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  • बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार

    बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, फाल्टा सीट पर TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने से किया इनकार


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा सीट को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मतदान से ठीक पहले पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से हटने का फैसला कर सभी को चौंका दिया है। इस अचानक हुए घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर हलचल पैदा कर दी है, बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल में भी चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है।

    फाल्टा सीट पर पहले हुए मतदान के दौरान कथित अनियमितताओं और धांधली के आरोप सामने आए थे, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया को रद्द कर दोबारा मतदान कराने का निर्णय लिया गया था। दोबारा मतदान की तारीख तय होने के बाद सभी दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी थीं, लेकिन अंतिम समय में TMC उम्मीदवार का पीछे हटना एक अप्रत्याशित राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है।

    जहांगीर खान अपने प्रचार अभियान के दौरान अपने अलग अंदाज और बयानों को लेकर काफी चर्चा में रहे थे। उनके वायरल प्रचार स्टाइल और आत्मविश्वास भरे बयानों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। लेकिन चुनाव से महज कुछ दिन पहले उनके मैदान छोड़ने के फैसले ने सभी राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है और विपक्ष को भी इस पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ इसे व्यक्तिगत कारणों से लिया गया फैसला बता रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि राजनीतिक और कानूनी दबाव ने इस स्थिति को जन्म दिया है। हालांकि आधिकारिक तौर पर उम्मीदवार की ओर से अपना नाम वापस लेने की पुष्टि की गई है, लेकिन इसके पीछे की पूरी वजह अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है।

    इस बीच यह भी चर्चा में है कि फाल्टा सीट पर पहले चरण के मतदान के दौरान कई बूथों पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराई और फिर दोबारा मतदान का आदेश दिया। इसी पृष्ठभूमि में यह नया घटनाक्रम राजनीतिक महत्व और बढ़ा देता है।

    कुल मिलाकर फाल्टा विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है। मतदान से ठीक पहले उम्मीदवार का हटना न केवल सत्ताधारी दल के लिए चुनौती बन गया है, बल्कि आने वाले दिनों में इस सीट के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह बदल सकता है।

  • चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे

    चुनावी हार के बाद ममता का बड़ा संदेश, बोलीं- जिसे जाना है जाए, TMC को फिर से खड़ा करेंगे



    कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी अब पार्टी को नए सिरे से मजबूत करने में जुट गई हैं। चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी उम्मीदवारों के साथ अहम समीक्षा बैठक की। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी मौजूद रहे।

    पार्टी में बढ़ती अंदरूनी हलचल और नेताओं के पाला बदलने की अटकलों के बीच ममता बनर्जी ने साफ संदेश दिया कि जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा कर सकते हैं।

    ‘जिसे जाना है जाए, मैं नहीं रोकूंगी’
    बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने दो टूक कहा कि वे किसी को भी जबरदस्ती पार्टी में बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। मैं पार्टी को फिर से खड़ा करूंगी।”

    उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा कि जिन पार्टी कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है, उन्हें दोबारा तैयार किया जाए। ममता ने कहा कि दफ्तरों की मरम्मत कर उन्हें फिर से सक्रिय बनाया जाए। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह खुद भी पार्टी कार्यालयों को पेंट करेंगी। ममता ने भरोसा जताया कि तृणमूल कांग्रेस मुश्किल हालात के बावजूद झुकेगी नहीं और एक बार फिर मजबूती से वापसी करेगी।

    सोशल मीडिया पर दिखी एकजुटता
    बैठक के बाद टीएमसी के आधिकारिक एक्स (X) अकाउंट से नेताओं की तस्वीरें साझा की गईं। पोस्ट में कहा गया कि पार्टी के उम्मीदवारों ने दबाव और धमकियों के बावजूद साहस के साथ चुनाव लड़ा। पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस एक परिवार की तरह एकजुट है और जनता के जनादेश की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

    चुनाव में TMC को बड़ा झटका
    हालिया विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। 294 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। टीएमसी ने 291 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 211 उम्मीदवार हार गए। हारने वालों में कई बड़े नेता और मंत्री भी शामिल रहे। सबसे बड़ा झटका खुद ममता बनर्जी को लगा, जो अपने गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर सीट से चुनाव हार गईं।

    ‘जनादेश लूटा गया’
    चुनावी हार की समीक्षा के दौरान ममता बनर्जी ने नतीजों पर सवाल भी उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता के जनादेश को “लूटा” और “चुराया” गया है। टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि पार्टी इस हार के बाद संगठन को नए सिरे से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने की दिशा में काम करेगी।

  • बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को ही क्यों चुना बंगाल का मुख्‍यमंत्री ? जाने किन कारणों से लेना पड़ा फैसला

    बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को ही क्यों चुना बंगाल का मुख्‍यमंत्री ? जाने किन कारणों से लेना पड़ा फैसला

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर करते हुए बीजेपी ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना है। कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी और टीएमसी के मजबूत रणनीतिकार माने जाने वाले शुभेंदु अब बीजेपी का सबसे बड़ा बंगाली चेहरा बनकर उभरे हैं। विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 293 में से 207 सीटों पर जीत मिली है, जबकि एक सीट पर मतदान 21 मई को होना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी की जमीनी पकड़, टीएमसी की अंदरूनी रणनीति की समझ और हिंदुत्व के मुद्दों पर उनकी आक्रामक छवि ने उन्हें इस पद तक पहुंचाया है।

    ममता बनर्जी को उनके गढ़ में दी चुनौती

    शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में खुद को उस नेता के रूप में स्थापित किया, जो सीधे ममता बनर्जी को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने नंदीग्राम सीट पर 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को हराया था। बाद में ममता को भवानीपुर सीट से चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को उसके मजबूत गढ़ में हराना बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और इसी ने शुभेंदु को बीजेपी के लिए सबसे मजबूत विकल्प बना दिया।

    बीजेपी के एजेंडे के लिए फिट चेहरा

    विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी को बंगाल में ऐसा नेता चाहिए था, जो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की तरह आक्रामक और संगठनात्मक रूप से मजबूत हो। पार्टी पहले ही यह संकेत दे चुकी थी कि बंगाल का मुख्यमंत्री ऐसा व्यक्ति होगा, जिसका राज्य से गहरा जुड़ाव हो। बीजेपी ने चुनावी घोषणापत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने और बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी थी। ऐसे में शुभेंदु अधिकारी पार्टी की रणनीति के अनुरूप सबसे उपयुक्त चेहरे के तौर पर सामने आए।

    प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव भी बना आधार

    शुभेंदु अधिकारी को सरकार चलाने का अनुभव भी है। टीएमसी सरकार में वह मंत्री रह चुके हैं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को करीब से समझते हैं। बीजेपी नेताओं का मानना है कि नई सरकार बनने के बाद वे ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल को लेकर श्वेतपत्र जारी कर सकते हैं और विभिन्न मामलों की जांच के लिए आयोग भी गठित किया जा सकता है।

    हिंदुत्व की छवि से RSS का समर्थन

    राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, शुभेंदु अधिकारी की हिंदुत्व समर्थक छवि भी उनके पक्ष में गई। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज उठाई थी। नंदीग्राम क्षेत्र में उन्हें हिंदुत्व के मजबूत चेहरे के तौर पर पेश किया गया। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर भी उन्हें लेकर सकारात्मक रुख बताया जा रहा है।

    छात्र राजनीति से बंगाल की सत्ता तक का सफर

    शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली नेता माने जाते थे। शुभेंदु ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस की छात्र इकाई से की थी। बाद में, जब बंगाल में वामपंथ का दबदबा था, तब उन्होंने ममता बनर्जी के साथ मिलकर टीएमसी को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। पूर्व मेदिनीपुर में उन्होंने वाम दलों को कड़ी चुनौती दी। वर्ष 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और इसके बाद से वे पार्टी के सबसे प्रभावशाली बंगाली नेताओं में शामिल हो गए।

  • ममता बनर्जी से मुलाकात में अखिलेश यादव का बड़ा बयान, बोले-दीदी आप हारी नहीं हैं, आपको हराया गया है

    ममता बनर्जी से मुलाकात में अखिलेश यादव का बड़ा बयान, बोले-दीदी आप हारी नहीं हैं, आपको हराया गया है

    नई दिल्ली।
    पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी की हार के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। इसी बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव कोलकाता पहुंचे, जहां उन्होंने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी से मुलाकात की। यह मुलाकात राजनीतिक तौर पर काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसे विपक्षी एकजुटता को फिर से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

    मुलाकात के दौरान माहौल काफी भावनात्मक और सौहार्दपूर्ण बताया गया। सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि यह चुनावी परिणाम उनकी हार नहीं है, बल्कि उन्हें हराया गया है। उनके इस बयान को विपक्षी राजनीति में एक बड़े समर्थन संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। इसी मुलाकात में अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी के बीच भी गर्मजोशी देखने को मिली, जहां दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाया।

    बताया जा रहा है कि बैठक के दौरान तीनों नेताओं के बीच चुनावी स्थिति, राजनीतिक हालात और आगे की रणनीति को लेकर चर्चा हुई। ममता बनर्जी ने हाल के चुनाव परिणामों और राज्य की राजनीतिक स्थिति को लेकर अपनी बात रखी, वहीं अखिलेश यादव ने टीएमसी के संघर्ष और चुनावी लड़ाई की सराहना की।

    इस मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब भी चुनाव निष्पक्ष होते हैं, तब ममता बनर्जी को जनता का समर्थन मिलता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई तरह की अनियमितताओं की बातें सामने आई हैं, जिसने परिणामों को प्रभावित किया है। उनके अनुसार, विपक्षी दलों को एकजुट होकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी।

    सूत्रों के अनुसार, यह भी चर्चा हुई कि चुनाव के बाद की स्थिति और राजनीतिक दबावों को लेकर कानूनी और संगठनात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। अभिषेक बनर्जी ने भी बैठक में पार्टी कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने और जनता के बीच सक्रिय रहने की सलाह दी।

    इस पूरी राजनीतिक हलचल के बीच यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल के समय में विपक्षी दलों के बीच संपर्क और संवाद बढ़ा है। इससे पहले भी कई विपक्षी नेता ममता बनर्जी से संपर्क कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि चुनावी हार के बाद भी राजनीतिक समीकरणों को फिर से साधने की कोशिशें जारी हैं।

     कोलकाता में हुई यह मुलाकात केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि इसे आने वाले समय में विपक्षी राजनीति की दिशा तय करने वाले एक अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है।

  • शुभेंदु अधिकारी को नजरअंदाज करना BJP के लिए मुश्किल, बंगाल में मुख्यमंत्री चयन पर बढ़ा सस्पेंस

    शुभेंदु अधिकारी को नजरअंदाज करना BJP के लिए मुश्किल, बंगाल में मुख्यमंत्री चयन पर बढ़ा सस्पेंस

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची भारतीय जनता पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस बीच पार्टी नेतृत्व में नाम को लेकर गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है और जल्द ही अंतिम फैसला होने की संभावना है।

    सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गुरुवार को कोलकाता पहुंचने की संभावना है, जबकि शुक्रवार शाम भाजपा विधायक दल की अहम बैठक प्रस्तावित है, जिसमें राज्य के नए मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसी बीच शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या की घटना ने राज्य की राजनीति में तनाव और बढ़ा दिया है।

    सीएम पद की रेस में कई चेहरे
    मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा चल रही है। राजनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि ममता बनर्जी के विकल्प के तौर पर किसी महिला चेहरे को आगे लाने पर विचार हो सकता है, जिसमें अग्निमित्रा पॉल और रूपा गांगुली के नाम शामिल हैं। इसके अलावा संगठनात्मक अनुभव के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि इन सभी के बीच सबसे ज्यादा चर्चा और कार्यकर्ताओं का झुकाव शुभेंदु अधिकारी की ओर देखा जा रहा है।

    शुभेंदु अधिकारी क्यों हैं सबसे मजबूत दावेदार?
    शुभेंदु अधिकारी को भाजपा की चुनावी सफलता का अहम चेहरा माना जा रहा है। 2021 में नंदीग्राम में और बाद में भवानीपुर जैसे हाई-प्रोफाइल मुकाबलों में उन्होंने सत्ताधारी टीएमसी नेतृत्व को कड़ी चुनौती दी। पूर्व में तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार रह चुके शुभेंदु को राज्य की राजनीति की गहरी समझ रखने वाला नेता माना जाता है। 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने संगठन को जमीन पर मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।

    कार्यकर्ताओं की पहली पसंद
    पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, जमीनी कार्यकर्ता शुभेंदु अधिकारी को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। उनका मानना है कि उन्होंने लगातार टीएमसी के खिलाफ संघर्ष किया और राज्य में भाजपा को मजबूत पहचान दिलाई।

    नजरअंदाज करने के संभावित खतरे
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा नेतृत्व शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री नहीं बनाता है तो इसका असर संगठन पर पड़ सकता है। इससे उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर सकता है जिन्होंने चुनाव में कड़ी मेहनत की है। साथ ही, शुभेंदु का प्रशासनिक अनुभव, क्योंकि वे पहले राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं, नए शासन संचालन में बेहद अहम माना जा रहा है।

    क्या भाजपा करेगी सरप्राइज फैसला?
    भाजपा का इतिहास रहा है कि वह कई बार अप्रत्याशित फैसले लेकर सभी को चौंकाती है। ऐसे में शमिक भट्टाचार्य या अग्निमित्रा पॉल जैसे नामों को भी अंतिम क्षण में आगे किया जा सकता है। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या भाजपा शुभेंदु अधिकारी पर भरोसा जताएगी या फिर कोई नया चेहरा सामने लाकर सबको चौंका देगी?

  • मनोज तिवारी का ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले- ‘खेल मंत्री होकर भी सिर्फ चाय-बिस्किट तक सीमित रहा काम’

    मनोज तिवारी का ममता सरकार पर तीखा हमला, बोले- ‘खेल मंत्री होकर भी सिर्फ चाय-बिस्किट तक सीमित रहा काम’

    नई दिल्ली। पूर्व क्रिकेटर और पश्चिम बंगाल के पूर्व खेल मंत्री मनोज तिवारी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में उन्होंने दावा किया कि खेल मंत्री रहते हुए उन्हें पिछले पांच वर्षों तक सही तरीके से काम नहीं करने दिया गया।

    मनोज तिवारी ने सीधे तौर पर टीएमसी नेता और पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास को निशाने पर लेते हुए कहा कि उनकी लोकप्रियता और छवि से डरकर उन्हें लगातार अलग-थलग रखा गया। उन्होंने कहा कि खेल विभाग में उनकी भूमिका केवल “चाय और बिस्किट खाने” तक सीमित कर दी गई थी।

    ‘कार्यक्रमों में भी नहीं बुलाया गया’
    तिवारी ने आरोप लगाया कि उन्हें खेल विभाग के कई अहम कार्यक्रमों से दूर रखा गया। उन्होंने कहा कि डूरंड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में मैदान पर मौजूद रहने के बावजूद उन्हें आधिकारिक निमंत्रण तक नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, इसके पीछे अरूप बिस्वास की राजनीतिक सोच काम कर रही थी।

    मेसी के कार्यक्रम को लेकर भी साधा निशाना
    पूर्व मंत्री ने लियोनेल मेसी से जुड़े एक कार्यक्रम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह उस आयोजन में इसलिए शामिल नहीं हुए क्योंकि उन्हें पहले से अंदेशा था कि वहां उन्हें अपमानित किया जा सकता है। तिवारी ने दावा किया कि आयोजन के दौरान खेल प्रेमियों को भी निराशा हाथ लगी और मेसी कुछ ही मिनटों में कार्यक्रम छोड़कर चले गए।

    ‘सरकार जनता नहीं, अपने हितों के लिए काम कर रही थी’
    मनोज तिवारी ने कहा कि उन्होंने खेल और शिवपुर के विकास से जुड़े कई मुद्दे कैबिनेट बैठकों में उठाए, लेकिन उनकी बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने राज्य सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार की सोच बेहद संकीर्ण थी और उसका फोकस जनता की बजाय अपने राजनीतिक हितों पर ज्यादा था।

    ममता बनर्जी को लेकर भी कही बड़ी बात
    तिवारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लेते हुए कहा कि एक बार जब उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की तो मुख्यमंत्री ने उनसे कहा, “क्या मेरे पास और कोई काम नहीं है?” तिवारी के अनुसार, उन्हें अपनी बात रखने के लिए 20 सेकंड का समय भी नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि उसी दिन उन्हें एहसास हो गया था कि यह सरकार लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है, क्योंकि इसकी नींव “झूठे वादों” पर टिकी हुई है।

    मनोज तिवारी का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में खेल प्रशासन और राजनीतिक खींचतान को लेकर लगातार बहस चल रही है। उनके आरोपों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

  • उज्जैन में पप्पू यादव का बड़ा हमला: “बंगाल में BJP जीती नहीं, जिताई गई”, चुनाव नतीजों पर उठाए गंभीर सवाल

    उज्जैन में पप्पू यादव का बड़ा हमला: “बंगाल में BJP जीती नहीं, जिताई गई”, चुनाव नतीजों पर उठाए गंभीर सवाल



    नई दिल्ली। उज्जैन में दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों को लेकर बड़ा और विवादित बयान दिया है। महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती में शामिल होने के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव “जीता नहीं, जिताया गया है”। उनके मुताबिक करीब 100 सीटों पर गड़बड़ी कर जीत हासिल की गई और अब भाजपा कार्यकर्ता जश्न मना रहे हैं।

    पप्पू यादव ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया। साथ ही उन्होंने भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि हालात ऐसे थे जैसे युद्ध जैसी स्थिति बना दी गई हो।

    वोटिंग प्रतिशत को लेकर भी उन्होंने गंभीर शंका जताई। उनका कहना था कि एक बूथ पर सीमित समय में जितने वोट पड़ सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा प्रतिशत दर्ज किया गया, जो जांच का विषय है। उन्होंने मांग की कि दोपहर 2 बजे के बाद की सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जाए और सभी सीटों की गिनती सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में दोबारा कराई जाए। उन्होंने कहा कि अगर ममता बनर्जी हारती हैं तो वे जनादेश स्वीकार करेंगे।

    उज्जैन प्रवास के दौरान पप्पू यादव ने महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन कर देश में शांति और मानवता की रक्षा के लिए प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि दुनिया युद्ध की ओर बढ़ रही है और ऐसे समय में नफरत नहीं, बल्कि प्रेम और एकता की जरूरत है। उन्होंने नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर में भी पूजा-अर्चना की।

    राजनीतिक बयानबाजी के बीच पप्पू यादव ने विपक्षी दलों को एकजुट होने की सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि छोटी पार्टियों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर नहीं लड़ना चाहिए, बल्कि 2027 और 2029 के चुनावों के लिए एक मजबूत गठबंधन बनाना जरूरी है। उनका मानना है कि बिखरा हुआ विपक्ष भाजपा के सामने कमजोर पड़ता है।

    अपने बयान में उन्होंने कई क्षेत्रीय नेताओं और दलों के कमजोर पड़ने का जिक्र करते हुए कहा कि अब विपक्ष को नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान कई जगहों पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हुई।

    पप्पू यादव के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। जहां एक ओर उनके आरोपों ने चुनावी पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दूसरी ओर सियासी बयानबाजी का दौर भी तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

  • बंगाल में सत्ता बदली तो मचा बवाल! ममता-अभिषेक के घरों से हटी सुरक्षा, TMC ऑफिस पर बुलडोजर, देशभर में सियासी हलचल तेज

    बंगाल में सत्ता बदली तो मचा बवाल! ममता-अभिषेक के घरों से हटी सुरक्षा, TMC ऑफिस पर बुलडोजर, देशभर में सियासी हलचल तेज



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की सियासत में उबाल साफ नजर आ रहा है। रिजल्ट के महज दो दिन बाद ही हालात ऐसे बने कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के घरों से अतिरिक्त सुरक्षा हटा ली गई। कोलकाता के कैमैक स्ट्रीट स्थित पार्टी मुख्यालय से भी पुलिस बल कम कर दिया गया, जिससे पूरे घटनाक्रम को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, अभिषेक बनर्जी को पहले की तरह Z कैटेगरी सुरक्षा मिलती रहेगी, लेकिन अचानक सुरक्षा में कटौती ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।

    इधर, चुनाव नतीजों के बाद शुरू हुई हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही। कोलकाता के न्यू मार्केट इलाके में मंगलवार रात हालात उस वक्त बिगड़ गए जब उग्र भीड़ ने टीएमसी के पार्टी कार्यालय पर बुलडोजर चला दिया। इस दौरान आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई, जिससे इलाके में दहशत फैल गई। टीएमसी ने इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए बीजेपी पर निशाना साधा और इसे ‘परिवर्तन की असल तस्वीर’ बताया। वहीं विपक्षी दलों ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नॉर्थ 24 परगना के संदेशखाली में हुई घटना से भी लगाया जा सकता है, जहां गश्त कर रही पुलिस और केंद्रीय बलों पर हमला कर दिया गया। उपद्रवियों की फायरिंग में पांच सुरक्षाकर्मी घायल हो गए, जिनमें एक महिला पुलिसकर्मी भी शामिल है। मौके से बम से भरा बैग मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं और पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

    इस बीच, बंगाल की सियासत के साथ-साथ दक्षिण भारत में भी बड़ा राजनीतिक मोड़ देखने को मिला है। तमिलनाडु में कांग्रेस ने बड़ा दांव खेलते हुए TVK प्रमुख विजय को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस नेताओं ने खुद उनके मुख्यालय पहुंचकर समर्थन पत्र सौंपा, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि राज्य में नई राजनीतिक धुरी बनने की कोशिश हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने इसके साथ ही DMK से अपना पुराना गठबंधन भी तोड़ दिया है।

    हालांकि, तमिलनाडु में अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। TVK और AIADMK के बीच संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पार्टी नेताओं की मुलाकातों ने सियासी अटकलों को और हवा दे दी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह तय होगा कि विजय किसके साथ मिलकर सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

    कुल मिलाकर, एक तरफ बंगाल हिंसा और राजनीतिक टकराव की आग में झुलस रहा है, तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में सत्ता समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। देश की राजनीति इस वक्त एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जहां हर दिन नई घटनाएं और नए गठबंधन तस्वीर को और दिलचस्प बना रहे हैं।

  • बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?

    बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत और भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर एक नया दिलचस्प मोड़ सामने आया है। बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने पश्चिम बंगाल में BJP की संभावित जीत पर खुशी जताई है और इसे दोनों देशों के रिश्तों के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।

    BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी सरकार को इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और बांग्लादेश, दोनों ही इस समझौते को अंतिम रूप देना चाहते थे, लेकिन राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पाई।

    BNP नेताओं को उम्मीद है कि अगर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति आएगी और सीमा व जल विवाद जैसे मुद्दों पर प्रगति हो सकती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा इसी राज्य की लगती है।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में है तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इस नदी पर दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के 50% पानी की मांग करता रहा है, जबकि भारत भी अपने हिस्से को लेकर संतुलन बनाए रखना चाहता है।

    तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रयास कई बार हुए, लेकिन हर बार सहमति बनने से पहले ही मामला अटक गया। 2011 में एक प्रस्ताव तैयार हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन उस समय भी ममता बनर्जी के विरोध के चलते समझौता आगे नहीं बढ़ पाया।

    राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता नदी में पहले ही पानी का प्रवाह कम हो चुका है और अगर अतिरिक्त पानी साझा किया गया, तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। यही वजह है कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।

    गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता नदी का मुद्दा अब भी दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा लंबित जल विवाद बना हुआ है।

    कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत-बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में सियासी समीकरण बदलते हैं या फिर तीस्ता का यह विवाद यूं ही अधूरा रह जाता है।

  • West Bengal: ममता बनर्जी के आवास से हटाए बैरिकेड्स… अभिषेक के दफ्तर से भी हटाई सुरक्षा

    West Bengal: ममता बनर्जी के आवास से हटाए बैरिकेड्स… अभिषेक के दफ्तर से भी हटाई सुरक्षा


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal.) में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) (Trinamool Congress – TMC) की करारी हार और सत्ता से बेदखल होने के एक दिन बाद, दक्षिण कोलकाता (Kolkata) में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) के आवास के बाहर लगाए गए बैरिकेड्स मंगलवार को आंशिक रूप से हटा दिए गए. साथ ही उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) के ऑफिस से भी सुरक्षा हटा ली गई है. पुलिस का कहना है कि ये कदम आला अधिकारियों के निर्देश और सुरक्षा-व्यवस्था की नई समीक्षा के तहत उठाया गया है।

    जानकारी के अनुसार, ममता बनर्जी के 30बी हरिश चटर्जी स्ट्रीट स्थित आवास के आसपास सुबह से पुलिसकर्मी स्मार्ट बैरिकेड्स को हटाते नजर आए. हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, लेकिन मौके पर मौजूद एक कोलकाता पुलिस अधिकारी ने बताया कि उन्हें सीनियर अधिकारियों के निर्देश पर ये कार्रवाई की है। अधिकारी ने कहा, ‘हमने सीनियर अधिकारियों के निर्देश पर काम किया है. कोई खास वजह नहीं बताई गई.’ आवास के पास पुलिस कियोस्क अभी-भी मौजूद है, लेकिन इलाके में भारी सुरक्षा व्यवस्था आंशिक रूप से कम हो गई है.


    हाई सिक्योरिटी जोन में ढील

    ममता बनर्जी का निवास क्षेत्र अब तक एक उच्च-सुरक्षा क्षेत्र था, जहां वाहनों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रहती थी. स्थानीय निवासियों को भी अपने घरों तक पहुंचने के लिए पहचान पत्र दिखाना पड़ता था. बैरिकेड्स हटाने से अब इन प्रतिबंधों में काफी ढील मिल गई है. हालांकि, इलाके में एक पुलिस कियोस्क अभी भी मौजूद है, लेकिन सुरक्षाकर्मियों की भारी तैनाती अब काफी कम हो गई है।


    अभिषेक के ऑफिस से वापस ली सुरक्षा

    इसके साथ ही पुलिस प्रशासन ने टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के कैमक स्ट्रीट स्थित ऑफिस से भी सुरक्षा हटा ली गई है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की है कि परिसर से सुरक्षा बलों की वापसी हो चुकी है. ये कार्यालय पार्टी की महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र माना जाता रहा है, लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही यहां का सुरक्षा घेरा खत्म कर दिया गया है।


    नेताओं की सुरक्षा कवर की समीक्षा

    इसके अलावा कोलकाता पुलिस अब निवर्तमान टीएमसी सरकार के अन्य बड़े नेताओं की सुरक्षा की भी समीक्षा कर रही है. अधिकारियों के मुताबिक वर्तमान आवश्यकताओं के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है. इस समीक्षा सूची में फिरहाद हकीम, अरूप विश्वास और सुजीत बोस जैसे कद्दावर नेताओं के नाम शामिल हैं. आने वाले दिनों में कई अन्य नेताओं की सुरक्षा में भी बदलाव किए जा सकते हैं.

    आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ टीएमसी को बीजेपी ने करारी शिकस्त देते हुए दो तिहाई से ज्यादा बहुमत हासिल किया है. बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि सत्तारूढ़ टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई है।