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  • "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला

    "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें राजनीति से ज्यादा प्रचार में रुचि रखने वाली नेता बताया है। उनके बयान ने टीएमसी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर दिया है।

    एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान काकोली घोष ने कहा कि जब ममता बनर्जी ने राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की थी, तब आज खुद को उनका करीबी बताने वाले कई चेहरे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने बिना नाम लिए महुआ मोइत्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेश में बैठकर ट्वीट करने वाले लोग वास्तविक राजनीति नहीं करते, बल्कि केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बयानबाजी करते हैं।

    काकोली घोष की यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई है जब हाल ही में महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों को “लालची”, “मतलबी” और “गद्दार” करार दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है। घोष ने कहा कि कुछ नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनसे मीडिया में उनकी चर्चा बनी रहे, लेकिन इससे पार्टी संगठन को नुकसान पहुंचता है।

    इस बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि उसके साथ करीब 20 सांसदों का समर्थन मौजूद है। काकोली घोष ने स्वयं को भी इस गुट का हिस्सा बताया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसदों ने हाल के दिनों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बैठकें की हैं, जिससे टीएमसी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।

    उधर, पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे ने भी टीएमसी में असंतोष की खबरों को बल दिया है। बताया जा रहा है कि रॉय कई सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पहुंचे थे, जहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा हुई। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के कई लोकसभा सांसदों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं।

    दिल्ली में चल रहे इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर उथल-पुथल जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के बाद कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है और संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर यह असंतोष और बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक रणनीतियों और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर उनके लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।

  • बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?

    बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ सांसदों की दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन घटनाक्रम को लेकर कई तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं।

    इस बैठक में राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रॉय की मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष के संकेत अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

    दिल्ली में जुटे कई सांसद
    दिल्ली में हुई इस मुलाकात में TMC के सांसद जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन समेत कई नेता शामिल बताए गए। वहीं शाम को सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर भी एक बैठक हुई, जिसमें विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की खबरें सामने आईं। इसी बीच TMC सांसद काकोली घोष ने दावा किया कि प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से संवाद किया जा रहा है।

    इस्तीफे के बाद सुखेंदु शेखर रॉय के आरोप
    राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने संगठन में भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और आंतरिक लोकतंत्र की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया था। उनके बयान को पार्टी के अंदरूनी असंतोष का संकेत माना गया।

    कई महीनों से चल रही है नाराजगी की चर्चा
    राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, TMC के भीतर पिछले कुछ समय से असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से ऐसे दावों को खारिज किया जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। हाल के दिनों में पार्टी की बैठकों में कई नेताओं की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी रही है। इससे संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं।

    ऋतब्रत बंद्योपाध्याय की भूमिका पर नजर
    विपक्ष के नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रमुखता से सामने आ रहा है। उन्होंने दावा किया है कि TMC के कई नेता उनके संपर्क में हैं और पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को लेकर लगातार संवाद जारी है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विपक्ष इसे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।

    फिरहाद हाकिम की मुलाकात ने बढ़ाई चर्चा
    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी माने जाने वाले फिरहाद हाकिम की विपक्षी नेताओं से हुई मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा को और तेज कर दिया है। इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ इसे संवाद की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे पार्टी के भीतर की स्थिति को समझने की कवायद बता रहे हैं।

    ममता बनर्जी की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय
    दिल्ली दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीडिया से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी। आमतौर पर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र सरकार के मुद्दों पर मुखर रहने वाली ममता की इस बार की चुप्पी को भी राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

    आगे क्या?
    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया है कि TMC के भीतर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या संगठन में किसी बड़े बदलाव की स्थिति बनती है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब TMC के अगले कदम और संभावित रणनीति पर टिकी हुई है, क्योंकि बंगाल की राजनीति में होने वाला हर बदलाव राज्य के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • ममता का साथ छोड़ NDA को सपोर्ट कर रहे TMC के बागी सांसद…. यूसुफ पठान भी गुट में शामिल

    ममता का साथ छोड़ NDA को सपोर्ट कर रहे TMC के बागी सांसद…. यूसुफ पठान भी गुट में शामिल


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के संसदीय दल पर संकट गहराता नजर आ रहा है। अधिकांश सांसदों के समर्थन का दावा करने वाले पार्टी के एक गुट ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) का साथ छोड़कर NDA का समर्थन करने का फैसला किया है। कहा जा रहा है कि इन बागी सांसदों के गुट में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान (Yusuf Pathan) भी शामिल हैं। हालांकि, उन्होंने इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। ये सारा घटनाक्रम तब हुआ, जब बनर्जी दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं थीं।

    टीएमसी की वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पठान का नाम भी होने के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि 20 सांसदों ने बगावत की है और जरूरत पड़ी, तो वह सभी का नाम बता सकती हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं एक-एक कर सभी का नाम बता सकती हूं। हम 20 सांसद हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहती।’


    महुआ मित्रा ने साधा निशाना

    सोमवार को टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने पठान पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था, ‘और यूसुफ पठान आप दिल्ली जा रहे हैं, क्योंकि आपको अमित शाह का कॉल आया है? थोड़ी हिम्मत तो रखो। आप भारत के लिए खेले हैं। हमारे जिले ने आपको बड़े अंतर से जिताया है। थोड़ी शर्म और रीढ़ की हड्डी को मजबूत रखो।’


    लोकसभा सीट पर हो गया था बवाल

    हाल ही में खबरें आई थीं कि टीएमसी ने बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान को सीट से इस्तीफा देने के लिए मनाने की कोशिश की थी। साथ ही इसके लिए भी पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली की मदद ली गई थी। ऐसा इसलिए ताकि ममता बनर्जी सीट से उपचुनाव लड़ सकें। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पूर्व क्रिकेटर ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था। हालांकि, बाद में गांगुली ने इन दावों को खारिज कर दिया था।


    ओम बिरला को लिख दिया पत्र

    बागी गुट की प्रमुख बताई जा रहीं दस्तीदार ने NDA को अपने समर्थन की जानकारी देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखने का फैसला किया है। दस्तीदार ने बताया, ‘मेरे समेत टीएमसी के लगभग बीस सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर NDA को औपचारिक रूप से समर्थन देने का फैसला किया है।’


    भाजपा में शामिल होंगे बागी?

    सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने टीएमसी से तुरंत इस्तीफा देने या भाजपा में शामिल होने का विकल्प नहीं चुना है। इसके बजाय, वे राजग का समर्थन करने वाले एक अलग गुट के रूप में काम करने का इरादा रखते हैं, जो दलबदल रोधी कानून से बचने के लिए बनाई गई एक रणनीति है। टीएमसी के पास फिलहाल लोकसभा में 28 सांसद हैं, जिनमें से एक सीट बसीरहाट सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के निधन के बाद रिक्त है। 20 सांसदों का समर्थन मिलने पर दलबदल रोधी कानून लागू होने से रोकने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत आसानी से प्राप्त हो जाएगा।

    एक सूत्र ने बताया कि बागी सांसदों के एक समूह ने दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक की। बैठक की एक कथित तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही है। इस तस्वीर में, राज्यसभा सदस्य सुखेंदु शेखर राय, सांसद अबू ताहिर, असित मल, अरूप चक्रवर्ती, कालीपद खेरवाल, जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार और शताब्दी रॉय के साथ दिखाई दे रहे हैं।

  • चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान

    चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष चर्चा का विषय बना हुआ है। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दिए जाने के बाद TMC नेतृत्व और बागी गुट के बीच टकराव और तेज हो गया है। इसी बीच TMC सांसद Mahua Moitra ने बागी विधायकों पर जमकर हमला बोला है।

    एक इंटरव्यू में महुआ मोइत्रा ने कहा कि जिन नेताओं ने वर्षों तक Mamata Banerjee की लोकप्रियता और पार्टी के संगठनात्मक बल का लाभ उठाया, वही आज पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बागी नेताओं को निशाने पर लेते हुए कहा कि सत्ता में रहने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए वे विपक्ष में संघर्ष करने के बजाय आसान रास्ता चुन रहे हैं। महुआ ने दो टूक कहा कि यदि किसी नेता को पार्टी छोड़नी है तो वह खुलकर जाए, लेकिन खुद को तृणमूल कांग्रेस बताने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बागी नेता चाहें तो अपनी अलग पार्टी बना लें, लेकिन TMC के नाम और पहचान का इस्तेमाल न करें।

    भाजपा पर गंभीर आरो
    महुआ मोइत्रा ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका होने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि भाजपा योजनाबद्ध तरीके से TMC को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के नेता Suvendu Adhikari का नाम लेते हुए कहा कि वे कभी तृणमूल का हिस्सा रहे हैं और पार्टी के नेताओं की राजनीतिक कमजोरियों से भली-भांति परिचित हैं। इसी जानकारी का इस्तेमाल कर भाजपा नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है।

    महुआ ने दावा किया कि कुछ नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पक्ष बदलने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विधायकों और नेताओं को गिरफ्तारी की धमकियां दी गईं, जिसके चलते वे बागी खेमे के साथ चले गए।

    “असली TMC ममता के साथ”
    बागी गुट के बढ़ते प्रभाव और चुनाव चिह्न पर संभावित विवाद के सवाल पर महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस आज भी ममता बनर्जी और उनके साथ खड़े नेताओं के पास ही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का मूल संगठन, विचारधारा और जनाधार ममता बनर्जी के नेतृत्व में कायम है।

    महुआ ने यह भी कहा कि यदि कभी ऐसी स्थिति आती है कि पार्टी को अपना मौजूदा चुनाव चिह्न छोड़ना पड़े, तब भी उन्हें कोई चिंता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर नई राजनीतिक राह चुनी थी, तब उन्होंने अपनी पहचान और चुनावी प्रतीक खुद तैयार किया था।

    नया सिंबल बनाकर भी जीत सकती हैं ममता
    महुआ मोइत्रा ने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी का राजनीतिक कद किसी चुनाव चिह्न का मोहताज नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने नया दल बनाकर और नया प्रतीक लेकर पश्चिम बंगाल में तीन बार सरकार बनाई, वह भविष्य में भी नया चुनावी चिह्न बनाकर जनता का समर्थन हासिल कर सकती हैं।

    उनके अनुसार, चुनाव चिह्न या पार्टी का नाम बदल सकता है, लेकिन जनता के बीच ममता बनर्जी की पहचान और राजनीतिक प्रभाव को कोई नहीं छीन सकता।

  • TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ

    TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) में हुए विद्रोह में टीएमसी (TMC) के अल्पसंख्यक विधायक (Minority MLA) भी पीछे नहीं हैं. इन विधायकों ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee .) की बजाय ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के साथ जाना ज्यादा बेहतर समझा है. मुर्शिदाबाद में TMC के जो 9 विधायक जीते थे उनमें से 8 ने ममता का साथ छोड़ दिया है और ऋतब्रत बनर्जी का दामन थाम लिया है।

    इस सूची में तृणमूल कांग्रेस के लंबे समय से विश्वसनीय और वरिष्ठ नेता जावेद खान के साथ-साथ काजल शेख जैसे प्रभावशाली नेता भी शामिल हैं। बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने इन मुस्लिम विधायकों को बगावत का भरपूर इनाम दिया है. बागियों में शामिल जावेद खान को विधानसभा में विपक्ष का उपनेता बनाया गया है. वहीं दूसरी ओर अखुरुज्जमां को चीफ व्हिप बनाया गया है।


    तृणमूल की ‘टूट’ बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद

    एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले मंत्रिमंडल के चार अल्पसंख्यक मंत्री भी आंदोलनकारी विधायकों के इस समूह में शामिल हैं. ये विधायक हैं- जावेद खान, सबीना यास्मीन, गुलाम रब्बानी और अखरूजमां।

    तृणमूल के आंदोलनकारी खेमे के जिन अल्पसंख्यक विधायकों के नाम अब तक सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं – जावेद खान, अखरूजमां, काजल शेख, गुलाम रब्बानी, डॉ. मोशर्रफ हुसैन, इमानी बिस्वास, नियामत शेख, रेयात हुसैन, गुलशन मल्लिक, तौसीफुर रहमान, मुस्तफिजुर रहमान, बहारुल इस्लाम।

    लेकिन कुल आंकड़ा कही ज्यादा है. रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल के टिकट पर चुनाव जीतने वाले 34 मुस्लिम विधायकों में से 17 बागी खेमे में शामिल हो गए हैं।

    सबसे खास बात यह है कि मुर्शिदाबाद के 9 अल्पसंख्यक विधायकों में से 8 ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में शामिल हो गए हैं. अखरुजमां कहते हैं, ‘मुर्शिदाबाद जिले के 9 विधायकों में से 8 ने हमारा समर्थन किया है. हमने पार्टी के बहुमत के साथ खड़े रहने का फैसला किया है.’ केवल नव निर्वाचित विधायक और शिक्षाविद बाबर अली (जलंगी विधायक) ने ही पार्टी नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    रघुनाथगंज के विधायक अख्रुज्जमां को इस ‘विद्रोह’ के सूत्रधारों में से एक माना जा रहा है. अखरूजमां ने 2018 में कांग्रेस छोड़ दी थी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे, तब शुभेंदु अधिकारी मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के पर्यवेक्षक थे. इस बार वे ऋतब्रता के साथ आए हैं. जिले के दूसरे विधायकों शमशेरगंज के नूर आलम, सुती विधायक इमानी बिस्वास, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन सरकार और हरिहरपारा के नियामत शेख तथा भरतपुर के विधायकों मुस्तफिजुर रहमान।

    आंकड़ों के अनुसार 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने मुर्शिदाबाद जिले की 22 सीटों में से 20 सीटें जीती थीं. तृणमूल कांग्रेस के सुनहरे दिनों में जब अभिषेक बनर्जी या ममता बनर्जी कोलकाता में बैठक बुलाते थे तो मुर्शिदाबाद जिले से बुलाए गए सभी विधायक लगभग एक दिन पहले ही कोलकाता में होटल बुक कर लेते थे, ताकि वे समय पर बैठक में पहुंच सकें और पीछे की पंक्ति में न बैठना पड़े. लेकिन इस विधानसभा चुनाव के बाद स्थिति बदल गई है।

    पिछले रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर पर हुई तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में ये विधायक नजर नहीं आए. 2011 से ही मुस्लिम बड़ी संख्या में तृणमूल को वोट देते आ रहे हैं. ममता बनर्जी को लगता था कि मुस्लिम उनके स्थायी वोट बैंक रहेंगे. लेकिन इस चुनाव में पूरी तस्वीर बदल गई है।

  • पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs

    पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs


    कोलकाता।
    ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) टूट की कगार पर है। अटकलें हैं कि पार्टी के दो फाड़ हो सकते हैं और करीब 60 विधायक ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) को समर्थन देने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। संभावनाएं हैं कि बुधवार को विधायक एकजुट होकर पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंप सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो पार्टी 60 और 20 के गुट में बंट जाएगी और ममता बनर्जी गुट से विपक्ष का दर्ज भी छिन जाएगा।

    कथित नए गुट के सदस्यों ने 80 में से 60 टीएमसी विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया है। एक नेता ने अखबार से कहा, ‘मान्यता पाने के लिए हमारा पत्र तैयार है, क्योंकि असली टीएमसी तैयार है। हम बुधवार को बंगाल विधानसभा स्पीकर रतींद्रनाथ बोस को पत्र सौंप देंगे।’ कहा जा रहा है कि ये सभी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन दे रहे हैं।


    पश्चिम बंगाल के मंत्री ने बढ़ाई चर्चा

    पश्चिम बंगाल के मंत्री तापस रॉय ने मंगलवार को दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस में महाराष्ट्र जैसी टूट होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।रॉय ने दावा किया कि तृणमूल ने कई ऐसे लोगों को शामिल किया, जिनका राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं था। उन्होंने दावा किया कि अब पार्टी के अंदरूनी मतभेद और अंतर्विरोध सतह पर दिखाई देने लगे हैं।


    ऋतब्रत बनर्जी विधायकों से मिले

    विधानसभा परिसर से बाहर आने के बाद पत्रकारों से बातचीत में ऋतब्रत बनर्जी ने स्वीकार किया कि उनकी मुलाकात विधायक हॉस्टल में कुछ विधायकों से हुई और उनके साथ मुरमुरा खाया था। बनर्जी ने कहा कि वह ‘एक-एक दिन के हिसाब से आगे बढ़ने’ में विश्वास रखते हैं। उन्होंने 50 से ज्यादा विधायकों के उनके साथ आने की अटकलों पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

    उन्होंने दावा किया कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता निर्वाचित करने संबंधी कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। बनर्जी के अनुसार, जिस कागज पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे, वह महज उपस्थिति दर्ज करने के लिए था। टीएमसी ने ऋतब्रत समेत दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था।


    विरोध प्रदर्शन में नहीं पहुंचे सांसद और विधायक

    ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद मंगलवार को पहली बड़ी राजनीतिक लामबंदी की, लेकिन एस्प्लेनेड के वाई-चैनल पर आयोजित धरना कार्यक्रम में कम भीड़ और कई सांसदों-विधायकों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही। बनर्जी के विरोध प्रदर्शन के लिए वाई-चैनल के बस अड्डे के करीब एक धरना मंच तैयार किया गया था।

    यहां चंद्रिमा भट्टाचार्य, शोभनदेब चट्टोपाध्याय, डेरेक ओ’ब्रायन, फिरहाद हकीम और अन्य वरिष्ठ नेता बनर्जी के साथ मौजूद रहे, लेकिन बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर असंतोष की अटकलों को और बल दिया।

  • फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें

    फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत ने जहां विपक्षी खेमे को उत्साहित किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कई सवाल छोड़ गया है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी और आरोपों का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस अप्रत्याशित परिणाम के लिए अपने ही उम्मीदवार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    Mamata Banerjee के करीबी माने जाने वाले सांसद Sougata Roy ने चुनाव परिणाम के बाद तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को मिली हार केवल चुनावी रणनीति की कमी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे आंतरिक परिस्थितियों ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी उम्मीदवार जहांगीर खान के फैसलों ने संगठन को नुकसान पहुंचाया और अंतिम समय में पैदा हुई परिस्थितियों के कारण पार्टी प्रभावी ढंग से चुनावी रणनीति नहीं बना सकी।

    फाल्टा सीट पर चुनावी मुकाबला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और इस सीट को प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन परिणाम सामने आने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार देबांगशु पांडा ने भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी। उनकी जीत केवल एक सीट का परिणाम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य के राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। चुनावी आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया क्योंकि पार्टी उम्मीदवार अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सके। यह स्थिति पार्टी के लिए और भी असहज इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि संगठन को इतना कमजोर चुनावी परिणाम झेलना पड़ा। इस नतीजे ने पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक मजबूती और आंतरिक एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उपचुनाव अक्सर बड़े चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेत देते हैं। ऐसे में फाल्टा का परिणाम आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर डाल सकता है। भाजपा इस जीत को अपने बढ़ते जनाधार के संकेत के रूप में देख रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपनी रणनीति और संगठन दोनों को लेकर गंभीर समीक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनावी झटका राज्य की राजनीति में किस तरह के नए समीकरण पैदा करता है।

  • बंगाल में TMC पर बड़ा एक्शन: ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों से मचा हड़कंप, कई नेता जांच के घेरे में

    बंगाल में TMC पर बड़ा एक्शन: ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों से मचा हड़कंप, कई नेता जांच के घेरे में



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा बवाल मचा हुआ है। राज्य में चल रही कार्रवाई के तहत तृणमूल कांग्रेस (Mamata Banerjee) की पार्टी All India Trinamool Congress के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार, हिंसा और अवैध गतिविधियों के गंभीर आरोपों के चलते लगातार गिरफ्तारियां हो रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है।

    हाई-प्रोफाइल नेताओं पर कार्रवाई
    इस कार्रवाई के तहत पूर्व राज्य मंत्री और TMC नेता Sujit Bose को नगरपालिका भर्ती घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया है। वहीं, संदेशखाली विवाद से जुड़े नेता Sheikh Shahjahan भी गंभीर आरोपों के चलते जांच के दायरे में हैं।

    पंचायत और स्थानीय स्तर पर भी शिकंजा
    सिर्फ बड़े नेताओं तक ही नहीं, बल्कि पंचायत और जिला स्तर पर भी कार्रवाई तेज है। कई पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय पदाधिकारियों पर वित्तीय अनियमितताओं, रंगदारी और अवैध हथियार रखने जैसे आरोप लगाए गए हैं। कई मामलों में गिरफ्तारियां भी हुई हैं, जिससे प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ गई है।

    हिंसा और रंगदारी के आरोप
    कुछ नेताओं पर राजनीतिक विरोधियों पर हमले, धमकी और जबरन वसूली जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। इन मामलों की जांच राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही है।

    फरार और जांच के घेरे में नेता
    इस कार्रवाई के बीच कुछ नेता या तो फरार बताए जा रहे हैं या फिर पूछताछ के लिए तलाश में हैं। पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और कई जगहों पर निगरानी बढ़ा दी गई है।

    जनता का विरोध और तनाव
    राज्य के कई इलाकों में गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। कुछ जगहों पर स्थानीय लोगों द्वारा विरोध दर्ज कराया जा रहा है, जिससे जमीनी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।

    फिलहाल यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव और सत्ता-संघर्ष की ओर इशारा कर रहा है, और आने वाले दिनों में इस पर और राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

  • बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार

    बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा सीट को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मतदान से ठीक पहले पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से हटने का फैसला कर सभी को चौंका दिया है। इस अचानक हुए घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर हलचल पैदा कर दी है, बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल में भी चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है।

    फाल्टा सीट पर पहले हुए मतदान के दौरान कथित अनियमितताओं और धांधली के आरोप सामने आए थे, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया को रद्द कर दोबारा मतदान कराने का निर्णय लिया गया था। दोबारा मतदान की तारीख तय होने के बाद सभी दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी थीं, लेकिन अंतिम समय में TMC उम्मीदवार का पीछे हटना एक अप्रत्याशित राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है।

    जहांगीर खान अपने प्रचार अभियान के दौरान अपने अलग अंदाज और बयानों को लेकर काफी चर्चा में रहे थे। उनके वायरल प्रचार स्टाइल और आत्मविश्वास भरे बयानों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। लेकिन चुनाव से महज कुछ दिन पहले उनके मैदान छोड़ने के फैसले ने सभी राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है और विपक्ष को भी इस पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ इसे व्यक्तिगत कारणों से लिया गया फैसला बता रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि राजनीतिक और कानूनी दबाव ने इस स्थिति को जन्म दिया है। हालांकि आधिकारिक तौर पर उम्मीदवार की ओर से अपना नाम वापस लेने की पुष्टि की गई है, लेकिन इसके पीछे की पूरी वजह अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

    इस बीच यह भी चर्चा में है कि फाल्टा सीट पर पहले चरण के मतदान के दौरान कई बूथों पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराई और फिर दोबारा मतदान का आदेश दिया। इसी पृष्ठभूमि में यह नया घटनाक्रम राजनीतिक महत्व और बढ़ा देता है।

    कुल मिलाकर फाल्टा विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है। मतदान से ठीक पहले उम्मीदवार का हटना न केवल सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन गया है, बल्कि आने वाले दिनों में इस सीट के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल सकता है।

  • चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे

    चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे



    कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी अब पार्टी को नए सिरे से मजबूत करने में जुट गई हैं। चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी उम्मीदवारों के साथ अहम समीक्षा बैठक की। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी मौजूद रहे।

    पार्टी में बढ़ती अंदरूनी हलचल और नेताओं के पाला बदलने की अटकलों के बीच ममता बनर्जी ने साफ संदेश दिया कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं।

    ‘जिसे जाना है जाए, मैं नहीं रोकूंगी’
    बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने दो टूक कहा कि वे किसी को भी जबरदस्ती पार्टी में बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। मैं पार्टी को फिर से खड़ा करूंगी।”

    उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा कि जिन पार्टी कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है, उन्हें दोबारा तैयार किया जाए। ममता ने कहा कि दफ्तरों की मरम्मत कर उन्हें फिर से सक्रिय बनाया जाए। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह खुद भी पार्टी कार्यालयों को पेंट करेंगी। ममता ने भरोसा जताया कि तृणमूल कांग्रेस मुश्किल हालात के बावजूद झुकेगी नहीं और एक बार फिर मजबूती से वापसी करेगी।

    सोशल मीडिया पर दिखी एकजुटता
    बैठक के बाद टीएमसी के आधिकारिक एक्स (X) अकाउंट से नेताओं की तस्वीरें साझा की गईं। पोस्ट में कहा गया कि पार्टी के उम्मीदवारों ने दबाव और धमकियों के बावजूद साहस के साथ चुनाव लड़ा। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस एक परिवार की तरह एकजुट है और जनता के जनादेश की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

    चुनाव में TMC को बड़ा झटका
    हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। 294 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। टीएमसी ने 291 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 211 उम्मीदवार हार गए। हारने वालों में कई बड़े नेता और मंत्री भी शामिल रहे। सबसे बड़ा झटका खुद ममता बनर्जी को लगा, जो अपने गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं।

    ‘जनादेश लूटा गया’
    चुनावी हार की समीक्षा के दौरान ममता बनर्जी ने नतीजों पर सवाल भी उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता के जनादेश को “लूटा” और “चुराया” गया है। टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि पार्टी इस हार के बाद संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने की दिशा में काम करेगी।