। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 सांसदों के एक अलग गुट बनाने के दावे ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। यह बागी समूह सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग कर सकता है और साथ ही सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ बैठने की अनुमति भी चाहता है।

    सूत्रों और बागी गुट के नेताओं के अनुसार, सांसद खुद को “असली टीएमसी” के रूप में मान्यता देने की मांग करेंगे। इस समूह की ओर से वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार को नेता और शताब्दी रॉय को उपनेता के रूप में प्रस्तावित किए जाने की बात भी सामने आई है। साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि उनके पास 19 सांसदों का समर्थन है और अन्य सांसदों के लिए भी दरवाजे खुले हैं।

    बताया जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद NDA की संसदीय ताकत बढ़ सकती है, जिससे संसद में विपक्षी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष और आगे चलकर चुनाव आयोग (EC) की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

    बागी गुट के नेताओं ने आरोप लगाया है कि पार्टी में आंतरिक असंतोष की वजह नेतृत्व शैली और संगठनात्मक फैसले हैं। उनका कहना है कि पहले जब तक ममता बनर्जी का सीधा नियंत्रण था, स्थिति स्थिर थी, लेकिन अब संगठन में बदलाव के बाद असंतोष बढ़ा है। कुछ नेताओं ने यहां तक दावा किया है कि पार्टी अब “कॉरपोरेट ढांचे” की तरह काम कर रही है, जहां जमीनी नेताओं की अनदेखी हो रही है।

    बागी सांसदों का यह भी तर्क है कि वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं और अपने क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार के साथ बेहतर समन्वय आवश्यक है। इसी वजह से वे NDA के साथ जुड़कर काम करने की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि पहले लोकसभा अध्यक्ष से मान्यता लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी और उसके बाद चुनाव आयोग का रुख किया जाएगा।

    इसी बीच, पार्टी के भीतर अन्य स्तरों पर भी असंतोष के संकेत सामने आए हैं। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और बैठक से दूरी बनाए जाने की खबरों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। कुछ नेताओं ने संगठनात्मक फैसलों और रणनीतिक प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, जिससे TMC के भीतर गुटबाजी की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और चुनाव आयोग की संभावित भूमिका पर टिकी हुई हैं, जो आगे की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।