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  • TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ

    TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) में हुए विद्रोह में टीएमसी (TMC) के अल्पसंख्यक विधायक (Minority MLA) भी पीछे नहीं हैं. इन विधायकों ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee .) की बजाय ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के साथ जाना ज्यादा बेहतर समझा है. मुर्शिदाबाद में TMC के जो 9 विधायक जीते थे उनमें से 8 ने ममता का साथ छोड़ दिया है और ऋतब्रत बनर्जी का दामन थाम लिया है।

    इस सूची में तृणमूल कांग्रेस के लंबे समय से विश्वसनीय और वरिष्ठ नेता जावेद खान के साथ-साथ काजल शेख जैसे प्रभावशाली नेता भी शामिल हैं। बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने इन मुस्लिम विधायकों को बगावत का भरपूर इनाम दिया है. बागियों में शामिल जावेद खान को विधानसभा में विपक्ष का उपनेता बनाया गया है. वहीं दूसरी ओर अखुरुज्जमां को चीफ व्हिप बनाया गया है।


    तृणमूल की ‘टूट’ बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद

    एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले मंत्रिमंडल के चार अल्पसंख्यक मंत्री भी आंदोलनकारी विधायकों के इस समूह में शामिल हैं. ये विधायक हैं- जावेद खान, सबीना यास्मीन, गुलाम रब्बानी और अखरूजमां।

    तृणमूल के आंदोलनकारी खेमे के जिन अल्पसंख्यक विधायकों के नाम अब तक सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं – जावेद खान, अखरूजमां, काजल शेख, गुलाम रब्बानी, डॉ. मोशर्रफ हुसैन, इमानी बिस्वास, नियामत शेख, रेयात हुसैन, गुलशन मल्लिक, तौसीफुर रहमान, मुस्तफिजुर रहमान, बहारुल इस्लाम।

    लेकिन कुल आंकड़ा कही ज्यादा है. रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल के टिकट पर चुनाव जीतने वाले 34 मुस्लिम विधायकों में से 17 बागी खेमे में शामिल हो गए हैं।

    सबसे खास बात यह है कि मुर्शिदाबाद के 9 अल्पसंख्यक विधायकों में से 8 ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में शामिल हो गए हैं. अखरुजमां कहते हैं, ‘मुर्शिदाबाद जिले के 9 विधायकों में से 8 ने हमारा समर्थन किया है. हमने पार्टी के बहुमत के साथ खड़े रहने का फैसला किया है.’ केवल नव निर्वाचित विधायक और शिक्षाविद बाबर अली (जलंगी विधायक) ने ही पार्टी नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    रघुनाथगंज के विधायक अख्रुज्जमां को इस ‘विद्रोह’ के सूत्रधारों में से एक माना जा रहा है. अखरूजमां ने 2018 में कांग्रेस छोड़ दी थी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे, तब शुभेंदु अधिकारी मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के पर्यवेक्षक थे. इस बार वे ऋतब्रता के साथ आए हैं. जिले के दूसरे विधायकों शमशेरगंज के नूर आलम, सुती विधायक इमानी बिस्वास, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन सरकार और हरिहरपारा के नियामत शेख तथा भरतपुर के विधायकों मुस्तफिजुर रहमान।

    आंकड़ों के अनुसार 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने मुर्शिदाबाद जिले की 22 सीटों में से 20 सीटें जीती थीं. तृणमूल कांग्रेस के सुनहरे दिनों में जब अभिषेक बनर्जी या ममता बनर्जी कोलकाता में बैठक बुलाते थे तो मुर्शिदाबाद जिले से बुलाए गए सभी विधायक लगभग एक दिन पहले ही कोलकाता में होटल बुक कर लेते थे, ताकि वे समय पर बैठक में पहुंच सकें और पीछे की पंक्ति में न बैठना पड़े. लेकिन इस विधानसभा चुनाव के बाद स्थिति बदल गई है।

    पिछले रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर पर हुई तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में ये विधायक नजर नहीं आए. 2011 से ही मुस्लिम बड़ी संख्या में तृणमूल को वोट देते आ रहे हैं. ममता बनर्जी को लगता था कि मुस्लिम उनके स्थायी वोट बैंक रहेंगे. लेकिन इस चुनाव में पूरी तस्वीर बदल गई है।

  • पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs

    पश्चिम बंगालः टूट की कगार पर ममता बनर्जी की पार्टी TMC…. अलग गुट बनाने चले 60 MLAs


    कोलकाता।
    ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) टूट की कगार पर है। अटकलें हैं कि पार्टी के दो फाड़ हो सकते हैं और करीब 60 विधायक ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) को समर्थन देने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। संभावनाएं हैं कि बुधवार को विधायक एकजुट होकर पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर को समर्थन पत्र सौंप सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो पार्टी 60 और 20 के गुट में बंट जाएगी और ममता बनर्जी गुट से विपक्ष का दर्ज भी छिन जाएगा।

    कथित नए गुट के सदस्यों ने 80 में से 60 टीएमसी विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया है। एक नेता ने अखबार से कहा, ‘मान्यता पाने के लिए हमारा पत्र तैयार है, क्योंकि असली टीएमसी तैयार है। हम बुधवार को बंगाल विधानसभा स्पीकर रतींद्रनाथ बोस को पत्र सौंप देंगे।’ कहा जा रहा है कि ये सभी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन दे रहे हैं।


    पश्चिम बंगाल के मंत्री ने बढ़ाई चर्चा

    पश्चिम बंगाल के मंत्री तापस रॉय ने मंगलवार को दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस में महाराष्ट्र जैसी टूट होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।रॉय ने दावा किया कि तृणमूल ने कई ऐसे लोगों को शामिल किया, जिनका राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं था। उन्होंने दावा किया कि अब पार्टी के अंदरूनी मतभेद और अंतर्विरोध सतह पर दिखाई देने लगे हैं।


    ऋतब्रत बनर्जी विधायकों से मिले

    विधानसभा परिसर से बाहर आने के बाद पत्रकारों से बातचीत में ऋतब्रत बनर्जी ने स्वीकार किया कि उनकी मुलाकात विधायक हॉस्टल में कुछ विधायकों से हुई और उनके साथ मुरमुरा खाया था। बनर्जी ने कहा कि वह ‘एक-एक दिन के हिसाब से आगे बढ़ने’ में विश्वास रखते हैं। उन्होंने 50 से ज्यादा विधायकों के उनके साथ आने की अटकलों पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

    उन्होंने दावा किया कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता निर्वाचित करने संबंधी कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। बनर्जी के अनुसार, जिस कागज पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे, वह महज उपस्थिति दर्ज करने के लिए था। टीएमसी ने ऋतब्रत समेत दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था।


    विरोध प्रदर्शन में नहीं पहुंचे सांसद और विधायक

    ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद मंगलवार को पहली बड़ी राजनीतिक लामबंदी की, लेकिन एस्प्लेनेड के वाई-चैनल पर आयोजित धरना कार्यक्रम में कम भीड़ और कई सांसदों-विधायकों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय रही। बनर्जी के विरोध प्रदर्शन के लिए वाई-चैनल के बस अड्डे के करीब एक धरना मंच तैयार किया गया था।

    यहां चंद्रिमा भट्टाचार्य, शोभनदेब चट्टोपाध्याय, डेरेक ओ’ब्रायन, फिरहाद हकीम और अन्य वरिष्ठ नेता बनर्जी के साथ मौजूद रहे, लेकिन बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर असंतोष की अटकलों को और बल दिया।

  • फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें

    फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत ने जहां विपक्षी खेमे को उत्साहित किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कई सवाल छोड़ गया है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी और आरोपों का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस अप्रत्याशित परिणाम के लिए अपने ही उम्मीदवार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    Mamata Banerjee के करीबी माने जाने वाले सांसद Sougata Roy ने चुनाव परिणाम के बाद तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को मिली हार केवल चुनावी रणनीति की कमी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे आंतरिक परिस्थितियों ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी उम्मीदवार जहांगीर खान के फैसलों ने संगठन को नुकसान पहुंचाया और अंतिम समय में पैदा हुई परिस्थितियों के कारण पार्टी प्रभावी ढंग से चुनावी रणनीति नहीं बना सकी।

    फाल्टा सीट पर चुनावी मुकाबला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और इस सीट को प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन परिणाम सामने आने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार देबांगशु पांडा ने भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी। उनकी जीत केवल एक सीट का परिणाम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य के राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। चुनावी आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया क्योंकि पार्टी उम्मीदवार अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सके। यह स्थिति पार्टी के लिए और भी असहज इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि संगठन को इतना कमजोर चुनावी परिणाम झेलना पड़ा। इस नतीजे ने पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक मजबूती और आंतरिक एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उपचुनाव अक्सर बड़े चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेत देते हैं। ऐसे में फाल्टा का परिणाम आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर डाल सकता है। भाजपा इस जीत को अपने बढ़ते जनाधार के संकेत के रूप में देख रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपनी रणनीति और संगठन दोनों को लेकर गंभीर समीक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनावी झटका राज्य की राजनीति में किस तरह के नए समीकरण पैदा करता है।

  • बंगाल में TMC पर बड़ा एक्शन: ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों से मचा हड़कंप, कई नेता जांच के घेरे में

    बंगाल में TMC पर बड़ा एक्शन: ताबड़तोड़ गिरफ्तारियों से मचा हड़कंप, कई नेता जांच के घेरे में



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा बवाल मचा हुआ है। राज्य में चल रही कार्रवाई के तहत तृणमूल कांग्रेस (Mamata Banerjee) की पार्टी All India Trinamool Congress के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार, हिंसा और अवैध गतिविधियों के गंभीर आरोपों के चलते लगातार गिरफ्तारियां हो रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है।

    हाई-प्रोफाइल नेताओं पर कार्रवाई
    इस कार्रवाई के तहत पूर्व राज्य मंत्री और TMC नेता Sujit Bose को नगरपालिका भर्ती घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया है। वहीं, संदेशखाली विवाद से जुड़े नेता Sheikh Shahjahan भी गंभीर आरोपों के चलते जांच के दायरे में हैं।

    पंचायत और स्थानीय स्तर पर भी शिकंजा
    सिर्फ बड़े नेताओं तक ही नहीं, बल्कि पंचायत और जिला स्तर पर भी कार्रवाई तेज है। कई पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय पदाधिकारियों पर वित्तीय अनियमितताओं, रंगदारी और अवैध हथियार रखने जैसे आरोप लगाए गए हैं। कई मामलों में गिरफ्तारियां भी हुई हैं, जिससे प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ गई है।

    हिंसा और रंगदारी के आरोप
    कुछ नेताओं पर राजनीतिक विरोधियों पर हमले, धमकी और जबरन वसूली जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। इन मामलों की जांच राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही है।

    फरार और जांच के घेरे में नेता
    इस कार्रवाई के बीच कुछ नेता या तो फरार बताए जा रहे हैं या फिर पूछताछ के लिए तलाश में हैं। पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और कई जगहों पर निगरानी बढ़ा दी गई है।

    जनता का विरोध और तनाव
    राज्य के कई इलाकों में गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। कुछ जगहों पर स्थानीय लोगों द्वारा विरोध दर्ज कराया जा रहा है, जिससे जमीनी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।

    फिलहाल यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव और सत्ता-संघर्ष की ओर इशारा कर रहा है, और आने वाले दिनों में इस पर और राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

  • बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार

    बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा सीट को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मतदान से ठीक पहले पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से हटने का फैसला कर सभी को चौंका दिया है। इस अचानक हुए घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर हलचल पैदा कर दी है, बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल में भी चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है।

    फाल्टा सीट पर पहले हुए मतदान के दौरान कथित अनियमितताओं और धांधली के आरोप सामने आए थे, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया को रद्द कर दोबारा मतदान कराने का निर्णय लिया गया था। दोबारा मतदान की तारीख तय होने के बाद सभी दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी थीं, लेकिन अंतिम समय में TMC उम्मीदवार का पीछे हटना एक अप्रत्याशित राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है।

    जहांगीर खान अपने प्रचार अभियान के दौरान अपने अलग अंदाज और बयानों को लेकर काफी चर्चा में रहे थे। उनके वायरल प्रचार स्टाइल और आत्मविश्वास भरे बयानों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। लेकिन चुनाव से महज कुछ दिन पहले उनके मैदान छोड़ने के फैसले ने सभी राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है और विपक्ष को भी इस पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ इसे व्यक्तिगत कारणों से लिया गया फैसला बता रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि राजनीतिक और कानूनी दबाव ने इस स्थिति को जन्म दिया है। हालांकि आधिकारिक तौर पर उम्मीदवार की ओर से अपना नाम वापस लेने की पुष्टि की गई है, लेकिन इसके पीछे की पूरी वजह अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

    इस बीच यह भी चर्चा में है कि फाल्टा सीट पर पहले चरण के मतदान के दौरान कई बूथों पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराई और फिर दोबारा मतदान का आदेश दिया। इसी पृष्ठभूमि में यह नया घटनाक्रम राजनीतिक महत्व और बढ़ा देता है।

    कुल मिलाकर फाल्टा विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है। मतदान से ठीक पहले उम्मीदवार का हटना न केवल सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन गया है, बल्कि आने वाले दिनों में इस सीट के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल सकता है।

  • चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे

    चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे



    कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी अब पार्टी को नए सिरे से मजबूत करने में जुट गई हैं। चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी उम्मीदवारों के साथ अहम समीक्षा बैठक की। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी मौजूद रहे।

    पार्टी में बढ़ती अंदरूनी हलचल और नेताओं के पाला बदलने की अटकलों के बीच ममता बनर्जी ने साफ संदेश दिया कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं।

    ‘जिसे जाना है जाए, मैं नहीं रोकूंगी’
    बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने दो टूक कहा कि वे किसी को भी जबरदस्ती पार्टी में बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। मैं पार्टी को फिर से खड़ा करूंगी।”

    उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा कि जिन पार्टी कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है, उन्हें दोबारा तैयार किया जाए। ममता ने कहा कि दफ्तरों की मरम्मत कर उन्हें फिर से सक्रिय बनाया जाए। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह खुद भी पार्टी कार्यालयों को पेंट करेंगी। ममता ने भरोसा जताया कि तृणमूल कांग्रेस मुश्किल हालात के बावजूद झुकेगी नहीं और एक बार फिर मजबूती से वापसी करेगी।

    सोशल मीडिया पर दिखी एकजुटता
    बैठक के बाद टीएमसी के आधिकारिक एक्स (X) अकाउंट से नेताओं की तस्वीरें साझा की गईं। पोस्ट में कहा गया कि पार्टी के उम्मीदवारों ने दबाव और धमकियों के बावजूद साहस के साथ चुनाव लड़ा। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस एक परिवार की तरह एकजुट है और जनता के जनादेश की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

    चुनाव में TMC को बड़ा झटका
    हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। 294 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। टीएमसी ने 291 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 211 उम्मीदवार हार गए। हारने वालों में कई बड़े नेता और मंत्री भी शामिल रहे। सबसे बड़ा झटका खुद ममता बनर्जी को लगा, जो अपने गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं।

    ‘जनादेश लूटा गया’
    चुनावी हार की समीक्षा के दौरान ममता बनर्जी ने नतीजों पर सवाल भी उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता के जनादेश को “लूटा” और “चुराया” गया है। टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि पार्टी इस हार के बाद संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने की दिशा में काम करेगी।

  • बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को ही क्यों चुना बंगाल का मुख्‍यमंत्री ? जाने किन कारणों से लेना पड़ा फैसला

    बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को ही क्यों चुना बंगाल का मुख्‍यमंत्री ? जाने किन कारणों से लेना पड़ा फैसला

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर करते हुए बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना है। कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी और टीएमसी के मजबूत रणनीतिकार माने जाने वाले शुभेंदु अब बीजेपी का सबसे बड़ा बंगाली चेहरा बनकर उभरे हैं। विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 293 में से 207 सीटों पर जीत मिली है, जबकि एक सीट पर मतदान 21 मई को होना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी की जमीनी पकड़, टीएमसी की अंदरूनी रणनीति की समझ और हिंदुत्व के मुद्दों पर उनकी आक्रामक छवि ने उन्हें इस पद तक पहुंचाया है।

    ममता बनर्जी को उनके गढ़ में दी चुनौती

    शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में खुद को उस नेता के रूप में स्थापित किया, जो सीधे ममता बनर्जी को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने नंदीग्राम सीट पर 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को हराया था। बाद में ममता को भवानीपुर सीट से चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को उसके मजबूत गढ़ में हराना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और इसी ने शुभेंदु को बीजेपी के लिए सबसे मजबूत विकल्प बना दिया।

    बीजेपी के एजेंडे के लिए फिट चेहरा

    विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी को बंगाल में ऐसा नेता चाहिए था, जो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की तरह आक्रामक और संगठनात्मक रूप से मजबूत हो। पार्टी पहले ही यह संकेत दे चुकी थी कि बंगाल का मुख्यमंत्री ऐसा व्यक्ति होगा, जिसका राज्य से गहरा जुड़ाव हो। बीजेपी ने चुनावी घोषणापत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी थी। ऐसे में शुभेंदु अधिकारी पार्टी की रणनीति के अनुरूप सबसे उपयुक्त चेहरे के तौर पर सामने आए।

    प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव भी बना आधार

    शुभेंदु अधिकारी को सरकार चलाने का अनुभव भी है। टीएमसी सरकार में वह मंत्री रह चुके हैं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को करीब से समझते हैं। बीजेपी नेताओं का मानना है कि नई सरकार बनने के बाद वे ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल को लेकर श्वेतपत्र जारी कर सकते हैं और विभिन्न मामलों की जांच के लिए आयोग भी गठित किया जा सकता है।

    हिंदुत्व की छवि से RSS का समर्थन

    राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, शुभेंदु अधिकारी की हिंदुत्व समर्थक छवि भी उनके पक्ष में गई। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज उठाई थी। नंदीग्राम क्षेत्र में उन्हें हिंदुत्व के मजबूत चेहरे के तौर पर पेश किया गया। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर भी उन्हें लेकर सकारात्मक रुख बताया जा रहा है।

    छात्र राजनीति से बंगाल की सत्ता तक का सफर

    शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली नेता माने जाते थे। शुभेंदु ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस की छात्र इकाई से की थी। बाद में, जब बंगाल में वामपंथ का दबदबा था, तब उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। पूर्व मेदिनीपुर में उन्होंने वाम दलों को कड़ी चुनौती दी। वर्ष 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और इसके बाद से वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली बंगाली नेताओं में शामिल हो गए।

  • ममता बनर्जी से मुलाकात में अखिलेश यादव का बड़ा बयान, बोले-दीदी आप हारी नहीं हैं, आपको हराया गया है

    ममता बनर्जी से मुलाकात में अखिलेश यादव का बड़ा बयान, बोले-दीदी आप हारी नहीं हैं, आपको हराया गया है

    नई दिल्ली।
    पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी की हार के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। इसी बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव कोलकाता पहुंचे, जहां उन्होंने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी से मुलाकात की। यह मुलाकात राजनीतिक तौर पर काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसे विपक्षी एकजुटता को फिर से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

    मुलाकात के दौरान माहौल काफी भावनात्मक और सौहार्दपूर्ण बताया गया। सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि यह चुनावी परिणाम उनकी हार नहीं है, बल्कि उन्हें हराया गया है। उनके इस बयान को विपक्षी राजनीति में एक बड़े समर्थन संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। इसी मुलाकात में अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी के बीच भी गर्मजोशी देखने को मिली, जहां दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाया।

    बताया जा रहा है कि बैठक के दौरान तीनों नेताओं के बीच चुनावी स्थिति, राजनीतिक हालात और आगे की रणनीति को लेकर चर्चा हुई। ममता बनर्जी ने हाल के चुनाव परिणामों और राज्य की राजनीतिक स्थिति को लेकर अपनी बात रखी, वहीं अखिलेश यादव ने टीएमसी के संघर्ष और चुनावी लड़ाई की सराहना की।

    इस मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब भी चुनाव निष्पक्ष होते हैं, तब ममता बनर्जी को जनता का समर्थन मिलता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई तरह की अनियमितताओं की बातें सामने आई हैं, जिसने परिणामों को प्रभावित किया है। उनके अनुसार, विपक्षी दलों को एकजुट होकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी।

    सूत्रों के अनुसार, यह भी चर्चा हुई कि चुनाव के बाद की स्थिति और राजनीतिक दबावों को लेकर कानूनी और संगठनात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। अभिषेक बनर्जी ने भी बैठक में पार्टी कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने और जनता के बीच सक्रिय रहने की सलाह दी।

    इस पूरी राजनीतिक हलचल के बीच यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल के समय में विपक्षी दलों के बीच संपर्क और संवाद बढ़ा है। इससे पहले भी कई विपक्षी नेता ममता बनर्जी से संपर्क कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि चुनावी हार के बाद भी राजनीतिक समीकरणों को फिर से साधने की कोशिशें जारी हैं।

     कोलकाता में हुई यह मुलाकात केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि इसे आने वाले समय में विपक्षी राजनीति की दिशा तय करने वाले एक अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है।

  • शुभेंदु अधिकारी को नजरअंदाज करना BJP के लिए मुश्किल, बंगाल में मुख्यमंत्री चयन पर बढ़ा सस्पेंस

    शुभेंदु अधिकारी को नजरअंदाज करना BJP के लिए मुश्किल, बंगाल में मुख्यमंत्री चयन पर बढ़ा सस्पेंस

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची भारतीय जनता पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस बीच पार्टी नेतृत्व में नाम को लेकर गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है और जल्द ही अंतिम फैसला होने की संभावना है।

    सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गुरुवार को कोलकाता पहुंचने की संभावना है, जबकि शुक्रवार शाम भाजपा विधायक दल की अहम बैठक प्रस्तावित है, जिसमें राज्य के नए मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसी बीच शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या की घटना ने राज्य की राजनीति में तनाव और बढ़ा दिया है।

    सीएम पद की रेस में कई चेहरे
    मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा चल रही है। राजनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि ममता बनर्जी के विकल्प के तौर पर किसी महिला चेहरे को आगे लाने पर विचार हो सकता है, जिसमें अग्निमित्रा पॉल और रूपा गांगुली के नाम शामिल हैं। इसके अलावा संगठनात्मक अनुभव के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि इन सभी के बीच सबसे ज्यादा चर्चा और कार्यकर्ताओं का झुकाव शुभेंदु अधिकारी की ओर देखा जा रहा है।

    शुभेंदु अधिकारी क्यों हैं सबसे मजबूत दावेदार?
    शुभेंदु अधिकारी को भाजपा की चुनावी सफलता का अहम चेहरा माना जा रहा है। 2021 में नंदीग्राम में और बाद में भवानीपुर जैसे हाई-प्रोफाइल मुकाबलों में उन्होंने सत्ताधारी टीएमसी नेतृत्व को कड़ी चुनौती दी। पूर्व में तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार रह चुके शुभेंदु को राज्य की राजनीति की गहरी समझ रखने वाला नेता माना जाता है। 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने संगठन को जमीन पर मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।

    कार्यकर्ताओं की पहली पसंद
    पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, जमीनी कार्यकर्ता शुभेंदु अधिकारी को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। उनका मानना है कि उन्होंने लगातार टीएमसी के खिलाफ संघर्ष किया और राज्य में भाजपा को मजबूत पहचान दिलाई।

    नजरअंदाज करने के संभावित खतरे
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा नेतृत्व शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री नहीं बनाता है तो इसका असर संगठन पर पड़ सकता है। इससे उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर सकता है जिन्होंने चुनाव में कड़ी मेहनत की है। साथ ही, शुभेंदु का प्रशासनिक अनुभव, क्योंकि वे पहले राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं, नए शासन संचालन में बेहद अहम माना जा रहा है।

    क्या भाजपा करेगी सरप्राइज फैसला?
    भाजपा का इतिहास रहा है कि वह कई बार अप्रत्याशित फैसले लेकर सभी को चौंकाती है। ऐसे में शमिक भट्टाचार्य या अग्निमित्रा पॉल जैसे नामों को भी अंतिम क्षण में आगे किया जा सकता है। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या भाजपा शुभेंदु अधिकारी पर भरोसा जताएगी या फिर कोई नया चेहरा सामने लाकर सबको चौंका देगी?

  • मनोज तिवारी का ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले- ‘खेल मंत्री होकर भी सिर्फ चाय-बिस्किट तक सीमित रहा काम’

    मनोज तिवारी का ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले- ‘खेल मंत्री होकर भी सिर्फ चाय-बिस्किट तक सीमित रहा काम’

    नई दिल्ली। पूर्व क्रिकेटर और पश्चिम बंगाल के पूर्व खेल मंत्री मनोज तिवारी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में उन्होंने दावा किया कि खेल मंत्री रहते हुए उन्हें पिछले पांच वर्षों तक सही तरीके से काम नहीं करने दिया गया।

    मनोज तिवारी ने सीधे तौर पर टीएमसी नेता और पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास को निशाने पर लेते हुए कहा कि उनकी लोकप्रियता और छवि से डरकर उन्हें लगातार अलग-थलग रखा गया। उन्होंने कहा कि खेल विभाग में उनकी भूमिका केवल “चाय और बिस्किट खाने” तक सीमित कर दी गई थी।

    ‘कार्यक्रमों में भी नहीं बुलाया गया’
    तिवारी ने आरोप लगाया कि उन्हें खेल विभाग के कई अहम कार्यक्रमों से दूर रखा गया। उन्होंने कहा कि डूरंड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में मैदान पर मौजूद रहने के बावजूद उन्हें आधिकारिक निमंत्रण तक नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, इसके पीछे अरूप बिस्वास की राजनीतिक सोच काम कर रही थी।

    मेसी के कार्यक्रम को लेकर भी साधा निशाना
    पूर्व मंत्री ने लियोनेल मेसी से जुड़े एक कार्यक्रम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह उस आयोजन में इसलिए शामिल नहीं हुए क्योंकि उन्हें पहले से अंदेशा था कि वहां उन्हें अपमानित किया जा सकता है। तिवारी ने दावा किया कि आयोजन के दौरान खेल प्रेमियों को भी निराशा हाथ लगी और मेसी कुछ ही मिनटों में कार्यक्रम छोड़कर चले गए।

    ‘सरकार जनता नहीं, अपने हितों के लिए काम कर रही थी’
    मनोज तिवारी ने कहा कि उन्होंने खेल और शिवपुर के विकास से जुड़े कई मुद्दे कैबिनेट बैठकों में उठाए, लेकिन उनकी बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने राज्य सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार की सोच बेहद संकीर्ण थी और उसका फोकस जनता की बजाय अपने राजनीतिक हितों पर ज्यादा था।

    ममता बनर्जी को लेकर भी कही बड़ी बात
    तिवारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लेते हुए कहा कि एक बार जब उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की तो मुख्यमंत्री ने उनसे कहा, “क्या मेरे पास और कोई काम नहीं है?” तिवारी के अनुसार, उन्हें अपनी बात रखने के लिए 20 सेकंड का समय भी नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि उसी दिन उन्हें एहसास हो गया था कि यह सरकार लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है, क्योंकि इसकी नींव “झूठे वादों” पर टिकी हुई है।

    मनोज तिवारी का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में खेल प्रशासन और राजनीतिक खींचतान को लेकर लगातार बहस चल रही है। उनके आरोपों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।