Tag: Middle East crisis

  • ईरान का ‘हार्ट अटैक’ हथियार! हूट टॉरपीडो से अमेरिका को चेतावनी, कितना खतरनाक है ये सीक्रेट वेपन?

    ईरान का ‘हार्ट अटैक’ हथियार! हूट टॉरपीडो से अमेरिका को चेतावनी, कितना खतरनाक है ये सीक्रेट वेपन?


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते टकराव के बीच ईरान ने अपने एक कथित “खौफनाक हथियार” का संकेत देकर वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान खींच लिया है। ईरानी नौसेना के कमांडर Shahram Irani ने दावा किया है कि जल्द ही दुश्मन सेनाओं के खिलाफ ऐसा हथियार इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे उनके नेताओं तक को “हार्ट अटैक” जैसा डर महसूस हो सकता है।

    इस बयान के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि ईरान आखिर किस हथियार की बात कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह इशारा संभवतः ईरान के ‘हूट’ (Hoot) सुपर-कैविटेटिंग टॉरपीडो की ओर हो सकता है एक ऐसा अंडरवाटर हथियार जो अपनी रफ्तार और मारक क्षमता के लिए जाना जाता है।

    ‘हूट’ टॉरपीडो को लेकर कहा जाता है कि यह पारंपरिक टॉरपीडो से कई गुना तेज है। जहां सामान्य टॉरपीडो 60 से 100 किमी/घंटा की गति से चलते हैं, वहीं ईरान दावा करता है कि उसका हूट 300 किमी/घंटा से ज्यादा की रफ्तार पकड़ सकता है। इसकी खासियत है “सुपर-कैविटेशन” तकनीक, जिसमें टॉरपीडो अपने चारों ओर गैस का बुलबुला बनाता है, जिससे पानी का प्रतिरोध बेहद कम हो जाता है और यह तेज रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ता है।

    यह तकनीक सबसे पहले Russia ने अपने VA-111 Shkval टॉरपीडो में विकसित की थी। ईरान ने 2006 में हूट का परीक्षण किया था, लेकिन इसके बाद से इसकी क्षमताओं को लेकर ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। यही कारण है कि इसे “सीक्रेट वेपन” के तौर पर पेश किया जाता है।

    हालांकि, इस हथियार की ताकत जितनी चर्चा में है, उसकी सीमाएं भी उतनी ही अहम हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी तेज गति के कारण इसे नियंत्रित करना मुश्किल होता है। गैस के बुलबुले और शोर के कारण यह आसानी से सोनार सिस्टम में भी पकड़ा जा सकता है। यानी यह हथियार बेहद तेज जरूर है, लेकिन पूरी तरह अचूक नहीं।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह अमेरिकी युद्धपोतों या एयरक्राफ्ट कैरियर को नुकसान पहुंचा सकता है? United States के एयरक्राफ्ट कैरियर अत्याधुनिक सुरक्षा कवच, मल्टी-लेयर डिफेंस और हाई टेक रडार सिस्टम से लैस होते हैं। ऐसे में किसी एक टॉरपीडो से उन्हें डुबाना बेहद मुश्किल माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस हथियार का इस्तेमाल करता भी है, तो उसका सबसे संभावित क्षेत्र Strait of Hormuz हो सकता है एक संकरा समुद्री मार्ग जहां जहाजों की आवाजाही सीमित रहती है। हालांकि, अमेरिकी नौसेना आमतौर पर इस क्षेत्र से सुरक्षित दूरी बनाए रखती है।

    ईरान का “हार्ट अटैक हथियार” फिलहाल ज्यादा एक मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक संदेश नजर आता है, न कि तुरंत तबाही मचाने वाला गेम-चेंजर।फिर भी, मिडिल ईस्ट में बढ़ती बयानबाजी और सैन्य तैयारियों के बीच यह साफ है कि आने वाले समय में समुद्री युद्ध तकनीक और भी खतरनाक और जटिल हो सकती है।

  • होर्मुज में हाई अलर्ट: भारत का LNG जहाज दरवाजे पर, अमेरिका–ईरान तनातनी से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर खतरा

    होर्मुज में हाई अलर्ट: भारत का LNG जहाज दरवाजे पर, अमेरिका–ईरान तनातनी से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर खतरा


    नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन कहा जाता है, एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। इसी बीच भारत से रवाना LNG जहाज Umm Al Ashtan इस संवेदनशील समुद्री मार्ग के करीब पहुंच चुका है। यह जहाज गुजरात के दाहेज पोर्ट से निकला है और यूएई के Das Island की ओर बढ़ रहा है, जहां से इसे तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) लोड करनी है।

    हालात इसलिए ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे वैश्विक बाजारों और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकता है।

    ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा है कि संभावित नौसैनिक नाकेबंदी दरअसल सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति है। उन्होंने साफ किया कि ईरान अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा और किसी भी आक्रामक कदम का जवाब देने के लिए तैयार है।

    दूसरी ओर, Donald Trump ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए दावा किया है कि हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की रक्षा क्षमता को काफी कमजोर कर दिया है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान पहुंचा है और उसका मिसाइल उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान अब बातचीत के लिए तैयार दिख रहा है।

    इस तनावपूर्ण माहौल में Umm Al Ashtan का होर्मुज के पास पहुंचना एक अहम संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्शाता है कि यूएई के दास द्वीप से LNG उत्पादन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। यह द्वीप हर साल लगभग 6 मिलियन टन LNG उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जो वैश्विक आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती। Qatar जैसे बड़े LNG निर्यातक देशों के जहाज अभी भी सावधानी बरत रहे हैं। कई कार्गो शिप्स या तो इस क्षेत्र में रुके हुए हैं या वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहे हैं।

    इसी बीच कुछ राहत भरी खबरें भी सामने आई हैं। हाल के दिनों में चीन और जापान जाने वाले कुछ जहाज इस मार्ग से सफलतापूर्वक गुजर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन जोखिम बरकरार है।होर्मुज में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो चुका है और अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो यह महंगाई और सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकता है।

    भारत का LNG जहाज ऐसे समय इस हाई-रिस्क जोन में प्रवेश करने जा रहा है, जब मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है।

  • हाइपरसोनिक वार की तैयारी? ईरान पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ विकल्प पर अमेरिका, मिडिल ईस्ट में बढ़ी टेंशन

    हाइपरसोनिक वार की तैयारी? ईरान पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ विकल्प पर अमेरिका, मिडिल ईस्ट में बढ़ी टेंशन


    नई दिल्ली। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (United States Central Command) ने व्हाइट हाउस में हुई एक अहम बैठक में राष्ट्रपति Donald Trump को ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के विकल्पों की जानकारी दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कमांडर Brad Cooper ने एक “छोटा लेकिन बेहद शक्तिशाली हमला” करने की रणनीति प्रस्तुत की, जिसमें ईरान की बची हुई सैन्य क्षमता, नेतृत्व और महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाया जा सकता है।

    इस प्रस्ताव में अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल पर भी विचार किया जा रहा है, जिनमें ‘डार्क ईगल’ हाइपरसोनिक मिसाइल शामिल है। यह मिसाइल करीब 3,200 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम मानी जाती है और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चरों को टारगेट कर सकती है।

    इसके साथ ही अमेरिकी वायुसेना ने B-1B Lancer जैसे भारी बमवर्षक विमानों की तैनाती भी बढ़ा दी है, जो बड़ी मात्रा में हथियार और उन्नत मिसाइल सिस्टम ले जाने में सक्षम हैं।

    बढ़ते तनाव के संकेत:
    बीते 24 घंटों में घटनाक्रम तेजी से बदला है। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सख्त संदेश देते हुए कहा कि “तूफान आगे बढ़ रहा है, इसे कोई नहीं रोक पाएगा।” दूसरी ओर, ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है।

    Mojtaba Khamenei ने चेतावनी दी कि अगर हमला हुआ तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी और हमलावरों को “समंदर में डुबो दिया जाएगा।”

    इसी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया। कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो पिछले चार वर्षों में सबसे ऊंचा स्तर है, हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट आई।


    जमीनी हालात और क्षेत्रीय असर:
    दूसरी ओर, लेबनान में भी हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं। दक्षिणी इलाकों में हुए हमलों में कई लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की खबर है। यह घटनाएं ऐसे समय में सामने आई हैं जब संघर्ष विराम लागू होने के बावजूद Hezbollah और इजरायल के बीच तनाव बना हुआ है।

    ट्रम्प का बदला हुआ सुर:
    हालांकि, इन सभी तैयारियों के बीच ट्रम्प ने यह भी कहा है कि वे दोबारा हमले शुरू करने के पक्ष में नहीं हैं और फिलहाल सीजफायर तोड़ने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि ईरान समझौते के लिए तैयार नजर आ रहा है।एक तरफ सैन्य तैयारियां और दूसरी ओर कूटनीतिक बयान—इन दोनों के बीच मिडिल ईस्ट की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है।

  • सीधी बातचीत नहीं, लेकिन बातचीत जारी ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान के जरिए कूटनीतिक प्रयास तेज

    सीधी बातचीत नहीं, लेकिन बातचीत जारी ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान के जरिए कूटनीतिक प्रयास तेज


    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीतिक बातचीत की संभावना बनती दिखाई दे रही है, हालांकि इस बार दोनों देश सीधे बातचीत से दूरी बनाए रखते हुए अप्रत्यक्ष माध्यमों का सहारा ले सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच के रूप में उभरता दिख रहा है।

    जानकारी के अनुसार ईरान से एक प्रतिनिधिमंडल पहले ही पाकिस्तान पहुंच चुका है जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के भी वहां पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। यह बातचीत किसी औपचारिक सीधी बैठक के बजाय मध्यस्थों के जरिए आगे बढ़ सकती है।

    ईरान ने पहले अमेरिका के साथ सीधे बातचीत करने से इनकार कर दिया था जिसके चलते पिछले दौर की वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी थी। हालांकि बाद में क्षेत्रीय दबाव और सीजफायर से जुड़े मुद्दों के चलते दोनों पक्षों ने फिर से संवाद की संभावना तलाशनी शुरू की है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया में अब्बास अराघची की भूमिका महत्वपूर्ण है जो क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचे हैं। उनका उद्देश्य सीधी बातचीत से ज्यादा क्षेत्रीय समन्वय और मध्यस्थता के जरिए समाधान तलाशना बताया जा रहा है।

    दूसरी तरफ अमेरिकी पक्ष से भी वरिष्ठ प्रतिनिधियों की सक्रियता देखी जा रही है जिनमें ट्रंप प्रशासन से जुड़े सलाहकार और दूत शामिल हैं। हालांकि दोनों देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल किसी औपचारिक आमने-सामने बैठक की योजना नहीं है।

    इस बीच क्षेत्रीय तनाव भी बना हुआ है जहां समुद्री मार्गों और जहाजों को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति देखी गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

    पिछले दौर की बातचीत में ओमान जैसे देशों की मध्यस्थता अहम रही थी और अब भी उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान सहित कुछ अन्य क्षेत्रीय देश इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।

    व्हाइट हाउस की ओर से संकेत दिए गए हैं कि अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है लेकिन अंतिम निर्णय परिस्थितियों और प्रगति पर निर्भर करेगा। वहीं ईरान का रुख अब भी यह है कि वह सीधे नहीं बल्कि मध्यस्थों के जरिए ही अपनी बात रखेगा।

    कुल मिलाकर मौजूदा स्थिति में तनाव और बातचीत दोनों साथ-साथ चलते दिखाई दे रहे हैं जहां एक ओर टकराव की आशंका बनी हुई है वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक समाधान की हल्की उम्मीद भी जिंदा है।

  • समुद्र में सियासी संग्राम ,अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान का कड़ा रुख, बोला मुंहतोड़ जवाब देंगे

    समुद्र में सियासी संग्राम ,अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान का कड़ा रुख, बोला मुंहतोड़ जवाब देंगे

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव गहराता नजर आ रहा है जहां अमेरिका और ईरान के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना द्वारा एक ईरानी जहाज को जब्त किए जाने के बाद हालात तेजी से बिगड़ते दिख रहे हैं। इस कार्रवाई के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे सीधी उकसावे वाली कार्रवाई बताया है और जवाब देने की चेतावनी दी है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस घटना की जानकारी देते हुए बताया कि ईरान के झंडे वाला एक बड़ा कार्गो जहाज अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी को पार करने की कोशिश कर रहा था। उनके अनुसार लगभग 900 फीट लंबे इस जहाज को रोकने के लिए पहले चेतावनी दी गई लेकिन जब जहाज के क्रू ने निर्देशों का पालन नहीं किया तो अमेरिकी नौसेना को सख्त कार्रवाई करनी पड़ी।

    बताया जा रहा है कि अमेरिकी गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS Spruance ने जहाज को रोकने के लिए उसके इंजन रूम को निशाना बनाया जिससे वह आगे बढ़ने में असमर्थ हो गया। इसके बाद अमेरिकी मरीन ने जहाज को अपने कब्जे में ले लिया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इस जहाज पर पहले से वित्तीय प्रतिबंध लगे हुए थे और यह गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल रहा है।

    वहीं दूसरी ओर ईरान ने इस कार्रवाई को पूरी तरह गलत बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। ईरानी सेना ने इसे समुद्री रास्ते में की गई डकैती करार दिया है और आरोप लगाया है कि अमेरिका ने न केवल जहाज को रोका बल्कि उसके नेविगेशन सिस्टम को भी नुकसान पहुंचाया और उस पर सैन्य कब्जा कर लिया। ईरान के सरकारी माध्यमों के जरिए जारी बयान में स्पष्ट कहा गया है कि इस कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और जल्द ही जवाबी कदम उठाए जाएंगे।

    यह घटना ऐसे समय में हुई है जब दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा चल रही थी। खबरों के अनुसार अमेरिका की ओर से एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के इस्लामाबाद जाने वाला है जहां संभावित वार्ता हो सकती है। इस प्रतिनिधिमंडल में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस स्पेशल दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर शामिल बताए जा रहे हैं।

    हालांकि ईरान की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से इस बैठक की पुष्टि नहीं की गई है और वहां के मीडिया में भी इस पर संदेह जताया जा रहा है। ऐसे में यह घटना दोनों देशों के बीच संभावित कूटनीतिक प्रयासों पर भी असर डाल सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ओमान की खाड़ी जैसी संवेदनशील जगह पर इस तरह की सैन्य कार्रवाई वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा सकती है क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि ईरान अपनी चेतावनी को किस हद तक अमल में लाता है और क्या दोनों देश बातचीत के जरिए इस तनाव को कम करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं या यह टकराव और गंभीर रूप ले लेता है।

  • अमेरिका ईरान तनाव चरम पर ट्रंप की सख्त चेतावनी दूतावास ने कहा स्ट्रेट पहले से खुला

    अमेरिका ईरान तनाव चरम पर ट्रंप की सख्त चेतावनी दूतावास ने कहा स्ट्रेट पहले से खुला


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है जहां बयानबाजी के साथ साथ सैन्य कार्रवाई की आशंकाएं भी तेज हो गई हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर ईरान को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए साफ कर दिया है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर उसकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो बड़े पैमाने पर हमले किए जा सकते हैं।

    ट्रंप ने ईरान को सोमवार तक की मोहलत देते हुए चेतावनी दी है कि यदि मंगलवार तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह नहीं खोला गया तो ईरान के पावर प्लांट और पुलों को निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बेहद सख्त लहजे में लिखा कि ईरान के लिए आने वाला दिन पावर प्लांट और ब्रिज डे जैसा साबित हो सकता है जो अभूतपूर्व होगा। यह बयान इस बात का संकेत है कि अमेरिका केवल कूटनीतिक दबाव तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि सैन्य विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है।

    हालांकि ईरान की ओर से इस पर तुरंत प्रतिक्रिया आई है। फिनलैंड में स्थित ईरानी दूतावास ने ट्रंप के बयान को खारिज करते हुए कहा कि होर्मुज स्ट्रेट पहले से खुला हुआ है और उसके मित्र देशों के जहाजों के लिए किसी तरह की बाधा नहीं है। दूतावास ने यह भी कहा कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक बयान देते समय संयम और तथ्यों का ध्यान रखना जरूरी है।

    ईरान की इस प्रतिक्रिया से साफ है कि वह अमेरिकी आरोपों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और अपने रुख पर कायम है। साथ ही उसने ट्रंप के बयान के लहजे पर भी सवाल उठाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से इसे गैर जिम्मेदाराना बताया है।

    इस बीच ट्रंप ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में भी अपने सख्त रुख को दोहराया। उन्होंने कहा कि अगर ईरान तय समयसीमा तक कदम नहीं उठाता है तो उसके इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि ईरान अपने पूरे देश में मौजूद पावर प्लांट्स और अन्य महत्वपूर्ण सुविधाएं खो सकता है।

    ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं लेकिन नतीजा अभी तक सामने नहीं आया है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं लेकिन यदि ईरान ने सहयोग नहीं किया तो अमेरिका कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

    कुल मिलाकर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी है वहीं दूसरी ओर सैन्य टकराव का खतरा भी मंडरा रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में कोई समाधान निकलता है या फिर यह तनाव और ज्यादा गहरा होकर बड़े संघर्ष का रूप ले लेता है।

  • वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क

    वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में वेस्ट एशिया का बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव में अब हूती विद्रोही भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। हूतियों द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस संघर्ष को और व्यापक बना दिया है।

    पहले ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के बाधित होने की आशंका से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, और अब स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर भी संकट गहराने की संभावना जताई जा रही है। यह अहम समुद्री मार्ग रेड सी और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और दुनिया के करीब 12 प्रतिशत व्यापार का रास्ता है।

    इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना पूरी तरह अलर्ट मोड में है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत तैनात किए गए हैं। एंटी-पायरेसी मिशन के तहत पहले से मौजूद निगरानी को अब और मजबूत किया गया है।

    भारतीय नौसेना इस समय कच्चे तेल और एलपीजी ले जाने वाले भारतीय टैंकरों को एस्कॉर्ट कर रही है ताकि उन्हें किसी भी संभावित खतरे से सुरक्षित रखा जा सके। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा देने की भी तैयारी है।

    हालांकि अभी तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी में किसी बड़े जहाज को निशाना नहीं बनाया है, लेकिन हालात तेजी से बदल सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञ संजय कुलकर्णी का मानना है कि ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते हूती इस रणनीतिक मार्ग को ‘वेपोनाइज’ कर सकते हैं, यानी इसे दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

    यदि ऐसा होता है, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। महंगाई बढ़ सकती है, उर्वरकों की कीमतों में इजाफा हो सकता है और निर्यात प्रभावित हो सकता है।

    जिबूती जैसे रणनीतिक स्थानों पर अमेरिका, चीन, जापान और फ्रांस की सैन्य मौजूदगी के कारण इस क्षेत्र को पूरी तरह बाधित करना आसान नहीं है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला भी नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा है। एक प्रमुख मार्ग फारस की खाड़ी से होकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, ओमान की खाड़ी और अरब सागर तक जाता है, जबकि दूसरा मार्ग स्वेज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी के जरिए अरब सागर से जुड़ता है।

    यदि ये दोनों मार्ग प्रभावित होते हैं, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों में भारी बढ़ोतरी होगी। भारत के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका से आता है।

    कुल मिलाकर, वेस्ट एशिया में बढ़ता यह संघर्ष अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • बढ़ते तनाव के बीच ईरान का कड़ा कानून: दुश्मन देशों को सूचना भेजना पड़ेगा भारी

    बढ़ते तनाव के बीच ईरान का कड़ा कानून: दुश्मन देशों को सूचना भेजना पड़ेगा भारी


    नई दिल्ली । तेहरान में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा और सख्त फैसला लेते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि अमेरिका और इजरायल को किसी भी प्रकार की संवेदनशील जानकारी फोटो या वीडियो भेजने वालों को मौत की सजा दी जा सकती है। यह बयान ईरान की न्यायपालिका के प्रवक्ता असगर जहांगीर ने दिया है जिसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

    असगर जहांगीर ने कहा कि दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना देना सीधे तौर पर जासूसी की श्रेणी में आता है और इसके लिए कठोरतम दंड का प्रावधान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हमले से प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीरें या वीडियो साझा करता है तो यह दुश्मन को यह संकेत देने जैसा है कि उनका हमला सही जगह पर हुआ है। इस तरह की गतिविधियां राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ मानी जाएंगी।

    यह सख्त रुख ऐसे समय में सामने आया है जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा हाल ही में ईरान के तेल भंडार को निशाना बनाते हुए हमला किया गया। इस हमले के वीडियो भी सार्वजनिक किए गए जिसके बाद ईरान की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया गया है।

    ईरान के अधिकारियों के मुताबिक पिछले अक्टूबर में पारित किए गए नए जासूसी कानून के तहत अब दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना भेजना गंभीर अपराध माना जाएगा। इस कानून में दोषी पाए जाने पर न सिर्फ संपत्ति जब्त की जा सकती है बल्कि मौत की सजा तक दी जा सकती है।

    इसी क्रम में ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कार्रवाई तेज कर दी है। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिन पर अमेरिका और इजरायल से जुड़ी खुफिया एजेंसियों को संवेदनशील जानकारी भेजने का आरोप है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने कथित तौर पर सुरक्षित स्थानों की जानकारी देने के बदले क्रिप्टोकरेंसी प्राप्त की थी।

    ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन दोनों को पूर्वी अजरबैजान प्रांत के ओस्कू इलाके से हिरासत में लिया गया और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया गया है। इससे पहले भी इसी तरह के आरोपों में दो अन्य लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी है जिससे यह साफ है कि ईरान इस मुद्दे पर कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है।

    इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने क्षेत्रीय समर्थन को लेकर इराक का आभार जताया है। उन्होंने कहा कि इराकी लोग इस संघर्ष में मजबूरी से नहीं बल्कि साझा इतिहास पहचान और धार्मिक मूल्यों के आधार पर ईरान के साथ खड़े हैं।

    कुल मिलाकर अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान का यह कड़ा रुख यह संकेत देता है कि देश अपनी आंतरिक सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क है और किसी भी प्रकार की जासूसी गतिविधि को सख्ती से कुचलने के लिए तैयार है।

  • युद्ध की मार सबसे ज्यादा बच्चों, पर मध्य पूर्व में बढ़ता मानवीय संकट….

    युद्ध की मार सबसे ज्यादा बच्चों, पर मध्य पूर्व में बढ़ता मानवीय संकट….


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में जारी सैन्य संघर्ष ने एक बार फिर मानवीय संकट को गहरा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष UNICEF ने चिंता जताते हुए बताया है कि इस हिंसा में अब तक 2100 से अधिक बच्चे या तो मारे जा चुके हैं या घायल हुए हैं। संगठन के उप कार्यकारी निदेशक टेड चैबन ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि संघर्ष के 23 दिन बीतने के बावजूद हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार हर दिन औसतन 87 बच्चे इस संघर्ष का शिकार बन रहे हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। ईरान में 206 बच्चों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि लेबनान में 118, इजरायल में 4 और कुवैत में 1 बच्चे की जान गई है। इसके अलावा लगातार बमबारी और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेशों के चलते लाखों परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

    संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार ईरान में लगभग 32 लाख लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें करीब 8 लाख 64 हजार बच्चे शामिल हैं। वहीं लेबनान में 10 लाख से अधिक लोग अपने घर छोड़ चुके हैं, जिनमें लगभग 3 लाख 70 हजार बच्चे हैं। इससे स्पष्ट है कि युद्ध का सबसे बड़ा असर मासूमों और उनके भविष्य पर पड़ रहा है।

    टेड चैबन ने चेतावनी दी कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है, तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है। उन्होंने कहा कि पहले से ही मध्य पूर्व में लगभग 4 करोड़ 48 लाख बच्चे ऐसे हालात में रह रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में संघर्ष से प्रभावित हैं। ऐसे में मौजूदा हिंसा इनकी स्थिति को और भी बदतर बना सकती है।

    लेबनान की स्थिति पर बोलते हुए उन्होंने बताया कि वहां 350 से ज्यादा सरकारी स्कूलों को अस्थायी राहत शिविर में बदल दिया गया है, जिससे लगभग 1 लाख बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है। इसके साथ ही पानी की व्यवस्था बाधित हुई है और कई स्वास्थ्यकर्मियों की भी जान जा चुकी है, जो राहत कार्यों को और कठिन बना रहा है।

    UNICEF ने अब तक 250 से अधिक शिविरों और दूर-दराज के इलाकों में करीब 1 लाख 51 हजार लोगों तक सहायता पहुंचाई है। साथ ही 46 हजार लोगों को स्वच्छ पानी और सैनिटेशन की सुविधा दी जा रही है, लेकिन संगठन ने यह भी कहा कि जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और संसाधन सीमित पड़ रहे हैं।

    अंत में टेड चैबन ने सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करने की अपील की और कहा कि इस संघर्ष को रोकने के लिए एक राजनीतिक समाधान बेहद जरूरी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस संकट पर तुरंत और प्रभावी कार्रवाई करने की मांग की।

  • ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक

    ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम ने वैश्विक चिंता को और गहरा कर दिया है। इस अल्टीमेटम के बाद जहां ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी, वहीं अब रूस ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। रूस का कहना है कि मौजूदा हालात को युद्ध के बजाय राजनीतिक और रणनीतिक तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए।

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने साफ शब्दों में कहा कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने का एकमात्र प्रभावी तरीका संवाद और कूटनीति है। उनका मानना है कि सैन्य कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं, जिसका असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

    रूस ने खास तौर पर ईरान के बुशहर परमाणु पावर प्लांट पर संभावित हमले की आशंका को बेहद गंभीर बताया है। पेसकोव ने चेतावनी दी कि किसी भी परमाणु सुविधा पर हमला न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा बल्कि इससे मानवीय आपदा भी पैदा हो सकती है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि रूस इस मुद्दे पर अमेरिका तक अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से पहुंचा चुका है।

    इसी बीच, ईरान के नतांज परमाणु परिसर पर हाल ही में हुए हमलों ने भी स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। यह परिसर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां यूरेनियम संवर्धन का कार्य होता है। इस पर हुए हमले को रूस ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ बताते हुए कड़ी निंदा की थी।

    इस मामले में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी ने भी चिंता व्यक्त की है। हालांकि एजेंसी ने स्पष्ट किया कि किसी प्रकार का रेडियोएक्टिव रिसाव नहीं हुआ, लेकिन उसने एहतियात बरतने और स्थिति पर करीबी नजर रखने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

    मौजूदा हालात ऐसे समय में सामने आए हैं जब पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं, और इजरायल भी इस समीकरण का अहम हिस्सा है। ऐसे में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को बड़े संघर्ष की ओर धकेल सकती है।

    रूस का यह बयान वैश्विक स्तर पर शांति की अपील के रूप में देखा जा रहा है। यह साफ संकेत देता है कि बड़ी शक्तियां अब इस संकट को युद्ध के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाने के पक्ष में हैं। हालांकि, आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या संबंधित देश इस सलाह को मानते हैं या फिर यह तनाव एक बड़े संघर्ष का रूप लेता है।